Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 3
অথাতো গুল্মনিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১||
ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
ইহ খলু পঞ্চ গুল্মা ভবন্তি; তদ্যথা- বাতগুল্মঃ, পিত্তগুল্মঃ, শ্লেষ্মগুল্মো, নিচযগুল্মঃ, শোণিতগুল্ম ইতি||৩||
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अथातो गुल्मनिदानं व्याख्यास्यामः||१||
इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
इह खलु पञ्च गुल्मा भवन्ति; तद्यथा- वातगुल्मः, पित्तगुल्मः, श्लेष्मगुल्मो, निचयगुल्मः, शोणितगुल्म इति||३||
Adhikarana 2 (4-5) · Śloka 5
এবংবাদিনং ভগবন্তমাত্রেযমগ্নিবেশ উবাচ- কথমিহ ভগবন্ পঞ্চানাং গুল্মানাং বিশেষমভিজানীমহে; নহ্যবিশেষবিদ্রোগাণামৌষধবিদপি ভিষক্ প্রশমনসমর্থো ভবতীতি||৪||
তমুবাচ ভগবানাত্রেযঃ- সমুত্থানপূর্বরূপলিঙ্গবেদনোপশযবিশেষেভ্যো বিশেষবিজ্ঞানং গুল্মানাং ভবত্যন্যেষাং চ রোগাণামগ্নিবেশ! তত্তু খলু গুল্মেষূচ্যমানং নিবোধ||৫||
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एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच- कथमिह भगवन् पञ्चानां गुल्मानां विशेषमभिजानीमहे; नह्यविशेषविद्रोगाणामौषधविदपि भिषक् प्रशमनसमर्थो भवतीति||४||
तमुवाच भगवानात्रेयः- समुत्थानपूर्वरूपलिङ्गवेदनोपशयविशेषेभ्यो विशेषविज्ञानं गुल्मानां भवत्यन्येषां च रोगाणामग्निवेश! तत्तु खलु गुल्मेषूच्यमानं निबोध||५||
Adhikarana 3 (6) · Śloka 6
যদা পুরুষো বাতলো বিশেষেণ জ্বরবমনবিরেচনাতীসারাণামন্যতমেন কর্শনেন কর্শিতো বাতলমাহারমাহরতি, শীতং বা বিশেষেণাতিমাত্রম্ , অস্নেহপূর্বে বা বমনবিরেচনে পিবতি, অনুদীর্ণাং বা ছর্দিমুদীরযতি, উদীর্ণান্ বাতমূত্রপুরীষবেগান্নিরুণদ্ধি, অত্যশিতো বা পিবতি নবোদকমতিমাত্রম্, অতিসঙ্ক্ষোভিণা বা যানেন যাতি, অতিব্যবাযব্যাযামমদ্যশোকরুচির্বা, অভিঘাতমৃচ্ছতি বা, বিষমাসনশযনস্থানচঙ্ক্রমণসেবী বা ভবতি, অন্যদ্বা কিঞ্চিদেবংবিধং বিষমমতিমাত্রং ব্যাযামজাতমারভতে, তস্যাপচারাদ্বাতঃ প্রকোপমাপদ্যতে||৬||
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यदा पुरुषो वातलो विशेषेण ज्वरवमनविरेचनातीसाराणामन्यतमेन कर्शनेन कर्शितो वातलमाहारमाहरति, शीतं वा विशेषेणातिमात्रम् , अस्नेहपूर्वे वा वमनविरेचने पिबति, अनुदीर्णां वा छर्दिमुदीरयति, उदीर्णान् वातमूत्रपुरीषवेगान्निरुणद्धि, अत्यशितो वा पिबति नवोदकमतिमात्रम्, अतिसङ्क्षोभिणा वा यानेन याति, अतिव्यवायव्यायाममद्यशोकरुचिर्वा, अभिघातमृच्छति वा, विषमासनशयनस्थानचङ्क्रमणसेवी वा भवति, अन्यद्वा किञ्चिदेवंविधं विषममतिमात्रं व्यायामजातमारभते, तस्यापचाराद्वातः प्रकोपमापद्यते||६||
Adhikarana 4 (7) · Śloka 7
স প্রকুপিতো বাযুর্মহাস্রোতোঽনুপ্রবিশ্য রৌক্ষ্যাত্ কঠিনীভূতমাপ্লুত্য পিণ্ডিতোঽবস্থানং করোতি হৃদি বস্তৌ পার্শ্বযোর্নাভ্যাং বা; স শূলমুপজনযতি গ্রন্থীংশ্চানেকবিধান্, পিণ্ডিতশ্চাবতিষ্ঠতে, স পিণ্ডিতত্বাদ্ ‘গুল্ম’ ইত্যভিধীযতে; স মুহুরাধমতি , মুহুরল্পত্বমাপদ্যতে; অনিযতবিপুলাণুবেদনশ্চ ভবতি চলত্বাদ্বাযোঃ, মুহুঃ পিপীলিকাসম্প্রচার ইবাঙ্গেষু, তোদভেদস্ফুরণাযামসঙ্কোচসুপ্তিহর্ষপ্রলযোদযবহুলঃ; তদাতুরঃ সূচ্যেব শঙ্কুনেব চাভিসংবিদ্ধমাত্মানং মন্যতে, অপি চ দিবসান্তে জ্বর্যতে , শুষ্যতি চাস্যাস্যম্, উচ্ছ্বাসশ্চোপরুধ্যতে, হৃষ্যন্তি চাস্য রোমাণি বেদনাযাঃ প্রাদুর্ভাবে; প্লীহাটোপান্ত্রকূজনাবিপাকোদাবর্তাঙ্গমর্দমন্যাশিরঃশঙ্খশূলব্রধ্নরোগাশ্চৈনমুপদ্রবন্তি; কৃষ্ণারুণপরুষত্বঙ্নখনযনবদনমূত্রপুরীষশ্চ ভবতি, নিদানোক্তানি চাস্য নোপশেরতে, বিপরীতানি চোপশেরত ইতি বাতগুল্মঃ||৭||
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स प्रकुपितो वायुर्महास्रोतोऽनुप्रविश्य रौक्ष्यात् कठिनीभूतमाप्लुत्य पिण्डितोऽवस्थानं करोति हृदि बस्तौ पार्श्वयोर्नाभ्यां वा; स शूलमुपजनयति ग्रन्थींश्चानेकविधान्, पिण्डितश्चावतिष्ठते, स पिण्डितत्वाद् ‘गुल्म’ इत्यभिधीयते; स मुहुराधमति , मुहुरल्पत्वमापद्यते; अनियतविपुलाणुवेदनश्च भवति चलत्वाद्वायोः, मुहुः पिपीलिकासम्प्रचार इवाङ्गेषु, तोदभेदस्फुरणायामसङ्कोचसुप्तिहर्षप्रलयोदयबहुलः; तदातुरः सूच्येव शङ्कुनेव चाभिसंविद्धमात्मानं मन्यते, अपि च दिवसान्ते ज्वर्यते , शुष्यति चास्यास्यम्, उच्छ्वासश्चोपरुध्यते, हृष्यन्ति चास्य रोमाणि वेदनायाः प्रादुर्भावे; प्लीहाटोपान्त्रकूजनाविपाकोदावर्ताङ्गमर्दमन्याशिरःशङ्खशूलब्रध्नरोगाश्चैनमुपद्रवन्ति; कृष्णारुणपरुषत्वङ्नखनयनवदनमूत्रपुरीषश्च भवति, निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते, विपरीतानि चोपशेरत इति वातगुल्मः||७||
Adhikarana 5 (8-9) · Śloka 9
তৈরেব তু কর্শনৈঃ কর্শিতস্যাম্ললবণকটুকক্ষারোষ্ণতীক্ষ্ণশুক্তব্যাপন্নমদ্যহরিতকফলাম্লানাং বিদাহিনাং চ শাকধান্যমাংসাদীনামুপযোগাদজীর্ণাধ্যশনাদ্রৌক্ষ্যানুগতে চামাশযে বমনমতিবেলং সন্ধারণং বাতাতপৌ চাতিসেবমানস্য পিত্তং সহ মারুতেন প্রকোপমাপদ্যতে||৮||
তত্ প্রকুপিতং মারুত আমাশযৈকদেশে সংবর্ত্য তানেব বেদনাপ্রকারানুপজনযতি, য উক্তা বাতগুল্মে; পিত্তং ত্বেনং বিদহতি কুক্ষৌ হৃদ্যুরসি কণ্ঠে চ; স বিদহ্যমানঃ সধূমমিবোদ্গারমুদ্গিরত্যম্লান্বিতং, গুল্মাবকাশশ্চাস্য দহ্যতে দূযতে ধূপ্যতে ঊষ্মাযতে স্বিদ্যতি ক্লিদ্যতি শিথিল ইব স্পর্শাসহোঽল্পরোমাঞ্চশ্চ ভবতি; জ্বরভ্রমদবথুপিপাসাগলতালুমুখশোষপ্রমোহবিড্ভেদাশ্চৈনমুপদ্রবন্তি; হরিতহারিদ্রত্বঙ্নখনযনবদনমূত্রপুরীষশ্চ ভবতি; নিদানোক্তানি চাস্য নোপশেরতে, বিপরীতান্যুপশেরত ইতি পিত্তগুল্মঃ||৯||
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तैरेव तु कर्शनैः कर्शितस्याम्ललवणकटुकक्षारोष्णतीक्ष्णशुक्तव्यापन्नमद्यहरितकफलाम्लानां विदाहिनां च शाकधान्यमांसादीनामुपयोगादजीर्णाध्यशनाद्रौक्ष्यानुगते चामाशये वमनमतिवेलं सन्धारणं वातातपौ चातिसेवमानस्य पित्तं सह मारुतेन प्रकोपमापद्यते||८||
तत् प्रकुपितं मारुत आमाशयैकदेशे संवर्त्य तानेव वेदनाप्रकारानुपजनयति, य उक्ता वातगुल्मे; पित्तं त्वेनं विदहति कुक्षौ हृद्युरसि कण्ठे च; स विदह्यमानः सधूममिवोद्गारमुद्गिरत्यम्लान्वितं, गुल्मावकाशश्चास्य दह्यते दूयते धूप्यते ऊष्मायते स्विद्यति क्लिद्यति शिथिल इव स्पर्शासहोऽल्परोमाञ्चश्च भवति; ज्वरभ्रमदवथुपिपासागलतालुमुखशोषप्रमोहविड्भेदाश्चैनमुपद्रवन्ति; हरितहारिद्रत्वङ्नखनयनवदनमूत्रपुरीषश्च भवति; निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते, विपरीतान्युपशेरत इति पित्तगुल्मः||९||
Adhikarana 6 (10-11) · Śloka 11
তৈরেব তু কর্শনৈঃ কর্শিতস্যাত্যশনাদতিস্নিগ্ধগুরুমধুরশীতাশনাত্ পিষ্টেক্ষুক্ষীরতিলমাষগুডবিকৃতিসেবনান্মন্দকমদ্যাতিপানাদ্ধরিতকাতিপ্রণনযাদানূপৌদকগ্রাম্যমাংসাতিভক্ষণাত্ সন্ধারণাদবুভুক্ষস্য চাতিপ্রগাঢমুদপানাত্ সঙ্ক্ষোভণাদ্বা শরীরস্য শ্লেষ্মা সহ মারুতেন প্রকোপমাপদ্যতে||১০||
তং প্রকুপিতং মারুত আমাশযৈকদেশে সংবর্ত্য তানেব বেদনাপ্রকারানুপজনযতি য উক্তা বাতগুল্মে; শ্লেষ্মা ত্বস্য শীতজ্বরারোচকাবিপাকাঙ্গমর্দহর্ষহৃদ্রোগচ্ছর্দিনিদ্রালস্যস্তৈমিত্যগৌরবশিরোভিতাপানুপজনযতি, অপি চ গুল্মস্য স্থৈর্যগৌরবকাঠিন্যাবগাঢসুপ্ততাঃ, তথা কাসশ্বাসপ্রতিশ্যাযান্ রাজযক্ষ্মাণং চাতিপ্রবৃদ্ধঃ, শ্বৈত্যং ত্বঙ্নখনযনবদনমূত্রপুরীষেষূপজনযতি, নিদানোক্তানি চাস্য নোপশেরতে, বিপরীতানি চোপশেরত ইতি শ্লেষ্মগুল্মঃ||১১||
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तैरेव तु कर्शनैः कर्शितस्यात्यशनादतिस्निग्धगुरुमधुरशीताशनात् पिष्टेक्षुक्षीरतिलमाषगुडविकृतिसेवनान्मन्दकमद्यातिपानाद्धरितकातिप्रणनयादानूपौदकग्राम्यमांसातिभक्षणात् सन्धारणादबुभुक्षस्य चातिप्रगाढमुदपानात् सङ्क्षोभणाद्वा शरीरस्य श्लेष्मा सह मारुतेन प्रकोपमापद्यते||१०||
तं प्रकुपितं मारुत आमाशयैकदेशे संवर्त्य तानेव वेदनाप्रकारानुपजनयति य उक्ता वातगुल्मे; श्लेष्मा त्वस्य शीतज्वरारोचकाविपाकाङ्गमर्दहर्षहृद्रोगच्छर्दिनिद्रालस्यस्तैमित्यगौरवशिरोभितापानुपजनयति, अपि च गुल्मस्य स्थैर्यगौरवकाठिन्यावगाढसुप्तताः, तथा कासश्वासप्रतिश्यायान् राजयक्ष्माणं चातिप्रवृद्धः, श्वैत्यं त्वङ्नखनयनवदनमूत्रपुरीषेषूपजनयति, निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते, विपरीतानि चोपशेरत इति श्लेष्मगुल्मः||११||
Adhikarana 7 (12) · Śloka 12
ত্রিদোষহেতুলিঙ্গসন্নিপাতে তু সান্নিপাতিকং গুল্মমুপদিশন্তি কুশলাঃ|
স বিপ্রতিষিদ্ধোপক্রমত্বাদসাধ্যো নিচযগুল্মঃ||১২||
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त्रिदोषहेतुलिङ्गसन्निपाते तु सान्निपातिकं गुल्ममुपदिशन्ति कुशलाः|
स विप्रतिषिद्धोपक्रमत्वादसाध्यो निचयगुल्मः||१२||
Adhikarana 8 (13-14) · Śloka 14
শোণিতগুল্মস্তু খলু স্ত্রিযা এব ভবতি ন পুরুষস্য, গর্ভকোষ্ঠার্তবাগমনবৈশেষ্যাত্|
পারতন্ত্র্যাদবৈশারদ্যাত্ সততমুপচারানুরোধাদ্বা বেগানুদীর্ণানুপরুন্ধত্যা আমগর্ভে বাঽপ্যচিরপতিতেঽথবাঽপ্যচিরপ্রজাতাযা ঋতৌ বা বাতপ্রকোপণান্যাসেবমানাযাঃ ক্ষিপ্রং বাতঃ প্রকোপমাপদ্যতে||১৩||
স প্রকুপিতো যোনিমুখমনুপ্রবিশ্যার্তবমুপরুণদ্ধি, মাসি মাসি তদার্তবমুপরুধ্যমানং কুক্ষিমভিবর্ধযতি|
তস্যাঃ শূলকাসাতীসারচ্ছর্দ্যরোচকাবিপাকাঙ্গমর্দনিদ্রালস্যস্তৈমিত্যকফপ্রসেকাঃ সমুপজাযন্তে, স্তনযোশ্চ স্তন্যম্, ওষ্ঠযোঃ স্তনমণ্ডলযোশ্চ কার্ষ্ণ্যম্, অত্যর্থং গ্লানিশ্চক্ষুষোঃ, মূর্চ্ছা, হৃল্লাসঃ, দোহদঃ, শ্বযথুশ্চ পাদযোঃ, ঈষচ্চোদ্গমো রোমরাজ্যাঃ, যোন্যাশ্চাটালত্বম্, অপি চ যোন্যা দৌর্গন্ধ্যমাস্রাবশ্চোপজাযতে, কেবলশ্চাস্যা গুল্মঃ পিণ্ডিত এব স্পন্দতে, তামগর্ভাং গর্ভিণীমিত্যাহুর্মূঢাঃ||১৪||
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शोणितगुल्मस्तु खलु स्त्रिया एव भवति न पुरुषस्य, गर्भकोष्ठार्तवागमनवैशेष्यात्|
पारतन्त्र्यादवैशारद्यात् सततमुपचारानुरोधाद्वा वेगानुदीर्णानुपरुन्धत्या आमगर्भे वाऽप्यचिरपतितेऽथवाऽप्यचिरप्रजाताया ऋतौ वा वातप्रकोपणान्यासेवमानायाः क्षिप्रं वातः प्रकोपमापद्यते||१३||
स प्रकुपितो योनिमुखमनुप्रविश्यार्तवमुपरुणद्धि, मासि मासि तदार्तवमुपरुध्यमानं कुक्षिमभिवर्धयति|
तस्याः शूलकासातीसारच्छर्द्यरोचकाविपाकाङ्गमर्दनिद्रालस्यस्तैमित्यकफप्रसेकाः समुपजायन्ते, स्तनयोश्च स्तन्यम्, ओष्ठयोः स्तनमण्डलयोश्च कार्ष्ण्यम्, अत्यर्थं ग्लानिश्चक्षुषोः, मूर्च्छा, हृल्लासः, दोहदः, श्वयथुश्च पादयोः, ईषच्चोद्गमो रोमराज्याः, योन्याश्चाटालत्वम्, अपि च योन्या दौर्गन्ध्यमास्रावश्चोपजायते, केवलश्चास्या गुल्मः पिण्डित एव स्पन्दते, तामगर्भां गर्भिणीमित्याहुर्मूढाः||१४||
Adhikarana 9 (15) · Śloka 15
এষাং তু খলু পঞ্চানাং গুল্মানাং প্রাগভিনির্বৃত্তেরিমানি পূর্বরূপাণি ভবন্তি; তদ্যথা- অনন্নাভিলষণম্, অরোচকাবিপাকৌ, অগ্নিবৈষম্যং, বিদাহো ভুক্তস্য, পাককালে চাযুক্ত্যা ছর্দ্যুদ্গারৌ, বাতমূত্রপুরীষবেগানাং চাপ্রাদুর্ভাবঃ, প্রাদুর্ভূতানাং চাপ্রবৃত্তিরীষদাগমনং বা, বাতশূলাটোপান্ত্রকূজনাপরিহর্ষণাতিবৃত্তপুরীষতাঃ, অবুভুক্ষা, দৌর্বল্যং, সৌহিত্যস্য চাসহত্বমিতি||১৫||
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एषां तु खलु पञ्चानां गुल्मानां प्रागभिनिर्वृत्तेरिमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति; तद्यथा- अनन्नाभिलषणम्, अरोचकाविपाकौ, अग्निवैषम्यं, विदाहो भुक्तस्य, पाककाले चायुक्त्या छर्द्युद्गारौ, वातमूत्रपुरीषवेगानां चाप्रादुर्भावः, प्रादुर्भूतानां चाप्रवृत्तिरीषदागमनं वा, वातशूलाटोपान्त्रकूजनापरिहर्षणातिवृत्तपुरीषताः, अबुभुक्षा, दौर्बल्यं, सौहित्यस्य चासहत्वमिति||१५||
Adhikarana 10 (16-17) · Śloka 17
সর্বেষ্বপি খল্বেতেষু গুল্মেষু ন কশ্চিদ্বাতাদৃতে সম্ভবতি গুল্মঃ|
তেষাং সান্নিপাতিকমসাধ্যং জ্ঞাত্বা নৈবোপক্রমেত, একদোষজে তু যথাস্বমারম্ভং প্রণযেত্, সংসৃষ্টাংস্তু সাধারণেন কর্মণোপচরেত্|
যচ্চান্যদপ্যবিরুদ্ধং মন্যেত তদপ্যবচারযেদ্বিভজ্য গুরুলাঘবমুপদ্রবাণাং, গুরূনুপদ্রবাংস্ত্বরমাণশ্চিকিত্সেজ্জঘন্যমিতরান্|
ত্বরমাণস্তু বিশেষমনুপলভমানো গুল্মেষ্বাত্যযিকে কর্মণি বাতচিকিত্সিতং প্রণযেত্, স্নেহস্বেদৌ বাতহরৌ স্নেহোপসংহিতং চ মৃদু বিরেচনং বস্তীংশ্চ; অম্ললবণমধুরাংশ্চ রসান্ যুক্ত্যাঽবচারযেত্|
মারুতে হ্যুপশান্তে স্বল্পেনাপি প্রযত্নেন শক্যোঽন্যোঽপি দোষো নিযন্তুং গুল্মেষ্বিতি||১৬||
ভবতি চাত্র- গুল্মিনামনিলশান্তিরুপাযৈঃ সর্বশো বিধিবদাচরিতব্যা|
মারুতে হ্যবজিতেঽন্যমুদীর্ণং দোষমল্পমপি কর্ম নিহন্যাত্||১৭||
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सर्वेष्वपि खल्वेतेषु गुल्मेषु न कश्चिद्वातादृते सम्भवति गुल्मः|
तेषां सान्निपातिकमसाध्यं ज्ञात्वा नैवोपक्रमेत, एकदोषजे तु यथास्वमारम्भं प्रणयेत्, संसृष्टांस्तु साधारणेन कर्मणोपचरेत्|
यच्चान्यदप्यविरुद्धं मन्येत तदप्यवचारयेद्विभज्य गुरुलाघवमुपद्रवाणां, गुरूनुपद्रवांस्त्वरमाणश्चिकित्सेज्जघन्यमितरान्|
त्वरमाणस्तु विशेषमनुपलभमानो गुल्मेष्वात्ययिके कर्मणि वातचिकित्सितं प्रणयेत्, स्नेहस्वेदौ वातहरौ स्नेहोपसंहितं च मृदु विरेचनं बस्तींश्च; अम्ललवणमधुरांश्च रसान् युक्त्याऽवचारयेत्|
मारुते ह्युपशान्ते स्वल्पेनापि प्रयत्नेन शक्योऽन्योऽपि दोषो नियन्तुं गुल्मेष्विति||१६||
भवति चात्र- गुल्मिनामनिलशान्तिरुपायैः सर्वशो विधिवदाचरितव्या|
मारुते ह्यवजितेऽन्यमुदीर्णं दोषमल्पमपि कर्म निहन्यात्||१७||
Adhikarana 11 (18) · Śloka 18
তত্র শ্লোকঃ- সঙ্খ্যা নিমিত্তং রূপাণি পূর্বরূপমথাপি চ|
দিষ্টং নিদানে গুল্মানামেকদেশশ্চ কর্মণাম্||১৮||
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तत्र श्लोकः- सङ्ख्या निमित्तं रूपाणि पूर्वरूपमथापि च|
दिष्टं निदाने गुल्मानामेकदेशश्च कर्मणाम्||१८||
Adhikarana puShpikA · Śloka 3
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে নিদানস্থানে গুল্মনিদানং নাম তৃতীযোঽধ্যাযঃ||৩||
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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने गुल्मनिदानं नाम तृतीयोऽध्यायः||३||