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47. pānātyayapratiṣēdhādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ পানাত্যযপ্রতিষেধং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः पानात्ययप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

মদ্যমুষ্ণং তথা তীক্ষ্ণং সূক্ষ্মং বিশদমেব চ | রূক্ষমাশুকরং চৈব ব্যবাযি চ বিকাশি চ ||৩||

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मद्यमुष्णं तथा तीक्ष्णं सूक्ष्मं विशदमेव च | रूक्षमाशुकरं चैव व्यवायि च विकाशि च ||३||

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Adhikarana 3 (4-5) · Śloka 5

ঔষ্ণ্যাচ্ছীতোপচারং তত্তৈক্ষ্ণ্যাদ্ধন্তি মনোগতিম্ | বিশত্যবযবান্ সৌক্ষ্ম্যাদ্বৈশদ্যাত্কফশুক্রনুত্ ||৪|| মারুতং কোপযেদ্রৌক্ষ্যাদাশুত্বাচ্চাশুকর্মকৃত্ | হর্ষদং চ ব্যবাযিত্বাদ্বিকাশিত্বাদ্বিসর্পতি ||৫||

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औष्ण्याच्छीतोपचारं तत्तैक्ष्ण्याद्धन्ति मनोगतिम् | विशत्यवयवान् सौक्ष्म्याद्वैशद्यात्कफशुक्रनुत् ||४|| मारुतं कोपयेद्रौक्ष्यादाशुत्वाच्चाशुकर्मकृत् | हर्षदं च व्यवायित्वाद्विकाशित्वाद्विसर्पति ||५||

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Adhikarana 4 (6) · Śloka 6

তদম্লং রসতঃ প্রোক্তং লঘু রোচনদীপনম্ | কেচিল্লবণবর্জ্যাংস্তু রসানত্রাদিশন্তি হি ||৬||

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तदम्लं रसतः प्रोक्तं लघु रोचनदीपनम् | केचिल्लवणवर्ज्यांस्तु रसानत्रादिशन्ति हि ||६||

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Adhikarana 5 (7) · Śloka 7

স্নিগ্ধৈস্তদন্নৈর্মাংসৈশ্চ ভক্ষ্যৈশ্চ সহ সেবিতম্ | ভবেদাযুঃপ্রকর্ষায বলাযোপচযায চ ||৭||

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स्निग्धैस्तदन्नैर्मांसैश्च भक्ष्यैश्च सह सेवितम् | भवेदायुःप्रकर्षाय बलायोपचयाय च ||७||

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Adhikarana 6 (8) · Śloka 8

কাম্যতা মনসস্তুষ্টির্ধৈর্যং তেজোঽতিবিক্রমঃ | বিধিবত্ সেব্যমানে তু মদ্যে সন্নিহিতা গুণাঃ ||৮||

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काम्यता मनसस्तुष्टिर्धैर्यं तेजोऽतिविक्रमः | विधिवत् सेव्यमाने तु मद्ये सन्निहिता गुणाः ||८||

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Adhikarana 7 (9) · Śloka 9

তদেবানন্নমজ্ঞেন সেব্যমানমমাত্রযা | কাযাগ্নিনা হ্যগ্নিসমং সমেত্য কুরুতে মদম্ ||৯||

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तदेवानन्नमज्ञेन सेव्यमानममात्रया | कायाग्निना ह्यग्निसमं समेत्य कुरुते मदम् ||९||

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Adhikarana 8 (10) · Śloka 10

মদেন করণানাং তু ভাবান্যত্বে কৃতে সতি | নিগূঢমপি ভাবং স্বং প্রকাশীকুরুতেঽবশঃ ||১০||

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मदेन करणानां तु भावान्यत्वे कृते सति | निगूढमपि भावं स्वं प्रकाशीकुरुतेऽवशः ||१०||

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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11

ত্র্যবস্থশ্চ মদো জ্ঞেযঃ পূর্বো মধ্যোঽথ পশ্চিমঃ |১১|

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त्र्यवस्थश्च मदो ज्ञेयः पूर्वो मध्योऽथ पश्चिमः |११|

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Adhikarana 10 (11) · Śloka 11

পূর্বে বীর্যরতিপ্রীতিহর্ষভাষ্যাদিবর্ধনম্ ||১১||

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पूर्वे वीर्यरतिप्रीतिहर्षभाष्यादिवर्धनम् ||११||

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Adhikarana 11 (12) · Śloka 12

প্রলাপো মধ্যমে মোহো যুক্তাযুক্তক্রিযাস্তথা |১২|

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प्रलापो मध्यमे मोहो युक्तायुक्तक्रियास्तथा |१२|

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Adhikarana 12 (12) · Śloka 12

বিসঞ্জ্ঞঃ পশ্চিমে শেতে নষ্টকর্মক্রিযাগুণঃ ||১২||

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विसञ्ज्ञः पश्चिमे शेते नष्टकर्मक्रियागुणः ||१२||

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Adhikarana 13 (13) · Śloka 13

শ্লৈষ্মিকানল্পপিত্তাংশ্চ স্নিগ্ধান্মাত্রোপসেবিনঃ | পানং ন বাধতেঽত্যর্থং বিপরীতাংস্তু বাধতে ||১৩||

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श्लैष्मिकानल्पपित्तांश्च स्निग्धान्मात्रोपसेविनः | पानं न बाधतेऽत्यर्थं विपरीतांस्तु बाधते ||१३||

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Adhikarana 14 (14) · Śloka 14

নির্ভক্তমেকান্তত এব মদ্যং নিষেব্যমাণং মনুজেন নিত্যম্ | উত্পাদযেত্ কষ্টতমান্ বিকারানাপাদযেচ্চাপি শরীরমেদম্ ||১৪||

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निर्भक्तमेकान्तत एव मद्यं निषेव्यमाणं मनुजेन नित्यम् | उत्पादयेत् कष्टतमान् विकारानापादयेच्चापि शरीरमेदम् ||१४||

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Adhikarana 15 (15-16) · Śloka 26

ক্রুদ্ধেন ভীতেন পিপাসিতেন শোকাভিতপ্তেন বুভুক্ষিতেন | ব্যাযামভারাধ্বপরিক্ষতেন বেগাবরোধাভিহতেন চাপি ||১৫|| অত্যম্লভক্ষ্যাবততোদরেণ সাজীর্ণভুক্তেন তথাঽবলেন | উষ্ণাভিতপ্তেন চ সেব্যমানং করোতি মদ্যং বিবিধান্ বিকারান্ ||২৬||

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क्रुद्धेन भीतेन पिपासितेन शोकाभितप्तेन बुभुक्षितेन | व्यायामभाराध्वपरिक्षतेन वेगावरोधाभिहतेन चापि ||१५|| अत्यम्लभक्ष्यावततोदरेण साजीर्णभुक्तेन तथाऽबलेन | उष्णाभितप्तेन च सेव्यमानं करोति मद्यं विविधान् विकारान् ||२६||

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Adhikarana 16 (17) · Śloka 17

পানাত্যযং পরমদং পানাজীর্ণমথাপি বা | পানবিভ্রমমুগ্রং চ তেষাং বক্ষ্যমি লক্ষণম্ ||১৭||

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पानात्ययं परमदं पानाजीर्णमथापि वा | पानविभ्रममुग्रं च तेषां वक्ष्यमि लक्षणम् ||१७||

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Adhikarana 17 (18) · Śloka 19

স্তম্ভাঙ্গমর্দহৃদযগ্রহতোদকম্পাঃ পানাত্যযেঽনিলকৃতে শিরসো রুজশ্চ | স্বেদপ্রলাপমুখশোষণদাহমূর্চ্ছাঃ পিত্তাত্মকে বদনলোচনপীততা চ ||১৮|| শ্লেষ্মাত্মকে বমথুশীতকফপ্রসেকাঃ সর্বাত্মকে ভবতি সর্ববিকারসম্পত্ |১৯|

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स्तम्भाङ्गमर्दहृदयग्रहतोदकम्पाः पानात्ययेऽनिलकृते शिरसो रुजश्च | स्वेदप्रलापमुखशोषणदाहमूर्च्छाः पित्तात्मके वदनलोचनपीतता च ||१८|| श्लेष्मात्मके वमथुशीतकफप्रसेकाः सर्वात्मके भवति सर्वविकारसम्पत् |१९|

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Adhikarana 18 (19) · Śloka 20

ঊষ্মাণমঙ্গগুরুতাং বিরসাননত্বং শ্লেষ্মাধিকত্বমরুচিং মলমূত্রসঙ্গম্ ||১৯|| লিঙ্গং পরস্য তু মদস্য বদন্তি তজ্জ্ঞাস্তৃষ্ণাং রুজাং শিরসি সন্ধিষু চাপি ভেদম্ |২০|

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ऊष्माणमङ्गगुरुतां विरसाननत्वं श्लेष्माधिकत्वमरुचिं मलमूत्रसङ्गम् ||१९|| लिङ्गं परस्य तु मदस्य वदन्ति तज्ज्ञास्तृष्णां रुजां शिरसि सन्धिषु चापि भेदम् |२०|

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Adhikarana 19 (20) · Śloka 21

আধ্মানমুদ্গিরণমম্লরসো বিদাহোঽজীর্ণস্য পানজনিতস্য বদন্তি লিঙ্গম্ ||২০|| জ্ঞেযানি তত্র ভিষজা সুবিনিশ্চিতানি পিত্তপ্রকোপজনিতানি চ কারণানি |২১|

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आध्मानमुद्गिरणमम्लरसो विदाहोऽजीर्णस्य पानजनितस्य वदन्ति लिङ्गम् ||२०|| ज्ञेयानि तत्र भिषजा सुविनिश्चितानि पित्तप्रकोपजनितानि च कारणानि |२१|

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Adhikarana 20 (21) · Śloka 22

হৃদ্গাত্রতোদবমথুজ্বরকণ্ঠধূমমূর্চ্ছাকফস্রবণমূর্ধরুজো বিদাহঃ ||২১|| দ্বেষঃ সুরান্নবিকৃতেষু চ তেষু তেষু তং পানবিভ্রমমুশন্ত্যখিলেন ধীরাঃ |২২|

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हृद्गात्रतोदवमथुज्वरकण्ठधूममूर्च्छाकफस्रवणमूर्धरुजो विदाहः ||२१|| द्वेषः सुरान्नविकृतेषु च तेषु तेषु तं पानविभ्रममुशन्त्यखिलेन धीराः |२२|

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Adhikarana 21 (22) · Śloka 23

হীনোত্তরৌষ্ঠমতিশীতমমন্দদাহং তৈলপ্রভাস্যমতি(পি)পানহতং বিজহ্যাত্ ||২২|| জিহ্বৌষ্ঠদন্তমসিতং ত্বথবাঽপি নীলং পীতে চ যস্য নযনে রুধিরপ্রভে চ |২৩|

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हीनोत्तरौष्ठमतिशीतममन्ददाहं तैलप्रभास्यमति(पि)पानहतं विजह्यात् ||२२|| जिह्वौष्ठदन्तमसितं त्वथवाऽपि नीलं पीते च यस्य नयने रुधिरप्रभे च |२३|

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Adhikarana 22 (23) · Śloka 23

হিক্কাজ্বরৌ বমথুবেপথুপার্শ্বশূলাঃ কাসভ্রমাবপি চ পানহতং ভজন্তে ||২৩||

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हिक्काज्वरौ वमथुवेपथुपार्श्वशूलाः कासभ्रमावपि च पानहतं भजन्ते ||२३||

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Adhikarana 23 (24) · Śloka 24

তেষাং নিবারণমিদং হি মযোচ্যমানং ব্যক্তাভিধানমখিলেন বিধিং নিবোধ |২৪|

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तेषां निवारणमिदं हि मयोच्यमानं व्यक्ताभिधानमखिलेन विधिं निबोध |२४|

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Adhikarana 24 (24) · Śloka 25

মদ্যং তু চুক্রমরিচার্দ্রকদীপ্যকুষ্ঠসৌবর্চলাযুতমলং পবনস্য শান্ত্যৈ ||২৪|| পৃথ্বীকদীপ্যকমহৌষধহিঙ্গুভির্বা সৌবর্চলেন চ যুতং বিতরেত্ সুখায |২৫|

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मद्यं तु चुक्रमरिचार्द्रकदीप्यकुष्ठसौवर्चलायुतमलं पवनस्य शान्त्यै ||२४|| पृथ्वीकदीप्यकमहौषधहिङ्गुभिर्वा सौवर्चलेन च युतं वितरेत् सुखाय |२५|

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Adhikarana 25 (25) · Śloka 26

আম্রাতকাম্রফলদাডিমমাতুলুঙ্গৈঃ কুর্যাচ্ছুভান্যপি চ ষাডবপানকানি ||২৫|| সেবেত বা ফলরসোপহিতান্ রসাদীনানূপবর্গপিশিতান্যপি গন্ধবন্তি |২৬|

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आम्रातकाम्रफलदाडिममातुलुङ्गैः कुर्याच्छुभान्यपि च षाडवपानकानि ||२५|| सेवेत वा फलरसोपहितान् रसादीनानूपवर्गपिशितान्यपि गन्धवन्ति |२६|

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Adhikarana 26 (26) · Śloka 26

পিত্তাত্মকে মধুরবর্গকষাযমিশ্রং মদ্যং হিতং সমধুশর্করমিষ্টগন্ধম্ ||২৬||

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पित्तात्मके मधुरवर्गकषायमिश्रं मद्यं हितं समधुशर्करमिष्टगन्धम् ||२६||

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Adhikarana 27 (27) · Śloka 27

পীত্বা চ মদ্যমপি চেক্ষুরসপ্রগাঢং নিঃশেষতঃ ক্ষণমবস্থিতমুল্লিখেচ্চ | লাবৈণতিত্তিরিরসাংশ্চ পিবেদনম্লান্ মৌদ্গান্ সুখায সঘৃতান্ সসিতাংশ্চ যূষান্ ||২৭||

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पीत्वा च मद्यमपि चेक्षुरसप्रगाढं निःशेषतः क्षणमवस्थितमुल्लिखेच्च | लावैणतित्तिरिरसांश्च पिबेदनम्लान् मौद्गान् सुखाय सघृतान् ससितांश्च यूषान् ||२७||

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Adhikarana 28 (28) · Śloka 28

পানাত্যযে কফকৃতে কফমুল্লিখেচ্চ মদ্যেন বিম্বিবিদুলোদকসংযুতেন | সেবেত তিক্তকটুকাংশ্চ রসানুদারান্ যূষাংশ্চ তিক্তকটুকোপহিতান্ হিতায ||২৮||

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पानात्यये कफकृते कफमुल्लिखेच्च मद्येन बिम्बिविदुलोदकसंयुतेन | सेवेत तिक्तकटुकांश्च रसानुदारान् यूषांश्च तिक्तकटुकोपहितान् हिताय ||२८||

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Adhikarana 29 (29) · Śloka 29

পথ্যং যবান্নবিকৃতানি চ জাঙ্গলানি শ্লেষ্মঘ্নমন্যদপি যচ্চ নিরত্যযং স্যাত্ |২৯|

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पथ्यं यवान्नविकृतानि च जाङ्गलानि श्लेष्मघ्नमन्यदपि यच्च निरत्ययं स्यात् |२९|

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Adhikarana 30 (29) · Śloka 29

কুর্যাচ্চ সর্বমথ সর্বভবে বিধানং দ্বন্দ্বোদ্ভবে দ্বযমবেক্ষ্য যথাপ্রধানম্ ||২৯||

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कुर्याच्च सर्वमथ सर्वभवे विधानं द्वन्द्वोद्भवे द्वयमवेक्ष्य यथाप्रधानम् ||२९||

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Adhikarana 31 (30) · Śloka 30

সামান্যমন্যদপি যচ্চ সমগ্রমগ্র্যং বক্ষ্যামি যচ্চ মনসো মদকৃত্ সুখং চ |৩০|

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सामान्यमन्यदपि यच्च समग्रमग्र्यं वक्ष्यामि यच्च मनसो मदकृत् सुखं च |३०|

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Adhikarana 32 (30-33) · Śloka 34

ত্বঙ্গাগপুষ্পমগধৈলমধূকধান্যৈঃ শ্লক্ষ্ণৈরজাজিমরিচৈশ্চ কৃতং সমাংশৈঃ ||৩০|| পানং কপিত্থরসবারিপরূষকাঢ্যং পানাত্যযেষু বিধিবত্স্রুতমম্বরান্তে | হ্রীবেরপদ্মপরিপেলবসম্প্রযুক্তৈঃ পুষ্পৈর্বিলিপ্য করবীরজলোদ্ভবৈশ্চ ||৩১|| পিষ্টৈঃ সপদ্মকযুতৈরপি সারিবাদ্যৈঃ সেকং জলৈশ্চ বিতরেদমলৈঃ সুশীতৈঃ | ত্বক্পত্রচোচমরিচৈলভুজঙ্গপুষ্পশ্লেষ্মাতকপ্রসববল্কগুডৈরুপেতম্ ||৩২|| দ্রাক্ষাযুতং হৃতমলং মদিরামযার্তৈস্তত্পানকং শুচি সুগন্ধি নরৈর্নিষেব্যম্ | পিষ্ট্বা পিবেচ্চ মধুকং কটুরোহিণীং চ দ্রাক্ষাং চ মূলমসকৃত্ ত্রপুষীভবং যত্ ||৩৩|| কার্পাসিনীমথ চ নাগবলাং চ তুল্যাং পীত্বা সুখী ভবতি সাধু সুবর্চলাং চ |৩৪|

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त्वङ्गागपुष्पमगधैलमधूकधान्यैः श्लक्ष्णैरजाजिमरिचैश्च कृतं समांशैः ||३०|| पानं कपित्थरसवारिपरूषकाढ्यं पानात्ययेषु विधिवत्स्रुतमम्बरान्ते | ह्रीवेरपद्मपरिपेलवसम्प्रयुक्तैः पुष्पैर्विलिप्य करवीरजलोद्भवैश्च ||३१|| पिष्टैः सपद्मकयुतैरपि सारिवाद्यैः सेकं जलैश्च वितरेदमलैः सुशीतैः | त्वक्पत्रचोचमरिचैलभुजङ्गपुष्पश्लेष्मातकप्रसववल्कगुडैरुपेतम् ||३२|| द्राक्षायुतं हृतमलं मदिरामयार्तैस्तत्पानकं शुचि सुगन्धि नरैर्निषेव्यम् | पिष्ट्वा पिबेच्च मधुकं कटुरोहिणीं च द्राक्षां च मूलमसकृत् त्रपुषीभवं यत् ||३३|| कार्पासिनीमथ च नागबलां च तुल्यां पीत्वा सुखी भवति साधु सुवर्चलां च |३४|

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Adhikarana 33 (34) · Śloka 35

কাশ্মর্যদারুবিডদাডিমপিপ্পলীষু দ্রাক্ষান্বিতাসু কৃতমম্বুনি পানকং যত্ ||৩৪|| তদ্বীজপূরকরসাযুতমাশু পীতং শান্তিং পরাং পরমদে ত্বচিরাত্ করোতি |৩৫|

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काश्मर्यदारुविडदाडिमपिप्पलीषु द्राक्षान्वितासु कृतमम्बुनि पानकं यत् ||३४|| तद्बीजपूरकरसायुतमाशु पीतं शान्तिं परां परमदे त्वचिरात् करोति |३५|

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Adhikarana 34 (35-36) · Śloka 36

দ্রাক্ষাসিতামধুকজীরকধান্যকৃষ্ণাস্বেবং কৃতং ত্রিবৃতযা চ পিবেত্তথৈব ||৩৫|| সৌবর্চলাযুতমুদাররসং ফলাম্লং ভার্গীশৃতেন চ জলেন হিতোঽবসেকঃ ||৩৬||

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द्राक्षासितामधुकजीरकधान्यकृष्णास्वेवं कृतं त्रिवृतया च पिबेत्तथैव ||३५|| सौवर्चलायुतमुदाररसं फलाम्लं भार्गीशृतेन च जलेन हितोऽवसेकः ||३६||

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Adhikarana 35 (37) · Śloka 37

ইক্ষ্বাকুধামার্গববৃক্ষকাণি কাকাহ্বযোদুম্বরিকাশ্চ দুগ্ধে | বিপাচ্য তস্যাঞ্জলিনা বমেদ্ধি মদ্যং পিবেচ্চাহ্নি গতে ত্বজীর্ণে ||৩৭||

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इक्ष्वाकुधामार्गववृक्षकाणि काकाह्वयोदुम्बरिकाश्च दुग्धे | विपाच्य तस्याञ्जलिना वमेद्धि मद्यं पिबेच्चाह्नि गते त्वजीर्णे ||३७||

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Adhikarana 36 (38) · Śloka 39

ত্বক্পিপ্পলীভুজগপুষ্পবিডৈরুপেতং সেবেত হিঙ্গুমরিচৈলযুতং ফলাম্লম্ | উষ্ণাম্বুসৈন্ধবযুতাস্ত্বথবা বিডত্বক্চব্যৈলহিঙ্গুমগধাফলমূলশুণ্ঠীঃ ||৩৮|| হৃদ্যৈঃ খডৈরপি চ ভোজনমত্র শস্তং... |৩৯|

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त्वक्पिप्पलीभुजगपुष्पविडैरुपेतं सेवेत हिङ्गुमरिचैलयुतं फलाम्लम् | उष्णाम्बुसैन्धवयुतास्त्वथवा विडत्वक्चव्यैलहिङ्गुमगधाफलमूलशुण्ठीः ||३८|| हृद्यैः खडैरपि च भोजनमत्र शस्तं... |३९|

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Adhikarana 37 (39-41) · Śloka 41

... দ্রাক্ষাকপিত্থফলদাডিমপানকং যত্ | তত্ পানবিভ্রমহরং মধুশর্করাঢ্যমাম্রাতকোলরসপানকমেব চাপি ||৩৯|| খর্জূরবেত্রককরীরপরূষকেষু দ্রাক্ষাত্রিবৃত্সু চ কৃতং সসিতং হিমং বা | শ্রীপর্ণিযুক্তমথবা তু পিবেদিমানি যষ্ট্যাহ্বযোত্পলহিমাম্বুবিমিশ্রিতানি ||৪০|| ক্ষীরিপ্রবালবিসজীরকনাগপুষ্পপত্রৈলবালুসিতসারিবপদ্মকানি | আম্রাতভব্যকরমর্দকপিত্থকোলবৃক্ষাম্লবেত্রফলজীরকদাডিমানি ||৪১||

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... द्राक्षाकपित्थफलदाडिमपानकं यत् | तत् पानविभ्रमहरं मधुशर्कराढ्यमाम्रातकोलरसपानकमेव चापि ||३९|| खर्जूरवेत्रककरीरपरूषकेषु द्राक्षात्रिवृत्सु च कृतं ससितं हिमं वा | श्रीपर्णियुक्तमथवा तु पिबेदिमानि यष्ट्याह्वयोत्पलहिमाम्बुविमिश्रितानि ||४०|| क्षीरिप्रवालबिसजीरकनागपुष्पपत्रैलवालुसितसारिवपद्मकानि | आम्रातभव्यकरमर्दकपित्थकोलवृक्षाम्लवेत्रफलजीरकदाडिमानि ||४१||

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Adhikarana 38 (42) · Śloka 42

সেবেত বা মরিচজীরকনাগপুষ্পত্বক্পত্রবিশ্বচবিকৈলযুতান্ রসাংশ্চ | সূক্ষ্মাম্বরস্রুতহিমাংশ্চ সুগন্ধিগন্ধান্ পানোদ্ভবান্নুদতি সপ্তগদানশেষান্ ||৪২||

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सेवेत वा मरिचजीरकनागपुष्पत्वक्पत्रविश्वचविकैलयुतान् रसांश्च | सूक्ष्माम्बरस्रुतहिमांश्च सुगन्धिगन्धान् पानोद्भवान्नुदति सप्तगदानशेषान् ||४२||

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Adhikarana 39 (43-44) · Śloka 44

পঞ্চেন্দ্রিযার্থবিষযা মৃদুপানযোগা হৃদ্যাঃ সুখাশ্চ মনসঃ সততং নিষেব্যাঃ | পানাত্যযেষু বিকটোরুনিতম্ববত্যঃ পীনোন্নতস্তনভরানতমধ্যদেশাঃ ||৪৩|| প্রৌঢাঃ স্ত্রিযোঽভিনবযৌবনপীনগাত্র্যঃ সেব্যাশ্চ পঞ্চবিষযাতিশযস্বভাবাঃ ||৪৪||

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पञ्चेन्द्रियार्थविषया मृदुपानयोगा हृद्याः सुखाश्च मनसः सततं निषेव्याः | पानात्ययेषु विकटोरुनितम्बवत्यः पीनोन्नतस्तनभरानतमध्यदेशाः ||४३|| प्रौढाः स्त्रियोऽभिनवयौवनपीनगात्र्यः सेव्याश्च पञ्चविषयातिशयस्वभावाः ||४४||

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Adhikarana 40 (45) · Śloka 45

পিবেদ্রসং পুষ্পফলোদ্ভবং বা সিতামধূকত্রিসুগন্ধিযুক্তম্ | সঞ্চূর্ণ্য সংযোজ্য চ নাগপুষ্পৈরজাজিকৃষ্ণামরিচৈশ্চ তুল্যৈঃ ||৪৫||

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पिबेद्रसं पुष्पफलोद्भवं वा सितामधूकत्रिसुगन्धियुक्तम् | सञ्चूर्ण्य संयोज्य च नागपुष्पैरजाजिकृष्णामरिचैश्च तुल्यैः ||४५||

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Adhikarana 41 (46) · Śloka 46

বর্ষাভূযষ্ট্যাহ্বমধূকলাক্ষাত্বক্কর্বুদারাঙ্কুরজীরকাণি | দ্রাক্ষাং চ কৃষ্ণামথ কেশরং চ ক্ষীরে সমালোড্য পিবেত্ সুখেপ্সুঃ ||৪৬||

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वर्षाभूयष्ट्याह्वमधूकलाक्षात्वक्कर्बुदाराङ्कुरजीरकाणि | द्राक्षां च कृष्णामथ केशरं च क्षीरे समालोड्य पिबेत् सुखेप्सुः ||४६||

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Adhikarana 42 (47) · Śloka 47

ভবেচ্চ মদ্যেন তু যেন পাতিতঃ প্রকামপীতেন সুরাসবাদিনা | তদেব তস্মৈ বিধিবত্ প্রদাপযেদ্বিপর্যযে ভ্রংশমবশ্যমৃচ্ছতি ||৪৭||

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भवेच्च मद्येन तु येन पातितः प्रकामपीतेन सुरासवादिना | तदेव तस्मै विधिवत् प्रदापयेद्विपर्यये भ्रंशमवश्यमृच्छति ||४७||

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Adhikarana 43 (48) · Śloka 48

যথা নরেন্দ্রোপহতস্য কস্যচিদ্ভবেত্ প্রসাদস্তত এব নান্যতঃ | ধ্রুবং তথা মদ্যহতস্য দেহিনো ভবেত্ প্রসাদস্তত এব নান্যতঃ ||৪৮||

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यथा नरेन्द्रोपहतस्य कस्यचिद्भवेत् प्रसादस्तत एव नान्यतः | ध्रुवं तथा मद्यहतस्य देहिनो भवेत् प्रसादस्तत एव नान्यतः ||४८||

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Adhikarana 44 (49) · Śloka 49

বিচ্ছিন্নমদ্যঃ সহসা যোঽতিমদ্যং নিষেবতে | তস্য পানাত্যযোদ্দিষ্টা বিকারাঃ সম্ভবন্তি হি ||৪৯||

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विच्छिन्नमद्यः सहसा योऽतिमद्यं निषेवते | तस्य पानात्ययोद्दिष्टा विकाराः सम्भवन्ति हि ||४९||

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Adhikarana 45 (50) · Śloka 50

মদ্যস্যাগ্নেযবাযব্যৌ গুণাবম্বু(ম্ভো)বহানি তু | স্রোতাংসি শোষযেযাতাং তেন তৃষ্ণোপজাযতে ||৫০||

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मद्यस्याग्नेयवायव्यौ गुणावम्बु(म्भो)वहानि तु | स्रोतांसि शोषयेयातां तेन तृष्णोपजायते ||५०||

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Adhikarana 46 (51) · Śloka 51

পাটলোত্পলকন্দেষু মুদ্গপর্ণ্যাং চ সাধিতম্ | পিবেন্মাগধিকোন্মিশ্রং তত্রাম্ভো হিমশীতলম্ ||৫১||

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पाटलोत्पलकन्देषु मुद्गपर्ण्यां च साधितम् | पिबेन्मागधिकोन्मिश्रं तत्राम्भो हिमशीतलम् ||५१||

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Adhikarana 47 (52) · Śloka 53

সর্পিস্তৈলবসামজ্জদধিভৃঙ্গরসৈর্যুতম্ | ক্বাথেন বিল্বযবযোঃ সর্বগন্ধৈশ্চ পেষিতৈঃ ||৫২|| পক্বমভ্যঞ্জনে শ্রেষ্ঠং... |৫৩|

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सर्पिस्तैलवसामज्जदधिभृङ्गरसैर्युतम् | क्वाथेन बिल्वयवयोः सर्वगन्धैश्च पेषितैः ||५२|| पक्वमभ्यञ्जने श्रेष्ठं... |५३|

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Adhikarana 48 (53) · Śloka 53

...সেকে ক্বাথশ্চ শীতলঃ |৫৩|

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...सेके क्वाथश्च शीतलः |५३|

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Adhikarana 49 (53) · Śloka 54

রসবন্তি চ ভোজ্যানি যথাস্বমবচারযেত্ ||৫৩|| পানকানি সুশীতানি হৃদ্যানি সুরভীণি চ |৫৪|

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रसवन्ति च भोज्यानि यथास्वमवचारयेत् ||५३|| पानकानि सुशीतानि हृद्यानि सुरभीणि च |५४|

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Adhikarana 50 (54) · Śloka 54

ত্বচং প্রাপ্তস্তু পানোষ্মা পিত্তরক্তাভিমূর্চ্ছিতঃ | দাহং প্রকুরুতে ঘোরং পিত্তবত্তত্র ভেষজম্ ||৫৪||

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त्वचं प्राप्तस्तु पानोष्मा पित्तरक्ताभिमूर्च्छितः | दाहं प्रकुरुते घोरं पित्तवत्तत्र भेषजम् ||५४||

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Adhikarana 51 (55-56) · Śloka 56

শীতং বিধানমত ঊর্ধ্বমহং প্রবক্ষ্যে দাহপ্রশান্তিকরমৃদ্ধিমতাং নরাণাম্ | তত্রাদিতো মলযজেন হিতঃ প্রদেহশ্চন্দ্রাংশুহারতুহিনোদকশীতলেন ||৫৫|| শীতাম্বুশীতলতরৈশ্চ শযানমেনং হারৈর্মৃণালবলযৈরবলাঃ স্পৃশেযুঃ | ভিন্নোত্পলোজ্জ্বলহিমে শযনে শযীত পত্রেষু বা সজলবিন্দুষু পদ্মিনীনাম্ ||৫৬||

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शीतं विधानमत ऊर्ध्वमहं प्रवक्ष्ये दाहप्रशान्तिकरमृद्धिमतां नराणाम् | तत्रादितो मलयजेन हितः प्रदेहश्चन्द्रांशुहारतुहिनोदकशीतलेन ||५५|| शीताम्बुशीतलतरैश्च शयानमेनं हारैर्मृणालवलयैरबलाः स्पृशेयुः | भिन्नोत्पलोज्ज्वलहिमे शयने शयीत पत्रेषु वा सजलबिन्दुषु पद्मिनीनाम् ||५६||

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Adhikarana 52 (57) · Śloka 57

আসাদযন্ পবনমাহৃতমঙ্গনাভিঃ কহ্লারপদ্মদলশৈবলসঞ্চযেষু | কান্তৈর্বনান্তপবনৈঃ পরিমৃশ্যমানঃ শক্তশ্চরেদ্ভবনকাননদীর্ঘিকাসু ||৫৭||

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आसादयन् पवनमाहृतमङ्गनाभिः कह्लारपद्मदलशैवलसञ्चयेषु | कान्तैर्वनान्तपवनैः परिमृश्यमानः शक्तश्चरेद्भवनकाननदीर्घिकासु ||५७||

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Adhikarana 53 (58) · Śloka 59

দাহাভিভূতমথবা পরিষেচযেত্তু লামজ্জকাম্বুরুহচন্দনতোযতোযৈঃ | বিস্রাবিতাং হৃতমলাং নববারিপূর্ণাং পদ্মোত্পলাকুলজলামধিবাসিতাম্বুম্ ||৫৮|| বাপীং ভজেত হরিচন্দনভূষিতাঙ্গঃ কান্তাকরস্পৃশনকর্কশরোমকূপঃ |৫৯|

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दाहाभिभूतमथवा परिषेचयेत्तु लामज्जकाम्बुरुहचन्दनतोयतोयैः | विस्रावितां हृतमलां नववारिपूर्णां पद्मोत्पलाकुलजलामधिवासिताम्बुम् ||५८|| वापीं भजेत हरिचन्दनभूषिताङ्गः कान्ताकरस्पृशनकर्कशरोमकूपः |५९|

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Adhikarana 54 (59) · Śloka 60

তত্রৈনমম্বুরুহপত্রসমৈঃ স্পৃশন্ত্যঃ শীতৈঃ করোরুবদনৈঃ কঠিনৈঃ স্তনৈশ্চ ||৫৯|| তোযাবগাহকুশলা মধুরস্বভাবাঃ সংহর্ষযেযুরবলাঃ সুকলৈঃ প্রলাপৈঃ |৬০|

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तत्रैनमम्बुरुहपत्रसमैः स्पृशन्त्यः शीतैः करोरुवदनैः कठिनैः स्तनैश्च ||५९|| तोयावगाहकुशला मधुरस्वभावाः संहर्षयेयुरबलाः सुकलैः प्रलापैः |६०|

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Adhikarana 55 (60-61) · Śloka 62

ধারাগৃহে প্রগলিতোদকদুর্দিনাভে ক্লান্তঃ শযীত সলিলানিলশীতকুক্ষৌ ||৬০|| গন্ধোদকৈঃ সকুসুমৈরুপসিক্তভূমৌ পত্রাম্বুচন্দনরসৈরুপলিপ্তকুড্যে | জাত্যুত্পলপ্রিযককেশরপুণ্ডরীকপুন্নাগনাগকরবীরকৃতোপচারে ||৬১|| তস্মিন্ গৃহে কমলরেণ্বরুণে শযীত যত্নাহৃতানিলবিকম্পিতপুষ্পদাম্নি |৬২|

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धारागृहे प्रगलितोदकदुर्दिनाभे क्लान्तः शयीत सलिलानिलशीतकुक्षौ ||६०|| गन्धोदकैः सकुसुमैरुपसिक्तभूमौ पत्राम्बुचन्दनरसैरुपलिप्तकुड्ये | जात्युत्पलप्रियककेशरपुण्डरीकपुन्नागनागकरवीरकृतोपचारे ||६१|| तस्मिन् गृहे कमलरेण्वरुणे शयीत यत्नाहृतानिलविकम्पितपुष्पदाम्नि |६२|

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Adhikarana 56 (62-64) · Śloka 64

হেমন্তবিন্ধ্যহিমবন্মলযাচলানাং শীতাম্ভসাং সকদলীহরিতদ্রুমাণাম্ ||৬২|| উদ্ভিন্ননীলনলিনাম্বুরুহাকরাণাং চন্দ্রোদযস্য চ কথাঃ শৃণুযান্মনোজ্ঞাঃ | ম্লানং প্রতান্তমনসং মনসোঽনুকূলাঃ পীনস্তনোরুজঘনা হরিচন্দনাঙ্গ্যঃ ||৬৩|| তা এনমার্দ্রবসনাঃ সহ সংবিশেযুঃ শ্লিষ্ট্বাঽবলাঃ শিথিলমেখলহারযষ্ট্যঃ ||৬৪||

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हेमन्तविन्ध्यहिमवन्मलयाचलानां शीताम्भसां सकदलीहरितद्रुमाणाम् ||६२|| उद्भिन्ननीलनलिनाम्बुरुहाकराणां चन्द्रोदयस्य च कथाः शृणुयान्मनोज्ञाः | म्लानं प्रतान्तमनसं मनसोऽनुकूलाः पीनस्तनोरुजघना हरिचन्दनाङ्ग्यः ||६३|| ता एनमार्द्रवसनाः सह संविशेयुः श्लिष्ट्वाऽबलाः शिथिलमेखलहारयष्ट्यः ||६४||

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Adhikarana 57 (65) · Śloka 65

হর্ষযেযুর্নরং নার্যঃ স্বগুণৈ রহসি স্থিতাঃ | তাঃ শৈত্যাচ্ছমযেযুশ্চ পিত্তপানাত্যযান্তরম্ ||৬৫||

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हर्षयेयुर्नरं नार्यः स्वगुणै रहसि स्थिताः | ताः शैत्याच्छमयेयुश्च पित्तपानात्ययान्तरम् ||६५||

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Adhikarana 58 (66) · Śloka 66

তৃড্দাহরক্তপিত্তেষু কার্যোঽযং ভেষজক্রমঃ | সামান্যতো... |৬৬|

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तृड्दाहरक्तपित्तेषु कार्योऽयं भेषजक्रमः | सामान्यतो... |६६|

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Adhikarana 59 (66) · Śloka 66

... বিশেষং তু শৃণু দাহেষ্বশেষতঃ ||৬৬||

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... विशेषं तु शृणु दाहेष्वशेषतः ||६६||

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Adhikarana 60 (67-69) · Śloka 69

কৃত্স্নদেহানুগং রক্তমুদ্রিক্তং দহতি হ্যতি | সঞ্চূষ্যতে দহ্যতে চ তাম্রাভস্তাম্রলোচনঃ ||৬৭|| লোহগন্ধাঙ্গবদনো বহ্নিনেবাবকীর্যতে | তং বিলঙ্ঘ্য বিধানেন সংসৃষ্টাহারমাচরেত্ ||৬৮|| অপ্রশাম্যতি দাহে চ রসৈস্তৃপ্তস্য জাঙ্গলৈঃ | শাখাশ্রযা যথান্যাযং রোহিণীর্ব্যধযেত্ সিরাঃ ||৬৯||

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कृत्स्नदेहानुगं रक्तमुद्रिक्तं दहति ह्यति | सञ्चूष्यते दह्यते च ताम्राभस्ताम्रलोचनः ||६७|| लोहगन्धाङ्गवदनो वह्निनेवावकीर्यते | तं विलङ्घ्य विधानेन संसृष्टाहारमाचरेत् ||६८|| अप्रशाम्यति दाहे च रसैस्तृप्तस्य जाङ्गलैः | शाखाश्रया यथान्यायं रोहिणीर्व्यधयेत् सिराः ||६९||

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Adhikarana 61 (70) · Śloka 70

পিত্তজ্বরসমঃ পিত্তাত্ স চাপ্যস্য বিধির্হিতঃ |৭০|

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पित्तज्वरसमः पित्तात् स चाप्यस्य विधिर्हितः |७०|

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Adhikarana 62 (70-71) · Śloka 71

তৃষ্ণানিরোধাদব্ধাতৌ ক্ষীণে তেজঃ সমুদ্ধতম্ ||৭০|| সবাহ্যাভ্যন্তরং দেহং দহেদ্বৈ মন্দচেতসঃ | সংশুষ্কগলতাল্বোষ্ঠো জিহ্বাং নিষ্কৃষ্য চেষ্টতে ||৭১||

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तृष्णानिरोधादब्धातौ क्षीणे तेजः समुद्धतम् ||७०|| सबाह्याभ्यन्तरं देहं दहेद्वै मन्दचेतसः | संशुष्कगलताल्वोष्ठो जिह्वां निष्कृष्य चेष्टते ||७१||

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Adhikarana 63 (72) · Śloka 73

তত্রোপশমযেত্তেজস্ত্বব্ধাতুং চ বিবর্ধযেত্ | পাযযেত্ কামমম্ভশ্চ শর্করাঢ্যং পযোঽপি বা ||৭২|| শীতমিক্ষুরসং মন্থং বিতরেচ্চেরিতং বিধিম্ |৭৩|

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तत्रोपशमयेत्तेजस्त्वब्धातुं च विवर्धयेत् | पाययेत् काममम्भश्च शर्कराढ्यं पयोऽपि वा ||७२|| शीतमिक्षुरसं मन्थं वितरेच्चेरितं विधिम् |७३|

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Adhikarana 64 (73) · Śloka 74

অসৃজা পূর্ণকোষ্ঠস্য দাহো ভবতি দুঃসহঃ ||৭৩|| বিধিঃ সদ্যোব্রণীযোক্তস্তস্য লক্ষণমেব চ |৭৪|

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असृजा पूर्णकोष्ठस्य दाहो भवति दुःसहः ||७३|| विधिः सद्योव्रणीयोक्तस्तस्य लक्षणमेव च |७४|

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Adhikarana 65 (74-75) · Śloka 75

ধাতুক্ষযোক্তো যো দাহস্তেন মূর্চ্ছাতৃষান্বিতঃ ||৭৪|| ক্ষামস্বরঃ ক্রিযাহীনো ভৃশং সীদতি পীডিতঃ | রক্তপিত্তবিধিস্তস্য হিতঃ স্নিগ্ধোঽনিলাপহঃ ||৭৫||

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धातुक्षयोक्तो यो दाहस्तेन मूर्च्छातृषान्वितः ||७४|| क्षामस्वरः क्रियाहीनो भृशं सीदति पीडितः | रक्तपित्तविधिस्तस्य हितः स्निग्धोऽनिलापहः ||७५||

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Adhikarana 66 (76-77) · Śloka 77

ক্ষতজেনাশ্নতশ্চান্যঃ শোচতো বাঽপ্যনেকধা | তেনান্তর্দহ্যতেঽত্যর্থং তৃষ্ণামূর্চ্ছাপ্রলাপবান্ ||৭৬|| তমিষ্টবিষযোপেতং সুহৃদ্ভিরভিসংবৃতম্ | ক্ষীরমাংসরসাহারং বিধিনোক্তেন সাধযেত্ ||৭৭||

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क्षतजेनाश्नतश्चान्यः शोचतो वाऽप्यनेकधा | तेनान्तर्दह्यतेऽत्यर्थं तृष्णामूर्च्छाप्रलापवान् ||७६|| तमिष्टविषयोपेतं सुहृद्भिरभिसंवृतम् | क्षीरमांसरसाहारं विधिनोक्तेन साधयेत् ||७७||

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Adhikarana 67 (78) · Śloka 78

মর্মাভিঘাতজোঽপ্যস্তি স চাসাধ্যতমঃ স্মৃতঃ |৭৮|

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मर्माभिघातजोऽप्यस्ति स चासाध्यतमः स्मृतः |७८|

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Adhikarana 68 (78) · Śloka 78

সর্ব এব চ বর্জ্যাঃ স্যুঃ শীতগাত্রেষু দেহিষু ||৭৮|| (এবংবিধো ভবেদ্যস্তু মদিরামযপীডিতঃ ||) |

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सर्व एव च वर्ज्याः स्युः शीतगात्रेषु देहिषु ||७८|| (एवंविधो भवेद्यस्तु मदिरामयपीडितः ||) |

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Adhikarana 69 (79) · Śloka 79

প্রশান্তোপদ্রবে চাপি শোধনং প্রাপ্তমাচরেত্ ||৭৯||

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प्रशान्तोपद्रवे चापि शोधनं प्राप्तमाचरेत् ||७९||

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Adhikarana 70 (80) · Śloka 80

সজীরকাণ্যার্দ্রকশৃঙ্গবেরসৌবর্চলান্যর্ধজলপ্লুতানি | মদ্যানি হৃদ্যান্যথ গন্ধবন্তি পীতানি সদ্যঃ শমযন্তি তৃষ্ণাম্ ||৮০||

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सजीरकाण्यार्द्रकशृङ्गवेरसौवर्चलान्यर्धजलप्लुतानि | मद्यानि हृद्यान्यथ गन्धवन्ति पीतानि सद्यः शमयन्ति तृष्णाम् ||८०||

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Adhikarana 71 (81) · Śloka 81

জলপ্লুতশ্চন্দনভূষিতাঙ্গঃ স্রগ্বী সভক্তাং পিশিতোপদংশাম্ | পিবন্ সুরাং নৈব লভেত রোগান্ মনোনুবিঘ্নং চ মদং ন যাতি ||৮১||

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जलप्लुतश्चन्दनभूषिताङ्गः स्रग्वी सभक्तां पिशितोपदंशाम् | पिबन् सुरां नैव लभेत रोगान् मनोनुविघ्नं च मदं न याति ||८१||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 47

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে কাযচিকিত্সাতন্ত্রে মদাত্যযপ্রতিষেধো নাম (নবমোঽধ্যাযঃ, আদিতঃ) সপ্তচত্বারিংশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৪৭||

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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे मदात्ययप्रतिषेधो नाम (नवमोऽध्यायः, आदितः) सप्तचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ||४७||

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