Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ পন্নরূপীযমিন্দ্রিযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातः पन्नरूपीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ পন্নরূপীযমিন্দ্রিযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातः पन्नरूपीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
দৃষ্ট্যাং যস্য বিজানীযাত্ পন্নরূপাং কুমারিকাম্| প্রতিচ্ছাযামযীমক্ষ্ণোর্নৈনমিচ্ছেচ্চিকিত্সিতুম্||৩||
दृष्ट्यां यस्य विजानीयात् पन्नरूपां कुमारिकाम्| प्रतिच्छायामयीमक्ष्णोर्नैनमिच्छेच्चिकित्सितुम्||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
জ্যোত্স্নাযামাতপে দীপে সলিলাদর্শযোরপি| অঙ্গেষু বিকৃতা যস্য চ্ছাযা প্রেতস্তথৈব সঃ||৪||
ज्योत्स्नायामातपे दीपे सलिलादर्शयोरपि| अङ्गेषु विकृता यस्य च्छाया प्रेतस्तथैव सः||४||
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Adhikarana 4 (5-6) · Śloka 6
ছিন্না ভিন্নাঽঽকুলা চ্ছাযা হীনা বাঽপ্যধিকাঽপি বা| নষ্টা তন্বী দ্বিধা চ্ছিন্না বিকৃতা বিশিরা চ যা||৫|| এতাশ্চান্যাশ্চ যাঃ কাশ্চিত্ প্রতিচ্ছাযা বিগর্হিতাঃ| সর্বা মুমূর্ষতাং জ্ঞেযা ন চেল্লক্ষ্যনিমিত্তজাঃ||৬||
छिन्ना भिन्नाऽऽकुला च्छाया हीना वाऽप्यधिकाऽपि वा| नष्टा तन्वी द्विधा च्छिन्ना विकृता विशिरा च या||५|| एताश्चान्याश्च याः काश्चित् प्रतिच्छाया विगर्हिताः| सर्वा मुमूर्षतां ज्ञेया न चेल्लक्ष्यनिमित्तजाः||६||
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Adhikarana 5 (7) · Śloka 7
সংস্থানেন প্রমাণেন বর্ণেন প্রভযা তথা| ছাযা বিবর্ততে যস্য স্বস্থোঽপি প্রেত এব সঃ||৭||
संस्थानेन प्रमाणेन वर्णेन प्रभया तथा| छाया विवर्तते यस्य स्वस्थोऽपि प्रेत एव सः||७||
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Adhikarana 6 (8-9) · Śloka 9
সংস্থানমাকৃতির্জ্ঞেযা সুষমা বিষমা চ সা| মধ্যমল্পং মহচ্চোক্তং প্রমাণং ত্রিবিধং নৃণাম্||৮|| প্রতিপ্রমাণসংস্থানা জলাদর্শাতপাদিষু| ছাযা যা সা প্রতিচ্ছাযা চ্ছাযা বর্ণপ্রভাশ্রযা||৯||
संस्थानमाकृतिर्ज्ञेया सुषमा विषमा च सा| मध्यमल्पं महच्चोक्तं प्रमाणं त्रिविधं नृणाम्||८|| प्रतिप्रमाणसंस्थाना जलादर्शातपादिषु| छाया या सा प्रतिच्छाया च्छाया वर्णप्रभाश्रया||९||
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Adhikarana 7 (10-13) · Śloka 13
খাদীনাং পঞ্চ পঞ্চানাং ছাযা বিবিধলক্ষণাঃ| নাভসী নির্মলা নীলা সস্নেহা সপ্রভেব চ||১০|| রূক্ষা শ্যাবারুণা যা তু বাযবী সা হতপ্রভা| বিশুদ্ধরক্তা ত্বাগ্নেযী দীপ্তাভা দর্শনপ্রিযা||১১|| শুদ্ধবৈদূর্যবিমলা সুস্নিগ্ধা চাম্ভসী মতা| স্থিরা স্নিগ্ধা ঘনা শ্লক্ষ্ণা শ্যামা শ্বেতা চ পার্থিবী||১২|| বাযবী গর্হিতা ত্বাসাং চতস্রঃ স্যুঃ সুখোদযাঃ | বাযবী তু বিনাশায ক্লেশায মহতেঽপি বা||১৩||
खादीनां पञ्च पञ्चानां छाया विविधलक्षणाः| नाभसी निर्मला नीला सस्नेहा सप्रभेव च||१०|| रूक्षा श्यावारुणा या तु वायवी सा हतप्रभा| विशुद्धरक्ता त्वाग्नेयी दीप्ताभा दर्शनप्रिया||११|| शुद्धवैदूर्यविमला सुस्निग्धा चाम्भसी मता| स्थिरा स्निग्धा घना श्लक्ष्णा श्यामा श्वेता च पार्थिवी||१२|| वायवी गर्हिता त्वासां चतस्रः स्युः सुखोदयाः | वायवी तु विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा||१३||
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Adhikarana 8 (14-15) · Śloka 15
স্যাত্তৈজসী প্রভা সর্বা সা তু সপ্তবিধা স্মৃতা| রক্তা পীতা সিতা শ্যাবা হরিতা পাণ্ডুরাঽসিতা||১৪|| তাসাং যাঃ স্যুর্বিকাসিন্যঃ স্নিগ্ধাশ্চ বিপুলাশ্চ যাঃ| তাঃ শুভা রূক্ষমলিনাঃ সঙ্ক্ষিপ্তাশ্চাশুভোদযাঃ ||১৫||
स्यात्तैजसी प्रभा सर्वा सा तु सप्तविधा स्मृता| रक्ता पीता सिता श्यावा हरिता पाण्डुराऽसिता||१४|| तासां याः स्युर्विकासिन्यः स्निग्धाश्च विपुलाश्च याः| ताः शुभा रूक्षमलिनाः सङ्क्षिप्ताश्चाशुभोदयाः ||१५||
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Adhikarana 9 (16-17) · Śloka 17
বর্ণমাক্রামতি চ্ছাযা ভাস্তু বর্ণপ্রকাশিনী| আসন্না লক্ষ্যতে চ্ছাযা ভাঃ প্রকৃষ্টা প্রকাশতে||১৬|| নাচ্ছাযো নাপ্রভঃ কশ্চিদ্বিশেষাশ্চিহ্নযন্তি তু| নৃণাং শুভাশুভোত্পত্তিং কালে ছাযাপ্রভাশ্রযাঃ||১৭||
वर्णमाक्रामति च्छाया भास्तु वर्णप्रकाशिनी| आसन्ना लक्ष्यते च्छाया भाः प्रकृष्टा प्रकाशते||१६|| नाच्छायो नाप्रभः कश्चिद्विशेषाश्चिह्नयन्ति तु| नृणां शुभाशुभोत्पत्तिं काले छायाप्रभाश्रयाः||१७||
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Adhikarana 10 (18-20) · Śloka 20
কামলাঽক্ষ্ণোর্মুখং পূর্ণং শঙ্খযোর্মুক্তমাংসতা| সন্ত্রাসশ্চোষ্ণগাত্রত্বং যস্য তং পরিবর্জযেত্||১৮|| উত্থাপ্যমানঃ শযনাত্ প্রমোহং যাতি যো নরঃ| মুহুর্মুহুর্ন সপ্তাহং স জীবতি বিকত্থনঃ ||১৯|| সংসৃষ্টা ব্যাধযো যস্য প্রতিলোমানুলোমগাঃ| ব্যাপন্না গ্রহণী প্রাযঃ সোঽর্ধমাসং ন জীবতি||২০||
कामलाऽक्ष्णोर्मुखं पूर्णं शङ्खयोर्मुक्तमांसता| सन्त्रासश्चोष्णगात्रत्वं यस्य तं परिवर्जयेत्||१८|| उत्थाप्यमानः शयनात् प्रमोहं याति यो नरः| मुहुर्मुहुर्न सप्ताहं स जीवति विकत्थनः ||१९|| संसृष्टा व्याधयो यस्य प्रतिलोमानुलोमगाः| व्यापन्ना ग्रहणी प्रायः सोऽर्धमासं न जीवति||२०||
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Adhikarana 11 (21-26) · Śloka 26
উপরুদ্ধস্য রোগেণ কর্শিতস্যাল্পমশ্নতঃ| বহু মূত্রপুরীষং স্যাদ্যস্য তং পরিবর্জযেত্||২১|| দুর্বলো বহু ভুঙ্ক্তে যঃ প্রাগ্ভুক্তাদন্নমাতুরঃ | অল্পমূত্রপুরীষশ্চ যথা প্রেতস্তথৈব সঃ||২২|| ইষ্টং চ গুণসম্পন্নমন্নমশ্নাতি যো নরঃ| শশ্বচ্চ বলবর্ণাভ্যাং হীযতে ন স জীবতি||২৩|| প্রকূজতি প্রশ্বসিতি শিথিলং চাতিসার্যতে| বলহীনঃ পিপাসার্তঃ শুষ্কাস্যো ন স জীবতি||২৪|| হ্রস্বং চ যঃ প্রশ্বসিতি ব্যাবিদ্ধং স্পন্দতে চ যঃ| মৃতমেব তমাত্রেযো ব্যাচচক্ষে পুনর্বসুঃ||২৫|| ঊর্ধ্বং চ যঃ প্রশ্বসিতি শ্লেষ্মণা চাভিভূযতে| হীনবর্ণবলাহারো যো নরো ন স জীবতি||২৬||
उपरुद्धस्य रोगेण कर्शितस्याल्पमश्नतः| बहु मूत्रपुरीषं स्याद्यस्य तं परिवर्जयेत्||२१|| दुर्बलो बहु भुङ्क्ते यः प्राग्भुक्तादन्नमातुरः | अल्पमूत्रपुरीषश्च यथा प्रेतस्तथैव सः||२२|| इष्टं च गुणसम्पन्नमन्नमश्नाति यो नरः| शश्वच्च बलवर्णाभ्यां हीयते न स जीवति||२३|| प्रकूजति प्रश्वसिति शिथिलं चातिसार्यते| बलहीनः पिपासार्तः शुष्कास्यो न स जीवति||२४|| ह्रस्वं च यः प्रश्वसिति व्याविद्धं स्पन्दते च यः| मृतमेव तमात्रेयो व्याचचक्षे पुनर्वसुः||२५|| ऊर्ध्वं च यः प्रश्वसिति श्लेष्मणा चाभिभूयते| हीनवर्णबलाहारो यो नरो न स जीवति||२६||
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Adhikarana 12 (27-32) · Śloka 32
ঊর্ধ্বাগ্রে নযনে যস্য মন্যে চারতকম্পনে| বলহীনঃ পিপাসার্তঃ শুষ্কাস্যো ন স জীবতি||২৭|| যস্য গণ্ডাবুপচিতৌ জ্বরকাসৌ চ দারুণৌ| শূলী প্রদ্বেষ্টি চাপ্যন্নং তস্মিন্ কর্ম ন সিধ্যতি||২৮|| ব্যাবৃত্তমূর্ধজিহ্বাস্যো ভ্রুবৌ যস্য চ বিচ্যুতে| কণ্টকৈশ্চাচিতা জিহ্বা যথা প্রেতস্তথৈব সঃ||২৯|| শেফশ্চাত্যর্থমুত্সিক্তং নিঃসৃতৌ বৃষণৌ ভৃশম্| অতশ্চৈব বিপর্যাসো বিকৃত্যা প্রেতলক্ষণম্||৩০|| নিচিতং যস্য মাংসং স্যাত্ত্বগস্থিষ্বেব দৃশ্যতে| ক্ষীণস্যানশ্নতস্তস্য মাসমাযুঃ পরং ভবেত্||৩১|| তত্র শ্লোকঃ- ইদং লিঙ্গমরিষ্টাখ্যমনেকমভিজজ্ঞিবান্| আযুর্বেদবিদিত্যাখ্যাং লভতে কুশলো জনঃ||৩২||
ऊर्ध्वाग्रे नयने यस्य मन्ये चारतकम्पने| बलहीनः पिपासार्तः शुष्कास्यो न स जीवति||२७|| यस्य गण्डावुपचितौ ज्वरकासौ च दारुणौ| शूली प्रद्वेष्टि चाप्यन्नं तस्मिन् कर्म न सिध्यति||२८|| व्यावृत्तमूर्धजिह्वास्यो भ्रुवौ यस्य च विच्युते| कण्टकैश्चाचिता जिह्वा यथा प्रेतस्तथैव सः||२९|| शेफश्चात्यर्थमुत्सिक्तं निःसृतौ वृषणौ भृशम्| अतश्चैव विपर्यासो विकृत्या प्रेतलक्षणम्||३०|| निचितं यस्य मांसं स्यात्त्वगस्थिष्वेव दृश्यते| क्षीणस्यानश्नतस्तस्य मासमायुः परं भवेत्||३१|| तत्र श्लोकः- इदं लिङ्गमरिष्टाख्यमनेकमभिजज्ञिवान्| आयुर्वेदविदित्याख्यां लभते कुशलो जनः||३२||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 7
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে ইন্দ্রিযস্থানে পন্নরূপীযমিন্দ্রিযং নাম সপ্তমোঽধ্যাযঃ||৭||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने पन्नरूपीयमिन्द्रियं नाम सप्तमोऽध्यायः||७||
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