Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো দ্বিব্রণীযং চিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो द्विव्रणीयं चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো দ্বিব্রণীযং চিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो द्विव्रणीयं चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
দ্বৌ ব্রণৌ ভবতঃ- শারীর, আগন্তুশ্চ | তযোঃ শারীরঃ পবনপিত্তকফশোণিতসন্নিপাতনিমিত্তঃ; আগন্তুরপি পুরুষপশুপক্ষিব্যালসরীসৃপপ্রপতনপীডনপ্রহারাগ্নিক্ষারবিষতীক্ষ্ণৌষধশকলকপালশৃঙ্গ- চক্রেষুপরশুশক্তিকুন্তাদ্যাযুধাভিঘাতনিমিত্তঃ | তত্র তুল্যে ব্রণসামান্যে দ্বিকারণোত্থানপ্রযোজনসামর্থ্যাদ্ ‘দ্বিব্রণীয’ ইত্যুচ্যতে ||৩||
द्वौ व्रणौ भवतः- शारीर, आगन्तुश्च | तयोः शारीरः पवनपित्तकफशोणितसन्निपातनिमित्तः; आगन्तुरपि पुरुषपशुपक्षिव्यालसरीसृपप्रपतनपीडनप्रहाराग्निक्षारविषतीक्ष्णौषधशकलकपालशृङ्ग- चक्रेषुपरशुशक्तिकुन्ताद्यायुधाभिघातनिमित्तः | तत्र तुल्ये व्रणसामान्ये द्विकारणोत्थानप्रयोजनसामर्थ्याद् ‘द्विव्रणीय’ इत्युच्यते ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
সর্বস্মিন্নেবাগন্তুব্রণে তত্কালমেব ক্ষতোষ্মণঃ প্রসৃতস্যোপশমার্থং পিত্তবচ্ছীতক্রিযাবচারণবিধিবিশেষঃ সন্ধানার্থং চ মধুঘৃতপ্রযোগ ইত্যেতদ্দ্বিকারণোত্থানপ্রযোজনম্, উত্তরকালং তু দোষোপপ্লববিশেষাচ্ছারীরবত্ প্রতীকারঃ ||৪||
सर्वस्मिन्नेवागन्तुव्रणे तत्कालमेव क्षतोष्मणः प्रसृतस्योपशमार्थं पित्तवच्छीतक्रियावचारणविधिविशेषः सन्धानार्थं च मधुघृतप्रयोग इत्येतद्द्विकारणोत्थानप्रयोजनम्, उत्तरकालं तु दोषोपप्लवविशेषाच्छारीरवत् प्रतीकारः ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
দোষোপপ্লববিশেষঃ পুনঃ সমাসতঃ পঞ্চদশপ্রকারঃ, প্রসরণসামর্থ্যাত্, যথোক্তো ব্রণপ্রশ্নাধিকারে; শুদ্ধত্বাত্ ষোডশপ্রকার ইত্যেকে ||৫||
दोषोपप्लवविशेषः पुनः समासतः पञ्चदशप्रकारः, प्रसरणसामर्थ्यात्, यथोक्तो व्रणप्रश्नाधिकारे; शुद्धत्वात् षोडशप्रकार इत्येके ||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
তস্য লক্ষণং দ্বিবিধং- সামান্যং, বৈশেষিকং চ | তত্র সামান্যং রুক্ | ‘ব্রণ’ গাত্রবিচূর্ণনে, ব্রণযতীতি ব্রণঃ | বিশেষলক্ষণং পুনর্বাতাদিলিঙ্গবিশেষঃ ||৬||
तस्य लक्षणं द्विविधं- सामान्यं, वैशेषिकं च | तत्र सामान्यं रुक् | ‘व्रण’ गात्रविचूर्णने, व्रणयतीति व्रणः | विशेषलक्षणं पुनर्वातादिलिङ्गविशेषः ||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
তত্র শ্যাবারুণাভস্তনুঃ শীতঃ পিচ্ছিলোঽল্পস্রাবী রূক্ষশ্চটচটাযনশীলঃ স্ফুরণাযামতোদভেদবেদনাবহুলো নির্মাংসশ্চেতি বাতাত্, ক্ষিপ্রজঃ পীতনীলাভঃ কিংশুকোদকাভোষ্ণস্রাবী দাহপাকরাগবিকারকারী পীতপিডকাজুষ্টশ্চেতি পিত্তাত্, প্রততচণ্ডকণ্ডূবহুলঃ স্থূলৌষ্ঠঃ স্তব্ধসিরাস্নাযুজালাবততঃ কঠিনঃ পাণ্ড্ববভাসো মন্দবেদনঃ শুক্লশীতসান্দ্রপিচ্ছিলাস্রাবী গুরুশ্চেতি কফাত্, প্রবালদলনিচযপ্রকাশঃ কৃষ্ণস্ফোটপিডকাজালোপচিতস্তুরঙ্গস্থানগন্ধিঃ সবেদনো ধূমাযনশীলো রক্তস্রাবী পিত্তলিঙ্গশ্চেতি রক্তাত্, তোদদাহধূমাযনপ্রাযঃ পীতারুণাভস্তদ্বর্ণস্রাবী চেতি বাতপিত্তাভ্যাং, কণ্ডূযনশীলঃ সনিস্তোদো রূক্ষো গুরুর্দারুণো মুহুর্মুহুঃ শীতপিচ্ছিলাল্পস্রাবী চেতি বাতশ্লেষ্মভ্যাং, গুরুঃ সদাহ উষ্ণঃ পীতপাণ্ডুস্রাবী চেতি পিত্তশ্লেষ্মভ্যাং, রূক্ষস্তনুস্তোদবহুলঃ সুপ্ত ইব চ রক্তারুণাভস্তদ্বর্ণাস্রাবী চেতি বাতশোণিতাভ্যাং, ঘৃতমণ্ডাভো মীনধাবনতোযগন্ধির্মৃদুর্বিসর্প্যুষ্ণকৃষ্ণস্রাবী চেতি পিত্তশোণিতাভ্যাং, রক্তো গুরুঃ স্নিগ্ধঃ পিচ্ছিলঃ কণ্ডূপ্রাযঃ স্থিরো সরক্তপাণ্ডুস্রাবী চেতি শ্লেষ্মশোণিতাভ্যাং, স্ফুরণতোদদাহধূমাযনপ্রাযঃ পীততনুরক্তস্রাবী চেতি বাতপিত্তশোণিতেভ্যঃ, কণ্ডূস্ফুরণচুমচুমাযমানপ্রাযঃ পাণ্ডুঘনরক্তাস্রাবী চেতি বাতশ্লেষ্মশোণিতেভ্যঃ, দাহপাকরাগকণ্ডূপ্রাযঃ পাণ্ডুঘনরক্তাস্রাবী চেতি পিত্তশ্লেষ্মশোণিতেভ্যঃ, ত্রিবিধবর্ণবেদনাস্রাববিশেষোপেতঃ পবনপিত্তকফেভ্যঃ, নির্দহননির্মথনস্ফুরণতোদদাহপাকরাগকণ্ডূস্বাপবহুলো নানাবর্ণবেদনাস্রাববিশেষোপেতঃ পবনপিত্তকফশোণিতেভ্যঃ, জিহ্বাতলাভো মৃদুঃ স্নিগ্ধঃ শ্লক্ষ্ণো বিগতবেদনঃ সুব্যবস্থিতো নিরাস্রাবশ্চেতি শুদ্ধো ব্রণ ইতি ||৭||
तत्र श्यावारुणाभस्तनुः शीतः पिच्छिलोऽल्पस्रावी रूक्षश्चटचटायनशीलः स्फुरणायामतोदभेदवेदनाबहुलो निर्मांसश्चेति वातात्, क्षिप्रजः पीतनीलाभः किंशुकोदकाभोष्णस्रावी दाहपाकरागविकारकारी पीतपिडकाजुष्टश्चेति पित्तात्, प्रततचण्डकण्डूबहुलः स्थूलौष्ठः स्तब्धसिरास्नायुजालावततः कठिनः पाण्ड्ववभासो मन्दवेदनः शुक्लशीतसान्द्रपिच्छिलास्रावी गुरुश्चेति कफात्, प्रवालदलनिचयप्रकाशः कृष्णस्फोटपिडकाजालोपचितस्तुरङ्गस्थानगन्धिः सवेदनो धूमायनशीलो रक्तस्रावी पित्तलिङ्गश्चेति रक्तात्, तोददाहधूमायनप्रायः पीतारुणाभस्तद्वर्णस्रावी चेति वातपित्ताभ्यां, कण्डूयनशीलः सनिस्तोदो रूक्षो गुरुर्दारुणो मुहुर्मुहुः शीतपिच्छिलाल्पस्रावी चेति वातश्लेष्मभ्यां, गुरुः सदाह उष्णः पीतपाण्डुस्रावी चेति पित्तश्लेष्मभ्यां, रूक्षस्तनुस्तोदबहुलः सुप्त इव च रक्तारुणाभस्तद्वर्णास्रावी चेति वातशोणिताभ्यां, घृतमण्डाभो मीनधावनतोयगन्धिर्मृदुर्विसर्प्युष्णकृष्णस्रावी चेति पित्तशोणिताभ्यां, रक्तो गुरुः स्निग्धः पिच्छिलः कण्डूप्रायः स्थिरो सरक्तपाण्डुस्रावी चेति श्लेष्मशोणिताभ्यां, स्फुरणतोददाहधूमायनप्रायः पीततनुरक्तस्रावी चेति वातपित्तशोणितेभ्यः, कण्डूस्फुरणचुमचुमायमानप्रायः पाण्डुघनरक्तास्रावी चेति वातश्लेष्मशोणितेभ्यः, दाहपाकरागकण्डूप्रायः पाण्डुघनरक्तास्रावी चेति पित्तश्लेष्मशोणितेभ्यः, त्रिविधवर्णवेदनास्रावविशेषोपेतः पवनपित्तकफेभ्यः, निर्दहननिर्मथनस्फुरणतोददाहपाकरागकण्डूस्वापबहुलो नानावर्णवेदनास्रावविशेषोपेतः पवनपित्तकफशोणितेभ्यः, जिह्वातलाभो मृदुः स्निग्धः श्लक्ष्णो विगतवेदनः सुव्यवस्थितो निरास्रावश्चेति शुद्धो व्रण इति ||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
তস্য ব্রণস্য ষষ্টিরুপক্রমা ভবন্তি | তদ্যথা- অপতর্পণমালেপঃ পরিষেকোঽভ্যঙ্গঃ স্বেদো বিম্লাপনমুপনাহঃ পাচনং বিস্রাবণং স্নেহো বমনং বিরেচনং ছেদনং ভেদনং দারণং লেখনমেষণমাহরণং ব্যধনং বিস্রাবণং সীবনং সন্ধানং পীডনং শোণিতাস্থাপনং নির্বাপণমুত্কারিকা কষাযো বর্তিঃ কল্কঃ সর্পিস্তৈলং রসক্রিযাঽবচূর্ণনং ব্রণধূপনমুত্সাদনমবসাদনং মৃদুকর্ম দারুণকর্ম ক্ষারকর্মাগ্নিকর্ম কৃষ্ণকর্ম পাণ্ডুকর্ম প্রতিসারণং রোমসঞ্জননং লোমাপহরণং বস্তিকর্মোত্তরবস্তিকর্ম বন্ধঃ পত্রদানং কৃমিঘ্নং বৃংহণং বিষঘ্নং শিরোবিরেচনং নস্যং কবলধারণং ধূমো মধু সর্পির্যন্ত্রমাহারো রক্ষাবিধানমিতি ||৮||
तस्य व्रणस्य षष्टिरुपक्रमा भवन्ति | तद्यथा- अपतर्पणमालेपः परिषेकोऽभ्यङ्गः स्वेदो विम्लापनमुपनाहः पाचनं विस्रावणं स्नेहो वमनं विरेचनं छेदनं भेदनं दारणं लेखनमेषणमाहरणं व्यधनं विस्रावणं सीवनं सन्धानं पीडनं शोणितास्थापनं निर्वापणमुत्कारिका कषायो वर्तिः कल्कः सर्पिस्तैलं रसक्रियाऽवचूर्णनं व्रणधूपनमुत्सादनमवसादनं मृदुकर्म दारुणकर्म क्षारकर्माग्निकर्म कृष्णकर्म पाण्डुकर्म प्रतिसारणं रोमसञ्जननं लोमापहरणं बस्तिकर्मोत्तरबस्तिकर्म बन्धः पत्रदानं कृमिघ्नं बृंहणं विषघ्नं शिरोविरेचनं नस्यं कवलधारणं धूमो मधु सर्पिर्यन्त्रमाहारो रक्षाविधानमिति ||८||
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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9
তেষু কষাযো বর্তিঃ কল্কঃ সর্পিস্তৈলং রসক্রিযাঽবচূর্ণনমিতি শোধনরোপণানি, তেষ্বষ্টৌ শস্ত্রকৃত্যাঃ, শোণিতাস্থাপনং ক্ষারোঽগ্নির্যন্ত্রমাহারো রক্ষাবিধানং বন্ধবিধানং চোক্তানি, স্নেহস্বেদনবমনবিরেচনবস্ত্যুত্তরবস্তিশিরোবিরেচননস্যধূমকবলধারণান্যন্যত্র বক্ষ্যামঃ , যদন্যদবশিষ্টমুপক্রমজাতং তদিহ বক্ষ্যতে ||৯||
तेषु कषायो वर्तिः कल्कः सर्पिस्तैलं रसक्रियाऽवचूर्णनमिति शोधनरोपणानि, तेष्वष्टौ शस्त्रकृत्याः, शोणितास्थापनं क्षारोऽग्निर्यन्त्रमाहारो रक्षाविधानं बन्धविधानं चोक्तानि, स्नेहस्वेदनवमनविरेचनबस्त्युत्तरबस्तिशिरोविरेचननस्यधूमकवलधारणान्यन्यत्र वक्ष्यामः , यदन्यदवशिष्टमुपक्रमजातं तदिह वक्ष्यते ||९||
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Adhikarana 9 (10) · Śloka 10
ষড্বিধঃ প্রাগুপদিষ্টঃ শোফঃ, তস্যৈকাদশোপক্রমা ভবন্ত্যপতর্পণাদযো বিরেচনান্তাঃ; তে চ বিশেষেণ শোথপ্রতীকারে বর্তন্তে, ব্রণভাবমাপন্নস্য চ ন বিরুধ্যন্তে; শেষাস্তু প্রাযেণ ব্রণপ্রতীকারহেতব এব ||১০||
षड्विधः प्रागुपदिष्टः शोफः, तस्यैकादशोपक्रमा भवन्त्यपतर्पणादयो विरेचनान्ताः; ते च विशेषेण शोथप्रतीकारे वर्तन्ते, व्रणभावमापन्नस्य च न विरुध्यन्ते; शेषास्तु प्रायेण व्रणप्रतीकारहेतव एव ||१०||
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Adhikarana 10 (11) · Śloka 11
অপতর্পণমাদ্য উপক্রমঃ; এষ সর্বশোফানাং সামান্যঃ প্রধানতমশ্চ ||১১||
अपतर्पणमाद्य उपक्रमः; एष सर्वशोफानां सामान्यः प्रधानतमश्च ||११||
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Adhikarana 11 (12) · Śloka 12
ভবন্তি চাত্র - দোষোচ্ছ্রাযোপশান্ত্যর্থং দোষানদ্ধস্য দেহিনঃ | অবেক্ষ্য দোষং প্রাণং চ কার্যং স্যাদপতর্পণম্ ||১২||
भवन्ति चात्र - दोषोच्छ्रायोपशान्त्यर्थं दोषानद्धस्य देहिनः | अवेक्ष्य दोषं प्राणं च कार्यं स्यादपतर्पणम् ||१२||
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Adhikarana 12 (13) · Śloka 13
ঊর্ধ্বমারুততৃষ্ণাক্ষুন্মুখশোষশ্রমান্বিতৈঃ | ন কার্যং গর্ভিণীবৃদ্ধবালদুর্বলভীরুভিঃ ||১৩||
ऊर्ध्वमारुततृष्णाक्षुन्मुखशोषश्रमान्वितैः | न कार्यं गर्भिणीवृद्धबालदुर्बलभीरुभिः ||१३||
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Adhikarana 13 (14) · Śloka 14
শোফেষূত্থিতমাত্রেষু ব্রণেষূগ্ররুজেষু চ | যথাস্বৈরৌষধৈর্লেপং প্রত্যেকশ্যেন কারযেত্ ||১৪||
शोफेषूत्थितमात्रेषु व्रणेषूग्ररुजेषु च | यथास्वैरौषधैर्लेपं प्रत्येकश्येन कारयेत् ||१४||
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Adhikarana 14 (15-16) · Śloka 16
যথা প্রবজ্বলিতে বেশ্মন্যম্ভসা পরিষেচনম্ | ক্ষিপ্রং প্রশমযত্যগ্নিমেবমালেপনং রুজঃ ||১৫|| প্রহ্লাদনে শোধনে চ শোফস্য হরণে তথা | উত্সাদনে রোপণে চ লেপঃ স্যাত্তু তদর্থকৃত্ ||১৬||
यथा प्रवज्वलिते वेश्मन्यम्भसा परिषेचनम् | क्षिप्रं प्रशमयत्यग्निमेवमालेपनं रुजः ||१५|| प्रह्लादने शोधने च शोफस्य हरणे तथा | उत्सादने रोपणे च लेपः स्यात्तु तदर्थकृत् ||१६||
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Adhikarana 15 (17-18) · Śloka 18
বাতশোফে তু বেদনোপশমার্থং সর্পিস্তৈলধান্যাম্লমাংসরসবাতহরৌষধনিষ্ক্বাথৈরশীতৈঃ পরিষেকান্ কুর্বীত, পিত্তরক্তাভিঘাতবিষনিমিত্তেষু ক্ষীরঘৃতমধুশর্করোদকেক্ষুরসমধুরৌষধক্ষীরবৃক্ষনিষ্ক্বাথৈরনুষ্ণৈঃ পরিষেকান্ কুর্বীত, শ্লেষ্মশোফে তু তৈলমূত্রক্ষারোদকসুরাশুক্তকফঘ্নৌষধনিষ্ক্বাথৈরশীতৈঃ পরিষেকান্ কুর্বীত ||১৭|| যথাঽম্বুভিঃ সিচ্যমানঃ শান্তিমগ্নির্নিযচ্ছতি | দোষাগ্নিরেবং সহসা পরিষেকেণ শাম্যতি ||১৮||
वातशोफे तु वेदनोपशमार्थं सर्पिस्तैलधान्याम्लमांसरसवातहरौषधनिष्क्वाथैरशीतैः परिषेकान् कुर्वीत, पित्तरक्ताभिघातविषनिमित्तेषु क्षीरघृतमधुशर्करोदकेक्षुरसमधुरौषधक्षीरवृक्षनिष्क्वाथैरनुष्णैः परिषेकान् कुर्वीत, श्लेष्मशोफे तु तैलमूत्रक्षारोदकसुराशुक्तकफघ्नौषधनिष्क्वाथैरशीतैः परिषेकान् कुर्वीत ||१७|| यथाऽम्बुभिः सिच्यमानः शान्तिमग्निर्नियच्छति | दोषाग्निरेवं सहसा परिषेकेण शाम्यति ||१८||
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Adhikarana 16 (19-20) · Śloka 20
অভ্যঙ্গস্তু দোষমালোক্যোপযুক্তো দোষোপশমং মৃদুতাং চ করোতি ||১৯|| স্বেদবিম্লাপনাদীনাং ক্রিযাণাং প্রাক্ স উচ্যতে | পশ্চাত্ কর্মসু চাদিষ্টঃ স চ বিস্রাবণাদিষু ||২০||
अभ्यङ्गस्तु दोषमालोक्योपयुक्तो दोषोपशमं मृदुतां च करोति ||१९|| स्वेदविम्लापनादीनां क्रियाणां प्राक् स उच्यते | पश्चात् कर्मसु चादिष्टः स च विस्रावणादिषु ||२०||
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Adhikarana 17 (21) · Śloka 21
রুজাবতাং দারুণানাং কঠিনানাং তথৈব চ | শোফানাং স্বেদনং কার্যং যে চাপ্যেবংবিধা ব্রণাঃ ||২১||
रुजावतां दारुणानां कठिनानां तथैव च | शोफानां स्वेदनं कार्यं ये चाप्येवंविधा व्रणाः ||२१||
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Adhikarana 18 (22) · Śloka 23
স্থিরাণাং রুজতাং মন্দং কার্যং বিম্লাপনং ভবেত্ | অভ্যজ্য স্বেদযিত্বা তু বেণুনাড্যা ততঃ শনৈঃ ||২২|| বিমর্দযেদ্ভিষক্ প্রাজ্ঞস্তলেনাঙ্গুষ্ঠকেন বা |২৩|
स्थिराणां रुजतां मन्दं कार्यं विम्लापनं भवेत् | अभ्यज्य स्वेदयित्वा तु वेणुनाड्या ततः शनैः ||२२|| विमर्दयेद्भिषक् प्राज्ञस्तलेनाङ्गुष्ठकेन वा |२३|
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Adhikarana 19 (23) · Śloka 24
শোফযোরুপনাহং তু কুর্যাদামবিদগ্ধযোঃ ||২৩|| অবিদগ্ধঃ শমং যাতি বিদগ্ধঃ পাকমেতি চ |২৪|
शोफयोरुपनाहं तु कुर्यादामविदग्धयोः ||२३|| अविदग्धः शमं याति विदग्धः पाकमेति च |२४|
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Adhikarana 20 (24-26) · Śloka 27
নিবর্ততে ন যঃ শোফো বিরেকান্তৈরুপক্রমৈঃ ||২৪|| তস্য সম্পাচনং কুর্যাত্ সমাহৃত্যৌষধানি তু | দধিতক্রসুরাশুক্তধান্যাম্লৈর্যোজিতানি তু ||২৫|| স্নিগ্ধানি লবণীকৃত্য পচেদুত্কারিকাং শুভাম্ | সৈরণ্ডপত্রযা শোফং নাহযেদুষ্ণযা তযা ||২৬|| হিতং সম্ভোজনং চাপি পাকাযাভিমুখো যদি |২৭|
निवर्तते न यः शोफो विरेकान्तैरुपक्रमैः ||२४|| तस्य सम्पाचनं कुर्यात् समाहृत्यौषधानि तु | दधितक्रसुराशुक्तधान्याम्लैर्योजितानि तु ||२५|| स्निग्धानि लवणीकृत्य पचेदुत्कारिकां शुभाम् | सैरण्डपत्रया शोफं नाहयेदुष्णया तया ||२६|| हितं सम्भोजनं चापि पाकायाभिमुखो यदि |२७|
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Adhikarana 21 (27-29) · Śloka 30
বেদনোপশমার্থায তথা পাকশমায চ ||২৭|| অচিরোত্পতিতে শোফে কুর্যাচ্ছোণিতমোক্ষণম্ | সশোফে কঠিনে ধ্যামে সরক্তে বেদনাবতি ||২৮|| সংরব্ধে বিষমে চাপি ব্রণে বিস্রাবণং হিতম্ | সবিষে চ বিশেষেণ জলৌকোভিঃ পদৈস্তথা ||২৯|| বেদনাযাঃ প্রশান্ত্যর্থং পাকস্যাপ্রাপ্তযে তথা |৩০|
वेदनोपशमार्थाय तथा पाकशमाय च ||२७|| अचिरोत्पतिते शोफे कुर्याच्छोणितमोक्षणम् | सशोफे कठिने ध्यामे सरक्ते वेदनावति ||२८|| संरब्धे विषमे चापि व्रणे विस्रावणं हितम् | सविषे च विशेषेण जलौकोभिः पदैस्तथा ||२९|| वेदनायाः प्रशान्त्यर्थं पाकस्याप्राप्तये तथा |३०|
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Adhikarana 22 (30) · Śloka 31
সোপদ্রবাণাং রূক্ষাণাং কৃশানাং ব্রণশোষিণাম্ ||৩০|| যথাস্বমৌষধৈঃ সিদ্ধং স্নেহপানং বিধীযতে |৩১|
सोपद्रवाणां रूक्षाणां कृशानां व्रणशोषिणाम् ||३०|| यथास्वमौषधैः सिद्धं स्नेहपानं विधीयते |३१|
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Adhikarana 23 (31) · Śloka 32
উত্সন্নমাংসশোফে তু কফজুষ্টে বিশেষতঃ ||৩১|| সঙ্ক্লিষ্টশ্যা(ধ্যা)মরুধিরে ব্রণে প্রচ্ছর্দনং হিতম্ |৩২|
उत्सन्नमांसशोफे तु कफजुष्टे विशेषतः ||३१|| सङ्क्लिष्टश्या(ध्या)मरुधिरे व्रणे प्रच्छर्दनं हितम् |३२|
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Adhikarana 24 (32) · Śloka 33
বাতপিত্তপ্রদুষ্টেষু দীর্ঘকালানুবন্ধিষু ||৩২|| বিরেচনং প্রশংসন্তি ব্রণেষু ব্রণকোবিদাঃ |৩৩|
वातपित्तप्रदुष्टेषु दीर्घकालानुबन्धिषु ||३२|| विरेचनं प्रशंसन्ति व्रणेषु व्रणकोविदाः |३३|
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Adhikarana 25 (33) · Śloka 34
অপাকেষু তু রোগেষু কঠিনেষু স্থিরেষু চ ||৩৩|| স্নাযুকোথাদিষু তথা চ্ছেদনং প্রাপ্তমুচ্যতে |৩৪|
अपाकेषु तु रोगेषु कठिनेषु स्थिरेषु च ||३३|| स्नायुकोथादिषु तथा च्छेदनं प्राप्तमुच्यते |३४|
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Adhikarana 26 (34) · Śloka 35
অন্তঃপূযেষ্ববক্ত্রেষু তথৈবোত্সঙ্গবত্স্বপি ||৩৪|| গতিমত্সু চ রোগেষু ভেদনং প্রাপ্তমুচ্যতে |৩৫|
अन्तःपूयेष्ववक्त्रेषु तथैवोत्सङ्गवत्स्वपि ||३४|| गतिमत्सु च रोगेषु भेदनं प्राप्तमुच्यते |३५|
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Adhikarana 27 (35-37) · Śloka 37
বালবৃদ্ধাসহক্ষীণভীরূণাং যোষিতামপি ||৩৫|| মর্মোপরি চ জাতেষু রোগেষূক্তেষু দারণম্ | সুপক্বে পিণ্ডিতে শোফে পীডনৈরুপপীডিতে ||৩৬|| পাকোদ্বৃত্তেষু দোষেষু তত্তু কার্যং বিজানতা | সুপিষ্টৈর্দারণদ্রব্যৈর্যুক্তৈঃ ক্ষারেণ বা পুনঃ ||৩৭||
बालवृद्धासहक्षीणभीरूणां योषितामपि ||३५|| मर्मोपरि च जातेषु रोगेषूक्तेषु दारणम् | सुपक्वे पिण्डिते शोफे पीडनैरुपपीडिते ||३६|| पाकोद्वृत्तेषु दोषेषु तत्तु कार्यं विजानता | सुपिष्टैर्दारणद्रव्यैर्युक्तैः क्षारेण वा पुनः ||३७||
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Adhikarana 28 (38-39) · Śloka 39
কঠিনান্ স্থূলবৃত্তৌষ্ঠান্ দীর্যমাণান্ পুনঃ পুনঃ | কঠিনোত্সন্নমাংসাংশ্চ লেখনেনাচরেদ্ভিষক্ ||৩৮|| সমং লিখেত্ সুলিখিতং লিখেন্নিরবশেষতঃ | বর্ত্মনাং তু প্রমাণেন সমং শস্ত্রেণ নির্লিখেত্ ||৩৯||
कठिनान् स्थूलवृत्तौष्ठान् दीर्यमाणान् पुनः पुनः | कठिनोत्सन्नमांसांश्च लेखनेनाचरेद्भिषक् ||३८|| समं लिखेत् सुलिखितं लिखेन्निरवशेषतः | वर्त्मनां तु प्रमाणेन समं शस्त्रेण निर्लिखेत् ||३९||
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Adhikarana 29 (40) · Śloka 40
ক্ষৌমং প্লোতং পিচুং ফেনং যাবশূকং সসৈন্ধবম্ | কর্কশানি চ পত্রাণি লেখনার্থে প্রদাপযেত্ ||৪০||
क्षौमं प्लोतं पिचुं फेनं यावशूकं ससैन्धवम् | कर्कशानि च पत्राणि लेखनार्थे प्रदापयेत् ||४०||
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Adhikarana 30 (41-42) · Śloka 42
নাডীব্রণাঞ্ শল্যগর্ভানুন্মার্গ্যুত্সঙ্গিনঃ শনৈঃ | করীরবালাঙ্গুলিভিরেষণ্যা বৈষযেদ্ভিষক্ ||৪১|| নেত্রবর্ত্মগুদাভ্যাসনাড্যোঽবক্ত্রাঃ সশোণিতাঃ | চুচ্চূপোদকজৈঃ শ্লক্ষ্ণৈঃ করীরৈরেষযেত্তু তাঃ ||৪২||
नाडीव्रणाञ् शल्यगर्भानुन्मार्ग्युत्सङ्गिनः शनैः | करीरबालाङ्गुलिभिरेषण्या वैषयेद्भिषक् ||४१|| नेत्रवर्त्मगुदाभ्यासनाड्योऽवक्त्राः सशोणिताः | चुच्चूपोदकजैः श्लक्ष्णैः करीरैरेषयेत्तु ताः ||४२||
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Adhikarana 31 (43) · Śloka 43
সংবৃতাসংবৃতাস্যেষু ব্রণেষু মতিমান্ ভিষক্ | যথোক্তমাহরেচ্ছল্যং প্রাপ্তোদ্ধরণলক্ষণম্ ||৪৩||
संवृतासंवृतास्येषु व्रणेषु मतिमान् भिषक् | यथोक्तमाहरेच्छल्यं प्राप्तोद्धरणलक्षणम् ||४३||
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Adhikarana 32 (44) · Śloka 44
রোগে ব্যধনসাধ্যে তু যথোদ্দেশং প্রমাণতঃ | শস্ত্রং নিদধ্যাদ্দোষং চ স্রাবযেত্ কীর্তিতং যথা ||৪৪||
रोगे व्यधनसाध्ये तु यथोद्देशं प्रमाणतः | शस्त्रं निदध्याद्दोषं च स्रावयेत् कीर्तितं यथा ||४४||
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Adhikarana 33 (45) · Śloka 45
অপাকোপদ্রুতা যে চ মাংসস্থা বিবৃতাশ্চ যে | যথোক্তং সীবনং তেষু কার্যং সন্ধানমেব চ ||৪৫||
अपाकोपद्रुता ये च मांसस्था विवृताश्च ये | यथोक्तं सीवनं तेषु कार्यं सन्धानमेव च ||४५||
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Adhikarana 34 (46-47) · Śloka 47
পূযগর্ভানণুদ্বারান্ ব্রণান্মর্মগতানপি | যথোক্তৈঃ পীডনদ্রব্যৈঃ সমন্তাত্ পরিপীডযেত্ ||৪৬|| শুষ্যমাণমুপেক্ষেত প্রদেহং পীডনং প্রতি | ন চাভিমুখমালিম্পেত্তথা দোষঃ প্রসিচ্যতে ||৪৭||
पूयगर्भानणुद्वारान् व्रणान्मर्मगतानपि | यथोक्तैः पीडनद्रव्यैः समन्तात् परिपीडयेत् ||४६|| शुष्यमाणमुपेक्षेत प्रदेहं पीडनं प्रति | न चाभिमुखमालिम्पेत्तथा दोषः प्रसिच्यते ||४७||
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Adhikarana 35 (48) · Śloka 48
তৈস্তৈর্নিমিত্তৈর্বহুধা শোণিতে প্রস্রুতে ভৃশম্ | কার্যং যথোক্তং বৈদ্যেন শোণিতাস্থাপনং ভবেত্ ||৪৮||
तैस्तैर्निमित्तैर्बहुधा शोणिते प्रस्रुते भृशम् | कार्यं यथोक्तं वैद्येन शोणितास्थापनं भवेत् ||४८||
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Adhikarana 36 (49-50) · Śloka 50
দাহপাকজ্বরবতাং ব্রণানাং পিত্তকোপতঃ | রক্তেন চাভিভূতানাং কার্যং নির্বাপণং ভবেত্ ||৪৯|| যথোক্তৈঃ শীতলদ্রব্যৈঃ ক্ষীরপিষ্টৈর্ঘৃতাপ্লুতৈঃ | দিহ্যাদবহলান্ সেকান্ সুশীতাংশ্চাবচারযেত্ ||৫০||
दाहपाकज्वरवतां व्रणानां पित्तकोपतः | रक्तेन चाभिभूतानां कार्यं निर्वापणं भवेत् ||४९|| यथोक्तैः शीतलद्रव्यैः क्षीरपिष्टैर्घृताप्लुतैः | दिह्यादबहलान् सेकान् सुशीतांश्चावचारयेत् ||५०||
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Adhikarana 37 (51-52) · Śloka 53
ব্রণেষু ক্ষীণমাংসেষু তনুস্রাবিষ্বপাকিষু | তোদকাঠিন্যপারুষ্যশূলবেপথুমত্সু চ ||৫১|| বাতঘ্নবর্গেঽম্লগণে কাকোল্যাদিগণে তথা | স্নৈহিকেষু চ বীজেষু পচেদুত্কারিকাং শুভাম্ ||৫২|| তেষাং চ স্বেদনং কার্যং স্থিরাণাং বেদনাবতাম্ |৫৩|
व्रणेषु क्षीणमांसेषु तनुस्राविष्वपाकिषु | तोदकाठिन्यपारुष्यशूलवेपथुमत्सु च ||५१|| वातघ्नवर्गेऽम्लगणे काकोल्यादिगणे तथा | स्नैहिकेषु च बीजेषु पचेदुत्कारिकां शुभाम् ||५२|| तेषां च स्वेदनं कार्यं स्थिराणां वेदनावताम् |५३|
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Adhikarana 38 (53) · Śloka 54
দুর্গন্ধানাং ক্লেদবতাং পিচ্ছিলানাং বিশেষতঃ ||৫৩|| কষাযৈঃ শোধনং কার্যং শোধনৈঃ প্রাগুদীরিতৈঃ |৫৪|
दुर्गन्धानां क्लेदवतां पिच्छिलानां विशेषतः ||५३|| कषायैः शोधनं कार्यं शोधनैः प्रागुदीरितैः |५४|
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Adhikarana 39 (54-55) · Śloka 56
অন্তঃশল্যানণুমুখান্ গম্ভীরান্ মাংসসংশ্রিতান্ শোধনদ্রব্যযুক্তাভির্বর্তিভিস্তান্ যথাক্রমম্ ||৫৪|| পূতিমাংসপ্রতিচ্ছন্নান্ মহাদোষাংশ্চ শোধযেত্ ||৫৫|| কল্কীকৃতৈর্যথালাভং বর্তিদ্রব্যৈঃ পুরোদিতৈঃ |৫৬|
अन्तःशल्यानणुमुखान् गम्भीरान् मांससंश्रितान् शोधनद्रव्ययुक्ताभिर्वर्तिभिस्तान् यथाक्रमम् ||५४|| पूतिमांसप्रतिच्छन्नान् महादोषांश्च शोधयेत् ||५५|| कल्कीकृतैर्यथालाभं वर्तिद्रव्यैः पुरोदितैः |५६|
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Adhikarana 40 (56) · Śloka 57
পিত্তপ্রদুষ্টান্ গম্ভীরান্ দাহপাকপ্রপীডিতান্ ||৫৬|| কার্পাসীফলমিশ্রেণ জযেচ্ছোধনসর্পিষা |৫৭|
पित्तप्रदुष्टान् गम्भीरान् दाहपाकप्रपीडितान् ||५६|| कार्पासीफलमिश्रेण जयेच्छोधनसर्पिषा |५७|
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Adhikarana 41 (57) · Śloka 58
উত্সন্নমাংসানস্নিগ্ধানল্পস্রাবান্ ব্রণাংস্তথা ||৫৭|| সর্ষপস্নেহযুক্তেন ধীমাংস্তৈলেন শোধযেত্ |৫৮|
उत्सन्नमांसानस्निग्धानल्पस्रावान् व्रणांस्तथा ||५७|| सर्षपस्नेहयुक्तेन धीमांस्तैलेन शोधयेत् |५८|
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Adhikarana 42 (58-61) · Śloka 61
তৈলেনাশুধ্যমানানাং শোধনীযাং রসক্রিযাম্ ||৫৮|| ব্রণানাং স্থিরমাংসানাং কুর্যাদ্দ্রব্যৈরুদীরিতৈঃ | কষাযে বিধিবত্তেষাং কৃতে চাধিশ্রযেত্ পুনঃ ||৫৯|| সুরাষ্ট্রজাং সকাসীসাং দদ্যাচ্চাপি মনঃশিলাম্ | হরিতালং চ মতিমাংস্ততস্তামবচারযেত্ ||৬০|| মাতুলুঙ্গরসোপেতাং সক্ষৌদ্রামতিমর্দিতাম্ | ব্রণেষু দত্ত্বা তাং তিষ্ঠেত্ত্রীংস্ত্রীংশ্চ দিবসান্ পরম্ ||৬১||
तैलेनाशुध्यमानानां शोधनीयां रसक्रियाम् ||५८|| व्रणानां स्थिरमांसानां कुर्याद्द्रव्यैरुदीरितैः | कषाये विधिवत्तेषां कृते चाधिश्रयेत् पुनः ||५९|| सुराष्ट्रजां सकासीसां दद्याच्चापि मनःशिलाम् | हरितालं च मतिमांस्ततस्तामवचारयेत् ||६०|| मातुलुङ्गरसोपेतां सक्षौद्रामतिमर्दिताम् | व्रणेषु दत्त्वा तां तिष्ठेत्त्रींस्त्रींश्च दिवसान् परम् ||६१||
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Adhikarana 43 (62) · Śloka 62
মেদোজুষ্টানগম্ভীরান্ দুর্গন্ধাংশ্চূর্ণশোধনৈঃ | উপাচরেত্ ভিষক্ প্রাজ্ঞঃ শ্লক্ষ্ণৈঃ শোধনবর্তিজৈঃ ||৬২||
मेदोजुष्टानगम्भीरान् दुर्गन्धांश्चूर्णशोधनैः | उपाचरेत् भिषक् प्राज्ञः श्लक्ष्णैः शोधनवर्तिजैः ||६२||
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Adhikarana 44 (63) · Śloka 63
শুদ্ধলক্ষণযুক্তানাং কষাযং রোপণং হিতম্ | তত্র কার্যং যথোদ্দিষ্টৈর্দ্রব্যৈর্বৈদ্যেন জানতা ||৬৩||
शुद्धलक्षणयुक्तानां कषायं रोपणं हितम् | तत्र कार्यं यथोद्दिष्टैर्द्रव्यैर्वैद्येन जानता ||६३||
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Adhikarana 45 (64) · Śloka 64
অবেদনানাং শুদ্ধানাং গম্ভীরাণাং তথৈব চ | হিতা রোপণবর্ত্যঙ্গকৃতা রোপণবর্তযঃ ||৬৪||
अवेदनानां शुद्धानां गम्भीराणां तथैव च | हिता रोपणवर्त्यङ्गकृता रोपणवर्तयः ||६४||
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Adhikarana 46 (65-69) · Śloka 70
অপেতপূতিমাংসানাং মাংসস্থানামরোহতাম্ | কল্কঃ সংরোহণঃ কার্যস্তিলজো মধুসংযুতঃ ||৬৫|| স মাধুর্যাত্তথৌষ্ণ্যাচ্চ স্নেহাচ্চানিলনাশনঃ | কষাযভাবান্মাধুর্যাত্তিক্তত্বাচ্চাপি পিত্তহৃত্ ||৬৬|| ঔষ্ণ্যাত্ কষাযভাবাচ্চ তিক্তত্বাচ্চ কফে হিতঃ | শোধযেদ্রোপযেচ্চাপি যুক্তঃ শোধনরোপণৈঃ ||৬৭|| নিম্বপত্রমধুভ্যাং তু যুক্তঃ সংশোধনঃ স্মৃতঃ | পূর্বাভ্যাং সর্পিষা চাপি যুক্তশ্চাপ্যুপরোপণঃ ||৬৮|| তিলবদ্যবকল্কং তু কেচিদাহুর্মনীষিণঃ | শমযেদবিদগ্ধং চ বিদগ্ধমপি পাচযেত্ ||৬৯|| পক্বং ভিনত্তি ভিন্নং চ শোধযেদ্রোপযেত্তথা |৭০|
अपेतपूतिमांसानां मांसस्थानामरोहताम् | कल्कः संरोहणः कार्यस्तिलजो मधुसंयुतः ||६५|| स माधुर्यात्तथौष्ण्याच्च स्नेहाच्चानिलनाशनः | कषायभावान्माधुर्यात्तिक्तत्वाच्चापि पित्तहृत् ||६६|| औष्ण्यात् कषायभावाच्च तिक्तत्वाच्च कफे हितः | शोधयेद्रोपयेच्चापि युक्तः शोधनरोपणैः ||६७|| निम्बपत्रमधुभ्यां तु युक्तः संशोधनः स्मृतः | पूर्वाभ्यां सर्पिषा चापि युक्तश्चाप्युपरोपणः ||६८|| तिलवद्यवकल्कं तु केचिदाहुर्मनीषिणः | शमयेदविदग्धं च विदग्धमपि पाचयेत् ||६९|| पक्वं भिनत्ति भिन्नं च शोधयेद्रोपयेत्तथा |७०|
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Adhikarana 47 (70) · Śloka 71
পিত্তরক্তবিষাগন্তূন্ গম্ভীরানপি চ ব্রণান্ ||৭০|| রোপযেদ্রোপণীযেন ক্ষীরসিদ্ধেন সর্পিষা |৭১|
पित्तरक्तविषागन्तून् गम्भीरानपि च व्रणान् ||७०|| रोपयेद्रोपणीयेन क्षीरसिद्धेन सर्पिषा |७१|
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Adhikarana 48 (71) · Śloka 72
কফবাতাভিভূতানাং ব্রণানাং মতিমান্ ভিষক্ ||৭১|| কারযেদ্রোপণং তৈলং ভেষজৈস্তদ্যথোদিতৈঃ |৭২|
कफवाताभिभूतानां व्रणानां मतिमान् भिषक् ||७१|| कारयेद्रोपणं तैलं भेषजैस्तद्यथोदितैः |७२|
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Adhikarana 49 (72) · Śloka 73
অবন্ধ্যানাং চলস্থানাং শুদ্ধানাং চ প্রদুষ্যতাম্ ||৭২|| দ্বিহরিদ্রাযুতাং কুর্যাদ্রোপণার্থাং রসক্রিযাম্ |৭৩|
अबन्ध्यानां चलस्थानां शुद्धानां च प्रदुष्यताम् ||७२|| द्विहरिद्रायुतां कुर्याद्रोपणार्थां रसक्रियाम् |७३|
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Adhikarana 50 (73) · Śloka 74
সমানাং স্থিরমাংসানাং ত্বক্স্থানাং রোপণং ভিষক্ ||৭৩|| চূর্ণং বিদধ্যান্মতিমান্ প্রাক্স্থানোক্তো বিধির্যথা |৭৪|
समानां स्थिरमांसानां त्वक्स्थानां रोपणं भिषक् ||७३|| चूर्णं विदध्यान्मतिमान् प्राक्स्थानोक्तो विधिर्यथा |७४|
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Adhikarana 51 (74) · Śloka 75
শোধনো রোপণশ্চৈব বিধির্যোঽযং প্রকীর্তিতঃ ||৭৪|| সর্বব্রণানাং সামান্যেনোক্তো দোষাবিশেষতঃ |৭৫|
शोधनो रोपणश्चैव विधिर्योऽयं प्रकीर्तितः ||७४|| सर्वव्रणानां सामान्येनोक्तो दोषाविशेषतः |७५|
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Adhikarana 52 (75) · Śloka 76
এষ আগমসিদ্ধত্বাত্তথৈব ফলদর্শনাত্ ||৭৫|| মন্ত্রবত্ সম্প্রযোক্তব্যো ন মীমাংস্যঃ কথঞ্চন |৭৬|
एष आगमसिद्धत्वात्तथैव फलदर्शनात् ||७५|| मन्त्रवत् सम्प्रयोक्तव्यो न मीमांस्यः कथञ्चन |७६|
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Adhikarana 53 (76) · Śloka 77
স্ববুদ্ধ্যা চাপি বিভজেত্ কষাযাদিষু সপ্তসু ||৭৬|| ভেষজানি যথাযোগং যান্যুক্তানি পুরা মযা |৭৭|
स्वबुद्ध्या चापि विभजेत् कषायादिषु सप्तसु ||७६|| भेषजानि यथायोगं यान्युक्तानि पुरा मया |७७|
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Adhikarana 54 (77-79) · Śloka 80
আদ্যে দ্বে পঞ্চমূল্যৌ তু গণো যশ্চানিলাপহঃ ||৭৭|| স বাতদুষ্টে দাতব্যঃ কষাযাদিষু সপ্তসু | ন্যগ্রোধাদির্গণো যস্তু কাকোল্যাদিশ্চ যঃ স্মৃতঃ ||৭৮|| তৌ পিত্তদুষ্টে দাতব্যৌ কষাযাদিষু সপ্তসু | আরগ্বধাদিস্তু গণো যশ্চোষ্ণঃ পরিকীর্তিতঃ ||৭৯|| তৌ দেযৌ কফদুষ্টে তু, সংসৃষ্টে সংযুতা গণাঃ |৮০|
आद्ये द्वे पञ्चमूल्यौ तु गणो यश्चानिलापहः ||७७|| स वातदुष्टे दातव्यः कषायादिषु सप्तसु | न्यग्रोधादिर्गणो यस्तु काकोल्यादिश्च यः स्मृतः ||७८|| तौ पित्तदुष्टे दातव्यौ कषायादिषु सप्तसु | आरग्वधादिस्तु गणो यश्चोष्णः परिकीर्तितः ||७९|| तौ देयौ कफदुष्टे तु, संसृष्टे संयुता गणाः |८०|
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Adhikarana 55 (80) · Śloka 81
বাতাত্মকানুগ্ররুজান্ সাস্রাবানপি চ ব্রণান্ ||৮০|| সক্ষৌমযবসর্পির্ভির্ধূপনাঙ্গৈশ্চ ধূপযেত্ |৮১|
वातात्मकानुग्ररुजान् सास्रावानपि च व्रणान् ||८०|| सक्षौमयवसर्पिर्भिर्धूपनाङ्गैश्च धूपयेत् |८१|
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Adhikarana 56 (81-82) · Śloka 83
পরিশুষ্কাল্পমাংসানাং গম্ভীরাণাং তথৈব চ ||৮১|| কুর্যাদুত্সাদনীযানি সর্পীংষ্যালেপনানি চ | মাংসাশিনাং চ মাংসানি ভক্ষযেদ্বিধিবন্নরঃ ||৮২|| বিশুদ্ধমনসস্তস্য মাংসং মাংসেন বর্ধতে |৮৩|
परिशुष्काल्पमांसानां गम्भीराणां तथैव च ||८१|| कुर्यादुत्सादनीयानि सर्पींष्यालेपनानि च | मांसाशिनां च मांसानि भक्षयेद्विधिवन्नरः ||८२|| विशुद्धमनसस्तस्य मांसं मांसेन वर्धते |८३|
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Adhikarana 57 (83) · Śloka 84
উত্সন্নমৃদুমাংসানাং ব্রণানামবসাদনম্ ||৮৩|| কুর্যাদ্দ্রব্যৈর্যথোদ্দিষ্টৈশ্চূর্ণিতৈর্মধুনা সহ |৮৪|
उत्सन्नमृदुमांसानां व्रणानामवसादनम् ||८३|| कुर्याद्द्रव्यैर्यथोद्दिष्टैश्चूर्णितैर्मधुना सह |८४|
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Adhikarana 58 (84-85) · Śloka 86
কঠিনানামমাংসানাং দুষ্টানাং মাতরিশ্বনা ||৮৪|| মৃদ্বী ক্রিযা বিধাতব্যা শোণিতং চাপি মোক্ষযেত্ | বাতঘ্নৌষধসংযুক্তান্ স্নেহান্ সেকাংশ্চ কারযেত্ ||৮৫|| মৃদুত্বমাশুরোহং চ গাঢো বন্ধঃ করোতি হি |৮৬|
कठिनानाममांसानां दुष्टानां मातरिश्वना ||८४|| मृद्वी क्रिया विधातव्या शोणितं चापि मोक्षयेत् | वातघ्नौषधसंयुक्तान् स्नेहान् सेकांश्च कारयेत् ||८५|| मृदुत्वमाशुरोहं च गाढो बन्धः करोति हि |८६|
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Adhikarana 59 (86-87) · Śloka 87
ব্রণেষু মৃদুমাংসেষু দারুণীকরণং হিতম্ | ধবপ্রিযঙ্গ্বশোকানাং রোহিণ্যাশ্চ ত্বচস্তথা ||৮৬|| ত্রিফলাধাতকীপুষ্পরোধ্রসর্জরসান্ সমান্ | কৃত্বা সূক্ষ্মাণি চূর্ণানি ব্রণং তৈরবচূর্ণযেত্ ||৮৭||
व्रणेषु मृदुमांसेषु दारुणीकरणं हितम् | धवप्रियङ्ग्वशोकानां रोहिण्याश्च त्वचस्तथा ||८६|| त्रिफलाधातकीपुष्परोध्रसर्जरसान् समान् | कृत्वा सूक्ष्माणि चूर्णानि व्रणं तैरवचूर्णयेत् ||८७||
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Adhikarana 60 (88) · Śloka 88
উত্সন্নমাংসান্ কঠিনান্ কণ্ডূযুক্তাংশ্চিরোত্থিতান্ | তথৈব খলু দুঃশোধ্যাঞ্ শোধযেত্ ক্ষারকর্মণা ||৮৮||
उत्सन्नमांसान् कठिनान् कण्डूयुक्तांश्चिरोत्थितान् | तथैव खलु दुःशोध्याञ् शोधयेत् क्षारकर्मणा ||८८||
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Adhikarana 61 (89) · Śloka 89
স্রবতোঽশ্মভবান্মূত্রং যে চান্যে রক্তবাহিনঃ | নিঃশেষচ্ছিন্নসন্ধীংশ্চ সাধযেদগ্নিকর্মণা ||৮৯||
स्रवतोऽश्मभवान्मूत्रं ये चान्ये रक्तवाहिनः | निःशेषच्छिन्नसन्धींश्च साधयेदग्निकर्मणा ||८९||
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Adhikarana 62 (89-93) · Śloka 94
দুরূঢত্বাত্তু শুক্লানাং কৃষ্ণকর্ম হিতং ভবেত্ | ভল্লাতকান্ বাসযেত্তু ক্ষীরে প্রাঙ্মূত্রভাবিতান্ | ততো দ্বিধাচ্ছেদযিত্বা লৌহে কুম্ভে নিধাপযেত্ ||৯০|| কুম্ভেঽন্যস্মিন্ নিখাতে তু তং কুম্ভমথ যোজযেত্ | মুখং মুখেন সন্ধায গোমযৈর্দাহযেত্ততঃ ||৯১|| যঃ স্নেহশ্চ্যবতে তস্মাদ্গ্রাহযেত্তং শনৈর্ভিষক্ | গ্রাম্যানূপশফান্ দগ্ধ্বা সূক্ষ্মচূর্ণানি কারযেত্ ||৯২|| তৈলেনানেন সংসৃষ্টং শুক্লমালেপযেদ্ব্রণম্ | ভল্লাতকবিধানেন সারস্নেহাংস্তু কারযেত্ ||৯৩|| যে চ কেচিত্ ফলস্নেহা বিধানং তেষু পূর্ববত্ |৯৪|
दुरूढत्वात्तु शुक्लानां कृष्णकर्म हितं भवेत् | भल्लातकान् वासयेत्तु क्षीरे प्राङ्मूत्रभावितान् | ततो द्विधाच्छेदयित्वा लौहे कुम्भे निधापयेत् ||९०|| कुम्भेऽन्यस्मिन् निखाते तु तं कुम्भमथ योजयेत् | मुखं मुखेन सन्धाय गोमयैर्दाहयेत्ततः ||९१|| यः स्नेहश्च्यवते तस्माद्ग्राहयेत्तं शनैर्भिषक् | ग्राम्यानूपशफान् दग्ध्वा सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् ||९२|| तैलेनानेन संसृष्टं शुक्लमालेपयेद्व्रणम् | भल्लातकविधानेन सारस्नेहांस्तु कारयेत् ||९३|| ये च केचित् फलस्नेहा विधानं तेषु पूर्ववत् |९४|
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Adhikarana 63 (94-98) · Śloka 99
দুরূঢত্বাত্তু কৃষ্ণানাং পাণ্ডুকর্ম হিতং ভবেত্ ||৯৪|| সপ্তরাত্রং স্থিতং ক্ষীরে ছাগলে রোহিণীফলম্ | তেনৈব পিষ্টং সুশ্লক্ষ্ণং সবর্ণকরণং হিতম্ ||৯৫|| নবং কপালিকাচূর্ণং বৈদুলং সর্জনাম চ | কাসীসং মধুকং চৈব ক্ষৌদ্রযুক্তং প্রলেপযেত্ ||৯৬|| কপিত্থমুদ্ধৃতে মাংসে মূত্রেণাজেন পূরযেত্ | কাসীসং রোচনাং তুত্থং হরিতালং মনঃশিলাম্ ||৯৭|| বেণুনির্লেখনং চাপি প্রপুন্নাডরসাঞ্জনম্ | অধস্তাদর্জুনস্যৈতন্মাসং ভূমৌ নিধাপযেত্ ||৯৮|| মাসাদূর্ধ্বং ততস্তেন কৃষ্ণমালেপযেদ্ব্রণম্ |৯৯|
दुरूढत्वात्तु कृष्णानां पाण्डुकर्म हितं भवेत् ||९४|| सप्तरात्रं स्थितं क्षीरे छागले रोहिणीफलम् | तेनैव पिष्टं सुश्लक्ष्णं सवर्णकरणं हितम् ||९५|| नवं कपालिकाचूर्णं वैदुलं सर्जनाम च | कासीसं मधुकं चैव क्षौद्रयुक्तं प्रलेपयेत् ||९६|| कपित्थमुद्धृते मांसे मूत्रेणाजेन पूरयेत् | कासीसं रोचनां तुत्थं हरितालं मनःशिलाम् ||९७|| वेणुनिर्लेखनं चापि प्रपुन्नाडरसाञ्जनम् | अधस्तादर्जुनस्यैतन्मासं भूमौ निधापयेत् ||९८|| मासादूर्ध्वं ततस्तेन कृष्णमालेपयेद्व्रणम् |९९|
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Adhikarana 64 (99-100) · Śloka 100
কুক্কুটাণ্ডকপালানি কতকং মধুকং সমম্ ||৯৯|| তথা সমুদ্রমণ্ডূকী মণিচূর্ণং চ দাপযেত্ | গুটিকা মূত্রপিষ্টাস্তা ব্রণানাং প্রতিসারণম্ ||১০০||
कुक्कुटाण्डकपालानि कतकं मधुकं समम् ||९९|| तथा समुद्रमण्डूकी मणिचूर्णं च दापयेत् | गुटिका मूत्रपिष्टास्ता व्रणानां प्रतिसारणम् ||१००||
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Adhikarana 65 (101-103) · Śloka 103
হস্তিদন্তমসীং কৃত্বা মুখ্যং চৈব রসাঞ্জনম্ | রোমাণ্যেতেন জাযন্তে লেপাত্পাণিতলেষ্বপি ||১০১|| চতুষ্পদানাং ত্বগ্রোমখুরশৃঙ্গাস্থিভস্মনা | তৈলাক্তা চূর্ণিতা ভূমির্ভবেদ্রোমবতী পুনঃ ||১০২|| কাসীসং নক্তমালস্য পল্লবাংশ্চৈব সংহরেত্ | কপিত্থরসপিষ্টানি রোমসঞ্জননং পরম্ ||১০৩||
हस्तिदन्तमसीं कृत्वा मुख्यं चैव रसाञ्जनम् | रोमाण्येतेन जायन्ते लेपात्पाणितलेष्वपि ||१०१|| चतुष्पदानां त्वग्रोमखुरशृङ्गास्थिभस्मना | तैलाक्ता चूर्णिता भूमिर्भवेद्रोमवती पुनः ||१०२|| कासीसं नक्तमालस्य पल्लवांश्चैव संहरेत् | कपित्थरसपिष्टानि रोमसञ्जननं परम् ||१०३||
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Adhikarana 66 (104-108) · Śloka 108
রোমাকীর্ণো ব্রণো যস্তু ন সম্যগুপরোহতি | ক্ষুরকর্তরিসন্দংশৈস্তস্য রোমাণি নির্হরেত্ ||১০৪|| (শঙ্খচূর্ণস্য ভাগৌ দ্বৌ হরিতালং চ ভাগিকম্ | শুক্তেন সহ পিষ্টানি লোমশাতনমুত্তমম্) ||১০৫|| তৈলং ভল্লাতকস্যাথ স্নুহীক্ষীরং তথৈব চ | প্রগৃহ্যৈকত্র মতিমান্ রোমশাতনমুত্তমম্ ||১০৬|| কদলীদীর্ঘবৃন্তাভ্যাং ভস্মালং লবণং শমীবীজং শীতোদপিষ্টং বা রোমশাতনমাচরেত্ ||১০৭|| আগারগোধিকাপুচ্ছং রম্ভাঽঽলং বীজমৈঙ্গুদম্ | দগ্ধ্বা তদ্ভস্মতৈলাম্বু সূর্যপক্বং কচান্তকৃত্ ||১০৮||
रोमाकीर्णो व्रणो यस्तु न सम्यगुपरोहति | क्षुरकर्तरिसन्दंशैस्तस्य रोमाणि निर्हरेत् ||१०४|| (शङ्खचूर्णस्य भागौ द्वौ हरितालं च भागिकम् | शुक्तेन सह पिष्टानि लोमशातनमुत्तमम्) ||१०५|| तैलं भल्लातकस्याथ स्नुहीक्षीरं तथैव च | प्रगृह्यैकत्र मतिमान् रोमशातनमुत्तमम् ||१०६|| कदलीदीर्घवृन्ताभ्यां भस्मालं लवणं शमीबीजं शीतोदपिष्टं वा रोमशातनमाचरेत् ||१०७|| आगारगोधिकापुच्छं रम्भाऽऽलं बीजमैङ्गुदम् | दग्ध्वा तद्भस्मतैलाम्बु सूर्यपक्वं कचान्तकृत् ||१०८||
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Adhikarana 67 (109) · Śloka 109
বাতদুষ্টো ব্রণো যস্তু রূক্ষশ্চাত্যর্থবেদনঃ | অধঃকাযে বিশেষেণ তত্র বস্তির্বিধীযতে ||১০৯||
वातदुष्टो व्रणो यस्तु रूक्षश्चात्यर्थवेदनः | अधःकाये विशेषेण तत्र बस्तिर्विधीयते ||१०९||
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Adhikarana 68 (110) · Śloka 110
মূত্রাঘাতে মূত্রদোষে শুক্রদোষেঽশ্মরীব্রণে | তথৈবার্তবদোষে চ বস্তিরপ্যুত্তরো হিতঃ ||১১০||
मूत्राघाते मूत्रदोषे शुक्रदोषेऽश्मरीव्रणे | तथैवार्तवदोषे च बस्तिरप्युत्तरो हितः ||११०||
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Adhikarana 69 (111) · Śloka 111
যস্মাচ্ছুধ্যতি বন্ধেন ব্রণো যাতি চ মার্দবম্ | রোহত্যপি চ নিঃশঙ্কস্তস্মাদ্বন্ধো বিধীযতে ||১১১||
यस्माच्छुध्यति बन्धेन व्रणो याति च मार्दवम् | रोहत्यपि च निःशङ्कस्तस्माद्बन्धो विधीयते ||१११||
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Adhikarana 70 (112-118) · Śloka 118
স্থিরাণামল্পমাংসানাং রৌক্ষ্যাদনুপরোহতাম্ | পত্রদানং ভবেত্ কার্যং যথাদোষং যথর্তু চ ||১১২|| এরণ্ডভূর্জপূতীকহরিদ্রাণাং তু বাতজে | পত্রমাশ্ববলং যচ্চ কাশ্মরীপত্রমেব চ ||১১৩|| পত্রাণি ক্ষীরবৃক্ষাণামৌদকানি তথৈব চ | দূষিতে রক্তপিত্তাভ্যাং ব্রণে দদ্যাদ্বিচক্ষণঃ ||১১৪|| পাঠামূর্বাগুডূচীনাং কাকমাচীহরিদ্রযোঃ | পত্রং চ শুকনাসাযা যোজযেত্ কফজে ব্রণে ||১১৫|| অকর্কশমবিচ্ছিন্নমজীর্ণং সুকুমারকম্ | অজন্তুজগ্ধং মৃদু চ পত্রং গুণবদুচ্যতে ||১১৬|| স্নেহমৌষধসারং চ পট্টঃ পত্রান্তরীকৃতঃ | নাদত্তে যত্ততঃ পত্রং লেপস্যোপরি দাপযেত্ ||১১৭|| শৈত্যৌষ্ণ্যজননার্থায স্নেহসঙ্গ্রহণায চ | দত্তৌষধেষু দাতব্যং পত্রং বৈদ্যেন জানতা ||১১৮||
स्थिराणामल्पमांसानां रौक्ष्यादनुपरोहताम् | पत्रदानं भवेत् कार्यं यथादोषं यथर्तु च ||११२|| एरण्डभूर्जपूतीकहरिद्राणां तु वातजे | पत्रमाश्वबलं यच्च काश्मरीपत्रमेव च ||११३|| पत्राणि क्षीरवृक्षाणामौदकानि तथैव च | दूषिते रक्तपित्ताभ्यां व्रणे दद्याद्विचक्षणः ||११४|| पाठामूर्वागुडूचीनां काकमाचीहरिद्रयोः | पत्रं च शुकनासाया योजयेत् कफजे व्रणे ||११५|| अकर्कशमविच्छिन्नमजीर्णं सुकुमारकम् | अजन्तुजग्धं मृदु च पत्रं गुणवदुच्यते ||११६|| स्नेहमौषधसारं च पट्टः पत्रान्तरीकृतः | नादत्ते यत्ततः पत्रं लेपस्योपरि दापयेत् ||११७|| शैत्यौष्ण्यजननार्थाय स्नेहसङ्ग्रहणाय च | दत्तौषधेषु दातव्यं पत्रं वैद्येन जानता ||११८||
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Adhikarana 71 (119-122) · Śloka 122
মক্ষিকা ব্রণমাগত্য নিঃক্ষিপন্তি যদা কৃমীন্ | শ্বযথুর্ভক্ষিতে তৈস্তু জাযতে ভৃশদারুণঃ ||১১৯|| তীব্রা রুজো বিচিত্রাশ্চ রক্তাস্রাবশ্চ জাযতে | সুরসাদির্হিতস্তত্র ধাবনে পূরণে তথা ||১২০|| সপ্তপর্ণকরঞ্জার্কনিম্বরাজাদনত্বচঃ | হিতা গোমূত্রপিষ্টাশ্চ সেকঃ ক্ষারোদকেন বা ||১২১|| প্রচ্ছাদ্য মাংসপেশ্যা বা কৃমীনপহরেদ্ব্রণাত্ | বিংশতিং কৃমিজাতীস্তু বক্ষ্যাম্যুপরি ভাগশঃ ||১২২||
मक्षिका व्रणमागत्य निःक्षिपन्ति यदा कृमीन् | श्वयथुर्भक्षिते तैस्तु जायते भृशदारुणः ||११९|| तीव्रा रुजो विचित्राश्च रक्तास्रावश्च जायते | सुरसादिर्हितस्तत्र धावने पूरणे तथा ||१२०|| सप्तपर्णकरञ्जार्कनिम्बराजादनत्वचः | हिता गोमूत्रपिष्टाश्च सेकः क्षारोदकेन वा ||१२१|| प्रच्छाद्य मांसपेश्या वा कृमीनपहरेद्व्रणात् | विंशतिं कृमिजातीस्तु वक्ष्याम्युपरि भागशः ||१२२||
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Adhikarana 72 (123) · Śloka 123
দীর্ঘকালাতুরাণাং তু কৃশানাং ব্রণশোষিণাম্ | বৃংহণীযো বিধিঃ সর্বঃ কাযাগ্নিং পরিরক্ষতা ||১২৩||
दीर्घकालातुराणां तु कृशानां व्रणशोषिणाम् | बृंहणीयो विधिः सर्वः कायाग्निं परिरक्षता ||१२३||
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Adhikarana 73 (124) · Śloka 124
বিষজুষ্টস্য বিজ্ঞানং বিষনিশ্চযমেব চ | চিকিত্সিতং চ বক্ষ্যামি কল্পেষু প্রতিভাগশঃ ||১২৪||
विषजुष्टस्य विज्ञानं विषनिश्चयमेव च | चिकित्सितं च वक्ष्यामि कल्पेषु प्रतिभागशः ||१२४||
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Adhikarana 74 (125) · Śloka 125
কণ্ডূমন্তঃ সশোফাশ্চ যে চ জত্রূপরি ব্রণাঃ | শিরোবিরেচনং তেষু বিদধ্যাত্কুশলো ভিষক্ ||১২৫||
कण्डूमन्तः सशोफाश्च ये च जत्रूपरि व्रणाः | शिरोविरेचनं तेषु विदध्यात्कुशलो भिषक् ||१२५||
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Adhikarana 75 (126) · Śloka 126
রুজাবন্তোঽনিলাবিষ্টা রূক্ষা যে চোর্ধ্বজত্রুজাঃ | ব্রণেষু তেষু কর্তব্যং নস্যং বৈদ্যেন জানতা ||১২৬||
रुजावन्तोऽनिलाविष्टा रूक्षा ये चोर्ध्वजत्रुजाः | व्रणेषु तेषु कर्तव्यं नस्यं वैद्येन जानता ||१२६||
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Adhikarana 76 (127-128) · Śloka 128
দোষপ্রচ্যাবনার্থায রুজাদাহক্ষযায চ | জিহ্বাদন্তসমুত্থস্য হরণার্থং মলস্য চ ||১২৭|| শোধনো রোপণশ্চৈব ব্রণস্য মুখজস্য বৈ | উষ্ণো বা যদি বা শীতঃ কবলগ্রহ ইষ্যতে ||১২৮||
दोषप्रच्यावनार्थाय रुजादाहक्षयाय च | जिह्वादन्तसमुत्थस्य हरणार्थं मलस्य च ||१२७|| शोधनो रोपणश्चैव व्रणस्य मुखजस्य वै | उष्णो वा यदि वा शीतः कवलग्रह इष्यते ||१२८||
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Adhikarana 77 (129) · Śloka 129
ঊর্ধ্বজত্রুগতান্ রোগান্ ব্রণাংশ্চ কফবাতজান্ | শোফস্রাবরুজাযুক্তান্ ধূমপানৈরুপাচরেত্ ||১২৯||
ऊर्ध्वजत्रुगतान् रोगान् व्रणांश्च कफवातजान् | शोफस्रावरुजायुक्तान् धूमपानैरुपाचरेत् ||१२९||
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Adhikarana 78 (130) · Śloka 130
ক্ষতোষ্মণো নিগ্রহার্থং সন্ধানার্থং তথৈব চ | সদ্যোব্রণেষ্বাযতেষু ক্ষৌদ্রসর্পির্বিধীযতে ||১৩০||
क्षतोष्मणो निग्रहार्थं सन्धानार्थं तथैव च | सद्योव्रणेष्वायतेषु क्षौद्रसर्पिर्विधीयते ||१३०||
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Adhikarana 79 (131) · Śloka 131
অবগাঢাস্ত্বণুমুখা যে ব্রণাঃ শল্যপীডিতাঃ | নিবৃত্তহস্তোদ্ধরণা যন্ত্রং তেষু বিধীযতে ||১৩১||
अवगाढास्त्वणुमुखा ये व्रणाः शल्यपीडिताः | निवृत्तहस्तोद्धरणा यन्त्रं तेषु विधीयते ||१३१||
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Adhikarana 80 (132) · Śloka 132
লঘুমাত্রো লঘুশ্চৈব স্নিগ্ধ উষ্ণোঽগ্নিদীপনঃ | সর্বব্রণিভ্যো দেযস্তু সদাঽঽহারো বিজানতা ||১৩২||
लघुमात्रो लघुश्चैव स्निग्ध उष्णोऽग्निदीपनः | सर्वव्रणिभ्यो देयस्तु सदाऽऽहारो विजानता ||१३२||
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Adhikarana 81 (133) · Śloka 133
নিশাচরেভ্যো রক্ষ্যস্তু নিত্যমেব ক্ষতাতুরঃ | রক্ষাবিধানৈরুদ্দিষ্টৈর্যমৈঃ সনিযমৈস্তথা ||১৩৩||
निशाचरेभ्यो रक्ष्यस्तु नित्यमेव क्षतातुरः | रक्षाविधानैरुद्दिष्टैर्यमैः सनियमैस्तथा ||१३३||
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Adhikarana 82 (134) · Śloka 134
ষণ্মূলোঽষ্টপরিগ্রাহী পঞ্চলক্ষণলক্ষিতঃ | ষষ্ট্যা বিধানৈর্নির্দিষ্টৈশ্চতুর্ভিঃ সাধ্যতে ব্রণঃ ||১৩৪||
षण्मूलोऽष्टपरिग्राही पञ्चलक्षणलक्षितः | षष्ट्या विधानैर्निर्दिष्टैश्चतुर्भिः साध्यते व्रणः ||१३४||
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Adhikarana 83 (135) · Śloka 135
যোঽল্পৌষধকৃতো যোগো বহুগ্রন্থভযান্মযা | দ্রব্যাণাং তত্সমানানাং তত্রাবাপো ন দুষ্যতি ||১৩৫||
योऽल्पौषधकृतो योगो बहुग्रन्थभयान्मया | द्रव्याणां तत्समानानां तत्रावापो न दुष्यति ||१३५||
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Adhikarana 84 (136) · Śloka 136
প্রসঙ্গাভিহিতো যো বা বহুদুর্লভভেষজঃ | যথোপপত্তি তত্রাপি কার্যমেব চিকিত্সিতম্ ||১৩৬||
प्रसङ्गाभिहितो यो वा बहुदुर्लभभेषजः | यथोपपत्ति तत्रापि कार्यमेव चिकित्सितम् ||१३६||
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Adhikarana 85 (137) · Śloka 137
গণোক্তমপি যদ্দ্রব্যং ভবেদ্ব্যাধাবযৌগিকম্ | তদুদ্ধরেদ্যৌগিকং তু প্রক্ষিপেদপ্যকীর্তিতম্ ||১৩৭||
गणोक्तमपि यद्द्रव्यं भवेद्व्याधावयौगिकम् | तदुद्धरेद्यौगिकं तु प्रक्षिपेदप्यकीर्तितम् ||१३७||
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Adhikarana 86 (138-139) · Śloka 139
উপদ্রবাস্তু বিবিধা ব্রণস্য ব্রণিতস্য চ | তত্র গন্ধাদযঃ পঞ্চ ব্রণস্যোপদ্রবাঃ স্মৃতাঃ ||১৩৮|| জ্বরাতিসারৌ মূর্চ্ছা চ হিক্কা চ্ছর্দিররোচকঃ | শ্বাসকাসাবিপাকাশ্চ তৃষ্ণা চ ব্রণিতস্য তু ||১৩৯||
उपद्रवास्तु विविधा व्रणस्य व्रणितस्य च | तत्र गन्धादयः पञ्च व्रणस्योपद्रवाः स्मृताः ||१३८|| ज्वरातिसारौ मूर्च्छा च हिक्का च्छर्दिररोचकः | श्वासकासाविपाकाश्च तृष्णा च व्रणितस्य तु ||१३९||
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Adhikarana 87 (140) · Śloka 140
ব্রণক্রিযাস্বেবমাসু ব্যাসেনোক্তাস্বপি ক্রিযাম্ | ভূযোঽপ্যুপরি বক্ষ্যামি সদ্যোব্রণচিকিত্সিতে ||১৪০||
व्रणक्रियास्वेवमासु व्यासेनोक्तास्वपि क्रियाम् | भूयोऽप्युपरि वक्ष्यामि सद्योव्रणचिकित्सिते ||१४०||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 1
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে দ্বিব্রণীযচিকিত্সিতং নাম প্রথমোঽধ্যাযঃ ||১||
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने द्विव्रणीयचिकित्सितं नाम प्रथमोऽध्यायः ||१||
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