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1. katidhāpuruṣīyaśārīram

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ কতিধাপুরুষীযং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातः कतिधापुरुषीयं शारीरं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3-15) · Śloka 15

কতিধা পুরুষো ধীমন্! ধাতুভেদেন ভিদ্যতে| পুরুষঃ কারণং কস্মাত্, প্রভবঃ পুরুষস্য কঃ||৩|| কিমজ্ঞো জ্ঞঃ, স নিত্যঃ কিং কিমনিত্যো নিদর্শিতঃ| প্রকৃতিঃ কা, বিকারাঃ কে, কিং লিঙ্গং পুরুষস্য চ||৪|| নিষ্ক্রিযং চ স্বতন্ত্রং চ বশিনং সর্বগং বিভুম্| বদন্ত্যাত্মানমাত্মজ্ঞাঃ ক্ষেত্রজ্ঞং সাক্ষিণং তথা||৫|| নিষ্ক্রিযস্য ক্রিযা তস্য ভগবন্! বিদ্যতে কথম্| স্বতন্ত্রশ্চেদনিষ্টাসু কথং যোনিষু জাযতে||৬|| বশী যদ্যসুখৈঃ কস্মাদ্ভাবৈরাক্রম্যতে বলাত্| সর্বাঃ সর্বগতত্বাচ্চ বেদনাঃ কিং ন বেত্তি সঃ||৭|| ন পশ্যতি বিভুঃ কস্মাচ্ছৈলকুড্যতিরস্কৃতম্| ক্ষেত্রজ্ঞঃ ক্ষেত্রমথবা কিং পূর্বমিতি সংশযঃ||৮|| জ্ঞেযং ক্ষেত্রং বিনা পূর্বং ক্ষেত্রজ্ঞো হি ন যুজ্যতে| ক্ষেত্রং চ যদি পূর্বং স্যাত্ ক্ষেত্রজ্ঞঃ স্যাদশাশ্বতঃ||৯|| সাক্ষিভূতশ্চ কস্যাযং কর্তা হ্যন্যো ন বিদ্যতে| স্যাত্ কথং চাবিকারস্য বিশেষো বেদনাকৃতঃ||১০|| অথ চার্তস্য ভগবংস্তিসৃণাং কাং চিকিত্সতি| অতীতাং বেদনাং বৈদ্যো বর্তমানাং ভবিষ্যতীম্||১১|| ভবিষ্যন্ত্যা অসম্প্রাপ্তিরতীতাযা অনাগমঃ| সাম্প্রতিক্যা অপি স্থানং নাস্ত্যর্তেঃ সংশযো হ্যতঃ||১২|| কারণং বেদনানাং কিং, কিমধিষ্ঠানমুচ্যতে| ক্ব চৈতা বেদনাঃ সর্বা নিবৃত্তিং যান্ত্যশেষতঃ||১৩|| সর্ববিত্ সর্বসন্ন্যাসী সর্বসংযোগনিঃসৃতঃ| একঃ প্রশান্তো ভূতাত্মা কৈর্লিঙ্গৈরুপলভ্যতে||১৪|| ইত্যগ্নিবেশস্য বচঃ শ্রুত্বা মতিমতাং বরঃ| সর্বং যথাবত্ প্রোবাচ প্রশান্তাত্মা পুনর্বসুঃ||১৫||

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कतिधा पुरुषो धीमन्! धातुभेदेन भिद्यते| पुरुषः कारणं कस्मात्, प्रभवः पुरुषस्य कः||३|| किमज्ञो ज्ञः, स नित्यः किं किमनित्यो निदर्शितः| प्रकृतिः का, विकाराः के, किं लिङ्गं पुरुषस्य च||४|| निष्क्रियं च स्वतन्त्रं च वशिनं सर्वगं विभुम्| वदन्त्यात्मानमात्मज्ञाः क्षेत्रज्ञं साक्षिणं तथा||५|| निष्क्रियस्य क्रिया तस्य भगवन्! विद्यते कथम्| स्वतन्त्रश्चेदनिष्टासु कथं योनिषु जायते||६|| वशी यद्यसुखैः कस्माद्भावैराक्रम्यते बलात्| सर्वाः सर्वगतत्वाच्च वेदनाः किं न वेत्ति सः||७|| न पश्यति विभुः कस्माच्छैलकुड्यतिरस्कृतम्| क्षेत्रज्ञः क्षेत्रमथवा किं पूर्वमिति संशयः||८|| ज्ञेयं क्षेत्रं विना पूर्वं क्षेत्रज्ञो हि न युज्यते| क्षेत्रं च यदि पूर्वं स्यात् क्षेत्रज्ञः स्यादशाश्वतः||९|| साक्षिभूतश्च कस्यायं कर्ता ह्यन्यो न विद्यते| स्यात् कथं चाविकारस्य विशेषो वेदनाकृतः||१०|| अथ चार्तस्य भगवंस्तिसृणां कां चिकित्सति| अतीतां वेदनां वैद्यो वर्तमानां भविष्यतीम्||११|| भविष्यन्त्या असम्प्राप्तिरतीताया अनागमः| साम्प्रतिक्या अपि स्थानं नास्त्यर्तेः संशयो ह्यतः||१२|| कारणं वेदनानां किं, किमधिष्ठानमुच्यते| क्व चैता वेदनाः सर्वा निवृत्तिं यान्त्यशेषतः||१३|| सर्ववित् सर्वसन्न्यासी सर्वसंयोगनिःसृतः| एकः प्रशान्तो भूतात्मा कैर्लिङ्गैरुपलभ्यते||१४|| इत्यग्निवेशस्य वचः श्रुत्वा मतिमतां वरः| सर्वं यथावत् प्रोवाच प्रशान्तात्मा पुनर्वसुः||१५||

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Adhikarana 3 (16) · Śloka 16

খাদযশ্চেতনাষষ্ঠা ধাতবঃ পুরুষঃ স্মৃতঃ| চেতনাধাতুরপ্যেকঃ স্মৃতঃ পুরুষসঞ্জ্ঞকঃ||১৬||

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खादयश्चेतनाषष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः| चेतनाधातुरप्येकः स्मृतः पुरुषसञ्ज्ञकः||१६||

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Adhikarana 4 (17) · Śloka 17

পুনশ্চ ধাতুভেদেন চতুর্বিংশতিকঃ স্মৃতঃ| মনো দশেন্দ্রিযাণ্যর্থাঃ প্রকৃতিশ্চাষ্টধাতুকী||১৭||

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पुनश्च धातुभेदेन चतुर्विंशतिकः स्मृतः| मनो दशेन्द्रियाण्यर्थाः प्रकृतिश्चाष्टधातुकी||१७||

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Adhikarana 5 (18-19) · Śloka 19

লক্ষণং মনসো জ্ঞানস্যাভাবো ভাব এব চ| সতি হ্যাত্মেন্দ্রিযার্থানাং সন্নিকর্ষে ন বর্ততে||১৮|| বৈবৃত্ত্যান্মনসো জ্ঞানং সান্নিধ্যাত্তচ্চ বর্ততে| অণুত্বমথ চৈকত্বং দ্বৌ গুণৌ মনসঃ স্মৃতৌ||১৯||

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लक्षणं मनसो ज्ञानस्याभावो भाव एव च| सति ह्यात्मेन्द्रियार्थानां सन्निकर्षे न वर्तते||१८|| वैवृत्त्यान्मनसो ज्ञानं सान्निध्यात्तच्च वर्तते| अणुत्वमथ चैकत्वं द्वौ गुणौ मनसः स्मृतौ||१९||

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Adhikarana 6 (20-21) · Śloka 21

চিন্ত্যং বিচার্যমূহ্যং চ ধ্যেযং সঙ্কল্প্যমেব চ| যত্কিঞ্চিন্মনসো জ্ঞেযং তত্ সর্বং হ্যর্থসঞ্জ্ঞকম্||২০|| ইন্দ্রিযাভিগ্রহঃ কর্ম মনসঃ স্বস্য নিগ্রহঃ| ঊহো বিচারশ্চ, ততঃ পরং বুদ্ধিঃ প্রবর্ততে||২১||

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चिन्त्यं विचार्यमूह्यं च ध्येयं सङ्कल्प्यमेव च| यत्किञ्चिन्मनसो ज्ञेयं तत् सर्वं ह्यर्थसञ्ज्ञकम्||२०|| इन्द्रियाभिग्रहः कर्म मनसः स्वस्य निग्रहः| ऊहो विचारश्च, ततः परं बुद्धिः प्रवर्तते||२१||

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Adhikarana 7 (22-23) · Śloka 23

ইন্দ্রিযেণেন্দ্রিযার্থো হি সমনস্কেন গৃহ্যতে| কল্প্যতে মনসা তূর্ধ্বং গুণতো দোষতোঽথবা||২২|| জাযতে বিষযে তত্র যা বুদ্ধির্নিশ্চযাত্মিকা| ব্যবস্যতি তযা বক্তুং কর্তুং বা বুদ্ধিপূর্বকম্||২৩||

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इन्द्रियेणेन्द्रियार्थो हि समनस्केन गृह्यते| कल्प्यते मनसा तूर्ध्वं गुणतो दोषतोऽथवा||२२|| जायते विषये तत्र या बुद्धिर्निश्चयात्मिका| व्यवस्यति तया वक्तुं कर्तुं वा बुद्धिपूर्वकम्||२३||

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Adhikarana 8 (24) · Śloka 24

একৈকাধিকযুক্তানি খাদীনামিন্দ্রিযাণি তু| পঞ্চ কর্মানুমেযানি যেভ্যো বুদ্ধিঃ প্রবর্ততে||২৪||

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एकैकाधिकयुक्तानि खादीनामिन्द्रियाणि तु| पञ्च कर्मानुमेयानि येभ्यो बुद्धिः प्रवर्तते||२४||

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Adhikarana 9 (25-26) · Śloka 26

হস্তৌ পাদৌ গুদোপস্থং বাগিন্দ্রিযমথাপি চ| কর্মেন্দ্রিযাণি পঞ্চৈব পাদৌ গমনকর্মণি||২৫|| পাযূপস্থং বিসর্গার্থং হস্তৌ গ্রহণধারণে| জিহ্বা বাগিন্দ্রিযং বাক্ চ সত্যা জ্যোতিস্তমোঽনৃতা||২৬||

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हस्तौ पादौ गुदोपस्थं वागिन्द्रियमथापि च| कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव पादौ गमनकर्मणि||२५|| पायूपस्थं विसर्गार्थं हस्तौ ग्रहणधारणे| जिह्वा वागिन्द्रियं वाक् च सत्या ज्योतिस्तमोऽनृता||२६||

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Adhikarana 10 (27) · Śloka 27

মহাভূতানি খং বাযুরগ্নিরাপঃ ক্ষিতিস্তথা| শব্দঃ স্পর্শশ্চ রূপং চ রসো গন্ধশ্চ তদ্গুণাঃ||২৭||

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महाभूतानि खं वायुरग्निरापः क्षितिस्तथा| शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च तद्गुणाः||२७||

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Adhikarana 11 (28) · Śloka 28

তেষামেকগুণঃ পূর্বো গুণবৃদ্ধিঃ পরে পরে| পূর্বঃ পূর্বগুণশ্চৈব ক্রমশো গুণিষু স্মৃতঃ||২৮||

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तेषामेकगुणः पूर्वो गुणवृद्धिः परे परे| पूर्वः पूर्वगुणश्चैव क्रमशो गुणिषु स्मृतः||२८||

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Adhikarana 12 (29-30) · Śloka 30

খরদ্রবচলোষ্ণত্বং ভূজলানিলতেজসাম্| আকাশস্যাপ্রতীঘাতো দৃষ্টং লিঙ্গং যথাক্রমম্||২৯|| লক্ষণং সর্বমেবৈতত্ স্পর্শনেন্দ্রিযগোচরম্| স্পর্শনেন্দ্রিযবিজ্ঞেযঃ স্পর্শো হি সবিপর্যযঃ||৩০||

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खरद्रवचलोष्णत्वं भूजलानिलतेजसाम्| आकाशस्याप्रतीघातो दृष्टं लिङ्गं यथाक्रमम्||२९|| लक्षणं सर्वमेवैतत् स्पर्शनेन्द्रियगोचरम्| स्पर्शनेन्द्रियविज्ञेयः स्पर्शो हि सविपर्ययः||३०||

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Adhikarana 13 (31) · Śloka 31

গুণাঃ শরীরে গুণিনাং নির্দিষ্টাশ্চিহ্নমেব চ|৩১|

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गुणाः शरीरे गुणिनां निर्दिष्टाश्चिह्नमेव च|३१|

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Adhikarana 14 (31) · Śloka 31

অর্থাঃ শব্দাদযো জ্ঞেযা গোচরা বিষযা গুণাঃ||৩১||

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अर्थाः शब्दादयो ज्ञेया गोचरा विषया गुणाः||३१||

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Adhikarana 15 (32-34) · Śloka 34

যা যদিন্দ্রিযমাশ্রিত্য জন্তোর্বুদ্ধিঃ প্রবর্ততে| যাতি সা তেন নির্দেশং মনসা চ মনোভবা||৩২|| ভেদাত্ কার্যেন্দ্রিযার্থানাং বহ্ব্যো বৈ বুদ্ধযঃ স্মৃতাঃ| আত্মেন্দ্রিযমনোর্থানামেকৈকা সন্নিকর্ষজা||৩৩|| অঙ্গুল্যঙ্গুষ্ঠতলজস্তন্ত্রীবীণানখোদ্ভবঃ| দৃষ্টঃ শব্দো যথা বুদ্ধির্দৃষ্টা সংযোগজা তথা||৩৪||

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या यदिन्द्रियमाश्रित्य जन्तोर्बुद्धिः प्रवर्तते| याति सा तेन निर्देशं मनसा च मनोभवा||३२|| भेदात् कार्येन्द्रियार्थानां बह्व्यो वै बुद्धयः स्मृताः| आत्मेन्द्रियमनोर्थानामेकैका सन्निकर्षजा||३३|| अङ्गुल्यङ्गुष्ठतलजस्तन्त्रीवीणानखोद्भवः| दृष्टः शब्दो यथा बुद्धिर्दृष्टा संयोगजा तथा||३४||

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Adhikarana 16 (35) · Śloka 35

বুদ্ধীন্দ্রিযমনোর্থানাং বিদ্যাদ্যোগধরং পরম্| চতুর্বিংশতিকো হ্যেষ রাশিঃ পুরুষসঞ্জ্ঞকঃ||৩৫||

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बुद्धीन्द्रियमनोर्थानां विद्याद्योगधरं परम्| चतुर्विंशतिको ह्येष राशिः पुरुषसञ्ज्ञकः||३५||

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Adhikarana 17 (36) · Śloka 36

রজস্তমোভ্যাং যুক্তস্য সংযোগোঽযমনন্তবান্| তাভ্যাং নিরাকৃতাভ্যাং তু সত্ত্ববৃদ্ধ্যা নিবর্ততে||৩৬||

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रजस्तमोभ्यां युक्तस्य संयोगोऽयमनन्तवान्| ताभ्यां निराकृताभ्यां तु सत्त्ववृद्ध्या निवर्तते||३६||

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Adhikarana 18 (37-38) · Śloka 38

অত্র কর্ম ফলং চাত্র জ্ঞানং চাত্র প্রতিষ্ঠিতম্| অত্র মোহঃ সুখং দুঃখং জীবিতং মরণং স্বতা||৩৭|| এবং যো বেদ তত্ত্বেন স বেদ প্রলযোদযৌ| পারম্পর্যং চিকিত্সাং চ জ্ঞাতব্যং যচ্চ কিঞ্চন||৩৮||

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अत्र कर्म फलं चात्र ज्ञानं चात्र प्रतिष्ठितम्| अत्र मोहः सुखं दुःखं जीवितं मरणं स्वता||३७|| एवं यो वेद तत्त्वेन स वेद प्रलयोदयौ| पारम्पर्यं चिकित्सां च ज्ञातव्यं यच्च किञ्चन||३८||

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Adhikarana 19 (39-42) · Śloka 42

ভাস্তমঃ সত্যমনৃতং বেদাঃ কর্ম শুভাশুভম্| ন স্যুঃ কর্তা চ বোদ্ধা চ পুরুষো ন ভবেদ্যদি||৩৯|| নাশ্রযো ন সুখং নার্তির্ন গতির্নাগতির্ন বাক্| ন বিজ্ঞানং ন শাস্ত্রাণি ন জন্ম মরণং ন চ||৪০|| ন বন্ধো ন চ মোক্ষঃ স্যাত্ পুরুষো ন ভবেদ্যদি| কারণং পুরুষস্তস্মাত্ কারণজ্ঞৈরুদাহৃতঃ||৪১|| ন চেত্ কারণমাত্মা স্যাদ্ভাদযঃ স্যুরহেতুকাঃ| ন চৈষু সম্ভবেজ্ জ্ঞানং ন চ তৈঃ স্যাত্ প্রযোজনম্||৪২||

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भास्तमः सत्यमनृतं वेदाः कर्म शुभाशुभम्| न स्युः कर्ता च बोद्धा च पुरुषो न भवेद्यदि||३९|| नाश्रयो न सुखं नार्तिर्न गतिर्नागतिर्न वाक्| न विज्ञानं न शास्त्राणि न जन्म मरणं न च||४०|| न बन्धो न च मोक्षः स्यात् पुरुषो न भवेद्यदि| कारणं पुरुषस्तस्मात् कारणज्ञैरुदाहृतः||४१|| न चेत् कारणमात्मा स्याद्भादयः स्युरहेतुकाः| न चैषु सम्भवेज् ज्ञानं न च तैः स्यात् प्रयोजनम्||४२||

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Adhikarana 20 (43-44) · Śloka 44

কৃতং মৃদ্দণ্ডচক্রৈশ্চ কুম্ভকারাদৃতে ঘটম্| কৃতং মৃত্তৃণকাষ্ঠৈশ্চ গৃহকারাদ্বিনা গৃহম্||৪৩|| যো বদেত্ স বদেদ্দেহং সম্ভূয করণৈঃ কৃতম্| বিনা কর্তারমজ্ঞানাদ্যুক্ত্যাগমবহিষ্কৃতঃ||৪৪||

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कृतं मृद्दण्डचक्रैश्च कुम्भकारादृते घटम्| कृतं मृत्तृणकाष्ठैश्च गृहकाराद्विना गृहम्||४३|| यो वदेत् स वदेद्देहं सम्भूय करणैः कृतम्| विना कर्तारमज्ञानाद्युक्त्यागमबहिष्कृतः||४४||

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Adhikarana 21 (45) · Śloka 45

কারণং পুরুষঃ সর্বৈঃ প্রমাণৈরুপলভ্যতে| যেভ্যঃ প্রমেযং সর্বেভ্য আগমেভ্যঃ প্রমীযতে||৪৫||

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कारणं पुरुषः सर्वैः प्रमाणैरुपलभ्यते| येभ्यः प्रमेयं सर्वेभ्य आगमेभ्यः प्रमीयते||४५||

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Adhikarana 22 (46-47) · Śloka 47

ন তে তত্সদৃশাস্ত্বন্যে পারম্পর্যসমুত্থিতাঃ| সারূপ্যাদ্যে ত এবেতি নির্দিশ্যন্তে নবা নবাঃ||৪৬|| ভাবাস্তেষাং সমুদযো নিরীশঃ সত্ত্বসঞ্জ্ঞকঃ| কর্তা ভোক্তা ন স পুমানিতি কেচিদ্ব্যবস্থিতাঃ||৪৭||

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न ते तत्सदृशास्त्वन्ये पारम्पर्यसमुत्थिताः| सारूप्याद्ये त एवेति निर्दिश्यन्ते नवा नवाः||४६|| भावास्तेषां समुदयो निरीशः सत्त्वसञ्ज्ञकः| कर्ता भोक्ता न स पुमानिति केचिद्व्यवस्थिताः||४७||

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Adhikarana 23 (48) · Śloka 48

তেষামন্যৈঃ কৃতস্যান্যে ভাবা ভাবৈর্নবাঃ ফলম্| ভুঞ্জতে সদৃশাঃ প্রাপ্তং যৈরাত্মা নোপদিশ্যতে||৪৮||

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तेषामन्यैः कृतस्यान्ये भावा भावैर्नवाः फलम्| भुञ्जते सदृशाः प्राप्तं यैरात्मा नोपदिश्यते||४८||

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Adhikarana 24 (49) · Śloka 49

করণান্যান্যতা দৃষ্টা কর্তুঃ কর্তা স এব তু| কর্তা হি করণৈর্যুক্তঃ কারণং সর্বকর্মণাম্||৪৯||

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करणान्यान्यता दृष्टा कर्तुः कर्ता स एव तु| कर्ता हि करणैर्युक्तः कारणं सर्वकर्मणाम्||४९||

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Adhikarana 25 (50-51) · Śloka 51

নিমেষকালাদ্ভাবানাং কালঃ শীঘ্রতরোঽত্যযে| ভগ্নানাং ন পুনর্ভাবঃ কৃতং নান্যমুপৈতি চ||৫০|| মতং তত্ত্ববিদামেতদ্যস্মাত্তস্মাত্ স কারণম্| ক্রিযোপভোগে ভূতানাং নিত্যঃ পুরুষসঞ্জ্ঞকঃ||৫১||

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निमेषकालाद्भावानां कालः शीघ्रतरोऽत्यये| भग्नानां न पुनर्भावः कृतं नान्यमुपैति च||५०|| मतं तत्त्वविदामेतद्यस्मात्तस्मात् स कारणम्| क्रियोपभोगे भूतानां नित्यः पुरुषसञ्ज्ञकः||५१||

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Adhikarana 26 (52) · Śloka 52

অহঙ্কারঃ ফলং কর্ম দেহান্তরগতিঃ স্মৃতিঃ| বিদ্যতে সতি ভূতানাং কারণে দেহমন্তরা||৫২||

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अहङ्कारः फलं कर्म देहान्तरगतिः स्मृतिः| विद्यते सति भूतानां कारणे देहमन्तरा||५२||

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Adhikarana 27 (53) · Śloka 53

প্রভবো ন হ্যনাদিত্বাদ্বিদ্যতে পরমাত্মনঃ| পুরুষো রাশিসঞ্জ্ঞস্তু মোহেচ্ছাদ্বেষকর্মজঃ||৫৩||

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प्रभवो न ह्यनादित्वाद्विद्यते परमात्मनः| पुरुषो राशिसञ्ज्ञस्तु मोहेच्छाद्वेषकर्मजः||५३||

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Adhikarana 28 (54-55) · Śloka 55

আত্মা জ্ঞঃ করণৈর্যোগাজ্ জ্ঞানং ত্বস্য প্রবর্ততে| করণানামবৈমল্যাদযোগাদ্বা ন বর্ততে||৫৪|| পশ্যতোঽপি যথাঽঽদর্শে সঙ্ক্লিষ্টে নাস্তি দর্শনম্| তত্ত্বং জলে বা কলুষে চেতস্যুপহতে তথা||৫৫||

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आत्मा ज्ञः करणैर्योगाज् ज्ञानं त्वस्य प्रवर्तते| करणानामवैमल्यादयोगाद्वा न वर्तते||५४|| पश्यतोऽपि यथाऽऽदर्शे सङ्क्लिष्टे नास्ति दर्शनम्| तत्त्वं जले वा कलुषे चेतस्युपहते तथा||५५||

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Adhikarana 29 (56-57) · Śloka 57

করণানি মনো বুদ্ধির্বুদ্ধিকর্মেন্দ্রিযাণি চ| কর্তুঃ সংযোগজং কর্ম বেদনা বুদ্ধিরেব চ||৫৬|| নৈকঃ প্রবর্ততে কর্তুং ভূতাত্মা নাশ্নুতে ফলম্| সংযোগাদ্বর্ততে সর্বং তমৃতে নাস্তি কিঞ্চন||৫৭||

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करणानि मनो बुद्धिर्बुद्धिकर्मेन्द्रियाणि च| कर्तुः संयोगजं कर्म वेदना बुद्धिरेव च||५६|| नैकः प्रवर्तते कर्तुं भूतात्मा नाश्नुते फलम्| संयोगाद्वर्तते सर्वं तमृते नास्ति किञ्चन||५७||

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Adhikarana 30 (58) · Śloka 58

ন হ্যেকো বর্ততে ভাবো বর্ততে নাপ্যহেতুকঃ| শীঘ্রগত্বাত্স্বভাবাত্ত্বভাবো ন ব্যতিবর্ততে||৫৮||

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न ह्येको वर्तते भावो वर्तते नाप्यहेतुकः| शीघ्रगत्वात्स्वभावात्त्वभावो न व्यतिवर्तते||५८||

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Adhikarana 31 (59) · Śloka 59

অনাদিঃ পুরুষো নিত্যো বিপরীতস্তু হেতুজঃ| সদকারণবন্নিত্যং দৃষ্টং হেতুজমন্যথা||৫৯||

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अनादिः पुरुषो नित्यो विपरीतस्तु हेतुजः| सदकारणवन्नित्यं दृष्टं हेतुजमन्यथा||५९||

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Adhikarana 32 (60-62) · Śloka 62

তদেব ভাবাদগ্রাহ্যং নিত্যত্ব ন কুতশ্চন| ভাবাজ্জ্ঞেযং তদব্যক্তমচিন্ত্যং ব্যক্তমন্যথা||৬০|| অব্যক্তমাত্মা ক্ষেত্রজ্ঞঃ শাশ্বতো বিভুরব্যযঃ| তস্মাদ্যদন্যত্তদ্ব্যক্তং, বক্ষ্যতে চাপরং দ্বযম্||৬১|| ব্যক্তমৈন্দ্রিযকং চৈব গৃহ্যতে তদ্যদিন্দ্রিযৈঃ| অতোঽন্যত্ পুনরব্যক্তং লিঙ্গগ্রাহ্যমতীন্দ্রিযম্||৬২||

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तदेव भावादग्राह्यं नित्यत्व न कुतश्चन| भावाज्ज्ञेयं तदव्यक्तमचिन्त्यं व्यक्तमन्यथा||६०|| अव्यक्तमात्मा क्षेत्रज्ञः शाश्वतो विभुरव्ययः| तस्माद्यदन्यत्तद्व्यक्तं, वक्ष्यते चापरं द्वयम्||६१|| व्यक्तमैन्द्रियकं चैव गृह्यते तद्यदिन्द्रियैः| अतोऽन्यत् पुनरव्यक्तं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम्||६२||

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Adhikarana 33 (63-64) · Śloka 64

খাদীনি বুদ্ধিরব্যক্তমহঙ্কারস্তথাঽষ্টমঃ| ভূতপ্রকৃতিরুদ্দিষ্টা বিকারাশ্চৈব ষোডশ||৬৩|| বুদ্ধীন্দ্রিযাণি পঞ্চৈব পঞ্চ কর্মেন্দ্রিযাণি চ| সমনস্কাশ্চ পঞ্চার্থা বিকারা ইতি সঞ্জ্ঞিতাঃ||৬৪||

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खादीनि बुद्धिरव्यक्तमहङ्कारस्तथाऽष्टमः| भूतप्रकृतिरुद्दिष्टा विकाराश्चैव षोडश||६३|| बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च| समनस्काश्च पञ्चार्था विकारा इति सञ्ज्ञिताः||६४||

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Adhikarana 34 (65) · Śloka 65

ইতি ক্ষেত্রং সমুদ্দিষ্টং সর্বমব্যক্তবর্জিতম্| অব্যক্তমস্য ক্ষেত্রস্য ক্ষেত্রজ্ঞমৃষযো বিদুঃ||৬৫||

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इति क्षेत्रं समुद्दिष्टं सर्वमव्यक्तवर्जितम्| अव्यक्तमस्य क्षेत्रस्य क्षेत्रज्ञमृषयो विदुः||६५||

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Adhikarana 35 (66) · Śloka 67

জাযতে বুদ্ধিরব্যক্তাদ্বুদ্ধ্যাঽহমিতি মন্যতে| পরং খাদীন্যহঙ্কারাদুত্পদ্যন্তে যথাক্রমম্||৬৬|| ততঃ সম্পূর্ণসর্বাঙ্গো জাতোঽভ্যুদিত উচ্যতে|৬৭|

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जायते बुद्धिरव्यक्ताद्बुद्ध्याऽहमिति मन्यते| परं खादीन्यहङ्कारादुत्पद्यन्ते यथाक्रमम्||६६|| ततः सम्पूर्णसर्वाङ्गो जातोऽभ्युदित उच्यते|६७|

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Adhikarana 36 (67-69) · Śloka 69

পুরুষঃ প্রলযে চেষ্টৈঃ পুনর্ভাবৈর্বিযুজ্যতে||৬৭|| অব্যক্তাদ্ব্যক্ততাং যাতি ব্যক্তাদব্যক্ততাং পুনঃ| রজস্তমোভ্যামাবিষ্টশ্চক্রবত্ পরিবর্ততে||৬৮|| যেষাং দ্বন্দ্বে পরা সক্তিরহঙ্কারপরাশ্চ যে| উদযপ্রলযৌ তেষাং ন তেষাং যে ত্বতোঽন্যথা||৬৯||

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पुरुषः प्रलये चेष्टैः पुनर्भावैर्वियुज्यते||६७|| अव्यक्ताद्व्यक्ततां याति व्यक्तादव्यक्ततां पुनः| रजस्तमोभ्यामाविष्टश्चक्रवत् परिवर्तते||६८|| येषां द्वन्द्वे परा सक्तिरहङ्कारपराश्च ये| उदयप्रलयौ तेषां न तेषां ये त्वतोऽन्यथा||६९||

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Adhikarana 37 (70-74) · Śloka 74

প্রাণাপানৌ নিমেষাদ্যা জীবনং মনসো গতিঃ| ইন্দ্রিযান্তরসঞ্চারঃ প্রেরণং ধারণং চ যত্||৭০|| দেশান্তরগতিঃ স্বপ্নে পঞ্চত্বগ্রহণং তথা| দৃষ্টস্য দক্ষিণেনাক্ষ্ণা সব্যেনাবগমস্তথা||৭১|| ইচ্ছা দ্বেষঃ সুখং দুঃখং প্রযত্নশ্চেতনা ধৃতিঃ| বুদ্ধিঃ স্মৃতিরহঙ্কারো লিঙ্গানি পরমাত্মনঃ||৭২|| যস্মাত্ সমুপলভ্যন্তে লিঙ্গান্যেতানি জীবতঃ| ন মৃতস্যাত্মলিঙ্গানি তস্মাদাহুর্মহর্ষযঃ||৭৩|| শরীরং হি গতে তস্মিঞ্ শূন্যাগারমচেতনম্| পঞ্চভূতাবশেষত্বাত্ পঞ্চত্বং গতমুচ্যতে||৭৪||

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प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसो गतिः| इन्द्रियान्तरसञ्चारः प्रेरणं धारणं च यत्||७०|| देशान्तरगतिः स्वप्ने पञ्चत्वग्रहणं तथा| दृष्टस्य दक्षिणेनाक्ष्णा सव्येनावगमस्तथा||७१|| इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं प्रयत्नश्चेतना धृतिः| बुद्धिः स्मृतिरहङ्कारो लिङ्गानि परमात्मनः||७२|| यस्मात् समुपलभ्यन्ते लिङ्गान्येतानि जीवतः| न मृतस्यात्मलिङ्गानि तस्मादाहुर्महर्षयः||७३|| शरीरं हि गते तस्मिञ् शून्यागारमचेतनम्| पञ्चभूतावशेषत्वात् पञ्चत्वं गतमुच्यते||७४||

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Adhikarana 38 (75-76) · Śloka 76

অচেতনং ক্রিযাবচ্চ মনশ্চেতযিতা পরঃ| যুক্তস্য মনসা তস্য নির্দিশ্যন্তে বিভোঃ ক্রিযাঃ||৭৫|| চেতনাবান্ যতশ্চাত্মা ততঃ কর্তা নিরুচ্যতে| অচেতনত্বাচ্চ মনঃ ক্রিযাবদপি নোচ্যতে||৭৬||

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अचेतनं क्रियावच्च मनश्चेतयिता परः| युक्तस्य मनसा तस्य निर्दिश्यन्ते विभोः क्रियाः||७५|| चेतनावान् यतश्चात्मा ततः कर्ता निरुच्यते| अचेतनत्वाच्च मनः क्रियावदपि नोच्यते||७६||

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Adhikarana 39 (77) · Śloka 77

যথাস্বেনাত্মনাঽঽত্মানং সর্বঃ সর্বাসু যোনিষু| প্রাণৈস্তন্ত্রযতে প্রাণী নহ্যন্যোঽস্ত্যস্য তন্ত্রকঃ||৭৭||

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यथास्वेनात्मनाऽऽत्मानं सर्वः सर्वासु योनिषु| प्राणैस्तन्त्रयते प्राणी नह्यन्योऽस्त्यस्य तन्त्रकः||७७||

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Adhikarana 40 (78) · Śloka 78

বশী তত্ কুরুতে কর্ম যত্ কৃত্বা ফলমশ্নুতে| বশী চেতঃ সমাধত্তে বশী সর্বং নিরস্যতি||৭৮||

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वशी तत् कुरुते कर्म यत् कृत्वा फलमश्नुते| वशी चेतः समाधत्ते वशी सर्वं निरस्यति||७८||

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Adhikarana 41 (79) · Śloka 79

দেহী সর্বগতোঽপ্যাত্মা স্বে স্বে সংস্পর্শনেন্দ্রিযে| সর্বাঃ সর্বাশ্রযস্থাস্তু নাত্মাঽতো বেত্তি বেদনাঃ||৭৯||

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देही सर्वगतोऽप्यात्मा स्वे स्वे संस्पर्शनेन्द्रिये| सर्वाः सर्वाश्रयस्थास्तु नात्माऽतो वेत्ति वेदनाः||७९||

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Adhikarana 42 (80-81) · Śloka 81

বিভুত্বমত এবাস্য যস্মাত্ সর্বগতো মহান্| মনসশ্চ সমাধানাত্ পশ্যত্যাত্মা তিরস্কৃতম্||৮০|| নিত্যানুবন্ধং মনসা দেহকর্মানুপাতিনা| সর্বযোনিগতং বিদ্যাদেকযোনাবপি স্থিতম্||৮১||

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विभुत्वमत एवास्य यस्मात् सर्वगतो महान्| मनसश्च समाधानात् पश्यत्यात्मा तिरस्कृतम्||८०|| नित्यानुबन्धं मनसा देहकर्मानुपातिना| सर्वयोनिगतं विद्यादेकयोनावपि स्थितम्||८१||

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Adhikarana 43 (82) · Śloka 82

আদির্নাস্ত্যাত্মনঃ ক্ষেত্রপারম্পর্যমনাদিকম্| অতস্তযোরনাদিত্বাত্ কিং পূর্বমিতি নোচ্যতে||৮২||

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आदिर्नास्त्यात्मनः क्षेत्रपारम्पर्यमनादिकम्| अतस्तयोरनादित्वात् किं पूर्वमिति नोच्यते||८२||

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Adhikarana 44 (83) · Śloka 83

জ্ঞঃ সাক্ষীত্যুচ্যতে নাজ্ঞঃ সাক্ষী ত্বাত্মা যতঃ স্মৃতঃ| সর্বে ভাবা হি সর্বেষাং ভূতানামাত্মসাক্ষিকাঃ||৮৩||

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ज्ञः साक्षीत्युच्यते नाज्ञः साक्षी त्वात्मा यतः स्मृतः| सर्वे भावा हि सर्वेषां भूतानामात्मसाक्षिकाः||८३||

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Adhikarana 45 (84-85) · Śloka 85

নৈকঃ কদাচিদ্ভূতাত্মা লক্ষণৈরুপলভ্যতে| বিশেষোঽনুপলভ্যস্য তস্য নৈকস্য বিদ্যতে||৮৪|| সংযোগপুরুষস্যেষ্টো বিশেষো বেদনাকৃতঃ| বেদনা যত্র নিযতা বিশেষস্তত্র তত্কৃতঃ||৮৫||

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नैकः कदाचिद्भूतात्मा लक्षणैरुपलभ्यते| विशेषोऽनुपलभ्यस्य तस्य नैकस्य विद्यते||८४|| संयोगपुरुषस्येष्टो विशेषो वेदनाकृतः| वेदना यत्र नियता विशेषस्तत्र तत्कृतः||८५||

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Adhikarana 46 (86-94) · Śloka 94

চিকিত্সতি ভিষক্ সর্বাস্ত্রিকালা বেদনা ইতি| যযা যুক্ত্যা বদন্ত্যেকে সা যুক্তিরুপধার্যতাম্||৮৬|| পুনস্তচ্ছিরসঃ শূলং জ্বরঃ স পুনরাগতঃ| পুনঃ স কাসো বলবাংশ্ছর্দিঃ সা পুনরাগতা||৮৭|| এভিঃ প্রসিদ্ধবচনৈরতীতাগমনং মতম্| কালশ্চাযমতীতানামর্তীনাং পুনরাগতঃ||৮৮|| তমর্তিকালমুদ্দিশ্য ভেষজং যত্ প্রযুজ্যতে| অতীতানাং প্রশমনং বেদনানাং তদুচ্যতে||৮৯|| আপস্তাঃ পুনরাগুর্মা যাভিঃ শস্যং পুরা হতম্| যথা প্রক্রিযতে সেতুঃ প্রতিকর্ম তথাঽঽশ্রযে||৯০|| পূর্বরূপং বিকারাণাং দৃষ্ট্বা প্রাদুর্ভবিষ্যতাম্| যা ক্রিযা ক্রিযতে সা চ বেদনাং হন্ত্যনাগতাম্||৯১|| পারম্পর্যানবন্ধস্তু দুঃখানাং বিনিবর্ততে| সুখহেতূপচারেণ সুখং চাপি প্রবর্ততে||৯২|| ন সমা যান্তি বৈষম্যং বিষমাঃ সমতাং ন চ| হেতুভিঃ সদৃশা নিত্যং জাযন্তে দেহধাতবঃ||৯৩|| যুক্তিমেতাং পুরস্কৃত্য ত্রিকালাং বেদনাং ভিষক্| হন্তীত্যুক্তং চিকিত্সা তু নৈষ্ঠিকী যা বিনোপধাম্||৯৪||

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चिकित्सति भिषक् सर्वास्त्रिकाला वेदना इति| यया युक्त्या वदन्त्येके सा युक्तिरुपधार्यताम्||८६|| पुनस्तच्छिरसः शूलं ज्वरः स पुनरागतः| पुनः स कासो बलवांश्छर्दिः सा पुनरागता||८७|| एभिः प्रसिद्धवचनैरतीतागमनं मतम्| कालश्चायमतीतानामर्तीनां पुनरागतः||८८|| तमर्तिकालमुद्दिश्य भेषजं यत् प्रयुज्यते| अतीतानां प्रशमनं वेदनानां तदुच्यते||८९|| आपस्ताः पुनरागुर्मा याभिः शस्यं पुरा हतम्| यथा प्रक्रियते सेतुः प्रतिकर्म तथाऽऽश्रये||९०|| पूर्वरूपं विकाराणां दृष्ट्वा प्रादुर्भविष्यताम्| या क्रिया क्रियते सा च वेदनां हन्त्यनागताम्||९१|| पारम्पर्यानबन्धस्तु दुःखानां विनिवर्तते| सुखहेतूपचारेण सुखं चापि प्रवर्तते||९२|| न समा यान्ति वैषम्यं विषमाः समतां न च| हेतुभिः सदृशा नित्यं जायन्ते देहधातवः||९३|| युक्तिमेतां पुरस्कृत्य त्रिकालां वेदनां भिषक्| हन्तीत्युक्तं चिकित्सा तु नैष्ठिकी या विनोपधाम्||९४||

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Adhikarana 47 (95-97) · Śloka 97

উপধা হি পরো হেতুর্দুঃখদুঃখাশ্রযপ্রদঃ| ত্যাগঃ সর্বোপধানাং চ সর্বদুঃখব্যপোহকঃ||৯৫|| কোষকারো যথা হ্যংশূনুপাদত্তে বধপ্রদান্ | উপাদত্তে তথাঽর্থেভ্যস্তৃষ্ণামজ্ঞঃ সদাঽঽতুরঃ||৯৬|| যস্ত্বগ্নিকল্পানর্থাঞ্ জ্ঞো জ্ঞাত্বা তেভ্যো নিবর্ততে| অনারম্ভাদসংযোগাত্তং দুঃখং নোপতিষ্ঠতে||৯৭||

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उपधा हि परो हेतुर्दुःखदुःखाश्रयप्रदः| त्यागः सर्वोपधानां च सर्वदुःखव्यपोहकः||९५|| कोषकारो यथा ह्यंशूनुपादत्ते वधप्रदान् | उपादत्ते तथाऽर्थेभ्यस्तृष्णामज्ञः सदाऽऽतुरः||९६|| यस्त्वग्निकल्पानर्थाञ् ज्ञो ज्ञात्वा तेभ्यो निवर्तते| अनारम्भादसंयोगात्तं दुःखं नोपतिष्ठते||९७||

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Adhikarana 48 (98) · Śloka 98

ধীধৃতিস্মৃতিবিভ্রংশঃ সম্প্রাপ্তিঃ কালকর্মণাম্| অসাত্ম্যার্থাগমশ্চেতি জ্ঞাতব্যা দুঃখহেতবঃ||৯৮||

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धीधृतिस्मृतिविभ्रंशः सम्प्राप्तिः कालकर्मणाम्| असात्म्यार्थागमश्चेति ज्ञातव्या दुःखहेतवः||९८||

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Adhikarana 49 (99) · Śloka 99

বিষমাভিনিবেশো যো নিত্যানিত্যে হিতাহিতে| জ্ঞেযঃ স বুদ্ধিবিভ্রংশঃ সমং বুদ্ধির্হি পশ্যতি||৯৯||

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विषमाभिनिवेशो यो नित्यानित्ये हिताहिते| ज्ञेयः स बुद्धिविभ्रंशः समं बुद्धिर्हि पश्यति||९९||

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Adhikarana 50 (100) · Śloka 100

বিষযপ্রবণং সত্ত্বং ধৃতিভ্রংশান্ন শক্যতে| নিযন্তুমহিতাদর্থাদ্ধৃতির্হি নিযমাত্মিকা||১০০||

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विषयप्रवणं सत्त्वं धृतिभ्रंशान्न शक्यते| नियन्तुमहितादर्थाद्धृतिर्हि नियमात्मिका||१००||

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Adhikarana 51 (101) · Śloka 101

তত্ত্বজ্ঞানে স্মৃতির্যস্য রজোমোহাবৃতাত্মনঃ| ভ্রশ্যতে স স্মৃতিভ্রংশঃ স্মর্তব্যং হি স্মৃতৌ স্থিতম্||১০১||

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तत्त्वज्ञाने स्मृतिर्यस्य रजोमोहावृतात्मनः| भ्रश्यते स स्मृतिभ्रंशः स्मर्तव्यं हि स्मृतौ स्थितम्||१०१||

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Adhikarana 52 (102-108) · Śloka 108

ধীধৃতিস্মৃতিবিভ্রষ্টঃ কর্ম যত্ কুরুতেঽশুভম্| প্রজ্ঞাপরাধং তং বিদ্যাত্ সর্বদোষপ্রকোপণম্||১০২|| উদীরণং গতিমতামুদীর্ণানাং চ নিগ্রহঃ| সেবনং সাহসানাং চ নারীণাং চাতিসেবনম্||১০৩|| কর্মকালাতিপাতশ্চ মিথ্যারম্ভশ্চ কর্মণাম্| বিনযাচারলোপশ্চ পূজ্যানাং চাভিধর্ষণম্||১০৪|| জ্ঞাতানাং স্বযমর্থানামহিতানাং নিষেবণম্| পরমৌন্মাদিকানাং চ প্রত্যযানাং নিষেবণম্||১০৫|| অকালাদেশসঞ্চারৌ মৈত্রী সঙ্ক্লিষ্টকর্মভিঃ| ইন্দ্রিযোপক্রমোক্তস্য সদ্বৃত্তস্য চ বর্জনম্||১০৬|| ঈর্ষ্যামানভযক্রোধলোভমোহমদভ্রমাঃ| তজ্জং বা কর্ম যত্ ক্লিষ্টং ক্লিষ্টং যদ্দেহকর্ম চ||১০৭|| যচ্চান্যদীদৃশং কর্ম রজোমোহসমুত্থিতম্| প্রজ্ঞাপরাধং তং শিষ্টা ব্রুবতে ব্যাধিকারণম্ ||১০৮||

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धीधृतिस्मृतिविभ्रष्टः कर्म यत् कुरुतेऽशुभम्| प्रज्ञापराधं तं विद्यात् सर्वदोषप्रकोपणम्||१०२|| उदीरणं गतिमतामुदीर्णानां च निग्रहः| सेवनं साहसानां च नारीणां चातिसेवनम्||१०३|| कर्मकालातिपातश्च मिथ्यारम्भश्च कर्मणाम्| विनयाचारलोपश्च पूज्यानां चाभिधर्षणम्||१०४|| ज्ञातानां स्वयमर्थानामहितानां निषेवणम्| परमौन्मादिकानां च प्रत्ययानां निषेवणम्||१०५|| अकालादेशसञ्चारौ मैत्री सङ्क्लिष्टकर्मभिः| इन्द्रियोपक्रमोक्तस्य सद्वृत्तस्य च वर्जनम्||१०६|| ईर्ष्यामानभयक्रोधलोभमोहमदभ्रमाः| तज्जं वा कर्म यत् क्लिष्टं क्लिष्टं यद्देहकर्म च||१०७|| यच्चान्यदीदृशं कर्म रजोमोहसमुत्थितम्| प्रज्ञापराधं तं शिष्टा ब्रुवते व्याधिकारणम् ||१०८||

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Adhikarana 53 (109) · Śloka 109

বুদ্ধ্যা বিষমবিজ্ঞানং বিষমং চ প্রবর্তনম্| প্রজ্ঞাপরাধং জানীযান্মনসো গোচরং হি তত্||১০৯||

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बुद्ध्या विषमविज्ञानं विषमं च प्रवर्तनम्| प्रज्ञापराधं जानीयान्मनसो गोचरं हि तत्||१०९||

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Adhikarana 54 (110-112) · Śloka 112

নির্দিষ্টা কালসম্প্রাপ্তির্ব্যাধীনাং ব্যাধিসঙ্গ্রহে| চযপ্রকোপপ্রশমাঃ পিত্তাদীনাং যথা পুরা||১১০|| মিথ্যাতিহীনলিঙ্গাশ্চ বর্ষান্তা রোগহেতবঃ| জীর্ণভুক্তপ্রজীর্ণান্নকালাকালস্থিতিশ্চ যা||১১১|| পূর্বমধ্যাপরাহ্ণাশ্চ রাত্র্যা যামাস্ত্রযশ্চ যে| এষু কালেষু নিযতা যে রোগাস্তে চ কালজাঃ||১১২||

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निर्दिष्टा कालसम्प्राप्तिर्व्याधीनां व्याधिसङ्ग्रहे| चयप्रकोपप्रशमाः पित्तादीनां यथा पुरा||११०|| मिथ्यातिहीनलिङ्गाश्च वर्षान्ता रोगहेतवः| जीर्णभुक्तप्रजीर्णान्नकालाकालस्थितिश्च या||१११|| पूर्वमध्यापराह्णाश्च रात्र्या यामास्त्रयश्च ये| एषु कालेषु नियता ये रोगास्ते च कालजाः||११२||

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Adhikarana 55 (113) · Śloka 113

অন্যেদ্যুষ্কো দ্ব্যহগ্রাহী তৃতীযকচতুর্থকৌ| স্বে স্বে কালে প্রবর্তন্তে কালে হ্যেষাং বলাগমঃ||১১৩||

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अन्येद्युष्को द्व्यहग्राही तृतीयकचतुर्थकौ| स्वे स्वे काले प्रवर्तन्ते काले ह्येषां बलागमः||११३||

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Adhikarana 56 (114) · Śloka 114

এতে চান্যে চ যে কেচিত্ কালজা বিবিধা গদাঃ| অনাগতে চিকিত্স্যাস্তে বলকালৌ বিজানতা||১১৪||

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एते चान्ये च ये केचित् कालजा विविधा गदाः| अनागते चिकित्स्यास्ते बलकालौ विजानता||११४||

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Adhikarana 57 (115) · Śloka 115

কালস্য পরিণামেন জরামৃত্যুনিমিত্তজাঃ| রোগাঃ স্বাভাবিকা দৃষ্টাঃ স্বভাবো নিষ্প্রতিক্রিযঃ||১১৫||

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कालस्य परिणामेन जरामृत्युनिमित्तजाः| रोगाः स्वाभाविका दृष्टाः स्वभावो निष्प्रतिक्रियः||११५||

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Adhikarana 58 (116) · Śloka 116

নির্দিষ্টং দৈবশব্দেন কর্ম যত্ পৌর্বদেহিকম্| হেতুস্তদপি কালেন রোগাণামুপলভ্যতে||১১৬||

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निर्दिष्टं दैवशब्देन कर्म यत् पौर्वदेहिकम्| हेतुस्तदपि कालेन रोगाणामुपलभ्यते||११६||

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Adhikarana 59 (117) · Śloka 117

ন হি কর্ম মহত্ কিঞ্চিত্ ফলং যস্য ন ভুজ্যতে| ক্রিযাঘ্নাঃ কর্মজা রোগাঃ প্রশমং যান্তি তত্ক্ষযাত্||১১৭||

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न हि कर्म महत् किञ्चित् फलं यस्य न भुज्यते| क्रियाघ्नाः कर्मजा रोगाः प्रशमं यान्ति तत्क्षयात्||११७||

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Adhikarana 60 (118-126) · Śloka 127

অত্যুগ্রশব্দশ্রবণাচ্ছ্রবণাত্ সর্বশো ন চ| শব্দানাং চাতিহীনানাং ভবন্তি শ্রবণাজ্জডাঃ||১১৮|| পরুষোদ্ভীষণাশস্তাপ্রিযব্যসনসূচকৈঃ| শব্দৈঃ শ্রবণসংযোগো মিথ্যাসংযোগ উচ্যতে||১১৯|| অসংস্পর্শোঽতিসংস্পর্শো হীনসংস্পর্শ এব চ| স্পৃশ্যানাং সঙ্গ্রহেণোক্তঃ স্পর্শনেন্দ্রিযবাধকঃ||১২০|| যো ভূতবিষবাতানামকালেনাগতশ্চ যঃ| স্নেহশীতোষ্ণসংস্পর্শো মিথ্যাযোগ স উচ্যতে||১২১|| রূপাণাং ভাস্বতাং দৃষ্টির্বিনশ্যত্যতিদর্শনাত্| দর্শনাচ্চাতিসূক্ষ্মাণাং সর্বশশ্চাপ্যদর্শনাত্||১২২|| দ্বিষ্টভৈরববীভত্সদূরাতিশ্লিষ্টদর্শনাত্ | তামসানাং চ রূপাণাং মিথ্যাসংযোগ উচ্যতে||১২৩|| অত্যাদানমনাদানমোকসাত্ম্যাদিভিশ্চ যত্| রসানাং বিষমাদানমল্পাদানং চ দূষণম্||১২৪|| অতিমৃদ্বতিতীক্ষ্ণানাং গন্ধানামুপসেবনম্| অসেবনং সর্বশশ্চ ঘ্রাণেন্দ্রিযবিনাশনম্||১২৫|| পূতিভূতবিষদ্বিষ্টা গন্ধা যে চাপ্যনার্তবাঃ| তৈর্গন্ধৈর্ঘ্রাণসংযোগো মিথ্যাযোগঃ স উচ্যতে||১২৬|| ইত্যসাত্ম্যার্থসংযোগস্ত্রিবিধো দোষকোপনঃ|১২৭|

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अत्युग्रशब्दश्रवणाच्छ्रवणात् सर्वशो न च| शब्दानां चातिहीनानां भवन्ति श्रवणाज्जडाः||११८|| परुषोद्भीषणाशस्ताप्रियव्यसनसूचकैः| शब्दैः श्रवणसंयोगो मिथ्यासंयोग उच्यते||११९|| असंस्पर्शोऽतिसंस्पर्शो हीनसंस्पर्श एव च| स्पृश्यानां सङ्ग्रहेणोक्तः स्पर्शनेन्द्रियबाधकः||१२०|| यो भूतविषवातानामकालेनागतश्च यः| स्नेहशीतोष्णसंस्पर्शो मिथ्यायोग स उच्यते||१२१|| रूपाणां भास्वतां दृष्टिर्विनश्यत्यतिदर्शनात्| दर्शनाच्चातिसूक्ष्माणां सर्वशश्चाप्यदर्शनात्||१२२|| द्विष्टभैरवबीभत्सदूरातिश्लिष्टदर्शनात् | तामसानां च रूपाणां मिथ्यासंयोग उच्यते||१२३|| अत्यादानमनादानमोकसात्म्यादिभिश्च यत्| रसानां विषमादानमल्पादानं च दूषणम्||१२४|| अतिमृद्वतितीक्ष्णानां गन्धानामुपसेवनम्| असेवनं सर्वशश्च घ्राणेन्द्रियविनाशनम्||१२५|| पूतिभूतविषद्विष्टा गन्धा ये चाप्यनार्तवाः| तैर्गन्धैर्घ्राणसंयोगो मिथ्यायोगः स उच्यते||१२६|| इत्यसात्म्यार्थसंयोगस्त्रिविधो दोषकोपनः|१२७|

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Adhikarana 61 (127) · Śloka 127

অসাত্ম্যমিতি তদ্বিদ্যাদ্যন্ন যাতি সহাত্মতাম্||১২৭||

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असात्म्यमिति तद्विद्याद्यन्न याति सहात्मताम्||१२७||

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Adhikarana 62 (128) · Śloka 128

মিথ্যাতিহীনযোগেভ্যো যো ব্যাধিরুপজাযতে| শব্দাদীনাং স বিজ্ঞেযো ব্যাধিরৈন্দ্রিযকো বুধৈঃ||১২৮||

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मिथ्यातिहीनयोगेभ्यो यो व्याधिरुपजायते| शब्दादीनां स विज्ञेयो व्याधिरैन्द्रियको बुधैः||१२८||

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Adhikarana 63 (129) · Śloka 129

বেদনানামশান্তানামিত্যেতে হেতবঃ স্মৃতাঃ| সুখহেতুঃ সমস্ত্বেকঃ সমযোগঃ সুদুর্লভঃ||১২৯||

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वेदनानामशान्तानामित्येते हेतवः स्मृताः| सुखहेतुः समस्त्वेकः समयोगः सुदुर्लभः||१२९||

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Adhikarana 64 (130-131) · Śloka 131

নেন্দ্রিযাণি ন চৈবার্থাঃ সুখদুঃখস্য হেতবঃ| হেতুস্তু সুখদুঃখস্য যোগো দৃষ্টশ্চতুর্বিধঃ||১৩০|| সন্তীন্দ্রিযাণি সন্ত্যর্থা যোগো ন চ ন চাস্তি রুক্| ন সুখং, কারণং তস্মাদ্যোগ এব চতুর্বধঃ||১৩১||

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नेन्द्रियाणि न चैवार्थाः सुखदुःखस्य हेतवः| हेतुस्तु सुखदुःखस्य योगो दृष्टश्चतुर्विधः||१३०|| सन्तीन्द्रियाणि सन्त्यर्था योगो न च न चास्ति रुक्| न सुखं, कारणं तस्माद्योग एव चतुर्वधः||१३१||

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Adhikarana 65 (132) · Śloka 132

নাত্মেন্দ্রিযং মনো বুদ্ধিং গোচরং কর্ম বা বিনা| সুখদুঃখং, যথা যচ্চ বোদ্ধব্যং তত্তথোচ্যতে||১৩২||

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नात्मेन्द्रियं मनो बुद्धिं गोचरं कर्म वा विना| सुखदुःखं, यथा यच्च बोद्धव्यं तत्तथोच्यते||१३२||

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Adhikarana 66 (133) · Śloka 133

স্পর্শনেন্দ্রিযসংস্পর্শঃ স্পর্শো মানস এব চ| দ্বিবিধঃ সুখদুঃখানাং বেদনানাং প্রবর্তকঃ||১৩৩||

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स्पर्शनेन्द्रियसंस्पर्शः स्पर्शो मानस एव च| द्विविधः सुखदुःखानां वेदनानां प्रवर्तकः||१३३||

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Adhikarana 67 (134-135) · Śloka 135

ইচ্ছাদ্বেষাত্মিকা তৃষ্ণা সুখদুঃখাত্ প্রবর্ততে| তৃষ্ণা চ সুখদুঃখানাং কারণং পুনরুচ্যতে||১৩৪|| উপাদত্তে হি সা ভাবান্ বেদনাশ্রযসঞ্জ্ঞকান্| স্পৃশ্যতে নানুপাদানে নাস্পৃষ্টো বেত্তি বেদনাঃ||১৩৫||

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इच्छाद्वेषात्मिका तृष्णा सुखदुःखात् प्रवर्तते| तृष्णा च सुखदुःखानां कारणं पुनरुच्यते||१३४|| उपादत्ते हि सा भावान् वेदनाश्रयसञ्ज्ञकान्| स्पृश्यते नानुपादाने नास्पृष्टो वेत्ति वेदनाः||१३५||

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Adhikarana 68 (136) · Śloka 136

বেদনানামধিষ্ঠানং মনো দেহশ্চ সেন্দ্রিযঃ| কেশলোমনখাগ্রান্নমলদ্রবগুণৈর্বিনা||১৩৬||

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वेदनानामधिष्ठानं मनो देहश्च सेन्द्रियः| केशलोमनखाग्रान्नमलद्रवगुणैर्विना||१३६||

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Adhikarana 69 (137) · Śloka 137

যোগে মোক্ষে চ সর্বাসাং বেদনানামবর্তনম্| মোক্ষে নিবৃত্তির্নিঃশেষা যোগো মোক্ষপ্রবর্তকঃ||১৩৭||

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योगे मोक्षे च सर्वासां वेदनानामवर्तनम्| मोक्षे निवृत्तिर्निःशेषा योगो मोक्षप्रवर्तकः||१३७||

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Adhikarana 70 (138-139) · Śloka 139

আত্মেন্দ্রিযমনোর্থানাং সন্নিকর্ষাত্ প্রবর্ততে| সুখদুঃখমনারম্ভাদাত্মস্থে মনসি স্থিরে||১৩৮|| নিবর্ততে তদুভযং বশিত্বং চোপজাযতে| সশরীরস্য যোগজ্ঞাস্তং যোগমৃষযো বিদুঃ||১৩৯||

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आत्मेन्द्रियमनोर्थानां सन्निकर्षात् प्रवर्तते| सुखदुःखमनारम्भादात्मस्थे मनसि स्थिरे||१३८|| निवर्तते तदुभयं वशित्वं चोपजायते| सशरीरस्य योगज्ञास्तं योगमृषयो विदुः||१३९||

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Adhikarana 71 (140-141) · Śloka 141

আবেশশ্চেতসো জ্ঞানমর্থানাং ছন্দতঃ ক্রিযা| দৃষ্টিঃ শ্রোত্রং স্মৃতিঃ কান্তিরিষ্টতশ্চাপ্যদর্শনম্||১৪০|| ইত্যষ্টবিধমাখ্যাতং যোগিনাং বলমৈশ্বরম্| শুদ্ধসত্ত্বসমাধানাত্তত্ সর্বমুপজাযতে||১৪১||

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आवेशश्चेतसो ज्ञानमर्थानां छन्दतः क्रिया| दृष्टिः श्रोत्रं स्मृतिः कान्तिरिष्टतश्चाप्यदर्शनम्||१४०|| इत्यष्टविधमाख्यातं योगिनां बलमैश्वरम्| शुद्धसत्त्वसमाधानात्तत् सर्वमुपजायते||१४१||

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Adhikarana 72 (142) · Śloka 142

মোক্ষো রজস্তমোঽভাবাত্ বলবত্কর্মসঙ্ক্ষযাত্| বিযোগঃ সর্বসংযোগৈরপুনর্ভব উচ্যতে||১৪২||

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मोक्षो रजस्तमोऽभावात् बलवत्कर्मसङ्क्षयात्| वियोगः सर्वसंयोगैरपुनर्भव उच्यते||१४२||

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Adhikarana 73 (143-146) · Śloka 146

সতামুপাসনং সম্যগসতাং পরিবর্জনম্| ব্রতচর্যোপবাসৌ চ নিযমাশ্চ পৃথগ্বিধাঃ||১৪৩|| ধারণং ধর্মশাস্ত্রাণাং বিজ্ঞানং বিজনে রতিঃ| বিষযেষ্বরতির্মোক্ষে ব্যবসাযঃ পরা ধৃতিঃ||১৪৪|| কর্মণামসমারম্ভঃ কৃতানাং চ পরিক্ষযঃ| নৈষ্ক্রম্যমনহঙ্কারঃ সংযোগে ভযদর্শনম্||১৪৫|| মনোবুদ্ধিসমাধানমর্থতত্ত্বপরীক্ষণম্| তত্ত্বস্মৃতেরুপস্থানাত্ সর্বমেতত্ প্রবর্ততে||১৪৬||

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सतामुपासनं सम्यगसतां परिवर्जनम्| व्रतचर्योपवासौ च नियमाश्च पृथग्विधाः||१४३|| धारणं धर्मशास्त्राणां विज्ञानं विजने रतिः| विषयेष्वरतिर्मोक्षे व्यवसायः परा धृतिः||१४४|| कर्मणामसमारम्भः कृतानां च परिक्षयः| नैष्क्रम्यमनहङ्कारः संयोगे भयदर्शनम्||१४५|| मनोबुद्धिसमाधानमर्थतत्त्वपरीक्षणम्| तत्त्वस्मृतेरुपस्थानात् सर्वमेतत् प्रवर्तते||१४६||

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Adhikarana 74 (147) · Śloka 147

স্মৃতিঃ সত্সেবনাদ্যৈশ্চ ধৃত্যন্তৈরুপজাযতে| স্মৃত্বা স্বভাবং ভাবানাং স্মরন্ দুঃখাত্ প্রমুচ্যতে||১৪৭||

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स्मृतिः सत्सेवनाद्यैश्च धृत्यन्तैरुपजायते| स्मृत्वा स्वभावं भावानां स्मरन् दुःखात् प्रमुच्यते||१४७||

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Adhikarana 75 (148-149) · Śloka 149

বক্ষ্যন্তে কারণান্যষ্টৌ স্মৃতির্যৈরুপজাযতে| নিমিত্তরূপগ্রহণাত্ সাদৃশ্যাত্ সবিপর্যযাত্||১৪৮|| সত্ত্বানুবন্ধাদভ্যাসাজ্জ্ঞানযোগাত্ পুনঃ শ্রুতাত্| দৃষ্টশ্রুতানুভূতানাং স্মারণাত্ স্মৃতিরুচ্যতে||১৪৯||

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वक्ष्यन्ते कारणान्यष्टौ स्मृतिर्यैरुपजायते| निमित्तरूपग्रहणात् सादृश्यात् सविपर्ययात्||१४८|| सत्त्वानुबन्धादभ्यासाज्ज्ञानयोगात् पुनः श्रुतात्| दृष्टश्रुतानुभूतानां स्मारणात् स्मृतिरुच्यते||१४९||

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Adhikarana 76 (150-151) · Śloka 151

এতত্তদেকমযনং মুক্তৈর্মোক্ষস্য দর্শিতম্| তত্ত্বস্মৃতিবলং, যেন গতা ন পুনরাগতাঃ||১৫০|| অযনং পুনরাখ্যাতমেতদ্যোগস্য যোগিভিঃ| সঙ্খ্যাতধর্মৈঃ সাঙ্খ্যৈশ্চ মুক্তৈর্মোক্ষস্য চাযনম্||১৫১||

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एतत्तदेकमयनं मुक्तैर्मोक्षस्य दर्शितम्| तत्त्वस्मृतिबलं, येन गता न पुनरागताः||१५०|| अयनं पुनराख्यातमेतद्योगस्य योगिभिः| सङ्ख्यातधर्मैः साङ्ख्यैश्च मुक्तैर्मोक्षस्य चायनम्||१५१||

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Adhikarana 77 (152-153) · Śloka 153

সর্বং কারণবদ্দুঃখমস্বং চানিত্যমেব চ| ন চাত্মকৃতকং তদ্ধি তত্র চোত্পদ্যতে স্বতা||১৫২|| যাবন্নোত্পদ্যতে সত্যা বুদ্ধির্নৈতদহং যযা| নৈতন্মমেতি বিজ্ঞায জ্ঞঃ সর্বমতিবর্ততে||১৫৩||

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सर्वं कारणवद्दुःखमस्वं चानित्यमेव च| न चात्मकृतकं तद्धि तत्र चोत्पद्यते स्वता||१५२|| यावन्नोत्पद्यते सत्या बुद्धिर्नैतदहं यया| नैतन्ममेति विज्ञाय ज्ञः सर्वमतिवर्तते||१५३||

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Adhikarana 78 (154) · Śloka 154

তস্মিংশ্চরমসন্ন্যাসে সমূলাঃ সর্ববেদনাঃ| সসঞ্জ্ঞাজ্ঞানবিজ্ঞানা নিবৃত্তিং যান্ত্যশেষতঃ||১৫৪||

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तस्मिंश्चरमसन्न्यासे समूलाः सर्ववेदनाः| ससञ्ज्ञाज्ञानविज्ञाना निवृत्तिं यान्त्यशेषतः||१५४||

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Adhikarana 79 (155) · Śloka 155

অতঃ পরং ব্রহ্মভূতো ভূতাত্মা নোপলভ্যতে| নিঃসৃতঃ সর্বভাবেভ্যশ্চিহ্নং যস্য ন বিদ্যতে| জ্ঞানং ব্রহ্মবিদাং চাত্র নাজ্ঞস্তজ্জ্ঞাতুমর্হতি||১৫৫||

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अतः परं ब्रह्मभूतो भूतात्मा नोपलभ्यते| निःसृतः सर्वभावेभ्यश्चिह्नं यस्य न विद्यते| ज्ञानं ब्रह्मविदां चात्र नाज्ञस्तज्ज्ञातुमर्हति||१५५||

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Adhikarana 80 (156) · Śloka 156

তত্র শ্লোকঃ- প্রশ্নাঃ পুরুষমাশ্রিত্য ত্রযোবিংশতিরুত্তমাঃ| কতিধাপুরুষীযেঽস্মিন্নির্ণীতাস্তত্ত্বদর্শিনা||১৫৬||

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तत्र श्लोकः- प्रश्नाः पुरुषमाश्रित्य त्रयोविंशतिरुत्तमाः| कतिधापुरुषीयेऽस्मिन्निर्णीतास्तत्त्वदर्शिना||१५६||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 1

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শারীরস্থানে কতিধাপুরুষীযং শারীরং নাম প্রথমোঽধ্যাযঃ||১||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने कतिधापुरुषीयं शारीरं नाम प्रथमोऽध्यायः||१||

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