Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো মাত্রাশিতীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातो मात्राशितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো মাত্রাশিতীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातो मात्राशितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
মাত্রাশী স্যাত্| আহারমাত্রা পুনরগ্নিবলাপেক্ষিণী||৩||
मात्राशी स्यात्| आहारमात्रा पुनरग्निबलापेक्षिणी||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
যাবদ্ধ্যস্যাশনমশিতমনুপহত্য প্রকৃতিং যথাকালং জরাং গচ্ছতি তাবদস্য মাত্রাপ্রমাণং বেদিতব্যং ভবতি||৪||
यावद्ध्यस्याशनमशितमनुपहत्य प्रकृतिं यथाकालं जरां गच्छति तावदस्य मात्राप्रमाणं वेदितव्यं भवति||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
তত্র শালিষষ্টিকমুদ্গলাবকপিঞ্জলৈণশশশরভশম্বরাদীন্যাহারদ্রব্যাণি প্রকৃতিলঘূন্যপি মাত্রাপেক্ষীণি ভবন্তি| তথা পিষ্টেক্ষুক্ষীরবিকৃতিতিলমাষানূপৌদকপিশিতাদীন্যাহারদ্রব্যাণি প্রকৃতিগুরূণ্যপি মাত্রামেবাপেক্ষন্তে||৫||
तत्र शालिषष्टिकमुद्गलावकपिञ्जलैणशशशरभशम्बरादीन्याहारद्रव्याणि प्रकृतिलघून्यपि मात्रापेक्षीणि भवन्ति| तथा पिष्टेक्षुक्षीरविकृतितिलमाषानूपौदकपिशितादीन्याहारद्रव्याणि प्रकृतिगुरूण्यपि मात्रामेवापेक्षन्ते||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
ন চৈবমুক্তে দ্রব্যে গুরুলাঘবমকারণং মন্যেত, লঘূনি হি দ্রব্যাণি বায্বগ্নিগুণবহুলানি ভবন্তি; পৃথ্বীসোমগুণবহুলানীতরাণি, তস্মাত্ স্বগুণাদপি লঘূন্যগ্নিসন্ধুক্ষণস্বভাবান্যল্পদোষাণি চোচ্যন্তেঽপি সৌহিত্যোপযুক্তানি, গুরূণি পুনর্নাগ্নিসন্ধুক্ষণস্বভাবান্যসামান্যাত্, অতশ্চাতিমাত্রং দোষবন্তি সৌহিত্যোপযুক্তান্যন্যত্র ব্যাযামাগ্নিবলাত্; সৈষা ভবত্যগ্নিবলাপেক্ষিণী মাত্রা||৬||
न चैवमुक्ते द्रव्ये गुरुलाघवमकारणं मन्येत, लघूनि हि द्रव्याणि वाय्वग्निगुणबहुलानि भवन्ति; पृथ्वीसोमगुणबहुलानीतराणि, तस्मात् स्वगुणादपि लघून्यग्निसन्धुक्षणस्वभावान्यल्पदोषाणि चोच्यन्तेऽपि सौहित्योपयुक्तानि, गुरूणि पुनर्नाग्निसन्धुक्षणस्वभावान्यसामान्यात्, अतश्चातिमात्रं दोषवन्ति सौहित्योपयुक्तान्यन्यत्र व्यायामाग्निबलात्; सैषा भवत्यग्निबलापेक्षिणी मात्रा||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
ন চ নাপেক্ষতে দ্রব্যং; দ্রব্যাপেক্ষযা চ ত্রিভাগসৌহিত্যমর্ধসৌহিত্যং বা গুরূণামুপদিশ্যতে, লঘূনামপি চ নাতিসৌহিত্যমগ্নের্যুক্ত্যর্থম্||৭||
न च नापेक्षते द्रव्यं; द्रव्यापेक्षया च त्रिभागसौहित्यमर्धसौहित्यं वा गुरूणामुपदिश्यते, लघूनामपि च नातिसौहित्यमग्नेर्युक्त्यर्थम्||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
মাত্রাবদ্ধ্যশনমশিতমনুপহত্য প্রকৃতিং বলবর্ণসুখাযুষা যোজযত্যুপযোক্তারমবশ্যমিতি||৮||
मात्रावद्ध्यशनमशितमनुपहत्य प्रकृतिं बलवर्णसुखायुषा योजयत्युपयोक्तारमवश्यमिति||८||
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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9
ভবন্তি চাত্র- গুরু পিষ্টমযং তস্মাত্তণ্ডুলান্ পৃথুকানপি| ন জাতু ভুক্তবান্ খাদেন্মাত্রাং খাদেদ্বুভুক্ষিতঃ||৯||
भवन्ति चात्र- गुरु पिष्टमयं तस्मात्तण्डुलान् पृथुकानपि| न जातु भुक्तवान् खादेन्मात्रां खादेद्बुभुक्षितः||९||
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Adhikarana 9 (10-11) · Śloka 11
বল্লূরং শুষ্কশাকানি শালূকানি বিসানি চ| নাভ্যসেদ্গৌরবান্মাংসং কৃশং নৈবোপযোজযেত্||১০|| কূর্চিকাংশ্চ কিলাটাংশ্চ শৌকরং গব্যমাহিষে| মত্স্যান্ দধি চ মাষাংশ্চ যবকাংশ্চ ন শীলযেত্||১১||
वल्लूरं शुष्कशाकानि शालूकानि बिसानि च| नाभ्यसेद्गौरवान्मांसं कृशं नैवोपयोजयेत्||१०|| कूर्चिकांश्च किलाटांश्च शौकरं गव्यमाहिषे| मत्स्यान् दधि च माषांश्च यवकांश्च न शीलयेत्||११||
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Adhikarana 10 (12) · Śloka 12
ষষ্টিকাঞ্ছালিমুদ্গাংশ্চ সৈন্ধবামলকে যবান্| আন্তরীক্ষং পযঃ সর্পির্জাঙ্গলং মধু চাভ্যসেত্||১২||
षष्टिकाञ्छालिमुद्गांश्च सैन्धवामलके यवान्| आन्तरीक्षं पयः सर्पिर्जाङ्गलं मधु चाभ्यसेत्||१२||
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Adhikarana 11 (13) · Śloka 13
তচ্চ নিত্যং প্রযুঞ্জীত স্বাস্থ্যং যেনানুবর্ততে| অজাতানাং বিকারাণামনুত্পত্তিকরং চ যত্||১৩||
तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत स्वास्थ्यं येनानुवर्तते| अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत्||१३||
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Adhikarana 12 (14) · Śloka 14
অত ঊর্ধ্বং শরীরস্য কার্যমক্ষ্যঞ্জনাদিকম্| স্বস্থবৃত্তিমভিপ্রেত্য গুণতঃ সম্প্রবক্ষ্যতে||১৪||
अत ऊर्ध्वं शरीरस्य कार्यमक्ष्यञ्जनादिकम्| स्वस्थवृत्तिमभिप्रेत्य गुणतः सम्प्रवक्ष्यते||१४||
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Adhikarana 13 (15) · Śloka 15
সৌবীরমঞ্জনং নিত্যং হিতমক্ষ্ণোঃ প্রযোজযেত্| পঞ্চরাত্রেঽষ্টরাত্রে বা স্রাবণার্থে রসাঞ্জনম্||১৫||
सौवीरमञ्जनं नित्यं हितमक्ष्णोः प्रयोजयेत्| पञ्चरात्रेऽष्टरात्रे वा स्रावणार्थे रसाञ्जनम्||१५||
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Adhikarana 14 (16-17) · Śloka 18
চক্ষুস্তেজোমযং তস্য বিশেষাচ্ছ্লেষ্মতো ভযম্| ততঃ শ্লেষ্মহরং কর্ম হিতং দৃষ্টেঃ প্রসাদনম্||১৬|| দিবা তন্ন প্রযোক্তব্যং নেত্রযোস্তীক্ষ্ণমঞ্জনম্| বিরেকদুর্বলা দৃষ্টিরাদিত্যং প্রাপ্য সীদতি||১৭|| তস্মাত্ স্রাব্যং নিশাযাং তু ধ্রুবমঞ্জনমিষ্যতে|১৮|
चक्षुस्तेजोमयं तस्य विशेषाच्छ्लेष्मतो भयम्| ततः श्लेष्महरं कर्म हितं दृष्टेः प्रसादनम्||१६|| दिवा तन्न प्रयोक्तव्यं नेत्रयोस्तीक्ष्णमञ्जनम्| विरेकदुर्बला दृष्टिरादित्यं प्राप्य सीदति||१७|| तस्मात् स्राव्यं निशायां तु ध्रुवमञ्जनमिष्यते|१८|
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Adhikarana 15 (18-19) · Śloka 20
যথা হি কনকাদীনাং মলিনাং বিবিধাত্মনাম্||১৮|| ধৌতানাং নির্মলা শুদ্ধিস্তৈলচেলকচাদিভিঃ| এবং নেত্রেষু মর্ত্যানামঞ্জনাশ্চ্যোতনাদিভিঃ||১৯|| দৃষ্টির্নিরাকুলা ভাতি নির্মলে নভসীন্দুবত্|২০|
यथा हि कनकादीनां मलिनां विविधात्मनाम्||१८|| धौतानां निर्मला शुद्धिस्तैलचेलकचादिभिः| एवं नेत्रेषु मर्त्यानामञ्जनाश्च्योतनादिभिः||१९|| दृष्टिर्निराकुला भाति निर्मले नभसीन्दुवत्|२०|
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Adhikarana 16 (20-24) · Śloka 25
হরেণুকাং প্রিযঙ্গুং চ পৃথ্বীকাং কেশরং নখম্||২০|| হ্রীবেরং চন্দনং পত্রং ত্বগেলোশীরপদ্মকম্| ধ্যামকং মধুকং মাংসী গুগ্গুল্বগুরুশর্করম্||২১|| ন্যগ্রোধোদুম্বরাশ্বত্থপ্লক্ষলোধ্রত্বচঃ শুভাঃ| বন্যং সর্জরসং মুস্তং শৈলেযং কমলোত্পলে||২২|| শ্রীবেষ্টকং শল্লকীং চ শুকবর্হমথাপি চ| পিষ্ট্বা লিম্পেচ্ছরেষীকাং তাং বর্তিং যবসন্নিভাম্||২৩|| অঙ্গুষ্ঠসম্মিতাং কুর্যাদষ্টাঙ্গুলসমাং ভিষক্| শুষ্কাং নিগর্ভাং তাং বর্তিং ধূমনেত্রার্পিতাং নরঃ||২৪|| স্নেহাক্তামগ্নিসম্প্লুষ্টাং পিবেত্ প্রাযোগিকীং সুখাম্|২৫|
हरेणुकां प्रियङ्गुं च पृथ्वीकां केशरं नखम्||२०|| ह्रीवेरं चन्दनं पत्रं त्वगेलोशीरपद्मकम्| ध्यामकं मधुकं मांसी गुग्गुल्वगुरुशर्करम्||२१|| न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थप्लक्षलोध्रत्वचः शुभाः| वन्यं सर्जरसं मुस्तं शैलेयं कमलोत्पले||२२|| श्रीवेष्टकं शल्लकीं च शुकबर्हमथापि च| पिष्ट्वा लिम्पेच्छरेषीकां तां वर्तिं यवसन्निभाम्||२३|| अङ्गुष्ठसम्मितां कुर्यादष्टाङ्गुलसमां भिषक्| शुष्कां निगर्भां तां वर्तिं धूमनेत्रार्पितां नरः||२४|| स्नेहाक्तामग्निसम्प्लुष्टां पिबेत् प्रायोगिकीं सुखाम्|२५|
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Adhikarana 17 (25) · Śloka 26
বসাঘৃতমধূচ্ছিষ্টৈর্যুক্তিযুক্তৈর্বরৌষধৈঃ||২৫|| বর্তিং মধুরকৈঃ কৃত্বা স্নৈহিকীং ধূমমাচরেত্|২৬|
वसाघृतमधूच्छिष्टैर्युक्तियुक्तैर्वरौषधैः||२५|| वर्तिं मधुरकैः कृत्वा स्नैहिकीं धूममाचरेत्|२६|
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Adhikarana 18 (26) · Śloka 27
শ্বেতা জ্যোতিষ্মতী চৈব হরিতালং মনঃশিলা||২৬|| গন্ধাশ্চাগুরুপত্রাদ্যা ধূমং মূর্ধবিরেচনে |২৭|
श्वेता ज्योतिष्मती चैव हरितालं मनःशिला||२६|| गन्धाश्चागुरुपत्राद्या धूमं मूर्धविरेचने |२७|
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Adhikarana 19 (27-32) · Śloka 33
গৌরবং শিরসঃ শূলং পীনসার্ধাবভেদকৌ||২৭|| কর্ণাক্ষিশূলং কাসশ্চ হিক্কাশ্বাসৌ গলগ্রহঃ| দন্তদৌর্বল্যমাস্রাবঃ শ্রোত্রঘ্রাণাক্ষিদোষজঃ||২৮|| পূতির্ঘ্রাণাস্যগন্ধশ্চ দন্তশূলমরোচকঃ| হনুমন্যাগ্রহঃ কণ্ডূঃ ক্রিমযঃ পাণ্ডুতা মুখে||২৯|| শ্লেষ্মপ্রসেকো বৈস্বর্যং গলশুণ্ড্যুপজিহ্বিকা| খালিত্যং পিঞ্জরত্বং চ কেশানাং পতনং তথা||৩০|| ক্ষবথুশ্চাতিতন্দ্রা চ বুদ্ধের্মোহোঽতিনিদ্রতা| ধূমপানাত্ প্রশাম্যন্তি বলং ভবতি চাধিকম্||৩১|| শিরোরুহকপালানামিন্দ্রিযাণাং স্বরস্য চ| ন চ বাতকফাত্মানো বলিনোঽপ্যূর্ধ্বজত্রুজাঃ||৩২|| ধূমবক্ত্রকপানস্য ব্যাধযঃ স্যুঃ শিরোগতাঃ|৩৩|
गौरवं शिरसः शूलं पीनसार्धावभेदकौ||२७|| कर्णाक्षिशूलं कासश्च हिक्काश्वासौ गलग्रहः| दन्तदौर्बल्यमास्रावः श्रोत्रघ्राणाक्षिदोषजः||२८|| पूतिर्घ्राणास्यगन्धश्च दन्तशूलमरोचकः| हनुमन्याग्रहः कण्डूः क्रिमयः पाण्डुता मुखे||२९|| श्लेष्मप्रसेको वैस्वर्यं गलशुण्ड्युपजिह्विका| खालित्यं पिञ्जरत्वं च केशानां पतनं तथा||३०|| क्षवथुश्चातितन्द्रा च बुद्धेर्मोहोऽतिनिद्रता| धूमपानात् प्रशाम्यन्ति बलं भवति चाधिकम्||३१|| शिरोरुहकपालानामिन्द्रियाणां स्वरस्य च| न च वातकफात्मानो बलिनोऽप्यूर्ध्वजत्रुजाः||३२|| धूमवक्त्रकपानस्य व्याधयः स्युः शिरोगताः|३३|
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Adhikarana 20 (33-35) · Śloka 36
প্রযোগপানে তস্যাষ্টৌ কালাঃ সম্পরিকীর্তিতাঃ||৩৩|| বাতশ্লেষ্মসমুত্ক্লেশঃ কালেষ্বেষু হি লক্ষ্যতে| স্নাত্বা ভুক্ত্বা সমুল্লিখ্য ক্ষুত্বা দন্তান্নিঘৃষ্য চ| নাবনাঞ্জননিদ্রান্তে চাত্মবান্ ধূমপো ভবেত্| তথা বাতকফাত্মানো ন ভবন্ত্যূর্ধ্বজত্রুজাঃ||৩৫|| রোগাস্তস্য তু পেযাঃ স্যুরাপানাস্ত্রিস্ত্রযস্ত্রযঃ|৩৬|
प्रयोगपाने तस्याष्टौ कालाः सम्परिकीर्तिताः||३३|| वातश्लेष्मसमुत्क्लेशः कालेष्वेषु हि लक्ष्यते| स्नात्वा भुक्त्वा समुल्लिख्य क्षुत्वा दन्तान्निघृष्य च| नावनाञ्जननिद्रान्ते चात्मवान् धूमपो भवेत्| तथा वातकफात्मानो न भवन्त्यूर्ध्वजत्रुजाः||३५|| रोगास्तस्य तु पेयाः स्युरापानास्त्रिस्त्रयस्त्रयः|३६|
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Adhikarana 21 (36-37) · Śloka 38
পরং দ্বিকালপাযী স্যাদহ্নঃ কালেষু বুদ্ধিমান্||৩৬|| প্রযোগে, স্নৈহিকে ত্বেকং, বৈরেচ্যং ত্রিচতুঃ পিবেত্| হৃত্কণ্ঠেন্দ্রিযসংশুদ্ধির্লঘুত্বং শিরসঃ শমঃ||৩৭|| যথেরিতানাং দোষাণাং সম্যক্পীতস্য লক্ষণম্|৩৮|
परं द्विकालपायी स्यादह्नः कालेषु बुद्धिमान्||३६|| प्रयोगे, स्नैहिके त्वेकं, वैरेच्यं त्रिचतुः पिबेत्| हृत्कण्ठेन्द्रियसंशुद्धिर्लघुत्वं शिरसः शमः||३७|| यथेरितानां दोषाणां सम्यक्पीतस्य लक्षणम्|३८|
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Adhikarana 22 (38-40) · Śloka 40
বাধির্যমান্ধ্যমূকত্বং রক্তপিত্তং শিরোভ্রমম্||৩৮|| অকালে চাতিপীতশ্চ ধূমঃ কুর্যাদুপদ্রবান্| তত্রেষ্টং সর্পিষঃ পানং নাবনাঞ্জনতর্পণম্||৩৯|| স্নৈহিকং ধূমজে দোষে বাযুঃ পিত্তানুগো যদি| শীতং তু রক্তপিত্তে স্যাচ্ছ্লেষ্মপিত্তে বিরূক্ষণম্||৪০||
बाधिर्यमान्ध्यमूकत्वं रक्तपित्तं शिरोभ्रमम्||३८|| अकाले चातिपीतश्च धूमः कुर्यादुपद्रवान्| तत्रेष्टं सर्पिषः पानं नावनाञ्जनतर्पणम्||३९|| स्नैहिकं धूमजे दोषे वायुः पित्तानुगो यदि| शीतं तु रक्तपित्ते स्याच्छ्लेष्मपित्ते विरूक्षणम्||४०||
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Adhikarana 23 (41-45) · Śloka 46
পরং ত্বতঃ প্রবক্ষ্যামি ধূমো যেষাং বিগর্হিতঃ| ন বিরিক্তঃ পিবেদ্ধূমং ন কৃতে বস্তিকর্মণি||৪১|| ন রক্তী ন বিষেণার্তো ন শোচন্ন চ গর্ভিণী| ন শ্রমে ন মদে নামে ন পিত্তে ন প্রজাগরে||৪২|| ন মূর্চ্ছাভ্রমতৃষ্ণাসু ন ক্ষীণে নাপি চ ক্ষতে| ন মদ্যদুগ্ধে পীত্বা চ ন স্নেহং ন চ মাক্ষিকম্||৪৩|| ধূমং ন ভুক্ত্বা দধ্না চ ন রূক্ষঃ ক্রুদ্ধ এব চ| ন তালুশোষে তিমিরে শিরস্যভিহিতে ন চ||৪৪|| ন শঙ্খকে ন রোহিণ্যাং ন মেহে ন মদাত্যযে| এষু ধূমমকালেষু মোহাত্ পিবতি যো নরঃ||৪৫|| রোগাস্তস্য প্রবর্ধন্তে দারুণা ধূমবিভ্রমাত্|৪৬|
परं त्वतः प्रवक्ष्यामि धूमो येषां विगर्हितः| न विरिक्तः पिबेद्धूमं न कृते बस्तिकर्मणि||४१|| न रक्ती न विषेणार्तो न शोचन्न च गर्भिणी| न श्रमे न मदे नामे न पित्ते न प्रजागरे||४२|| न मूर्च्छाभ्रमतृष्णासु न क्षीणे नापि च क्षते| न मद्यदुग्धे पीत्वा च न स्नेहं न च माक्षिकम्||४३|| धूमं न भुक्त्वा दध्ना च न रूक्षः क्रुद्ध एव च| न तालुशोषे तिमिरे शिरस्यभिहिते न च||४४|| न शङ्खके न रोहिण्यां न मेहे न मदात्यये| एषु धूममकालेषु मोहात् पिबति यो नरः||४५|| रोगास्तस्य प्रवर्धन्ते दारुणा धूमविभ्रमात्|४६|
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Adhikarana 24 (46-47) · Śloka 48
ধূমযোগ্যঃ পিবেদ্দোষে শিরোঘ্রাণাক্ষিসংশ্রযে||৪৬|| ঘ্রাণেনাস্যেন কণ্ঠস্থে মুখেন ঘ্রাণপো বমেত্| আস্যেন ধূমকবলান্ পিবন্ ঘ্রাণেন নোদ্বমেত্||৪৭|| প্রতিলোমং গতো হ্যাশু ধূমো হিংস্যাদ্ধি চক্ষুষী|৪৮|
धूमयोग्यः पिबेद्दोषे शिरोघ्राणाक्षिसंश्रये||४६|| घ्राणेनास्येन कण्ठस्थे मुखेन घ्राणपो वमेत्| आस्येन धूमकवलान् पिबन् घ्राणेन नोद्वमेत्||४७|| प्रतिलोमं गतो ह्याशु धूमो हिंस्याद्धि चक्षुषी|४८|
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Adhikarana 25 (48) · Śloka 49
ঋজ্বঙ্গচক্ষুস্তচ্চেতাঃ সূপবিষ্টস্ত্রিপর্যযম্||৪৮|| পিবেচ্ছিদ্রং পিধাযৈকং নাসযা ধূমমাত্মবান্|৪৯|
ऋज्वङ्गचक्षुस्तच्चेताः सूपविष्टस्त्रिपर्ययम्||४८|| पिबेच्छिद्रं पिधायैकं नासया धूममात्मवान्|४९|
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Adhikarana 26 (49-50) · Śloka 51
চতুর্বিংশতিকং নেত্রং স্বাঙ্গুলীভির্বিরেচনে||৪৯|| দ্বাত্রিংশদঙ্গুলং স্নেহে প্রযোগেঽধ্যর্ধমিষ্যতে| ঋজু ত্রিকোষাফলিতং কোলাস্থ্যগ্রপ্রমাণিতম্||৫০|| বস্তিনেত্রসমদ্রব্যং ধূমনেত্রং প্রশস্যতে|৫১|
चतुर्विंशतिकं नेत्रं स्वाङ्गुलीभिर्विरेचने||४९|| द्वात्रिंशदङ्गुलं स्नेहे प्रयोगेऽध्यर्धमिष्यते| ऋजु त्रिकोषाफलितं कोलास्थ्यग्रप्रमाणितम्||५०|| बस्तिनेत्रसमद्रव्यं धूमनेत्रं प्रशस्यते|५१|
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Adhikarana 27 (51) · Śloka 52
দূরাদ্বিনির্গতঃ পর্বচ্ছিন্নো নাডীতনূকৃতঃ||৫১|| নেন্দ্রিযং বাধতে ধূমো মাত্রাকালনিষেবিতঃ|৫২|
दूराद्विनिर्गतः पर्वच्छिन्नो नाडीतनूकृतः||५१|| नेन्द्रियं बाधते धूमो मात्राकालनिषेवितः|५२|
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Adhikarana 28 (52-55) · Śloka 56
যদা চোরশ্চ কণ্ঠশ্চ শিরশ্চ লঘুতাং ব্রজেত্||৫২|| কফশ্চ তনুতাং প্রাপ্তঃ সুপীতং ধূমমাদিশেত্| অবিশুদ্ধঃ স্বরো যস্য কণ্ঠশ্চ সকফো ভবেত্||৫৩|| স্তিমিতো মস্তকশ্চৈবমপীতং ধূমমাদিশেত্| তালু মূর্ধা চ কণ্ঠশ্চ শুষ্যতে পরিতপ্যতে||৫৪|| তৃষ্যতে মুহ্যতে জন্তূ রক্তং চ স্রবতেঽধিকম্| শিরশ্চ ভ্রমতেঽত্যর্থং মূর্চ্ছা চাস্যোপজাযতে||৫৫|| ইন্দ্রিযাণ্যুপতপ্যন্তে ধূমেঽত্যর্থং নিষেবিতে|৫৬|
यदा चोरश्च कण्ठश्च शिरश्च लघुतां व्रजेत्||५२|| कफश्च तनुतां प्राप्तः सुपीतं धूममादिशेत्| अविशुद्धः स्वरो यस्य कण्ठश्च सकफो भवेत्||५३|| स्तिमितो मस्तकश्चैवमपीतं धूममादिशेत्| तालु मूर्धा च कण्ठश्च शुष्यते परितप्यते||५४|| तृष्यते मुह्यते जन्तू रक्तं च स्रवतेऽधिकम्| शिरश्च भ्रमतेऽत्यर्थं मूर्च्छा चास्योपजायते||५५|| इन्द्रियाण्युपतप्यन्ते धूमेऽत्यर्थं निषेविते|५६|
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Adhikarana 29 (56-62) · Śloka 63
বর্ষে বর্ষেঽণুতৈলং চ কালেষু ত্রিষু না চরেত্||৫৬|| প্রাবৃট্শরদ্বসন্তেষু গতমেঘে নভস্তলে| নস্যকর্ম যথাকালং যো যথোক্তং নিষেবতে||৫৭|| ন তস্য চক্ষুর্ন ঘ্রাণং ন শ্রোত্রমুপহন্যতে| ন স্যুঃ শ্বেতা ন কপিলাঃ কেশাঃ শ্মশ্রূণি বা পুনঃ||৫৮|| ন চ কেশাঃ প্রমুচ্যন্তে বর্ধন্তে চ বিশেষতঃ| মন্যাস্তম্ভঃ শিরঃশূলমর্দিতং হনুসঙ্গ্রহঃ||৫৯|| পীনসার্ধাবভেদৌ চ শিরঃকম্পশ্চ শাম্যতি| সিরাঃ শিরঃকপালানাং সন্ধযঃ স্নাযুকণ্ডরাঃ||৬০|| নাবনপ্রীণিতাশ্চাস্য লভন্তেঽভ্যধিকং বলম্| মুখং প্রসন্নোপচিতং স্বরঃ স্নিগ্ধঃ স্থিরো মহান্||৬১|| সর্বেন্দ্রিযাণাং বৈমল্যং বলং ভবতি চাধিকম্| ন চাস্য রোগাঃ সহসা প্রভবন্ত্যূর্ধ্বজত্রুজাঃ||৬২|| জীর্যতশ্চোত্তমাঙ্গেষু জরা ন লভতে বলম্|৬৩|
वर्षे वर्षेऽणुतैलं च कालेषु त्रिषु ना चरेत्||५६|| प्रावृट्शरद्वसन्तेषु गतमेघे नभस्तले| नस्यकर्म यथाकालं यो यथोक्तं निषेवते||५७|| न तस्य चक्षुर्न घ्राणं न श्रोत्रमुपहन्यते| न स्युः श्वेता न कपिलाः केशाः श्मश्रूणि वा पुनः||५८|| न च केशाः प्रमुच्यन्ते वर्धन्ते च विशेषतः| मन्यास्तम्भः शिरःशूलमर्दितं हनुसङ्ग्रहः||५९|| पीनसार्धावभेदौ च शिरःकम्पश्च शाम्यति| सिराः शिरःकपालानां सन्धयः स्नायुकण्डराः||६०|| नावनप्रीणिताश्चास्य लभन्तेऽभ्यधिकं बलम्| मुखं प्रसन्नोपचितं स्वरः स्निग्धः स्थिरो महान्||६१|| सर्वेन्द्रियाणां वैमल्यं बलं भवति चाधिकम्| न चास्य रोगाः सहसा प्रभवन्त्यूर्ध्वजत्रुजाः||६२|| जीर्यतश्चोत्तमाङ्गेषु जरा न लभते बलम्|६३|
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Adhikarana 30 (63-70) · Śloka 71
চন্দনাগুরুণী পত্রং দার্বীত্বঙ্মধুকং বলাম্||৬৩|| প্রপৌণ্ডরীকং সূক্ষ্মৈলাং বিডঙ্গং বিল্বমুত্পলম্| হ্রীবেরমভযং বন্যং ত্বঙ্মুস্তং সারিবাং স্থিরাম্||৬৪|| জীবন্তীং পৃশ্নিপর্ণীং চ সুরদারু শতাবরীম্| হরেণুং বৃহতীং ব্যাঘ্রীং সুরভীং পদ্মকেশরম্||৬৫|| বিপাচযেচ্ছতগুণে মাহেন্দ্রে বিমলেঽম্ভসি| তৈলাদ্দশগুণং শেষং কষাযমবতারযেত্||৬৬|| তেন তৈলং কষাযেণ দশকৃত্বো বিপাচযেত্| অথাস্য দশমে পাকে সমাংশং ছাগলং পযঃ||৬৭|| দদ্যাদেষোঽণুতৈলস্য নাবনীযস্য সংবিধিঃ| অস্য মাত্রাং প্রযুঞ্জীত তৈলস্যার্ধপলোন্মিতাম্||৬৮|| স্নিগ্ধস্বিন্নোত্তমাঙ্গস্য পিচুনা নাবনৈস্ত্রিভিঃ| ত্র্যহাত্ত্র্যহাচ্চ সপ্তাহমেতত্ কর্ম সমাচরেত্||৬৯|| নিবাতোষ্ণসমাচারী হিতাশী নিযতেন্দ্রিযঃ| তৈলমেতত্ত্রিদোষঘ্নমিন্দ্রিযাণাং বলপ্রদম্||৭০|| প্রযুঞ্জানো যথাকালং যথোক্তানশ্নুতে গুণান্|৭১|
चन्दनागुरुणी पत्रं दार्वीत्वङ्मधुकं बलाम्||६३|| प्रपौण्डरीकं सूक्ष्मैलां विडङ्गं बिल्वमुत्पलम्| ह्रीबेरमभयं वन्यं त्वङ्मुस्तं सारिवां स्थिराम्||६४|| जीवन्तीं पृश्निपर्णीं च सुरदारु शतावरीम्| हरेणुं बृहतीं व्याघ्रीं सुरभीं पद्मकेशरम्||६५|| विपाचयेच्छतगुणे माहेन्द्रे विमलेऽम्भसि| तैलाद्दशगुणं शेषं कषायमवतारयेत्||६६|| तेन तैलं कषायेण दशकृत्वो विपाचयेत्| अथास्य दशमे पाके समांशं छागलं पयः||६७|| दद्यादेषोऽणुतैलस्य नावनीयस्य संविधिः| अस्य मात्रां प्रयुञ्जीत तैलस्यार्धपलोन्मिताम्||६८|| स्निग्धस्विन्नोत्तमाङ्गस्य पिचुना नावनैस्त्रिभिः| त्र्यहात्त्र्यहाच्च सप्ताहमेतत् कर्म समाचरेत्||६९|| निवातोष्णसमाचारी हिताशी नियतेन्द्रियः| तैलमेतत्त्रिदोषघ्नमिन्द्रियाणां बलप्रदम्||७०|| प्रयुञ्जानो यथाकालं यथोक्तानश्नुते गुणान्|७१|
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Adhikarana 31 (71-75) · Śloka 76
আপোথিতাগ্রং দ্বৌ কালৌ কষাযকটুতিক্তকম্||৭১|| ভক্ষযেদ্দন্তপবনং দন্তমাংসান্যবাধযন্| নিহন্তি গন্ধং বৈরস্যং জিহ্বাদন্তাস্যজং মলম্||৭২|| নিষ্কৃষ্য রুচিমাধত্তে সদ্যো দন্তবিশোধনম্| করঞ্জকরবীরার্কমালতীককুভাসনাঃ||৭৩|| শস্যন্তে দন্তপবনে যে চাপ্যেবংবিধা দ্রুমাঃ| সুবর্ণরূপ্যতাম্রাণি ত্রপুরীতিমযানি চ||৭৪|| জিহ্বানির্লেখনানি স্যুরতীক্ষ্ণান্যনৃজূনি চ| জিহ্বামূলগতং যচ্চ মলমুচ্ছ্বাসরোধি চ||৭৫|| দৌর্গন্ধ্যং ভজতে তেন তস্মাজ্জিহ্বাং বিনির্লিখেত্|৭৬|
आपोथिताग्रं द्वौ कालौ कषायकटुतिक्तकम्||७१|| भक्षयेद्दन्तपवनं दन्तमांसान्यबाधयन्| निहन्ति गन्धं वैरस्यं जिह्वादन्तास्यजं मलम्||७२|| निष्कृष्य रुचिमाधत्ते सद्यो दन्तविशोधनम्| करञ्जकरवीरार्कमालतीककुभासनाः||७३|| शस्यन्ते दन्तपवने ये चाप्येवंविधा द्रुमाः| सुवर्णरूप्यताम्राणि त्रपुरीतिमयानि च||७४|| जिह्वानिर्लेखनानि स्युरतीक्ष्णान्यनृजूनि च| जिह्वामूलगतं यच्च मलमुच्छ्वासरोधि च||७५|| दौर्गन्ध्यं भजते तेन तस्माज्जिह्वां विनिर्लिखेत्|७६|
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Adhikarana 32 (76-77) · Śloka 77
ধার্যাণ্যাস্যেন বৈশদ্যরুচিসৌগন্ধ্যমিচ্ছতা||৭৬|| জাতীকটুকপূগানাং লবঙ্গস্য ফলানি চ| কক্কোলস্য ফলং পত্রং তাম্বূলস্য শুভং তথা| তথা কর্পূরনির্যাসঃ সূক্ষ্মৈলাযাঃ ফলানি চ||৭৭||
धार्याण्यास्येन वैशद्यरुचिसौगन्ध्यमिच्छता||७६|| जातीकटुकपूगानां लवङ्गस्य फलानि च| कक्कोलस्य फलं पत्रं ताम्बूलस्य शुभं तथा| तथा कर्पूरनिर्यासः सूक्ष्मैलायाः फलानि च||७७||
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Adhikarana 33 (78-89) · Śloka 89
হন্বোর্বলং স্বরবলং বদনোপচযঃ পরঃ| স্যাত্ পরং চ রসজ্ঞানমন্নে চ রুচিরুত্তমা||৭৮|| ন চাস্য কণ্ঠশোষঃ স্যান্নৌষ্ঠযোঃ স্ফুটনাদ্ভযম্| ন চ দন্তাঃ ক্ষযং যান্তি দৃঢমূলা ভবন্তি চ||৭৯|| ন শূল্যন্তে ন চাম্লেন হৃষ্যন্তে ভক্ষযন্তি চ| পরানপি খরান্ ভক্ষ্যাংস্তৈলগণ্ডূষধারণাত্||৮০|| নিত্যং স্নেহার্দ্রশিরসঃ শিরঃশূলং ন জাযতে| ন খালিত্যং ন পালিত্যং ন কেশাঃ প্রপতন্তি চ||৮১|| বলং শিরঃকপালানাং বিশেষেণাভিবর্ধতে| দৃঢমূলাশ্চ দীর্ঘাশ্চ কৃষ্ণাঃ কেশা ভবন্তি চ||৮২|| ইন্দ্রিযাণি প্রসীদন্তি সুত্বগ্ভবতি চাননম্ | নিদ্রালাভঃ সুখং চ স্যান্মূর্ধ্নি তৈলনিষেবণাত্||৮৩|| ন কর্ণরোগা বাতোত্থা ন মন্যাহনুসঙ্গ্রহঃ| নোচ্চৈঃ শ্রুতির্ন বাধির্যং স্যান্নিত্যং কর্ণতর্পণাত্||৮৪|| স্নেহাভ্যঙ্গাদ্যথা কুম্ভশ্চর্ম স্নেহবিমর্দনাত্| ভবত্যুপাঙ্গাদক্ষশ্চ দৃঢঃ ক্লেশসহো যথা||৮৫|| তথা শরীরমভ্যঙ্গাদ্দৃঢং সুত্বক্ চ জাযতে| প্রশান্তমারুতাবাধং ক্লেশব্যাযামসংসহম্||৮৬|| স্পর্শনেঽভ্যধিকো বাযুঃ স্পর্শনং চ ত্বগাশ্রিতম্| ত্বচ্যশ্চ পরমভ্যঙ্গস্তস্মাত্তং শীলযেন্নরঃ||৮৭|| ন চাভিঘাতাভিহতং গাত্রমভ্যঙ্গসেবিনঃ| বিকারং ভজতেঽত্যর্থং বলকর্মণি বা ক্বচিত্||৮৮|| সুস্পর্শোপচিতাঙ্গশ্চ বলবান্ প্রিযদর্শনঃ| ভবত্যভ্যঙ্গনিত্যত্বান্নরোঽল্পজর এব চ||৮৯||
हन्वोर्बलं स्वरबलं वदनोपचयः परः| स्यात् परं च रसज्ञानमन्ने च रुचिरुत्तमा||७८|| न चास्य कण्ठशोषः स्यान्नौष्ठयोः स्फुटनाद्भयम्| न च दन्ताः क्षयं यान्ति दृढमूला भवन्ति च||७९|| न शूल्यन्ते न चाम्लेन हृष्यन्ते भक्षयन्ति च| परानपि खरान् भक्ष्यांस्तैलगण्डूषधारणात्||८०|| नित्यं स्नेहार्द्रशिरसः शिरःशूलं न जायते| न खालित्यं न पालित्यं न केशाः प्रपतन्ति च||८१|| बलं शिरःकपालानां विशेषेणाभिवर्धते| दृढमूलाश्च दीर्घाश्च कृष्णाः केशा भवन्ति च||८२|| इन्द्रियाणि प्रसीदन्ति सुत्वग्भवति चाननम् | निद्रालाभः सुखं च स्यान्मूर्ध्नि तैलनिषेवणात्||८३|| न कर्णरोगा वातोत्था न मन्याहनुसङ्ग्रहः| नोच्चैः श्रुतिर्न बाधिर्यं स्यान्नित्यं कर्णतर्पणात्||८४|| स्नेहाभ्यङ्गाद्यथा कुम्भश्चर्म स्नेहविमर्दनात्| भवत्युपाङ्गादक्षश्च दृढः क्लेशसहो यथा||८५|| तथा शरीरमभ्यङ्गाद्दृढं सुत्वक् च जायते| प्रशान्तमारुताबाधं क्लेशव्यायामसंसहम्||८६|| स्पर्शनेऽभ्यधिको वायुः स्पर्शनं च त्वगाश्रितम्| त्वच्यश्च परमभ्यङ्गस्तस्मात्तं शीलयेन्नरः||८७|| न चाभिघाताभिहतं गात्रमभ्यङ्गसेविनः| विकारं भजतेऽत्यर्थं बलकर्मणि वा क्वचित्||८८|| सुस्पर्शोपचिताङ्गश्च बलवान् प्रियदर्शनः| भवत्यभ्यङ्गनित्यत्वान्नरोऽल्पजर एव च||८९||
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Adhikarana 34 (90-92) · Śloka 92
খরত্বং স্তব্ধতা রৌক্ষ্যং শ্রমঃ সুপ্তিশ্চ পাদযোঃ| সদ্য এবোপশাম্যন্তি পাদাভ্যঙ্গনিষেবণাত্||৯০|| জাযতে সৌকুমার্যং চ বলং স্থৈর্যং চ পাদযোঃ| দৃষ্টিঃ প্রসাদং লভতে মারুতশ্চোপশাম্যতি||৯১|| ন চ স্যাদ্গৃধ্রসীবাতঃ পাদযোঃ স্ফুটনং ন চ| ন সিরাস্নাযুসঙ্কোচঃ পাদাভ্যঙ্গেন পাদযোঃ||৯২||
खरत्वं स्तब्धता रौक्ष्यं श्रमः सुप्तिश्च पादयोः| सद्य एवोपशाम्यन्ति पादाभ्यङ्गनिषेवणात्||९०|| जायते सौकुमार्यं च बलं स्थैर्यं च पादयोः| दृष्टिः प्रसादं लभते मारुतश्चोपशाम्यति||९१|| न च स्याद्गृध्रसीवातः पादयोः स्फुटनं न च| न सिरास्नायुसङ्कोचः पादाभ्यङ्गेन पादयोः||९२||
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Adhikarana 35 (93-94) · Śloka 94
দৌর্গন্ধ্যং গৌরবং তন্দ্রাং কণ্ডূং মলমরোচকম্| স্বেদবীভত্সতাং হন্তি শরীরপরিমার্জনম্||৯৩|| পবিত্রং বৃষ্যমাযুষ্যং শ্রমস্বেদমলাপহম্ | শরীরবলসন্ধানং স্নানমোজস্করং পরম্||৯৪||
दौर्गन्ध्यं गौरवं तन्द्रां कण्डूं मलमरोचकम्| स्वेदबीभत्सतां हन्ति शरीरपरिमार्जनम्||९३|| पवित्रं वृष्यमायुष्यं श्रमस्वेदमलापहम् | शरीरबलसन्धानं स्नानमोजस्करं परम्||९४||
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Adhikarana 36 (95-102) · Śloka 102
কাম্যং যশস্যমাযুষ্যমলক্ষ্মীঘ্নং প্রহর্ষণম্| শ্রীমত্ পারিষদং শস্তং নির্মলাম্বরধারণম্||৯৫|| বৃষ্যং সৌগন্ধ্যমাযুষ্যং কাম্যং পুষ্টিবলপ্রদম্| সৌমনস্যমলক্ষ্মীঘ্নং গন্ধমাল্যনিষেবণম্||৯৬|| ধন্যং মঙ্গল্যমাযুষ্যং শ্রীমদ্ব্যসনসূদনম্| হর্ষণং কাম্যমোজস্যং রত্নাভরণধারণম্||৯৭|| মেধ্যং পবিত্রমাযুষ্যমলক্ষ্মীকলিনাশনম্| পাদযোর্মলমার্গাণাং শৌচাধানমভীক্ষ্ণশঃ||৯৮|| পৌষ্টিকং বৃষ্যমাযুষ্যং শুচি রূপবিরাজনম্| কেশশ্মশ্রুনখাদীনাং কল্পনং সম্প্রসাধনম্||৯৯|| চক্ষুষ্যং স্পর্শনহিতং পাদযোর্ব্যসনাপহম্| বল্যং পরাক্রমসুখং বৃষ্যং পাদত্রধারণম্||১০০|| ঈতেঃ প্রশমনং বল্যং গুপ্ত্যাবরণশঙ্করম্| ঘর্মানিলরজোম্বুঘ্নং ছত্রধারণমুচ্যতে||১০১|| স্খলতঃ সম্প্রতিষ্ঠানং শত্রূণাং চ নিষূদনম্| অবষ্টম্ভনমাযুষ্যং ভযঘ্নং দণ্ডধারণম্||১০২||
काम्यं यशस्यमायुष्यमलक्ष्मीघ्नं प्रहर्षणम्| श्रीमत् पारिषदं शस्तं निर्मलाम्बरधारणम्||९५|| वृष्यं सौगन्ध्यमायुष्यं काम्यं पुष्टिबलप्रदम्| सौमनस्यमलक्ष्मीघ्नं गन्धमाल्यनिषेवणम्||९६|| धन्यं मङ्गल्यमायुष्यं श्रीमद्व्यसनसूदनम्| हर्षणं काम्यमोजस्यं रत्नाभरणधारणम्||९७|| मेध्यं पवित्रमायुष्यमलक्ष्मीकलिनाशनम्| पादयोर्मलमार्गाणां शौचाधानमभीक्ष्णशः||९८|| पौष्टिकं वृष्यमायुष्यं शुचि रूपविराजनम्| केशश्मश्रुनखादीनां कल्पनं सम्प्रसाधनम्||९९|| चक्षुष्यं स्पर्शनहितं पादयोर्व्यसनापहम्| बल्यं पराक्रमसुखं वृष्यं पादत्रधारणम्||१००|| ईतेः प्रशमनं बल्यं गुप्त्यावरणशङ्करम्| घर्मानिलरजोम्बुघ्नं छत्रधारणमुच्यते||१०१|| स्खलतः सम्प्रतिष्ठानं शत्रूणां च निषूदनम्| अवष्टम्भनमायुष्यं भयघ्नं दण्डधारणम्||१०२||
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Adhikarana 37 (103) · Śloka 103
নগরী নগরস্যেব রথস্যেব রথী যথা| স্বশরীরস্য মেধাবী কৃত্যেষ্ববহিতো ভবেত্||১০৩||
नगरी नगरस्येव रथस्येव रथी यथा| स्वशरीरस्य मेधावी कृत्येष्ववहितो भवेत्||१०३||
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Adhikarana 38 (104) · Śloka 104
ভবতি চাত্র- বৃত্ত্যুপাযান্নিষেবেত যে স্যুর্ধর্মাবিরোধিনঃ| শমমধ্যযনং চৈব সুখমেবং সমশ্নুতে||১০৪||
भवति चात्र- वृत्त्युपायान्निषेवेत ये स्युर्धर्माविरोधिनः| शममध्ययनं चैव सुखमेवं समश्नुते||१०४||
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Adhikarana 39 (105-111) · Śloka 111
তত্র শ্লোকাঃ- মাত্রা দ্রব্যাণি মাত্রাং চ সংশ্রিত্য গুরুলাঘবম্| দ্রব্যাণাং গর্হিতোঽভ্যাসো যেষাং, যেষাং চ শস্যতে||১০৫|| অঞ্জনং ধূমবর্তিশ্চ ত্রিবিধা বর্তিকল্পনা| ধূমপানগুণাঃ কালাঃ পানমানং চ যস্য যত্||১০৬|| ব্যাপত্তিচিহ্নং ভৈষজ্যং ধূমো যেষাং বিগর্হিতঃ| পেযো যথা যন্মযং চ নেত্রং যস্য চ যদ্বিধম্||১০৭|| নস্যকর্মগুণা নস্তঃকার্যং যচ্চ যথা যদা| ভক্ষযেদ্দন্তপবনং যথা যদ্যদ্গুণং চ যত্||১০৮|| যদর্থং যানি চাস্যেন ধার্যাণি কবলগ্রহে| তৈলস্য যে গুণা দিষ্টাঃ শিরস্তৈলগুণাশ্চ যে||১০৯|| কর্ণতৈলে তথাঽভ্যঙ্গে পাদাভ্যঙ্গেঽঙ্গমার্জনে| স্নানে বাসসি শুদ্ধে চ সৌগন্ধ্যে রত্নধারণে||১১০|| শৌচে সংহরণে লোম্নাং পাদত্রচ্ছত্রধারণে| গুণা মাত্রাশিতীযেঽস্মিংস্তথোক্তা দণ্ডধারণে||১১১||
तत्र श्लोकाः- मात्रा द्रव्याणि मात्रां च संश्रित्य गुरुलाघवम्| द्रव्याणां गर्हितोऽभ्यासो येषां, येषां च शस्यते||१०५|| अञ्जनं धूमवर्तिश्च त्रिविधा वर्तिकल्पना| धूमपानगुणाः कालाः पानमानं च यस्य यत्||१०६|| व्यापत्तिचिह्नं भैषज्यं धूमो येषां विगर्हितः| पेयो यथा यन्मयं च नेत्रं यस्य च यद्विधम्||१०७|| नस्यकर्मगुणा नस्तःकार्यं यच्च यथा यदा| भक्षयेद्दन्तपवनं यथा यद्यद्गुणं च यत्||१०८|| यदर्थं यानि चास्येन धार्याणि कवलग्रहे| तैलस्य ये गुणा दिष्टाः शिरस्तैलगुणाश्च ये||१०९|| कर्णतैले तथाऽभ्यङ्गे पादाभ्यङ्गेऽङ्गमार्जने| स्नाने वाससि शुद्धे च सौगन्ध्ये रत्नधारणे||११०|| शौचे संहरणे लोम्नां पादत्रच्छत्रधारणे| गुणा मात्राशितीयेऽस्मिंस्तथोक्ता दण्डधारणे||१११||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 5
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শ্লোকস্থানে মাত্রাশিতীযো নাম পঞ্চমোঽধ্যাযঃ সমাপ্তঃ||৫||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते श्लोकस्थाने मात्राशितीयो नाम पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः||५||
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