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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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7. navēgāndhāraṇīyō'dhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো নবেগান্ধারণীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातो नवेगान्धारणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 4

ন বেগান্ ধারযেদ্ধীমাঞ্জাতান্ মূত্রপুরীষযোঃ| ন রেতসো ন বাতস্য ন ছর্দ্যাঃ ক্ষবথোর্ন চ||৩|| নোদ্গারস্য ন জৃম্ভাযা ন বেগান্ ক্ষুত্পিপাসযোঃ| ন বাষ্পস্য ন নিদ্রাযা নিঃশ্বাসস্য শ্রমেণ চ||৪||

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न वेगान् धारयेद्धीमाञ्जातान् मूत्रपुरीषयोः| न रेतसो न वातस्य न छर्द्याः क्षवथोर्न च||३|| नोद्गारस्य न जृम्भाया न वेगान् क्षुत्पिपासयोः| न बाष्पस्य न निद्राया निःश्वासस्य श्रमेण च||४||

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Adhikarana 3 (5-25) · Śloka 25

এতান্ ধারযতো জাতান্ বেগান্ রোগা ভবন্তি যে| পৃথক্পৃথক্চিকিত্সার্থং তান্মে নিগদতঃ শৃণু||৫|| বস্তিমেহনযোঃ শূলং মূত্রকৃচ্ছ্রং শিরোরুজা | বিনামো বঙ্ক্ষণানাহঃ স্যাল্লিঙ্গং মূত্রনিগ্রহে||৬|| স্বেদাবগাহনাভ্যঙ্গান্ সর্পিষশ্চাবপীডকম্ | মূত্রে প্রতিহতে কুর্যাত্ত্রিবিধং বস্তিকর্ম চ||৭|| পক্বাশযশিরঃশূলং বাতবর্চোঽপ্রবর্তনম্ | পিণ্ডিকোদ্বেষ্টনাধ্মানং পুরীষে স্যাদ্বিধারিতে||৮|| স্বেদাভ্যঙ্গাবগাহাশ্চ বর্তযো বস্তিকর্ম চ| হিতং প্রতিহতে বর্চস্যন্নপানং প্রমাথি চ||৯|| মেঢ্রে বৃষণযোঃ শূলমঙ্গমর্দো হৃদি ব্যথা| ভবেত্ প্রতিহতে শুক্রে বিবদ্ধং মূত্রমেব চ||১০|| তত্রাভ্যঙ্গোঽবগাহশ্চ মদিরা চরণাযুধাঃ| শালিঃ পযো নিরূহশ্চ শস্তং মৈথুনমেব চ||১১|| সঙ্গো বিণ্মূত্রবাতানামাধ্মানং বেদনা ক্লমঃ| জঠরে বাতজাশ্চান্যে রোগাঃ স্যুর্বাতনিগ্রহাত্||১২|| স্নেহস্বেদবিধিস্তত্র বর্তযো ভোজনানি চ| পানানি বস্তযশ্চৈব শস্তং বাতানুলোমনম্||১৩|| কণ্ডূকোঠারুচিব্যঙ্গশোথপাণ্ড্বামযজ্বরাঃ| কুষ্ঠহৃল্লাসবীসর্পাশ্ছর্দিনিগ্রহজা গদাঃ||১৪|| ভুক্ত্বা প্রচ্ছর্দনং ধূমো লঙ্ঘনং রক্তমোক্ষণম্| রূক্ষান্নপানং ব্যাযামো বিরেকশ্চাত্র শস্যতে||১৫|| মন্যাস্তম্ভঃ শিরঃশূলমর্দিতার্ধাবভেদকৌ| ইন্দ্রিযাণাং চ দৌর্বল্যং ক্ষবথোঃ স্যাদ্বিধারণাত্||১৬|| তত্রোর্ধ্বজত্রুকেঽভ্যঙ্গঃ স্বেদো ধূমঃ সনাবনঃ| হিতং বাতঘ্নমাদ্যং চ ঘৃতং চৌত্তরভক্তিকম্||১৭|| হিক্কা শ্বাসোঽরুচিঃ কম্পো বিবন্ধো হৃদযোরসোঃ| উদ্গারনিগ্রহাত্তত্র হিক্কাযাস্তুল্যমৌষধম্||১৮|| বিনামাক্ষেপসঙ্কোচাঃ সুপ্তিঃ কম্পঃ প্রবেপনম্| জৃম্ভাযা নিগ্রহাত্তত্র সর্বং বাতঘ্নমৌষধম্||১৯|| কার্শ্যদৌর্বল্যবৈবর্ণ্যমঙ্গমর্দোঽরুচির্ভ্রমঃ| ক্ষুদ্বেগনিগ্রহাত্তত্র স্নিগ্ধোষ্ণং লঘু ভোজনম্||২০|| কণ্ঠাস্যশোষো বাধির্যং শ্রমঃ সাদো হৃদি ব্যথা| পিপাসানিগ্রহাত্তত্র শীতং তর্পণমিষ্যতে||২১|| প্রতিশ্যাযোঽক্ষিরোগশ্চ হৃদ্রোগশ্চারুচির্ভ্রমঃ| বাষ্পনিগ্রহণাত্তত্র স্বপ্নো মদ্যং প্রিযাঃ কথাঃ||২২|| জৃম্ভাঽঙ্গমর্দস্তন্দ্রা চ শিরোরোগোঽক্ষিগৌরবম্| নিদ্রাবিধারণাত্তত্র স্বপ্নঃ সংবাহনানি চ||২৩|| গুল্মহৃদ্রোগসম্মোহাঃ শ্রমনিঃশ্বাসধারণাত্| জাযন্তে তত্র বিশ্রামো বাতঘ্ন্যশ্চ ক্রিযা হিতাঃ||২৪|| বেগনিগ্রহজা রোগা য এতে পরিকীর্তিতাঃ| ইচ্ছংস্তেষামনুত্পত্তিং বেগানেতান্ন ধারযেত্||২৫||

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एतान् धारयतो जातान् वेगान् रोगा भवन्ति ये| पृथक्पृथक्चिकित्सार्थं तान्मे निगदतः शृणु||५|| बस्तिमेहनयोः शूलं मूत्रकृच्छ्रं शिरोरुजा | विनामो वङ्क्षणानाहः स्याल्लिङ्गं मूत्रनिग्रहे||६|| स्वेदावगाहनाभ्यङ्गान् सर्पिषश्चावपीडकम् | मूत्रे प्रतिहते कुर्यात्त्रिविधं बस्तिकर्म च||७|| पक्वाशयशिरःशूलं वातवर्चोऽप्रवर्तनम् | पिण्डिकोद्वेष्टनाध्मानं पुरीषे स्याद्विधारिते||८|| स्वेदाभ्यङ्गावगाहाश्च वर्तयो बस्तिकर्म च| हितं प्रतिहते वर्चस्यन्नपानं प्रमाथि च||९|| मेढ्रे वृषणयोः शूलमङ्गमर्दो हृदि व्यथा| भवेत् प्रतिहते शुक्रे विबद्धं मूत्रमेव च||१०|| तत्राभ्यङ्गोऽवगाहश्च मदिरा चरणायुधाः| शालिः पयो निरूहश्च शस्तं मैथुनमेव च||११|| सङ्गो विण्मूत्रवातानामाध्मानं वेदना क्लमः| जठरे वातजाश्चान्ये रोगाः स्युर्वातनिग्रहात्||१२|| स्नेहस्वेदविधिस्तत्र वर्तयो भोजनानि च| पानानि बस्तयश्चैव शस्तं वातानुलोमनम्||१३|| कण्डूकोठारुचिव्यङ्गशोथपाण्ड्वामयज्वराः| कुष्ठहृल्लासवीसर्पाश्छर्दिनिग्रहजा गदाः||१४|| भुक्त्वा प्रच्छर्दनं धूमो लङ्घनं रक्तमोक्षणम्| रूक्षान्नपानं व्यायामो विरेकश्चात्र शस्यते||१५|| मन्यास्तम्भः शिरःशूलमर्दितार्धावभेदकौ| इन्द्रियाणां च दौर्बल्यं क्षवथोः स्याद्विधारणात्||१६|| तत्रोर्ध्वजत्रुकेऽभ्यङ्गः स्वेदो धूमः सनावनः| हितं वातघ्नमाद्यं च घृतं चौत्तरभक्तिकम्||१७|| हिक्का श्वासोऽरुचिः कम्पो विबन्धो हृदयोरसोः| उद्गारनिग्रहात्तत्र हिक्कायास्तुल्यमौषधम्||१८|| विनामाक्षेपसङ्कोचाः सुप्तिः कम्पः प्रवेपनम्| जृम्भाया निग्रहात्तत्र सर्वं वातघ्नमौषधम्||१९|| कार्श्यदौर्बल्यवैवर्ण्यमङ्गमर्दोऽरुचिर्भ्रमः| क्षुद्वेगनिग्रहात्तत्र स्निग्धोष्णं लघु भोजनम्||२०|| कण्ठास्यशोषो बाधिर्यं श्रमः सादो हृदि व्यथा| पिपासानिग्रहात्तत्र शीतं तर्पणमिष्यते||२१|| प्रतिश्यायोऽक्षिरोगश्च हृद्रोगश्चारुचिर्भ्रमः| बाष्पनिग्रहणात्तत्र स्वप्नो मद्यं प्रियाः कथाः||२२|| जृम्भाऽङ्गमर्दस्तन्द्रा च शिरोरोगोऽक्षिगौरवम्| निद्राविधारणात्तत्र स्वप्नः संवाहनानि च||२३|| गुल्महृद्रोगसम्मोहाः श्रमनिःश्वासधारणात्| जायन्ते तत्र विश्रामो वातघ्न्यश्च क्रिया हिताः||२४|| वेगनिग्रहजा रोगा य एते परिकीर्तिताः| इच्छंस्तेषामनुत्पत्तिं वेगानेतान्न धारयेत्||२५||

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Adhikarana 4 (26) · Śloka 26

ইমাংস্তু ধারযেদ্বেগান্ হিতার্থী প্রেত্য চেহ চ| সাহসানামশস্তানাং মনোবাক্কাযকর্মণাম্||২৬||

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इमांस्तु धारयेद्वेगान् हितार्थी प्रेत्य चेह च| साहसानामशस्तानां मनोवाक्कायकर्मणाम्||२६||

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Adhikarana 5 (27) · Śloka 27

লোভশোকভযক্রোধমানবেগান্ বিধারযেত্| নৈর্লজ্জ্যের্ষ্যাতিরাগাণামভিধ্যাযাশ্চ বুদ্ধিমান্||২৭||

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लोभशोकभयक्रोधमानवेगान् विधारयेत्| नैर्लज्ज्येर्ष्यातिरागाणामभिध्यायाश्च बुद्धिमान्||२७||

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Adhikarana 6 (28) · Śloka 28

পরুষস্যাতিমাত্রস্য সূচকস্যানৃতস্য চ| বাক্যস্যাকালযুক্তস্য ধারযেদ্বেগমুত্থিতম্||২৮||

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परुषस्यातिमात्रस्य सूचकस्यानृतस्य च| वाक्यस्याकालयुक्तस्य धारयेद्वेगमुत्थितम्||२८||

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Adhikarana 7 (29) · Śloka 29

দেহপ্রবৃত্তির্যা কাচিদ্বিদ্যতে পরপীডযা| স্ত্রীভোগস্তেযহিংসাদ্যা তস্যাবেগান্বিধারযেত্||২৯||

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देहप्रवृत्तिर्या काचिद्विद्यते परपीडया| स्त्रीभोगस्तेयहिंसाद्या तस्यावेगान्विधारयेत्||२९||

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Adhikarana 8 (30) · Śloka 30

পুণ্যশব্দো বিপাপত্বান্মনোবাক্কাযকর্মণাম্| ধর্মার্থকামান্ পুরুষঃ সুখী ভুঙ্ক্তে চিনোতি চ||৩০||

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पुण्यशब्दो विपापत्वान्मनोवाक्कायकर्मणाम्| धर्मार्थकामान् पुरुषः सुखी भुङ्क्ते चिनोति च||३०||

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Adhikarana 9 (31) · Śloka 31

শরীরচেষ্টা যা চেষ্টা স্থৈর্যার্থা বলবর্ধিনী| দেহব্যাযামসঙ্খ্যাতা মাত্রযা তাং সমাচরেত্||৩১||

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शरीरचेष्टा या चेष्टा स्थैर्यार्था बलवर्धिनी| देहव्यायामसङ्ख्याता मात्रया तां समाचरेत्||३१||

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Adhikarana 10 (32-33) · Śloka 1

লাঘবং কর্মসামর্থ্যং স্থৈর্যং দুঃখসহিষ্ণুতা | দোষক্ষযোঽগ্নিবৃদ্ধিশ্চ ব্যাযামাদুপজাযতে||৩২|| শ্রমঃ ক্লমঃ ক্ষযস্তৃষ্ণা রক্তপিত্তং প্রতামকঃ| অতিব্যাযামতঃ কাসো জ্বরশ্ছর্দিশ্চ জাযতে||৩৩|| (স্বেদাগমঃ শ্বাসবৃদ্ধির্গাত্রাণাং লাঘবং তথা| হৃদযাদ্যুপরোধশ্চ ইতি ব্যাযামলক্ষণম্||১||)|

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लाघवं कर्मसामर्थ्यं स्थैर्यं दुःखसहिष्णुता | दोषक्षयोऽग्निवृद्धिश्च व्यायामादुपजायते||३२|| श्रमः क्लमः क्षयस्तृष्णा रक्तपित्तं प्रतामकः| अतिव्यायामतः कासो ज्वरश्छर्दिश्च जायते||३३|| (स्वेदागमः श्वासवृद्धिर्गात्राणां लाघवं तथा| हृदयाद्युपरोधश्च इति व्यायामलक्षणम्||१||)|

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Adhikarana 11 (34) · Śloka 34

ব্যাযামহাস্যভাষ্যাধ্বগ্রাম্যধর্মপ্রজাগরান্| নোচিতানপি সেবেত বুদ্ধিমানতিমাত্রযা||৩৪||

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व्यायामहास्यभाष्याध्वग्राम्यधर्मप्रजागरान्| नोचितानपि सेवेत बुद्धिमानतिमात्रया||३४||

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Adhikarana 12 (35) · Śloka 2

এতানেবংবিধাংশ্চান্যান্ যোঽতিমাত্রং নিষেবতে| গজং সিংহ ইবাকর্ষন্ সহসা স বিনশ্যতি||৩৫|| (অতিব্যবাযভারাধ্বকর্মভিশ্চাতিকর্শিতাঃ | ক্রোধশোকভযাযাসৈঃ ক্রান্তা যে চাপি মানবাঃ||১|| বালবৃদ্ধপ্রবাতাশ্চ যে চোচ্চৈর্বহুভাষকাঃ| তে বর্জযেযুর্ব্যাযামং ক্ষুধিতাস্তৃষিতাশ্চ যে||২||)|

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एतानेवंविधांश्चान्यान् योऽतिमात्रं निषेवते| गजं सिंह इवाकर्षन् सहसा स विनश्यति||३५|| (अतिव्यवायभाराध्वकर्मभिश्चातिकर्शिताः | क्रोधशोकभयायासैः क्रान्ता ये चापि मानवाः||१|| बालवृद्धप्रवाताश्च ये चोच्चैर्बहुभाषकाः| ते वर्जयेयुर्व्यायामं क्षुधितास्तृषिताश्च ये||२||)|

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Adhikarana 13 (36-37) · Śloka 37

উচিতাদহিতাদ্ধীমান্ ক্রমশো বিরমেন্নরঃ| হিতং ক্রমেণ সেবেত ক্রমশ্চাত্রোপদিশ্যতে||৩৬|| প্রক্ষেপাপচযে তাভ্যাং ক্রমঃ পাদাংশিকো ভবেত্| একান্তরং ততশ্চোর্ধ্বং দ্ব্যন্তরং ত্র্যন্তরং তথা||৩৭||

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उचितादहिताद्धीमान् क्रमशो विरमेन्नरः| हितं क्रमेण सेवेत क्रमश्चात्रोपदिश्यते||३६|| प्रक्षेपापचये ताभ्यां क्रमः पादांशिको भवेत्| एकान्तरं ततश्चोर्ध्वं द्व्यन्तरं त्र्यन्तरं तथा||३७||

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Adhikarana 14 (38) · Śloka 38

ক্রমেণাপচিতা দোষাঃ ক্রমেণোপচিতা গুণাঃ| সন্তো যান্ত্যপুনর্ভাবমপ্রকম্প্যা ভবন্তি চ||৩৮||

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क्रमेणापचिता दोषाः क्रमेणोपचिता गुणाः| सन्तो यान्त्यपुनर्भावमप्रकम्प्या भवन्ति च||३८||

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Adhikarana 15 (39-40) · Śloka 40

সমপিত্তানিলকফাঃ কেচিদ্গর্ভাদি মানবাঃ| দৃশ্যন্তে বাতলাঃ কেচিত্পিত্তলাঃ শ্লেষ্মলাস্তথা||৩৯|| তেষামনাতুরাঃ পূর্বে বাতলাদ্যাঃ সদাতুরাঃ| দোষানুশযিতা হ্যেষাং দেহপ্রকৃতিরুচ্যতে||৪০||

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समपित्तानिलकफाः केचिद्गर्भादि मानवाः| दृश्यन्ते वातलाः केचित्पित्तलाः श्लेष्मलास्तथा||३९|| तेषामनातुराः पूर्वे वातलाद्याः सदातुराः| दोषानुशयिता ह्येषां देहप्रकृतिरुच्यते||४०||

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Adhikarana 16 (41) · Śloka 41

বিপরীতগুণস্তেষাং স্বস্থবৃত্তের্বিধির্হিতঃ| সমসর্বরসং সাত্ম্যং সমধাতোঃ প্রশস্যতে||৪১||

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विपरीतगुणस्तेषां स्वस्थवृत्तेर्विधिर्हितः| समसर्वरसं सात्म्यं समधातोः प्रशस्यते||४१||

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Adhikarana 17 (42-43) · Śloka 43

দ্বে অধঃ সপ্ত শিরসি খানি স্বেদমুখানি চ| মলাযনানি বাধ্যন্তে দুষ্টৈর্মাত্রাধিকৈর্মলৈঃ||৪২|| মলবৃদ্ধিং গুরুতযা লাঘবান্মলসঙ্ক্ষযম্| মলাযনানাং বুধ্যেত সঙ্গোত্সর্গাদতীব চ||৪৩||

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द्वे अधः सप्त शिरसि खानि स्वेदमुखानि च| मलायनानि बाध्यन्ते दुष्टैर्मात्राधिकैर्मलैः||४२|| मलवृद्धिं गुरुतया लाघवान्मलसङ्क्षयम्| मलायनानां बुध्येत सङ्गोत्सर्गादतीव च||४३||

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Adhikarana 18 (44) · Śloka 44

তান্ দোষলিঙ্গৈরাদিশ্য ব্যাধীন্ সাধ্যানুপাচরেত্| ব্যাধিহেতুপ্রতিদ্বন্দ্বৈর্মাত্রাকালৌ বিচারযন্||৪৪||

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तान् दोषलिङ्गैरादिश्य व्याधीन् साध्यानुपाचरेत्| व्याधिहेतुप्रतिद्वन्द्वैर्मात्राकालौ विचारयन्||४४||

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Adhikarana 19 (45-50) · Śloka 50

বিষমস্বস্থবৃত্তানামেতে রোগাস্তথাঽপরে| জাযন্তেঽনাতুরস্তস্মাত্ স্বস্থবৃত্তপরো ভবেত্||৪৫|| মাধবপ্রথমে মাসি নভস্যপ্রথমে পুনঃ| সহস্যপ্রথমে চৈব হারযেদ্দোষসঞ্চযম্||৪৬|| স্নিগ্ধস্বিন্নশরীরাণামূর্ধ্বং চাধশ্চ নিত্যশঃ| বস্তিকর্ম ততঃ কুর্যান্নস্যকর্ম চ বুদ্ধিমান্||৪৭|| যথাক্রমং যথাযোগ্যমত ঊর্ধ্বং প্রযোজযেত্| রসাযনানি সিদ্ধানি বৃষ্যযোগাংশ্চ কালবিত্||৪৮|| রোগাস্তথা ন জাযন্তে প্রকৃতিস্থেষু ধাতুষু| ধাতবশ্চাভিবর্ধন্তে জরা মান্দ্যমুপৈতি চ||৪৯|| বিধিরেষ বিকারাণামনুত্পত্তৌ নিদর্শিতঃ| নিজানামিতরেষাং তু পৃথগেবোপদেক্ষ্যতে||৫০||

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विषमस्वस्थवृत्तानामेते रोगास्तथाऽपरे| जायन्तेऽनातुरस्तस्मात् स्वस्थवृत्तपरो भवेत्||४५|| माधवप्रथमे मासि नभस्यप्रथमे पुनः| सहस्यप्रथमे चैव हारयेद्दोषसञ्चयम्||४६|| स्निग्धस्विन्नशरीराणामूर्ध्वं चाधश्च नित्यशः| बस्तिकर्म ततः कुर्यान्नस्यकर्म च बुद्धिमान्||४७|| यथाक्रमं यथायोग्यमत ऊर्ध्वं प्रयोजयेत्| रसायनानि सिद्धानि वृष्ययोगांश्च कालवित्||४८|| रोगास्तथा न जायन्ते प्रकृतिस्थेषु धातुषु| धातवश्चाभिवर्धन्ते जरा मान्द्यमुपैति च||४९|| विधिरेष विकाराणामनुत्पत्तौ निदर्शितः| निजानामितरेषां तु पृथगेवोपदेक्ष्यते||५०||

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Adhikarana 20 (51-52) · Śloka 52

যে ভূতবিষবায্বগ্নিসম্প্রহারাদিসম্ভবাঃ| নৃণামাগন্তবো রোগাঃ প্রজ্ঞা তেষ্বপরাধ্যতি||৫১|| ঈর্ষ্যাশোকভযক্রোধমানদ্বেষাদযশ্চ যে| মনোবিকারাস্তেঽপ্যুক্তাঃ সর্বে প্রজ্ঞাপরাধজাঃ||৫২||

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ये भूतविषवाय्वग्निसम्प्रहारादिसम्भवाः| नृणामागन्तवो रोगाः प्रज्ञा तेष्वपराध्यति||५१|| ईर्ष्याशोकभयक्रोधमानद्वेषादयश्च ये| मनोविकारास्तेऽप्युक्ताः सर्वे प्रज्ञापराधजाः||५२||

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Adhikarana 21 (53-54) · Śloka 54

ত্যাগঃ প্রজ্ঞাপরাধানামিন্দ্রিযোপশমঃ স্মৃতিঃ| দেশকালাত্মবিজ্ঞানং সদ্বৃত্তস্যানুবর্তনম্||৫৩|| আগন্তূনামনুত্পত্তাবেষ মার্গো নিদর্শিতঃ| প্রাজ্ঞঃ প্রাগেব তত্ কুর্যাদ্ধিতং বিদ্যাদ্যদাত্মনঃ||৫৪||

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त्यागः प्रज्ञापराधानामिन्द्रियोपशमः स्मृतिः| देशकालात्मविज्ञानं सद्वृत्तस्यानुवर्तनम्||५३|| आगन्तूनामनुत्पत्तावेष मार्गो निदर्शितः| प्राज्ञः प्रागेव तत् कुर्याद्धितं विद्याद्यदात्मनः||५४||

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Adhikarana 22 (55) · Śloka 55

আপ্তোপদেশপ্রজ্ঞানং প্রতিপত্তিশ্চ কারণম্| বিকারাণামনুত্পত্তাবুত্পন্নানাং চ শান্তযে||৫৫||

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आप्तोपदेशप्रज्ञानं प्रतिपत्तिश्च कारणम्| विकाराणामनुत्पत्तावुत्पन्नानां च शान्तये||५५||

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Adhikarana 23 (56-59) · Śloka 59

পাপবৃত্তবচঃসত্ত্বাঃ সূচকাঃ কলহপ্রিযাঃ| মর্মোপহাসিনো লুব্ধাঃ পরবৃদ্ধিদ্বিষঃ শঠাঃ||৫৬|| পরাপবাদরতযশ্চপলা রিপুসেবিনঃ| নির্ঘৃণাস্ত্যক্তধর্মাণঃ পরিবর্জ্যা নরাধমাঃ||৫৭|| বুদ্ধিবিদ্যাবযঃশীলধৈর্যস্মৃতিসমাধিভিঃ| বৃদ্ধোপসেবিনো বৃদ্ধাঃ স্বভাবজ্ঞা গতব্যথাঃ||৫৮|| সুমুখাঃ সর্বভূতানাং প্রশান্তাঃ শংসিতব্রতাঃ| সেব্যাঃ সন্মার্গবক্তারঃ পুণ্যশ্রবণদর্শনাঃ||৫৯||

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पापवृत्तवचःसत्त्वाः सूचकाः कलहप्रियाः| मर्मोपहासिनो लुब्धाः परवृद्धिद्विषः शठाः||५६|| परापवादरतयश्चपला रिपुसेविनः| निर्घृणास्त्यक्तधर्माणः परिवर्ज्या नराधमाः||५७|| बुद्धिविद्यावयःशीलधैर्यस्मृतिसमाधिभिः| वृद्धोपसेविनो वृद्धाः स्वभावज्ञा गतव्यथाः||५८|| सुमुखाः सर्वभूतानां प्रशान्ताः शंसितव्रताः| सेव्याः सन्मार्गवक्तारः पुण्यश्रवणदर्शनाः||५९||

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Adhikarana 24 (60) · Śloka 60

আহারাচারচেষ্টাসু সুখার্থী প্রেত্য চেহ চ| পরং প্রযত্নমাতিষ্ঠেদ্বুদ্ধিমান্ হিতসেবনে||৬০||

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आहाराचारचेष्टासु सुखार्थी प्रेत्य चेह च| परं प्रयत्नमातिष्ठेद्बुद्धिमान् हितसेवने||६०||

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Adhikarana 25 (61-62) · Śloka 62

ন নক্তং দধি ভুঞ্জীত ন চাপ্যঘৃতশর্করম্| নামুদ্গযূষং নাক্ষৌদ্রং নোষ্ণং নামলকৈর্বিনা ||৬১|| জ্বরাসৃক্পিত্তবীসর্পকুষ্ঠপাণ্ড্বামযভ্রমান্| প্রাপ্নুযাত্কামলাং চোগ্রাং বিধিং হিত্বা দধিপ্রিযঃ||৬২||

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न नक्तं दधि भुञ्जीत न चाप्यघृतशर्करम्| नामुद्गयूषं नाक्षौद्रं नोष्णं नामलकैर्विना ||६१|| ज्वरासृक्पित्तवीसर्पकुष्ठपाण्ड्वामयभ्रमान्| प्राप्नुयात्कामलां चोग्रां विधिं हित्वा दधिप्रियः||६२||

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Adhikarana 26 (63-66) · Śloka 66

তত্র শ্লোকাঃ- বেগা বেগসমুত্থাশ্চ রোগাস্তেষাং চ ভেষজম্| যেষাং বেগা বিধার্যাশ্চ যদর্থং যদ্ধিতাহিতম্||৬৩|| উচিতে চাহিতে বর্জ্যে সেব্যে চানুচিতে ক্রমঃ| যথাপ্রকৃতি চাহারো মলাযনগদৌষধম্||৬৪|| ভবিষ্যতামনুত্পত্তৌ রোগাণামৌষধং চ যত্| বর্জ্যাঃ সেব্যাশ্চ পুরুষা ধীমতাঽঽত্মসুখার্থিনা||৬৫|| বিধিনা দধি সেব্যং চ যেন যস্মাত্তদত্রিজঃ| নবেগান্ধারণেঽধ্যাযে সর্বমেবাবদন্মুনিঃ||৬৬||

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तत्र श्लोकाः- वेगा वेगसमुत्थाश्च रोगास्तेषां च भेषजम्| येषां वेगा विधार्याश्च यदर्थं यद्धिताहितम्||६३|| उचिते चाहिते वर्ज्ये सेव्ये चानुचिते क्रमः| यथाप्रकृति चाहारो मलायनगदौषधम्||६४|| भविष्यतामनुत्पत्तौ रोगाणामौषधं च यत्| वर्ज्याः सेव्याश्च पुरुषा धीमताऽऽत्मसुखार्थिना||६५|| विधिना दधि सेव्यं च येन यस्मात्तदत्रिजः| नवेगान्धारणेऽध्याये सर्वमेवावदन्मुनिः||६६||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 7

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শ্লোকস্থানে নবেগান্ধারণীযো নাম সপ্তমোঽধ্যাযঃ||৭||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते श्लोकस्थाने नवेगान्धारणीयो नाम सप्तमोऽध्यायः||७||

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7. navēgāndhāraṇīyō'dhyāyaḥ — Charaka Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi