Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 3
অথাতো নেত্রবস্তিব্যাপত্সিদ্ধিং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১||
ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
অথ নেত্রাণি বস্তীংশ্চ শৃণু বর্জ্যানি কর্মসু|
নেত্রস্যাজ্ঞপ্রণীতস্য ব্যাপদঃ সচিকিত্সিতাঃ||৩||
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अथातो नेत्रबस्तिव्यापत्सिद्धिं व्याख्यास्यामः||१||
इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
अथ नेत्राणि बस्तींश्च शृणु वर्ज्यानि कर्मसु|
नेत्रस्याज्ञप्रणीतस्य व्यापदः सचिकित्सिताः||३||
Adhikarana 2 (4-5) · Śloka 5
হ্রস্বং দীর্ঘং তনু স্থূলং জীর্ণং শিথিলবন্ধনম্|
পার্শ্বচ্ছিদ্রং তথা বক্রমষ্টৌ নেত্রাণি বর্জযেত্||৪||
অপ্রাপ্ত্যতিগতিক্ষোভকর্ষণক্ষণনস্রবাঃ|
গুদপীডা গতির্জিহ্মা তেষাং দোষা যথাক্রমম্||৫||
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ह्रस्वं दीर्घं तनु स्थूलं जीर्णं शिथिलबन्धनम्|
पार्श्वच्छिद्रं तथा वक्रमष्टौ नेत्राणि वर्जयेत्||४||
अप्राप्त्यतिगतिक्षोभकर्षणक्षणनस्रवाः|
गुदपीडा गतिर्जिह्मा तेषां दोषा यथाक्रमम्||५||
Adhikarana 3 (6-7) · Śloka 7
বিষমমাংসলচ্ছিন্নস্থূলজালিকবাতলাঃ|
স্নিগ্ধঃ ক্লিন্নশ্চ তানষ্টৌ বস্তীন্ কর্মসু বর্জযেত্||৬||
গতিবৈষম্যবিস্রত্বস্রাবদৌর্গ্রাহ্যনিস্রবাঃ|
ফেনিলচ্যুত্যধার্যত্বং বস্তেঃ স্যুর্বস্তিদোষতঃ||৭||
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विषममांसलच्छिन्नस्थूलजालिकवातलाः|
स्निग्धः क्लिन्नश्च तानष्टौ बस्तीन् कर्मसु वर्जयेत्||६||
गतिवैषम्यविस्रत्वस्रावदौर्ग्राह्यनिस्रवाः|
फेनिलच्युत्यधार्यत्वं बस्तेः स्युर्बस्तिदोषतः||७||
Adhikarana 4 (8) · Śloka 8
সবাতাতিদ্রুতোত্ক্ষিপ্ততির্যগুল্লুপ্তকম্পিতাঃ|
অতিবাহ্যগমন্দাতিবেগদোষাঃ প্রণেতৃতঃ||৮||
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सवातातिद्रुतोत्क्षिप्ततिर्यगुल्लुप्तकम्पिताः|
अतिबाह्यगमन्दातिवेगदोषाः प्रणेतृतः||८||
Adhikarana 5 (9) · Śloka 10
অনুচ্ছ্বাস্য চ বদ্ধে বা দত্তে নিঃশেষ এব বা|
প্রবিশ্য কুপিতো বাযুঃ শূলতোদকরো ভবেত্||৯||
তত্রাভ্যঙ্গো গুদে স্বেদো বাতঘ্নান্যশনানি চ|১০|
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अनुच्छ्वास्य च बद्धे वा दत्ते निःशेष एव वा|
प्रविश्य कुपितो वायुः शूलतोदकरो भवेत्||९||
तत्राभ्यङ्गो गुदे स्वेदो वातघ्नान्यशनानि च|१०|
Adhikarana 6 (10-11) · Śloka 11
দ্রুতং প্রণীতে নিষ্কৃষ্টে সহসোত্ক্ষিপ্ত এব বা||১০||
স্যাত্ কটীগুদজঙ্ঘার্তিবস্তিস্তম্ভোরুবেদনাঃ |
ভোজনং তত্র বাতঘ্নং স্নেহাঃ স্বেদাঃ সবস্তযঃ||১১||
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द्रुतं प्रणीते निष्कृष्टे सहसोत्क्षिप्त एव वा||१०||
स्यात् कटीगुदजङ्घार्तिबस्तिस्तम्भोरुवेदनाः |
भोजनं तत्र वातघ्नं स्नेहाः स्वेदाः सबस्तयः||११||
Adhikarana 7 (12) · Śloka 12
তির্যগ্বল্যাবৃতদ্বারে বদ্ধে বাঽপি ন গচ্ছতি|
নেত্রে তদৃজু নিষ্কৃষ্য সংশোধ্য চ প্রবেশযেত্||১২||
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तिर्यग्वल्यावृतद्वारे बद्धे वाऽपि न गच्छति|
नेत्रे तदृजु निष्कृष्य संशोध्य च प्रवेशयेत्||१२||
Adhikarana 8 (13-14) · Śloka 15
পীড্যমানেঽন্তরা মুক্তে গুদে প্রতিহতোঽনিলঃ|
উরঃশিরোর্তিমূর্বোশ্চ সদনং জনযেদ্বলী||১৩||
বস্তিঃ স্যাত্তত্র বিল্বাদিফলশ্যামাদিমূত্রবান্|
স্যাদ্দাহো দবথুঃ শোফঃ কম্পনাভিহতে গুদে||১৪||
কষাযমধুরাঃ শীতাঃ সেকাস্তত্র সবস্তযঃ|১৫|
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पीड्यमानेऽन्तरा मुक्ते गुदे प्रतिहतोऽनिलः|
उरःशिरोर्तिमूर्वोश्च सदनं जनयेद्बली||१३||
बस्तिः स्यात्तत्र बिल्वादिफलश्यामादिमूत्रवान्|
स्याद्दाहो दवथुः शोफः कम्पनाभिहते गुदे||१४||
कषायमधुराः शीताः सेकास्तत्र सबस्तयः|१५|
Adhikarana 9 (15-16) · Śloka 16
অতিমাত্রপ্রণীতেন নেত্রেণ ক্ষণনাদ্বলেঃ||১৫||
স্যাত্ সার্তি দাহনিস্তোদগুদবর্চঃপ্রবর্তনম্|
তত্র সর্পিঃ পিচুঃ ক্ষীরং পিচ্ছাবস্তিশ্চ শস্যতে||১৬||
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अतिमात्रप्रणीतेन नेत्रेण क्षणनाद्वलेः||१५||
स्यात् सार्ति दाहनिस्तोदगुदवर्चःप्रवर्तनम्|
तत्र सर्पिः पिचुः क्षीरं पिच्छाबस्तिश्च शस्यते||१६||
Adhikarana 10 (17-18) · Śloka 18
ন ভাবযতি মন্দস্তু বাহ্যস্ত্বাশু নিবর্ততে|
স্নেহস্তত্র পুনঃ সম্যক্ প্রণেযঃ সিদ্ধিমিচ্ছতা||১৭||
অতিপ্রপীডিতঃ কোষ্ঠে তিষ্ঠত্যাযাতি বা গলম্|
তত্র বস্তির্বিরেকশ্চ গলপীডাদি কর্ম চ||১৮||
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न भावयति मन्दस्तु बाह्यस्त्वाशु निवर्तते|
स्नेहस्तत्र पुनः सम्यक् प्रणेयः सिद्धिमिच्छता||१७||
अतिप्रपीडितः कोष्ठे तिष्ठत्यायाति वा गलम्|
तत्र बस्तिर्विरेकश्च गलपीडादि कर्म च||१८||
Adhikarana 11 (19) · Śloka 19
তত্র শ্লোকঃ- নেত্রবস্তিপ্রণেতৄণাং দোষানেতান্ সভেষজান্|
বেত্তি যস্তেন মতিমান্ বস্তিকর্মাণি কারযেত্||১৯||
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तत्र श्लोकः- नेत्रबस्तिप्रणेतॄणां दोषानेतान् सभेषजान्|
वेत्ति यस्तेन मतिमान् बस्तिकर्माणि कारयेत्||१९||
Adhikarana puShpikA · Śloka 5
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতেঽপ্রাপ্তে দৃঢবলসম্পূরিতে সিদ্ধিস্থানে নেত্রবস্তিব্যাপত্সিদ্ধির্নাম পঞ্চমোঽধ্যাযঃ||৫||
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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृतेऽप्राप्ते दृढबलसम्पूरिते सिद्धिस्थाने नेत्रबस्तिव्यापत्सिद्धिर्नाम पञ्चमोऽध्यायः||५||