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21. karṇagatarōgapratiṣēdhādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ কর্ণগতরোগপ্রতিষেধং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः कर्णगतरोगप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

সামান্যং কর্ণরোধেষু ঘৃতপানং রসাযনম্ | অব্যাযামোঽশিরঃস্নানং ব্রহ্মচর্যমকত্থনম্ ||৩||

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सामान्यं कर्णरोधेषु घृतपानं रसायनम् | अव्यायामोऽशिरःस्नानं ब्रह्मचर्यमकत्थनम् ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

কর্ণশূলে প্রণাদে চ বাধির্যক্ষ্বেডযোরপি | চতুর্ণামপি রোগাণাং সামান্যং ভেষজং বিদুঃ ||৪||

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कर्णशूले प्रणादे च बाधिर्यक्ष्वेडयोरपि | चतुर्णामपि रोगाणां सामान्यं भेषजं विदुः ||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

স্নিগ্ধং বাতহরৈঃ স্বেদৈর্নরং স্নেহবিরেচিতম্ | নাডীস্বেদৈরুপচরেত্পিণ্ডস্বেদৈস্তথৈব চ ||৫||

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स्निग्धं वातहरैः स्वेदैर्नरं स्नेहविरेचितम् | नाडीस्वेदैरुपचरेत्पिण्डस्वेदैस्तथैव च ||५||

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Adhikarana 5 (6-7) · Śloka 7

বিল্বৈরণ্ডার্কবর্ষাভূদধিত্থোন্মত্তশিগ্রুভিঃ | বস্তগন্ধাশ্বগন্ধাভ্যাং তর্কারীযববেণুভিঃ ||৬|| আরনালশৃতৈরেভির্নাডীস্বেদঃ প্রযোজিতঃ | কফবাতসমুত্থানং কর্ণশূলং নিরস্যতি ||৭||

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बिल्वैरण्डार्कवर्षाभूदधित्थोन्मत्तशिग्रुभिः | बस्तगन्धाश्वगन्धाभ्यां तर्कारीयववेणुभिः ||६|| आरनालशृतैरेभिर्नाडीस्वेदः प्रयोजितः | कफवातसमुत्थानं कर्णशूलं निरस्यति ||७||

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Adhikarana 6 (8) · Śloka 8

মীনকুক্কুটলাবানাং মাংসজৈঃ পযসাঽপি বা | পিণ্ডৈঃ স্বেদং চ কুর্বীত কর্ণশূলনিবারণম্ ||৮||

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मीनकुक्कुटलावानां मांसजैः पयसाऽपि वा | पिण्डैः स्वेदं च कुर्वीत कर्णशूलनिवारणम् ||८||

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Adhikarana 7 (9-10) · Śloka 10

অশ্বত্থপত্রখল্লং বা বিধায বহুপত্রকম্ | তদঙ্গারৈঃ সুসম্পূর্ণং নিদধ্যাচ্ছ্রবণোপরি ||৯|| যত্তৈলং চ্যবতে তস্মাত্ খল্লাদঙ্গারতাপিতাত্ | তত্ প্রাপ্তং শ্রবণস্রোতঃ সদ্যো গৃহ্ণাতি বেদনাম্ ||১০||

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अश्वत्थपत्रखल्लं वा विधाय बहुपत्रकम् | तदङ्गारैः सुसम्पूर्णं निदध्याच्छ्रवणोपरि ||९|| यत्तैलं च्यवते तस्मात् खल्लादङ्गारतापितात् | तत् प्राप्तं श्रवणस्रोतः सद्यो गृह्णाति वेदनाम् ||१०||

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Adhikarana 8 (11) · Śloka 11

ক্ষৌমগুগ্গুল্বগুরুভিঃ সঘৃতৈর্ধূপযেচ্চ তম্ | ভক্তোপরি হিতং সর্পির্বস্তিকর্ম চ পূজিতম্ ||১১||

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क्षौमगुग्गुल्वगुरुभिः सघृतैर्धूपयेच्च तम् | भक्तोपरि हितं सर्पिर्बस्तिकर्म च पूजितम् ||११||

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Adhikarana 9 (12) · Śloka 13

নিরন্নো নিশি তত্সর্পিঃ পীত্বোপরি পিবেত্ পযঃ | মূর্ধবস্তিষু নস্যে চ মস্তিষ্কে পরিষেচনে ||১২|| শতপাকং বলাতৈলং প্রশস্তং চাপি ভোজনে |১৩|

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निरन्नो निशि तत्सर्पिः पीत्वोपरि पिबेत् पयः | मूर्धबस्तिषु नस्ये च मस्तिष्के परिषेचने ||१२|| शतपाकं बलातैलं प्रशस्तं चापि भोजने |१३|

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Adhikarana 10 (13) · Śloka 14

কণ্টকারীমজাক্ষীরে পক্ত্বা ক্ষীরেণ তেন চ ||১৩|| বিপচেত্ কুক্কুটবসাং কর্ণযোস্তত্প্রপূরণম্ |১৪|

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कण्टकारीमजाक्षीरे पक्त्वा क्षीरेण तेन च ||१३|| विपचेत् कुक्कुटवसां कर्णयोस्तत्प्रपूरणम् |१४|

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Adhikarana 11 (14-16) · Śloka 16

তণ্ডুলীযকমূলানি ফলমঙ্কোলজং তথা ||১৪|| অহিংস্রাকেন্দুকান্মূলং সরলং দেবদারু চ | লশুনং শৃঙ্গবেরং চ তথা বংশাবলেখনম্ ||১৫|| কল্কৈরেষাং তথাঽম্লৈশ্চ পচেত্ স্নেহং চতুর্বিধম্ | বেদনাযাঃ প্রশান্ত্যর্থং হিতং তত্কর্ণপূরণম্ ||১৬||

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तण्डुलीयकमूलानि फलमङ्कोलजं तथा ||१४|| अहिंस्राकेन्दुकान्मूलं सरलं देवदारु च | लशुनं शृङ्गवेरं च तथा वंशावलेखनम् ||१५|| कल्कैरेषां तथाऽम्लैश्च पचेत् स्नेहं चतुर्विधम् | वेदनायाः प्रशान्त्यर्थं हितं तत्कर्णपूरणम् ||१६||

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Adhikarana 12 (17-18) · Śloka 18

লশুনার্দ্রকশিগ্রূণাং মুরঙ্গ্যা মূলকস্য চ | কদল্যাঃ স্বরসঃ শ্রেষ্ঠঃ কদুষ্ণঃ কর্ণপূরণে ||১৭|| শৃঙ্গবেররসঃ ক্ষৌদ্রং সৈন্ধবং তৈলমেব চ | কদুষ্ণং কর্ণযোর্দেযমেতদ্বা বেদনাপহম্ ||১৮||

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लशुनार्द्रकशिग्रूणां मुरङ्ग्या मूलकस्य च | कदल्याः स्वरसः श्रेष्ठः कदुष्णः कर्णपूरणे ||१७|| शृङ्गवेररसः क्षौद्रं सैन्धवं तैलमेव च | कदुष्णं कर्णयोर्देयमेतद्वा वेदनापहम् ||१८||

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Adhikarana 13 (19) · Śloka 19

বংশাবলেখনাযুক্তে মূত্রে চাজাবিকে ভিষক্ | সর্পিঃ পচেত্তেন কর্ণং পূরযেত্ কর্ণশূলিনঃ ||১৯||

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वंशावलेखनायुक्ते मूत्रे चाजाविके भिषक् | सर्पिः पचेत्तेन कर्णं पूरयेत् कर्णशूलिनः ||१९||

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Adhikarana 14 (20-21) · Śloka 21

মহতঃ পঞ্চমূলস্য কাণ্ডমষ্টাদশাঙ্গুলম্ | ক্ষৌমেণাবেষ্ট্য সংসিচ্য তৈলেনাদীপযেত্ততঃ ||২০|| যত্তৈলং চ্যবতে তেভ্যো ধৃতেভ্যো ভাজনোপরি | জ্ঞেযং তদ্দীপিকাতৈলং সদ্যো গৃহ্ণাতি বেদনাম্ ||২১||

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महतः पञ्चमूलस्य काण्डमष्टादशाङ्गुलम् | क्षौमेणावेष्ट्य संसिच्य तैलेनादीपयेत्ततः ||२०|| यत्तैलं च्यवते तेभ्यो धृतेभ्यो भाजनोपरि | ज्ञेयं तद्दीपिकातैलं सद्यो गृह्णाति वेदनाम् ||२१||

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Adhikarana 15 (22) · Śloka 22

কুর্যাদেবং ভদ্রকাষ্ঠে কুষ্ঠে কাষ্ঠে চ সারলে | মতিমান্ দীপিকাতৈলং কর্ণশূলনিবর্হণম্ ||২২||

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कुर्यादेवं भद्रकाष्ठे कुष्ठे काष्ठे च सारले | मतिमान् दीपिकातैलं कर्णशूलनिबर्हणम् ||२२||

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Adhikarana 16 (23-26) · Śloka 26

অর্কাঙ্কুরানম্লপিষ্টাংস্তৈলাক্তান্ লবণান্বিতান্ | সন্নিদধ্যাত্ স্নুহীকাণ্ডে কোরিতে তচ্ছদাবৃতে ||২৩|| পুটপাকক্রমাস্বিন্নান্ পীডযেদারসাগমাত্ | সুখোষ্ণং তদ্রসং কর্ণে দাপযেচ্ছূলশান্তযে ||২৪|| কপিত্থমাতুলুঙ্গাম্লশৃঙ্গবেররসৈঃ শুভৈঃ | সুখোষ্ণৈঃ পূরযেত্ কর্ণং তচ্ছূলবিনিবৃত্তযে ||২৫|| কর্ণং কোষ্ণেন চুক্রেণ পূরযেত্ কর্ণশূলিনঃ | সমুদ্রফেনচূর্ণেন যুক্ত্যা চাপ্যবচূর্ণযেত্ ||২৬||

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अर्काङ्कुरानम्लपिष्टांस्तैलाक्तान् लवणान्वितान् | सन्निदध्यात् स्नुहीकाण्डे कोरिते तच्छदावृते ||२३|| पुटपाकक्रमास्विन्नान् पीडयेदारसागमात् | सुखोष्णं तद्रसं कर्णे दापयेच्छूलशान्तये ||२४|| कपित्थमातुलुङ्गाम्लशृङ्गवेररसैः शुभैः | सुखोष्णैः पूरयेत् कर्णं तच्छूलविनिवृत्तये ||२५|| कर्णं कोष्णेन चुक्रेण पूरयेत् कर्णशूलिनः | समुद्रफेनचूर्णेन युक्त्या चाप्यवचूर्णयेत् ||२६||

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Adhikarana 17 (27) · Śloka 27

অষ্টানামিহ মূত্রাণাং মূত্রেণান্যতমেন তু | কোষ্ণেন পূরযেত্ কর্ণং কর্ণশূলোপশান্তযে ||২৭||

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अष्टानामिह मूत्राणां मूत्रेणान्यतमेन तु | कोष्णेन पूरयेत् कर्णं कर्णशूलोपशान्तये ||२७||

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Adhikarana 18 (28) · Śloka 28

মূত্রেষ্বম্লেষু বাতঘ্নে গণে চ ক্বথিতে ভিষক্ | পচেচ্চতুর্বিধং স্নেহং পূরণং তচ্চ কর্ণযোঃ ||২৮||

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मूत्रेष्वम्लेषु वातघ्ने गणे च क्वथिते भिषक् | पचेच्चतुर्विधं स्नेहं पूरणं तच्च कर्णयोः ||२८||

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Adhikarana 19 (29) · Śloka 29

এতা এব ক্রিযাঃ কুর্যাত্ পিত্তঘ্নৈঃ পিত্তসংযুতে |২৯|

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एता एव क्रियाः कुर्यात् पित्तघ्नैः पित्तसंयुते |२९|

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Adhikarana 20 (29-30) · Śloka 30

কাকোল্যাদৌ দশক্ষীরং তিক্তং চাত্র হিতং হবিঃ ||২৯|| ক্ষীরবৃক্ষপ্রবালেষু মধুকে চন্দনে তথা | কল্কক্বাথে পরং পক্বং শর্করামধুকৈঃ সরৈঃ ||৩০||

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काकोल्यादौ दशक्षीरं तिक्तं चात्र हितं हविः ||२९|| क्षीरवृक्षप्रवालेषु मधुके चन्दने तथा | कल्कक्वाथे परं पक्वं शर्करामधुकैः सरैः ||३०||

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Adhikarana 21 (31) · Śloka 31

ইঙ্গুদীসর্ষপস্নেহৌ সকফে পূরণে হিতৌ | তিক্তৌষধানাং যূষাশ্চ স্বেদাশ্চ কফনাশনাঃ ||৩১||

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इङ्गुदीसर्षपस्नेहौ सकफे पूरणे हितौ | तिक्तौषधानां यूषाश्च स्वेदाश्च कफनाशनाः ||३१||

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Adhikarana 22 (32-33) · Śloka 33

সুরসাদৌ কৃতং তৈলং পঞ্চমূলে মহত্যপি | মাতুলুঙ্গরসঃ শুক্তং লশুনার্দ্রকযো রসঃ ||৩২|| একৈকঃ পূরণে পথ্যস্তৈলং তেষ্বপি বা কৃতম্ | তীক্ষ্ণা মূর্ধবিরেকাশ্চ কবলাশ্চাত্র পূজিতাঃ ||৩৩||

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सुरसादौ कृतं तैलं पञ्चमूले महत्यपि | मातुलुङ्गरसः शुक्तं लशुनार्द्रकयो रसः ||३२|| एकैकः पूरणे पथ्यस्तैलं तेष्वपि वा कृतम् | तीक्ष्णा मूर्धविरेकाश्च कवलाश्चात्र पूजिताः ||३३||

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Adhikarana 23 (34) · Śloka 34

কর্ণশূলবিধিঃ কৃত্স্নঃ পিত্তঘ্নঃ শোণিতাবৃতে |৩৪|

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कर्णशूलविधिः कृत्स्नः पित्तघ्नः शोणितावृते |३४|

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Adhikarana 24 (34-35) · Śloka 36

শূলপ্রণাদবাধির্যক্ষ্বেডানাং তু প্রকীর্তিতম্ ||৩৪|| সামান্যতো, বিশেষেণ বাধির্যে পূরণং শৃণু | গবাং মূত্রেণ বিল্বানি পিষ্ট্বা তৈলং বিপাচযেত্ ||৩৫|| সজলং চ সদুগ্ধং চ বাধির্যে কর্ণপূরণম্ |৩৬|

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शूलप्रणादबाधिर्यक्ष्वेडानां तु प्रकीर्तितम् ||३४|| सामान्यतो, विशेषेण बाधिर्ये पूरणं शृणु | गवां मूत्रेण बिल्वानि पिष्ट्वा तैलं विपाचयेत् ||३५|| सजलं च सदुग्धं च बाधिर्ये कर्णपूरणम् |३६|

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Adhikarana 25 (36-37) · Śloka 38

সিতামধুকবিম্বীভিঃ সিদ্ধং বাঽঽজে পযস্যপি ||৩৬|| বিম্বীক্বাথে বিমথ্যোষ্ণং শীতীভূতং তদুদ্ধৃতম্ | পুনঃ পচেদ্দশক্ষীরং সিতামধুকচন্দনৈঃ ||৩৭|| বিল্বাম্বুগাঢং তত্তৈলং বাধির্যে কর্ণপূরণম্ |৩৮|

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सितामधुकबिम्बीभिः सिद्धं वाऽऽजे पयस्यपि ||३६|| बिम्बीक्वाथे विमथ्योष्णं शीतीभूतं तदुद्धृतम् | पुनः पचेद्दशक्षीरं सितामधुकचन्दनैः ||३७|| बिल्वाम्बुगाढं तत्तैलं बाधिर्ये कर्णपूरणम् |३८|

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Adhikarana 26 (38) · Śloka 38

বক্ষ্যতে যঃপ্রতিশ্যাযে বিধিঃ সোঽপ্যত্র পূজিতঃ ||৩৮||

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वक्ष्यते यःप्रतिश्याये विधिः सोऽप्यत्र पूजितः ||३८||

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Adhikarana 27 (39) · Śloka 39

বাতব্যাধিষু যশ্চোক্তো বিধিঃ স চ হিতো ভবেত্ |৩৯|

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वातव्याधिषु यश्चोक्तो विधिः स च हितो भवेत् |३९|

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Adhikarana 28 (39) · Śloka 40

কর্ণস্রাবে পূতিকর্ণে তথৈব কৃমিকর্ণকে ||৩৯|| সমানং কর্ম কুর্বীত যোগান্ বৈশেষিকানপি |৪০|

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कर्णस्रावे पूतिकर्णे तथैव कृमिकर्णके ||३९|| समानं कर्म कुर्वीत योगान् वैशेषिकानपि |४०|

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Adhikarana 29 (40-41) · Śloka 41

শিরোবিরেচনং চৈব ধূপনং পূরণং তথা ||৪০|| প্রমার্জনং ধাবনং চ বীক্ষ্য বীক্ষ্যাবচারযেত্ | রাজবৃক্ষাদিতোযেন সুরসাদিগণেন বা ||৪১||

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शिरोविरेचनं चैव धूपनं पूरणं तथा ||४०|| प्रमार्जनं धावनं च वीक्ष्य वीक्ष्यावचारयेत् | राजवृक्षादितोयेन सुरसादिगणेन वा ||४१||

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Adhikarana 30 (42-45) · Śloka 45

কর্ণপ্রক্ষালনং কার্যং চূর্ণৈরেষাং চ পূরণম্ | ক্বাথং পঞ্চকষাযং তু কপিত্থরসযোজিতম্ ||৪২|| কর্ণস্রাবে প্রশংসন্তি পূরণং মধুনা সহ | সর্জত্বক্চূর্ণসংযুক্তঃ কার্পাসীফলজো রসঃ ||৪৩|| যোজিতো মধুনা বাঽপি কর্ণস্রাবে প্রশস্যতে | লাক্ষা রসাঞ্জনং সর্জশ্চূর্ণিতং কর্ণপূরণম্ ||৪৪|| সশৈবলং মহাবৃক্ষজম্ব্বাম্রপ্রসবাযুতম্ | কুলীরক্ষৌদ্রমণ্ডূকীসিদ্ধং তৈলং চ পূজিতম্ ||৪৫||

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कर्णप्रक्षालनं कार्यं चूर्णैरेषां च पूरणम् | क्वाथं पञ्चकषायं तु कपित्थरसयोजितम् ||४२|| कर्णस्रावे प्रशंसन्ति पूरणं मधुना सह | सर्जत्वक्चूर्णसंयुक्तः कार्पासीफलजो रसः ||४३|| योजितो मधुना वाऽपि कर्णस्रावे प्रशस्यते | लाक्षा रसाञ्जनं सर्जश्चूर्णितं कर्णपूरणम् ||४४|| सशैवलं महावृक्षजम्ब्वाम्रप्रसवायुतम् | कुलीरक्षौद्रमण्डूकीसिद्धं तैलं च पूजितम् ||४५||

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Adhikarana 31 (46) · Śloka 46

তিন্দুকান্যভযা রোধ্রং সমঙ্গাঽঽমলকং মধু | পূরণং চাত্র পথ্যং স্যাত্কপিত্থরসযোজিতম্ ||৪৬||

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तिन्दुकान्यभया रोध्रं समङ्गाऽऽमलकं मधु | पूरणं चात्र पथ्यं स्यात्कपित्थरसयोजितम् ||४६||

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Adhikarana 32 (47-48) · Śloka 49

রসমাম্রকপিত্থানাং মধূকধবশালজম্ | পূরণার্থং প্রশংসন্তি তৈলং বা তৈর্বিপাচিতম্ ||৪৭|| প্রিযঙ্গুমধুকাম্বষ্ঠাধাতকীশিলপর্ণিভিঃ | মঞ্জিষ্ঠালোধ্রলাক্ষাভিঃ কপিত্থস্য রসেন বা ||৪৮|| পচেত্তৈলং তদাস্রাবমবগৃহ্ণাতি পূরণাত্ |৪৯|

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रसमाम्रकपित्थानां मधूकधवशालजम् | पूरणार्थं प्रशंसन्ति तैलं वा तैर्विपाचितम् ||४७|| प्रियङ्गुमधुकाम्बष्ठाधातकीशिलपर्णिभिः | मञ्जिष्ठालोध्रलाक्षाभिः कपित्थस्य रसेन वा ||४८|| पचेत्तैलं तदास्रावमवगृह्णाति पूरणात् |४९|

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Adhikarana 33 (49-50) · Śloka 51

ঘৃতং রসাঞ্জনং নার্যাঃ ক্ষীরেণ মধুসংযুতম্ ||৪৯|| তত্প্রশস্তং চিরোত্থেঽপি সাস্রাবে পূতিকর্ণকে | নির্গুণ্ডীস্বরসস্তৈলং সিন্ধুর্ধূমরজো গুডঃ ||৫০|| পূরণঃ পূতিকর্ণস্য শমনো মধুসংযুতঃ |৫১|

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घृतं रसाञ्जनं नार्याः क्षीरेण मधुसंयुतम् ||४९|| तत्प्रशस्तं चिरोत्थेऽपि सास्रावे पूतिकर्णके | निर्गुण्डीस्वरसस्तैलं सिन्धुर्धूमरजो गुडः ||५०|| पूरणः पूतिकर्णस्य शमनो मधुसंयुतः |५१|

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Adhikarana 34 (51) · Śloka 51

কৃমিকর্ণকনাশার্থং কৃমিঘ্নং যোজযেদ্বিধিম্ ||৫১||

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कृमिकर्णकनाशार्थं कृमिघ्नं योजयेद्विधिम् ||५१||

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Adhikarana 35 (52) · Śloka 52

বার্তাকুধূমশ্চ হিতঃ সার্ষপস্নেহ এব চ |৫২|

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वार्ताकुधूमश्च हितः सार्षपस्नेह एव च |५२|

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Adhikarana 36 (52-53) · Śloka 53

কৃমিঘ্নং হরিতালেন গবাং মূত্রযুতেন চ ||৫২|| গুগ্গুলোঃ কর্ণদৌর্গন্ধ্যে ধূপনং শ্রেষ্ঠমুচ্যতে | ছর্দনং ধূমপানং চ কবলস্য চ ধারণম্ ||৫৩||

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कृमिघ्नं हरितालेन गवां मूत्रयुतेन च ||५२|| गुग्गुलोः कर्णदौर्गन्ध्ये धूपनं श्रेष्ठमुच्यते | छर्दनं धूमपानं च कवलस्य च धारणम् ||५३||

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Adhikarana 37 (54) · Śloka 54

কর্ণক্ষ্বেডে হিতং তৈলং সার্ষপং চৈব পূরণম্ | বিদ্রধৌ চাপি কুর্বীত বিদ্রধ্যুক্তং চিকিত্সিতম্ ||৫৪||

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कर्णक्ष्वेडे हितं तैलं सार्षपं चैव पूरणम् | विद्रधौ चापि कुर्वीत विद्रध्युक्तं चिकित्सितम् ||५४||

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Adhikarana 38 (55) · Śloka 55

প্রক্লেদ্য ধীমাংস্তৈলেন স্বেদেন প্রবিলায্য চ | শোধযেত্কর্ণবিট্কং তু ভিষক্ সম্যক্ শলাকযা ||৫৫||

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प्रक्लेद्य धीमांस्तैलेन स्वेदेन प्रविलाय्य च | शोधयेत्कर्णविट्कं तु भिषक् सम्यक् शलाकया ||५५||

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Adhikarana 39 (56) · Śloka 56

নাডীস্বেদোঽথ বমনং ধূমো মূর্ধবিরেচনম্ | বিধিশ্চ কফহৃত্সর্বঃ কর্ণকণ্ডূমপোহতি ||৫৬||

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नाडीस्वेदोऽथ वमनं धूमो मूर्धविरेचनम् | विधिश्च कफहृत्सर्वः कर्णकण्डूमपोहति ||५६||

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Adhikarana 40 (57) · Śloka 57

অথ কর্ণপ্রতীনাহে স্নেহস্বেদৌ প্রযোজযেত্ | ততো বিরিক্তশিরসঃ ক্রিযাং প্রাপ্তাং সমাচরেত্ ||৫৭||

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अथ कर्णप्रतीनाहे स्नेहस्वेदौ प्रयोजयेत् | ततो विरिक्तशिरसः क्रियां प्राप्तां समाचरेत् ||५७||

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Adhikarana 41 (58) · Śloka 58

কর্ণপাকস্য ভৈষজ্যং কুর্যাত্পিত্তবিসর্পবত্ |৫৮|

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कर्णपाकस्य भैषज्यं कुर्यात्पित्तविसर्पवत् |५८|

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Adhikarana 42 (58) · Śloka 59

কর্ণচ্ছিদ্রে বর্তমানং কীটং ক্লেদমলাদি বা ||৫৮|| শৃঙ্গেণাপহরেদ্ধীমানথবাঽপি শলাকযা |৫৯|

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कर्णच्छिद्रे वर्तमानं कीटं क्लेदमलादि वा ||५८|| शृङ्गेणापहरेद्धीमानथवाऽपि शलाकया |५९|

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Adhikarana 43 (59) · Śloka 59

শেষাণাং তু বিকারাণাং প্রাক্ চিকিত্সিতমীরিতম্ ||৫৯||

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शेषाणां तु विकाराणां प्राक् चिकित्सितमीरितम् ||५९||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 21

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে শালাক্যতন্ত্রে কর্ণগতরোগপ্রতিষেধো নামৈকবিংশোঽধ্যাযঃ ||২১||

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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतन्त्रे कर्णगतरोगप्रतिषेधो नामैकविंशोऽध्यायः ||२१||

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