Adhikarana ajagallikAlakShaNam (1) · Śloka 1
অথ ক্ষুদ্ররোগনিদানম্ |
স্নিগ্ধাঃ সবর্ণা গ্রন্থিতা নীরুজো মুদ্গসন্নিভাঃ |
কফবাতোত্থিতা জ্ঞেযা বালানামজগল্লিকাঃ ||১||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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अथ क्षुद्ररोगनिदानम् |
स्निग्धाः सवर्णा ग्रन्थिता नीरुजो मुद्गसन्निभाः |
कफवातोत्थिता ज्ञेया बालानामजगल्लिकाः ||१||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana yavaprakhyAlakShaNam (2) · Śloka 2
যবাকারা সুকঠিনা গ্রথিতা মাংসসংশ্রিতা |
পিডকা কফবাতাভ্যাং যবপ্রখ্যেতি সোচ্যতে ||২||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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यवाकारा सुकठिना ग्रथिता मांससंश्रिता |
पिडका कफवाताभ्यां यवप्रख्येति सोच्यते ||२||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana antrAlajIlakShaNam (3) · Śloka 3
ঘনামবক্ত্রাং পিডকামুন্নতাং পরিমণ্ডলাম্ |
অন্ত্রালজীমল্পপূযাং তাং বিদ্যাত্ কফবাতজাম্ ||৩||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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घनामवक्त्रां पिडकामुन्नतां परिमण्डलाम् |
अन्त्रालजीमल्पपूयां तां विद्यात् कफवातजाम् ||३||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana vivRutAlakShaNam (4) · Śloka 4
বিবৃতাস্যাং মহাদাহাং পক্বোদুম্বরসন্নিভাম্ |
বিবৃতামিতি তাং বিদ্যাত্ পিত্তোত্থাং পরিমণ্ডলাম্ ||৪||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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विवृतास्यां महादाहां पक्वोदुम्बरसन्निभाम् |
विवृतामिति तां विद्यात् पित्तोत्थां परिमण्डलाम् ||४||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana kacchapikAlakShaNam (5) · Śloka 5
গ্রথিতাঃ পঞ্চ বা ষড্বা দারুণাঃ কচ্ছপোপমাঃ |
কফানিলাভ্যাং পিডকা জ্ঞেযাঃ কচ্ছপিকা বুধৈঃ ||৫||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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ग्रथिताः पञ्च वा षड्वा दारुणाः कच्छपोपमाः |
कफानिलाभ्यां पिडका ज्ञेयाः कच्छपिका बुधैः ||५||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana valmIkalakShaNam (6-7) · Śloka 7
গ্রীবাংসকক্ষাকরপাদদেশে সন্ধৌ গলে বা ত্রিভিরেব দোষৈঃ |
গ্রন্থিঃ স বল্মীকবদক্রিযাণাং জাতঃ ক্রমেণৈব গতঃ প্রবৃদ্ধিম্ ||৬||
মুখৈরনেকৈঃ স্রুতিতোদবদ্ভির্বিসর্পবত্ সর্পতি চোন্নতাগ্রৈঃ |
বল্মীকমাহুর্ভিষজো বিকারং নিষ্প্রত্যনীকং চিরজং বিশেষাত্ ||৭||
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ग्रीवांसकक्षाकरपाददेशे सन्धौ गले वा त्रिभिरेव दोषैः |
ग्रन्थिः स वल्मीकवदक्रियाणां जातः क्रमेणैव गतः प्रवृद्धिम् ||६||
मुखैरनेकैः स्रुतितोदवद्भिर्विसर्पवत् सर्पति चोन्नताग्रैः |
वल्मीकमाहुर्भिषजो विकारं निष्प्रत्यनीकं चिरजं विशेषात् ||७||
Adhikarana indraviddhAlakShaNam (8) · Śloka 8
পদ্মকর্ণিকবন্মধ্যে পিডকাভিঃ সমাচিতাম্ |
ইন্দ্রবিদ্ধাং তু তাং বিদ্যাদ্বাতপিত্তোত্থিতাং ভিষক্ ||৮||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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पद्मकर्णिकवन्मध्ये पिडकाभिः समाचिताम् |
इन्द्रविद्धां तु तां विद्याद्वातपित्तोत्थितां भिषक् ||८||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana gardabhikAlakShaNam (9) · Śloka 9
মণ্ডলং বৃত্তমুত্সন্নং সরক্তং পিডকাচিতম্ |
রুজাকরীং গর্দভিকাং তাং বিদ্যাদ্বাতপিত্তজাম্ ||৯||
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मण्डलं वृत्तमुत्सन्नं सरक्तं पिडकाचितम् |
रुजाकरीं गर्दभिकां तां विद्याद्वातपित्तजाम् ||९||
Adhikarana pAShANagardabhalakShaNam (10) · Śloka 10
বাতশ্লেষ্মসমুদ্ভূতঃ শ্বযথুর্হনুসন্ধিজঃ |
স্থিরো মন্দরুজঃ স্নিগ্ধো জ্ঞেযঃ পাষাণগর্দভঃ ||১০||
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वातश्लेष्मसमुद्भूतः श्वयथुर्हनुसन्धिजः |
स्थिरो मन्दरुजः स्निग्धो ज्ञेयः पाषाणगर्दभः ||१०||
Adhikarana panasikAlakShaNam (11) · Śloka 11
কর্ণস্যাভ্যন্তরে জাতাং পিডকামুগ্রবেদনাম্ |
স্থিরাং পনসিকাং তাং তু বিদ্যাদ্বাতকফোত্থিতাম্ ||১১||
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कर्णस्याभ्यन्तरे जातां पिडकामुग्रवेदनाम् |
स्थिरां पनसिकां तां तु विद्याद्वातकफोत्थिताम् ||११||
Adhikarana jAlagardabhalakShaNam (12) · Śloka 12
বিসর্পবত্ সর্পতি যঃ শোথস্তনুরপাকবান্ |
দাহজ্বরকরঃ পিত্তাত্ স জ্ঞেযো জালগর্দভঃ ||১২||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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विसर्पवत् सर्पति यः शोथस्तनुरपाकवान् |
दाहज्वरकरः पित्तात् स ज्ञेयो जालगर्दभः ||१२||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana irivellikA-kakShAlakShaNam (13-14) · Śloka 14
পিডকামুত্তমাঙ্গস্থাং বৃত্তামুগ্ররুজাজ্বরাম্ |
সর্বাত্মিকাং সর্বলিঙ্গাং জানীযাদিরিবেল্লিকাম্ ||১৩||
বাহুপার্শ্বাংসকক্ষেষু কৃষ্ণস্ফোটাং সবেদনাম্ |
পিত্তপ্রকোপসম্ভূতাং কক্ষামিত্যভিনির্দিশেত্ ||১৪||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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पिडकामुत्तमाङ्गस्थां वृत्तामुग्ररुजाज्वराम् |
सर्वात्मिकां सर्वलिङ्गां जानीयादिरिवेल्लिकाम् ||१३||
बाहुपार्श्वांसकक्षेषु कृष्णस्फोटां सवेदनाम् |
पित्तप्रकोपसम्भूतां कक्षामित्यभिनिर्दिशेत् ||१४||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana gandhamAlAlakShaNam (15) · Śloka 15
একামেতাদৃশীং দৃষ্ট্বা পিডকাং স্ফোটসন্নিভাম্ |
ত্বগ্গতাং পিত্তকোপেন গন্ধমালাং প্রচক্ষতে ||১৫||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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एकामेतादृशीं दृष्ट्वा पिडकां स्फोटसन्निभाम् |
त्वग्गतां पित्तकोपेन गन्धमालां प्रचक्षते ||१५||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana agnirohiNIlakShaNam (16-17) · Śloka 17
কক্ষভাগেষু যে স্ফোটা জাযন্তে মাংসদারণাঃ |
অন্তর্দাহজ্বরকরা দীপ্তপাবকসন্নিভাঃ ||১৬||
সপ্তাহাদ্বা দশাহাদ্বা পক্ষাদ্বা হন্তি মানবম্ |
তামগ্নিরোহিণীং বিদ্যাদসাধ্যাং সর্বদোষজাম্ ||১৭||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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कक्षभागेषु ये स्फोटा जायन्ते मांसदारणाः |
अन्तर्दाहज्वरकरा दीप्तपावकसन्निभाः ||१६||
सप्ताहाद्वा दशाहाद्वा पक्षाद्वा हन्ति मानवम् |
तामग्निरोहिणीं विद्यादसाध्यां सर्वदोषजाम् ||१७||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana cippa-kunakhalakShaNam (18-19) · Śloka 19
নখমাংসমধিষ্ঠায বাযুঃ পিত্তঃ চ দেহিনাম্ |
কুর্বতে দাহপাকৌ চ তং ব্যাধিং চিপ্পমাদিশেত্ ||১৮||
তদেবাল্পতরৈর্দোষৈঃ পরুষং কুনখং বদেত্ ||১৯||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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नखमांसमधिष्ठाय वायुः पित्तः च देहिनाम् |
कुर्वते दाहपाकौ च तं व्याधिं चिप्पमादिशेत् ||१८||
तदेवाल्पतरैर्दोषैः परुषं कुनखं वदेत् ||१९||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana anushayIlakShaNam (20) · Śloka 20
গম্ভীরামল্পসংরম্ভাং সবর্ণামুপরিস্থিতাম্ |
পাদস্যানুশযীং তাং তু বিদ্যাদন্তঃপ্রপাকিনীম্ ||২০||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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गम्भीरामल्पसंरम्भां सवर्णामुपरिस्थिताम् |
पादस्यानुशयीं तां तु विद्यादन्तःप्रपाकिनीम् ||२०||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana vidArikAlakShaNam (21) · Śloka 21
বিদারীকন্দবদ্বৃত্তা কক্ষাবঙ্ক্ষণসন্ধিষু |
বিদারিকা ভবেদ্রক্তা সর্বজা সর্বলক্ষণা ||২১||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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विदारीकन्दवद्वृत्ता कक्षावङ्क्षणसन्धिषु |
विदारिका भवेद्रक्ता सर्वजा सर्वलक्षणा ||२१||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana sharkarArbudalakShaNam (22-24) · Śloka 24
প্রাপ্য মাংসসিরাস্নাযূঃ শ্লেষ্মা মেদস্তথাঽনিলঃ |
গ্রন্থিং করোত্যসৌ ভিন্নো মধুসর্পির্বসানিভম্ ||২২||
স্রবত্যাস্রাবমনিলস্তত্র বৃদ্ধিং গতঃ পুনঃ |
মাংসং সংশোষ্য গ্রথিতাং শর্করাং জনযেত্ততঃ ||২৩||
দুর্গন্ধি ক্লিন্নমত্যর্থং নানাবর্ণং ততঃ সিরাঃ |
স্রবন্তি রক্তং সহসা তং বিদ্যাচ্ছর্করার্বুদম্ ||২৪||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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प्राप्य मांससिरास्नायूः श्लेष्मा मेदस्तथाऽनिलः |
ग्रन्थिं करोत्यसौ भिन्नो मधुसर्पिर्वसानिभम् ||२२||
स्रवत्यास्रावमनिलस्तत्र वृद्धिं गतः पुनः |
मांसं संशोष्य ग्रथितां शर्करां जनयेत्ततः ||२३||
दुर्गन्धि क्लिन्नमत्यर्थं नानावर्णं ततः सिराः |
स्रवन्ति रक्तं सहसा तं विद्याच्छर्करार्बुदम् ||२४||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana pAdadArIlakShaNam (25) · Śloka 25
পরিক্রমণশীলস্য বাযুরত্যর্থরূক্ষযোঃ |
পাদযোঃ কুরুতে দারীং পাদদারীং তমাদিশেত্ ||২৫||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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परिक्रमणशीलस्य वायुरत्यर्थरूक्षयोः |
पादयोः कुरुते दारीं पाददारीं तमादिशेत् ||२५||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana kadaralakShaNam (26) · Śloka 26
শর্করোন্মথিতে পাদে ক্ষতে বা কণ্টকাদিভিঃ |
গ্রন্থিঃ কোলবদুত্সন্নো জাযতে কদরং হি তত্ ||২৬||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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शर्करोन्मथिते पादे क्षते वा कण्टकादिभिः |
ग्रन्थिः कोलवदुत्सन्नो जायते कदरं हि तत् ||२६||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana alasalakShaNam (27) · Śloka 27
ক্লিন্নাঙ্গুল্যন্তরৌ পাদৌ কণ্ডূদাহরুজান্বিতৌ |
দুষ্টকর্দমসংস্পর্শাদলসং তং বিভাবযেত্ ||২৭||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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क्लिन्नाङ्गुल्यन्तरौ पादौ कण्डूदाहरुजान्वितौ |
दुष्टकर्दमसंस्पर्शादलसं तं विभावयेत् ||२७||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana indraluptalakShaNam (28-29) · Śloka 29
রোমকূপানুগং পিত্তং বাতেন সহ মূর্ছিতম্ |
প্রচ্যাবযতি রোমাণি ততঃ শ্লেষ্মা সশোণিতঃ ||২৮||
রুণদ্ধি রোমকূপাংস্তু ততোঽন্যেষামসম্ভবঃ |
তদিন্দ্রলুপ্তং খালিত্যং রুহ্যেতি চ বিভাব্যতে ||২৯||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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रोमकूपानुगं पित्तं वातेन सह मूर्छितम् |
प्रच्यावयति रोमाणि ततः श्लेष्मा सशोणितः ||२८||
रुणद्धि रोमकूपांस्तु ततोऽन्येषामसम्भवः |
तदिन्द्रलुप्तं खालित्यं रुह्येति च विभाव्यते ||२९||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana dAruNakalakShaNam (30) · Śloka 30
দারুণা কণ্ডুরা রূক্ষা কেশভূমিঃ প্রপাট্যতে |
কফমারুতকোপেন বিদ্যাদ্দারুণকং তু তম্ ||৩০||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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दारुणा कण्डुरा रूक्षा केशभूमिः प्रपाट्यते |
कफमारुतकोपेन विद्याद्दारुणकं तु तम् ||३०||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana arUMShikAlakShaNam (31) · Śloka 31
অরূংষি বহুবক্ত্রাণি বহুক্লেদীনি মূর্ধ্নি তু |
কফাসৃক্ক্রিমিকোপেন নৃণাং বিদ্যাদরূংষিকাম্ ||৩১||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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अरूंषि बहुवक्त्राणि बहुक्लेदीनि मूर्ध्नि तु |
कफासृक्क्रिमिकोपेन नृणां विद्यादरूंषिकाम् ||३१||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana palitalakShaNam (32) · Śloka 32
ক্রোধশোকশ্রমকৃতঃ শরীরোষ্মা শিরোগতঃ |
পিত্তং চ কেশান্ পচতি পলিতং তেন জাযতে ||৩২||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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क्रोधशोकश्रमकृतः शरीरोष्मा शिरोगतः |
पित्तं च केशान् पचति पलितं तेन जायते ||३२||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana yuvAnapiDakAlakShaNam (33) · Śloka 34
শাল্মলীকণ্টকপ্রখ্যাঃ কফমারুতরক্তজাঃ |
যুবানপিডকা যূনাং বিজ্ঞেযা মুখদূষিকাঃ ||৩৩||
(সু. নি. অ. ১৩) |৩৪|
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शाल्मलीकण्टकप्रख्याः कफमारुतरक्तजाः |
युवानपिडका यूनां विज्ञेया मुखदूषिकाः ||३३||
(सु. नि. अ. १३) |३४|
Adhikarana padminIkaNTakalakShaNam (34) · Śloka 34
কণ্টকৈরাচিতং বৃত্তং মণ্ডলং পাণ্ডুকণ্ডুরম্ |
পদ্মিনীকণ্টকপ্রখ্যৈস্তদাখ্যং কফবাতজম্ ||৩৪||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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कण्टकैराचितं वृत्तं मण्डलं पाण्डुकण्डुरम् |
पद्मिनीकण्टकप्रख्यैस्तदाख्यं कफवातजम् ||३४||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana jatumaNilakShaNam (35) · Śloka 35
সমমুত্সন্নমরুজং মণ্ডলং কফরক্তজম্ |
সহজং লক্ষ্ম চৈকেষাং লক্ষ্যো জতুমণিস্তু সঃ ||৩৫||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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सममुत्सन्नमरुजं मण्डलं कफरक्तजम् |
सहजं लक्ष्म चैकेषां लक्ष्यो जतुमणिस्तु सः ||३५||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana maShakalakShaNam (36) · Śloka 36
অবেদনং স্থিরং চৈব যস্মিন্ গাত্রে প্রদৃশ্যতে |
মাষবত্কৃষ্ণমুত্সন্নমনিলান্মষকং তু তত্ ||৩৬||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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अवेदनं स्थिरं चैव यस्मिन् गात्रे प्रदृश्यते |
माषवत्कृष्णमुत्सन्नमनिलान्मषकं तु तत् ||३६||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana tilakAlakalakShaNam (37) · Śloka 37
কৃষ্ণানি তিলমাত্রাণি নীরুজানি সমানি চ |
বাতপিত্তকফোচ্ছোষাত্তান্ বিদ্যাত্তিলকালকান্ ||৩৭||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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कृष्णानि तिलमात्राणि नीरुजानि समानि च |
वातपित्तकफोच्छोषात्तान् विद्यात्तिलकालकान् ||३७||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana nyacchalakShaNam (38) · Śloka 38
মহদ্বা যদি বা চাল্পং শ্যাবং বা যদি বাঽসিতম্ |
নীরুজং মণ্ডলং গাত্রে ন্যচ্ছমিত্যভিধীযতে ||৩৮||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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महद्वा यदि वा चाल्पं श्यावं वा यदि वाऽसितम् |
नीरुजं मण्डलं गात्रे न्यच्छमित्यभिधीयते ||३८||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana vya~ggalakShaNam (39) · Śloka 39
ক্রোধাযাসপ্রকুপিতো বাযুঃ পিত্তেন সংযুতঃ |
মুখমাগত্য সহসা মণ্ডলং বিসৃজত্যতঃ ||৩৯||
নীরুজং তনুকং শ্যাবং মুখে ব্যঙ্গং তমাদিশেত্ |
(সু. নি. অ. ১৩) |
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क्रोधायासप्रकुपितो वायुः पित्तेन संयुतः |
मुखमागत्य सहसा मण्डलं विसृजत्यतः ||३९||
नीरुजं तनुकं श्यावं मुखे व्यङ्गं तमादिशेत् |
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana nIlikAlakShaNam (40) · Śloka 40
কৃষ্ণমেবঙ্গুণং গাত্রে মুখে বা নীলিকাং বিদুঃ ||৪০||
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कृष्णमेवङ्गुणं गात्रे मुखे वा नीलिकां विदुः ||४०||
Adhikarana parivartikAlakShaNam (41-43) · Śloka 43
মর্দনাত্ পীডনাদ্বাঽতি তথৈবাপ্যভিঘাততঃ |
মেঢ্রচর্ম যদা বাযুর্ভজতে সর্বতশ্চরন্ ||৪১||
তদা বাতোপসৃষ্টত্বাত্তচ্চর্ম পরিবর্ততে |
মণেরধস্তাত্ কোশশ্চ গ্রন্থিরূপেণ লম্বতে ||৪২||
সরুজাং বাতসম্ভূতাং তাং বিদ্যাত্ পরিবর্তিকাম্ |
সকণ্ডূঃ কঠিনা বাপি সৈব শ্লেষ্মসমুত্থিতা ||৪৩||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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मर्दनात् पीडनाद्वाऽति तथैवाप्यभिघाततः |
मेढ्रचर्म यदा वायुर्भजते सर्वतश्चरन् ||४१||
तदा वातोपसृष्टत्वात्तच्चर्म परिवर्तते |
मणेरधस्तात् कोशश्च ग्रन्थिरूपेण लम्बते ||४२||
सरुजां वातसम्भूतां तां विद्यात् परिवर्तिकाम् |
सकण्डूः कठिना वापि सैव श्लेष्मसमुत्थिता ||४३||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana avapATikAlakShaNam (44) · Śloka 44
অল্পীযঃখাং যদা হর্ষাদ্বলাদ্গচ্ছেত্ স্ত্রিযং নরঃ |
হস্তাভিঘাতাদপি বা চর্মণ্যুদ্বর্তিতে বলাত্ ||৪৪||
যস্যাবপাট্যতে চর্ম তাং বিদ্যাদবপাটিকাম্ |
(সু. নি. অ. ১৩) |
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अल्पीयःखां यदा हर्षाद्बलाद्गच्छेत् स्त्रियं नरः |
हस्ताभिघातादपि वा चर्मण्युद्वर्तिते बलात् ||४४||
यस्यावपाट्यते चर्म तां विद्यादवपाटिकाम् |
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana niruddhaprakashalakShaNam (45-47) · Śloka 47
বাতোপসৃষ্টে মেঢ্রে বৈ চর্ম সংশ্রযতে মণিম্ ||৪৫||
মণিশ্চর্মোপনদ্ধস্তু মূত্রস্রোতো রুণদ্ধি চ |
নিরুদ্ধপ্রকশে তস্মিন্ মন্দধারমবেদনম্ ||৪৬||
মূত্রং প্রবর্ততে জন্তোর্মণির্বিব্রিযতে ন চ |
নিরুদ্ধপ্রকশং বিদ্যাত্ সরুজং বাতসম্ভবম্ ||৪৭||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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वातोपसृष्टे मेढ्रे वै चर्म संश्रयते मणिम् ||४५||
मणिश्चर्मोपनद्धस्तु मूत्रस्रोतो रुणद्धि च |
निरुद्धप्रकशे तस्मिन् मन्दधारमवेदनम् ||४६||
मूत्रं प्रवर्तते जन्तोर्मणिर्विव्रियते न च |
निरुद्धप्रकशं विद्यात् सरुजं वातसम्भवम् ||४७||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana sanniruddhagudalakShaNam (48-49) · Śloka 49
বেগসন্ধারণাদ্বাযুর্বিহতো গুদসংশ্রিতঃ |
নিরুণদ্ধি মহাস্রোতঃ সূক্ষ্মদ্বারং করোতি চ ||৪৮||
মার্গস্য সৌক্ষ্ম্যাত্ কৃচ্ছ্রেণ পুরীষং তস্য গচ্ছতি |
সন্নিরুদ্ধগুদং ব্যাধিমেতং বিদ্যাত্ সুদারুণম্ ||৪৯||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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वेगसन्धारणाद्वायुर्विहतो गुदसंश्रितः |
निरुणद्धि महास्रोतः सूक्ष्मद्वारं करोति च ||४८||
मार्गस्य सौक्ष्म्यात् कृच्छ्रेण पुरीषं तस्य गच्छति |
सन्निरुद्धगुदं व्याधिमेतं विद्यात् सुदारुणम् ||४९||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana ahipUtanalakShaNam (50-51) · Śloka 51
শকৃন্মূত্রসমাযুক্তেঽধৌতেঽপানে শিশোর্ভবেত্ |
স্বিন্নে বাঽস্নাপ্যমানে বা কণ্ডূ রক্তকফোদ্ভবা ||৫০||
কণ্ডূযনাত্ততঃ ক্ষিপ্রং স্ফোটঃ স্রাবশ্চ জাযতে |
একীভূতং ব্রণৈর্ঘোরং তং বিদ্যাদহিপূতনম্ ||৫১||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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शकृन्मूत्रसमायुक्तेऽधौतेऽपाने शिशोर्भवेत् |
स्विन्ने वाऽस्नाप्यमाने वा कण्डू रक्तकफोद्भवा ||५०||
कण्डूयनात्ततः क्षिप्रं स्फोटः स्रावश्च जायते |
एकीभूतं व्रणैर्घोरं तं विद्यादहिपूतनम् ||५१||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana vRuShaNakacchUlakShaNam (52-53) · Śloka 53
স্নানোত্সাদনহীনস্য মলো বৃষণসংস্থিতঃ |
যদা প্রক্লিদ্যতে স্বেদাত্ কণ্ডূং জনযতে তদা ||৫২||
কণ্ডূযনাত্ততঃ ক্ষিপ্রং স্ফোটঃ স্রাবশ্চ জাযতে |
প্রাহুর্বৃষণকচ্ছূং তাং শ্লেষ্মরক্তপ্রকোপজাম্ ||৫৩||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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स्नानोत्सादनहीनस्य मलो वृषणसंस्थितः |
यदा प्रक्लिद्यते स्वेदात् कण्डूं जनयते तदा ||५२||
कण्डूयनात्ततः क्षिप्रं स्फोटः स्रावश्च जायते |
प्राहुर्वृषणकच्छूं तां श्लेष्मरक्तप्रकोपजाम् ||५३||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana gudabhraMshalakShaNam (54) · Śloka 54
প্রবাহণাতীসারাভ্যাং নির্গচ্ছতি গুদং বহিঃ |
রূক্ষদুর্বলদেহস্য গুদভ্রংশং তমাদিশেত্ ||৫৪||
(সু. নি. অ. ১৩) |
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प्रवाहणातीसाराभ्यां निर्गच्छति गुदं बहिः |
रूक्षदुर्बलदेहस्य गुदभ्रंशं तमादिशेत् ||५४||
(सु. नि. अ. १३) |
Adhikarana varAhadaMShTralakShaNam (55) · Śloka 55
সদাহো রক্তপর্যন্তস্ত্বক্পাকী তীব্রবেদনঃ |
কণ্ডূমাঞ্জ্বরকারী চ স স্যাচ্ছূকরদংষ্ট্রকঃ ||৫৫||
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सदाहो रक्तपर्यन्तस्त्वक्पाकी तीव्रवेदनः |
कण्डूमाञ्ज्वरकारी च स स्याच्छूकरदंष्ट्रकः ||५५||
Adhikarana puShpikA · Śloka 55
ইতি শ্রীমাধবকরবিরচিতে মাধবনিদানে ক্ষুদ্ররোগনিদানং সমাপ্তম্ ||৫৫||
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इति श्रीमाधवकरविरचिते माधवनिदाने क्षुद्ररोगनिदानं समाप्तम् ||५५||