Adhikarana shirorogabhedAH (1) · Śloka 1
অথ শিরোরোগনিদানম্|
শিরোরোগাস্তু জাযন্তে বাতপিত্তকফৈস্ত্রিভিঃ |
সন্নিপাতেন রক্তেন ক্ষযেণ ক্রিমিভিস্তথা |
সূর্যাবর্তানন্তবাতার্ধাবভেদকশঙ্খকৈঃ ||১||
(সু. উ. তং. অ. ২৫) |
View original
अथ शिरोरोगनिदानम्|
शिरोरोगास्तु जायन्ते वातपित्तकफैस्त्रिभिः |
सन्निपातेन रक्तेन क्षयेण क्रिमिभिस्तथा |
सूर्यावर्तानन्तवातार्धावभेदकशङ्खकैः ||१||
(सु. उ. तं. अ. २५) |
Adhikarana vAtajashirorogalakShaNam (2) · Śloka 2
যস্যানিমিত্তং শিরসো রুজশ্চ ভবন্তি তীব্রা নিশি চাতিমাত্রম্ |
বন্ধোপতাপৈঃ প্রশমশ্চ যত্র শিরোঽভিতাপঃ স সমীরণেন ||২||
(সু. উ. তং. অ. ২৫) |
View original
यस्यानिमित्तं शिरसो रुजश्च भवन्ति तीव्रा निशि चातिमात्रम् |
बन्धोपतापैः प्रशमश्च यत्र शिरोऽभितापः स समीरणेन ||२||
(सु. उ. तं. अ. २५) |
Adhikarana pittajashirorogalakShaNam (3) · Śloka 3
যস্যোষ্ণমঙ্গারচিতং যথৈব ভবেচ্ছিরো ধূপ্যতি চাক্ষিনাসম্ |
শীতেন রাত্রৌ চ ভবেচ্ছমশ্চ শিরোভিতাপঃ স তু পিত্তকোপাত্ ||৩||
(সু. উ. তং. অ. ২৫) |
View original
यस्योष्णमङ्गारचितं यथैव भवेच्छिरो धूप्यति चाक्षिनासम् |
शीतेन रात्रौ च भवेच्छमश्च शिरोभितापः स तु पित्तकोपात् ||३||
(सु. उ. तं. अ. २५) |
Adhikarana shleShmajashirorogalakShaNam (4) · Śloka 4
শিরো ভবেদ্যস্য কফোপদিগ্ধং গুরু প্রতিষ্টব্ধমতো হিমং চ |
শূনাক্ষিকূটং বদনং চ যস্য শিরোঽভিতাপঃ স কফপ্রকোপাত্ ||৪||
(সু. উ. তং. অ. ২৫) |
View original
शिरो भवेद्यस्य कफोपदिग्धं गुरु प्रतिष्टब्धमतो हिमं च |
शूनाक्षिकूटं वदनं च यस्य शिरोऽभितापः स कफप्रकोपात् ||४||
(सु. उ. तं. अ. २५) |
Adhikarana tridoShajashirorogalakShaNam (5) · Śloka 5
শিরোঽভিতাপে ত্রিতযপ্রবৃত্তে সর্বাণি লিঙ্গানি সমুদ্ভবন্তি |৫|
(সু. উ. তং. অ. ২৫) |
View original
शिरोऽभितापे त्रितयप्रवृत्ते सर्वाणि लिङ्गानि समुद्भवन्ति |५|
(सु. उ. तं. अ. २५) |
Adhikarana raktajashirorogalakShaNam (5) · Śloka 5
রক্তাত্মকঃ পিত্তসমানলিঙ্গঃ স্পর্শাসহত্বং শিরসো ভবেচ্চ ||৫||
(সু. উ. তং. অ. ২৫) |
View original
रक्तात्मकः पित्तसमानलिङ्गः स्पर्शासहत्वं शिरसो भवेच्च ||५||
(सु. उ. तं. अ. २५) |
Adhikarana kShayajashirorogalakShaNam (6) · Śloka 6
অসৃগ্বসাশ্লেষ্মসমীরণানাং শিরোগতানামিহ সঙ্ক্ষযেণ |
ক্ষযপ্রবৃত্তঃ শিরসোঽভিতাপঃ কষ্টো ভবেদুগ্ররুজোঽতিমাত্রম্ |
সংস্বেদনচ্ছর্দনধূমনস্যৈরসৃগ্বিমোক্ষৈশ্চ বিবৃদ্ধিমেতি ||৬||
(সু. উ. তং. অ. ২৫) |
View original
असृग्वसाश्लेष्मसमीरणानां शिरोगतानामिह सङ्क्षयेण |
क्षयप्रवृत्तः शिरसोऽभितापः कष्टो भवेदुग्ररुजोऽतिमात्रम् |
संस्वेदनच्छर्दनधूमनस्यैरसृग्विमोक्षैश्च विवृद्धिमेति ||६||
(सु. उ. तं. अ. २५) |
Adhikarana krimijashirorogalakShaNam (7) · Śloka 7
নিস্তুদ্যতে যস্য শিরোঽতিমাত্রং সম্ভক্ষ্যমাণং স্ফুরতীব চান্তঃ |
ঘ্রাণাচ্চ গচ্ছেত্ সলিলং সপূযং শিরোভিতাপঃ ক্রিমিভিঃ স ঘোরঃ ||৭||
(সু. উ. তং. অ. ২৫) |
View original
निस्तुद्यते यस्य शिरोऽतिमात्रं सम्भक्ष्यमाणं स्फुरतीव चान्तः |
घ्राणाच्च गच्छेत् सलिलं सपूयं शिरोभितापः क्रिमिभिः स घोरः ||७||
(सु. उ. तं. अ. २५) |
Adhikarana sUryAvartalakShaNam (8) · Śloka 8
সূর্যোদযং যা প্রতি মন্দমন্দমক্ষিভ্রুবং রুক্ সমুপৈতি গাঢা |
বিবর্ধতে চাংশুমতা সহৈব সূর্যাপবৃত্তৌ বিনিবর্ততে চ |
সর্বাত্মকং কষ্টতমং বিকারং সূর্যাপবর্তং তমুদাহরন্তি ||৮||
(সু. উ. তং. অ. ২৫) |
View original
सूर्योदयं या प्रति मन्दमन्दमक्षिभ्रुवं रुक् समुपैति गाढा |
विवर्धते चांशुमता सहैव सूर्यापवृत्तौ विनिवर्तते च |
सर्वात्मकं कष्टतमं विकारं सूर्यापवर्तं तमुदाहरन्ति ||८||
(सु. उ. तं. अ. २५) |
Adhikarana anantavAtalakShaNam (9-10) · Śloka 10
দোষাস্তু দুষ্টাস্ত্রয এব মন্যাং সম্পীড্য ঘাটাসু রুজাং সুতীব্রাম্ |
কুর্বন্তি যোঽক্ষিভ্রুবি শঙ্খদেশে স্থিতিং করোত্যাশু বিশেষতস্তু ||৯||
গণ্ডস্য পার্শ্বে তু করোতি কম্পং হনুগ্রহং লোচনজাংশ্চ রোগান্ |
অনন্তবাতং তমুদাহরন্তি দোষত্রযোত্থং শিরসো বিকারম্ ||১০||
(সু. উ. তং. অ. ২৫) |
View original
दोषास्तु दुष्टास्त्रय एव मन्यां सम्पीड्य घाटासु रुजां सुतीव्राम् |
कुर्वन्ति योऽक्षिभ्रुवि शङ्खदेशे स्थितिं करोत्याशु विशेषतस्तु ||९||
गण्डस्य पार्श्वे तु करोति कम्पं हनुग्रहं लोचनजांश्च रोगान् |
अनन्तवातं तमुदाहरन्ति दोषत्रयोत्थं शिरसो विकारम् ||१०||
(सु. उ. तं. अ. २५) |
Adhikarana ardhAvabhedalakShaNam (11-13) · Śloka 13
রূক্ষাশনাত্যধ্যশনপ্রাগ্বাতাবশ্যমৈথুনৈঃ |
বেগসন্ধারণাযাসব্যাযামৈঃ কুপিতোঽনিলঃ ||১১||
কেবলঃ সকফো বাঽর্ধং গৃহীত্বা শিরসো বলী |
মন্যাভ্রূশঙ্খকর্ণাক্ষিললাটার্ধেঽতিবেদনাম্ ||১২||
শস্ত্রারণিনিভাং কুর্যাত্তীব্রাং সোঽর্ধাবভেদকঃ |
নযনং বাঽথবা শ্রোত্রমতিবৃদ্ধো বিনাশযেত্ ||১৩||
View original
रूक्षाशनात्यध्यशनप्राग्वातावश्यमैथुनैः |
वेगसन्धारणायासव्यायामैः कुपितोऽनिलः ||११||
केवलः सकफो वाऽर्धं गृहीत्वा शिरसो बली |
मन्याभ्रूशङ्खकर्णाक्षिललाटार्धेऽतिवेदनाम् ||१२||
शस्त्रारणिनिभां कुर्यात्तीव्रां सोऽर्धावभेदकः |
नयनं वाऽथवा श्रोत्रमतिवृद्धो विनाशयेत् ||१३||
Adhikarana sha~gkhakasya samprAptipUrvakaM lakShaNam (14-15) · Śloka 15
রক্তপিত্তানিলা দুষ্টাঃ শঙ্খদেশে বিমূর্ছিতাঃ |
তীব্ররুগ্দাহরাগং হি শোথং কুর্বন্তি দারুণম্ ||১৪||
স শিরো বিষবদ্বেগী নিরুন্ধ্যাশু গলং তথা |
ত্রিরাত্রাজ্জীবিতং হন্তি শঙ্খকো নামতঃ পরম্ |
ত্র্যহাজ্জীবতি ভৈষজ্যং প্রত্যাখ্যায সমাচরেত্ ||১৫||
View original
रक्तपित्तानिला दुष्टाः शङ्खदेशे विमूर्छिताः |
तीव्ररुग्दाहरागं हि शोथं कुर्वन्ति दारुणम् ||१४||
स शिरो विषवद्वेगी निरुन्ध्याशु गलं तथा |
त्रिरात्राज्जीवितं हन्ति शङ्खको नामतः परम् |
त्र्यहाज्जीवति भैषज्यं प्रत्याख्याय समाचरेत् ||१५||
Adhikarana puShpikA · Śloka 60
ইতি শ্রীমাধবকরবিচিতে মাধবনিদানে শিরোরোগনিদানং সমাপ্তম্ ||৬০||
View original
इति श्रीमाधवकरविचिते माधवनिदाने शिरोरोगनिदानं समाप्तम् ||६०||