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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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2. sadyōvraṇacikitsitam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ সদ্যোব্রণচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः सद्योव्रणचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

ধন্বন্তরির্ধর্মভৃতাং বরিষ্ঠো বাগ্বিশারদঃ | বিশ্বামিত্রসুতং শিষ্যমৃষিং সুশ্রুতমন্বশাত্ ||৩||

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धन्वन्तरिर्धर्मभृतां वरिष्ठो वाग्विशारदः | विश्वामित्रसुतं शिष्यमृषिं सुश्रुतमन्वशात् ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

নানাধারামুখৈঃ শস্ত্রৈর্নানাস্থাননিপাতিতৈঃ | নানারূপা ব্রণা যে স্যুস্তেষাং বক্ষ্যামি লক্ষণম্ ||৪||

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नानाधारामुखैः शस्त्रैर्नानास्थाननिपातितैः | नानारूपा व्रणा ये स्युस्तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् ||४||

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Adhikarana 4 (5-6) · Śloka 7

আযতাশ্চতুরস্রাশ্চ ত্র্যস্রা মণ্ডলিনস্তথা | অর্ধচন্দ্রপ্রতীকাশা বিশালাঃ কুটিলাস্তথা ||৫|| শরাবনিম্নমধ্যাশ্চ যবমধ্যাস্তথাঽপরে | এবম্প্রকারাকৃতযো ভবন্ত্যাগন্তবো ব্রণাঃ ||৬|| দোষজা বা স্বযং ভিন্না, ন তু বৈদ্যনিমিত্তজাঃ |৭|

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आयताश्चतुरस्राश्च त्र्यस्रा मण्डलिनस्तथा | अर्धचन्द्रप्रतीकाशा विशालाः कुटिलास्तथा ||५|| शरावनिम्नमध्याश्च यवमध्यास्तथाऽपरे | एवम्प्रकाराकृतयो भवन्त्यागन्तवो व्रणाः ||६|| दोषजा वा स्वयं भिन्ना, न तु वैद्यनिमित्तजाः |७|

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Adhikarana 5 (7) · Śloka 8

ভিষগ্ব্রণাকৃতিজ্ঞো হি ন মোহমধিগচ্ছতি ||৭|| ভৃশং দুর্দর্শরূপেষু ব্রণেষু বিকৃতেষ্বপি |৮|

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भिषग्व्रणाकृतिज्ञो हि न मोहमधिगच्छति ||७|| भृशं दुर्दर्शरूपेषु व्रणेषु विकृतेष्वपि |८|

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Adhikarana 6 (8) · Śloka 9

অনন্তাকৃতিরাগন্তুঃ স ভিষগ্ভিঃ পুরাতনৈঃ ||৮|| সমাসতো লক্ষণতঃ ষড্বিধঃ পরিকীর্তিতঃ |৯|

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अनन्ताकृतिरागन्तुः स भिषग्भिः पुरातनैः ||८|| समासतो लक्षणतः षड्विधः परिकीर्तितः |९|

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Adhikarana 7 (9) · Śloka 10

ছিন্নং ভিন্নং তথা বিদ্ধং ক্ষতং পিচ্চিতমেব চ ||৯|| ঘৃষ্টমাহুস্তথা ষষ্ঠং তেষাং বক্ষ্যামি লক্ষণম্ |১০|

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छिन्नं भिन्नं तथा विद्धं क्षतं पिच्चितमेव च ||९|| घृष्टमाहुस्तथा षष्ठं तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् |१०|

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Adhikarana 8 (10) · Śloka 11

তিরশ্চীন ঋজুর্বাঽপি যো ব্রণশ্চাযতো ভবেত্ ||১০|| গাত্রস্য পাতনং চাপি ছিন্নমিত্যুপদিশ্যতে |১১|

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तिरश्चीन ऋजुर्वाऽपि यो व्रणश्चायतो भवेत् ||१०|| गात्रस्य पातनं चापि छिन्नमित्युपदिश्यते |११|

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Adhikarana 9 (11) · Śloka 12

কুন্তশক্ত্যৃষ্টিখঙ্গাগ্রবিষাণাদিভিরাশযঃ ||১১|| হতঃ কিঞ্চিত্ স্রবেত্তদ্ধি ভিন্নলক্ষণমুচ্যতে |১২|

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कुन्तशक्त्यृष्टिखङ्गाग्रविषाणादिभिराशयः ||११|| हतः किञ्चित् स्रवेत्तद्धि भिन्नलक्षणमुच्यते |१२|

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Adhikarana 10 (12) · Śloka 13

স্থানান্যামাগ্নিপক্বানাং মূত্রস্য রুধিরস্য চ ||১২|| হৃদুণ্ডুকঃ ফুপ্ফুসশ্চ কোষ্ঠ ইত্যভিধীযতে |১৩|

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स्थानान्यामाग्निपक्वानां मूत्रस्य रुधिरस्य च ||१२|| हृदुण्डुकः फुप्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते |१३|

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Adhikarana 11 (13-15) · Śloka 16

তস্মিন্ ভিন্নে রক্তপূর্ণে জ্বরো দাহশ্চ জাযতে ||১৩|| মূত্রমার্গগুদাস্যেভ্যো রক্তং ঘ্রাণাচ্চ গচ্ছতি | মূর্চ্ছাশ্বাসতৃডাধ্মানমভক্তচ্ছন্দ এব চ ||১৪|| বিণ্মূত্রবাতসঙ্গশ্চ স্বেদাস্রাবোঽক্ষিরক্ততা | লোহগন্ধিত্বমাস্যস্য গাত্রদৌর্গন্ধ্যমেব চ ||১৫|| হৃচ্ছূলং পার্শ্বযোশ্চাপি... |১৬|

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तस्मिन् भिन्ने रक्तपूर्णे ज्वरो दाहश्च जायते ||१३|| मूत्रमार्गगुदास्येभ्यो रक्तं घ्राणाच्च गच्छति | मूर्च्छाश्वासतृडाध्मानमभक्तच्छन्द एव च ||१४|| विण्मूत्रवातसङ्गश्च स्वेदास्रावोऽक्षिरक्तता | लोहगन्धित्वमास्यस्य गात्रदौर्गन्ध्यमेव च ||१५|| हृच्छूलं पार्श्वयोश्चापि... |१६|

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Adhikarana 12 (16-17) · Śloka 18

... বিশেষং চাত্র মে শৃণু | আমাশযস্থে রুধিরে রুধিরং ছর্দযেত্ পুনঃ ||১৬|| আধ্মানমতিমাত্রং চ শূলং চ ভৃশদারুণম্ | পক্বাশযগতে চাপি রুজো গৌরবমেব চ ||১৭|| শীততা চাপ্যধো নাভেঃ খেভ্যো রক্তস্য চাগমঃ |১৮|

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... विशेषं चात्र मे शृणु | आमाशयस्थे रुधिरे रुधिरं छर्दयेत् पुनः ||१६|| आध्मानमतिमात्रं च शूलं च भृशदारुणम् | पक्वाशयगते चापि रुजो गौरवमेव च ||१७|| शीतता चाप्यधो नाभेः खेभ्यो रक्तस्य चागमः |१८|

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Adhikarana 13 (18) · Śloka 19

অভিন্নেঽপ্যাশযেঽন্ত্রাণাং খৈঃ সূক্ষ্মৈরন্ত্রপূরণম্ ||১৮|| পিহিতাস্যে ঘটে যদ্বল্লক্ষ্যতে তস্য গৌরবম্ |১৯|

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अभिन्नेऽप्याशयेऽन्त्राणां खैः सूक्ष्मैरन्त्रपूरणम् ||१८|| पिहितास्ये घटे यद्वल्लक्ष्यते तस्य गौरवम् |१९|

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Adhikarana 14 (19) · Śloka 20

সূক্ষ্মাস্যশল্যাভিহতং যদঙ্গং ত্বাশযাদ্বিনা ||১৯|| উত্তুণ্ডিতং নির্গতং বা তদ্বিদ্ধমিতি নির্দিশেত্ |২০|

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सूक्ष्मास्यशल्याभिहतं यदङ्गं त्वाशयाद्विना ||१९|| उत्तुण्डितं निर्गतं वा तद्विद्धमिति निर्दिशेत् |२०|

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Adhikarana 15 (20) · Śloka 21

নাতিচ্ছিন্নং নাতিভিন্নমুভযোর্লক্ষণান্বিতম্ ||২০|| বিষমং ব্রণমঙ্গে যত্তত্ ক্ষতং ত্বভিনির্দিশেত্ |২১|

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नातिच्छिन्नं नातिभिन्नमुभयोर्लक्षणान्वितम् ||२०|| विषमं व्रणमङ्गे यत्तत् क्षतं त्वभिनिर्दिशेत् |२१|

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Adhikarana 16 (21) · Śloka 22

প্রহারপীডনাভ্যাং তু যদঙ্গং পৃথুতাং গতম্ ||২১|| সাস্থি তত্ পিচ্চিতং বিদ্যান্মজ্জরক্তপরিপ্লুতম্ |২২|

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प्रहारपीडनाभ्यां तु यदङ्गं पृथुतां गतम् ||२१|| सास्थि तत् पिच्चितं विद्यान्मज्जरक्तपरिप्लुतम् |२२|

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Adhikarana 17 (22) · Śloka 23

বিগতত্বগ্যদঙ্গং হি সঙ্ঘর্ষাদন্যথাঽপি বা ||২২|| উষাস্রাবান্বিতং তত্তু ঘৃষ্টমিত্যুপদিশ্যতে |২৩|

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विगतत्वग्यदङ्गं हि सङ्घर्षादन्यथाऽपि वा ||२२|| उषास्रावान्वितं तत्तु घृष्टमित्युपदिश्यते |२३|

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Adhikarana 18 (23-25) · Śloka 26

ছিন্নে ভিন্নে তথা বিদ্ধে ক্ষতে বাঽসৃগতিস্রবেত্ ||২৩|| রক্তক্ষযাদ্রুজস্তত্র করোতি পবনো ভৃশম্ | স্নেহপানং হিতং তত্র তত্সেকো বিহিতস্তথা ||২৪|| বেশবারৈঃ সকৃশরৈঃ সুস্নিগ্ধৈশ্চোপনাহনম্ | ধান্যস্বেদাংশ্চ কুর্বীত স্নিগ্ধান্যালেপনানি চ ||২৫|| বাতঘ্নৌষধসিদ্ধৈশ্চ স্নেহৈর্বস্তির্বিধীযতে |২৬|

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छिन्ने भिन्ने तथा विद्धे क्षते वाऽसृगतिस्रवेत् ||२३|| रक्तक्षयाद्रुजस्तत्र करोति पवनो भृशम् | स्नेहपानं हितं तत्र तत्सेको विहितस्तथा ||२४|| वेशवारैः सकृशरैः सुस्निग्धैश्चोपनाहनम् | धान्यस्वेदांश्च कुर्वीत स्निग्धान्यालेपनानि च ||२५|| वातघ्नौषधसिद्धैश्च स्नेहैर्बस्तिर्विधीयते |२६|

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Adhikarana 19 (26-27) · Śloka 28

পিচ্চিতে চ বিঘৃষ্টে চ নাতিস্রবতি শোণিতম্ ||২৬|| অগচ্ছতি ভৃশং তস্মিন্ দাহঃ পাকশ্চ জাযতে | তত্রোষ্মণো নিগ্রহার্থং তথা দাহপ্রপাকযোঃ ||২৭|| শীতমালেপনং কার্যং পরিষেকশ্চ শীতলঃ |২৮|

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पिच्चिते च विघृष्टे च नातिस्रवति शोणितम् ||२६|| अगच्छति भृशं तस्मिन् दाहः पाकश्च जायते | तत्रोष्मणो निग्रहार्थं तथा दाहप्रपाकयोः ||२७|| शीतमालेपनं कार्यं परिषेकश्च शीतलः |२८|

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Adhikarana 20 (28) · Śloka 29

ষট্স্বেতেষু যথোক্তেষু ছিন্নাদিষু সমাসতঃ ||২৮|| জ্ঞেযং সমর্পিতং সর্বং সদ্যোব্রণচিকিত্সিতম্ |২৯|

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षट्स्वेतेषु यथोक्तेषु छिन्नादिषु समासतः ||२८|| ज्ञेयं समर्पितं सर्वं सद्योव्रणचिकित्सितम् |२९|

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Adhikarana 21 (29-30) · Śloka 30

অত ঊর্ধ্বং প্রবক্ষ্যামি ছিন্নানাং তু চিকিত্সিতম্ ||২৯|| যে ব্রণা বিবৃতাঃ কেচিচ্ছিরঃপার্শ্বাবলম্বিনঃ | তান্ সীব্যেদ্বিধিনোক্তেন বধ্নীযাদ্গাঢমেব চ ||৩০||

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अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि छिन्नानां तु चिकित्सितम् ||२९|| ये व्रणा विवृताः केचिच्छिरःपार्श्वावलम्बिनः | तान् सीव्येद्विधिनोक्तेन बध्नीयाद्गाढमेव च ||३०||

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Adhikarana 22 (31-33) · Śloka 33

কর্ণং স্থানাদপহৃতং স্থাপযিত্বা যথাস্থিতম্ | সীব্যেদ্যথোক্তং তৈলেন স্রোতশ্চাভিপ্রতর্পযেত্ ||৩১|| কৃকাটিকান্তে ছিন্নে তু গচ্ছত্যপি সমীরণে | সম্যঙ্নিবেশ্য বধ্নীযাত্ সীব্যেচ্চাপি নিরন্তরম্ ||৩২|| আজেন সর্পিষা চৈবং পরিষেকং তু কারযেত্ | উত্তানোঽন্নং সমশ্নীযাচ্ছযীত চ সুযন্ত্রিতঃ ||৩৩||

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कर्णं स्थानादपहृतं स्थापयित्वा यथास्थितम् | सीव्येद्यथोक्तं तैलेन स्रोतश्चाभिप्रतर्पयेत् ||३१|| कृकाटिकान्ते छिन्ने तु गच्छत्यपि समीरणे | सम्यङ्निवेश्य बध्नीयात् सीव्येच्चापि निरन्तरम् ||३२|| आजेन सर्पिषा चैवं परिषेकं तु कारयेत् | उत्तानोऽन्नं समश्नीयाच्छयीत च सुयन्त्रितः ||३३||

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Adhikarana 23 (34-35) · Śloka 35

শাখাসু পতিতাংস্তির্যক্ প্রহারান্ বিবৃতান্ ভৃশম্ | সীব্যেত্ সম্যঙ্নিবেশ্যাশু সন্ধ্যস্থীন্যনুপূর্বশঃ ||৩৪|| বদ্ধ্বা বেল্লিতকেনাশু ততস্তৈলেন সেচযেত্ | চর্মণা গোফণাবন্ধঃ কার্যো যো বা হিতো ভবেত্ ||৩৫||

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शाखासु पतितांस्तिर्यक् प्रहारान् विवृतान् भृशम् | सीव्येत् सम्यङ्निवेश्याशु सन्ध्यस्थीन्यनुपूर्वशः ||३४|| बद्ध्वा वेल्लितकेनाशु ततस्तैलेन सेचयेत् | चर्मणा गोफणाबन्धः कार्यो यो वा हितो भवेत् ||३५||

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Adhikarana 24 (36) · Śloka 36

পৃষ্ঠে ব্রণো যস্য ভবেদুত্তানং শাযযেত্তু তম্ | অতোঽন্যথা চোরসিজে শাযযেত্ পুরুষং ব্রণে ||৩৬||

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पृष्ठे व्रणो यस्य भवेदुत्तानं शाययेत्तु तम् | अतोऽन्यथा चोरसिजे शाययेत् पुरुषं व्रणे ||३६||

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Adhikarana 25 (37) · Śloka 37

ছিন্নাং নিঃশেষতঃ শাখাং দগ্ধ্বা তৈলেন বুদ্ধিমান্ | বধ্নীযাত্ কোশবন্ধেন প্রাপ্তং কার্যং চ রোপণম্ ||৩৭||

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छिन्नां निःशेषतः शाखां दग्ध्वा तैलेन बुद्धिमान् | बध्नीयात् कोशबन्धेन प्राप्तं कार्यं च रोपणम् ||३७||

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Adhikarana 26 (38) · Śloka 39

চন্দনং পদ্মকং রোধ্রমুত্পলানি প্রিযঙ্গবঃ | হরিদ্রা মধুকং চৈব পযঃ স্যাদত্র চাষ্টমম্ ||৩৮|| তৈলমেভির্বিপক্বং তু প্রধানং ব্রণরোপণম্ |৩৯|

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चन्दनं पद्मकं रोध्रमुत्पलानि प्रियङ्गवः | हरिद्रा मधुकं चैव पयः स्यादत्र चाष्टमम् ||३८|| तैलमेभिर्विपक्वं तु प्रधानं व्रणरोपणम् |३९|

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Adhikarana 27 (39-40) · Śloka 41

চন্দনং কর্কটাখ্যা চ সহে মাংস্যাহ্বযাঽমৃতা ||৩৯|| হরেণবো মৃণালং চ ত্রিফলা পদ্মকোত্পলে | ত্রযোদশাঙ্গং ত্রিবৃতমেতদ্বা পযসাঽন্বিতম্ ||৪০|| তৈলং বিপক্বং সেকার্থে হিতং তু ব্রণরোপণে |৪১|

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चन्दनं कर्कटाख्या च सहे मांस्याह्वयाऽमृता ||३९|| हरेणवो मृणालं च त्रिफला पद्मकोत्पले | त्रयोदशाङ्गं त्रिवृतमेतद्वा पयसाऽन्वितम् ||४०|| तैलं विपक्वं सेकार्थे हितं तु व्रणरोपणे |४१|

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Adhikarana 28 (41-43) · Śloka 43

অত ঊর্ধ্বং প্রবক্ষ্যামি ভিন্নানাং তু চিকিত্সিতম্ ||৪১|| ভিন্নং নেত্রমকর্মণ্যমভিন্নং লম্বতে তু যত্ | তন্নিবেশ্য যথাস্থানমব্যাবিদ্ধসিরং শনৈঃ ||৪২|| পীডযেত্ পাণিনা সম্যক্ পদ্মপত্ত্রান্তরেণ তু | ততোঽস্য তর্পণং কার্যং নস্যং চানেন সর্পিষা ||৪৩||

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अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि भिन्नानां तु चिकित्सितम् ||४१|| भिन्नं नेत्रमकर्मण्यमभिन्नं लम्बते तु यत् | तन्निवेश्य यथास्थानमव्याविद्धसिरं शनैः ||४२|| पीडयेत् पाणिना सम्यक् पद्मपत्त्रान्तरेण तु | ततोऽस्य तर्पणं कार्यं नस्यं चानेन सर्पिषा ||४३||

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Adhikarana 29 (44) · Śloka 45

আজং ঘৃতং ক্ষীরপাত্রং মধুকং চোত্পলানি চ | জীবকর্ষভকৌ চৈব পিষ্ট্বা সর্পির্বিপাচযেত্ ||৪৪|| সর্বনেত্রাভিঘাতে তু সর্পিরেতত্ প্রশস্যতে |৪৫|

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आजं घृतं क्षीरपात्रं मधुकं चोत्पलानि च | जीवकर्षभकौ चैव पिष्ट्वा सर्पिर्विपाचयेत् ||४४|| सर्वनेत्राभिघाते तु सर्पिरेतत् प्रशस्यते |४५|

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Adhikarana 30 (45-49) · Śloka 49

উদরান্মেদসো বর্তির্নির্গতা যস্য দেহিনঃ ||৪৫|| কষাযভস্মমৃত্কীর্ণাং বদ্ধ্বা সূত্রেণ সূত্রবিত্ | অগ্নিতপ্তেন শস্ত্রেণ ছিন্দ্যান্মধুসমাযুতম্ ||৪৬|| বদ্ধ্বা ব্রণং সুজীর্ণেঽন্নে সর্পিষঃ পানমিষ্যতে | স্নেহপানাদৃতে চাপি পযঃপানং বিধীযতে ||৪৭|| শর্করামধুযষ্টিভ্যাং লাক্ষযা বা শ্বদংষ্ট্রযা | চিত্রাসমন্বিতং চৈব রুজাদাহবিনাশনম্ ||৪৮|| আটোপো মরণং বা স্যাচ্ছূলো বাঽচ্ছিদ্যমানযা | মেদোগ্রন্থৌ তু যত্তৈলং বক্ষ্যতে তচ্চ যোজযেত্ ||৪৯||

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उदरान्मेदसो वर्तिर्निर्गता यस्य देहिनः ||४५|| कषायभस्ममृत्कीर्णां बद्ध्वा सूत्रेण सूत्रवित् | अग्नितप्तेन शस्त्रेण छिन्द्यान्मधुसमायुतम् ||४६|| बद्ध्वा व्रणं सुजीर्णेऽन्ने सर्पिषः पानमिष्यते | स्नेहपानादृते चापि पयःपानं विधीयते ||४७|| शर्करामधुयष्टिभ्यां लाक्षया वा श्वदंष्ट्रया | चित्रासमन्वितं चैव रुजादाहविनाशनम् ||४८|| आटोपो मरणं वा स्याच्छूलो वाऽच्छिद्यमानया | मेदोग्रन्थौ तु यत्तैलं वक्ष्यते तच्च योजयेत् ||४९||

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Adhikarana 31 (50) · Śloka 50

ত্বচোঽতীত্য সিরাদীনি ভিত্ত্বা বা পরিহৃত্য বা | কোষ্ঠে প্রতিষ্ঠিতং শল্যং কুর্যাদুক্তানুপদ্রবান্ ||৫০||

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त्वचोऽतीत्य सिरादीनि भित्त्वा वा परिहृत्य वा | कोष्ठे प्रतिष्ठितं शल्यं कुर्यादुक्तानुपद्रवान् ||५०||

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Adhikarana 32 (51) · Śloka 51

তত্রান্তর্লোহিতং পাণ্ডুং শীতপাদকরাননম্ | শীতোচ্ছ্বাসং রক্তনেত্রমানদ্ধং চ বিবর্জযেত্ ||৫১||

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तत्रान्तर्लोहितं पाण्डुं शीतपादकराननम् | शीतोच्छ्वासं रक्तनेत्रमानद्धं च विवर्जयेत् ||५१||

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Adhikarana 33 (52-54) · Śloka 54

আমাশযস্থে রুধিরে বমনং পথ্যমুচ্যতে | পক্বাশযস্থে দেযং চ বিরেচনমসংশযম্ ||৫২|| আস্থাপনং চ নিঃস্নেহং কার্যমুষ্ণৈর্বিশোধনৈঃ | যবকোলকুলত্থানাং নিঃস্নেহেন রসেন চ ||৫৩|| ভুঞ্জীতান্নং যবাগূং বা পিবেত্ সৈন্ধবসংযুতাম্ | অতিনিঃস্রুতরক্তো বা ভিন্নকোষ্ঠঃ পিবেদসৃক্ ||৫৪||

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आमाशयस्थे रुधिरे वमनं पथ्यमुच्यते | पक्वाशयस्थे देयं च विरेचनमसंशयम् ||५२|| आस्थापनं च निःस्नेहं कार्यमुष्णैर्विशोधनैः | यवकोलकुलत्थानां निःस्नेहेन रसेन च ||५३|| भुञ्जीतान्नं यवागूं वा पिबेत् सैन्धवसंयुताम् | अतिनिःस्रुतरक्तो वा भिन्नकोष्ठः पिबेदसृक् ||५४||

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Adhikarana 34 (55) · Śloka 55

স্বমার্গপ্রতিপন্নাস্তু যস্য বিণ্মূত্রমারুতাঃ | ব্যুপদ্রবঃ স ভিন্নেঽপি কোষ্ঠে জীবতি মানবঃ ||৫৫||

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स्वमार्गप्रतिपन्नास्तु यस्य विण्मूत्रमारुताः | व्युपद्रवः स भिन्नेऽपि कोष्ठे जीवति मानवः ||५५||

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Adhikarana 35 (56-65) · Śloka 66

অভিন্নমন্ত্রং নিষ্ক্রান্তং প্রবেশ্যং নান্যথা ভবেত্ | পিপীলিকাশিরোগ্রস্তং তদপ্যেকে বদন্তি তু ||৫৬|| প্রক্ষাল্য পযসা দিগ্ধং তৃণশোণিতপাংশুভিঃ | প্রবেশযেত্ কৃত্তনখো ঘৃতেনাক্তং শনৈঃ শনৈঃ ||৫৭|| প্রবেশযেত্ ক্ষীরসিক্তং শুষ্কমন্ত্রং ঘৃতাপ্লুতম্ | অঙ্গুল্যাঽভিমৃশেত্ কণ্ঠং জলেনোদ্বেজযেদপি ||৫৮|| হস্তপাদেষু সঙ্গৃহ্য সমুত্থাপ্য মহাবলাঃ | ভবত্যন্তঃপ্রবেশস্তু যথা নির্ধুনুযুস্তথা ||৫৯|| তথাঽন্ত্রাণি বিশন্ত্যন্তঃ স্বাং কলাং পীডযন্তি চ | ব্রণাল্পত্বাদ্বহুত্বাদ্বা দুষ্প্রবেশং ভবেত্তু যত্ ||৬০|| তদাপাট্য প্রমাণেন ভিষগন্ত্রং প্রবেশযেত্ | যথাস্থানং নিবিষ্টে চ ব্রণং সীব্যেদতন্দ্রিতঃ ||৬১|| স্থানাদপেতমাদত্তে প্রাণান্ গুপিতমেব বা | বেষ্টযিত্বা তু পট্টেন ঘৃতসেকং প্রদাপযেত্ ||৬২|| ঘৃতং পিবেত্ সুখোষ্ণং চ চিত্রাতৈলসমন্বিতম্ | মৃদুক্রিযার্থং শকৃতো বাযোশ্চাধঃপ্রবৃত্তযে ||৬৩|| ততস্তৈলমিদং কুর্যাদ্রোপণার্থং চিকিত্সকঃ | ত্বচোঽশ্বকর্ণধবযোর্মোচকীমেষশৃঙ্গযোঃ ||৬৪|| শল্লক্যর্জুনযোশ্চাপি বিদার্যাঃ ক্ষীরিণাং তথা | বলামূলানি চাহৃত্য তৈলমেতৈর্বিপাচযেত্ ||৬৫|| ব্রণং সংরোপযেত্তেন বর্ষমাত্রং যতেত চ |৬৬|

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अभिन्नमन्त्रं निष्क्रान्तं प्रवेश्यं नान्यथा भवेत् | पिपीलिकाशिरोग्रस्तं तदप्येके वदन्ति तु ||५६|| प्रक्षाल्य पयसा दिग्धं तृणशोणितपांशुभिः | प्रवेशयेत् कृत्तनखो घृतेनाक्तं शनैः शनैः ||५७|| प्रवेशयेत् क्षीरसिक्तं शुष्कमन्त्रं घृताप्लुतम् | अङ्गुल्याऽभिमृशेत् कण्ठं जलेनोद्वेजयेदपि ||५८|| हस्तपादेषु सङ्गृह्य समुत्थाप्य महाबलाः | भवत्यन्तःप्रवेशस्तु यथा निर्धुनुयुस्तथा ||५९|| तथाऽन्त्राणि विशन्त्यन्तः स्वां कलां पीडयन्ति च | व्रणाल्पत्वाद्बहुत्वाद्वा दुष्प्रवेशं भवेत्तु यत् ||६०|| तदापाट्य प्रमाणेन भिषगन्त्रं प्रवेशयेत् | यथास्थानं निविष्टे च व्रणं सीव्येदतन्द्रितः ||६१|| स्थानादपेतमादत्ते प्राणान् गुपितमेव वा | वेष्टयित्वा तु पट्टेन घृतसेकं प्रदापयेत् ||६२|| घृतं पिबेत् सुखोष्णं च चित्रातैलसमन्वितम् | मृदुक्रियार्थं शकृतो वायोश्चाधःप्रवृत्तये ||६३|| ततस्तैलमिदं कुर्याद्रोपणार्थं चिकित्सकः | त्वचोऽश्वकर्णधवयोर्मोचकीमेषशृङ्गयोः ||६४|| शल्लक्यर्जुनयोश्चापि विदार्याः क्षीरिणां तथा | बलामूलानि चाहृत्य तैलमेतैर्विपाचयेत् ||६५|| व्रणं संरोपयेत्तेन वर्षमात्रं यतेत च |६६|

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Adhikarana 36 (66-68) · Śloka 69

পাদৌ নিরস্তমুষ্কস্য জলেন প্রোক্ষ্য চাক্ষিণী ||৬৬|| প্রবেশ্য তুন্নসেবন্যা মুষ্কৌ সীব্যেত্ততঃ পরম্ | কার্যো গোফণিকাবন্ধঃ কট্যামাবেশ্য যন্ত্রকম্ ||৬৭|| ন কুর্যাত্ স্নেহসেকং চ তেন ক্লিদ্যতি হি ব্রণঃ | কালানুসার্যাগুর্বেলাজাতীচন্দনপদ্মকৈঃ ||৬৮|| শিলাদার্ব্যমৃতাতুত্থৈস্তৈলং কুর্বীত রোপণম্ |৬৯|

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पादौ निरस्तमुष्कस्य जलेन प्रोक्ष्य चाक्षिणी ||६६|| प्रवेश्य तुन्नसेवन्या मुष्कौ सीव्येत्ततः परम् | कार्यो गोफणिकाबन्धः कट्यामावेश्य यन्त्रकम् ||६७|| न कुर्यात् स्नेहसेकं च तेन क्लिद्यति हि व्रणः | कालानुसार्यागुर्वेलाजातीचन्दनपद्मकैः ||६८|| शिलादार्व्यमृतातुत्थैस्तैलं कुर्वीत रोपणम् |६९|

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Adhikarana 37 (69-70) · Śloka 71

শিরসোঽপহৃতে শল্যে বালবর্তিং নিবেশযেত্ ||৬৯|| বালবর্ত্যামদত্তাযাং মস্তুলুঙ্গং ব্রণাত্ স্রবেত্ | হন্যাদেনং ততো বাযুস্তস্মাদেবমুপাচরেত্ ||৭০|| ব্রণে রোহতি চৈকৈকং শনৈর্বালমপক্ষিপেত্ |৭১|

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शिरसोऽपहृते शल्ये बालवर्तिं निवेशयेत् ||६९|| बालवर्त्यामदत्तायां मस्तुलुङ्गं व्रणात् स्रवेत् | हन्यादेनं ततो वायुस्तस्मादेवमुपाचरेत् ||७०|| व्रणे रोहति चैकैकं शनैर्बालमपक्षिपेत् |७१|

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Adhikarana 38 (71) · Śloka 72

গাত্রাদপহৃতেঽন্যস্মাত্ স্নেহবর্তিং প্রবেশযেত্ ||৭১|| কৃতে নিঃশোণিতে চাপি বিধিঃ সদ্যঃক্ষতে হিতঃ |৭২|

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गात्रादपहृतेऽन्यस्मात् स्नेहवर्तिं प्रवेशयेत् ||७१|| कृते निःशोणिते चापि विधिः सद्यःक्षते हितः |७२|

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Adhikarana 39 (72) · Śloka 73

দূরাবগাঢাঃ সূক্ষ্মাঃ স্যুর্যে ব্রণাস্তান্ বিশোণিতান্ ||৭২|| কৃত্বা সূক্ষ্মেণ নেত্রেণ চক্রতৈলেন তর্পযেত্ |৭৩|

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दूरावगाढाः सूक्ष्माः स्युर्ये व्रणास्तान् विशोणितान् ||७२|| कृत्वा सूक्ष्मेण नेत्रेण चक्रतैलेन तर्पयेत् |७३|

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Adhikarana 40 (73-74) · Śloka 74

সমঙ্গাং রজনীং পদ্মাং ত্রিবর্গং তুত্থমেব চ ||৭৩|| বিডঙ্গং কটুকাং পথ্যাং গুডূচীং সকরঞ্জিকাম্ | সংহৃত্য বিপচেত্ কালে তৈলং রোপণমুত্তমম্ ||৭৪||

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समङ्गां रजनीं पद्मां त्रिवर्गं तुत्थमेव च ||७३|| विडङ्गं कटुकां पथ्यां गुडूचीं सकरञ्जिकाम् | संहृत्य विपचेत् काले तैलं रोपणमुत्तमम् ||७४||

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Adhikarana 41 (75) · Śloka 76

তালীশং পদ্মকং মাংসী হরেণ্বগুরুচন্দনম্ | হরিদ্রে পদ্মবীজানি সোশীরং মধুকং চ তৈঃ ||৭৫|| পক্বং সদ্যোব্রণেষূক্তং তৈলং রোপণমুত্তমম্ |৭৬|

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तालीशं पद्मकं मांसी हरेण्वगुरुचन्दनम् | हरिद्रे पद्मबीजानि सोशीरं मधुकं च तैः ||७५|| पक्वं सद्योव्रणेषूक्तं तैलं रोपणमुत्तमम् |७६|

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Adhikarana 42 (76) · Śloka 76

ক্ষতে ক্ষতবিধিঃ কার্যঃ পিচ্চিতে ভগ্নবদ্বিধিঃ ||৭৬||

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क्षते क्षतविधिः कार्यः पिच्चिते भग्नवद्विधिः ||७६||

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Adhikarana 43 (77) · Śloka 77

ঘৃষ্টে রুজো নিগৃহ্যাশু চূর্ণৈরুপচরেদ্ব্রণম্ |৭৭|

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घृष्टे रुजो निगृह्याशु चूर्णैरुपचरेद्व्रणम् |७७|

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Adhikarana 44 (77-78) · Śloka 78

বিশ্লিষ্টদেহং পতিতং মথিতং হতমেব চ ||৭৭|| বাসযেত্তৈলপূর্ণাযাং দ্রোণ্যাং মাংসরসাশনম্ | অযমেব বিধিঃ কার্যঃ ক্ষীণে মর্মহতে তথা ||৭৮||

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विश्लिष्टदेहं पतितं मथितं हतमेव च ||७७|| वासयेत्तैलपूर्णायां द्रोण्यां मांसरसाशनम् | अयमेव विधिः कार्यः क्षीणे मर्महते तथा ||७८||

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Adhikarana 45 (79) · Śloka 79

রোপণে সপরীষেকে পানে চ ব্রণিনাং সদা | তৈলং ঘৃতং বা সংযোজ্যং শরীরর্তূনবেক্ষ্য হি ||৭৯||

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रोपणे सपरीषेके पाने च व्रणिनां सदा | तैलं घृतं वा संयोज्यं शरीरर्तूनवेक्ष्य हि ||७९||

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Adhikarana 46 (80) · Śloka 80

ঘৃতানি যানি বক্ষ্যামি যত্নতঃ পিত্তবিদ্রধৌ | সদ্যোব্রণেষু দেযানি তানি বৈদ্যেন জানতা ||৮০||

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घृतानि यानि वक्ष्यामि यत्नतः पित्तविद्रधौ | सद्योव्रणेषु देयानि तानि वैद्येन जानता ||८०||

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Adhikarana 47 (81) · Śloka 81

সদ্যঃক্ষতব্রণং বৈদ্যঃ সশূলং পরিষেচযেত্ | সর্পিষা নাতিশীতেন বলাতৈলেন বা পুনঃ ||৮১||

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सद्यःक्षतव्रणं वैद्यः सशूलं परिषेचयेत् | सर्पिषा नातिशीतेन बलातैलेन वा पुनः ||८१||

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Adhikarana 48 (82-84) · Śloka 85

সমঙ্গাং রজনীং পদ্মাং পথ্যাং তুত্থং সুবর্চলাম্ | পদ্মকং রোধ্রমধুকং বিডঙ্গানি হরেণুকাম্ ||৮২|| তালীশপত্রং নলদং চন্দনং পদ্মকেশরম্ | মঞ্জিষ্ঠোশীরলাক্ষাশ্চ ক্ষীরিণাং চাপি পল্লবান্ ||৮৩|| প্রিযালবীজং তিন্দুক্যাস্তরুণানি ফলানি চ | যথালাভং সমাহৃত্য তৈলমেভির্বিপাচযেত্ ||৮৪|| সদ্যোব্রণানাং সর্বেষামদুষ্টানাং তু রোপণম্ |৮৫|

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समङ्गां रजनीं पद्मां पथ्यां तुत्थं सुवर्चलाम् | पद्मकं रोध्रमधुकं विडङ्गानि हरेणुकाम् ||८२|| तालीशपत्रं नलदं चन्दनं पद्मकेशरम् | मञ्जिष्ठोशीरलाक्षाश्च क्षीरिणां चापि पल्लवान् ||८३|| प्रियालबीजं तिन्दुक्यास्तरुणानि फलानि च | यथालाभं समाहृत्य तैलमेभिर्विपाचयेत् ||८४|| सद्योव्रणानां सर्वेषामदुष्टानां तु रोपणम् |८५|

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Adhikarana 49 (85) · Śloka 86

কষাযমধুরাঃশীতাঃ ক্রিযাঃ স্নিগ্ধাশ্চ যোজযেত্ ||৮৫|| সদ্যোব্রণানাং সপ্তাহং পশ্চাত্ পূর্বোক্তমাচরেত্ |৮৬|

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कषायमधुराःशीताः क्रियाः स्निग्धाश्च योजयेत् ||८५|| सद्योव्रणानां सप्ताहं पश्चात् पूर्वोक्तमाचरेत् |८६|

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Adhikarana 50 (86-88) · Śloka 88

দুষ্টব্রণেষু কর্তব্যমূর্ধ্বং চাধশ্চ শোধনম্ ||৮৬|| বিশোষণং তথাঽঽহারঃ শোণিতস্য চ মোক্ষণম্ | কষাযং রাজবৃক্ষাদৌ সুরসাদৌ চ ধাবনম্ ||৮৭|| তযোরেব কষাযেণ তৈলং শোধনমিষ্যতে | ক্ষারকল্পেন বা তৈলং ক্ষারদ্রব্যেষু সাধিতম্ ||৮৮||

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दुष्टव्रणेषु कर्तव्यमूर्ध्वं चाधश्च शोधनम् ||८६|| विशोषणं तथाऽऽहारः शोणितस्य च मोक्षणम् | कषायं राजवृक्षादौ सुरसादौ च धावनम् ||८७|| तयोरेव कषायेण तैलं शोधनमिष्यते | क्षारकल्पेन वा तैलं क्षारद्रव्येषु साधितम् ||८८||

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Adhikarana 51 (89-92) · Śloka 92

দ্রবন্তী চিরবিল্বশ্চ দন্তী চিত্রকমেব চ | পৃথ্বীকা নিম্বপত্রাণি কাসীসং তুত্থমেব চ ||৮৯|| ত্রিবৃত্তেজোবতী নীলী হরিদ্রে সৈন্ধবং তিলাঃ | ভূমিকদম্বঃ সুবহা শুকাখ্যা লাঙ্গলাহ্বযা ||৯০|| নৈপালী জালিনী চৈব মদযন্তী মৃগাদনী | সুধামূর্বার্ককীটারিহরিতালকরঞ্জিকাঃ ||৯১|| যথোপপত্তি কর্তব্যং তৈলমেতৈস্তু শোধনম্ | ঘৃতং বা যদি বা প্রাপ্তং কল্কাঃ সংশোধনাস্তথা ||৯২||

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द्रवन्ती चिरबिल्वश्च दन्ती चित्रकमेव च | पृथ्वीका निम्बपत्राणि कासीसं तुत्थमेव च ||८९|| त्रिवृत्तेजोवती नीली हरिद्रे सैन्धवं तिलाः | भूमिकदम्बः सुवहा शुकाख्या लाङ्गलाह्वया ||९०|| नैपाली जालिनी चैव मदयन्ती मृगादनी | सुधामूर्वार्ककीटारिहरितालकरञ्जिकाः ||९१|| यथोपपत्ति कर्तव्यं तैलमेतैस्तु शोधनम् | घृतं वा यदि वा प्राप्तं कल्काः संशोधनास्तथा ||९२||

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Adhikarana 52 (93-94) · Śloka 94

সৈন্ধবত্রিবৃদেরণ্ডপত্রকল্কস্তু বাতিকে | ত্রিবৃদ্ধরিদ্রামধুককল্কঃ পৈত্তে তিলৈর্যুতঃ ||৯৩|| কফজে তিলতেজোহ্বাদন্তীস্বর্জিকচিত্রকাঃ | দুষ্টব্রণবিধিঃ কার্যো মেহকুষ্ঠব্রণেষ্বপি ||৯৪||

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सैन्धवत्रिवृदेरण्डपत्रकल्कस्तु वातिके | त्रिवृद्धरिद्रामधुककल्कः पैत्ते तिलैर्युतः ||९३|| कफजे तिलतेजोह्वादन्तीस्वर्जिकचित्रकाः | दुष्टव्रणविधिः कार्यो मेहकुष्ठव्रणेष्वपि ||९४||

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Adhikarana 53 (95) · Śloka 95

ষড্বিধঃ প্রাক্ প্রদিষ্টো যঃ সদ্যোব্রণবিনিশ্চযঃ | নাতঃ শক্যং পরং বক্তুমপি নিশ্চিতবাদিভিঃ ||৯৫||

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षड्विधः प्राक् प्रदिष्टो यः सद्योव्रणविनिश्चयः | नातः शक्यं परं वक्तुमपि निश्चितवादिभिः ||९५||

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Adhikarana 54 (96-97) · Śloka 97

উপসর্গৈর্নিপাতৈশ্চ তত্তু পণ্ডিতমানিনঃ | কেচিত্ সংযোজ্য ভাষন্তে বহুধা মানগর্বিতাঃ ||৯৬|| বহু তদ্ভাষিতং তেষাং ষট্স্বেষ্বেবাবতিষ্ঠতে | বিশেষা ইব সামান্যে ষট্ত্বং তু পরমং মতম্ ||৯৭||

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उपसर्गैर्निपातैश्च तत्तु पण्डितमानिनः | केचित् संयोज्य भाषन्ते बहुधा मानगर्विताः ||९६|| बहु तद्भाषितं तेषां षट्स्वेष्वेवावतिष्ठते | विशेषा इव सामान्ये षट्त्वं तु परमं मतम् ||९७||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 2

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে সদ্যোব্রণচিকিত্সিতং নাম দ্বিতিযোঽধ্যাযঃ ||২||

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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने सद्योव्रणचिकित्सितं नाम द्वितियोऽध्यायः ||२||

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