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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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2. atulyagōtrīyaśārīram

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতোঽতুল্যগোত্রীযং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातोऽतुल्यगोत्रीयं शारीरं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

অতুল্যগোত্রস্য রজঃক্ষযান্তে রহোবিসৃষ্টং মিথুনীকৃতস্য| কিং স্যাচ্চতুষ্পাত্প্রভবং চ ষড্ভ্যো যত্ স্ত্রীষু গর্ভত্বমুপৈতি পুংসঃ||৩||

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अतुल्यगोत्रस्य रजःक्षयान्ते रहोविसृष्टं मिथुनीकृतस्य| किं स्याच्चतुष्पात्प्रभवं च षड्भ्यो यत् स्त्रीषु गर्भत्वमुपैति पुंसः||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

শুক্রং তদস্য প্রবদন্তি ধীরা যদ্ধীযতে গর্ভসমুদ্ভবায| বায্বগ্নিভূম্যব্গুণপাদবত্তত্ ষড্ভ্যো রসেভ্যঃ প্রভবশ্চ তস্য||৪||

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शुक्रं तदस्य प्रवदन्ति धीरा यद्धीयते गर्भसमुद्भवाय| वाय्वग्निभूम्यब्गुणपादवत्तत् षड्भ्यो रसेभ्यः प्रभवश्च तस्य||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

সম্পূর্ণদেহঃ সমযে সুখং চ গর্ভঃ কথং কেন চ জাযতে স্ত্রী| গর্ভং চিরাদ্বিন্দতি সপ্রজাঽপি ভূত্বাঽথবা নশ্যতি কেন গর্ভঃ||৫||

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सम्पूर्णदेहः समये सुखं च गर्भः कथं केन च जायते स्त्री| गर्भं चिराद्विन्दति सप्रजाऽपि भूत्वाऽथवा नश्यति केन गर्भः||५||

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Adhikarana 5 (6-10) · Śloka 10

শুক্রাসৃগাত্মাশযকালসম্পদ্ যস্যোপচারশ্চ হিতৈস্তথাঽন্নৈঃ | গর্ভশ্চ কালে চ সুখী সুখং চ সঞ্জাযতে সম্পরিপূর্ণদেহঃ||৬|| যোনিপ্রদোষান্মনসোঽভিতাপাচ্ছুক্রাসৃগাহারবিহারদোষাত্| অকালযোগাদ্বলসঙ্ক্ষযাচ্চ গর্ভং চিরাদ্বিন্দতি সপ্রজাঽপি||৭|| অসৃঙ্গিরুদ্ধং পবনেন নার্যা গর্ভং ব্যবস্যন্ত্যবুধাঃ কদাচিত্| গর্ভস্য রূপং হি করোতি তস্যাস্তদসৃগস্রবি বিবর্ধমানম্||৮|| তদগ্নিসূর্যশ্রমশোকরোগৈরূষ্ণান্নপানৈরথবা প্রবৃত্তম্| দৃষ্ট্বাঽসৃগেকং ন চ গর্ভসঞ্জ্ঞং কেচিন্নরা ভূতহৃতং বদন্তি||৯|| ওজোশনানাং রজনীচরাণামাহারহেতোর্ন শরীরমিষ্টম্| গর্ভং হরেযুর্যদি তে ন মাতুর্লব্ধাবকাশা ন হরেযুরোজঃ||১০||

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शुक्रासृगात्माशयकालसम्पद् यस्योपचारश्च हितैस्तथाऽन्नैः | गर्भश्च काले च सुखी सुखं च सञ्जायते सम्परिपूर्णदेहः||६|| योनिप्रदोषान्मनसोऽभितापाच्छुक्रासृगाहारविहारदोषात्| अकालयोगाद्बलसङ्क्षयाच्च गर्भं चिराद्विन्दति सप्रजाऽपि||७|| असृङ्गिरुद्धं पवनेन नार्या गर्भं व्यवस्यन्त्यबुधाः कदाचित्| गर्भस्य रूपं हि करोति तस्यास्तदसृगस्रवि विवर्धमानम्||८|| तदग्निसूर्यश्रमशोकरोगैरूष्णान्नपानैरथवा प्रवृत्तम्| दृष्ट्वाऽसृगेकं न च गर्भसञ्ज्ञं केचिन्नरा भूतहृतं वदन्ति||९|| ओजोशनानां रजनीचराणामाहारहेतोर्न शरीरमिष्टम्| गर्भं हरेयुर्यदि ते न मातुर्लब्धावकाशा न हरेयुरोजः||१०||

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Adhikarana 6 (11) · Śloka 11

কন্যাং সুতং বা সহিতৌ পৃথগ্বা সুতৌ সুতে বা তনযান্ বহূন্ বা| কস্মাত্ প্রসূতে সুচিরেণ গর্ভমেকোঽভিবৃদ্ধিং চ যমেঽভ্যুপৈতি||১১||

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कन्यां सुतं वा सहितौ पृथग्वा सुतौ सुते वा तनयान् बहून् वा| कस्मात् प्रसूते सुचिरेण गर्भमेकोऽभिवृद्धिं च यमेऽभ्युपैति||११||

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Adhikarana 7 (12-16) · Śloka 16

রক্তেন কন্যামধিকেন পুত্রং শুক্রেণ তেন দ্বিবিধীকৃতেন| বীজেন কন্যাং চ সুতং চ সূতে যথাস্ববীজান্যতরাধিকেন||১২|| শুক্রাধিকং দ্বৈধমুপৈতি বীজং যস্যাঃ সুতৌ সা সহিতৌ প্রসূতে| রক্তাধিকং বা যদি ভেদমেতি দ্বিধা সুতে সা সহিতে প্রসূতে||১৩|| ভিনত্তি যাবদ্বহুধা প্রপন্নঃ শুক্রার্তবং বাযুরতিপ্রবৃদ্ধঃ| তাবন্ত্যপত্যানি যথাবিভাগং কর্মাত্মকান্যস্ববশাত্ প্রসূতে||১৪|| আহারমাপ্নোতি যদা ন গর্ভঃ শোষং সমাপ্নোতি পরিস্রুতিং বা| তং স্ত্রী প্রসূতে সুচিরেণ গর্ভং পুষ্টো যদা বর্ষগণৈরপি স্যাত্||১৫|| কর্মাত্মকত্বাদ্বিষমাংশভেদাচ্ছুক্রাসৃজোর্বৃদ্ধিমুপৈতি কুক্ষৌ| একোঽধিকো ন্যূনতরো দ্বিতীয এবং যমেঽপ্যভ্যধিকো বিশেষঃ||১৬||

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रक्तेन कन्यामधिकेन पुत्रं शुक्रेण तेन द्विविधीकृतेन| बीजेन कन्यां च सुतं च सूते यथास्वबीजान्यतराधिकेन||१२|| शुक्राधिकं द्वैधमुपैति बीजं यस्याः सुतौ सा सहितौ प्रसूते| रक्ताधिकं वा यदि भेदमेति द्विधा सुते सा सहिते प्रसूते||१३|| भिनत्ति यावद्बहुधा प्रपन्नः शुक्रार्तवं वायुरतिप्रवृद्धः| तावन्त्यपत्यानि यथाविभागं कर्मात्मकान्यस्ववशात् प्रसूते||१४|| आहारमाप्नोति यदा न गर्भः शोषं समाप्नोति परिस्रुतिं वा| तं स्त्री प्रसूते सुचिरेण गर्भं पुष्टो यदा वर्षगणैरपि स्यात्||१५|| कर्मात्मकत्वाद्विषमांशभेदाच्छुक्रासृजोर्वृद्धिमुपैति कुक्षौ| एकोऽधिको न्यूनतरो द्वितीय एवं यमेऽप्यभ्यधिको विशेषः||१६||

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Adhikarana 8 (17) · Śloka 17

কস্মাদ্দ্বিরেতাঃ পবনেন্দ্রিযো বা সংস্কারবাহী নরনারিষণ্ডৌ| বক্রী তথের্ষ্যাভিরতিঃ কথং বা সঞ্জাযতে বাতিকষণ্ডকো বা||১৭||

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कस्माद्द्विरेताः पवनेन्द्रियो वा संस्कारवाही नरनारिषण्डौ| वक्री तथेर्ष्याभिरतिः कथं वा सञ्जायते वातिकषण्डको वा||१७||

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Adhikarana 9 (18-21) · Śloka 21

বীজাত্ সমাংশাদুপতপ্তবীজাত্ স্ত্রীপুংসলিঙ্গী ভবতি দ্বিরেতাঃ| শুক্রাশযং গর্ভগতস্য হত্বা করোতি বাযুঃ পবনেন্দ্রিযত্বম্||১৮|| শুক্রাশযদ্বারবিঘট্টনেন সংস্কারবাহং কুরুতেঽনিলশ্চ| মন্দাল্পবীজাববলাবহর্ষৌ ক্লীবৌ চ হেতুর্বিকৃতিদ্বযস্য||১৯|| মাতুর্ব্যবাযপ্রতিঘেন বক্রী স্যাদ্বীজদৌর্বল্যতযা পিতুশ্চ| ঈর্ষ্যাভিভূতাবপি মন্দহর্ষাবীর্ষ্যারতেরেব বদন্তি হেতুম্||২০|| বায্বগ্নিদোষাদ্বৃষণৌ তু যস্য নাশং গতৌ বাতিকষণ্ডকঃ সঃ| ইত্যেবমষ্টৌ বিকৃতিপ্রকারাঃ কর্মাত্মকানামুপলক্ষণীযাঃ||২১||

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बीजात् समांशादुपतप्तबीजात् स्त्रीपुंसलिङ्गी भवति द्विरेताः| शुक्राशयं गर्भगतस्य हत्वा करोति वायुः पवनेन्द्रियत्वम्||१८|| शुक्राशयद्वारविघट्टनेन संस्कारवाहं कुरुतेऽनिलश्च| मन्दाल्पबीजावबलावहर्षौ क्लीबौ च हेतुर्विकृतिद्वयस्य||१९|| मातुर्व्यवायप्रतिघेन वक्री स्याद्बीजदौर्बल्यतया पितुश्च| ईर्ष्याभिभूतावपि मन्दहर्षावीर्ष्यारतेरेव वदन्ति हेतुम्||२०|| वाय्वग्निदोषाद्वृषणौ तु यस्य नाशं गतौ वातिकषण्डकः सः| इत्येवमष्टौ विकृतिप्रकाराः कर्मात्मकानामुपलक्षणीयाः||२१||

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Adhikarana 10 (22) · Śloka 22

গর্ভস্য সদ্যোঽনুগতস্য কুক্ষৌ স্ত্রীপুন্নপুংসামুদরস্থিতানাম্| কিং লক্ষণং? কারণমিষ্যতে কিং সরূপতাং যেন চ যাত্যপত্যম্||২২||

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गर्भस्य सद्योऽनुगतस्य कुक्षौ स्त्रीपुन्नपुंसामुदरस्थितानाम्| किं लक्षणं? कारणमिष्यते किं सरूपतां येन च यात्यपत्यम्||२२||

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Adhikarana 11 (23-27) · Śloka 27

নিষ্ঠীবিকা গৌরবমঙ্গসাদস্তন্দ্রাপ্রহর্ষৌ হৃদযে ব্যথা চ| তৃপ্তিশ্চ বীজগ্রহণং চ যোন্যাং গর্ভস্য সদ্যোঽনুগতস্য লিঙ্গম্||২৩|| সব্যাঙ্গচেষ্টা পুরুষার্থিনী স্ত্রী স্ত্রীস্বপ্নপানাশনশীলচেষ্টা| সব্যাত্তগর্ভা ন চ বৃত্তগর্ভা সব্যপ্রদুগ্ধা স্ত্রিযমেব সূতে||২৪|| পুত্রং ত্বতো লিঙ্গবিপর্যযেণ ব্যামিশ্রলিঙ্গা প্রকৃতিং তৃতীযাম্| গর্ভোপপত্তৌ তু মনঃ স্ত্রিযা যং জন্তুং ব্রজেত্তত্সদৃশং প্রসূতে||২৫|| গর্ভস্য চত্বারি চতুর্বিধানি ভূতানি মাতাপিতৃসম্ভবানি| আহারজান্যাত্মকৃতানি চৈব সর্বস্য সর্বাণি ভবন্তি দেহে||২৬|| তেষাং বিশেষাদ্বলবন্তি যানি ভবন্তি মাতাপিতৃকর্মজানি| তানি ব্যবস্যেত্ সদৃশত্বহেতুং সত্ত্বং যথানূকমপি ব্যবস্যেত্||২৭||

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निष्ठीविका गौरवमङ्गसादस्तन्द्राप्रहर्षौ हृदये व्यथा च| तृप्तिश्च बीजग्रहणं च योन्यां गर्भस्य सद्योऽनुगतस्य लिङ्गम्||२३|| सव्याङ्गचेष्टा पुरुषार्थिनी स्त्री स्त्रीस्वप्नपानाशनशीलचेष्टा| सव्यात्तगर्भा न च वृत्तगर्भा सव्यप्रदुग्धा स्त्रियमेव सूते||२४|| पुत्रं त्वतो लिङ्गविपर्ययेण व्यामिश्रलिङ्गा प्रकृतिं तृतीयाम्| गर्भोपपत्तौ तु मनः स्त्रिया यं जन्तुं व्रजेत्तत्सदृशं प्रसूते||२५|| गर्भस्य चत्वारि चतुर्विधानि भूतानि मातापितृसम्भवानि| आहारजान्यात्मकृतानि चैव सर्वस्य सर्वाणि भवन्ति देहे||२६|| तेषां विशेषाद्बलवन्ति यानि भवन्ति मातापितृकर्मजानि| तानि व्यवस्येत् सदृशत्वहेतुं सत्त्वं यथानूकमपि व्यवस्येत्||२७||

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Adhikarana 12 (28) · Śloka 28

কস্মাত্ প্রজাং স্ত্রী বিকৃতাং প্রসূতে হীনাধিকাঙ্গীং বিকলেন্দ্রিযাং বা| দেহাত্ কথং দেহমুপৈতি চান্যমাত্মা সদা কৈরনুবধ্যতে চ||২৮||

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कस्मात् प्रजां स्त्री विकृतां प्रसूते हीनाधिकाङ्गीं विकलेन्द्रियां वा| देहात् कथं देहमुपैति चान्यमात्मा सदा कैरनुबध्यते च||२८||

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Adhikarana 13 (29-30) · Śloka 30

বীজাত্মকর্মাশযকালদোষৈর্মাতুস্তথাঽঽহারবিহারদোষৈঃ| কুর্বন্তি দোষা বিবিধানি দুষ্টাঃ সংস্থানবর্ণেন্দ্রিযবৈকৃতানি||২৯|| বর্ষাসু কাষ্টাশ্মঘনাম্বুবেগাস্তরোঃ সরিত্স্রোতসি সংস্থিতস্য| যথৈব কুর্যুর্বিকৃতিং তথৈব গর্ভস্য কুক্ষৌ নিযতস্য দোষাঃ||৩০||

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बीजात्मकर्माशयकालदोषैर्मातुस्तथाऽऽहारविहारदोषैः| कुर्वन्ति दोषा विविधानि दुष्टाः संस्थानवर्णेन्द्रियवैकृतानि||२९|| वर्षासु काष्टाश्मघनाम्बुवेगास्तरोः सरित्स्रोतसि संस्थितस्य| यथैव कुर्युर्विकृतिं तथैव गर्भस्य कुक्षौ नियतस्य दोषाः||३०||

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Adhikarana 14 (31-36) · Śloka 36

ভূতৈশ্চতুর্ভিঃ সহিতঃ সুসূক্ষ্মৈর্মনোজবো দেহমুপৈতি দেহাত্| কর্মাত্মকত্বান্ন তু তস্য দৃশ্যং দিব্যং বিনা দর্শনমস্তি রূপম্||৩১|| স সর্বগঃ সর্বশরীরভৃচ্চ স বিশ্বকর্মা স চ বিশ্বরূপঃ| স চেতনাধাতুরতীন্দ্রিযশ্চ স নিত্যযুক্ সানুশযঃ স এব ||৩২|| রসাত্মমাতাপিতৃসম্ভবানি ভূতানি বিদ্যাদ্দশ ষট্ চ দেহে| চত্বারি তত্রাত্মনি সংশ্রিতানি স্থিতস্তথাঽঽত্মা চ চতুর্ষু তেষু||৩৩|| ভূতানি মাতাপিতৃসম্ভবানি রজশ্চ শুক্রং চ বদন্তি গর্ভে| আপ্যায্যতে শুক্রমসৃক্ চ ভূতৈর্যৈস্তানি ভূতানি রসোদ্ভবানি||৩৪|| ভূতানি চত্বারি তু কর্মজানি যান্যাত্মলীনানি বিশন্তি গর্ভম্| স বীজধর্মা হ্যপরাপরাণি দেহান্তরাণ্যাত্মনি যাতি যাতি||৩৫|| রূপাদ্ধি রূপপ্রভবঃ প্রসিদ্ধঃ কর্মাত্মকানাং মনসো মনস্তঃ| ভবন্তি যে ত্বাকৃতিবুদ্ধিভেদারজস্তমস্তত্র চ কর্ম হেতুঃ||৩৬||

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भूतैश्चतुर्भिः सहितः सुसूक्ष्मैर्मनोजवो देहमुपैति देहात्| कर्मात्मकत्वान्न तु तस्य दृश्यं दिव्यं विना दर्शनमस्ति रूपम्||३१|| स सर्वगः सर्वशरीरभृच्च स विश्वकर्मा स च विश्वरूपः| स चेतनाधातुरतीन्द्रियश्च स नित्ययुक् सानुशयः स एव ||३२|| रसात्ममातापितृसम्भवानि भूतानि विद्याद्दश षट् च देहे| चत्वारि तत्रात्मनि संश्रितानि स्थितस्तथाऽऽत्मा च चतुर्षु तेषु||३३|| भूतानि मातापितृसम्भवानि रजश्च शुक्रं च वदन्ति गर्भे| आप्याय्यते शुक्रमसृक् च भूतैर्यैस्तानि भूतानि रसोद्भवानि||३४|| भूतानि चत्वारि तु कर्मजानि यान्यात्मलीनानि विशन्ति गर्भम्| स बीजधर्मा ह्यपरापराणि देहान्तराण्यात्मनि याति याति||३५|| रूपाद्धि रूपप्रभवः प्रसिद्धः कर्मात्मकानां मनसो मनस्तः| भवन्ति ये त्वाकृतिबुद्धिभेदारजस्तमस्तत्र च कर्म हेतुः||३६||

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Adhikarana 15 (37-38) · Śloka 38

অতীন্দ্রিযৈস্তৈরতিসূক্ষ্মরূপৈরাত্মা কদাচিন্ন বিযুক্তরূপঃ| ন কর্মণা নৈব মনোমতিভ্যাং ন চাপ্যহঙ্কারবিকারদোষৈঃ||৩৭|| রজস্তমোভ্যাং হি মনোঽনুবদ্ধং জ্ঞানং বিনা তত্র হি সর্বদোষাঃ| গতিপ্রবৃত্ত্যোস্তু নিমিত্তমুক্তং মনঃ সদোষং বলবচ্চ কর্ম||৩৮||

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अतीन्द्रियैस्तैरतिसूक्ष्मरूपैरात्मा कदाचिन्न वियुक्तरूपः| न कर्मणा नैव मनोमतिभ्यां न चाप्यहङ्कारविकारदोषैः||३७|| रजस्तमोभ्यां हि मनोऽनुबद्धं ज्ञानं विना तत्र हि सर्वदोषाः| गतिप्रवृत्त्योस्तु निमित्तमुक्तं मनः सदोषं बलवच्च कर्म||३८||

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Adhikarana 16 (39) · Śloka 39

রোগাঃ কুতঃ সংশমনং কিমেষাং হর্ষস্য শোকস্য চ কিং নিমিত্তম্| শরীরসত্ত্বপ্রভবা বিকারাঃ কথং ন শান্তাঃ পুনরাপতেযুঃ||৩৯||

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रोगाः कुतः संशमनं किमेषां हर्षस्य शोकस्य च किं निमित्तम्| शरीरसत्त्वप्रभवा विकाराः कथं न शान्ताः पुनरापतेयुः||३९||

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Adhikarana 17 (40) · Śloka 40

প্রজ্ঞাপরাধো বিষমাস্তথাঽর্থা হেতুস্তৃতীযঃ পরিণামকালঃ| সর্বামযানাং ত্রিবিধা চ শান্তির্জ্ঞানার্থকালাঃ সমযোগযুক্তাঃ||৪০||

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प्रज्ञापराधो विषमास्तथाऽर्था हेतुस्तृतीयः परिणामकालः| सर्वामयानां त्रिविधा च शान्तिर्ज्ञानार्थकालाः समयोगयुक्ताः||४०||

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Adhikarana 18 (41) · Śloka 41

ধর্ম্যাঃ ক্রিযা হর্ষনিমিত্তমুক্তাস্ততোঽন্যথা শোকবশং নযন্তি| শরীরসত্ত্বপ্রভবাস্তু রোগাস্তযোরবৃত্ত্যা ন ভবন্তি ভূযঃ||৪১||

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धर्म्याः क्रिया हर्षनिमित्तमुक्तास्ततोऽन्यथा शोकवशं नयन्ति| शरीरसत्त्वप्रभवास्तु रोगास्तयोरवृत्त्या न भवन्ति भूयः||४१||

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Adhikarana 19 (42) · Śloka 42

রূপস্য সত্ত্বস্য চ সন্ততির্যা নোক্তস্তদাদির্নহি সোঽস্তি কশ্চিত্| তযোরবৃত্তিঃ ক্রিযতে পরাভ্যাং ধৃতিস্মৃতিভ্যাং পরযা ধিযা চ||৪২||

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रूपस्य सत्त्वस्य च सन्ततिर्या नोक्तस्तदादिर्नहि सोऽस्ति कश्चित्| तयोरवृत्तिः क्रियते पराभ्यां धृतिस्मृतिभ्यां परया धिया च||४२||

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Adhikarana 20 (43) · Śloka 43

সত্যাশ্রযে বা দ্বিবিধে যথোক্তে পূর্বং গদেভ্যঃ প্রতিকর্ম নিত্যম্| জিতেন্দ্রিযং নানুপতন্তি রোগাস্তত্কালযুক্তং যদি নাস্তি দৈবম্||৪৩||

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सत्याश्रये वा द्विविधे यथोक्ते पूर्वं गदेभ्यः प्रतिकर्म नित्यम्| जितेन्द्रियं नानुपतन्ति रोगास्तत्कालयुक्तं यदि नास्ति दैवम्||४३||

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Adhikarana 21 (44) · Śloka 44

দৈবং পুরা যত্ কৃতমুচ্যতে তত্ তত্ পৌরুষং যত্ত্বিহ কর্ম দৃষ্টম্| প্রবৃত্তিহেতুর্বিষমঃ স দৃষ্টো নিবৃত্তিহেতুর্হি সমঃ স এব||৪৪||

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दैवं पुरा यत् कृतमुच्यते तत् तत् पौरुषं यत्त्विह कर्म दृष्टम्| प्रवृत्तिहेतुर्विषमः स दृष्टो निवृत्तिहेतुर्हि समः स एव||४४||

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Adhikarana 22 (45) · Śloka 45

হৈমন্তিকং দোষচযং বসন্তে প্রবাহযন্ গ্রৈষ্মিকমভ্রকালে| ঘনাত্যযে বার্ষিকমাশু সম্যক্ প্রাপ্নোতি রোগানৃতুজান্ন জাতু ||৪৫||

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हैमन्तिकं दोषचयं वसन्ते प्रवाहयन् ग्रैष्मिकमभ्रकाले| घनात्यये वार्षिकमाशु सम्यक् प्राप्नोति रोगानृतुजान्न जातु ||४५||

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Adhikarana 23 (46-48) · Śloka 48

নরো হিতাহারবিহারসেবী সমীক্ষ্যকারী বিষযেষ্বসক্তঃ| দাতা সমঃ সত্যপরঃ ক্ষমাবানাপ্তোপসেবী চ ভবত্যরোগঃ||৪৬|| মতির্বচঃ কর্ম সুখানুবন্ধং সত্ত্বং বিধেযং বিশদা চ বুদ্ধিঃ| জ্ঞানং তপস্তত্পরতা চ যোগে যস্যাস্তি তং নানুপতন্তি রোগাঃ||৪৭|| তত্র শ্লোকঃ| ইহাগ্নিবেশস্য মহার্থযুক্তং ষট্ত্রিংশকং প্রশ্নগণং মহর্ষিঃ| অতুল্যগোত্রে ভগবান্ যথাবন্নির্ণীতবান্ জ্ঞানবিবর্ধনার্থম্||৪৮||

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नरो हिताहारविहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्तः| दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः||४६|| मतिर्वचः कर्म सुखानुबन्धं सत्त्वं विधेयं विशदा च बुद्धिः| ज्ञानं तपस्तत्परता च योगे यस्यास्ति तं नानुपतन्ति रोगाः||४७|| तत्र श्लोकः| इहाग्निवेशस्य महार्थयुक्तं षट्त्रिंशकं प्रश्नगणं महर्षिः| अतुल्यगोत्रे भगवान् यथावन्निर्णीतवान् ज्ञानविवर्धनार्थम्||४८||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 2

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শারীরস্থানেঽতুল্যগোত্রীযং শারীরং নাম দ্বিতীযোঽধ্যাযঃ||২||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थानेऽतुल्यगोत्रीयं शारीरं नाम द्वितीयोऽध्यायः||२||

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