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2. śukraśōṇitaśuddhiśārīram

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ শুক্রশোণিতশুদ্ধিশারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः शुक्रशोणितशुद्धिशारीरं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

বাত-পিত্ত-শ্লেষ্ম-কুণপ -গ্রন্থি-পূতিপূয-ক্ষীণ-মূত্রপুরীষরেতসঃ প্রজোত্পাদনে ন সমর্থা ভবন্তি ||৩||

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वात-पित्त-श्लेष्म-कुणप -ग्रन्थि-पूतिपूय-क्षीण-मूत्रपुरीषरेतसः प्रजोत्पादने न समर्था भवन्ति ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

তেষু বাতবর্ণবেদনং বাতেন, পিত্তবর্ণবেদনং পিত্তেন, শ্লেষ্মবর্ণবেদনং শ্লেষ্মণা, কুণপগন্ধ্যনল্পং চ রক্তেন, গ্রন্থিভূতং শ্লেষ্মবাতাভ্যাং, পূতিপূযনিভং পিত্তশ্লেষ্মভ্যাং, ক্ষীণং প্রাগুক্তং পিত্তমারুতাভ্যাং, মূত্রপুরীষগন্ধি সন্নিপাতেনেতি | তেষু কুণপগ্রন্থিপূতিপূযক্ষীণরেতসঃ কৃচ্ছ্রসাধ্যাঃ, মূত্রপুরীষরেতসস্ত্বসাধ্যা ইতি ||৪||

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तेषु वातवर्णवेदनं वातेन, पित्तवर्णवेदनं पित्तेन, श्लेष्मवर्णवेदनं श्लेष्मणा, कुणपगन्ध्यनल्पं च रक्तेन, ग्रन्थिभूतं श्लेष्मवाताभ्यां, पूतिपूयनिभं पित्तश्लेष्मभ्यां, क्षीणं प्रागुक्तं पित्तमारुताभ्यां, मूत्रपुरीषगन्धि सन्निपातेनेति | तेषु कुणपग्रन्थिपूतिपूयक्षीणरेतसः कृच्छ्रसाध्याः, मूत्रपुरीषरेतसस्त्वसाध्या इति ||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

আর্তবমপি ত্রিভির্দোষৈঃ শোণিতচতুর্থৈঃ পৃথগ্দ্বন্দ্বৈঃ সমস্তৈশ্চোপসৃষ্টমবীজং ভবতি; তদপি দোষবর্ণবেদনাদিভির্বিজ্ঞেযম্ | তেষু কুণপগ্রন্থিপূতিপূযক্ষীণমূত্রপুরীষপ্রকাশমসাধ্যং , সাধ্যমন্যচ্চেতি ||৫||

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आर्तवमपि त्रिभिर्दोषैः शोणितचतुर्थैः पृथग्द्वन्द्वैः समस्तैश्चोपसृष्टमबीजं भवति; तदपि दोषवर्णवेदनादिभिर्विज्ञेयम् | तेषु कुणपग्रन्थिपूतिपूयक्षीणमूत्रपुरीषप्रकाशमसाध्यं , साध्यमन्यच्चेति ||५||

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Adhikarana 5 (6-10) · Śloka 11

ভবন্তি চাত্র- তেষ্বাদ্যাঞ্ শুক্রদোষাংস্ত্রীন্ স্নেহস্বেদাদিভির্জযেত্ | ক্রিযাবিশেষৈর্মতিমাংস্তথা চোত্তরবস্তিভিঃ ||৬|| পাযযেত নরং সর্পির্ভিষক্ কুণপরেতসি | ধাতকীপুষ্পখদিরদাডিমার্জুনসাধিতম্ ||৭|| পাযযেদথবা সর্পিঃ শালসারাদিসাধিতম্ | গ্রন্থিভূতে শটীসিদ্ধং পালাশে বাঽপি ভস্মনি ||৮|| পরূষকবটাদিভ্যাং পূযপ্রখ্যে চ সাধিতম্ | প্রাগুক্তং বক্ষ্যতে যচ্চ তত্ কার্যং ক্ষীণরেতসি ||৯|| বিট্প্রভে পাযযেত্ সিদ্ধং চিত্রকোশীরহিঙ্গুভিঃ | স্নিগ্ধং বান্তং বিরিক্তং চ নিরূঢমনুবাসিতম্ ||১০|| যোজযেচ্ছুক্রদোষার্তং সম্যগুত্তরবস্তিনা |১১|

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भवन्ति चात्र- तेष्वाद्याञ् शुक्रदोषांस्त्रीन् स्नेहस्वेदादिभिर्जयेत् | क्रियाविशेषैर्मतिमांस्तथा चोत्तरबस्तिभिः ||६|| पाययेत नरं सर्पिर्भिषक् कुणपरेतसि | धातकीपुष्पखदिरदाडिमार्जुनसाधितम् ||७|| पाययेदथवा सर्पिः शालसारादिसाधितम् | ग्रन्थिभूते शटीसिद्धं पालाशे वाऽपि भस्मनि ||८|| परूषकवटादिभ्यां पूयप्रख्ये च साधितम् | प्रागुक्तं वक्ष्यते यच्च तत् कार्यं क्षीणरेतसि ||९|| विट्प्रभे पाययेत् सिद्धं चित्रकोशीरहिङ्गुभिः | स्निग्धं वान्तं विरिक्तं च निरूढमनुवासितम् ||१०|| योजयेच्छुक्रदोषार्तं सम्यगुत्तरबस्तिना |११|

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Adhikarana 6 (11) · Śloka 12

স্ফটিকাভং দ্রবং স্নিগ্ধং মধুরং মধুগন্ধি চ ||১১|| শুক্রমিচ্ছন্তি, কেচিত্তু তৈলক্ষৌদ্রনিভং তথা |১২|

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स्फटिकाभं द्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगन्धि च ||११|| शुक्रमिच्छन्ति, केचित्तु तैलक्षौद्रनिभं तथा |१२|

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Adhikarana 7 (12-16) · Śloka 16

বিধিমুত্তরবস্ত্যন্তং কুর্যাদার্তবশুদ্ধযে ||১২|| স্ত্রীণাং স্নেহাদিযুক্তানাং চতসৃষ্বার্তবার্তিষু | কুর্যাত্কল্কান্ পিচূংশ্চাপি পথ্যান্যাচমনানি চ ||১৩|| গ্রন্থিভূতে পিবেত্ পাঠাং ত্র্যূষণং বৃক্ষকাণি চ | দুর্গন্ধিপূযসঙ্কাশে মজ্জতুল্যে তথাঽঽর্তবে ||১৪|| পিবেদ্ভদ্রশ্রিযঃ ক্বাথং চন্দনক্বাথমেব চ | শুক্রদোষহরাণাং চ যথাস্বমবচারণম্ ||১৫|| যোগানাং শুদ্ধিকরণং শেষাস্বপ্যার্তবার্তিষু | অন্নং শালিযবং মদ্যং হিতং মাংসং চ পিত্তলম্ ||১৬||

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विधिमुत्तरबस्त्यन्तं कुर्यादार्तवशुद्धये ||१२|| स्त्रीणां स्नेहादियुक्तानां चतसृष्वार्तवार्तिषु | कुर्यात्कल्कान् पिचूंश्चापि पथ्यान्याचमनानि च ||१३|| ग्रन्थिभूते पिबेत् पाठां त्र्यूषणं वृक्षकाणि च | दुर्गन्धिपूयसङ्काशे मज्जतुल्ये तथाऽऽर्तवे ||१४|| पिबेद्भद्रश्रियः क्वाथं चन्दनक्वाथमेव च | शुक्रदोषहराणां च यथास्वमवचारणम् ||१५|| योगानां शुद्धिकरणं शेषास्वप्यार्तवार्तिषु | अन्नं शालियवं मद्यं हितं मांसं च पित्तलम् ||१६||

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Adhikarana 8 (17) · Śloka 17

শশাসৃক্প্রতিমং যত্তু যদ্বা লাক্ষারসোপমম্ | তদার্তবং প্রশংসন্তি যদ্বাসো ন বিরঞ্জযেত্ ||১৭||

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शशासृक्प्रतिमं यत्तु यद्वा लाक्षारसोपमम् | तदार्तवं प्रशंसन्ति यद्वासो न विरञ्जयेत् ||१७||

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Adhikarana 9 (18-20) · Śloka 21

তদেবাতিপ্রসঙ্গেন প্রবৃত্তমনৃতাবপি | অসৃগ্দরং বিজানীযাদতোঽন্যদ্রক্তলক্ষণাত্ ||১৮|| অসৃগ্দরো ভবেত্ সর্বঃ সাঙ্গমর্দঃ সবেদনঃ | তস্যাতিবৃত্তৌ দৌর্বল্যং ভ্রমো মূর্চ্ছা তমস্তৃষা ||১৯|| দাহঃ প্রলাপঃ পাণ্ডুত্বং তন্দ্রা রোগাশ্চ বাতজাঃ | তরুণ্যা হিতসেবিন্যাস্তমল্পোপদ্রবং ভিষক্ ||২০|| রক্তপিত্তবিধানেন যথাবত্ সমুপাচরেত্ |২১|

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तदेवातिप्रसङ्गेन प्रवृत्तमनृतावपि | असृग्दरं विजानीयादतोऽन्यद्रक्तलक्षणात् ||१८|| असृग्दरो भवेत् सर्वः साङ्गमर्दः सवेदनः | तस्यातिवृत्तौ दौर्बल्यं भ्रमो मूर्च्छा तमस्तृषा ||१९|| दाहः प्रलापः पाण्डुत्वं तन्द्रा रोगाश्च वातजाः | तरुण्या हितसेविन्यास्तमल्पोपद्रवं भिषक् ||२०|| रक्तपित्तविधानेन यथावत् समुपाचरेत् |२१|

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Adhikarana 10 (21-23) · Śloka 23

দোষৈরাবৃতমার্গত্বাদার্তবং নশ্যতি স্ত্রিযাঃ ||২১|| তত্র মত্স্যকুলত্থাম্লতিলমাষসুরা হিতাঃ | পানে মূত্রমুদশ্বিচ্চ দধি শুক্তং চ ভোজনে ||২২|| ক্ষীণং প্রাগীরিতং রক্তং সলক্ষণচিকিত্সিতম্ | তথাঽপ্যত্র বিধাতব্যং বিধানং নষ্টরক্তবত্ ||২৩||

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दोषैरावृतमार्गत्वादार्तवं नश्यति स्त्रियाः ||२१|| तत्र मत्स्यकुलत्थाम्लतिलमाषसुरा हिताः | पाने मूत्रमुदश्विच्च दधि शुक्तं च भोजने ||२२|| क्षीणं प्रागीरितं रक्तं सलक्षणचिकित्सितम् | तथाऽप्यत्र विधातव्यं विधानं नष्टरक्तवत् ||२३||

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Adhikarana 11 (24) · Śloka 24

এবমদুষ্টশুক্রঃ শুদ্ধার্তবা চ ||২৪||

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एवमदुष्टशुक्रः शुद्धार्तवा च ||२४||

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Adhikarana 12 (25-30) · Śloka 30

ঋতৌ প্রথমদিবসাত্ প্রভৃতি ব্রহ্মচারিণী দিবাস্বপ্নাঞ্জনাশ্রুপাতস্নানানুলেপনাভ্যঙ্গনখচ্ছেদনপ্রধাবনহসনকথনাতিশব্দশ্রবণাবলেখনানিলাযাসান্ পরিহরেত্ | কিং কারণং? দিবা স্বপন্ত্যাঃ স্বাপশীলঃ, অঞ্জনাদন্ধঃ, রোদনাদ্বিকৃতদৃষ্টিঃ, স্নানানুলেপনাদ্দুঃখশীলঃ , তৈলাভ্যঙ্গাত্ কুষ্ঠী, নখাপকর্তনাত্ কুনখী, প্রধাবনাচ্চঞ্চলঃ, হসনাচ্ছ্যাবদন্তৌষ্ঠতালুজিহ্বঃ, প্রলাপী চাতিকথনাত্ , অতিশব্দশ্রবণাদ্বধিরঃ, অবলেখনাত্ খলতিঃ, মারুতাযাসসেবনাদুন্মত্তো গর্ভো ভবতীত্যেবমেতান্ পরিহরেত্ | দর্ভসংস্তরশাযিনীং করতলশরাবপর্ণান্যতমভোজিনীং হবিষ্যং, ত্র্যহং চ ভর্তুঃ সংরক্ষেত্ | ততঃ শুদ্ধস্নাতাং চতুর্থেঽহন্যহতবাসঃসমলঙ্কৃতাং কৃতমঙ্গলস্বস্তিবাচনাং ভর্তারং দর্শযেত্ | তত্ কস্য হেতোঃ? ||২৫|| পূর্বং পশ্যেদৃতুস্নাতা যাদৃশং নরমঙ্গনা | তাদৃশং জনযেত্ পুত্রং ভর্তারং দর্শযেদতঃ ||২৬|| ততো বিধানং পুত্রীযমুপাধ্যাযঃ সমাচরেত্ | কর্মান্তে চ ক্রমং হ্যেতমারভেত বিচক্ষণঃ ||২৭|| ততোঽপরাহ্ণে পুমান্ মাসং ব্রহ্মচারী সর্পিঃস্নিগ্ধঃ সর্পিঃক্ষীরাভ্যাং শাল্যোদনং ভুক্ত্বা মাসং ব্রহ্মচারিণীং তৈলস্নিগ্ধাং তৈলমাষোত্তরাহারাং নারীমুপেযাদ্রাত্রৌ সামভিরভিবিশ্বাস্য ; বিকল্প্যৈবং চতুর্থ্যাং ষষ্ঠ্যামষ্টম্যাং দশম্যাং দ্বাদশ্যাং চোপেযাদিতি পুত্রকামঃ ||২৮|| এষূত্তরোত্তরং বিদ্যাদাযুরারোগ্যমেব চ | প্রজাসৌভাগ্যমৈশ্বর্যং বলং চ দিবসেষু বৈ ||২৯|| অতঃ পরং পঞ্চম্যাং সপ্তম্যাং নবম্যামেকাদশ্যাং চ স্ত্রীকামঃ; ত্রযোদশীপ্রভৃতযো নিন্দ্যাঃ ||৩০||

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ऋतौ प्रथमदिवसात् प्रभृति ब्रह्मचारिणी दिवास्वप्नाञ्जनाश्रुपातस्नानानुलेपनाभ्यङ्गनखच्छेदनप्रधावनहसनकथनातिशब्दश्रवणावलेखनानिलायासान् परिहरेत् | किं कारणं? दिवा स्वपन्त्याः स्वापशीलः, अञ्जनादन्धः, रोदनाद्विकृतदृष्टिः, स्नानानुलेपनाद्दुःखशीलः , तैलाभ्यङ्गात् कुष्ठी, नखापकर्तनात् कुनखी, प्रधावनाच्चञ्चलः, हसनाच्छ्यावदन्तौष्ठतालुजिह्वः, प्रलापी चातिकथनात् , अतिशब्दश्रवणाद्बधिरः, अवलेखनात् खलतिः, मारुतायाससेवनादुन्मत्तो गर्भो भवतीत्येवमेतान् परिहरेत् | दर्भसंस्तरशायिनीं करतलशरावपर्णान्यतमभोजिनीं हविष्यं, त्र्यहं च भर्तुः संरक्षेत् | ततः शुद्धस्नातां चतुर्थेऽहन्यहतवासःसमलङ्कृतां कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनां भर्तारं दर्शयेत् | तत् कस्य हेतोः? ||२५|| पूर्वं पश्येदृतुस्नाता यादृशं नरमङ्गना | तादृशं जनयेत् पुत्रं भर्तारं दर्शयेदतः ||२६|| ततो विधानं पुत्रीयमुपाध्यायः समाचरेत् | कर्मान्ते च क्रमं ह्येतमारभेत विचक्षणः ||२७|| ततोऽपराह्णे पुमान् मासं ब्रह्मचारी सर्पिःस्निग्धः सर्पिःक्षीराभ्यां शाल्योदनं भुक्त्वा मासं ब्रह्मचारिणीं तैलस्निग्धां तैलमाषोत्तराहारां नारीमुपेयाद्रात्रौ सामभिरभिविश्वास्य ; विकल्प्यैवं चतुर्थ्यां षष्ठ्यामष्टम्यां दशम्यां द्वादश्यां चोपेयादिति पुत्रकामः ||२८|| एषूत्तरोत्तरं विद्यादायुरारोग्यमेव च | प्रजासौभाग्यमैश्वर्यं बलं च दिवसेषु वै ||२९|| अतः परं पञ्चम्यां सप्तम्यां नवम्यामेकादश्यां च स्त्रीकामः; त्रयोदशीप्रभृतयो निन्द्याः ||३०||

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Adhikarana 13 (31) · Śloka 31

তত্র প্রথমে দিবসে ঋতুমত্যাং মৈথুনগমনমনাযুষ্যং পুংসাং ভবতি, যশ্চ তত্রাধীযতে গর্ভঃ স প্রসবমানো বিমুচ্যতে ; দ্বিতীযেঽপ্যেবং সূতিকাগৃহে বা; তৃতীযেঽপ্যেবমসম্পূর্ণাঙ্গোঽল্পাযুর্বা ভবতি; চতুর্থে তু সম্পূর্ণাঙ্গো দীর্ঘাযুশ্চ ভবতি | ন চ প্রবর্তমানে রক্তে বীজং প্রবিষ্টং গুণকরং ভবতি, যথা নদ্যাং প্রতিস্রোতঃ প্লাবিদ্রব্যং প্রক্ষিপ্তং প্রতিনিবর্ততে নোর্ধ্বং গচ্ছতি তদ্বদেতদ্দ্রষ্টব্যম্ | তস্মান্নিযমবতীং ত্রিরাত্রং পরিহরেত্ | অতঃ পরং মাসাদুপেযাত্ ||৩১||

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तत्र प्रथमे दिवसे ऋतुमत्यां मैथुनगमनमनायुष्यं पुंसां भवति, यश्च तत्राधीयते गर्भः स प्रसवमानो विमुच्यते ; द्वितीयेऽप्येवं सूतिकागृहे वा; तृतीयेऽप्येवमसम्पूर्णाङ्गोऽल्पायुर्वा भवति; चतुर्थे तु सम्पूर्णाङ्गो दीर्घायुश्च भवति | न च प्रवर्तमाने रक्ते बीजं प्रविष्टं गुणकरं भवति, यथा नद्यां प्रतिस्रोतः प्लाविद्रव्यं प्रक्षिप्तं प्रतिनिवर्तते नोर्ध्वं गच्छति तद्वदेतद्द्रष्टव्यम् | तस्मान्नियमवतीं त्रिरात्रं परिहरेत् | अतः परं मासादुपेयात् ||३१||

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Adhikarana 14 (32) · Śloka 32

লব্ধগর্ভাযাশ্চৈতেষ্বহঃসু লক্ষ্মণাবটশুঙ্গসহদেবাবিশ্বদেবানামন্যতমাং ক্ষীরেণাভিষুত্য ত্রীংশ্চতুরো বা বিন্দূন্ দদ্যাদ্দক্ষিণে নাসাপুটে পুত্রকামাযৈ , ন চ তান্নিষ্ঠীবেত্ ||৩২||

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लब्धगर्भायाश्चैतेष्वहःसु लक्ष्मणावटशुङ्गसहदेवाविश्वदेवानामन्यतमां क्षीरेणाभिषुत्य त्रींश्चतुरो वा बिन्दून् दद्याद्दक्षिणे नासापुटे पुत्रकामायै , न च तान्निष्ठीवेत् ||३२||

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Adhikarana 15 (33) · Śloka 33

ধ্রুবং চতুর্ণাং সান্নিধ্যাদ্গর্ভঃ স্যাদ্বিধিপূর্বকম্ | ঋতুক্ষেত্রাম্বুবীজানাং সামগ্র্যাদঙ্কুরো যথা ||৩৩||

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ध्रुवं चतुर्णां सान्निध्याद्गर्भः स्याद्विधिपूर्वकम् | ऋतुक्षेत्राम्बुबीजानां सामग्र्यादङ्कुरो यथा ||३३||

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Adhikarana 16 (34) · Śloka 34

এবং জাতা রূপবন্তঃ সত্ত্ববন্তশ্চিরাযুষঃ | ভবন্ত্যৃণস্য মোক্তারঃ সত্পুত্রাঃ পুত্রিণে হিতাঃ ||৩৪||

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एवं जाता रूपवन्तः सत्त्ववन्तश्चिरायुषः | भवन्त्यृणस्य मोक्तारः सत्पुत्राः पुत्रिणे हिताः ||३४||

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Adhikarana 17 (35) · Śloka 35

তত্র তেজোধাতুর্বর্ণানাং প্রভবঃ, স যদা গর্ভোত্পত্তাবব্ধাতুপ্রাযো ভবতি তদা গর্ভং গৌরং করোতি, পৃথিবীধাতুপ্রাযঃ কৃষ্ণং, পৃথিব্যাকাশধাতুপ্রাযঃ কৃষ্ণশ্যামং, তোযাকাশধাতুপ্রাযো গৌরশ্যামম্ | ‘যাদৃগ্বর্ণমাহারমুপসেবতে গর্ভিণী তাদৃগ্বর্ণপ্রসবা ভবতি’ ইত্যেকে ভাষন্তে | তত্র দৃষ্টিভাগমপ্রতিপন্নং তেজো জাত্যন্ধং করোতি, তদেব রক্তানুগতং রক্তাক্ষং, পিত্তানুগতং পিঙ্গাক্ষং, শ্লেষ্মানুগতং শুক্লাক্ষং, বাতানুগতং বিকৃতাক্ষমিতি ||৩৫||

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तत्र तेजोधातुर्वर्णानां प्रभवः, स यदा गर्भोत्पत्तावब्धातुप्रायो भवति तदा गर्भं गौरं करोति, पृथिवीधातुप्रायः कृष्णं, पृथिव्याकाशधातुप्रायः कृष्णश्यामं, तोयाकाशधातुप्रायो गौरश्यामम् | ‘यादृग्वर्णमाहारमुपसेवते गर्भिणी तादृग्वर्णप्रसवा भवति’ इत्येके भाषन्ते | तत्र दृष्टिभागमप्रतिपन्नं तेजो जात्यन्धं करोति, तदेव रक्तानुगतं रक्ताक्षं, पित्तानुगतं पिङ्गाक्षं, श्लेष्मानुगतं शुक्लाक्षं, वातानुगतं विकृताक्षमिति ||३५||

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Adhikarana 18 (36) · Śloka 36

ভবন্তি চাত্র- ঘৃতপিণ্ডো যথৈবাগ্নিমাশ্রিতঃ প্রবিলীযতে | বিসর্পত্যার্তবং নার্যাস্তথা পুংসাং সমাগমে ||৩৬||

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भवन्ति चात्र- घृतपिण्डो यथैवाग्निमाश्रितः प्रविलीयते | विसर्पत्यार्तवं नार्यास्तथा पुंसां समागमे ||३६||

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Adhikarana 19 (37) · Śloka 37

বীজেঽন্তর্বাযুনা ভিন্নে দ্বৌ জীবৌ কুক্ষিমাগতৌ | যমাবিত্যভিধীযেতে ধর্মেতরপুরঃসরৌ ||৩৭||

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बीजेऽन्तर्वायुना भिन्ने द्वौ जीवौ कुक्षिमागतौ | यमावित्यभिधीयेते धर्मेतरपुरःसरौ ||३७||

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Adhikarana 20 (38) · Śloka 38

পিত্রোরত্যল্পবীজত্বাদাসেক্যঃ পুরুষো ভবেত্ | স শুক্রং প্রাশ্য লভতে ধ্বজোচ্ছ্রাযমসংশযম্ ||৩৮||

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पित्रोरत्यल्पबीजत्वादासेक्यः पुरुषो भवेत् | स शुक्रं प्राश्य लभते ध्वजोच्छ्रायमसंशयम् ||३८||

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Adhikarana 21 (39) · Śloka 39

যঃ পূতিযোনৌ জাযেত স সৌগন্ধিকসঞ্জ্ঞিতঃ | স যোনিশেফসোর্গন্ধমাঘ্রায লভতে বলম্ ||৩৯||

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यः पूतियोनौ जायेत स सौगन्धिकसञ्ज्ञितः | स योनिशेफसोर्गन्धमाघ्राय लभते बलम् ||३९||

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Adhikarana 22 (40) · Śloka 40

স্বে গুদেঽব্রহ্মচর্যাদ্যঃ স্ত্রীষু পুংবত্ প্রবর্ততে | কুম্ভীকঃ স তু বিজ্ঞেযঃ... |৪০|

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स्वे गुदेऽब्रह्मचर्याद्यः स्त्रीषु पुंवत् प्रवर्तते | कुम्भीकः स तु विज्ञेयः... |४०|

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Adhikarana 23 (40-41) · Śloka 41

...ঈর্ষ্যকং শৃণু চাপরম্ ||৪০|| দৃষ্ট্বা ব্যবাযমন্যেষাং ব্যবাযে যঃ প্রবর্ততে | ঈর্ষ্যকঃ স তু বিজ্ঞেযঃ,... |৪১|

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...ईर्ष्यकं शृणु चापरम् ||४०|| दृष्ट्वा व्यवायमन्येषां व्यवाये यः प्रवर्तते | ईर्ष्यकः स तु विज्ञेयः,... |४१|

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Adhikarana 24 (41-42) · Śloka 42

...ষণ্ঢকং শৃণু পঞ্চমম্ ||৪১|| যো ভার্যাযামৃতৌ মোহাদঙ্গনেব প্রবর্ততে | ততঃ স্ত্রীচেষ্টিতাকারো জাযতে ষণ্ঢসঞ্জ্ঞিতঃ ||৪২||

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...षण्ढकं शृणु पञ्चमम् ||४१|| यो भार्यायामृतौ मोहादङ्गनेव प्रवर्तते | ततः स्त्रीचेष्टिताकारो जायते षण्ढसञ्ज्ञितः ||४२||

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Adhikarana 25 (43) · Śloka 43

ঋতৌ পুরুষবদ্বাঽপি প্রবর্তেতাঙ্গনা যদি | তত্র কন্যা যদি ভবেত্ সা ভবেন্নরচেষ্টিতা ||৪৩||

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ऋतौ पुरुषवद्वाऽपि प्रवर्तेताङ्गना यदि | तत्र कन्या यदि भवेत् सा भवेन्नरचेष्टिता ||४३||

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Adhikarana 26 (44) · Śloka 44

আসেক্যশ্চ সুগন্ধী চ কুম্ভীকশ্চের্ষ্যকস্তথা | সরেতসস্ত্বমী জ্ঞেযা অশুক্রঃ ষণ্ঢসঞ্জ্ঞিতঃ ||৪৪||

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आसेक्यश्च सुगन्धी च कुम्भीकश्चेर्ष्यकस्तथा | सरेतसस्त्वमी ज्ञेया अशुक्रः षण्ढसञ्ज्ञितः ||४४||

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Adhikarana 27 (45) · Śloka 45

অনযা বিপ্রকৃত্যা তু তেষাং শুক্রবহাঃ সিরাঃ | হর্ষাত্ স্ফুটত্বমাযান্তি ধ্বজোচ্ছ্রাযস্ততো ভবেত্ ||৪৫||

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अनया विप्रकृत्या तु तेषां शुक्रवहाः सिराः | हर्षात् स्फुटत्वमायान्ति ध्वजोच्छ्रायस्ततो भवेत् ||४५||

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Adhikarana 28 (46) · Śloka 46

আহারাচারচেষ্টাভির্যাদৃশীভিঃ সমন্বিতৌ | স্ত্রীপুংসৌ সমুপেযাতাং তযোঃ পুত্রোঽপি তাদৃশঃ ||৪৬||

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आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशीभिः समन्वितौ | स्त्रीपुंसौ समुपेयातां तयोः पुत्रोऽपि तादृशः ||४६||

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Adhikarana 29 (47) · Śloka 47

যদা নার্যাবুপেযাতাং বৃষস্যন্ত্যৌ কথঞ্চন | মুঞ্চতঃ শুক্রমন্যোন্যমনস্থিস্তত্র জাযতে ||৪৭||

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यदा नार्यावुपेयातां वृषस्यन्त्यौ कथञ्चन | मुञ्चतः शुक्रमन्योन्यमनस्थिस्तत्र जायते ||४७||

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Adhikarana 30 (48-49) · Śloka 49

ঋতুস্নাতা তু যা নারী স্বপ্নে মৈথুনমাবহেত্ | আর্তবং বাযুরাদায কুক্ষৌ গর্ভং করোতি হি ||৪৮|| মাসি মাসি বিবর্ধেত গর্ভিণ্যা গর্ভলক্ষণম্ | কললং জাযতে তস্যা বর্জিতং পৈতৃকৈর্গুণৈঃ ||৪৯||

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ऋतुस्नाता तु या नारी स्वप्ने मैथुनमावहेत् | आर्तवं वायुरादाय कुक्षौ गर्भं करोति हि ||४८|| मासि मासि विवर्धेत गर्भिण्या गर्भलक्षणम् | कललं जायते तस्या वर्जितं पैतृकैर्गुणैः ||४९||

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Adhikarana 31 (50) · Śloka 50

সর্পবৃশ্চিককূষ্মাণ্ডবিকৃতাকৃতযশ্চ যে | গর্ভাস্ত্বেতে স্ত্রিযাশ্চৈব জ্ঞেযাঃ পাপকৃতো ভৃশম্ ||৫০||

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सर्पवृश्चिककूष्माण्डविकृताकृतयश्च ये | गर्भास्त्वेते स्त्रियाश्चैव ज्ञेयाः पापकृतो भृशम् ||५०||

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Adhikarana 32 (51) · Śloka 51

গর্ভো বাতপ্রকোপেণ দৌহৃদে বাঽবমানিতে | ভবেত্ কুব্জঃ কুণিঃ পঙ্গুর্মূকো মিন্মিণ এব বা ||৫১||

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गर्भो वातप्रकोपेण दौहृदे वाऽवमानिते | भवेत् कुब्जः कुणिः पङ्गुर्मूको मिन्मिण एव वा ||५१||

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Adhikarana 33 (52) · Śloka 52

মাতাপিত্রোস্তু নাস্তিক্যাদশুভৈশ্চ পুরাকৃতৈঃ | বাতাদীনাং প্রকোপেণ গর্ভো বৈকৃতমাপ্নুযাত্ ||৫২||

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मातापित्रोस्तु नास्तिक्यादशुभैश्च पुराकृतैः | वातादीनां प्रकोपेण गर्भो वैकृतमाप्नुयात् ||५२||

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Adhikarana 34 (53) · Śloka 53

মলাল্পত্বাদযোগাচ্চ বাযোঃ পক্বাশযস্য চ | বাতমূত্রপুরীষাণি ন গর্ভস্থঃ করোতি হি ||৫৩||

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मलाल्पत्वादयोगाच्च वायोः पक्वाशयस्य च | वातमूत्रपुरीषाणि न गर्भस्थः करोति हि ||५३||

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Adhikarana 35 (54) · Śloka 54

জরাযুণা মুখে চ্ছন্নে কণ্ঠে চ কফবেষ্টিতে | বাযোর্মার্গনিরোধাচ্চ ন গর্ভস্থঃ প্ররোদিতি ||৫৪||

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जरायुणा मुखे च्छन्ने कण्ठे च कफवेष्टिते | वायोर्मार्गनिरोधाच्च न गर्भस्थः प्ररोदिति ||५४||

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Adhikarana 36 (55) · Śloka 55

নিঃশ্বাসোচ্ছ্বাসসঙ্ক্ষোভস্বপ্নান্ গর্ভোঽধিগচ্ছতি | মাতুর্নিশ্বসিতোচ্ছ্বাসসঙ্ক্ষোভস্বপ্নসম্ভবান্ ||৫৫||

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निःश्वासोच्छ्वाससङ्क्षोभस्वप्नान् गर्भोऽधिगच्छति | मातुर्निश्वसितोच्छ्वाससङ्क्षोभस्वप्नसम्भवान् ||५५||

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Adhikarana 37 (56) · Śloka 56

সন্নিবেশঃ শরীরাণাং দন্তানাং পতনোদ্ভবৌ | তলেষ্বসম্ভবো যশ্চ রোম্ণামেতত্ স্বভাবতঃ ||৫৬||

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सन्निवेशः शरीराणां दन्तानां पतनोद्भवौ | तलेष्वसम्भवो यश्च रोम्णामेतत् स्वभावतः ||५६||

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Adhikarana 38 (57) · Śloka 57

ভাবিতাঃ পূর্বদেহেষু সততং শাস্ত্রবুদ্ধযঃ | ভবন্তি সত্ত্বভূযিষ্ঠাঃ পূর্বজাতিস্মরা নরাঃ ||৫৭||

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भाविताः पूर्वदेहेषु सततं शास्त्रबुद्धयः | भवन्ति सत्त्वभूयिष्ठाः पूर्वजातिस्मरा नराः ||५७||

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Adhikarana 39 (58) · Śloka 58

কর্মণা চোদিতো যেন তদাপ্নোতি পুনর্ভবে | অভ্যস্তাঃ পূর্বদেহে যে তানেব ভজতে গুণান্ ||৫৮||

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कर्मणा चोदितो येन तदाप्नोति पुनर्भवे | अभ्यस्ताः पूर्वदेहे ये तानेव भजते गुणान् ||५८||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 2

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং শারীরস্থানে শুক্রশোণিতশুদ্ধিশারীরং নাম দ্বিতীযোঽধ্যাযঃ ||২||

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इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने शुक्रशोणितशुद्धिशारीरं नाम द्वितीयोऽध्यायः ||२||

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2. śukraśōṇitaśuddhiśārīram — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi