Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ খুড্ডিকাং গর্ভাবক্রান্তিং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातः खुड्डिकां गर्भावक्रान्तिं शारीरं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ খুড্ডিকাং গর্ভাবক্রান্তিং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातः खुड्डिकां गर्भावक्रान्तिं शारीरं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
পুরুষস্যানুপহতরেতসঃ স্ত্রিযাশ্চাপ্রদুষ্টযোনিশোণিতগর্ভাশযাযা যদা ভবতি সংসর্গঃ ঋতুকালে, যদা চানযোস্তথাযুক্তে সংসর্গে শুক্রশোণিতসংসর্গমন্তর্গর্ভাশযগতং জীবোঽবক্রামতি সত্ত্বসম্প্রযোগাত্তদা গর্ভোঽভিনির্বতেতে, স সাত্ম্যরসোপযোগাদরোগোঽভিবর্ধতে সম্যগুপচারৈশ্চোপচর্যমাণঃ, ততঃ প্রাপ্তকালঃ সর্বেন্দ্রিযোপপন্নঃ পরিপূর্ণশরীরো বলবর্ণসত্ত্বসংহননসম্পদুপেতঃ সুখেন জাযতে সমুদযাদেষাং ভাবানাং- মাতৃজশ্চাযং গর্ভঃ পিতৃজশ্চাত্মজশ্চ সাত্ম্যজশ্চ রসজশ্চ, অস্তি চ খলু সত্ত্বমৌপপাদুকমিতি হোবাচ ভগবানাত্রেযঃ||৩||
पुरुषस्यानुपहतरेतसः स्त्रियाश्चाप्रदुष्टयोनिशोणितगर्भाशयाया यदा भवति संसर्गः ऋतुकाले, यदा चानयोस्तथायुक्ते संसर्गे शुक्रशोणितसंसर्गमन्तर्गर्भाशयगतं जीवोऽवक्रामति सत्त्वसम्प्रयोगात्तदा गर्भोऽभिनिर्वतेते, स सात्म्यरसोपयोगादरोगोऽभिवर्धते सम्यगुपचारैश्चोपचर्यमाणः, ततः प्राप्तकालः सर्वेन्द्रियोपपन्नः परिपूर्णशरीरो बलवर्णसत्त्वसंहननसम्पदुपेतः सुखेन जायते समुदयादेषां भावानां- मातृजश्चायं गर्भः पितृजश्चात्मजश्च सात्म्यजश्च रसजश्च, अस्ति च खलु सत्त्वमौपपादुकमिति होवाच भगवानात्रेयः||३||
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Adhikarana 3 (4 (1)) · Śloka 4
নেতি ভরদ্বাজঃ, কিং কারণং- ন হি মাতা ন পিতা নাত্মা ন সাত্ম্যং ন পানাশনভক্ষ্যলেহ্যোপযোগা গর্ভং জনযন্তি, ন চ পরলোকাদেত্য গর্ভং সত্ত্বমবক্রামতি (১)|৪|
नेति भरद्वाजः, किं कारणं- न हि माता न पिता नात्मा न सात्म्यं न पानाशनभक्ष्यलेह्योपयोगा गर्भं जनयन्ति, न च परलोकादेत्य गर्भं सत्त्वमवक्रामति (१)|४|
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Adhikarana 4 (4 (2)) · Śloka 4
যদি হি মাতাপিতরৌ গর্ভং জনযেতাং, ভূযস্যঃ স্ত্রিযঃ পুমাংসশ্চ ভূযাংসঃ পুত্রকামাঃ, তে সর্বে পুত্রজন্মাভিসন্ধায মৈথুনধর্মমাপদ্যমানাঃ পুত্রানেব জনযেযুর্দুহিতৄর্বা দুহিতৃকামাঃ, ন তু কাশ্চিত্ স্ত্রিযঃ কেচিদ্বা পুরুষা নিরপত্যাঃ স্যুরপত্যকামা বা পরিদেবেরন্ (২)|৪|
यदि हि मातापितरौ गर्भं जनयेतां, भूयस्यः स्त्रियः पुमांसश्च भूयांसः पुत्रकामाः, ते सर्वे पुत्रजन्माभिसन्धाय मैथुनधर्ममापद्यमानाः पुत्रानेव जनयेयुर्दुहितॄर्वा दुहितृकामाः, न तु काश्चित् स्त्रियः केचिद्वा पुरुषा निरपत्याः स्युरपत्यकामा वा परिदेवेरन् (२)|४|
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Adhikarana 5 (4 (3)) · Śloka 4
ন চাত্মাঽঽত্মানং জনযতি| যদি হ্যাত্মাঽঽত্মানং জনযেজ্জাতো বা জনযেদাত্মানমজাতো বা, তচ্চোভযথাঽপ্যযুক্তম্| ন হি জাতো জনযতি সত্ত্বাত্, ন চাজাতো জনযত্যসত্ত্বাত্, তস্মাদুভযথাঽপ্যনুপপত্তিঃ| তিষ্ঠতু তাবদেতত্| যদ্যযমাত্মাঽঽত্মানং শক্তো জনযিতুং স্যাত্, ন ত্বেনমিষ্টাস্বেব কথং যোনিষু জনযেদ্বশিনমপ্রতিহতগতিং কামরূপিণং তেজোবলজববর্ণসত্ত্বসংহননসমুদিতমজরমরুজমমরম্; এবংবিধং হ্যাত্মাঽঽত্মানমিচ্ছত্যতো বা ভূযঃ (৩)|৪|
न चात्माऽऽत्मानं जनयति| यदि ह्यात्माऽऽत्मानं जनयेज्जातो वा जनयेदात्मानमजातो वा, तच्चोभयथाऽप्ययुक्तम्| न हि जातो जनयति सत्त्वात्, न चाजातो जनयत्यसत्त्वात्, तस्मादुभयथाऽप्यनुपपत्तिः| तिष्ठतु तावदेतत्| यद्ययमात्माऽऽत्मानं शक्तो जनयितुं स्यात्, न त्वेनमिष्टास्वेव कथं योनिषु जनयेद्वशिनमप्रतिहतगतिं कामरूपिणं तेजोबलजववर्णसत्त्वसंहननसमुदितमजरमरुजममरम्; एवंविधं ह्यात्माऽऽत्मानमिच्छत्यतो वा भूयः (३)|४|
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Adhikarana 6 (4 (4)) · Śloka 4
অসাত্ম্যজশ্চাযং গর্ভঃ| যদি হি সাত্ম্যজঃস্যাত্, তর্হি সাত্ম্যসেবিনামেবৈকান্তেন প্রজা স্যাত্, অসাত্ম্যসেবিনশ্চ নিখিলেনানপত্যাঃ স্যুঃ, তচ্চোভযমুভযত্রৈব দৃশ্যতে (৪)|৪|
असात्म्यजश्चायं गर्भः| यदि हि सात्म्यजःस्यात्, तर्हि सात्म्यसेविनामेवैकान्तेन प्रजा स्यात्, असात्म्यसेविनश्च निखिलेनानपत्याः स्युः, तच्चोभयमुभयत्रैव दृश्यते (४)|४|
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Adhikarana 7 (4 (5)) · Śloka 4
অরসজশ্চাযং গর্ভঃ| যদি হি রসজঃ স্যাত্, ন কেচিত্ স্ত্রীপুরুষেষ্বনপত্যাঃ স্যুঃ, ন হি কশ্চিদস্ত্যেষাং যো রসান্নোপযুঙ্ক্তে; শ্রেষ্ঠরসোপযোগিনাং চেদ্গর্ভা জাযন্ত ইত্যভিপ্রেতমিতি, এবং সত্যাজৌরভ্রমার্গমাযূরগোক্ষীরদধিঘৃতমধুতৈলসৈন্ধবেক্ষুরসমুদ্গশালিভৃতানামেবৈকান্তেন প্রজা স্যাত্, শ্যামাকবরকোদ্দালককোরদূষককন্দমূলভক্ষাশ্চ নিখিলেনানপত্যাঃ স্যুঃ, তচ্চোভযমুভযত্র দৃশ্যতে (৫)|৪|
अरसजश्चायं गर्भः| यदि हि रसजः स्यात्, न केचित् स्त्रीपुरुषेष्वनपत्याः स्युः, न हि कश्चिदस्त्येषां यो रसान्नोपयुङ्क्ते; श्रेष्ठरसोपयोगिनां चेद्गर्भा जायन्त इत्यभिप्रेतमिति, एवं सत्याजौरभ्रमार्गमायूरगोक्षीरदधिघृतमधुतैलसैन्धवेक्षुरसमुद्गशालिभृतानामेवैकान्तेन प्रजा स्यात्, श्यामाकवरकोद्दालककोरदूषककन्दमूलभक्षाश्च निखिलेनानपत्याः स्युः, तच्चोभयमुभयत्र दृश्यते (५)|४|
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Adhikarana 8 (4) · Śloka 4
ন খল্বপি পরলোকাদেত্য সত্ত্বং গর্ভমবক্রামতি; যদি হ্যেনমবক্রামেত্, নাস্য কিঞ্চিত্ পৌর্বদেহিকং স্যাদবিদিতমশ্রুতমদৃষ্টং বা, স চ তচ্চ ন কিঞ্চিদপি স্মরতি (৬)||৪|| তস্মাদেতদ্ব্রূমহে- অমাতৃজশ্চাযং গর্ভোঽপিতৃজশ্চানাত্মজশ্চাসাত্ম্যজশ্চারসজশ্চ, ন চাস্তি সত্ত্বমৌপপাদুকমিতি (হোবাচ ভরদ্বাজঃ )||৪||
न खल्वपि परलोकादेत्य सत्त्वं गर्भमवक्रामति; यदि ह्येनमवक्रामेत्, नास्य किञ्चित् पौर्वदेहिकं स्यादविदितमश्रुतमदृष्टं वा, स च तच्च न किञ्चिदपि स्मरति (६)||४|| तस्मादेतद्ब्रूमहे- अमातृजश्चायं गर्भोऽपितृजश्चानात्मजश्चासात्म्यजश्चारसजश्च, न चास्ति सत्त्वमौपपादुकमिति (होवाच भरद्वाजः )||४||
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Adhikarana 9 (5) · Śloka 5
নেতি ভগবানাত্রেযঃ, সর্বেভ্য এভ্যো ভাবেভ্যঃ সমুদিতেভ্যো গর্ভোঽভিনির্বর্ততে||৫||
नेति भगवानात्रेयः, सर्वेभ्य एभ्यो भावेभ्यः समुदितेभ्यो गर्भोऽभिनिर्वर्तते||५||
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Adhikarana 10 (6) · Śloka 6
মাতৃজশ্চাযং গর্ভঃ| ন হি মাতুর্বিনা গর্ভোত্পত্তিঃ স্যাত্, ন চ জন্ম জরাযুজানাম্| যানি খল্বস্য গর্ভস্য মাতৃজানি, যানি চাস্য মাতৃতঃ সম্ভবতঃ সম্ভবন্তি, তান্যনুব্যাখ্যাস্যামঃ; তদ্যথা- ত্বক্চ লোহিতং চ মাংসং চ মেদশ্চ নাভিশ্চ হৃদযং চ ক্লোম চ যকৃচ্চ প্লীহা চ বৃক্কৌ চ বস্তিশ্চ পুরীষাধানং চামাশযশ্চ পক্বাশযশ্চোত্তরগুদং চাধরগুদং চ ক্ষুদ্রান্ত্রং চ স্থূলান্ত্রং চ বাপা চ বপাবহনং চেতি (মাতৃজানি)||৬||
मातृजश्चायं गर्भः| न हि मातुर्विना गर्भोत्पत्तिः स्यात्, न च जन्म जरायुजानाम्| यानि खल्वस्य गर्भस्य मातृजानि, यानि चास्य मातृतः सम्भवतः सम्भवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः; तद्यथा- त्वक्च लोहितं च मांसं च मेदश्च नाभिश्च हृदयं च क्लोम च यकृच्च प्लीहा च वृक्कौ च बस्तिश्च पुरीषाधानं चामाशयश्च पक्वाशयश्चोत्तरगुदं चाधरगुदं च क्षुद्रान्त्रं च स्थूलान्त्रं च वापा च वपावहनं चेति (मातृजानि)||६||
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Adhikarana 11 (7) · Śloka 7
পিতৃজশ্চাযং গর্ভঃ| নহি পিতুরৃতে গর্ভোত্পত্তিঃ স্যাত্, ন চ জন্ম জরাযুজানাম্| যানি খল্বস্য গর্ভস্য পিতৃজানি, যানি চাস্য পিতৃতঃ সম্ভবতঃ সম্ভবন্তি, তান্যনুব্যাখ্যাস্যামঃ; তদ্যথা- কেশশ্মশ্রুনখলোমদন্তাস্থিসিরাস্নাযুধমন্যঃ শুক্রং চেতি (পিতৃজানি)||৭||
पितृजश्चायं गर्भः| नहि पितुरृते गर्भोत्पत्तिः स्यात्, न च जन्म जरायुजानाम्| यानि खल्वस्य गर्भस्य पितृजानि, यानि चास्य पितृतः सम्भवतः सम्भवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः; तद्यथा- केशश्मश्रुनखलोमदन्तास्थिसिरास्नायुधमन्यः शुक्रं चेति (पितृजानि)||७||
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Adhikarana 12 (8) · Śloka 8
আত্মজশ্চাযং গর্ভঃ| গর্ভাত্মা হ্যন্তরাত্মা যঃ, তং ‘জীব’ ইত্যাচক্ষতে শাশ্বতমরুজমজরমমরমক্ষযমভেদ্যমচ্ছেদ্যমলোড্যং বিশ্বরূপং বিশ্বকর্মাণমব্যক্তমনাদিমনিধনমক্ষরমপি| স গর্ভাশযমনুপ্রবিশ্য শুক্রশোণিতাভ্যাং সংযোগমেত্য গর্ভত্বেন জনযত্যাত্মনাঽঽত্মানম্, আত্মসঞ্জ্ঞা হি গর্ভে| তস্য পুনরাত্মনো জন্মানাদিত্বান্নোপপদ্যতে, তস্মান্ন জাত এবাযমজাতং গর্ভং জনযতি, অজাতো হ্যযমজাতং গর্ভং জনযতি; স চৈব গর্ভঃ কালান্তরেণ বালযুবস্থবিরভাবান্ প্রাপ্নোতি, স যস্যাং যস্যামবস্থাযাং বর্ততে তস্যাং তস্যাং জাতো ভবতি, যা ত্বস্য পুরস্কৃতাতস্যাং জনিষ্যমাণশ্চ, তস্মাত্ স এব জাতশ্চাজাতশ্চ যুগপদ্ভবতি; যস্মিংশ্চৈতদুভযং সম্ভবতি জাতত্বং জনিষ্যমাণত্বং চ স জাতো জন্যতে, স চৈবানাগতেষ্ববস্থান্তরেষ্বজাতো জন্যযত্যাত্মনাঽঽত্মানম্| সতো হ্যবস্থান্তরগমনমাত্রমেব হি জন্ম চোচ্যতে তত্র তত্র বযসি তস্যাং তস্যামবস্থাযাং; যথা- সতামেব শুক্রশোণিতজীবানাং প্রাক্ সংযোগাদ্গর্ভত্বং ন ভবতি, তচ্চ সংযোগাদ্ভবতি; যথা- সতস্তস্যৈব পুরুষস্য প্রাগপত্যাত্ পিতৃত্বং ন ভবতি, তচ্চাপত্যাদ্ভবতি; তথা সতস্তস্যৈব গর্ভস্য তস্যাং তস্যামবস্থাযাং জাতত্বমজাতত্বং চোচ্যতে||৮||
आत्मजश्चायं गर्भः| गर्भात्मा ह्यन्तरात्मा यः, तं ‘जीव’ इत्याचक्षते शाश्वतमरुजमजरममरमक्षयमभेद्यमच्छेद्यमलोड्यं विश्वरूपं विश्वकर्माणमव्यक्तमनादिमनिधनमक्षरमपि| स गर्भाशयमनुप्रविश्य शुक्रशोणिताभ्यां संयोगमेत्य गर्भत्वेन जनयत्यात्मनाऽऽत्मानम्, आत्मसञ्ज्ञा हि गर्भे| तस्य पुनरात्मनो जन्मानादित्वान्नोपपद्यते, तस्मान्न जात एवायमजातं गर्भं जनयति, अजातो ह्ययमजातं गर्भं जनयति; स चैव गर्भः कालान्तरेण बालयुवस्थविरभावान् प्राप्नोति, स यस्यां यस्यामवस्थायां वर्तते तस्यां तस्यां जातो भवति, या त्वस्य पुरस्कृतातस्यां जनिष्यमाणश्च, तस्मात् स एव जातश्चाजातश्च युगपद्भवति; यस्मिंश्चैतदुभयं सम्भवति जातत्वं जनिष्यमाणत्वं च स जातो जन्यते, स चैवानागतेष्ववस्थान्तरेष्वजातो जन्ययत्यात्मनाऽऽत्मानम्| सतो ह्यवस्थान्तरगमनमात्रमेव हि जन्म चोच्यते तत्र तत्र वयसि तस्यां तस्यामवस्थायां; यथा- सतामेव शुक्रशोणितजीवानां प्राक् संयोगाद्गर्भत्वं न भवति, तच्च संयोगाद्भवति; यथा- सतस्तस्यैव पुरुषस्य प्रागपत्यात् पितृत्वं न भवति, तच्चापत्याद्भवति; तथा सतस्तस्यैव गर्भस्य तस्यां तस्यामवस्थायां जातत्वमजातत्वं चोच्यते||८||
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Adhikarana 13 (9) · Śloka 9
ন খলু গর্ভস্য ন চ মাতুর্ন পিতুর্ন চাত্মনঃ সর্বভাবেষু যথেষ্টকারিত্বমস্তি; তে কিঞ্চিত্ স্ববশাত্ কুর্বন্তি, কিঞ্চিত্ কর্মবশাত্, ক্বচিচ্চৈষাং করণশক্তির্ভবতি, ক্বচিন্ন ভবতি| যত্র সত্ত্বাদিকরণসম্পত্তত্র যথাবলমেব যথেষ্টকারিত্বম্, অতোঽন্যথা বিপর্যযঃ| ন চ করণদোষাদকরণমাত্মাসম্ভবতি গর্ভজননে, দৃষ্টং চেষ্টা যোনিরৈশ্বর্যং মোক্ষশ্চাত্মবিদ্ভিরাত্মাযত্তম্| নহ্যন্যঃ সুখদুঃখযোঃ কর্তা| ন চান্যতো গর্ভো জাযতে জাযমানঃ, নাঙ্কুরোত্পত্তিরবীজাত্||৯||
न खलु गर्भस्य न च मातुर्न पितुर्न चात्मनः सर्वभावेषु यथेष्टकारित्वमस्ति; ते किञ्चित् स्ववशात् कुर्वन्ति, किञ्चित् कर्मवशात्, क्वचिच्चैषां करणशक्तिर्भवति, क्वचिन्न भवति| यत्र सत्त्वादिकरणसम्पत्तत्र यथाबलमेव यथेष्टकारित्वम्, अतोऽन्यथा विपर्ययः| न च करणदोषादकरणमात्मासम्भवति गर्भजनने, दृष्टं चेष्टा योनिरैश्वर्यं मोक्षश्चात्मविद्भिरात्मायत्तम्| नह्यन्यः सुखदुःखयोः कर्ता| न चान्यतो गर्भो जायते जायमानः, नाङ्कुरोत्पत्तिरबीजात्||९||
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Adhikarana 14 (10) · Śloka 10
যানি তু খল্বস্য গর্ভস্যাত্মজানি, যানি চাস্যাত্মতঃ সম্ভবতঃ সম্ভবন্তি, তান্যনুব্যাখ্যাস্যামঃ তদ্যথা- তাসু তাসু যোনিষূত্পত্তিরাযুরাত্মজ্ঞানং মন ইন্দ্রিযাণি প্রাণাপানৌ প্রেরণং ধারণমাকৃতিস্বরবর্ণবিশেষাঃ সুখদুঃখে ইচ্ছাদ্বেষৌ চেতনা ধৃতির্বুদ্ধিঃ স্মৃতিরহঙ্কারঃ প্রযত্নশ্চেতি (আত্মজানি)||১০||
यानि तु खल्वस्य गर्भस्यात्मजानि, यानि चास्यात्मतः सम्भवतः सम्भवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः तद्यथा- तासु तासु योनिषूत्पत्तिरायुरात्मज्ञानं मन इन्द्रियाणि प्राणापानौ प्रेरणं धारणमाकृतिस्वरवर्णविशेषाः सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ चेतना धृतिर्बुद्धिः स्मृतिरहङ्कारः प्रयत्नश्चेति (आत्मजानि)||१०||
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Adhikarana 15 (11) · Śloka 11
সাত্ম্যজশ্চাযং গর্ভঃ| নহ্যসাত্ম্যসেবিত্বমন্তরেণ স্ত্রীপুরুষযোর্বন্ধ্যত্বমস্তি, গর্ভেষু বাঽপ্যনিষ্টো ভাবঃ| যাবত্ খল্বসাত্ম্যসেবিনাং স্ত্রীপুরুষাণাং ত্রযো দোষাঃ প্রকুপিতাঃ শরীরমুপসর্পন্তো ন শুক্রশোণিতগর্ভাশযোপঘাতাযোপপদ্যন্তে, তাবত্ সমর্থা গর্ভজননায ভবন্তি| সাত্ম্যসেবিনাং পুনঃ স্ত্রীপুরুষাণামনুপহতশুক্রশোণিতগর্ভাশযানামৃতকালে সন্নিপতিতানাং জীবস্যানবক্রমণাদ্গর্ভা ন প্রাদুর্ভবন্তি| নহি কেবলং সাত্ম্যজ এবাযং গর্ভঃ, সমুদযোঽত্র কারণমুচ্যতে| যানি খল্বস্য গর্ভস্য সাত্ম্যজানি, যানি চাস্য সাত্ম্যতঃ সম্ভবতঃ সম্ভবন্তি, তান্যনুব্যাখ্যাস্যামঃ; তদ্যথা- আরোগ্যমনালস্যমলোলুপত্বমিন্দ্রিযপ্রসাদঃ স্বরবর্ণবীজসম্পত্ প্রহর্ষভূযস্ত্বং চেতি (সাত্ম্যজানি)||১১||
सात्म्यजश्चायं गर्भः| नह्यसात्म्यसेवित्वमन्तरेण स्त्रीपुरुषयोर्वन्ध्यत्वमस्ति, गर्भेषु वाऽप्यनिष्टो भावः| यावत् खल्वसात्म्यसेविनां स्त्रीपुरुषाणां त्रयो दोषाः प्रकुपिताः शरीरमुपसर्पन्तो न शुक्रशोणितगर्भाशयोपघातायोपपद्यन्ते, तावत् समर्था गर्भजननाय भवन्ति| सात्म्यसेविनां पुनः स्त्रीपुरुषाणामनुपहतशुक्रशोणितगर्भाशयानामृतकाले सन्निपतितानां जीवस्यानवक्रमणाद्गर्भा न प्रादुर्भवन्ति| नहि केवलं सात्म्यज एवायं गर्भः, समुदयोऽत्र कारणमुच्यते| यानि खल्वस्य गर्भस्य सात्म्यजानि, यानि चास्य सात्म्यतः सम्भवतः सम्भवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः; तद्यथा- आरोग्यमनालस्यमलोलुपत्वमिन्द्रियप्रसादः स्वरवर्णबीजसम्पत् प्रहर्षभूयस्त्वं चेति (सात्म्यजानि)||११||
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Adhikarana 16 (12) · Śloka 12
রসজশ্চাযং গর্ভঃ| ন হি রসাদৃতে মাতুঃ প্রাণযাত্রাঽপি স্যাত্, কিং পুনর্গর্ভজন্ম| ন চৈবাসম্যগুপযুজ্যমানা রসা গর্ভমভিনির্বর্তযন্তি, ন চ কেবলং সম্যগুপযোগাদেব রসানাং গর্ভাভিনির্বৃত্তির্ভবতি, সমুদাযোঽপ্যত্র কারণমুচ্যতে| যানি তু খল্বস্য গর্ভস্য রসজানি, যানি চাস্য রসতঃ সম্ভবতঃ সম্ভবন্তি, তান্যনুব্যাখ্যাস্যামঃ; তদ্যথা- শরীরস্যাভিনির্বৃত্তিরভিবৃদ্ধিঃ প্রাণানুবন্ধস্তৃপ্তিঃ পুষ্টিরুত্সাহশ্চেতি (রসজানি)||১২||
रसजश्चायं गर्भः| न हि रसादृते मातुः प्राणयात्राऽपि स्यात्, किं पुनर्गर्भजन्म| न चैवासम्यगुपयुज्यमाना रसा गर्भमभिनिर्वर्तयन्ति, न च केवलं सम्यगुपयोगादेव रसानां गर्भाभिनिर्वृत्तिर्भवति, समुदायोऽप्यत्र कारणमुच्यते| यानि तु खल्वस्य गर्भस्य रसजानि, यानि चास्य रसतः सम्भवतः सम्भवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः; तद्यथा- शरीरस्याभिनिर्वृत्तिरभिवृद्धिः प्राणानुबन्धस्तृप्तिः पुष्टिरुत्साहश्चेति (रसजानि)||१२||
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Adhikarana 17 (13) · Śloka 13
অস্তি খলু সত্ত্বমৌপপাদুকং; যজ্জীবং স্পৃক্শরীরেণাভিসম্বধ্নাতি, যস্মিন্নপগমনপুরস্কৃতে শীলমস্য ব্যাবর্ততে, ভক্তির্বিপর্যস্যতে, সর্বেন্দ্রিযাণ্যুপতপ্যন্তে, বলং হীযতে, ব্যাধয আপ্যায্যন্তে, যস্মাদ্ধীনঃ প্রাণাঞ্জহাতি, যদিন্দ্রিযাণামভিগ্রাহকং চ ‘মন’ ইত্যভিধীযতে; তত্ত্রিবিধমাখ্যাযতে- শুদ্ধং, রাজসং, তামসমিতি| যেনাস্য খলু মনো ভূযিষ্ঠং, তেন দ্বিতীযাযামাজাতৌ সম্প্রযোগো ভবতি; যদা তু তেনৈব শুদ্ধেন সংযুজ্যতে, তদা জাতেরতিক্রান্তাযা অপি স্মরতি| স্মার্তং হি জ্ঞানমাত্মনস্তস্যৈব মনসোঽনুবন্ধাদনুবর্ততে, যস্যানুবৃত্তিং পুরস্কৃত্য পুরুষো ‘জাতিস্মর’ ইত্যুচ্যতে| যানি খল্বস্য গর্ভস্য সত্ত্বজানি, যান্যস্য সত্ত্বতঃ সম্ভবতঃ সম্ভবন্তি, তান্যনুব্যাখ্যাস্যামঃ; তদ্যথা- ভক্তিঃ শীলং শৌচং দ্বেষঃ স্মৃতির্মোহস্ত্যাগো মাত্সর্যং শৌর্যং ভযং ক্রোধস্তন্দ্রোত্সাহস্তৈক্ষ্ণ্যং মার্দবং গাম্ভীর্যমনবস্থিতত্বমিত্যেবমাদযশ্চান্যে, তে সত্ত্ববিকারা যানুত্তরকালং সত্ত্বভেদমধিকৃত্যোপদেক্ষ্যামঃ| নানাবিধানি খলু সত্ত্বানি, তানি সর্বাণ্যেকপুরুষে ভবন্তি, ন চ ভবন্ত্যেককালম্, একং তু প্রাযোবৃত্ত্যাঽঽহ ||১৩||
अस्ति खलु सत्त्वमौपपादुकं; यज्जीवं स्पृक्शरीरेणाभिसम्बध्नाति, यस्मिन्नपगमनपुरस्कृते शीलमस्य व्यावर्तते, भक्तिर्विपर्यस्यते, सर्वेन्द्रियाण्युपतप्यन्ते, बलं हीयते, व्याधय आप्याय्यन्ते, यस्माद्धीनः प्राणाञ्जहाति, यदिन्द्रियाणामभिग्राहकं च ‘मन’ इत्यभिधीयते; तत्त्रिविधमाख्यायते- शुद्धं, राजसं, तामसमिति| येनास्य खलु मनो भूयिष्ठं, तेन द्वितीयायामाजातौ सम्प्रयोगो भवति; यदा तु तेनैव शुद्धेन संयुज्यते, तदा जातेरतिक्रान्ताया अपि स्मरति| स्मार्तं हि ज्ञानमात्मनस्तस्यैव मनसोऽनुबन्धादनुवर्तते, यस्यानुवृत्तिं पुरस्कृत्य पुरुषो ‘जातिस्मर’ इत्युच्यते| यानि खल्वस्य गर्भस्य सत्त्वजानि, यान्यस्य सत्त्वतः सम्भवतः सम्भवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः; तद्यथा- भक्तिः शीलं शौचं द्वेषः स्मृतिर्मोहस्त्यागो मात्सर्यं शौर्यं भयं क्रोधस्तन्द्रोत्साहस्तैक्ष्ण्यं मार्दवं गाम्भीर्यमनवस्थितत्वमित्येवमादयश्चान्ये, ते सत्त्वविकारा यानुत्तरकालं सत्त्वभेदमधिकृत्योपदेक्ष्यामः| नानाविधानि खलु सत्त्वानि, तानि सर्वाण्येकपुरुषे भवन्ति, न च भवन्त्येककालम्, एकं तु प्रायोवृत्त्याऽऽह ||१३||
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Adhikarana 18 (14) · Śloka 14
এবমযং নানাবিধানামেষাং গর্ভকরাণাং ভাবানাং সমুদাযাদভিনির্বর্ততে গর্ভঃ; যথা- কূটাগারং নানাদ্রব্যসমুদাযাত্, যথা বা- রথো নানারথাঙ্গসমুদাযাত্; তস্মাদেতদবোচাম- মাতৃজশ্চাযং গর্ভঃ, পিতৃজশ্চ, আত্মজশ্চ, সাত্ম্যজশ্চ, রসজশ্চ, অস্তি চ সত্ত্বমৌপপাদুকমিতি (হোবাচ ভগবানাত্রেযঃ)||১৪||
एवमयं नानाविधानामेषां गर्भकराणां भावानां समुदायादभिनिर्वर्तते गर्भः; यथा- कूटागारं नानाद्रव्यसमुदायात्, यथा वा- रथो नानारथाङ्गसमुदायात्; तस्मादेतदवोचाम- मातृजश्चायं गर्भः, पितृजश्च, आत्मजश्च, सात्म्यजश्च, रसजश्च, अस्ति च सत्त्वमौपपादुकमिति (होवाच भगवानात्रेयः)||१४||
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Adhikarana 19 (15) · Śloka 15
ভরদ্বাজ উবাচ- যদ্যযমেষাং নানাবিধানাং গর্ভকরাণাং ভাবানাং সমুদাযাদভিনির্বর্ততে গর্ভঃ কথমযং সন্ধীযতে, যদি চাপি সন্ধীযতে কস্মাত্ সমুদাযপ্রভবঃ সন্ গর্ভো মনুষ্যবিগ্রহেণ জাযতে, মনুষ্যশ্চ মনুষ্যপ্রভব উচ্যতে; তত্র চেদিষ্টমেতদ্যস্মান্মনুষ্যো মনুষ্যপ্রভবস্তস্মাদেব মনুষ্যবিগ্রহেণ জাযতে, যথা- গৌর্গোপ্রভবঃ, যথা- চাশ্বোঽশ্বপ্রভব ইতি; এবং সতি যদুক্তমগ্রে সমুদযাত্মক ইতি তদযুক্তম্| যদি চ মনুষ্যো মনুষ্যপ্রভবঃ, কস্মাজ্জডান্ধকুব্জমূকবামনমিম্মিনব্যঙ্গোন্মত্তকুষ্ঠিকিলাসিভ্যো জাতাঃ পিতৃসদৃশরূপা ন ভবন্তি| অথাত্রাপি বুদ্ধিরেবং স্যাত্- স্বেনৈবাযমাত্মা চক্ষুষা রূপাণি বেত্তি, শ্রোত্রেণ শব্দান্, ঘ্রাণেন গন্ধান্, রসনেন রসান্, স্পর্শনেন স্পর্শান্, বুদ্ধ্যা বোদ্ধব্যমিত্যনেন হেতুনা ন জডাদিভ্যো জাতাঃ পিতৃসদৃশা ভবন্তি| অত্রাপি প্রতিজ্ঞাহানিদোষঃ স্যাত্, এবমুক্তে হ্যাত্মা সত্স্বিন্দ্রিযেষু জ্ঞঃ স্যাদসত্স্বজ্ঞঃ; যত্র চৈতদুভযং সম্ভবতি জ্ঞত্বমজ্ঞত্বং চ, সবিকারশ্চাত্মা | যদি চ দর্শনাদিভিরাত্মা বিষযান্ বেত্তি, নিরিন্দ্রিযো দর্শনাদিবিরহাদজ্ঞঃ স্যাত্, অজ্ঞত্বাদকারণম্, অকারণত্বাচ্চ নাত্মেতি বাগ্বস্তুমাত্রমেতদ্বচনমনর্থং স্যাদিতি (হোবাচ ভরদ্বাজঃ)||১৫||
भरद्वाज उवाच- यद्ययमेषां नानाविधानां गर्भकराणां भावानां समुदायादभिनिर्वर्तते गर्भः कथमयं सन्धीयते, यदि चापि सन्धीयते कस्मात् समुदायप्रभवः सन् गर्भो मनुष्यविग्रहेण जायते, मनुष्यश्च मनुष्यप्रभव उच्यते; तत्र चेदिष्टमेतद्यस्मान्मनुष्यो मनुष्यप्रभवस्तस्मादेव मनुष्यविग्रहेण जायते, यथा- गौर्गोप्रभवः, यथा- चाश्वोऽश्वप्रभव इति; एवं सति यदुक्तमग्रे समुदयात्मक इति तदयुक्तम्| यदि च मनुष्यो मनुष्यप्रभवः, कस्माज्जडान्धकुब्जमूकवामनमिम्मिनव्यङ्गोन्मत्तकुष्ठिकिलासिभ्यो जाताः पितृसदृशरूपा न भवन्ति| अथात्रापि बुद्धिरेवं स्यात्- स्वेनैवायमात्मा चक्षुषा रूपाणि वेत्ति, श्रोत्रेण शब्दान्, घ्राणेन गन्धान्, रसनेन रसान्, स्पर्शनेन स्पर्शान्, बुद्ध्या बोद्धव्यमित्यनेन हेतुना न जडादिभ्यो जाताः पितृसदृशा भवन्ति| अत्रापि प्रतिज्ञाहानिदोषः स्यात्, एवमुक्ते ह्यात्मा सत्स्विन्द्रियेषु ज्ञः स्यादसत्स्वज्ञः; यत्र चैतदुभयं सम्भवति ज्ञत्वमज्ञत्वं च, सविकारश्चात्मा | यदि च दर्शनादिभिरात्मा विषयान् वेत्ति, निरिन्द्रियो दर्शनादिविरहादज्ञः स्यात्, अज्ञत्वादकारणम्, अकारणत्वाच्च नात्मेति वाग्वस्तुमात्रमेतद्वचनमनर्थं स्यादिति (होवाच भरद्वाजः)||१५||
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Adhikarana 20 (16) · Śloka 16
আত্রেয উবাচ- পুরস্তাদেতত্ প্রতিজ্ঞাতং- সত্ত্বং জীবং স্পৃক্শরীরেণাভিসম্বধ্নাতীতি| যস্মাত্তু সমুদাযপ্রভবঃ সন্ স গর্ভো মনুষ্যবিগ্রহেণ জাযতে, মনুষ্যো মনুষ্যপ্রভব ইত্যুচ্যতে, তদ্বক্ষ্যামঃ- ভূতানাং চতুর্বিধা যোনির্ভবতি- জরায্বণ্ডস্বেদোদ্ভিদঃ| তাসাং খলু চতসৃণামপি যোনীনামেকৈকা যোনিরপরিসঙ্খ্যেযভেদা ভবতি, ভূতানামাকৃতিবিশেষাপরিসঙ্খ্যেযত্বাত্| তত্র জরাযুজানামণ্ডজানাং চ প্রাণিনামেতে গর্ভকরা ভাবা যাং যাং যোনিমাপদ্যন্তে, তস্যাং তস্যাং যোনৌ তথাতথারূপা ভবন্তি; যথা- কনকরজততাম্রত্রপুসীসকান্যাসিচ্যমানানি তেষু তেষু মধূচ্ছিষ্টবিগ্রহেষু, তানি যদা মনুষ্যবিম্বমাপদ্যন্তে তদা মনুষ্যবিগ্রহেণ জাযন্তে, তস্মাত্ সমুদাযপ্রভাবঃ সন্ গর্ভো মনুষ্যবিগ্রহেণ জাযতে; মনুষ্যশ্চ মনুষ্যপ্রভব উচ্যতে, তদ্যোনিত্বাত্||১৬||
आत्रेय उवाच- पुरस्तादेतत् प्रतिज्ञातं- सत्त्वं जीवं स्पृक्शरीरेणाभिसम्बध्नातीति| यस्मात्तु समुदायप्रभवः सन् स गर्भो मनुष्यविग्रहेण जायते, मनुष्यो मनुष्यप्रभव इत्युच्यते, तद्वक्ष्यामः- भूतानां चतुर्विधा योनिर्भवति- जराय्वण्डस्वेदोद्भिदः| तासां खलु चतसृणामपि योनीनामेकैका योनिरपरिसङ्ख्येयभेदा भवति, भूतानामाकृतिविशेषापरिसङ्ख्येयत्वात्| तत्र जरायुजानामण्डजानां च प्राणिनामेते गर्भकरा भावा यां यां योनिमापद्यन्ते, तस्यां तस्यां योनौ तथातथारूपा भवन्ति; यथा- कनकरजतताम्रत्रपुसीसकान्यासिच्यमानानि तेषु तेषु मधूच्छिष्टविग्रहेषु, तानि यदा मनुष्यबिम्बमापद्यन्ते तदा मनुष्यविग्रहेण जायन्ते, तस्मात् समुदायप्रभावः सन् गर्भो मनुष्यविग्रहेण जायते; मनुष्यश्च मनुष्यप्रभव उच्यते, तद्योनित्वात्||१६||
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Adhikarana 21 (17) · Śloka 17
যচ্চোক্তং- যদি চ মনুষ্যো মনুষ্যপ্রভবঃ, কস্মান্ন জডাদিভ্যো জাতাঃ পিতৃসদৃশরূপা ভবন্তীতি; তত্রোচ্যতে- যস্য যস্য হ্যঙ্গাবযবস্য বীজে বীজ ভাগ উপতপ্তো ভবতি, তস্য তস্যাঙ্গাবযবস্য বিকৃতিরুপজাযতে, নোপজাযতে চানুপতাপাত্; তস্মাদুভযোপপত্তিরপ্যত্র| সর্বস্য চাত্মজানীন্দ্রিযাণি, তেষাং ভাবাভাবহেতুর্দৈবং; তস্মান্নৈকান্ততো জডাদিভ্যো জাতাঃ পিতৃসদৃশরূপা ভবন্তি||১৭||
यच्चोक्तं- यदि च मनुष्यो मनुष्यप्रभवः, कस्मान्न जडादिभ्यो जाताः पितृसदृशरूपा भवन्तीति; तत्रोच्यते- यस्य यस्य ह्यङ्गावयवस्य बीजे बीज भाग उपतप्तो भवति, तस्य तस्याङ्गावयवस्य विकृतिरुपजायते, नोपजायते चानुपतापात्; तस्मादुभयोपपत्तिरप्यत्र| सर्वस्य चात्मजानीन्द्रियाणि, तेषां भावाभावहेतुर्दैवं; तस्मान्नैकान्ततो जडादिभ्यो जाताः पितृसदृशरूपा भवन्ति||१७||
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Adhikarana 22 (18) · Śloka 18
ন চাত্মা সত্স্বিন্দ্রিযেষু জ্ঞঃ, অসত্সু বা ভবত্যজ্ঞঃ; ন হ্যসত্ত্বঃ কদাচিদাত্মা, সত্ত্ববিশেষাচ্চোপলভ্যতে জ্ঞানবিশেষ ইতি||১৮||
न चात्मा सत्स्विन्द्रियेषु ज्ञः, असत्सु वा भवत्यज्ञः; न ह्यसत्त्वः कदाचिदात्मा, सत्त्वविशेषाच्चोपलभ्यते ज्ञानविशेष इति||१८||
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Adhikarana 23 (19) · Śloka 20
ভবন্তি চাত্র- ন কর্তুরিন্দ্রিযাভাবাত্ কার্যজ্ঞানং প্রবর্ততে| যা ক্রিযা বর্ততে ভাবৈঃ সা বিনা তৈর্ন বর্ততে||১৯|| জানন্নপি মৃদোঽভাবাত্ কুম্ভকৃন্ন প্রবর্ততে|২০|
भवन्ति चात्र- न कर्तुरिन्द्रियाभावात् कार्यज्ञानं प्रवर्तते| या क्रिया वर्तते भावैः सा विना तैर्न वर्तते||१९|| जानन्नपि मृदोऽभावात् कुम्भकृन्न प्रवर्तते|२०|
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Adhikarana 24 (20-21) · Śloka 22
শ্রূযতাং চেদমধ্যাত্মমাত্মজ্ঞানবলং মহত্||২০|| ইন্দ্রিযাণি চ সঙ্ক্ষিপ্য মনঃ সঙ্ক্ষিপ্য চঞ্চলম্| প্রবিশ্যাধ্যাত্মমাত্মজ্ঞঃ স্বে জ্ঞানে পর্যবস্থিতঃ||২১|| সর্বত্রাবহিতজ্ঞানঃ সর্বভাবান্ পরীক্ষতে|২২|
श्रूयतां चेदमध्यात्ममात्मज्ञानबलं महत्||२०|| इन्द्रियाणि च सङ्क्षिप्य मनः सङ्क्षिप्य चञ्चलम्| प्रविश्याध्यात्ममात्मज्ञः स्वे ज्ञाने पर्यवस्थितः||२१|| सर्वत्रावहितज्ञानः सर्वभावान् परीक्षते|२२|
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Adhikarana 25 (22-24) · Śloka 24
গৃহ্ণীষ্ব চে(বে)দমপরং ভরদ্বাজ বিনির্ণযম্||২২|| নিবৃত্তেন্দ্রিযবাক্চেষ্টঃ সুপ্তঃ স্বপ্নগতো যদা| বিষযান্ সুখদুঃখে চ বেত্তি নাজ্ঞোঽপ্যতঃ স্মৃতঃ||২৩|| নাত্মজ্ঞানাদৃতে চৈকং জ্ঞানং কিঞ্চিত্ প্রবর্ততে| ন হ্যেকো বর্ততে ভাবো বর্ততে নাপ্যহেতুকঃ||২৪||
गृह्णीष्व चे(वे)दमपरं भरद्वाज विनिर्णयम्||२२|| निवृत्तेन्द्रियवाक्चेष्टः सुप्तः स्वप्नगतो यदा| विषयान् सुखदुःखे च वेत्ति नाज्ञोऽप्यतः स्मृतः||२३|| नात्मज्ञानादृते चैकं ज्ञानं किञ्चित् प्रवर्तते| न ह्येको वर्तते भावो वर्तते नाप्यहेतुकः||२४||
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Adhikarana 26 (25) · Śloka 25
তস্মাজ্জ্ঞঃ প্রকৃতিশ্চাত্মা দ্রষ্টা কারণমেব চ| সর্বমেতদ্ভরদ্বাজ নির্ণীতং জহি সংশযম্||২৫||
तस्माज्ज्ञः प्रकृतिश्चात्मा द्रष्टा कारणमेव च| सर्वमेतद्भरद्वाज निर्णीतं जहि संशयम्||२५||
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Adhikarana 27 (26-27) · Śloka 27
তত্র শ্লোকৌ- হেতুর্গর্ভস্য নির্বৃত্তৌ বৃদ্ধৌ জন্মনি চৈব যঃ| পুনর্বসুমতির্যা চ ভরদ্বাজমতিশ্চ যা||২৬|| প্রতিজ্ঞাপ্রতিষেধশ্চ বিশদশ্চাত্মনির্ণযঃ| গর্ভাবক্রান্তিমুদ্দিশ্য খুড্ডীকাং তত্প্রকাশিতম্||২৭||
तत्र श्लोकौ- हेतुर्गर्भस्य निर्वृत्तौ वृद्धौ जन्मनि चैव यः| पुनर्वसुमतिर्या च भरद्वाजमतिश्च या||२६|| प्रतिज्ञाप्रतिषेधश्च विशदश्चात्मनिर्णयः| गर्भावक्रान्तिमुद्दिश्य खुड्डीकां तत्प्रकाशितम्||२७||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 3
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শারীরস্থানে খুড্ডীকাগর্ভাবক্রান্তিশারীরং নাম তৃতীযোঽধ্যাযঃ||৩||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने खुड्डीकागर्भावक्रान्तिशारीरं नाम तृतीयोऽध्यायः||३||
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