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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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1. kalpanāsiddhiḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ কল্পনাসিদ্ধিং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातः कल्पनासिद्धिं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3-5) · Śloka 6

কা কল্পনা পঞ্চসু কর্মসূক্তা, ক্রমশ্চ কঃ, কিং চ কৃতাকৃতেষু| লিড্গং তথৈবাতিকৃতেষু, সঙ্খ্যা কা, কিঙ্গুণঃ, কেষু চ কশ্চ বস্তিঃ||৩|| কিং বর্জনীযং প্রতিকর্মকালে, কৃতে কিযান্ বা পরিহারকালঃ| প্রণীযমানশ্চ ন যাতি কেন, কেনৈতি শীঘ্রং, সুচিরাচ্চ বস্তিঃ||৪|| সাধ্যা গদাঃ স্বৈঃ শমনৈশ্চ কেচিত্ কস্মাত্ প্রযুক্তৈর্ন শমং ব্রজন্তি| প্রচোদিতঃ শিষ্যবরেণ সম্যগিত্যগ্নিবেশেন ভিষগ্বরিষ্ঠঃ||৫|| পুনর্বসুস্তন্ত্রবিদাহ তস্মৈ সর্বপ্রজানাং হিতকাম্যযেদম্|৬|

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का कल्पना पञ्चसु कर्मसूक्ता, क्रमश्च कः, किं च कृताकृतेषु| लिड्गं तथैवातिकृतेषु, सङ्ख्या का, किङ्गुणः, केषु च कश्च बस्तिः||३|| किं वर्जनीयं प्रतिकर्मकाले, कृते कियान् वा परिहारकालः| प्रणीयमानश्च न याति केन, केनैति शीघ्रं, सुचिराच्च बस्तिः||४|| साध्या गदाः स्वैः शमनैश्च केचित् कस्मात् प्रयुक्तैर्न शमं व्रजन्ति| प्रचोदितः शिष्यवरेण सम्यगित्यग्निवेशेन भिषग्वरिष्ठः||५|| पुनर्वसुस्तन्त्रविदाह तस्मै सर्वप्रजानां हितकाम्ययेदम्|६|

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Adhikarana 3 (6) · Śloka 7

ত্র্যহাবরং সপ্তদিনং পরং তু স্নিগ্ধো নরঃ স্বেদযিতব্য উক্তঃ ||৬|| নাতঃ পরং স্নেহনমাদিশন্তি সাত্ম্যীভবেত্ সপ্তদিনাত্ পরং তু|৭|

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त्र्यहावरं सप्तदिनं परं तु स्निग्धो नरः स्वेदयितव्य उक्तः ||६|| नातः परं स्नेहनमादिशन्ति सात्म्यीभवेत् सप्तदिनात् परं तु|७|

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Adhikarana 4 (7) · Śloka 7

স্নেহোঽনিলং হন্তি মৃদূকরোতি দেহং মলানাং বিনিহন্তি সঙ্গম্||৭||

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स्नेहोऽनिलं हन्ति मृदूकरोति देहं मलानां विनिहन्ति सङ्गम्||७||

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Adhikarana 5 (8) · Śloka 8

স্নিগ্ধস্য সূক্ষ্মেষ্বযনেষু লীনং স্বেদস্তু দোষং নযতি দ্রবত্বম্|৮|

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स्निग्धस्य सूक्ष्मेष्वयनेषु लीनं स्वेदस्तु दोषं नयति द्रवत्वम्|८|

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Adhikarana 6 (8) · Śloka 9

গ্রাম্যৌদকানূপরসৈঃ সমাংসৈরুত্ক্লেশনীযঃ পযসা চ বম্যঃ||৮|| রসৈস্তথা জাঙ্গলজৈঃ সযূষৈঃ স্নিগ্ধৈঃ কফাবৃদ্ধিকরৈর্বিরেচ্যঃ|৯|

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ग्राम्यौदकानूपरसैः समांसैरुत्क्लेशनीयः पयसा च वम्यः||८|| रसैस्तथा जाङ्गलजैः सयूषैः स्निग्धैः कफावृद्धिकरैर्विरेच्यः|९|

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Adhikarana 7 (9) · Śloka 10

শ্লেষ্মোত্তরশ্ছর্দযতি হ্যদুঃখং বিরিচ্যতে মন্দকফস্তু সম্যক্||৯|| অধঃ কফেঽল্পে বমনং বিরেচযেদ্বিরেচনং বৃদ্ধকফে তথোর্ধ্বম্|১০|

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श्लेष्मोत्तरश्छर्दयति ह्यदुःखं विरिच्यते मन्दकफस्तु सम्यक्||९|| अधः कफेऽल्पे वमनं विरेचयेद्विरेचनं वृद्धकफे तथोर्ध्वम्|१०|

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Adhikarana 8 (10) · Śloka 11

স্নিগ্ধায দেযং বমনং যথোক্তং বান্তস্য পেযাদিরনুক্রমশ্চ||১০|| স্নিগ্ধস্য সুস্বিন্নতনোর্যথাবদ্বিরেচনং যোগ্যতমং প্রযোজ্যম্ |১১|

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स्निग्धाय देयं वमनं यथोक्तं वान्तस्य पेयादिरनुक्रमश्च||१०|| स्निग्धस्य सुस्विन्नतनोर्यथावद्विरेचनं योग्यतमं प्रयोज्यम् |११|

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Adhikarana 9 (11) · Śloka 12

পেযাং বিলেপীমকৃতং কৃতং চ যূষং রসং ত্রির্দ্বিরথৈকশশ্চ||১১|| ক্রমেণ সেবেত বিশুদ্ধকাযঃ প্রধানমধ্যাবরশুদ্ধিশুদ্ধঃ|১২|

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पेयां विलेपीमकृतं कृतं च यूषं रसं त्रिर्द्विरथैकशश्च||११|| क्रमेण सेवेत विशुद्धकायः प्रधानमध्यावरशुद्धिशुद्धः|१२|

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Adhikarana 10 (12) · Śloka 13

যথাঽণুরগ্নিস্তৃণগোমযাদ্যৈঃ সন্ধুক্ষ্যমাণো ভবতি ক্রমেণ||১২|| মহান্ স্থিরঃ সর্বপচস্তথৈব শুদ্ধস্য পেযাদিভিরন্তরগ্নিঃ|১৩|

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यथाऽणुरग्निस्तृणगोमयाद्यैः सन्धुक्ष्यमाणो भवति क्रमेण||१२|| महान् स्थिरः सर्वपचस्तथैव शुद्धस्य पेयादिभिरन्तरग्निः|१३|

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Adhikarana 11 (13-14) · Śloka 15

জঘন্যমধ্যপ্রবরে তু বেগাশ্চত্বার ইষ্টা বমনে ষডষ্টৌ||১৩|| দশৈব তে দ্বিত্রিগুণা বিরেকে প্রস্থস্তথা দ্বিত্রিচতুর্গুণশ্চ| পিত্তান্তমিষ্টং বমনং বিরেকাদর্ধং কফান্তং চ বিরেকমাহুঃ||১৪|| দ্বিত্রান্ সবিট্কানপনীয বেগান্মেযং বিরেকে বমনে তু পীতম্|১৫|

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जघन्यमध्यप्रवरे तु वेगाश्चत्वार इष्टा वमने षडष्टौ||१३|| दशैव ते द्वित्रिगुणा विरेके प्रस्थस्तथा द्वित्रिचतुर्गुणश्च| पित्तान्तमिष्टं वमनं विरेकादर्धं कफान्तं च विरेकमाहुः||१४|| द्वित्रान् सविट्कानपनीय वेगान्मेयं विरेके वमने तु पीतम्|१५|

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Adhikarana 12 (15) · Śloka 16

ক্রমাত্ কফঃ পিত্তমথানিলশ্চ যস্যৈতি সম্যগ্বমিতঃ স ইষ্টঃ||১৫|| হৃত্পার্শ্বমূর্ধেন্দ্রিযমার্গশুদ্ধৌ তথা লঘুত্বেঽপি চ লক্ষ্যমাণে|১৬|

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क्रमात् कफः पित्तमथानिलश्च यस्यैति सम्यग्वमितः स इष्टः||१५|| हृत्पार्श्वमूर्धेन्द्रियमार्गशुद्धौ तथा लघुत्वेऽपि च लक्ष्यमाणे|१६|

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Adhikarana 13 (16) · Śloka 16

দুশ্ছর্দিতে স্ফোটককোঠকণ্ডূহৃত্খাবিশুদ্ধির্গুরুগাত্রতাং চ||১৬||

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दुश्छर्दिते स्फोटककोठकण्डूहृत्खाविशुद्धिर्गुरुगात्रतां च||१६||

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Adhikarana 14 (17) · Śloka 17

তৃণ্মোহমূর্চ্ছানিলকোপনিদ্রাবলাদিহানির্বমনেঽতি চ স্যাত্|১৭|

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तृण्मोहमूर्च्छानिलकोपनिद्राबलादिहानिर्वमनेऽति च स्यात्|१७|

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Adhikarana 15 (17) · Śloka 18

স্রোতোবিশুদ্ধীন্দ্রিযসম্প্রসাদৌ লঘুত্বমূর্জোঽগ্নিরনামযত্বম্||১৭|| প্রাপ্তিশ্চ বিট্পিত্তকফানিলানাং সম্যগ্বিরিক্তস্য ভবেত্ ক্রমেণ|১৮|

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स्रोतोविशुद्धीन्द्रियसम्प्रसादौ लघुत्वमूर्जोऽग्निरनामयत्वम्||१७|| प्राप्तिश्च विट्पित्तकफानिलानां सम्यग्विरिक्तस्य भवेत् क्रमेण|१८|

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Adhikarana 16 (18) · Śloka 19

স্যাচ্ছ্লেষ্মপিত্তানিলসম্প্রকোপঃ সাদস্তথাঽগ্নের্গুরুতা প্রতিশ্যা||১৮|| তন্দ্রা তথা চ্ছর্দিররোচকশ্চ বাতানুলোম্যং ন চ দুর্বিরিক্তে|১৯|

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स्याच्छ्लेष्मपित्तानिलसम्प्रकोपः सादस्तथाऽग्नेर्गुरुता प्रतिश्या||१८|| तन्द्रा तथा च्छर्दिररोचकश्च वातानुलोम्यं न च दुर्विरिक्ते|१९|

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Adhikarana 17 (19) · Śloka 20

কফাস্রপিত্তক্ষযজানিলোত্থাঃ সুপ্ত্যঙ্গমর্দক্লমবেপনাদ্যাঃ||১৯|| নিদ্রাবলাভাবতমঃপ্রবেশাঃ সোন্মাদহিক্কাশ্চ বিরেচিতেঽতি|২০|

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कफास्रपित्तक्षयजानिलोत्थाः सुप्त्यङ्गमर्दक्लमवेपनाद्याः||१९|| निद्राबलाभावतमःप्रवेशाः सोन्मादहिक्काश्च विरेचितेऽति|२०|

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Adhikarana 18 (20-21) · Śloka 22

সংসৃষ্টভক্তং নবমেঽহ্নি সর্পিস্তং পাযযেতাপ্যনুবাসযেদ্বা||২০|| তৈলাক্তগাত্রায ততো নিরূহং দদ্যাত্র্যহান্নাতিবুভুক্ষিতায| প্রস্যাগতে ধন্বরসেন ভোজ্যঃ সমীক্ষ্য বা দোষবলং যথার্হম্||২১|| নরস্ততো নিশ্যনুবাসনার্হো নাত্যাশিতঃ স্যাদনুবাসনীযঃ |২২|

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संसृष्टभक्तं नवमेऽह्नि सर्पिस्तं पाययेताप्यनुवासयेद्वा||२०|| तैलाक्तगात्राय ततो निरूहं दद्यात्र्यहान्नातिबुभुक्षिताय| प्रस्यागते धन्वरसेन भोज्यः समीक्ष्य वा दोषबलं यथार्हम्||२१|| नरस्ततो निश्यनुवासनार्हो नात्याशितः स्यादनुवासनीयः |२२|

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Adhikarana 19 (22) · Śloka 23

শীতে বসন্তে চ দিবাঽনুবাস্যো রাত্রৌ শরদ্গ্রীষ্মঘনাগমেষু||২২|| তানেব দোষান্ পরিরক্ষতা যে স্নেহস্য পানে পরিকীর্তিতাঃ প্রাক্|২৩|

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शीते वसन्ते च दिवाऽनुवास्यो रात्रौ शरद्ग्रीष्मघनागमेषु||२२|| तानेव दोषान् परिरक्षता ये स्नेहस्य पाने परिकीर्तिताः प्राक्|२३|

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Adhikarana 20 (23-24) · Śloka 24

প্রত্যাগতে চাপ্যনুবাসনীযে দিবা প্রদেযং ব্যুষিতায ভোজ্যম্||২৩|| সাযং চ ভোজ্যং পরতো দ্ব্যহে বা ত্র্যহেঽনুবাস্যোঽহনি পঞ্চমে বা | ত্র্যহে ত্র্যহে বাঽপ্যথ পঞ্চমে বা দদ্যান্নিরূহাদনুবাসনং চ||২৪||

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प्रत्यागते चाप्यनुवासनीये दिवा प्रदेयं व्युषिताय भोज्यम्||२३|| सायं च भोज्यं परतो द्व्यहे वा त्र्यहेऽनुवास्योऽहनि पञ्चमे वा | त्र्यहे त्र्यहे वाऽप्यथ पञ्चमे वा दद्यान्निरूहादनुवासनं च||२४||

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Adhikarana 21 (25) · Śloka 25

একং তথা ত্রীন্ কফজে বিকারে পিত্তাত্মকে পঞ্চ তু সপ্ত বাঽপি| বাতে নবৈকাদশ বা পুনর্বা বস্তীনযুগ্মান্ কুশলো বিদধ্যাত্||২৫||

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एकं तथा त्रीन् कफजे विकारे पित्तात्मके पञ्च तु सप्त वाऽपि| वाते नवैकादश वा पुनर्वा बस्तीनयुग्मान् कुशलो विदध्यात्||२५||

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Adhikarana 22 (26) · Śloka 26

নরো বিরিক্তস্তু নিরূহদানং বিবর্জযেত্ সপ্তদিনান্যবশ্যম্| শুদ্ধো নিরূহেণ বিরেচনং চ তদ্ধ্যস্য শূন্যং বিকসেচ্ছরীরম্||২৬||

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नरो विरिक्तस्तु निरूहदानं विवर्जयेत् सप्तदिनान्यवश्यम्| शुद्धो निरूहेण विरेचनं च तद्ध्यस्य शून्यं विकसेच्छरीरम्||२६||

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Adhikarana 23 (27-28) · Śloka 28

বস্তির্বযঃস্থাপযিতা সুখাযুর্বলাগ্নিমেধাস্বরবর্ণকৃচ্চ| সর্বার্থকারী শিশুবৃদ্ধযূনাং নিরত্যযঃ সর্বগদাপহশ্চ||২৭|| বিট্শ্লেষ্মপিত্তানিলমূত্রকর্ষী দার্ঢ্যাবহঃ শুক্রবলপ্রদশ্চ| বিশ্বক্স্থিতং দোষচযং নিরস্য সর্বান্ বিকারান্ শমযেন্নিরূহঃ||২৮||

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बस्तिर्वयःस्थापयिता सुखायुर्बलाग्निमेधास्वरवर्णकृच्च| सर्वार्थकारी शिशुवृद्धयूनां निरत्ययः सर्वगदापहश्च||२७|| विट्श्लेष्मपित्तानिलमूत्रकर्षी दार्ढ्यावहः शुक्रबलप्रदश्च| विश्वक्स्थितं दोषचयं निरस्य सर्वान् विकारान् शमयेन्निरूहः||२८||

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Adhikarana 24 (29-31) · Śloka 31

দেহে নিরূহেণ বিশুদ্ধমার্গে সংস্নেহনং বর্ণবলপ্রদং চ| ন তৈলদানাত্ পরমস্তি কিঞ্চিদ্দ্রব্যং বিশেষেণ সমীরণার্তে ||২৯|| স্নেহেন রৌক্ষ্যং লঘুতাং গুরুত্বাদৌষ্ণ্যাচ্চ শৈত্যং পবনস্য হত্বা| তৈলং দদাত্যাশু মনঃপ্রসাদং বীর্যং বলং বর্ণমথাগ্নিপুষ্টিম্ ||৩০|| মূলে নিষিক্তো হি যথা দ্রুমঃ স্যান্নীলচ্ছদঃ কোমলপল্লবাগ্র্যঃ| কালে মহান্ পুষ্পফলপ্রদশ্চ তথা নরঃ স্যাদনুবাসনেন||৩১||

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देहे निरूहेण विशुद्धमार्गे संस्नेहनं वर्णबलप्रदं च| न तैलदानात् परमस्ति किञ्चिद्द्रव्यं विशेषेण समीरणार्ते ||२९|| स्नेहेन रौक्ष्यं लघुतां गुरुत्वादौष्ण्याच्च शैत्यं पवनस्य हत्वा| तैलं ददात्याशु मनःप्रसादं वीर्यं बलं वर्णमथाग्निपुष्टिम् ||३०|| मूले निषिक्तो हि यथा द्रुमः स्यान्नीलच्छदः कोमलपल्लवाग्र्यः| काले महान् पुष्पफलप्रदश्च तथा नरः स्यादनुवासनेन||३१||

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Adhikarana 25 (32-34) · Śloka 34

স্তব্ধাশ্চ যে সঙ্কুচিতাশ্চ যেঽপি যে পঙ্গবো যেঽপি চ ভগ্নরুগ্ণাঃ| যেষাং চ শাখাসু চরন্তি বাতাঃ শস্তো বিশেষেণ হি তেষু বস্তিঃ||৩২|| আধ্মাপনে বিগ্রথিতে পুরীষে শূলে চ ভক্তানভিনন্দনে চ| এবম্প্রকারাশ্চ ভবন্তি কুক্ষৌ যে চামযাস্তেষু চ বস্তিরিষ্টঃ||৩৩|| যাশ্চ স্ত্রিযো বাতকৃতোপসর্গা গর্ভং ন গৃহ্ণন্তি নৃভিঃ সমেতাঃ| ক্ষীণেন্দ্রিযা যে চ নরাঃ কৃশাশ্চ বস্তিঃ প্রশস্তঃ পরমং চ তেষু||৩৪||

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स्तब्धाश्च ये सङ्कुचिताश्च येऽपि ये पङ्गवो येऽपि च भग्नरुग्णाः| येषां च शाखासु चरन्ति वाताः शस्तो विशेषेण हि तेषु बस्तिः||३२|| आध्मापने विग्रथिते पुरीषे शूले च भक्तानभिनन्दने च| एवम्प्रकाराश्च भवन्ति कुक्षौ ये चामयास्तेषु च बस्तिरिष्टः||३३|| याश्च स्त्रियो वातकृतोपसर्गा गर्भं न गृह्णन्ति नृभिः समेताः| क्षीणेन्द्रिया ये च नराः कृशाश्च बस्तिः प्रशस्तः परमं च तेषु||३४||

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Adhikarana 26 (35) · Śloka 35

উষ্ণাভিভূতেষু বদন্তি শীতাঞ্ছীতাভিভূতেষু তথা সুখোষ্ণান্| তত্প্রত্যনীকৌষধসম্প্রযুক্তান্ সর্বত্র বস্তীন্ প্রবিভজ্য যুঞ্জ্যাত্ ||৩৫||

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उष्णाभिभूतेषु वदन्ति शीताञ्छीताभिभूतेषु तथा सुखोष्णान्| तत्प्रत्यनीकौषधसम्प्रयुक्तान् सर्वत्र बस्तीन् प्रविभज्य युञ्ज्यात् ||३५||

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Adhikarana 27 (36) · Śloka 36

ন বৃংহণীযান্ বিদধীত বস্তীন্ বিশোধনীযেষু গদেষু বৈদ্যঃ| কুষ্ঠপ্রমেহাদিষু মেদুরেষু নরেষু যে চাপি বিশোধনীযাঃ||৩৬||

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न बृंहणीयान् विदधीत बस्तीन् विशोधनीयेषु गदेषु वैद्यः| कुष्ठप्रमेहादिषु मेदुरेषु नरेषु ये चापि विशोधनीयाः||३६||

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Adhikarana 28 (37) · Śloka 37

ক্ষীণক্ষতানাং ন বিশোধনীযান্ন শোষিণাং নো ভৃশদুর্বলানাম্| ন মূর্চ্ছিতানাং ন বিশোধিতানাং যেষাং চ দোষেষু নিবদ্ধমাযুঃ||৩৭||

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क्षीणक्षतानां न विशोधनीयान्न शोषिणां नो भृशदुर्बलानाम्| न मूर्च्छितानां न विशोधितानां येषां च दोषेषु निबद्धमायुः||३७||

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Adhikarana 29 (38-39) · Śloka 40

শাখাগতাঃ কোষ্ঠগতাশ্চ রোগা মর্মোর্ধ্বসর্বাবযবাঙ্গজাশ্চ| যে সন্তি তেষাং ন হি কশ্চিদন্যো বাযোঃ পরং জন্মনি হেতুরস্তি||৩৮|| বিণ্মূত্রপিত্তাদিমলাশযানাং বিক্ষেপসঙ্ঘাতকরঃ স যস্মাত্| তস্যাতিবৃদ্ধস্য শমায নান্যদ্বস্তিং বিনা ভেষজমস্তি কিঞ্চিত্||৩৯|| তস্মাচ্চিকিত্সার্ধমিতি ব্রুবন্তি সর্বাং চিকিত্সামপি বস্তিমেকে|৪০|

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शाखागताः कोष्ठगताश्च रोगा मर्मोर्ध्वसर्वावयवाङ्गजाश्च| ये सन्ति तेषां न हि कश्चिदन्यो वायोः परं जन्मनि हेतुरस्ति||३८|| विण्मूत्रपित्तादिमलाशयानां विक्षेपसङ्घातकरः स यस्मात्| तस्यातिवृद्धस्य शमाय नान्यद्बस्तिं विना भेषजमस्ति किञ्चित्||३९|| तस्माच्चिकित्सार्धमिति ब्रुवन्ति सर्वां चिकित्सामपि बस्तिमेके|४०|

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Adhikarana 30 (40) · Śloka 41

নাভিপ্রদেশং কটিপার্শ্বকুক্ষিং গত্বা শকৃদ্দোষচযং বিলোড্য ||৪০|| সংস্নেহ্য কাযং সপুরীষদোষঃ সম্যক্ সুখেনৈতি চ যঃ স বস্তিঃ |৪১|

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नाभिप्रदेशं कटिपार्श्वकुक्षिं गत्वा शकृद्दोषचयं विलोड्य ||४०|| संस्नेह्य कायं सपुरीषदोषः सम्यक् सुखेनैति च यः स बस्तिः |४१|

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Adhikarana 31 (41) · Śloka 42

প্রসৃষ্টবিণ্মূত্রসমীরণত্বং রুচ্যগ্নিবৃদ্ধ্যাশযলাঘবানি||৪১|| রোগোপশান্তিঃ প্রকৃতিস্থতা চ বলং চ তত্ স্যাত্ সুনিরূঢলিঙ্গম্|৪২|

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प्रसृष्टविण्मूत्रसमीरणत्वं रुच्यग्निवृद्ध्याशयलाघवानि||४१|| रोगोपशान्तिः प्रकृतिस्थता च बलं च तत् स्यात् सुनिरूढलिङ्गम्|४२|

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Adhikarana 32 (42) · Śloka 43

স্যাদ্রুক্ছিরোহৃদ্গুদবস্তিলিঙ্গে শোফঃ প্রতিশ্যাযবিকর্তিকে চ||৪২|| হৃল্লাসিকা মারুতমূত্রসঙ্গঃ শ্বাসো ন সম্যক্ চ নিরূহিতে স্যুঃ|৪৩|

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स्याद्रुक्छिरोहृद्गुदबस्तिलिङ्गे शोफः प्रतिश्यायविकर्तिके च||४२|| हृल्लासिका मारुतमूत्रसङ्गः श्वासो न सम्यक् च निरूहिते स्युः|४३|

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Adhikarana 33 (43) · Śloka 43

লিঙ্গং যদেবাতিবিরেচিতস্য ভবেত্তদেবাতিনিরূহিতস্য||৪৩||

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लिङ्गं यदेवातिविरेचितस्य भवेत्तदेवातिनिरूहितस्य||४३||

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Adhikarana 34 (44) · Śloka 44

প্রত্যেত্যসক্তং সশকৃচ্চ তৈলং রক্তাদিবুদ্ধীন্দ্রিযসম্প্রসাদঃ | স্বপ্নানুবৃত্তির্লঘুতা বলং চ সৃষ্টাশ্চ বেগাঃ স্বনুবাসিতে স্যুঃ||৪৪||

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प्रत्येत्यसक्तं सशकृच्च तैलं रक्तादिबुद्धीन्द्रियसम्प्रसादः | स्वप्नानुवृत्तिर्लघुता बलं च सृष्टाश्च वेगाः स्वनुवासिते स्युः||४४||

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Adhikarana 35 (45) · Śloka 46

অধঃশরীরোদরবাহুপৃষ্ঠপার্শ্বেষু রুগ্রূক্ষখরং চ গাত্রম্ | গ্রহশ্চ বিণ্মূত্রসমীরণানামসম্যগেতান্যনুবাসিতস্য ||৪৫|| হৃল্লাসমোহক্লমসাদমূর্চ্ছাবিকর্তিকা চাত্যনুবাসিতস্য|৪৬|

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अधःशरीरोदरबाहुपृष्ठपार्श्वेषु रुग्रूक्षखरं च गात्रम् | ग्रहश्च विण्मूत्रसमीरणानामसम्यगेतान्यनुवासितस्य ||४५|| हृल्लासमोहक्लमसादमूर्च्छाविकर्तिका चात्यनुवासितस्य|४६|

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Adhikarana 36 (46) · Śloka 47

যস্যেহ যামাননুবর্ততে ত্রীন্ স্নেহো নরঃ স্যাত্ স বিশুদ্ধদেহঃ||৪৬|| আশ্বাগতেঽন্যস্তু পুনর্বিধেযঃ স্নেহো ন সংস্নেহযতি হ্যতিষ্ঠন্|৪৭|

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यस्येह यामाननुवर्तते त्रीन् स्नेहो नरः स्यात् स विशुद्धदेहः||४६|| आश्वागतेऽन्यस्तु पुनर्विधेयः स्नेहो न संस्नेहयति ह्यतिष्ठन्|४७|

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Adhikarana 37 (47-48) · Śloka 49

ত্রিংশন্মতাঃ কর্ম নু বস্তযো হি কালস্ততোঽর্ধেন ততশ্চ যোগঃ||৪৭|| সান্বাসনা দ্বাদশ বৈ নিরূহাঃ প্রাক্ স্নেহ একঃ পরতশ্চ পঞ্চ| কালে ত্রযোঽন্তে পুরতস্তথৈকঃ স্নেহা নিরূহান্তরিতাশ্চ ষট্ স্যুঃ||৪৮|| যোগে নিরূহাস্ত্রয এব দেযাঃ স্নেহাশ্চ পঞ্চৈব পরাদিমধ্যাঃ|৪৯|

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त्रिंशन्मताः कर्म नु बस्तयो हि कालस्ततोऽर्धेन ततश्च योगः||४७|| सान्वासना द्वादश वै निरूहाः प्राक् स्नेह एकः परतश्च पञ्च| काले त्रयोऽन्ते पुरतस्तथैकः स्नेहा निरूहान्तरिताश्च षट् स्युः||४८|| योगे निरूहास्त्रय एव देयाः स्नेहाश्च पञ्चैव परादिमध्याः|४९|

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Adhikarana 38 (49) · Śloka 50

ত্রীন্ পঞ্চ বাঽঽহুশ্চতুরোঽথ ষড্বা বাতাদিকানামনুবাসনীযান্ ||৪৯|| স্নেহান্ প্রদাযাশু ভিষগ্বিদধ্যাত্ স্রোতোবিশুদ্যর্থমতো নিরূহান্|৫০|

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त्रीन् पञ्च वाऽऽहुश्चतुरोऽथ षड्वा वातादिकानामनुवासनीयान् ||४९|| स्नेहान् प्रदायाशु भिषग्विदध्यात् स्रोतोविशुद्यर्थमतो निरूहान्|५०|

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Adhikarana 39 (50-52) · Śloka 53

বিশুদ্ধদেহস্য ততঃ ক্রমেণ স্নিগ্ধং তলস্বেদিতমুত্তমাঙ্গম্||৫০|| বিরেচযেত্ত্রির্দ্বিরথৈকশো বা বলং সমীক্ষ্য ত্রিবিধং মলানাম্| উরঃশিরোলাঘবমিন্দ্রিযাচ্ছ্যং স্রোতোবিশুদ্ধিশ্চ ভবেদ্বিশুদ্ধে||৫১|| গলোপলেপঃ শিরসো গুরুত্বং নিষ্ঠীবনং চাপ্যথ দুর্বিরিক্তে| শিরোক্ষিশঙ্খশ্রবণার্তিতোদাবত্যর্থশুদ্ধে তিমিরং চ পশ্যেত্||৫২|| স্যাত্তর্পণং তত্র মৃদু দ্রবং চ স্নিগ্ধস্য তীক্ষ্ণং তু পুনর্ন যোগে|৫৩|

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विशुद्धदेहस्य ततः क्रमेण स्निग्धं तलस्वेदितमुत्तमाङ्गम्||५०|| विरेचयेत्त्रिर्द्विरथैकशो वा बलं समीक्ष्य त्रिविधं मलानाम्| उरःशिरोलाघवमिन्द्रियाच्छ्यं स्रोतोविशुद्धिश्च भवेद्विशुद्धे||५१|| गलोपलेपः शिरसो गुरुत्वं निष्ठीवनं चाप्यथ दुर्विरिक्ते| शिरोक्षिशङ्खश्रवणार्तितोदावत्यर्थशुद्धे तिमिरं च पश्येत्||५२|| स्यात्तर्पणं तत्र मृदु द्रवं च स्निग्धस्य तीक्ष्णं तु पुनर्न योगे|५३|

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Adhikarana 40 (53) · Śloka 53

ইত্যাতুরস্বস্থসুখঃ প্রযোগো বলাযুষোর্বৃদ্ধিকৃদামযঘ্নঃ||৫৩||

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इत्यातुरस्वस्थसुखः प्रयोगो बलायुषोर्वृद्धिकृदामयघ्नः||५३||

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Adhikarana 41 (54) · Śloka 54

কালস্তু বস্ত্যাদিষু যাতি যাবাংস্তাবান্ ভবেদ্দ্বিঃ পরিহারকালঃ|৫৪|

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कालस्तु बस्त्यादिषु याति यावांस्तावान् भवेद्द्विः परिहारकालः|५४|

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Adhikarana 42 (54) · Śloka 55

অত্যাসনস্থানবচাংসি যানং স্বপ্নং দিবা মৈথুনবেগরোধান্||৫৪|| শীতোপচারাতপশোকরোষাংস্ত্যজেদকালাহিতভোজনং চ|৫৫|

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अत्यासनस्थानवचांसि यानं स्वप्नं दिवा मैथुनवेगरोधान्||५४|| शीतोपचारातपशोकरोषांस्त्यजेदकालाहितभोजनं च|५५|

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Adhikarana 43 (55) · Śloka 56

বদ্ধে প্রণীতে বিষমং চ নেত্রে মার্গে তথাঽর্শঃকফবিড্বিবদ্ধে ||৫৫|| ন যাতি বস্তির্ন সুখং নিরেতি দোষাবৃতোঽল্পো যদি বাঽল্পবীর্যঃ|৫৬|

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बद्धे प्रणीते विषमं च नेत्रे मार्गे तथाऽर्शःकफविड्विबद्धे ||५५|| न याति बस्तिर्न सुखं निरेति दोषावृतोऽल्पो यदि वाऽल्पवीर्यः|५६|

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Adhikarana 44 (56) · Śloka 57

প্রাপ্তে তু বর্চোনিলমূত্রবেগে বাতেঽতিবৃদ্ধেঽল্পবলে গুদে বা||৫৬|| অত্যুষ্ণতীক্ষ্ণশ্চ মৃদৌ চ কোষ্ঠে প্রণীতমাত্রঃ পুনরেতি বস্তিঃ|৫৭|

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प्राप्ते तु वर्चोनिलमूत्रवेगे वातेऽतिवृद्धेऽल्पबले गुदे वा||५६|| अत्युष्णतीक्ष्णश्च मृदौ च कोष्ठे प्रणीतमात्रः पुनरेति बस्तिः|५७|

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Adhikarana 45 (57-58) · Śloka 59

মেদঃকফাভ্যামনিলো নিরুদ্ধঃ শূলাঙ্গসুপ্তিশ্বযথূন্ করোতি||৫৭|| স্নেহং তু যুঞ্জন্নবুধস্তু তস্মৈ সংবর্ধযত্যেব হি তান্ বিকারান্| রোগাস্তথাঽন্যেঽপ্যবিতর্ক্যমাণাঃ পরস্পরেণাবগৃহীতমার্গাঃ||৫৮|| সন্দূষিতা ধাতুভিরেব চান্যৈঃ স্বৈর্ভেষজৈর্নোপশমং ব্রজন্তি|৫৯|

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मेदःकफाभ्यामनिलो निरुद्धः शूलाङ्गसुप्तिश्वयथून् करोति||५७|| स्नेहं तु युञ्जन्नबुधस्तु तस्मै संवर्धयत्येव हि तान् विकारान्| रोगास्तथाऽन्येऽप्यवितर्क्यमाणाः परस्परेणावगृहीतमार्गाः||५८|| सन्दूषिता धातुभिरेव चान्यैः स्वैर्भेषजैर्नोपशमं व्रजन्ति|५९|

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Adhikarana 46 (59) · Śloka 60

সর্বং চ রোগপ্রশমায কর্ম হীনাতিমাত্রং বিপরীতকালম্||৫৯|| মিথ্যোপচারাচ্চ ন তং বিকারং শান্তিং নযেত্ পথ্যমপি প্রযুক্তম্|৬০|

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सर्वं च रोगप्रशमाय कर्म हीनातिमात्रं विपरीतकालम्||५९|| मिथ्योपचाराच्च न तं विकारं शान्तिं नयेत् पथ्यमपि प्रयुक्तम्|६०|

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Adhikarana 47 (60) · Śloka 61

তত্র শ্লোকঃ- প্রশ্নানিমান্ দ্বাদশ পঞ্চকর্মাণ্যুদ্দিশ্য সিদ্ধাবিহ কল্পনাযাম্||৬০|| প্রজাহিতার্থং ভগবান্ মহার্থান্ সম্যগ্জগাদর্ষিবরোঽত্রিপুত্রঃ||৬১||

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तत्र श्लोकः- प्रश्नानिमान् द्वादश पञ्चकर्माण्युद्दिश्य सिद्धाविह कल्पनायाम्||६०|| प्रजाहितार्थं भगवान् महार्थान् सम्यग्जगादर्षिवरोऽत्रिपुत्रः||६१||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 1

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতেঽপ্রাপ্তে দৃঢবলসম্পূরিতে সিদ্ধিস্থানে কল্পনাসিদ্ধির্নাম প্রথমোঽধ্যাযঃ||১||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृतेऽप्राप्ते दृढबलसम्पूरिते सिद्धिस्थाने कल्पनासिद्धिर्नाम प्रथमोऽध्यायः||१||

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1. kalpanāsiddhiḥ — Charaka Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi