Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 3
অথাতঃ পুষ্পিতকমিন্দ্রিযং ব্যাখ্যাস্যামহ||১||
ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
পুষ্পং যথা পূর্বরূপং ফলস্যেহ ভবিষ্যতঃ|
তথা লিঙ্গমরিষ্টাখ্যং পূর্বরূপং মরিষ্যতঃ||৩||
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अथातः पुष्पितकमिन्द्रियं व्याख्यास्यामह||१||
इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
पुष्पं यथा पूर्वरूपं फलस्येह भविष्यतः|
तथा लिङ्गमरिष्टाख्यं पूर्वरूपं मरिष्यतः||३||
Adhikarana 2 (4-5) · Śloka 5
অপ্যেবং তু ভবেত্ পুষ্পং ফলেনাননুবন্ধি যত্|
ফলং চাপি ভবেত্ কিঞ্চিদ্যস্য পুষ্পং ন পূর্বজম্ ||৪||
ন ত্বরিষ্টস্য জাতস্য নাশোঽস্তি মরণাদৃতে|
মরণং চাপি তন্নাস্তি যন্নারিষ্টপুরঃসরম্||৫||
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अप्येवं तु भवेत् पुष्पं फलेनाननुबन्धि यत्|
फलं चापि भवेत् किञ्चिद्यस्य पुष्पं न पूर्वजम् ||४||
न त्वरिष्टस्य जातस्य नाशोऽस्ति मरणादृते|
मरणं चापि तन्नास्ति यन्नारिष्टपुरःसरम्||५||
Adhikarana 3 (6) · Śloka 6
মিথ্যাদৃষ্টমরিষ্টাভমনরিষ্টমজানতা|
অরিষ্টং বাঽপ্যসম্বুদ্ধমেতত্ প্রজ্ঞাপরাধজম্||৬||
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मिथ्यादृष्टमरिष्टाभमनरिष्टमजानता|
अरिष्टं वाऽप्यसम्बुद्धमेतत् प्रज्ञापराधजम्||६||
Adhikarana 4 (7) · Śloka 7
জ্ঞানসম্বোধনার্থং তু লিঙ্গৈর্মরণপূর্বজৈঃ|
পুষ্পিতানুপদেক্ষ্যামো নরান্ বহুবিধৈর্বহূন্ ||৭||
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ज्ञानसम्बोधनार्थं तु लिङ्गैर्मरणपूर्वजैः|
पुष्पितानुपदेक्ष्यामो नरान् बहुविधैर्बहून् ||७||
Adhikarana 5 (8-16) · Śloka 17
নানাপুষ্পোপমো গন্ধো যস্য ভাতি দিবানিশম্|
পুষ্পিতস্য বনস্যেব নানাদ্রুমলতাবতঃ||৮||
তমাহুঃ পুষ্পিতং ধীরা নরং মরণলক্ষণৈঃ|
স না সংবত্সরাদ্দেহং জহাতীতি বিনিশ্চযঃ||৯||
এবমেকৈকশঃ পুষ্পৈর্যস্য গন্ধঃ সমো ভবেত্|
ইষ্টৈর্বা যদি বাঽনিষ্টৈঃ স চ পুষ্পিত উচ্যতে||১০||
সমাসেনাশুভান্ গন্ধানেকত্বেনাথবা পুনঃ|
আজিঘ্রেদ্যস্য গাত্রেষু তং বিদ্যাত্ পুষ্পিতং ভিষক্||১১||
আপ্লুতানাপ্লুতে কাযে যস্য গন্ধাঃ শুভাশুভাঃ|
ব্যত্যাসেনানিমিত্তাঃ স্যুঃ স চ পুষ্পিত উচ্যতে||১২||
তদ্যথা- চন্দনং কুষ্ঠং তগরাগুরুণী মধু|
মাল্যং মূত্রপুরীষে চ মৃতানি কুণপানি চ||১৩||
যে চান্যে বিবিধাত্মানো গন্ধা বিবিধযোনযঃ|
তেঽপ্যনেনানুমানেন বিজ্ঞেযা বিকৃতিং গতাঃ||১৪||
ইদং চাপ্যতিদেশার্থং লক্ষণং গন্ধসংশ্রযম্|
বক্ষ্যামো যদভিজ্ঞায ভিষঙ্মরণমাদিশেত্||১৫||
বিযোনির্বিদুরো গন্ধো যস্য গাত্রেষু জাযতে|
ইষ্টো বা যদি বাঽনিষ্টো ন স জীবতি তাং সমাম্||১৬||
এতাবদ্গন্ধবিজ্ঞানং,...|১৭|
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नानापुष्पोपमो गन्धो यस्य भाति दिवानिशम्|
पुष्पितस्य वनस्येव नानाद्रुमलतावतः||८||
तमाहुः पुष्पितं धीरा नरं मरणलक्षणैः|
स ना संवत्सराद्देहं जहातीति विनिश्चयः||९||
एवमेकैकशः पुष्पैर्यस्य गन्धः समो भवेत्|
इष्टैर्वा यदि वाऽनिष्टैः स च पुष्पित उच्यते||१०||
समासेनाशुभान् गन्धानेकत्वेनाथवा पुनः|
आजिघ्रेद्यस्य गात्रेषु तं विद्यात् पुष्पितं भिषक्||११||
आप्लुतानाप्लुते काये यस्य गन्धाः शुभाशुभाः|
व्यत्यासेनानिमित्ताः स्युः स च पुष्पित उच्यते||१२||
तद्यथा- चन्दनं कुष्ठं तगरागुरुणी मधु|
माल्यं मूत्रपुरीषे च मृतानि कुणपानि च||१३||
ये चान्ये विविधात्मानो गन्धा विविधयोनयः|
तेऽप्यनेनानुमानेन विज्ञेया विकृतिं गताः||१४||
इदं चाप्यतिदेशार्थं लक्षणं गन्धसंश्रयम्|
वक्ष्यामो यदभिज्ञाय भिषङ्मरणमादिशेत्||१५||
वियोनिर्विदुरो गन्धो यस्य गात्रेषु जायते|
इष्टो वा यदि वाऽनिष्टो न स जीवति तां समाम्||१६||
एतावद्गन्धविज्ञानं,...|१७|
Adhikarana 6 (17-22) · Śloka 22
...রসজ্ঞানমতঃ পরম্|
আতুরাণাং শরীরেষু বক্ষ্যতে বিধিপূর্বকম্||১৭||
যো রসঃ প্রকৃতিস্থানাং নরাণাং দেহসম্ভবঃ|
স এষাং চরমে কালে বিকারং ভজতে দ্বযম্||১৮||
কশ্চিদেবাস্যবৈরস্যমত্যর্থমুপপদ্যতে|
স্বাদুত্বমপরশ্চাপি বিপুলং ভজতে রসঃ||১৯||
তমনেনানুমানেন বিদ্যাদ্বিকৃতিমাগতম্|
মনুষ্যো হি মনুষ্যস্য কথং রসমবাপ্নুযাত্||২০||
মক্ষিকাশ্চৈব যূকাশ্চ দংশাশ্চ মশকৈঃ সহ|
বিরসাদপসর্পন্তি জন্তোঃ কাযান্মুমূর্ষতঃ||২১||
অত্যর্থরসিকং কাযং কালপক্বস্য মক্ষিকাঃ|
অপি স্নাতানুলিপ্তস্য ভৃশমাযান্তি সর্বশঃ||২২||
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...रसज्ञानमतः परम्|
आतुराणां शरीरेषु वक्ष्यते विधिपूर्वकम्||१७||
यो रसः प्रकृतिस्थानां नराणां देहसम्भवः|
स एषां चरमे काले विकारं भजते द्वयम्||१८||
कश्चिदेवास्यवैरस्यमत्यर्थमुपपद्यते|
स्वादुत्वमपरश्चापि विपुलं भजते रसः||१९||
तमनेनानुमानेन विद्याद्विकृतिमागतम्|
मनुष्यो हि मनुष्यस्य कथं रसमवाप्नुयात्||२०||
मक्षिकाश्चैव यूकाश्च दंशाश्च मशकैः सह|
विरसादपसर्पन्ति जन्तोः कायान्मुमूर्षतः||२१||
अत्यर्थरसिकं कायं कालपक्वस्य मक्षिकाः|
अपि स्नातानुलिप्तस्य भृशमायान्ति सर्वशः||२२||
Adhikarana 7 (23) · Śloka 23
তত্র শ্লোকঃ- সামান্যেন মযোক্তানি লিঙ্গানি রসগন্ধযোঃ|
পুষ্পিতস্য নরস্যৈতত্ফলং মরণমাদিশেত্||২৩||
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तत्र श्लोकः- सामान्येन मयोक्तानि लिङ्गानि रसगन्धयोः|
पुष्पितस्य नरस्यैतत्फलं मरणमादिशेत्||२३||
Adhikarana puShpikA · Śloka 2
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে ইন্দ্রিযস্থানে পুষ্পিতকমিন্দ্রিযং নাম দ্বিতীযোঽধ্যাযঃ||২||
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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने पुष्पितकमिन्द्रियं नाम द्वितीयोऽध्यायः||२||