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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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56. visūcikāpratiṣēdhādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো বিসূচিকাপ্রতিষেধমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो विसूचिकाप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

অজীর্ণমামং বিষ্টব্ধং বিদগ্ধং চ যদীরিতম্ | বিসূচ্যলসকৌ তস্মাদ্ভবেচ্চাপি বিলম্বিকা ||৩||

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अजीर्णमामं विष्टब्धं विदग्धं च यदीरितम् | विसूच्यलसकौ तस्माद्भवेच्चापि विलम्बिका ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

সূচীভিরিব গাত্রাণি তুদন্ সন্তিষ্ঠতেঽনিলঃ | যস্যাজীর্ণেন সা বৈদ্যৈরুচ্যতে তি বিসূচিকা ||৪||

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सूचीभिरिव गात्राणि तुदन् सन्तिष्ठतेऽनिलः | यस्याजीर्णेन सा वैद्यैरुच्यते ति विसूचिका ||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

ন তাং পরিমিতাহারা লভন্তে বিদিতাগমাঃ | মূঢাস্তামজিতাত্মানো লভন্তে কলুষাশযাঃ ||৫||

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न तां परिमिताहारा लभन्ते विदितागमाः | मूढास्तामजितात्मानो लभन्ते कलुषाशयाः ||५||

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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6

মূর্চ্ছাতিসারৌ বমথুঃ পিপাসা শূলং ভ্রমোদ্বেষ্টনজৃম্ভদাহাঃ | বৈবর্ণ্যকম্পৌ হৃদযে রুজশ্চ ভবন্তি তস্যাং শিরসশ্চ ভেদঃ ||৬||

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मूर्च्छातिसारौ वमथुः पिपासा शूलं भ्रमोद्वेष्टनजृम्भदाहाः | वैवर्ण्यकम्पौ हृदये रुजश्च भवन्ति तस्यां शिरसश्च भेदः ||६||

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Adhikarana 6 (7-8) · Śloka 8

কুক্ষিরানহ্যতেঽত্যর্থং প্রতাম্যতি বিকূজতি | নিরুদ্ধো মারুতশ্চাপি কুক্ষৌ বিপরিধাবতি ||৭|| বাতবর্চোনিরোধশ্চ কুক্ষৌ যস্য ভৃশং ভবেত্ | তস্যালসকমাচষ্টে তৃষ্ণোদ্গারাবরোধকৌ ||৮||

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कुक्षिरानह्यतेऽत्यर्थं प्रताम्यति विकूजति | निरुद्धो मारुतश्चापि कुक्षौ विपरिधावति ||७|| वातवर्चोनिरोधश्च कुक्षौ यस्य भृशं भवेत् | तस्यालसकमाचष्टे तृष्णोद्गारावरोधकौ ||८||

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Adhikarana 7 (9) · Śloka 9

দুষ্টং তু ভুক্তং কফমারুতাভ্যাং প্রবর্ততে নোর্ধ্বমধশ্চ যস্য | বিলম্বিকাং তাং ভৃশদুশ্চিকিত্স্যামাচক্ষতে শাস্ত্রবিদঃ পুরাণাঃ ||৯||

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दुष्टं तु भुक्तं कफमारुताभ्यां प्रवर्तते नोर्ध्वमधश्च यस्य | विलम्बिकां तां भृशदुश्चिकित्स्यामाचक्षते शास्त्रविदः पुराणाः ||९||

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Adhikarana 8 (10) · Śloka 10

যত্রস্থমামং বিরুজেত্তমেব দেশং বিশেষেণ বিকারজাতৈঃ | দোষেণ যেনাবততং স্বলিঙ্গৈস্তং লক্ষযেদামসমুদ্ভবৈশ্চ ||১০||

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यत्रस्थमामं विरुजेत्तमेव देशं विशेषेण विकारजातैः | दोषेण येनावततं स्वलिङ्गैस्तं लक्षयेदामसमुद्भवैश्च ||१०||

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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11

যঃ শ্যাবদন্তৌষ্ঠনখোঽল্পসঞ্জ্ঞশ্ছর্দ্যর্দিতোঽভ্যন্তরযাতনেত্রঃ | ক্ষামস্বরঃ সর্ববিমুক্তসন্ধির্যাযান্নরঃ সোঽপুনরাগমায ||১১||

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यः श्यावदन्तौष्ठनखोऽल्पसञ्ज्ञश्छर्द्यर्दितोऽभ्यन्तरयातनेत्रः | क्षामस्वरः सर्वविमुक्तसन्धिर्यायान्नरः सोऽपुनरागमाय ||११||

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Adhikarana 10 (12) · Śloka 12

সাধ্যাসু পার্ষ্ণ্যোর্দহনং প্রশস্তমগ্নিপ্রতাপো বমনং চ তীক্ষ্ণম্ | পক্বে ততোঽন্নে তু বিলঙ্ঘনং স্যাত্ সম্পাচনং চাপি বিরেচনং চ ||১২||

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साध्यासु पार्ष्ण्योर्दहनं प्रशस्तमग्निप्रतापो वमनं च तीक्ष्णम् | पक्वे ततोऽन्ने तु विलङ्घनं स्यात् सम्पाचनं चापि विरेचनं च ||१२||

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Adhikarana 11 (13) · Śloka 13

বিশুদ্ধদেহস্য হি সদ্য এব মূর্চ্ছাতিসারাদিরুপৈতি শান্তিম্ |১৩|

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विशुद्धदेहस्य हि सद्य एव मूर्च्छातिसारादिरुपैति शान्तिम् |१३|

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Adhikarana 12 (13) · Śloka 13

আস্থাপনং চাপি বদন্তি পথ্যং সর্বাসু যোগানপরান্নিবোধ ||১৩||

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आस्थापनं चापि वदन्ति पथ्यं सर्वासु योगानपरान्निबोध ||१३||

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Adhikarana 13 (14) · Śloka 14

পথ্যাবচাহিঙ্গুকলিঙ্গগৃঞ্জসৌবর্চলৈঃ সাতিবিষৈশ্চ চূর্ণম্ | সুখাম্বুপীতং বিনিহন্ত্যজীর্ণং শূলং বিসূচীমরুচিং চ সদ্যঃ ||১৪||

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पथ्यावचाहिङ्गुकलिङ्गगृञ्जसौवर्चलैः सातिविषैश्च चूर्णम् | सुखाम्बुपीतं विनिहन्त्यजीर्णं शूलं विसूचीमरुचिं च सद्यः ||१४||

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Adhikarana 14 (15-16) · Śloka 16

ক্ষারাগদং বা লবণং বিডং বা গুডপ্রগাঢানথ সর্ষপান্ বা | অম্লেন বা সৈন্ধবহিঙ্গুযুক্তৌ সবীজপূর্ণৌ সঘৃতৌ ত্রিবর্গৌ ||১৫|| কটুত্রিকং বা লবণৈরুপেতং পিবেত্ স্নুহীক্ষীরবিমিশ্রিতং তু | কল্যাণকং বা লবণং পিবেতু যদুক্তমাদাবনিলামযেষু ||১৬||

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क्षारागदं वा लवणं विडं वा गुडप्रगाढानथ सर्षपान् वा | अम्लेन वा सैन्धवहिङ्गुयुक्तौ सबीजपूर्णौ सघृतौ त्रिवर्गौ ||१५|| कटुत्रिकं वा लवणैरुपेतं पिबेत् स्नुहीक्षीरविमिश्रितं तु | कल्याणकं वा लवणं पिबेतु यदुक्तमादावनिलामयेषु ||१६||

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Adhikarana 15 (17) · Śloka 18

কৃষ্ণাজমোদক্ষবকাণি বাঽপি তুল্যৌ পিবেদ্বা মগধানিকুম্ভৌ | দন্তীযুতং বা মগধোদ্ভবানাং কল্কং পিবেত্ কোষবতীরসেন ||১৭|| উষ্ণাভিরদ্ভির্মগধোদ্ভবানাং কল্কং পিবেন্নাগরকল্কযুক্তম্ |১৮|

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कृष्णाजमोदक्षवकाणि वाऽपि तुल्यौ पिबेद्वा मगधानिकुम्भौ | दन्तीयुतं वा मगधोद्भवानां कल्कं पिबेत् कोषवतीरसेन ||१७|| उष्णाभिरद्भिर्मगधोद्भवानां कल्कं पिबेन्नागरकल्कयुक्तम् |१८|

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Adhikarana 16 (18) · Śloka 19

ব্যোষং করঞ্জস্য ফলং হরিদ্রে মূলং সমং চাপ্যথ মাতুলুঙ্গ্যাঃ ||১৮|| ছাযাবিশুষ্কা গুটিকাঃ কৃতাস্তা হন্যুর্বিসূচীং নযনাঞ্জনেন |১৯|

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व्योषं करञ्जस्य फलं हरिद्रे मूलं समं चाप्यथ मातुलुङ्ग्याः ||१८|| छायाविशुष्का गुटिकाः कृतास्ता हन्युर्विसूचीं नयनाञ्जनेन |१९|

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Adhikarana 17 (19) · Śloka 20

সুবামিতং সাধুবিরেচিতং বা সুলঙ্ঘিতং মনুজং বিদিত্বা ||১৯|| পেযাদিভির্দীপনপাচনীযৈঃ সম্যক্ক্ষুধার্তং সমুপক্রমেত |২০|

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सुवामितं साधुविरेचितं वा सुलङ्घितं मनुजं विदित्वा ||१९|| पेयादिभिर्दीपनपाचनीयैः सम्यक्क्षुधार्तं समुपक्रमेत |२०|

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Adhikarana 18 (20) · Śloka 21

আমং শকৃদ্বা নিচিতং ক্রমেণ ভূযো বিবদ্ধং বিগুণানিলেন ||২০|| প্রবর্তমানং ন যথাস্বমেনং বিকারমানাহমুদাহরন্তি |২১|

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आमं शकृद्वा निचितं क्रमेण भूयो विबद्धं विगुणानिलेन ||२०|| प्रवर्तमानं न यथास्वमेनं विकारमानाहमुदाहरन्ति |२१|

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Adhikarana 19 (21) · Śloka 22

তস্মিন্ ভবন্ত্যামসমুদ্ভবে তু তৃষ্ণাপ্রতিশ্যাযশিরোবিদাহাঃ ||২১|| আমাশযে শূলমথো গুরুত্বং হৃল্লাস উদ্গারবিঘাতনং চ |২২|

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तस्मिन् भवन्त्यामसमुद्भवे तु तृष्णाप्रतिश्यायशिरोविदाहाः ||२१|| आमाशये शूलमथो गुरुत्वं हृल्लास उद्गारविघातनं च |२२|

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Adhikarana 20 (22) · Śloka 23

স্তম্ভঃ কটীপৃষ্ঠপুরীষমূত্রে শূলোঽথ মূর্চ্ছা স শকৃদ্বমেচ্চ ||২২|| শ্বাসশ্চ পক্বাশযজে ভবন্তি লিঙ্গানি চাত্রালসকোদ্ভবানি |২৩|

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स्तम्भः कटीपृष्ठपुरीषमूत्रे शूलोऽथ मूर्च्छा स शकृद्वमेच्च ||२२|| श्वासश्च पक्वाशयजे भवन्ति लिङ्गानि चात्रालसकोद्भवानि |२३|

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Adhikarana 21 (23) · Śloka 23

আমোদ্ভবে বান্তমুপক্রমেত সংসর্গভক্তক্রমদীপনীযৈঃ ||২৩||

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आमोद्भवे वान्तमुपक्रमेत संसर्गभक्तक्रमदीपनीयैः ||२३||

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Adhikarana 22 (24) · Śloka 24

অথেতরং যো ন শকৃদ্বমেত্তমামং জযেত্ স্বেদনপাচনৈশ্চ |২৪|

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अथेतरं यो न शकृद्वमेत्तमामं जयेत् स्वेदनपाचनैश्च |२४|

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Adhikarana 23 (24-25) · Śloka 25

বিসূচিকাযাং পরিকীর্তিতানি দ্রব্যাণি বৈরেচনিকানি যানি ||২৪|| তান্যেব বর্তীর্বিরচেদ্বিচূর্ণ্য মহিষ্যজাবীভগবাং তু মূত্রৈঃ | স্বিন্নস্য পাযৌ বিনিবেশ্য তাশ্চ চূর্ণানি চৈষাং প্রধমেত্তু নাড্যা ||২৫||

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विसूचिकायां परिकीर्तितानि द्रव्याणि वैरेचनिकानि यानि ||२४|| तान्येव वर्तीर्विरचेद्विचूर्ण्य महिष्यजावीभगवां तु मूत्रैः | स्विन्नस्य पायौ विनिवेश्य ताश्च चूर्णानि चैषां प्रधमेत्तु नाड्या ||२५||

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Adhikarana 24 (26) · Śloka 27

মূত্রেষু সংসাধ্য যথাবিধানং দ্রব্যাণি যান্যূর্ধ্বমধশ্চ যান্তি | ক্বাথেন তেনাশু নিরুহযেচ্চ মূত্রার্ধযুক্তেন সমাক্ষিকেণ ||২৬|| ত্রিভণ্ডিযুক্তং লবণপ্রকুঞ্চং দত্ত্বা বিরিক্তক্রমমাচরেচ্চ |২৭|

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मूत्रेषु संसाध्य यथाविधानं द्रव्याणि यान्यूर्ध्वमधश्च यान्ति | क्वाथेन तेनाशु निरुहयेच्च मूत्रार्धयुक्तेन समाक्षिकेण ||२६|| त्रिभण्डियुक्तं लवणप्रकुञ्चं दत्त्वा विरिक्तक्रममाचरेच्च |२७|

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Adhikarana 25 (27) · Śloka 27

এষ্বেব তৈলেন চ সাধিতেন প্রাপ্তং যদি স্যাদনুবাসযেচ্চ ||২৭||

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एष्वेव तैलेन च साधितेन प्राप्तं यदि स्यादनुवासयेच्च ||२७||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 56

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে কাযচিকিত্সাতন্ত্রে বিসূচিকাপ্রতিষেধো নাম (অষ্টাদশোঽধ্যাযঃ, আদিতঃ ) ষট্পঞ্চাশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৫৬||

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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे विसूचिकाप्रतिषेधो नाम (अष्टादशोऽध्यायः, आदितः ) षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ||५६||

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