Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতস্তস্যাশিতীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातस्तस्याशितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতস্তস্যাশিতীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातस्तस्याशितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
তস্যাশিতাদ্যাদাহারাদ্বলং বর্ণশ্চ বর্ধতে| যস্যর্তুসাত্ম্যং বিদিতং চেষ্টাহারব্যপাশ্রযম্||৩||
तस्याशिताद्यादाहाराद्बलं वर्णश्च वर्धते| यस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम्||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
ইহ খলু সংবত্সরং ষডঙ্গমৃতুবিভাগেন বিদ্যাত্| তত্রাদিত্যস্যোদগযনমাদানং চ ত্রীনৃতূঞ্ছিশিরাদীন্ গ্রীষ্মান্তান্ ব্যবস্যেত্, বর্ষাদীন্ পুনর্হেমন্তান্তান্ দক্ষিণাযনং বিসর্গং চ||৪||
इह खलु संवत्सरं षडङ्गमृतुविभागेन विद्यात्| तत्रादित्यस्योदगयनमादानं च त्रीनृतूञ्छिशिरादीन् ग्रीष्मान्तान् व्यवस्येत्, वर्षादीन् पुनर्हेमन्तान्तान् दक्षिणायनं विसर्गं च||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
বিসর্গে পুনর্বাযবো নাতিরূক্ষাঃ প্রবান্তি, ইতরে পুনরাদানে; সোমশ্চাব্যাহতবলঃ শিশিরাভির্ভাভিরাপূরযঞ্জগদাপ্যাযযতি শশ্বত্, অতো বিসর্গঃ সৌম্যঃ| আদানং পুনরাগ্নেযং; তাবেতাবর্কবাযূ সোমশ্চ কালস্বভাবমার্গপরিগৃহীতাঃ কালর্তুরসদোষদেহবলনির্বৃত্তিপ্রত্যযভূতাঃ সমুপদিশ্যন্তে||৫||
विसर्गे पुनर्वायवो नातिरूक्षाः प्रवान्ति, इतरे पुनरादाने; सोमश्चाव्याहतबलः शिशिराभिर्भाभिरापूरयञ्जगदाप्याययति शश्वत्, अतो विसर्गः सौम्यः| आदानं पुनराग्नेयं; तावेतावर्कवायू सोमश्च कालस्वभावमार्गपरिगृहीताः कालर्तुरसदोषदेहबलनिर्वृत्तिप्रत्ययभूताः समुपदिश्यन्ते||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
তত্র রবির্ভাভিরাদদানো জগতঃ স্নেহং বাযবস্তীব্ররূক্ষাশ্চোপশোষযন্তঃ শিশিরবসন্তগ্রীষ্মেষু যথাক্রমং রৌক্ষ্যমুত্পাদযন্তো রূক্ষান্ রসাংস্তিক্তকষাযকটুকাংশ্চাভিবর্ধযন্তো নৃণাং দৌর্বল্যমাবহন্তি||৬||
तत्र रविर्भाभिराददानो जगतः स्नेहं वायवस्तीव्ररूक्षाश्चोपशोषयन्तः शिशिरवसन्तग्रीष्मेषु यथाक्रमं रौक्ष्यमुत्पादयन्तो रूक्षान् रसांस्तिक्तकषायकटुकांश्चाभिवर्धयन्तो नृणां दौर्बल्यमावहन्ति||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
বর্ষাশরদ্ধেমন্তেষু তু দক্ষিণাভিমুখেঽর্কে কালমার্গমেঘবাতবর্ষাভিহতপ্রতাপে, শশিনি চাব্যাহতবলে, মাহেন্দ্রসলিলপ্রশান্তসন্তাপে জগতি, অরূক্ষা রসাঃ প্রবর্ধন্তেঽম্ললবণমধুরা যথাক্রমং তত্র বলমুপচীযতে নৃণামিতি||৭||
वर्षाशरद्धेमन्तेषु तु दक्षिणाभिमुखेऽर्के कालमार्गमेघवातवर्षाभिहतप्रतापे, शशिनि चाव्याहतबले, माहेन्द्रसलिलप्रशान्तसन्तापे जगति, अरूक्षा रसाः प्रवर्धन्तेऽम्ललवणमधुरा यथाक्रमं तत्र बलमुपचीयते नृणामिति||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
ভবতি চাত্র- আদাবন্তে চ দৌর্বল্যং বিসর্গাদানযোর্নৃণাম্| মধ্যে মধ্যবলং, ত্বন্তে শ্রেষ্ঠমগ্রে চ নির্দিশেত্||৮||
भवति चात्र- आदावन्ते च दौर्बल्यं विसर्गादानयोर्नृणाम्| मध्ये मध्यबलं, त्वन्ते श्रेष्ठमग्रे च निर्दिशेत्||८||
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Adhikarana 8 (9-18) · Śloka 18
শীতে শীতানিলস্পর্শসংরুদ্ধো বলিনাং বলী| পক্তা ভবতি হেমন্তে মাত্রাদ্রব্যগুরুক্ষমঃ||৯|| স যদা নেন্ধনং যুক্তং লভতে দেহজং তদা| রসং হিনস্ত্যতো বাযুঃ শীতঃ শীতে প্রকুপ্যতি||১০|| তস্মাত্তুষারসমযে স্নিগ্ধাম্ললবণান্ রসান্| ঔদকানূপমাংসানাং মেদ্যানামুপযোজযেত্||১১|| বিলেশযানাং মাংসানি প্রসহানাং ভৃতানি চ| ভক্ষযেন্মদিরাং শীধুং মধু চানুপিবেন্নরঃ||১২|| গোরসানিক্ষুবিকৃতীর্বসাং তৈলং নবৌদনম্| হেমন্তেঽভ্যস্যতস্তোযমুষ্ণং চাযুর্ন হীযতে||১৩|| অভ্যঙ্গোত্সাদনং মূর্ধ্নি তৈলং জেন্তাকমাতপম্| ভজেদ্ভূমিগৃহং চোষ্ণমুষ্ণং গর্ভগৃহং তথা||১৪|| শীতেষু সংবৃতং সেব্যং যানং শযনমাসনম্| প্রাবারাজিনকৌষেযপ্রবেণীকুথকাস্তৃতম্||১৫|| গুরূষ্ণবাসা দিগ্ধাঙ্গো গুরুণাঽগুরুণা সদা| শযনে প্রমদাং পীনাং বিশালোপচিতস্তনীম্||১৬|| আলিঙ্গ্যাগুরুদিগ্ধাঙ্গীং সুপ্যাত্ সমদমন্মথঃ| প্রকামং চ নিষেবেত মৈথুনং শিশিরাগমে||১৭|| বর্জযেদন্নপানানি বাতলানি লঘূনি চ| প্রবাতং প্রমিতাহারমুদমন্থং হিমাগমে||১৮||
शीते शीतानिलस्पर्शसंरुद्धो बलिनां बली| पक्ता भवति हेमन्ते मात्राद्रव्यगुरुक्षमः||९|| स यदा नेन्धनं युक्तं लभते देहजं तदा| रसं हिनस्त्यतो वायुः शीतः शीते प्रकुप्यति||१०|| तस्मात्तुषारसमये स्निग्धाम्ललवणान् रसान्| औदकानूपमांसानां मेद्यानामुपयोजयेत्||११|| बिलेशयानां मांसानि प्रसहानां भृतानि च| भक्षयेन्मदिरां शीधुं मधु चानुपिबेन्नरः||१२|| गोरसानिक्षुविकृतीर्वसां तैलं नवौदनम्| हेमन्तेऽभ्यस्यतस्तोयमुष्णं चायुर्न हीयते||१३|| अभ्यङ्गोत्सादनं मूर्ध्नि तैलं जेन्ताकमातपम्| भजेद्भूमिगृहं चोष्णमुष्णं गर्भगृहं तथा||१४|| शीतेषु संवृतं सेव्यं यानं शयनमासनम्| प्रावाराजिनकौषेयप्रवेणीकुथकास्तृतम्||१५|| गुरूष्णवासा दिग्धाङ्गो गुरुणाऽगुरुणा सदा| शयने प्रमदां पीनां विशालोपचितस्तनीम्||१६|| आलिङ्ग्यागुरुदिग्धाङ्गीं सुप्यात् समदमन्मथः| प्रकामं च निषेवेत मैथुनं शिशिरागमे||१७|| वर्जयेदन्नपानानि वातलानि लघूनि च| प्रवातं प्रमिताहारमुदमन्थं हिमागमे||१८||
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Adhikarana 9 (19-21) · Śloka 21
হেমন্তশিশিরৌ তুল্যৌ শিশিরেঽল্পং বিশেষণম্| রৌক্ষ্যমাদানজং শীতং মেঘমারুতবর্ষজম্||১৯|| তস্মাদ্ধৈমন্তিকঃ সর্বঃ শিশিরে বিধিরিষ্যতে| নিবাতমুষ্ণং ত্বধিকং শিশিরে গৃহমাশ্রযেত্||২০|| কটুতিক্তকষাযাণি বাতলানি লঘূনি চ| বর্জযেদন্নপানানি শিশিরে শীতলানি চ||২১||
हेमन्तशिशिरौ तुल्यौ शिशिरेऽल्पं विशेषणम्| रौक्ष्यमादानजं शीतं मेघमारुतवर्षजम्||१९|| तस्माद्धैमन्तिकः सर्वः शिशिरे विधिरिष्यते| निवातमुष्णं त्वधिकं शिशिरे गृहमाश्रयेत्||२०|| कटुतिक्तकषायाणि वातलानि लघूनि च| वर्जयेदन्नपानानि शिशिरे शीतलानि च||२१||
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Adhikarana 10 (22-26) · Śloka 26
বসন্তে নিচিতঃ শ্লেষ্মা দিনকৃদ্ভাভিরীরিতঃ| কাযাগ্নিং বাধতে রোগাংস্ততঃ প্রকুরুতে বহূন্||২২|| তস্মাদ্বসন্তে কর্মাণি বমনাদীনি কারযেত্| গুর্বম্লস্নিগ্ধমধুরং দিবাস্বপ্নং চ বর্জযেত্||২৩|| ব্যাযামোদ্বর্তনং ধূমং কবলগ্রহমঞ্জনম্| সুখাম্বুনা শৌচবিধিং শীলযেত্ কুসুমাগমে||২৪|| চন্দনাগুরুদিগ্ধাঙ্গো যবগোধূমভোজনঃ| শারভং শাশমৈণেযং মাংসং লাবকপিঞ্জলম্||২৫|| ভক্ষযেন্নির্গদং সীধুং পিবেন্মাধ্বীকমেব বা| বসন্তেঽনুভবেত্ স্ত্রীণাং কাননানাং চ যৌবনম্||২৬||
वसन्ते निचितः श्लेष्मा दिनकृद्भाभिरीरितः| कायाग्निं बाधते रोगांस्ततः प्रकुरुते बहून्||२२|| तस्माद्वसन्ते कर्माणि वमनादीनि कारयेत्| गुर्वम्लस्निग्धमधुरं दिवास्वप्नं च वर्जयेत्||२३|| व्यायामोद्वर्तनं धूमं कवलग्रहमञ्जनम्| सुखाम्बुना शौचविधिं शीलयेत् कुसुमागमे||२४|| चन्दनागुरुदिग्धाङ्गो यवगोधूमभोजनः| शारभं शाशमैणेयं मांसं लावकपिञ्जलम्||२५|| भक्षयेन्निर्गदं सीधुं पिबेन्माध्वीकमेव वा| वसन्तेऽनुभवेत् स्त्रीणां काननानां च यौवनम्||२६||
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Adhikarana 11 (27-32) · Śloka 32
মযূখৈর্জগতঃ স্নেহং গ্রীষ্মে পেপীযতে রবিঃ| স্বাদু শীতং দ্রবং স্নিগ্ধমন্নপানং তদা হিতম্||২৭|| শীতং সশর্করং মন্থং জাঙ্গলান্মৃগপক্ষিণঃ| ঘৃতং পযঃ সশাল্যন্নং ভজন্ গ্রীষ্মে ন সীদতি||২৮|| মদ্যমল্পং ন বা পেযমথবা সুবহূদকম্| লবণাম্লকটূষ্ণানি ব্যাযামং চ বিবর্জযেত্ ||২৯|| দিবা শীতগৃহে নিদ্রাং নিশি চন্দ্রাংশুশীতলে| ভজেচ্চন্দনদিগ্ধাঙ্গঃ প্রবাতে হর্ম্যমস্তকে||৩০|| ব্যজনৈঃ পাণিসংস্পর্শৈশ্চন্দনোদকশীতলৈঃ| সেব্যমানো ভজেদাস্যাং মুক্তামণিবিভূষিতঃ||৩১|| কাননানি চ শীতানি জলানি কুসুমানি চ| গ্রীষ্মকালে নিষেবেত মৈথুনাদ্বিরতো নরঃ||৩২||
मयूखैर्जगतः स्नेहं ग्रीष्मे पेपीयते रविः| स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धमन्नपानं तदा हितम्||२७|| शीतं सशर्करं मन्थं जाङ्गलान्मृगपक्षिणः| घृतं पयः सशाल्यन्नं भजन् ग्रीष्मे न सीदति||२८|| मद्यमल्पं न वा पेयमथवा सुबहूदकम्| लवणाम्लकटूष्णानि व्यायामं च विवर्जयेत् ||२९|| दिवा शीतगृहे निद्रां निशि चन्द्रांशुशीतले| भजेच्चन्दनदिग्धाङ्गः प्रवाते हर्म्यमस्तके||३०|| व्यजनैः पाणिसंस्पर्शैश्चन्दनोदकशीतलैः| सेव्यमानो भजेदास्यां मुक्तामणिविभूषितः||३१|| काननानि च शीतानि जलानि कुसुमानि च| ग्रीष्मकाले निषेवेत मैथुनाद्विरतो नरः||३२||
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Adhikarana 12 (33-40) · Śloka 40
আদানদুর্বলে দেহে পক্তা ভবতি দুর্বলঃ| স বর্ষাস্বনিলাদীনাং দূষণৈর্বাধ্যতে পুনঃ||৩৩|| ভূবাষ্পান্মেঘনিস্যন্দাত্ পাকাদম্লাজ্জলস্য চ| বর্ষাস্বগ্নিবলে ক্ষীণে কুপ্যন্তি পবনাদযঃ||৩৪|| তস্মাত্ সাধারণঃ সর্বো বিধির্বর্ষাসু শস্যতে| উদমন্থং দিবাস্বপ্নমবশ্যাযং নদীজলম্||৩৫|| ব্যাযামমাতপং চৈব ব্যবাযং চাত্র বর্জযেত্| পানভোজনসংস্কারান্ প্রাযঃ ক্ষৌদ্রান্বিতান্ ভজেত্||৩৬|| ব্যক্তাম্ললবণস্নেহং বাতবর্ষাকুলেঽহনি| বিশেষশীতে ভোক্তব্যং বর্ষাস্বনিলশান্তযে||৩৭|| অগ্নিসংরক্ষণবতা যবগোধূমশালযঃ| পুরাণা জাঙ্গলৈর্মাংসৈর্ভোজ্যা যূষৈশ্চ সংস্কৃতৈঃ||৩৮|| পিবেত্ ক্ষৌদ্রান্বিতং চাল্পং মাধ্বীকারিষ্টমম্বু বা| মাহেন্দ্রং তপ্তশীতং বা কৌপং সারসমেব বা||৩৯|| প্রঘর্ষোদ্বর্তনস্নানগন্ধমাল্যপরো ভবেত্| লঘুশুদ্ধাম্বরঃ স্থানং ভজেদক্লেদি বার্ষিকম্||৪০||
आदानदुर्बले देहे पक्ता भवति दुर्बलः| स वर्षास्वनिलादीनां दूषणैर्बाध्यते पुनः||३३|| भूबाष्पान्मेघनिस्यन्दात् पाकादम्लाज्जलस्य च| वर्षास्वग्निबले क्षीणे कुप्यन्ति पवनादयः||३४|| तस्मात् साधारणः सर्वो विधिर्वर्षासु शस्यते| उदमन्थं दिवास्वप्नमवश्यायं नदीजलम्||३५|| व्यायाममातपं चैव व्यवायं चात्र वर्जयेत्| पानभोजनसंस्कारान् प्रायः क्षौद्रान्वितान् भजेत्||३६|| व्यक्ताम्ललवणस्नेहं वातवर्षाकुलेऽहनि| विशेषशीते भोक्तव्यं वर्षास्वनिलशान्तये||३७|| अग्निसंरक्षणवता यवगोधूमशालयः| पुराणा जाङ्गलैर्मांसैर्भोज्या यूषैश्च संस्कृतैः||३८|| पिबेत् क्षौद्रान्वितं चाल्पं माध्वीकारिष्टमम्बु वा| माहेन्द्रं तप्तशीतं वा कौपं सारसमेव वा||३९|| प्रघर्षोद्वर्तनस्नानगन्धमाल्यपरो भवेत्| लघुशुद्धाम्बरः स्थानं भजेदक्लेदि वार्षिकम्||४०||
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Adhikarana 13 (41-48) · Śloka 48
বর্ষাশীতোচিতাঙ্গানাং সহসৈবার্করশ্মিভিঃ| তপ্তানামাচিতং পিত্তং প্রাযঃ শরদি কুপ্যতি||৪১|| তত্রান্নপানং মধুরং লঘু শীতং সতিক্তকম্| পিত্তপ্রশমনং সেব্যং মাত্রযা সুপ্রকাঙ্ক্ষিতৈঃ||৪২|| লাবান্ কপিঞ্জলানেণানুরভ্রাঞ্ছরভান্ শশান্| শালীন্ সযবগোধূমান্ সেব্যানাহুর্ঘনাত্যযে||৪৩|| তিক্তস্য সর্পিষঃ পানং বিরেকো রক্তমোক্ষণম্| ধারাধরাত্যযে কার্যমাতপস্য চ বর্জনম্||৪৪|| বসাং তৈলমবশ্যাযমৌদকানূপমামিষম্| ক্ষারং দধি দিবাস্বপ্নং প্রাগ্বাতং চাত্র বর্জযেত্||৪৫|| দিবা সূর্যাংশুসন্তপ্তং নিশি চন্দ্রাংশুশীতলম্| কালেন পক্বং নির্দোষমগস্ত্যেনাবিষীকৃতম্||৪৬|| হংসোদকমিতি খ্যাতং শারদং বিমলং শুচি| স্নানপানাবগাহেষু হিতমম্বু যথাঽমৃতম্ ||৪৭|| শারদানি চ মাল্যানি বাসাংসি বিমলানি চ| শরত্কালে প্রশস্যন্তে প্রদোষে চেন্দুরশ্মযঃ||৪৮||
वर्षाशीतोचिताङ्गानां सहसैवार्करश्मिभिः| तप्तानामाचितं पित्तं प्रायः शरदि कुप्यति||४१|| तत्रान्नपानं मधुरं लघु शीतं सतिक्तकम्| पित्तप्रशमनं सेव्यं मात्रया सुप्रकाङ्क्षितैः||४२|| लावान् कपिञ्जलानेणानुरभ्राञ्छरभान् शशान्| शालीन् सयवगोधूमान् सेव्यानाहुर्घनात्यये||४३|| तिक्तस्य सर्पिषः पानं विरेको रक्तमोक्षणम्| धाराधरात्यये कार्यमातपस्य च वर्जनम्||४४|| वसां तैलमवश्यायमौदकानूपमामिषम्| क्षारं दधि दिवास्वप्नं प्राग्वातं चात्र वर्जयेत्||४५|| दिवा सूर्यांशुसन्तप्तं निशि चन्द्रांशुशीतलम्| कालेन पक्वं निर्दोषमगस्त्येनाविषीकृतम्||४६|| हंसोदकमिति ख्यातं शारदं विमलं शुचि| स्नानपानावगाहेषु हितमम्बु यथाऽमृतम् ||४७|| शारदानि च माल्यानि वासांसि विमलानि च| शरत्काले प्रशस्यन्ते प्रदोषे चेन्दुरश्मयः||४८||
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Adhikarana 14 (49) · Śloka 49
ইত্যুক্তমৃতুসাত্ম্যং যচ্চেষ্টাহারব্যপাশ্রযম্| উপশেতে যদৌচিত্যাদোকঃসাত্ম্যং তদুচ্যতে||৪৯||
इत्युक्तमृतुसात्म्यं यच्चेष्टाहारव्यपाश्रयम्| उपशेते यदौचित्यादोकःसात्म्यं तदुच्यते||४९||
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Adhikarana 15 (50) · Śloka 50
দেশানামামযানাং চ বিপরীতগুণং গুণৈঃ| সাত্ম্যমিচ্ছন্তি সাত্ম্যজ্ঞাশ্চেষ্টিতং চাদ্যমেব চ||৫০||
देशानामामयानां च विपरीतगुणं गुणैः| सात्म्यमिच्छन्ति सात्म्यज्ञाश्चेष्टितं चाद्यमेव च||५०||
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Adhikarana 16 (51) · Śloka 51
তত্র শ্লোকঃ- ঋতাবৃতৌ নৃভিঃ সেব্যমসেব্যং যচ্চ কিঞ্চন| তস্যাশিতীযে নির্দিষ্টং হেতুমত্ সাত্ম্যমেব চ||৫১||
तत्र श्लोकः- ऋतावृतौ नृभिः सेव्यमसेव्यं यच्च किञ्चन| तस्याशितीये निर्दिष्टं हेतुमत् सात्म्यमेव च||५१||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 6
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শ্লোকস্থানে তস্যাশিতীযো নাম ষষ্ঠোঽধ্যাযঃ||৬||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते श्लोकस्थाने तस्याशितीयो नाम षष्ठोऽध्यायः||६||
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