Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ সর্বভূতচিন্তাশারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातः सर्वभूतचिन्ताशारीरं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ সর্বভূতচিন্তাশারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातः सर्वभूतचिन्ताशारीरं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
সর্বভূতানাং কারণমকারণং সত্ত্বরজস্তমোলক্ষণমষ্টরূপমখিলস্য জগতঃ সম্ভবহেতুরব্যক্তং নাম | তদেকং বহূনাং ক্ষেত্রজ্ঞানামধিষ্ঠানং সমুদ্র ইবৌদকানাং ভাবানাম্ ||৩||
सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्त्वरजस्तमोलक्षणमष्टरूपमखिलस्य जगतः सम्भवहेतुरव्यक्तं नाम | तदेकं बहूनां क्षेत्रज्ञानामधिष्ठानं समुद्र इवौदकानां भावानाम् ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
তস্মাদব্যক্তান্মহানুত্পদ্যতে তল্লিঙ্গ এব | তল্লিঙ্গাচ্চ মহতস্তল্লক্ষণ এবাহঙ্কার উত্পদ্যতে; স ত্রিবিধো বৈকারিকস্তৈজসো ভূতাদিরিতি | তত্র বৈকারিকাদহঙ্কারাত্তৈজসসহাযাত্তল্লক্ষণান্যেবৈকাদশেন্দ্রিযাণ্যুত্পদ্যন্তে, তদ্যথা- শ্রোত্রত্বক্চক্ষুর্জিহ্বাঘ্রাণবাগ্ঘস্তোপস্থপাযুপাদমনাংসীতি; তত্র পূর্বাণি পঞ্চ বুদ্ধীন্দ্রিযাণি, ইতরাণি পঞ্চ কর্মেন্দ্রিযাণি, উভযাত্মকং মনঃ; ভূতাদেরপি তৈজসসহাযাত্তল্লক্ষণান্যেব পঞ্চতন্মাত্রাণ্যুত্পদ্যন্তে- শব্দতন্মাত্রং, স্পর্শতন্মাত্রং, রূপতন্মাত্রং, রসতন্মাত্রং, গন্ধতন্মাত্রমিতি; তেষাং বিশেষাঃ- শব্দস্পর্শরূপরসগন্ধাঃ; তেভ্যো ভূতানি- ব্যোমানিলানলজলোর্ব্যঃ; এবমেষা তত্ত্বচতুর্বিংশতির্ব্যাখ্যাতা ||৪||
तस्मादव्यक्तान्महानुत्पद्यते तल्लिङ्ग एव | तल्लिङ्गाच्च महतस्तल्लक्षण एवाहङ्कार उत्पद्यते; स त्रिविधो वैकारिकस्तैजसो भूतादिरिति | तत्र वैकारिकादहङ्कारात्तैजससहायात्तल्लक्षणान्येवैकादशेन्द्रियाण्युत्पद्यन्ते, तद्यथा- श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणवाग्घस्तोपस्थपायुपादमनांसीति; तत्र पूर्वाणि पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि, इतराणि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि, उभयात्मकं मनः; भूतादेरपि तैजससहायात्तल्लक्षणान्येव पञ्चतन्मात्राण्युत्पद्यन्ते- शब्दतन्मात्रं, स्पर्शतन्मात्रं, रूपतन्मात्रं, रसतन्मात्रं, गन्धतन्मात्रमिति; तेषां विशेषाः- शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः; तेभ्यो भूतानि- व्योमानिलानलजलोर्व्यः; एवमेषा तत्त्वचतुर्विंशतिर्व्याख्याता ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
তত্র বুদ্ধীন্দ্রিযাণাং শব্দাদযো বিষযাঃ; কর্মেন্দ্রিযাণাং যথাসঙ্খ্যং বচনাদানানন্দবিসর্গবিহরণানি ||৫||
तत्र बुद्धीन्द्रियाणां शब्दादयो विषयाः; कर्मेन्द्रियाणां यथासङ्ख्यं वचनादानानन्दविसर्गविहरणानि ||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
অব্যক্তং মহানহঙ্কারঃ পঞ্চতন্মাত্রাণি চেত্যষ্টৌ প্রকৃতযঃ; শেষাঃ ষোডশ বিকারাঃ ||৬||
अव्यक्तं महानहङ्कारः पञ्चतन्मात्राणि चेत्यष्टौ प्रकृतयः; शेषाः षोडश विकाराः ||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
স্বঃ স্বশ্চৈষাং বিষযোঽধিভূতং; স্বযমধ্যাত্মম্; অধিদৈবতম্- অথ বুদ্ধের্ব্রহ্মা, অহঙ্কারস্যেশ্বরঃ, মনসশ্চন্দ্রমাঃ, দিশঃ শ্রোত্রস্য, ত্বচো বাযুঃ, সূর্যশ্চক্ষুষঃ, রসনস্যাপঃ, পৃথিবী ঘ্রাণস্য, বাচোঽগ্নিঃ, হস্তযোরিন্দ্রঃ, পাদযোর্বিষ্ণুঃ, পাযোর্মিত্রঃ, প্রজাপতিরুপস্থস্যেতি ||৭||
स्वः स्वश्चैषां विषयोऽधिभूतं; स्वयमध्यात्मम्; अधिदैवतम्- अथ बुद्धेर्ब्रह्मा, अहङ्कारस्येश्वरः, मनसश्चन्द्रमाः, दिशः श्रोत्रस्य, त्वचो वायुः, सूर्यश्चक्षुषः, रसनस्यापः, पृथिवी घ्राणस्य, वाचोऽग्निः, हस्तयोरिन्द्रः, पादयोर्विष्णुः, पायोर्मित्रः, प्रजापतिरुपस्थस्येति ||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
তত্র সর্ব এবাচেতন এষ বর্গঃ, পুরুষঃ পঞ্চবিংশতিতমঃ কার্যকারণসংযুক্তশ্চেতযিতা ভবতি | সত্যপ্যচৈতন্যে প্রধানস্য পুরুষকৈবল্যার্থং প্রবৃত্তিমুপদিশন্তি, ক্ষীরাদীংশ্চাত্র হেতূনুদাহরন্তি ||৮||
तत्र सर्व एवाचेतन एष वर्गः, पुरुषः पञ्चविंशतितमः कार्यकारणसंयुक्तश्चेतयिता भवति | सत्यप्यचैतन्ये प्रधानस्य पुरुषकैवल्यार्थं प्रवृत्तिमुपदिशन्ति, क्षीरादींश्चात्र हेतूनुदाहरन्ति ||८||
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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9
অত ঊর্ধ্বং প্রকৃতিপুরুষযোঃ সাধর্ম্যবৈধর্ম্যে ব্যাখ্যাস্যামঃ | তদ্যথা- উভাবপ্যনাদী, উভাবপ্যনন্তৌ, উভাবপ্যলিঙ্গৌ, উভাবপি নিত্যৌ, উভাবপ্যনপরৌ , উভৌ চ সর্বগতাবিতি; একা তু প্রকৃতিরচেতনা ত্রিগুণা বীজধর্মিণী প্রসবধর্মিণ্যমধ্যস্থধর্মিণী চেতি, বহবস্তু পুরুষাশ্চেতনাবন্তোঽগুণা অবীজধর্মাণোঽপ্রসবধর্মাণো মধ্যস্থধর্মাণশ্চেতি ||৯||
अत ऊर्ध्वं प्रकृतिपुरुषयोः साधर्म्यवैधर्म्ये व्याख्यास्यामः | तद्यथा- उभावप्यनादी, उभावप्यनन्तौ, उभावप्यलिङ्गौ, उभावपि नित्यौ, उभावप्यनपरौ , उभौ च सर्वगताविति; एका तु प्रकृतिरचेतना त्रिगुणा बीजधर्मिणी प्रसवधर्मिण्यमध्यस्थधर्मिणी चेति, बहवस्तु पुरुषाश्चेतनावन्तोऽगुणा अबीजधर्माणोऽप्रसवधर्माणो मध्यस्थधर्माणश्चेति ||९||
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Adhikarana 9 (10) · Śloka 10
তত্র কারণানুরূপং কার্যমিতি কৃত্বা সর্ব এবৈতে বিশেষাঃ সত্ত্বরজস্তমোমযা ভবন্তি; তদঞ্জনত্বাত্তন্মযত্বাচ্চ তদ্গুণা এব পুরুষা ভবন্তীত্যেকে ভাষন্তে ||১০||
तत्र कारणानुरूपं कार्यमिति कृत्वा सर्व एवैते विशेषाः सत्त्वरजस्तमोमया भवन्ति; तदञ्जनत्वात्तन्मयत्वाच्च तद्गुणा एव पुरुषा भवन्तीत्येके भाषन्ते ||१०||
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Adhikarana 10 (11) · Śloka 11
বৈদ্যকে তু- স্বভাবমীশ্বরং কালং যদৃচ্ছাং নিযতিং তথা | পরিণামং চ মন্যন্তে প্রকৃতিং পৃথুদর্শিনঃ ||১১||
वैद्यके तु- स्वभावमीश्वरं कालं यदृच्छां नियतिं तथा | परिणामं च मन्यन्ते प्रकृतिं पृथुदर्शिनः ||११||
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Adhikarana 11 (12-14) · Śloka 14
তন্মযান্যেব ভূতানি তদ্গুণান্যেব চাদিশেত্ | তৈশ্চ তল্লক্ষণঃ কৃত্স্নো ভূতগ্রামো ব্যজন্যত ||১২|| তস্যোপযোগোঽভিহিতশ্চিকিত্সাং প্রতি সর্বদা | ভূতেভ্যো হি পরং যস্মান্নাস্তি চিন্তা চিকিত্সিতে ||১৩|| যতোঽভিহিতং- “তত্সম্ভবদ্রব্যসমূহো ভূতাদিরুক্তঃ” (সূ.১); ভৌতিকানি চেন্দ্রিযাণ্যাযুর্বেদে বর্ণ্যন্তে, তথেন্দ্রিযার্থাঃ ||১৪||
तन्मयान्येव भूतानि तद्गुणान्येव चादिशेत् | तैश्च तल्लक्षणः कृत्स्नो भूतग्रामो व्यजन्यत ||१२|| तस्योपयोगोऽभिहितश्चिकित्सां प्रति सर्वदा | भूतेभ्यो हि परं यस्मान्नास्ति चिन्ता चिकित्सिते ||१३|| यतोऽभिहितं- “तत्सम्भवद्रव्यसमूहो भूतादिरुक्तः” (सू.१); भौतिकानि चेन्द्रियाण्यायुर्वेदे वर्ण्यन्ते, तथेन्द्रियार्थाः ||१४||
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Adhikarana 12 (15) · Śloka 15
ভবতি চাত্র- ইন্দ্রিযেণেন্দ্রিযার্থং তু স্বং স্বং গৃহ্ণাতি মানবঃ | নিযতং তুল্যযোনিত্বান্নান্যেনান্যমিতি স্থিতিঃ ||১৫||
भवति चात्र- इन्द्रियेणेन्द्रियार्थं तु स्वं स्वं गृह्णाति मानवः | नियतं तुल्ययोनित्वान्नान्येनान्यमिति स्थितिः ||१५||
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Adhikarana 13 (16) · Śloka 16
ন চাযুর্বেদশাস্ত্রেষূপদিশ্যন্তে সর্বগতাঃ ক্ষেত্রজ্ঞা নিত্যাশ্চ; অসর্বগতেষু চ ক্ষেত্রজ্ঞেষু নিত্যপুরুষখ্যাপকান্ হেতূনুদাহরন্তি; আযুর্বেদশাস্ত্রেষ্বসর্বগতাঃ ক্ষেত্রজ্ঞা নিত্যাশ্চ, তির্যগ্যোনিমানুষদেবেষু সঞ্চরন্তি ধর্মাধর্মনিমিত্তং; ত এতেঽনুমানগ্রাহ্যাঃ পরমসূক্ষ্মাশ্চেতনাবন্তঃ শাশ্বতা লোহিতরেতসোঃ সন্নিপাতেষ্বভিব্যজ্যন্তে, যতোঽভিহিতং- ‘পঞ্চমহাভূতশরীরিসমবাযঃ পুরুষঃ’ (সূ.১) ইতি; স এষ কর্মপুরুষশ্চিকিত্সাধিকৃতঃ ||১৬||
न चायुर्वेदशास्त्रेषूपदिश्यन्ते सर्वगताः क्षेत्रज्ञा नित्याश्च; असर्वगतेषु च क्षेत्रज्ञेषु नित्यपुरुषख्यापकान् हेतूनुदाहरन्ति; आयुर्वेदशास्त्रेष्वसर्वगताः क्षेत्रज्ञा नित्याश्च, तिर्यग्योनिमानुषदेवेषु सञ्चरन्ति धर्माधर्मनिमित्तं; त एतेऽनुमानग्राह्याः परमसूक्ष्माश्चेतनावन्तः शाश्वता लोहितरेतसोः सन्निपातेष्वभिव्यज्यन्ते, यतोऽभिहितं- ‘पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषः’ (सू.१) इति; स एष कर्मपुरुषश्चिकित्साधिकृतः ||१६||
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Adhikarana 14 (17) · Śloka 17
তস্য সুখদুঃখে ইচ্ছাদ্বেষৌ প্রযত্নঃ প্রাণাপানাবুন্মেষনিমেষৌ বুদ্ধির্মনঃ সঙ্কল্পো বিচারণা স্মৃতির্বিজ্ঞানমধ্যবসাযো বিষযোপলব্ধিশ্চ গুণাঃ ||১৭||
तस्य सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ प्रयत्नः प्राणापानावुन्मेषनिमेषौ बुद्धिर्मनः सङ्कल्पो विचारणा स्मृतिर्विज्ञानमध्यवसायो विषयोपलब्धिश्च गुणाः ||१७||
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Adhikarana 15 (18) · Śloka 18
সাত্ত্বিকাস্তু- আনৃশংস্যং সংবিভাগরুচিতা তিতিক্ষা সত্যং ধর্ম আস্তিক্যং জ্ঞানং বুদ্ধির্মেধা স্মৃতির্ধৃতিরনভিষঙ্গশ্চ; রাজসাস্তু- দুঃখবহুলতাঽটনশীলতাঽধৃতিরহঙ্কার আনৃতিকত্বমকারুণ্যং দম্ভো মানো হর্ষঃ কামঃ ক্রোধশ্চ; তামসাস্তু- বিষাদিত্বং নাস্তিক্যমধর্মশীলতা বুদ্ধের্নিরোধোঽজ্ঞানং দুর্মেধস্ত্বমকর্মশীলতা নিদ্রালুত্বং চেতি ||১৮||
सात्त्विकास्तु- आनृशंस्यं संविभागरुचिता तितिक्षा सत्यं धर्म आस्तिक्यं ज्ञानं बुद्धिर्मेधा स्मृतिर्धृतिरनभिषङ्गश्च; राजसास्तु- दुःखबहुलताऽटनशीलताऽधृतिरहङ्कार आनृतिकत्वमकारुण्यं दम्भो मानो हर्षः कामः क्रोधश्च; तामसास्तु- विषादित्वं नास्तिक्यमधर्मशीलता बुद्धेर्निरोधोऽज्ञानं दुर्मेधस्त्वमकर्मशीलता निद्रालुत्वं चेति ||१८||
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Adhikarana 16 (19) · Śloka 19
আন্তরিক্ষাঃ- শব্দঃ শব্দেন্দ্রিযং সর্বচ্ছিদ্রসমূহো বিবিক্ততা চ; বাযব্যাস্তু- স্পর্শঃ স্পর্শেন্দ্রিযং সর্বচেষ্টাসমূহঃ সর্বশরীরস্পন্দনং লঘুতা চ; তৈজসাস্তু- রূপং রূপেন্দ্রিযং বর্ণঃ সন্তাপো ভ্রাজিষ্ণুতা পক্তিরমর্ষস্তৈক্ষ্ণ্যং শৌর্যং চ; আপ্যাস্তু- রসো রসনেন্দ্রিযং সর্বদ্রবসমূহো গুরুতা শৈত্যং স্নেহো রেতশ্চ; পার্থিবাস্তু- গন্ধো গন্ধেন্দ্রিযং সর্বমূর্তসমূহো গুরুতা চেতি ||১৯||
आन्तरिक्षाः- शब्दः शब्देन्द्रियं सर्वच्छिद्रसमूहो विविक्तता च; वायव्यास्तु- स्पर्शः स्पर्शेन्द्रियं सर्वचेष्टासमूहः सर्वशरीरस्पन्दनं लघुता च; तैजसास्तु- रूपं रूपेन्द्रियं वर्णः सन्तापो भ्राजिष्णुता पक्तिरमर्षस्तैक्ष्ण्यं शौर्यं च; आप्यास्तु- रसो रसनेन्द्रियं सर्वद्रवसमूहो गुरुता शैत्यं स्नेहो रेतश्च; पार्थिवास्तु- गन्धो गन्धेन्द्रियं सर्वमूर्तसमूहो गुरुता चेति ||१९||
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Adhikarana 17 (20) · Śloka 20
তত্র সত্ত্ববহুলমাকাশং, রজোবহুলো বাযুঃ, সত্ত্বরজোবহুলোঽগ্নিঃ, সত্ত্বতমোবহুলা আপঃ, তমোবহুলা পৃথিবীতি ||২০||
तत्र सत्त्वबहुलमाकाशं, रजोबहुलो वायुः, सत्त्वरजोबहुलोऽग्निः, सत्त्वतमोबहुला आपः, तमोबहुला पृथिवीति ||२०||
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Adhikarana 18 (21) · Śloka 21
শ্লোকৌ চাত্র ভবতঃ- অন্যোঽন্যানুপ্রবিষ্টানি সর্বাণ্যেতানি নির্দিশেত্ | স্বে স্বে দ্রব্যে তু সর্বেষাং ব্যক্তং লক্ষণমিষ্যতে ||২১||
श्लोकौ चात्र भवतः- अन्योऽन्यानुप्रविष्टानि सर्वाण्येतानि निर्दिशेत् | स्वे स्वे द्रव्ये तु सर्वेषां व्यक्तं लक्षणमिष्यते ||२१||
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Adhikarana 19 (22) · Śloka 22
অষ্টৌ প্রকৃতযঃ প্রোক্তা বিকারাঃ ষোডশৈব তু | ক্ষেত্রজ্ঞশ্চ সমাসেন স্বতন্ত্রপরতন্ত্রযোঃ ||২২||
अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्ता विकाराः षोडशैव तु | क्षेत्रज्ञश्च समासेन स्वतन्त्रपरतन्त्रयोः ||२२||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 1
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং শারীরস্থানে সর্বভূতচিন্তাশারীরং নাম প্রথমোঽধ্যাযঃ ||১||
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने सर्वभूतचिन्ताशारीरं नाम प्रथमोऽध्यायः ||१||
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