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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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1. varṇasvarīyamindriyam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো বর্ণস্বরীযমিন্দ্রিযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातो वर्णस्वरीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

ইহ খলু বর্ণশ্চ স্বরশ্চ গন্ধশ্চ রসশ্চ স্পর্শশ্চ চক্ষুশ্চ শ্রোত্রং চ ঘ্রাণং চ রসনং চ স্পর্শনং চ সত্ত্বং চ ভক্তিশ্চ শৌচং চ শীলং চাচারশ্চ স্মৃতিশ্চাকৃতিশ্চ প্রকৃতিশ্চ বিকৃতিশ্চ বলং চ গ্লানিশ্চ মেধা চ হর্ষশ্চ রৌক্ষ্যং চ স্নেহশ্চ তন্দ্রা চারম্ভশ্চ গৌরবং চ লাঘবং চ গুণাশ্চাহারশ্চ বিহারশ্চাহারপরিণামশ্চোপাযশ্চাপাযশ্চ ব্যাধিশ্চ ব্যাধিপূর্বরূপং চ বেদনাশ্চোপদ্রবাশ্চ চ্ছাযা চ প্রতিচ্ছাযা চ স্বপ্নদর্শনং চ দূতাধিকারশ্চ পথি চৌত্পাতিকং চাতুরকুলে ভাবাবস্থান্তরাণি চ ভেষজসংবৃত্তিশ্চ ভেষজবিকারযুক্তিশ্চেতি পরীক্ষ্যাণি প্রত্যক্ষানুমানোপদেশৈরাযুষঃ প্রমাণাবশেষং জিজ্ঞাসমানেন ভিষজা||৩||

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इह खलु वर्णश्च स्वरश्च गन्धश्च रसश्च स्पर्शश्च चक्षुश्च श्रोत्रं च घ्राणं च रसनं च स्पर्शनं च सत्त्वं च भक्तिश्च शौचं च शीलं चाचारश्च स्मृतिश्चाकृतिश्च प्रकृतिश्च विकृतिश्च बलं च ग्लानिश्च मेधा च हर्षश्च रौक्ष्यं च स्नेहश्च तन्द्रा चारम्भश्च गौरवं च लाघवं च गुणाश्चाहारश्च विहारश्चाहारपरिणामश्चोपायश्चापायश्च व्याधिश्च व्याधिपूर्वरूपं च वेदनाश्चोपद्रवाश्च च्छाया च प्रतिच्छाया च स्वप्नदर्शनं च दूताधिकारश्च पथि चौत्पातिकं चातुरकुले भावावस्थान्तराणि च भेषजसंवृत्तिश्च भेषजविकारयुक्तिश्चेति परीक्ष्याणि प्रत्यक्षानुमानोपदेशैरायुषः प्रमाणावशेषं जिज्ञासमानेन भिषजा||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

তত্র তু খল্বেষাং পরীক্ষ্যাণাং কানিচিত্ পুরুষমনাশ্রিতানি, কানিচিচ্চ পুরুষসংশ্রযাণি| তত্র যানি পুরুষমনাশ্রিতানি তান্যুপদেশতো যুক্তিতশ্চ পরীক্ষেত, পুরুষসংশ্রযাণি পুনঃ প্রকৃতিতো বিকৃতিতশ্চ||৪||

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तत्र तु खल्वेषां परीक्ष्याणां कानिचित् पुरुषमनाश्रितानि, कानिचिच्च पुरुषसंश्रयाणि| तत्र यानि पुरुषमनाश्रितानि तान्युपदेशतो युक्तितश्च परीक्षेत, पुरुषसंश्रयाणि पुनः प्रकृतितो विकृतितश्च||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

তত্র প্রকৃতির্জাতিপ্রসক্তা চ, কুলপ্রসক্তা চ, দেশানুপাতিনী চ, কালানুপাতিনী চ বযোঽনুপাতিনী চ, প্রত্যাত্মনিযতা চেতি| জাতিকুলদেশকালবযঃপ্রত্যাত্মনিযতা হি তেষাং তেষাং পুরুষাণাং তে তে ভাববিশেষা ভবন্তি||৫||

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तत्र प्रकृतिर्जातिप्रसक्ता च, कुलप्रसक्ता च, देशानुपातिनी च, कालानुपातिनी च वयोऽनुपातिनी च, प्रत्यात्मनियता चेति| जातिकुलदेशकालवयःप्रत्यात्मनियता हि तेषां तेषां पुरुषाणां ते ते भावविशेषा भवन्ति||५||

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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6

বিকৃতিঃ পুনর্লক্ষণনিমিত্তা চ, লক্ষ্যনিমিত্তা চ, নিমিত্তানুরূপা চ||৬||

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विकृतिः पुनर्लक्षणनिमित्ता च, लक्ष्यनिमित्ता च, निमित्तानुरूपा च||६||

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Adhikarana 6 (7(1)) · Śloka 7

তত্র লক্ষণনিমিত্তা নাম সা যস্যাঃ শরীরে লক্ষণান্যেব হেতুভূতানি ভবন্তি দৈবাত্; লক্ষণানি হি কানিচিচ্ছরীরোপনিবদ্ধানি ভবন্তি, যানি হি তস্মিংস্তস্মিন্ কালে তত্রাধিষ্ঠানমাসাদ্য তাং তাং বিকৃতিমুত্পাদযন্তি|৭|

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तत्र लक्षणनिमित्ता नाम सा यस्याः शरीरे लक्षणान्येव हेतुभूतानि भवन्ति दैवात्; लक्षणानि हि कानिचिच्छरीरोपनिबद्धानि भवन्ति, यानि हि तस्मिंस्तस्मिन् काले तत्राधिष्ठानमासाद्य तां तां विकृतिमुत्पादयन्ति|७|

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Adhikarana 7 (7(2)) · Śloka 7

লক্ষ্যনিমিত্তা তু সা যস্যা উপলভ্যতে নিমিত্তং যথোক্তং নিদানেষু|৭|

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लक्ष्यनिमित्ता तु सा यस्या उपलभ्यते निमित्तं यथोक्तं निदानेषु|७|

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Adhikarana 8 (7) · Śloka 7

নিমিত্তানুরূপা তু নিমিত্তার্থানুকারিণী যা, তামনিমিত্তাং নিমিত্তমাযুষঃ প্রমাণজ্ঞানস্যেচ্ছন্তি ভিষজো ভূযশ্চাযুষঃ ক্ষযনিমিত্তাং প্রেতেলিঙ্গানুরূপাং, যামাযুষোঽন্তর্গতস্য জ্ঞানার্থমুপদিশন্তি ধীরাঃ| যাং চাধিকৃত্য পুরুষসংশ্রযাণি মুমূর্ষতাং লক্ষণান্যুপদেক্ষ্যামঃ| ইত্যুদ্দেশঃ| তং বিস্তরেণানুব্যাখ্যাস্যামঃ||৭||

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निमित्तानुरूपा तु निमित्तार्थानुकारिणी या, तामनिमित्तां निमित्तमायुषः प्रमाणज्ञानस्येच्छन्ति भिषजो भूयश्चायुषः क्षयनिमित्तां प्रेतेलिङ्गानुरूपां, यामायुषोऽन्तर्गतस्य ज्ञानार्थमुपदिशन्ति धीराः| यां चाधिकृत्य पुरुषसंश्रयाणि मुमूर्षतां लक्षणान्युपदेक्ष्यामः| इत्युद्देशः| तं विस्तरेणानुव्याख्यास्यामः||७||

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Adhikarana 9 (8) · Śloka 8

তত্রাদিত এব বর্ণাধিকারঃ| তদ্যথা- কৃষ্ণঃ, শ্যামঃ , শ্যামাবদাতঃ, অবদাতশ্চেতি প্রকৃতিবর্ণাঃ শরীরস্য ভবন্তি; যাংশ্চাপরানুপেক্ষমাণো বিদ্যাদনূকতোঽন্যথা বাঽপি নির্দিশ্যমানাংস্তজ্জ্ঞৈঃ||৮||

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तत्रादित एव वर्णाधिकारः| तद्यथा- कृष्णः, श्यामः , श्यामावदातः, अवदातश्चेति प्रकृतिवर्णाः शरीरस्य भवन्ति; यांश्चापरानुपेक्षमाणो विद्यादनूकतोऽन्यथा वाऽपि निर्दिश्यमानांस्तज्ज्ञैः||८||

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Adhikarana 10 (9) · Śloka 9

নীলশ্যাবতাম্রহরিতশুক্লাশ্চ বর্ণাঃ শরীরস্য বৈকারিকা ভবন্তি; যাংশ্চাপরানুপেক্ষমাণো বিদ্যাত্ প্রাগ্বিকৃতানভূত্বোত্পন্নান্ | ইতি প্রকৃতিবিকৃতিবর্ণা ভবন্ত্যুক্তাঃ শরীরস্য| তত্র প্রকৃতিবর্ণমর্ধশরীরে বিকৃতিবর্ণমর্ধশরীরে, দ্বাবপি বর্ণৌ মর্যাদাবিভক্তৌ দৃষ্ট্বা; যদ্যেবং সব্যদক্ষিণবিভাগেন, যদ্যেবং পূর্বপশ্চিমবিভাগেন, যদ্যুত্তরাধরবিভাগেন, যদ্যন্তর্বহির্বিভাগেন, আতুরস্যারিষ্টমিতি বিদ্যাত্; এবমেব বর্ণভেদো মুখেঽপ্যন্যত্র বর্তমানো মরণায ভবতি||৯||

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नीलश्यावताम्रहरितशुक्लाश्च वर्णाः शरीरस्य वैकारिका भवन्ति; यांश्चापरानुपेक्षमाणो विद्यात् प्राग्विकृतानभूत्वोत्पन्नान् | इति प्रकृतिविकृतिवर्णा भवन्त्युक्ताः शरीरस्य| तत्र प्रकृतिवर्णमर्धशरीरे विकृतिवर्णमर्धशरीरे, द्वावपि वर्णौ मर्यादाविभक्तौ दृष्ट्वा; यद्येवं सव्यदक्षिणविभागेन, यद्येवं पूर्वपश्चिमविभागेन, यद्युत्तराधरविभागेन, यद्यन्तर्बहिर्विभागेन, आतुरस्यारिष्टमिति विद्यात्; एवमेव वर्णभेदो मुखेऽप्यन्यत्र वर्तमानो मरणाय भवति||९||

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Adhikarana 11 (10) · Śloka 10

বর্ণভেদেন গ্লানিহর্ষরৌক্ষ্যস্নেহা ব্যাখ্যাতাঃ||১০||

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वर्णभेदेन ग्लानिहर्षरौक्ष्यस्नेहा व्याख्याताः||१०||

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Adhikarana 12 (11) · Śloka 11

তথা পিপ্লুব্যঙ্গতিলকালকপিডকানামন্যতমস্যাননে জন্মাতুরস্যৈবমেবাপ্রশস্তং বিদ্যাত্||১১||

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तथा पिप्लुव्यङ्गतिलकालकपिडकानामन्यतमस्यानने जन्मातुरस्यैवमेवाप्रशस्तं विद्यात्||११||

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Adhikarana 13 (12) · Śloka 12

নখনযনবদনমূত্রপুরীষহস্তপাদৌষ্ঠাদিষ্বপি চ বৈকারিকোক্তানাং বর্ণানামন্যতমস্য প্রাদুর্ভাবো হীনবলবর্ণেন্দ্রিযেষু লক্ষণমাযুষঃ ক্ষযস্য ভবতি||১২||

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नखनयनवदनमूत्रपुरीषहस्तपादौष्ठादिष्वपि च वैकारिकोक्तानां वर्णानामन्यतमस्य प्रादुर्भावो हीनबलवर्णेन्द्रियेषु लक्षणमायुषः क्षयस्य भवति||१२||

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Adhikarana 14 (13) · Śloka 13

যচ্চান্যদপি কিঞ্চিদ্বর্ণবৈকৃতমভূতপূর্বং সহসোত্পদ্যেতানিমিত্তমেব হীযমানস্যাতুরস্য শশ্বত্, তদরিষ্টমিতি বিদ্যাত্| ইতি বর্ণাধিকারঃ||১৩||

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यच्चान्यदपि किञ्चिद्वर्णवैकृतमभूतपूर्वं सहसोत्पद्येतानिमित्तमेव हीयमानस्यातुरस्य शश्वत्, तदरिष्टमिति विद्यात्| इति वर्णाधिकारः||१३||

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Adhikarana 15 (14) · Śloka 14

স্বরাধিকারস্তু- হংসক্রৌঞ্চনেমিদুন্দুভিকলবিঙ্ককাককপোতজর্জরানুকারাঃ প্রকৃতিস্বরা ভবন্তি; যাংশ্চাপরানুপেক্ষমাণোঽপি বিদ্যাদনূকতোঽন্যথা বাঽপি নির্দিশ্যমানাংস্তজ্জ্ঞৈঃ| এডককলগ্রস্তাব্যক্তগদ্গদক্ষামদীনানুকীর্ণাস্ত্বাতুরাণাং স্বরা বৈকারিকা ভবন্তি; যাংশ্চাপরানুপেক্ষমাণোঽপি বিদ্যাত্ প্রাগ্বিকৃতানভূত্বোত্পন্নান্ | ইতি প্রকৃতিবিকৃতিস্বরা ব্যাখ্যাতা ভবন্তি||১৪||

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स्वराधिकारस्तु- हंसक्रौञ्चनेमिदुन्दुभिकलविङ्ककाककपोतजर्जरानुकाराः प्रकृतिस्वरा भवन्ति; यांश्चापरानुपेक्षमाणोऽपि विद्यादनूकतोऽन्यथा वाऽपि निर्दिश्यमानांस्तज्ज्ञैः| एडककलग्रस्ताव्यक्तगद्गदक्षामदीनानुकीर्णास्त्वातुराणां स्वरा वैकारिका भवन्ति; यांश्चापरानुपेक्षमाणोऽपि विद्यात् प्राग्विकृतानभूत्वोत्पन्नान् | इति प्रकृतिविकृतिस्वरा व्याख्याता भवन्ति||१४||

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Adhikarana 16 (15-16) · Śloka 16

তত্র প্রকৃতিবৈকারিকাণাং স্বরাণামাশ্বভিনির্বৃত্তিঃ স্বরানেকত্বমেকস্য চানেকত্বমপ্রশস্তম্| ইতি স্বরাধিকারঃ||১৫|| ইতি বর্ণস্বরাধিকারৌ যথাবদুক্তৌ মুমূর্ষতাং লক্ষণজ্ঞানার্থমিতি||১৬||

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तत्र प्रकृतिवैकारिकाणां स्वराणामाश्वभिनिर्वृत्तिः स्वरानेकत्वमेकस्य चानेकत्वमप्रशस्तम्| इति स्वराधिकारः||१५|| इति वर्णस्वराधिकारौ यथावदुक्तौ मुमूर्षतां लक्षणज्ञानार्थमिति||१६||

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Adhikarana 17 (17-26) · Śloka 26

ভবন্তি চাত্র- যস্য বৈকারিকো বর্ণঃ শরীর উপপদ্যতে| অর্ধে বা যদি বা কৃত্স্নে নিমিত্তং ন চ নাস্তি সঃ||১৭|| নীলং বা যদি বা শ্যাবং তাম্রং বা যদি বাঽরুণম্| মুখার্ধমন্যথা বর্ণো মুখার্ধেঽরিষ্টমুচ্যতে||১৮|| স্নেহো মুখার্ধে সুব্যক্তো রৌক্ষ্যমর্ধমুখে ভৃশম্| গ্লানিরর্ধে তথা হর্ষো মুখার্ধে প্রেতলক্ষণম্||১৯|| তিলকাঃ পিপ্লবো ব্যঙ্গা রাজযশ্চ পৃথগ্বিধাঃ| আতুরস্যাশু জাযন্তে মুখে প্রাণান্ মুমুক্ষতঃ||২০|| পুষ্পাণি নখদন্তেষু পঙ্কো বা দন্তসংশ্রিতঃ| চূর্ণকো বাঽপি দন্তেষু লক্ষণং মরণস্য তত্||২১|| ওষ্ঠযোঃ পাদযোঃ পাণ্যোরক্ষ্ণোর্মূত্রপুরীষযোঃ| নখেষ্বপি চ বৈবর্ণ্যমেতত্ ক্ষীণবলেঽন্তকৃত্||২২|| যস্য নীলাবুভাবোষ্ঠৌ পক্বজাম্ববসন্নিভৌ| মুমূর্ষুরিতি তং বিদ্যান্নরো ধীরো গতাযুষম্||২৩|| একো বা যদি বাঽনেকো যস্য বৈকারিকঃ স্বরঃ| সহসোত্পদ্যতে জন্তোর্হীযমানস্য নাস্তি সঃ||২৪|| যচ্চান্যদপি কিঞ্চিত্ স্যাদ্বৈকৃতং স্বরবর্ণযোঃ| বলমাংসবিহীনস্য তত্ সর্বং মরণোদযম্ ||২৫|| তত্র শ্লোকঃ- ইতি বর্ণস্বরাবুক্তৌ লক্ষণার্থং মুমূর্ষতাম্| যস্তৌ সম্যগ্বিজানাতি নাযুর্জ্ঞানে স মুহ্যতি||২৬||

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भवन्ति चात्र- यस्य वैकारिको वर्णः शरीर उपपद्यते| अर्धे वा यदि वा कृत्स्ने निमित्तं न च नास्ति सः||१७|| नीलं वा यदि वा श्यावं ताम्रं वा यदि वाऽरुणम्| मुखार्धमन्यथा वर्णो मुखार्धेऽरिष्टमुच्यते||१८|| स्नेहो मुखार्धे सुव्यक्तो रौक्ष्यमर्धमुखे भृशम्| ग्लानिरर्धे तथा हर्षो मुखार्धे प्रेतलक्षणम्||१९|| तिलकाः पिप्लवो व्यङ्गा राजयश्च पृथग्विधाः| आतुरस्याशु जायन्ते मुखे प्राणान् मुमुक्षतः||२०|| पुष्पाणि नखदन्तेषु पङ्को वा दन्तसंश्रितः| चूर्णको वाऽपि दन्तेषु लक्षणं मरणस्य तत्||२१|| ओष्ठयोः पादयोः पाण्योरक्ष्णोर्मूत्रपुरीषयोः| नखेष्वपि च वैवर्ण्यमेतत् क्षीणबलेऽन्तकृत्||२२|| यस्य नीलावुभावोष्ठौ पक्वजाम्बवसन्निभौ| मुमूर्षुरिति तं विद्यान्नरो धीरो गतायुषम्||२३|| एको वा यदि वाऽनेको यस्य वैकारिकः स्वरः| सहसोत्पद्यते जन्तोर्हीयमानस्य नास्ति सः||२४|| यच्चान्यदपि किञ्चित् स्याद्वैकृतं स्वरवर्णयोः| बलमांसविहीनस्य तत् सर्वं मरणोदयम् ||२५|| तत्र श्लोकः- इति वर्णस्वरावुक्तौ लक्षणार्थं मुमूर्षताम्| यस्तौ सम्यग्विजानाति नायुर्ज्ञाने स मुह्यति||२६||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 1

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে ইন্দ্রিযস্থানে বর্ণস্বরীযমিন্দ্রিযং নাম প্রথমোঽধ্যাযঃ||১||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने वर्णस्वरीयमिन्द्रियं नाम प्रथमोऽध्यायः||१||

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