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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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10. raktapittacikitsitam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো রক্তপিত্তচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातो रक्तपित्तचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 4

বিহরন্তং জিতাত্মানং পঞ্চগঙ্গে পুনর্বসুম্| প্রণম্যোবাচ নির্মোহমগ্নিবেশোঽগ্নিবর্চসম্||৩|| ভগবন্ রক্তপিত্তস্য হেতুরুক্তঃ সলক্ষণঃ| বক্তব্যং যত্ পরং তস্য বক্তুমর্হসি তদ্গুরো||৪||

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विहरन्तं जितात्मानं पञ्चगङ्गे पुनर्वसुम्| प्रणम्योवाच निर्मोहमग्निवेशोऽग्निवर्चसम्||३|| भगवन् रक्तपित्तस्य हेतुरुक्तः सलक्षणः| वक्तव्यं यत् परं तस्य वक्तुमर्हसि तद्गुरो||४||

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Adhikarana 3 (5-6) · Śloka 6

গুরুরুবাচ- মহাগদং মহাবেগমগ্নিবচ্ছীঘ্রকারি চ| হেতুলক্ষণবিচ্ছীঘ্রং রক্তপিত্তমুপাচরেত্||৫|| তস্যোষ্ণং তীক্ষ্ণমম্লং চ কটূনি লবণানি চ| ঘর্মশ্চান্নবিদাহশ্চ হেতুঃ পূর্বং নিদর্শিতঃ||৬||

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गुरुरुवाच- महागदं महावेगमग्निवच्छीघ्रकारि च| हेतुलक्षणविच्छीघ्रं रक्तपित्तमुपाचरेत्||५|| तस्योष्णं तीक्ष्णमम्लं च कटूनि लवणानि च| घर्मश्चान्नविदाहश्च हेतुः पूर्वं निदर्शितः||६||

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Adhikarana 4 (7-8) · Śloka 8

তৈর্হেতুভিঃ সমুত্ক্লিষ্টং পিত্তং রক্তং প্রপদ্যতে| তদ্যোনিত্বাত্ প্রপন্নং চ বর্ধতে তত্ প্রদূষযত্||৭|| তস্যোষ্মণা দ্রবো ধাতুর্ধাতোর্ধাতোঃ প্রসিচ্যতে| স্বিদ্যতস্তেন সংবৃদ্ধিং ভূযস্তদধিগচ্ছতি||৮||

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तैर्हेतुभिः समुत्क्लिष्टं पित्तं रक्तं प्रपद्यते| तद्योनित्वात् प्रपन्नं च वर्धते तत् प्रदूषयत्||७|| तस्योष्मणा द्रवो धातुर्धातोर्धातोः प्रसिच्यते| स्विद्यतस्तेन संवृद्धिं भूयस्तदधिगच्छति||८||

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Adhikarana 5 (9) · Śloka 9

সংযোগাদ্দূষণাত্তত্তু সামান্যাদ্গন্ধবর্ণযোঃ| রক্তস্য পিত্তমাখ্যাতং রক্তপিত্তং মনীষিভিঃ||৯||

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संयोगाद्दूषणात्तत्तु सामान्याद्गन्धवर्णयोः| रक्तस्य पित्तमाख्यातं रक्तपित्तं मनीषिभिः||९||

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Adhikarana 6 (10) · Śloka 10

প্লীহানং চ যকৃচ্চৈব তদধিষ্ঠায বর্ততে| স্রোতাংসি রক্তবাহীনি তন্মূলানি হি দেহিনাম্||১০||

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प्लीहानं च यकृच्चैव तदधिष्ठाय वर्तते| स्रोतांसि रक्तवाहीनि तन्मूलानि हि देहिनाम्||१०||

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Adhikarana 7 (11-12) · Śloka 13

সান্দ্রং সপাণ্ডু সস্নেহং পিচ্ছিলং চ কফান্বিতম্| শ্যাবারুণং সফেনং চ তনু রূক্ষং চ বাতিকম্||১১|| রক্তপিত্তং কষাযাভং কৃষ্ণং গোমূত্রসন্নিভম্| মেচকাগারধূমাভমঞ্জনাভং চ পৈত্তিকম্||১২|| সংসৃষ্টলিঙ্গং সংসর্গাত্ত্রিলিঙ্গং সান্নিপাতিকম্|১৩|

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सान्द्रं सपाण्डु सस्नेहं पिच्छिलं च कफान्वितम्| श्यावारुणं सफेनं च तनु रूक्षं च वातिकम्||११|| रक्तपित्तं कषायाभं कृष्णं गोमूत्रसन्निभम्| मेचकागारधूमाभमञ्जनाभं च पैत्तिकम्||१२|| संसृष्टलिङ्गं संसर्गात्त्रिलिङ्गं सान्निपातिकम्|१३|

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Adhikarana 8 (13-14) · Śloka 14

একদোষানুগং সাধ্যং দ্বিদোষং যাপ্যমুচ্যতে||১৩|| যত্ত্রিদোষমসাধ্যং তন্মন্দাগ্নেরতিবেগবত্| ব্যাধিভিঃ ক্ষীণদেহস্য বৃদ্ধস্যানশ্নতশ্চ যত্||১৪||

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एकदोषानुगं साध्यं द्विदोषं याप्यमुच्यते||१३|| यत्त्रिदोषमसाध्यं तन्मन्दाग्नेरतिवेगवत्| व्याधिभिः क्षीणदेहस्य वृद्धस्यानश्नतश्च यत्||१४||

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Adhikarana 9 (15-21) · Śloka 21

গতিরূর্ধ্বমধশ্চৈব রক্তপিত্তস্য দর্শিতা| ঊর্ধ্বা সপ্তবিধদ্বারা দ্বিদ্বারা ত্বধরা গতিঃ||১৫|| সপ্ত চ্ছিদ্রাণি শিরসি দ্বে চাধঃ, সাধ্যমূর্ধ্বগম্| যাপ্যং ত্বধোগং, মার্গৌ তু দ্বাবসাধ্যং প্রপদ্যতে||১৬|| যদা তু সর্বচ্ছিদ্রেভ্যো রোমকূপেভ্য এব চ| বর্ততে তামসঙ্খ্যেযাং গতিং তস্যাহুরান্তিকীম্||১৭|| যচ্চোভযাভ্যাং মার্গাভ্যামতিমাত্রং প্রবর্ততে| তুল্যং কুণপগন্ধেন রক্তং কৃষ্ণমতীব চ||১৮|| সংসৃষ্টং কফবাতাভ্যাং কণ্ঠে সজ্জতি চাপি যত্| যচ্চাপ্যুপদ্রবৈঃ সর্বৈর্যথোক্তৈঃ সমভিদ্রুতম্||১৯|| হারিদ্রনীলহরিততাম্রৈর্বর্ণৈরুপদ্রুতম্| ক্ষীণস্য কাসমানস্য যচ্চ তচ্চ ন সিধ্যতি||২০|| যদ্বিদোষানুগং যদ্বা শান্তং শান্তং প্রকুপ্যতি| মার্গান্মার্গং চরেদ্যদ্বা যাপ্যং পিত্তমসৃক্ চ তত্||২১||

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गतिरूर्ध्वमधश्चैव रक्तपित्तस्य दर्शिता| ऊर्ध्वा सप्तविधद्वारा द्विद्वारा त्वधरा गतिः||१५|| सप्त च्छिद्राणि शिरसि द्वे चाधः, साध्यमूर्ध्वगम्| याप्यं त्वधोगं, मार्गौ तु द्वावसाध्यं प्रपद्यते||१६|| यदा तु सर्वच्छिद्रेभ्यो रोमकूपेभ्य एव च| वर्तते तामसङ्ख्येयां गतिं तस्याहुरान्तिकीम्||१७|| यच्चोभयाभ्यां मार्गाभ्यामतिमात्रं प्रवर्तते| तुल्यं कुणपगन्धेन रक्तं कृष्णमतीव च||१८|| संसृष्टं कफवाताभ्यां कण्ठे सज्जति चापि यत्| यच्चाप्युपद्रवैः सर्वैर्यथोक्तैः समभिद्रुतम्||१९|| हारिद्रनीलहरितताम्रैर्वर्णैरुपद्रुतम्| क्षीणस्य कासमानस्य यच्च तच्च न सिध्यति||२०|| यद्विदोषानुगं यद्वा शान्तं शान्तं प्रकुप्यति| मार्गान्मार्गं चरेद्यद्वा याप्यं पित्तमसृक् च तत्||२१||

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Adhikarana 10 (22) · Śloka 22

একমার্গং বলবতো নাতিবেগং নবোত্থিতম্| রক্তপিত্তং সুখে কালে সাধ্যং স্যান্নিরুপদ্রবম্||২২||

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एकमार्गं बलवतो नातिवेगं नवोत्थितम्| रक्तपित्तं सुखे काले साध्यं स्यान्निरुपद्रवम्||२२||

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Adhikarana 11 (23-24) · Śloka 24

স্নিগ্ধোষ্ণমুষ্ণরূক্ষং চ রক্তপিত্তস্য কারণম্| অধোগস্যোত্তরং প্রাযঃ, পূর্বং স্যাদূর্ধ্বগস্য তু||২৩|| ঊর্ধ্বগং কফসংসৃষ্টমধোগং মারুতানুগম্| দ্বিমার্গং কফবাতাভ্যামুভাভ্যামনুবধ্যতে||২৪||

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स्निग्धोष्णमुष्णरूक्षं च रक्तपित्तस्य कारणम्| अधोगस्योत्तरं प्रायः, पूर्वं स्यादूर्ध्वगस्य तु||२३|| ऊर्ध्वगं कफसंसृष्टमधोगं मारुतानुगम्| द्विमार्गं कफवाताभ्यामुभाभ्यामनुबध्यते||२४||

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Adhikarana 12 (25-28) · Śloka 28

অক্ষীণবলমাংসস্য রক্তপিত্তং যদশ্নতঃ| তদ্দোষদুষ্টমুত্ক্লিষ্টং নাদৌ স্তম্ভনমর্হতি||২৫|| গলগ্রহং পূতিনস্যং মূর্চ্ছাযমরুচিং জ্বরম্| গুল্মং প্লীহানমানাহং কিলাসং কৃচ্ছ্রমূত্রতাম্||২৬|| কুষ্ঠান্যর্শাংসি বীসর্পং বর্ণনাশং ভগন্দরম্| বুদ্ধীন্দ্রিযোপরোধং চ কুর্যাত্ স্তম্ভিতমাদিতঃ||২৭|| তস্মাদুপেক্ষ্যং বলিনো বলদোষবিচারিণা | রক্তপিত্তং প্রথমতঃ প্রবৃদ্ধং সিদ্ধিমিচ্ছতা||২৮||

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अक्षीणबलमांसस्य रक्तपित्तं यदश्नतः| तद्दोषदुष्टमुत्क्लिष्टं नादौ स्तम्भनमर्हति||२५|| गलग्रहं पूतिनस्यं मूर्च्छायमरुचिं ज्वरम्| गुल्मं प्लीहानमानाहं किलासं कृच्छ्रमूत्रताम्||२६|| कुष्ठान्यर्शांसि वीसर्पं वर्णनाशं भगन्दरम्| बुद्धीन्द्रियोपरोधं च कुर्यात् स्तम्भितमादितः||२७|| तस्मादुपेक्ष्यं बलिनो बलदोषविचारिणा | रक्तपित्तं प्रथमतः प्रवृद्धं सिद्धिमिच्छता||२८||

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Adhikarana 13 (29-30) · Śloka 30

প্রাযেণ হি সমুত্ক্লিষ্টমামদোষাচ্ছরীরিণাম্| বৃদ্ধিং প্রযাতি পিত্তাসৃক্তস্মাত্তল্লঙ্ঘ্যমাদিতঃ||২৯|| মার্গৌ দোষানুবন্ধং চ নিদানং প্রসমীক্ষ্য চ| লঙ্ঘনং রক্তপিত্তাদৌ তর্পণং বা প্রযোজযেত্||৩০||

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प्रायेण हि समुत्क्लिष्टमामदोषाच्छरीरिणाम्| वृद्धिं प्रयाति पित्तासृक्तस्मात्तल्लङ्घ्यमादितः||२९|| मार्गौ दोषानुबन्धं च निदानं प्रसमीक्ष्य च| लङ्घनं रक्तपित्तादौ तर्पणं वा प्रयोजयेत्||३०||

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Adhikarana 14 (31-35) · Śloka 35

হ্রীবেরচন্দনোশীরমুস্তপর্পটকৈঃ শৃতম্| কেবলং শৃতশীতং বা দদ্যাত্তোযং পিপাসবে||৩১|| ঊর্ধ্বগে তর্পণং পূর্বং পেযাং পূর্বমধোগতে| কালসাত্ম্যানুবন্ধজ্ঞো দদ্যাত্ প্রকৃতিকল্পবিত্||৩২|| জলং খর্জূরমৃদ্বীকামধূকৈঃ সপরূষকৈঃ| শৃতশীতং প্রযোক্তব্যং তর্পণার্থে সশর্করম্||৩৩|| তর্পণং সঘৃতক্ষৌদ্রং লাজচূর্ণৈঃ প্রদাপযেত্| ঊর্ধ্বগং রক্তপিত্তং তত্ পীতং কালে ব্যপোহতি||৩৪|| মন্দাগ্নেরম্লসাত্ম্যায তত্ সাম্লমপি কল্পযেত্| দাডিমামলকৈর্বিদ্বানম্লার্থং চানুদাপযেত্||৩৫||

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ह्रीबेरचन्दनोशीरमुस्तपर्पटकैः शृतम्| केवलं शृतशीतं वा दद्यात्तोयं पिपासवे||३१|| ऊर्ध्वगे तर्पणं पूर्वं पेयां पूर्वमधोगते| कालसात्म्यानुबन्धज्ञो दद्यात् प्रकृतिकल्पवित्||३२|| जलं खर्जूरमृद्वीकामधूकैः सपरूषकैः| शृतशीतं प्रयोक्तव्यं तर्पणार्थे सशर्करम्||३३|| तर्पणं सघृतक्षौद्रं लाजचूर्णैः प्रदापयेत्| ऊर्ध्वगं रक्तपित्तं तत् पीतं काले व्यपोहति||३४|| मन्दाग्नेरम्लसात्म्याय तत् साम्लमपि कल्पयेत्| दाडिमामलकैर्विद्वानम्लार्थं चानुदापयेत्||३५||

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Adhikarana 15 (36-48) · Śloka 48

শালিষষ্টিকনীবারকোরদূষপ্রশান্তিকাঃ| শ্যামাকশ্চ প্রিযঙ্গুশ্চ ভোজনং রক্তপিত্তিনাম্||৩৬|| মুদ্গা মসূরাশ্চণকাঃ সমকুষ্ঠাঢকীফলাঃ| প্রশস্তাঃ সূপযূষার্থে কল্পিতা রক্তপিত্তিনাম্||৩৭|| পটোলনিম্ববেত্রাগ্রপ্লক্ষবেতসপল্লবাঃ| কিরাততিক্তকং শাকং গণ্ডীরঃ সকঠিল্লকঃ||৩৮|| কোবিদারস্য পুষ্পাণি কাশ্মর্যস্যাথ শাল্মলেঃ| অন্নপানবিধৌ শাকং যচ্চান্যদ্রক্তপিত্তনুত্||৩৯|| শাকার্থং শাকসাত্ম্যানাং তচ্ছস্তং রক্তপিত্তিনাম্| স্বিন্নং বা সর্পিষা ভৃষ্টং যূষবদ্বা বিপাচিতম্||৪০|| পারাবতান্ কপোতাংশ্চ লাবান্ রক্তাক্ষবর্তকান্| শশান্ কপিঞ্জলানেণান্ হরিণান্কালপুচ্ছকান্||৪১|| রক্তপিত্তে হিতান্ বিদ্যাদ্রসাংস্তেষাং প্রযোজযেত্| ঈষদম্লাননম্লান্ বা ঘৃতভৃষ্টান্ সশর্করান্||৪২|| কফানুগে যূষশাকং দদ্যাদ্বাতানুগে রসম্| রক্তপিত্তে যবাগূনামতঃ কল্পঃ প্রবক্ষ্যতে||৪৩|| পদ্মোত্পলানাং কিঞ্জল্কঃ পৃশ্নিপর্ণী প্রিযঙ্গুকাঃ| জলে সাধ্যা রসে তস্মিন্ পেযা স্যাদ্রক্তপিত্তিনাম্||৪৪|| চন্দনোশীরলোধ্রাণাং রসে তদ্বত্ সনাগরে| কিরাততিক্তকোশীরমুস্তানাং তদ্বদেব চ||৪৫|| ধাতকীধন্বযাসাম্বুবিল্বানাং বা রসে শৃতা| মসূরপৃশ্নিপর্ণ্যোর্বা স্থিরামুদ্গরসেঽথ বা||৪৬|| রসে হরেণুকানাং বা সঘৃতে সবলারসে| সিদ্ধাঃ পারাবতাদীনাং রসে বা স্যুঃ পৃথক্পৃথক্||৪৭|| ইত্যুক্তা রক্তপিত্তঘ্ন্যঃ শীতাঃ সমধুশর্করাঃ| যবাগ্বঃ কল্পনা চৈষা কার্যা মাংসরসেষ্বপি||৪৮||

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शालिषष्टिकनीवारकोरदूषप्रशान्तिकाः| श्यामाकश्च प्रियङ्गुश्च भोजनं रक्तपित्तिनाम्||३६|| मुद्गा मसूराश्चणकाः समकुष्ठाढकीफलाः| प्रशस्ताः सूपयूषार्थे कल्पिता रक्तपित्तिनाम्||३७|| पटोलनिम्बवेत्राग्रप्लक्षवेतसपल्लवाः| किराततिक्तकं शाकं गण्डीरः सकठिल्लकः||३८|| कोविदारस्य पुष्पाणि काश्मर्यस्याथ शाल्मलेः| अन्नपानविधौ शाकं यच्चान्यद्रक्तपित्तनुत्||३९|| शाकार्थं शाकसात्म्यानां तच्छस्तं रक्तपित्तिनाम्| स्विन्नं वा सर्पिषा भृष्टं यूषवद्वा विपाचितम्||४०|| पारावतान् कपोतांश्च लावान् रक्ताक्षवर्तकान्| शशान् कपिञ्जलानेणान् हरिणान्कालपुच्छकान्||४१|| रक्तपित्ते हितान् विद्याद्रसांस्तेषां प्रयोजयेत्| ईषदम्लाननम्लान् वा घृतभृष्टान् सशर्करान्||४२|| कफानुगे यूषशाकं दद्याद्वातानुगे रसम्| रक्तपित्ते यवागूनामतः कल्पः प्रवक्ष्यते||४३|| पद्मोत्पलानां किञ्जल्कः पृश्निपर्णी प्रियङ्गुकाः| जले साध्या रसे तस्मिन् पेया स्याद्रक्तपित्तिनाम्||४४|| चन्दनोशीरलोध्राणां रसे तद्वत् सनागरे| किराततिक्तकोशीरमुस्तानां तद्वदेव च||४५|| धातकीधन्वयासाम्बुबिल्वानां वा रसे शृता| मसूरपृश्निपर्ण्योर्वा स्थिरामुद्गरसेऽथ वा||४६|| रसे हरेणुकानां वा सघृते सबलारसे| सिद्धाः पारावतादीनां रसे वा स्युः पृथक्पृथक्||४७|| इत्युक्ता रक्तपित्तघ्न्यः शीताः समधुशर्कराः| यवाग्वः कल्पना चैषा कार्या मांसरसेष्वपि||४८||

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Adhikarana 16 (49-51) · Śloka 51

শশঃ সবাস্তুকঃ শস্তো বিবন্ধে রক্তপিত্তিনাম্| বাতোল্বণে তিত্তিরিঃ স্যাদুদুম্বররসে শৃতঃ||৪৯|| মযূরঃ প্লক্ষনির্যূহে ন্যগ্রোধস্য চ কুক্কুটঃ| রসে বিল্বোত্পলাদীনাং বর্তকক্রকরৌ হিতৌ||৫০|| তৃষ্যতে তিক্তকৈঃ সিদ্ধং তৃষ্ণাঘ্নং বা ফলোদকম্| সিদ্ধং বিদারিগন্ধাদ্যৈরথবা শৃতশীতলম্||৫১||

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शशः सवास्तुकः शस्तो विबन्धे रक्तपित्तिनाम्| वातोल्बणे तित्तिरिः स्यादुदुम्बररसे शृतः||४९|| मयूरः प्लक्षनिर्यूहे न्यग्रोधस्य च कुक्कुटः| रसे बिल्वोत्पलादीनां वर्तकक्रकरौ हितौ||५०|| तृष्यते तिक्तकैः सिद्धं तृष्णाघ्नं वा फलोदकम्| सिद्धं विदारिगन्धाद्यैरथवा शृतशीतलम्||५१||

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Adhikarana 17 (52) · Śloka 52

জ্ঞাত্বা দোষাবনুবলৌ বলমাহারমেব চ| জলং পিপাসবে দদ্যাদ্বিসর্গাদল্পশোঽপি বা||৫২||

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ज्ञात्वा दोषावनुबलौ बलमाहारमेव च| जलं पिपासवे दद्याद्विसर्गादल्पशोऽपि वा||५२||

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Adhikarana 18 (53) · Śloka 54

নিদানং রক্তপিত্তস্য যত্কিঞ্চিত্ সম্প্রকাশিতম্| জীবিতারোগ্যকামৈস্তন্ন সেব্যং রক্তপিত্তিভিঃ||৫৩|| ইত্যন্নপানং নির্দিষ্টং ক্রমশো রক্তপিত্তনুত্|৫৪|

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निदानं रक्तपित्तस्य यत्किञ्चित् सम्प्रकाशितम्| जीवितारोग्यकामैस्तन्न सेव्यं रक्तपित्तिभिः||५३|| इत्यन्नपानं निर्दिष्टं क्रमशो रक्तपित्तनुत्|५४|

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Adhikarana 19 (54-61) · Śloka 61

বক্ষ্যতে বহুদোষাণাং কার্যং বলবতাং চ যত্||৫৪|| অক্ষীণবলমাংসস্য যস্য সন্তর্পণোত্থিতম্| বহুদোষং বলবতো রক্তপিত্তং শরীরিণঃ||৫৫|| কালে সংশোধনার্হস্য তদ্ধরেন্নিরুপদ্রবম্| বিরেচনেনোর্ধ্বভাগমধোগং বমনেন চ||৫৬|| ত্রিবৃতামভযাং প্রাজ্ঞঃ ফলান্যারগ্বধস্য বা| ত্রাযমাণাং গবাক্ষ্যা বা মূলমামলকানি বা||৫৭|| বিরেচনং প্রযুঞ্জীত প্রভূতমধুশর্করম্| রসঃ প্রশস্যতে তেষাং রক্তপিত্তে বিশেষতঃ||৫৮|| বমনং মদনোন্মিশ্রো মন্থঃ সক্ষৌদ্রশর্করঃ| সশর্করং বা সলিলমিক্ষূণাং রস এব বা||৫৯|| বত্সকস্য ফলং মুস্তং মদনং মধুকং মধু| অধোবহে রক্তপিত্তে বমনং পরমুচ্যতে||৬০|| ঊর্ধ্বগে শুদ্ধকোষ্ঠস্য তর্পণাদিঃ ক্রমো হিতঃ| অধোগতে যবাগ্বাদির্ন চেত্স্যান্মারুতো বলী||৬১||

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वक्ष्यते बहुदोषाणां कार्यं बलवतां च यत्||५४|| अक्षीणबलमांसस्य यस्य सन्तर्पणोत्थितम्| बहुदोषं बलवतो रक्तपित्तं शरीरिणः||५५|| काले संशोधनार्हस्य तद्धरेन्निरुपद्रवम्| विरेचनेनोर्ध्वभागमधोगं वमनेन च||५६|| त्रिवृतामभयां प्राज्ञः फलान्यारग्वधस्य वा| त्रायमाणां गवाक्ष्या वा मूलमामलकानि वा||५७|| विरेचनं प्रयुञ्जीत प्रभूतमधुशर्करम्| रसः प्रशस्यते तेषां रक्तपित्ते विशेषतः||५८|| वमनं मदनोन्मिश्रो मन्थः सक्षौद्रशर्करः| सशर्करं वा सलिलमिक्षूणां रस एव वा||५९|| वत्सकस्य फलं मुस्तं मदनं मधुकं मधु| अधोवहे रक्तपित्ते वमनं परमुच्यते||६०|| ऊर्ध्वगे शुद्धकोष्ठस्य तर्पणादिः क्रमो हितः| अधोगते यवाग्वादिर्न चेत्स्यान्मारुतो बली||६१||

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Adhikarana 20 (62-72) · Śloka 72

বলমাংসপরিক্ষীণং শোকভারাধ্বকর্শিতম্| জ্বলনাদিত্যসন্তপ্তমন্যৈর্বা ক্ষীণমামযৈঃ||৬২|| গর্ভিণীং স্থবিরং বালং রূক্ষাল্পপ্রমিতাশিনম্| অবম্যমবিরেচ্যং বা যং পশ্যেদ্রক্তপিত্তিনম্||৬৩|| শোষেণ সানুবন্ধং বা তস্য সংশমনী ক্রিযা| শস্যতে রক্তপিত্তস্য পরং সাঽথ প্রবক্ষ্যতে||৬৪|| অটরূষকমৃদ্বীকাপথ্যাক্বাথঃ সশর্করঃ| মধুমিশ্রঃ শ্বাসকাসরক্তপিত্তনিবর্হণঃ||৬৫|| অটরূষকনির্যূহে প্রিযঙ্গুং মৃত্তিকাঞ্জনে| বিনীয লোধ্রং ক্ষৌদ্রং চ রক্তপিত্তহরং পিবেত্||৬৬|| পদ্মকং পদ্মকিঞ্জল্কং দূর্বাং বাস্তূকমুত্পলম্| নাগপুষ্পং চ লোধ্রং চ তেনৈব বিধিনা পিবেত্||৬৭|| প্রপৌণ্ডরীকং মধুকং মধু চাশ্বশকৃদ্রসে| যবাসভৃঙ্গরজসোর্মূলং বা গোশকৃদ্রসে||৬৮|| বিনীয রক্তপিত্তঘ্নং পেযং স্যাত্তণ্ডুলাম্বুনা| যুক্তং বা মঘুসর্পির্ভ্যাং লিহ্যাদ্গোশ্বশকৃদ্রসম্||৬৯|| খদিরস্য প্রিযঙ্গূণাং কোবিদারস্য শাল্মলেঃ| পুষ্পচূর্ণানি মধুনা লিহ্যান্না রক্তপিত্তিকঃ||৭০|| শৃঙ্গাটকানাং লাজানাং মুস্তখর্জূরযোরপি| লিহ্যাচ্চূর্ণানি মধুনা পদ্মানাং কেশরস্য চ||৭১|| ধন্বজানামসৃগ্লিহ্যান্মধুনা মৃগপক্ষিণাম্| সক্ষৌদ্রং গ্রথিতে রক্তে লিহ্যাত্ পারাবতং শকৃত্||৭২||

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बलमांसपरिक्षीणं शोकभाराध्वकर्शितम्| ज्वलनादित्यसन्तप्तमन्यैर्वा क्षीणमामयैः||६२|| गर्भिणीं स्थविरं बालं रूक्षाल्पप्रमिताशिनम्| अवम्यमविरेच्यं वा यं पश्येद्रक्तपित्तिनम्||६३|| शोषेण सानुबन्धं वा तस्य संशमनी क्रिया| शस्यते रक्तपित्तस्य परं साऽथ प्रवक्ष्यते||६४|| अटरूषकमृद्वीकापथ्याक्वाथः सशर्करः| मधुमिश्रः श्वासकासरक्तपित्तनिबर्हणः||६५|| अटरूषकनिर्यूहे प्रियङ्गुं मृत्तिकाञ्जने| विनीय लोध्रं क्षौद्रं च रक्तपित्तहरं पिबेत्||६६|| पद्मकं पद्मकिञ्जल्कं दूर्वां वास्तूकमुत्पलम्| नागपुष्पं च लोध्रं च तेनैव विधिना पिबेत्||६७|| प्रपौण्डरीकं मधुकं मधु चाश्वशकृद्रसे| यवासभृङ्गरजसोर्मूलं वा गोशकृद्रसे||६८|| विनीय रक्तपित्तघ्नं पेयं स्यात्तण्डुलाम्बुना| युक्तं वा मघुसर्पिर्भ्यां लिह्याद्गोश्वशकृद्रसम्||६९|| खदिरस्य प्रियङ्गूणां कोविदारस्य शाल्मलेः| पुष्पचूर्णानि मधुना लिह्यान्ना रक्तपित्तिकः||७०|| शृङ्गाटकानां लाजानां मुस्तखर्जूरयोरपि| लिह्याच्चूर्णानि मधुना पद्मानां केशरस्य च||७१|| धन्वजानामसृग्लिह्यान्मधुना मृगपक्षिणाम्| सक्षौद्रं ग्रथिते रक्ते लिह्यात् पारावतं शकृत्||७२||

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Adhikarana 21 (73-77) · Śloka 77

উশীরকালীযকলোধ্রপদ্মকপ্রিযঙ্গুকাকট্ফলশঙ্খগৈরিকাঃ| পৃথক্ পৃথক্ চন্দনতুল্যভাগিকাঃ সশর্করাস্তণ্ডুলধাবনাপ্লুতাঃ||৭৩|| রক্তং সপিত্তং তমকং পিপাসাং দাহং চ পীতাঃ শমযন্তি সদ্যঃ| কিরাততিক্তং ক্রমুকং সমুস্তং প্রপৌণ্ডরীকং কমলোত্পলে চ||৭৪|| হ্রীবেরমূলানি পটোলপত্রং দুরালভা পর্পটকো মৃণালম্| ধনঞ্জযোদুম্বরবেতসত্বঙ্ন্যগ্রোধশালেযযবাসকত্বক্||৭৫|| তুগালতাবেতসতণ্ডুলীযং সসারিবং মোচরসঃ সমঙ্গা| পৃথক্ পৃথক্ চন্দনযোজিতানি তেনৈব কল্পেন হিতানি তত্র||৭৬|| নিশি স্থিতা বা স্বরসীকৃতা বা কল্কীকৃতা বা মৃদিতাঃ শৃতা বা| এতে সমস্তা গণশঃ পৃথগ্বা রক্তং সপিত্তং শমযন্তি যোগাঃ||৭৭||

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उशीरकालीयकलोध्रपद्मकप्रियङ्गुकाकट्फलशङ्खगैरिकाः| पृथक् पृथक् चन्दनतुल्यभागिकाः सशर्करास्तण्डुलधावनाप्लुताः||७३|| रक्तं सपित्तं तमकं पिपासां दाहं च पीताः शमयन्ति सद्यः| किराततिक्तं क्रमुकं समुस्तं प्रपौण्डरीकं कमलोत्पले च||७४|| ह्रीबेरमूलानि पटोलपत्रं दुरालभा पर्पटको मृणालम्| धनञ्जयोदुम्बरवेतसत्वङ्न्यग्रोधशालेययवासकत्वक्||७५|| तुगालतावेतसतण्डुलीयं ससारिवं मोचरसः समङ्गा| पृथक् पृथक् चन्दनयोजितानि तेनैव कल्पेन हितानि तत्र||७६|| निशि स्थिता वा स्वरसीकृता वा कल्कीकृता वा मृदिताः शृता वा| एते समस्ता गणशः पृथग्वा रक्तं सपित्तं शमयन्ति योगाः||७७||

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Adhikarana 22 (78) · Śloka 78

মুদ্গাঃ সলাজাঃ সযবাঃ সকৃষ্ণাঃ সোশীরমুস্তাঃ সহ চন্দনেন| বলাজলে পর্যুষিতাঃ কষাযা রক্তং সপিত্তং শমযন্ত্যুদীর্ণম্||৭৮||

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मुद्गाः सलाजाः सयवाः सकृष्णाः सोशीरमुस्ताः सह चन्दनेन| बलाजले पर्युषिताः कषाया रक्तं सपित्तं शमयन्त्युदीर्णम्||७८||

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Adhikarana 23 (79-81) · Śloka 81

বৈদূর্যমুক্তামণিগৈরিকাণাং মৃচ্ছঙ্খহেমামলকোদকানাম্| মধূদকস্যেক্ষুরসস্য চৈব পানাচ্ছমং গচ্ছতি রক্তপিত্তম্||৭৯|| উশীরপদ্মোত্পলচন্দনানাং পক্বস্য লোষ্টস্য চ যঃ প্রসাদঃ| সশর্করঃ ক্ষৌদ্রযুতঃ সুশীতো রক্তাতিযোগপ্রশমায দেযঃ||৮০|| প্রিযঙ্গুকাচন্দনলোধ্রসারিবামধূকমুস্তাভযধাতকীজলম্| সমৃত্প্রসাদং সহ যষ্টিকাম্বুনা সশর্করং রক্তনিবর্হণং পরম্||৮১||

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वैदूर्यमुक्तामणिगैरिकाणां मृच्छङ्खहेमामलकोदकानाम्| मधूदकस्येक्षुरसस्य चैव पानाच्छमं गच्छति रक्तपित्तम्||७९|| उशीरपद्मोत्पलचन्दनानां पक्वस्य लोष्टस्य च यः प्रसादः| सशर्करः क्षौद्रयुतः सुशीतो रक्तातियोगप्रशमाय देयः||८०|| प्रियङ्गुकाचन्दनलोध्रसारिवामधूकमुस्ताभयधातकीजलम्| समृत्प्रसादं सह यष्टिकाम्बुना सशर्करं रक्तनिबर्हणं परम्||८१||

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Adhikarana 24 (72-84) · Śloka 84

কষাযযোগৈর্বিবিধৈর্যথোক্তৈর্দীপ্তেঽনলে শ্লেষ্মণি নির্জিতে চ| যদ্রক্তপিত্তং প্রশমং ন যাতি তত্রানিলঃ স্যাদনু তত্র কার্যম্||৮২|| ছাগং পযঃ স্যাত্ পরমং প্রযোগে গব্যং শৃতং পঞ্চগুণে জলে বা| সশর্করং মাক্ষিকসম্প্রযুক্তং বিদারিগন্ধাদিগণৈঃ শৃতং বা||৮৩|| দ্রাক্ষাশৃতং নাগরকৈঃ শৃতং বা বলাশৃতং গোক্ষুরকৈঃ শৃতং বা| সজীবকং সর্ষভকং সসর্পিঃ পযঃ প্রযোজ্যং সিতযা শৃতং বা||৮৪||

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कषाययोगैर्विविधैर्यथोक्तैर्दीप्तेऽनले श्लेष्मणि निर्जिते च| यद्रक्तपित्तं प्रशमं न याति तत्रानिलः स्यादनु तत्र कार्यम्||८२|| छागं पयः स्यात् परमं प्रयोगे गव्यं शृतं पञ्चगुणे जले वा| सशर्करं माक्षिकसम्प्रयुक्तं विदारिगन्धादिगणैः शृतं वा||८३|| द्राक्षाशृतं नागरकैः शृतं वा बलाशृतं गोक्षुरकैः शृतं वा| सजीवकं सर्षभकं ससर्पिः पयः प्रयोज्यं सितया शृतं वा||८४||

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Adhikarana 25 (85) · Śloka 85

শতাবরীগোক্ষুরকৈঃ শৃতং বা শৃতং পযো বাঽপ্যথ পর্ণিনীভিঃ| রক্তং নিহন্ত্যাশু বিশেষতস্তু যন্মূত্রমার্গাত্ সরুজং প্রযাতি||৮৫||

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शतावरीगोक्षुरकैः शृतं वा शृतं पयो वाऽप्यथ पर्णिनीभिः| रक्तं निहन्त्याशु विशेषतस्तु यन्मूत्रमार्गात् सरुजं प्रयाति||८५||

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Adhikarana 26 (83-87) · Śloka 87

বিশেষতো বিট্পথসম্প্রবৃত্তে পযো মতং মোচরসেন সিদ্ধম্| বটাবরোহৈর্বটশুঙ্গকৈর্বা হ্রীবেরনীলোত্পলনাগরৈর্বা||৮৬|| কষাযযোগান্ পযসা পুরা বা পীত্বাঽনু চাদ্যাত্ পযসৈব শালীন্| কষাযযোগৈরথবা বিপক্বমেতৈঃ পিবেত্ সর্পিরতিস্রবে চ||৮৭||

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विशेषतो विट्पथसम्प्रवृत्ते पयो मतं मोचरसेन सिद्धम्| वटावरोहैर्वटशुङ्गकैर्वा ह्रीबेरनीलोत्पलनागरैर्वा||८६|| कषाययोगान् पयसा पुरा वा पीत्वाऽनु चाद्यात् पयसैव शालीन्| कषाययोगैरथवा विपक्वमेतैः पिबेत् सर्पिरतिस्रवे च||८७||

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Adhikarana 27 (88) · Śloka 88

বাসাং সশাখাং সপলাশমূলাং কৃত্বা কষাযং কুসুমানি চাস্যাঃ| প্রদায কল্কং বিপচেদ্ঘৃতং তত্ সক্ষৌদ্রমাশ্বেব নিহন্তি রক্তম্||৮৮|| ইতি বাসাঘৃতম্|

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वासां सशाखां सपलाशमूलां कृत्वा कषायं कुसुमानि चास्याः| प्रदाय कल्कं विपचेद्घृतं तत् सक्षौद्रमाश्वेव निहन्ति रक्तम्||८८|| इति वासाघृतम्|

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Adhikarana 28 (89-90) · Śloka 90

পলাশবৃন্তস্বরসেন সিদ্ধং তস্যৈব কল্কেন মধুদ্রবেণ| লিহ্যাদ্ঘৃতং বত্সককল্কসিদ্ধং তদ্বত্ সমঙ্গোত্পললোধ্রসিদ্ধম্||৮৯|| স্যাত্ত্রাযমাণাবিধিরেষ এব সোদুম্বরে চৈব পটোলপত্রে| সর্পীংষি পিত্তজ্বরনাশনানি সর্বাণি শস্তানি চ রক্তপিত্তে||৯০||

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पलाशवृन्तस्वरसेन सिद्धं तस्यैव कल्केन मधुद्रवेण| लिह्याद्घृतं वत्सककल्कसिद्धं तद्वत् समङ्गोत्पललोध्रसिद्धम्||८९|| स्यात्त्रायमाणाविधिरेष एव सोदुम्बरे चैव पटोलपत्रे| सर्पींषि पित्तज्वरनाशनानि सर्वाणि शस्तानि च रक्तपित्ते||९०||

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Adhikarana 29 (91-92) · Śloka 92

অভ্যঙ্গযোগাঃ পরিষেচনানি সেকাবগাহাঃ শযনানি বেশ্ম| শীতো বিধির্বস্তিবিধানমগ্র্যং পিত্তজ্বরে যত্ প্রশমায দিষ্টম্||৯১|| তদ্রক্তপিত্তে নিখিলেন কার্যং কালং চ মাত্রাং চ পুরা সমীক্ষ্য| সর্পির্গুডা যে চ হিতাঃ ক্ষতেভ্যস্তে রক্তপিত্তং শমযন্তি সদ্যঃ||৯২||

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अभ्यङ्गयोगाः परिषेचनानि सेकावगाहाः शयनानि वेश्म| शीतो विधिर्बस्तिविधानमग्र्यं पित्तज्वरे यत् प्रशमाय दिष्टम्||९१|| तद्रक्तपित्ते निखिलेन कार्यं कालं च मात्रां च पुरा समीक्ष्य| सर्पिर्गुडा ये च हिताः क्षतेभ्यस्ते रक्तपित्तं शमयन्ति सद्यः||९२||

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Adhikarana 30 (93-94) · Śloka 94

কফানুবন্ধে রুধিরে সপিত্তে কণ্ঠাগতে স্যাদ্গ্রথিতে প্রযোগঃ| যুক্তস্য যুক্ত্যা মধুসর্পিষোশ্চ ক্ষারস্য চৈবোত্পলনালজস্য||৯৩|| মৃণালপদ্মোত্পলকেশরাণাং তথা পলাশস্য তথা প্রিযঙ্গোঃ| তথা মধূকস্য তথাঽসনস্য ক্ষারাঃ প্রযোজ্যা বিধিনৈব তেন||৯৪||

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कफानुबन्धे रुधिरे सपित्ते कण्ठागते स्याद्ग्रथिते प्रयोगः| युक्तस्य युक्त्या मधुसर्पिषोश्च क्षारस्य चैवोत्पलनालजस्य||९३|| मृणालपद्मोत्पलकेशराणां तथा पलाशस्य तथा प्रियङ्गोः| तथा मधूकस्य तथाऽसनस्य क्षाराः प्रयोज्या विधिनैव तेन||९४||

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Adhikarana 31 (95-96) · Śloka 96

শতাবরীদাডিমতিন্তিডীকং কাকোলিমেদে মধুকং বিদারীম্| পিষ্ট্বা চ মূলং ফলপূরকস্য ঘৃতং পচেত্ ক্ষীরচতুর্গুণং জ্ঞঃ||৯৫|| কাসজ্বরানাহবিবন্ধশূলং তদ্রক্তপিত্তং চ ঘৃতং নিহন্যাত্| যত্ পঞ্চমূলৈরথ পঞ্চভির্বা সিদ্ধং ঘৃতং তচ্চ তদর্থকারি||৯৬|| ইতি শতাবর্যাদিঘৃতম্|

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शतावरीदाडिमतिन्तिडीकं काकोलिमेदे मधुकं विदारीम्| पिष्ट्वा च मूलं फलपूरकस्य घृतं पचेत् क्षीरचतुर्गुणं ज्ञः||९५|| कासज्वरानाहविबन्धशूलं तद्रक्तपित्तं च घृतं निहन्यात्| यत् पञ्चमूलैरथ पञ्चभिर्वा सिद्धं घृतं तच्च तदर्थकारि||९६|| इति शतावर्यादिघृतम्|

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Adhikarana 32 (97-101) · Śloka 101

কষাযযোগা য ইহোপদিষ্টাস্তে চাবপীডে ভিষজা প্রযোজ্যাঃ| ঘ্রাণাত্ প্রবৃত্তং রুধিরং সপিত্তং যদা ভবেন্নিঃসৃতদুষ্টদোষম্||৯৭|| রক্তে প্রদুষ্টে হ্যবপীডবন্ধে দুষ্টপ্রতিশ্যাযশিরোবিকারাঃ| রক্তং সপূযং কুণপশ্চ গন্ধঃ স্যাদ্ ঘ্রাণনাশঃ কৃমযশ্চ দুষ্টাঃ||৯৮|| নীলোত্পলং গৈরিকশঙ্খযুক্তং সচন্দনং স্যাত্তু সিতাজলেন| নস্যং তথাঽঽম্রাস্থিরসঃ সমঙ্গা সধাতকীমোচরসঃ সলোধ্রঃ||৯৯|| দ্রাক্ষারসস্যেক্ষুরসস্য নস্যং ক্ষীরস্য দূর্বাস্বরসস্য চৈব| যবাসমূলানি পলাণ্ডুমূলং নস্যং তথা দাডিমপুষ্পতোযম্||১০০|| প্রিযালতৈলং মধুকং পযশ্চ সিদ্ধং ঘৃতং মাহিষমাজিকং বা| আম্রাস্থিপূর্বৈঃ পযসা চ নস্যং সসারিবৈঃ স্যাত্ কমলোত্পলৈশ্চ||১০১||

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कषाययोगा य इहोपदिष्टास्ते चावपीडे भिषजा प्रयोज्याः| घ्राणात् प्रवृत्तं रुधिरं सपित्तं यदा भवेन्निःसृतदुष्टदोषम्||९७|| रक्ते प्रदुष्टे ह्यवपीडबन्धे दुष्टप्रतिश्यायशिरोविकाराः| रक्तं सपूयं कुणपश्च गन्धः स्याद् घ्राणनाशः कृमयश्च दुष्टाः||९८|| नीलोत्पलं गैरिकशङ्खयुक्तं सचन्दनं स्यात्तु सिताजलेन| नस्यं तथाऽऽम्रास्थिरसः समङ्गा सधातकीमोचरसः सलोध्रः||९९|| द्राक्षारसस्येक्षुरसस्य नस्यं क्षीरस्य दूर्वास्वरसस्य चैव| यवासमूलानि पलाण्डुमूलं नस्यं तथा दाडिमपुष्पतोयम्||१००|| प्रियालतैलं मधुकं पयश्च सिद्धं घृतं माहिषमाजिकं वा| आम्रास्थिपूर्वैः पयसा च नस्यं ससारिवैः स्यात् कमलोत्पलैश्च||१०१||

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Adhikarana 33 (102-109) · Śloka 109

ভদ্রশ্রিযং লোহিতচন্দনং চ প্রপৌণ্ডরীকং কমলোত্পলে চ| উশীরবানীরজলং মৃণালং সহস্রবীর্যা মধুকং পযস্যা||১০২|| শালীক্ষুমূলানি যবাসগুন্দ্রামূলং নলানাং কুশকাশযোশ্চ| কুচন্দনং শৈবলমপ্যনন্তা কালানুসার্যা তৃণমূলমৃদ্ধিঃ||১০৩|| মূলানি পুষ্পাণি চ বারিজানাং প্রলেপনং পুষ্করিণীমৃদশ্চ| উদুম্বরাশ্বত্থমধূকলোধ্রাঃ কষাযবৃক্ষাঃ শিশিরাশ্চ সর্বে||১০৪|| প্রদেহকল্পে পরিষেচনে চ তথাঽবগাহে ঘৃততৈলসিদ্ধৌ| রক্তস্য পিত্তস্য চ শান্তিমিচ্ছন্ ভদ্রশ্রিযাদীনি ভিষক্ প্রযুঞ্জ্যাত্||১০৫|| ধারাগৃহং ভূমিগৃহং সুশীতং বনং চ রম্যং জলবাতশীতম্| বৈদূর্যমুক্তামণিভাজনানাং স্পর্শাশ্চ দাহে শিশিরাম্বুশীতাঃ||১০৬|| পত্রাণি পুষ্পাণি চ বারিজানাং ক্ষৌমং চ শীতং কদলীদলানি| প্রচ্ছাদনার্থং শযনাসনানাং পদ্মোত্পলানাং চ দলাঃ প্রশস্তাঃ||১০৭|| প্রিযঙ্গুকাচন্দনরূষিতানাং স্পর্শাঃ প্রিযাণাং চ বরাঙ্গনানাম্| দাহে প্রশস্তাঃ সজলাঃ সুশীতাঃ পদ্মোত্পলানাং চ কলাপবাতাঃ||১০৮|| সরিদ্ধ্রদানাং হিমবদ্দরীণাং চন্দ্রোদযানাং কমলাকরাণাম্| মনোঽনুকূলাঃ শিশিরাশ্চ সর্বাঃ কথাঃ সরক্তং শমযন্তি পিত্তম্||১০৯||

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भद्रश्रियं लोहितचन्दनं च प्रपौण्डरीकं कमलोत्पले च| उशीरवानीरजलं मृणालं सहस्रवीर्या मधुकं पयस्या||१०२|| शालीक्षुमूलानि यवासगुन्द्रामूलं नलानां कुशकाशयोश्च| कुचन्दनं शैवलमप्यनन्ता कालानुसार्या तृणमूलमृद्धिः||१०३|| मूलानि पुष्पाणि च वारिजानां प्रलेपनं पुष्करिणीमृदश्च| उदुम्बराश्वत्थमधूकलोध्राः कषायवृक्षाः शिशिराश्च सर्वे||१०४|| प्रदेहकल्पे परिषेचने च तथाऽवगाहे घृततैलसिद्धौ| रक्तस्य पित्तस्य च शान्तिमिच्छन् भद्रश्रियादीनि भिषक् प्रयुञ्ज्यात्||१०५|| धारागृहं भूमिगृहं सुशीतं वनं च रम्यं जलवातशीतम्| वैदूर्यमुक्तामणिभाजनानां स्पर्शाश्च दाहे शिशिराम्बुशीताः||१०६|| पत्राणि पुष्पाणि च वारिजानां क्षौमं च शीतं कदलीदलानि| प्रच्छादनार्थं शयनासनानां पद्मोत्पलानां च दलाः प्रशस्ताः||१०७|| प्रियङ्गुकाचन्दनरूषितानां स्पर्शाः प्रियाणां च वराङ्गनानाम्| दाहे प्रशस्ताः सजलाः सुशीताः पद्मोत्पलानां च कलापवाताः||१०८|| सरिद्ध्रदानां हिमवद्दरीणां चन्द्रोदयानां कमलाकराणाम्| मनोऽनुकूलाः शिशिराश्च सर्वाः कथाः सरक्तं शमयन्ति पित्तम्||१०९||

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Adhikarana 34 (110-111) · Śloka 111

তত্র শ্লোকৌ- হেতুং বৃদ্ধিং সঞ্জ্ঞাং স্থানং লিঙ্গং পৃথক্ প্রদুষ্টস্য| মার্গৌ সাধ্যমসাধ্যং যাপ্যং কার্যক্রমং চৈব||১১০|| পানান্নমিষ্টমেব চ বর্জ্যং সংশোধনং চ শমনং চ| গুরুরুক্তবান্যথাবচ্চিকিত্সিতে রক্তপিত্তস্য||১১১||

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तत्र श्लोकौ- हेतुं वृद्धिं सञ्ज्ञां स्थानं लिङ्गं पृथक् प्रदुष्टस्य| मार्गौ साध्यमसाध्यं याप्यं कार्यक्रमं चैव||११०|| पानान्नमिष्टमेव च वर्ज्यं संशोधनं च शमनं च| गुरुरुक्तवान्यथावच्चिकित्सिते रक्तपित्तस्य||१११||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 4

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে চিকিত্সিতস্থানে রক্তপিত্তচিকিত্সিতং নাম চতুর্থোঽধ্যাযঃ||৪||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सितस्थाने रक्तपित्तचिकित्सितं नाम चतुर्थोऽध्यायः||४||

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10. raktapittacikitsitam — Charaka Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi