Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো মূর্চ্ছাপ্রতিষেধং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो मूर्च्छाप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো মূর্চ্ছাপ্রতিষেধং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो मूर्च्छाप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3-5) · Śloka 5
ক্ষীণস্য বহুদোষস্য বিরুদ্ধাহারসেবিনঃ | বেগাঘাতাদভীঘাতাদ্ধীনসত্ত্বস্য বা পুনঃ ||৩|| করণাযতনেষূগ্রা বাহ্যেষ্বাভ্যন্তরেষু চ | নিবিশন্তে যদা দোষাস্তদা মূর্চ্ছন্তি মানবাঃ ||৪|| হৃত্পীডা জৃম্ভণং গ্লানিঃ সঞ্জ্ঞানাশো বলস্য চ | সর্বাসাং পূর্বরূপাণি, যথাস্বং তা বিভাবযেত্ ||৫||
क्षीणस्य बहुदोषस्य विरुद्धाहारसेविनः | वेगाघातादभीघाताद्धीनसत्त्वस्य वा पुनः ||३|| करणायतनेषूग्रा बाह्येष्वाभ्यन्तरेषु च | निविशन्ते यदा दोषास्तदा मूर्च्छन्ति मानवाः ||४|| हृत्पीडा जृम्भणं ग्लानिः सञ्ज्ञानाशो बलस्य च | सर्वासां पूर्वरूपाणि, यथास्वं ता विभावयेत् ||५||
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Adhikarana 3 (6) · Śloka 7
সঞ্জ্ঞাবহাসু নাডীষু পিহিতাস্বনিলাদিভিঃ | তমোঽভ্যুপৈতি সহসা সুখদুঃখব্যপোহকৃত্ ||৬|| সুখদুঃখব্যপোহাচ্চ নরঃ পততি কাষ্ঠবত্ | মোহো মূর্চ্ছেতি তাং প্রাহুঃ... |৭|
सञ्ज्ञावहासु नाडीषु पिहितास्वनिलादिभिः | तमोऽभ्युपैति सहसा सुखदुःखव्यपोहकृत् ||६|| सुखदुःखव्यपोहाच्च नरः पतति काष्ठवत् | मोहो मूर्च्छेति तां प्राहुः... |७|
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Adhikarana 4 (7-8) · Śloka 8
... ষড্বিধা সা প্রকীর্তিতা ||৭|| বাতাদিভিঃ শোণিতেন মদ্যেন চ বিষেণ চ | ষট্স্বপ্যেতাসু পিত্তং হি প্রভুত্বেনাবতিষ্ঠতে ||৮||
... षड्विधा सा प्रकीर्तिता ||७|| वातादिभिः शोणितेन मद्येन च विषेण च | षट्स्वप्येतासु पित्तं हि प्रभुत्वेनावतिष्ठते ||८||
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Adhikarana 5 (9) · Śloka 9
অপস্মারোক্তলিঙ্গানি তাসামুক্তানি তত্ত্বতঃ |৯|
अपस्मारोक्तलिङ्गानि तासामुक्तानि तत्त्वतः |९|
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Adhikarana 6 (9) · Śloka 10
পৃথিব্যম্ভস্তমোরূপং রক্তগন্ধশ্চ তন্মযঃ ||৯|| তস্মাদ্রক্তস্য গন্ধেন মূর্চ্ছন্তি ভুবি মানবাঃ |১০|
पृथिव्यम्भस्तमोरूपं रक्तगन्धश्च तन्मयः ||९|| तस्माद्रक्तस्य गन्धेन मूर्च्छन्ति भुवि मानवाः |१०|
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Adhikarana 7 (10) · Śloka 10
দ্রব্যস্বভাব ইত্যেকে দৃষ্ট্বা যদভিমুহ্যতি ||১০||
द्रव्यस्वभाव इत्येके दृष्ट्वा यदभिमुह्यति ||१०||
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Adhikarana 8 (11) · Śloka 11
গুণাস্তীব্রতরত্বেন স্থিতাস্তু বিষমদ্যযোঃ | ত এব তস্মাজ্জাযেত মোহস্তাভ্যাং যথেরিতঃ ||১১||
गुणास्तीव्रतरत्वेन स्थितास्तु विषमद्ययोः | त एव तस्माज्जायेत मोहस्ताभ्यां यथेरितः ||११||
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Adhikarana 9 (12) · Śloka 12
স্তব্ধাঙ্গদৃষ্টিস্ত্বসৃজা গূঢোচ্ছ্বাসশ্চ মূর্চ্ছিতঃ |১২|
स्तब्धाङ्गदृष्टिस्त्वसृजा गूढोच्छ्वासश्च मूर्च्छितः |१२|
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Adhikarana 10 (12) · Śloka 12
মদ্যেন বিলপংশ্ছেতে নষ্টবিভ্রান্তমানসঃ | গাত্রাণি বিক্ষিপন্ ভূমৌ জরাং যাবন্ন যাতি তত্ ||১২||
मद्येन विलपंश्छेते नष्टविभ्रान्तमानसः | गात्राणि विक्षिपन् भूमौ जरां यावन्न याति तत् ||१२||
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Adhikarana 11 (13) · Śloka 13
বেপথুস্বপ্নতৃষ্ণাঃ স্যুঃ স্তম্ভশ্চ বিষমূর্চ্ছিতে | বেদিতব্যং তীব্রতরং যথাস্বং বিষলক্ষণৈঃ ||১৩||
वेपथुस्वप्नतृष्णाः स्युः स्तम्भश्च विषमूर्च्छिते | वेदितव्यं तीव्रतरं यथास्वं विषलक्षणैः ||१३||
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Adhikarana 12 (14) · Śloka 14
সেকাবগাহৌ মণযঃ সহারাঃ শীতাঃ প্রদেহা ব্যজনানিলাশ্চ | শীতানি পানানি চ গন্ধবন্তি সর্বাসু মূর্চ্ছাস্বনিবারিতানি ||১৪||
सेकावगाहौ मणयः सहाराः शीताः प्रदेहा व्यजनानिलाश्च | शीतानि पानानि च गन्धवन्ति सर्वासु मूर्च्छास्वनिवारितानि ||१४||
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Adhikarana 13 (15) · Śloka 15
সিতাপ্রিযালেক্ষুরসপ্লুতানি দ্রাক্ষামধূকস্বরসান্বিতানি | খর্জূরকাশ্মর্যরসৈঃ শৃতানি পানানি সর্পীংষি চ জীবনানি ||১৫||
सिताप्रियालेक्षुरसप्लुतानि द्राक्षामधूकस्वरसान्वितानि | खर्जूरकाश्मर्यरसैः शृतानि पानानि सर्पींषि च जीवनानि ||१५||
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Adhikarana 14 (16) · Śloka 16
সিদ্ধানি বর্গে মধুরে পযাংসি সদাডিমা জাঙ্গলজা রসাশ্চ | তথা যবা লোহিতশালযশ্চ মূর্চ্ছাসু পথ্যাশ্চ সদা সতীনাঃ ||১৬||
सिद्धानि वर्गे मधुरे पयांसि सदाडिमा जाङ्गलजा रसाश्च | तथा यवा लोहितशालयश्च मूर्च्छासु पथ्याश्च सदा सतीनाः ||१६||
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Adhikarana 15 (17) · Śloka 17
ভুজঙ্গপুষ্পং মরিচান্যুশীরং কোলস্য মধ্যং চ পিবেত্ সমানি | শীতেন তোযেন বিসং মৃণালং ক্ষৌদ্রেণ কৃষ্ণাং সিতযা চ পথ্যাম্ ||১৭||
भुजङ्गपुष्पं मरिचान्युशीरं कोलस्य मध्यं च पिबेत् समानि | शीतेन तोयेन बिसं मृणालं क्षौद्रेण कृष्णां सितया च पथ्याम् ||१७||
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Adhikarana 16 (18) · Śloka 18
কুর্যাচ্চ নাসাবদনাবরোধং ক্ষীরং পিবেদ্বাঽপ্যথ মানুষীণাম্ | মূর্চ্ছাং প্রসক্তাং তু শিরোবিরেকৈর্জযেদভীক্ষ্ণং বমনৈশ্চ তীক্ষ্ণৈঃ ||১৮||
कुर्याच्च नासावदनावरोधं क्षीरं पिबेद्वाऽप्यथ मानुषीणाम् | मूर्च्छां प्रसक्तां तु शिरोविरेकैर्जयेदभीक्ष्णं वमनैश्च तीक्ष्णैः ||१८||
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Adhikarana 17 (19) · Śloka 20
হরীতকীক্বাথশৃতং ঘৃতং বা ধাত্রীফলানাং স্বরসৈঃ কৃতং বা | দ্রাক্ষাসিতাদাডিমলাজবন্তি শীতানি নীলোত্পলপদ্মবন্তি ||১৯|| পিবেত্ কষাযাণি চ গন্ধবন্তি পিত্তজ্বরং যানি শমং নযন্তি |২০|
हरीतकीक्वाथशृतं घृतं वा धात्रीफलानां स्वरसैः कृतं वा | द्राक्षासितादाडिमलाजवन्ति शीतानि नीलोत्पलपद्मवन्ति ||१९|| पिबेत् कषायाणि च गन्धवन्ति पित्तज्वरं यानि शमं नयन्ति |२०|
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Adhikarana 18 (20) · Śloka 21
প্রভূতদোষস্তমসোঽতিরেকাত্ সম্মূর্চ্ছিতো নৈব বিবুধ্যতে যঃ ||২০|| সন্ন্যস্তসঞ্জ্ঞো ভৃশদুশ্চিকিত্স্যো জ্ঞেযস্তদা বুদ্ধিমতা মনুষ্যঃ |২১|
प्रभूतदोषस्तमसोऽतिरेकात् सम्मूर्च्छितो नैव विबुध्यते यः ||२०|| सन्न्यस्तसञ्ज्ञो भृशदुश्चिकित्स्यो ज्ञेयस्तदा बुद्धिमता मनुष्यः |२१|
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Adhikarana 19 (21) · Śloka 22
যথাঽঽমলোষ্টং সলিলে নিষিক্তং সমুদ্ধরেদাশ্ববিলীনমেব ||২১|| তদ্বচ্চিকিত্সেত্ত্বরযা ভিষক্তমস্বেদনং মৃত্যুবশং প্রযাতম্ |২২|
यथाऽऽमलोष्टं सलिले निषिक्तं समुद्धरेदाश्वविलीनमेव ||२१|| तद्वच्चिकित्सेत्त्वरया भिषक्तमस्वेदनं मृत्युवशं प्रयातम् |२२|
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Adhikarana 20 (22) · Śloka 23
তীক্ষ্ণাঞ্জনাভ্যঞ্জনধূমযোগৈস্তথা নখাভ্যন্তরতোত্রপাতৈঃ ||২২|| বাদিত্রগীতানুনযৈরপূর্বৈর্বিঘট্টনৈর্গুপ্তফলাবঘর্ষৈঃ |২৩|
तीक्ष्णाञ्जनाभ्यञ्जनधूमयोगैस्तथा नखाभ्यन्तरतोत्रपातैः ||२२|| वादित्रगीतानुनयैरपूर्वैर्विघट्टनैर्गुप्तफलावघर्षैः |२३|
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Adhikarana 21 (23) · Śloka 23
আভিঃ ক্রিযাভিশ্চ ন লব্ধসঞ্জ্ঞঃ সানাহলালাশ্বসনশ্চ বর্জ্যঃ ||২৩||
आभिः क्रियाभिश्च न लब्धसञ्ज्ञः सानाहलालाश्वसनश्च वर्ज्यः ||२३||
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Adhikarana 22 (24) · Śloka 24
প্রবুদ্ধসঞ্জ্ঞং বমনানুলোম্যৈস্তীক্ষ্ণৈর্বিশুদ্ধং লঘুপথ্যভুক্তম্ | ফলত্রিকৈশ্চিত্রকনাগরাঢ্যৈস্তথাঽশ্মজাতাজ্জতুনঃ প্রযোগৈঃ | সশর্করৈর্মাসমুপক্রমেত বিশেষতো জীর্ণঘৃতং স পায্যঃ ||২৪||
प्रबुद्धसञ्ज्ञं वमनानुलोम्यैस्तीक्ष्णैर्विशुद्धं लघुपथ्यभुक्तम् | फलत्रिकैश्चित्रकनागराढ्यैस्तथाऽश्मजाताज्जतुनः प्रयोगैः | सशर्करैर्मासमुपक्रमेत विशेषतो जीर्णघृतं स पाय्यः ||२४||
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Adhikarana 23 (25) · Śloka 25
যথাস্বং চ জ্বরঘ্নানি কষাযাণ্যুপযোজযেত্ | সর্বমূর্চ্ছাপরীতানাং বিষজাযাং বিষাপহম্ ||২৫||
यथास्वं च ज्वरघ्नानि कषायाण्युपयोजयेत् | सर्वमूर्च्छापरीतानां विषजायां विषापहम् ||२५||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 46
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে কাযচিকিত্সাতন্ত্রে মূর্চ্ছাপ্রতিষেধো নাম (অষ্টমোঽধ্যাযঃ, আদিতঃ) ষট্চত্বারিংশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৪৬||
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे मूर्च्छाप्रतिषेधो नाम (अष्टमोऽध्यायः, आदितः) षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ||४६||
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