Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 3
অথাতো মূঢগর্ভচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
নাতোঽন্যত্ কষ্টতমমস্তি যথা মূঢগর্ভশল্যোদ্ধরণম্; অত্র হি যোনিযকৃত্প্লীহান্ত্রবিবরগর্ভাশযানাং মধ্যে কর্ম কর্তব্যং স্পর্শেন, উত্কর্ষণাপকর্ষণস্থানাপবর্তনোত্কর্তনভেদনচ্ছেদনপীডনর্জূকরণদারণানি চৈকহস্তেন গর্ভং গর্ভিণীং চাহিংসতা, তস্মাদধিপতিমাপৃচ্ছ্য পরং চ যত্নমাস্থাযোপক্রমেত ||৩||
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अथातो मूढगर्भचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
नातोऽन्यत् कष्टतममस्ति यथा मूढगर्भशल्योद्धरणम्; अत्र हि योनियकृत्प्लीहान्त्रविवरगर्भाशयानां मध्ये कर्म कर्तव्यं स्पर्शेन, उत्कर्षणापकर्षणस्थानापवर्तनोत्कर्तनभेदनच्छेदनपीडनर्जूकरणदारणानि चैकहस्तेन गर्भं गर्भिणीं चाहिंसता, तस्मादधिपतिमापृच्छ्य परं च यत्नमास्थायोपक्रमेत ||३||
Adhikarana 2 (4) · Śloka 4
তত্র সমাসেনাষ্টবিধা মূঢগর্ভগতিরুদ্দিষ্টা; স্বভাবগতা অপি ত্রযঃ সঙ্গা ভবন্তি- শিরসো বৈগুণ্যাদংসযোর্জঘনস্য বা ||৪||
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तत्र समासेनाष्टविधा मूढगर्भगतिरुद्दिष्टा; स्वभावगता अपि त्रयः सङ्गा भवन्ति- शिरसो वैगुण्यादंसयोर्जघनस्य वा ||४||
Adhikarana 3 (5-8) · Śloka 8
জীবতি তু গর্ভে সূতিকাগর্ভনির্হরণে প্রযতেত |
নির্হর্তুমশক্যে চ্যাবনান্ মন্ত্রানুপশৃণুযাত্; তান্ বক্ষ্যামঃ ||৫||
‘ইহামৃতং চ সোমশ্চ চিত্রভানুশ্চ ভামিনি |
উচ্চৈঃশ্রবাশ্চ তুরগো মন্দিরে নিবসন্তু তে ||৬||
ইদমমৃতমপাং সমুদ্ধৃতং বৈ তব লঘু গর্ভমিমং প্রমুঞ্চতু স্ত্রি |
তদনলপবনার্কবাসবাস্তে সহ লবণাম্বুধরৈর্দিশন্তু শান্তিম্ ||৭||
মুক্তাঃ পশোর্বিপাশাশ্চ মুক্তাঃ সূর্যেণ রশ্মযঃ |
মুক্তঃ সর্বভযাদ্গর্ভ এহ্যেহি বিরমাবিতঃ ||৮||
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जीवति तु गर्भे सूतिकागर्भनिर्हरणे प्रयतेत |
निर्हर्तुमशक्ये च्यावनान् मन्त्रानुपशृणुयात्; तान् वक्ष्यामः ||५||
‘इहामृतं च सोमश्च चित्रभानुश्च भामिनि |
उच्चैःश्रवाश्च तुरगो मन्दिरे निवसन्तु ते ||६||
इदममृतमपां समुद्धृतं वै तव लघु गर्भमिमं प्रमुञ्चतु स्त्रि |
तदनलपवनार्कवासवास्ते सह लवणाम्बुधरैर्दिशन्तु शान्तिम् ||७||
मुक्ताः पशोर्विपाशाश्च मुक्ताः सूर्येण रश्मयः |
मुक्तः सर्वभयाद्गर्भ एह्येहि विरमावितः ||८||
Adhikarana 4 (9-11) · Śloka 11
ঔষধানি চ বিদধ্যাদ্যথোক্তানি |
মৃতে চোত্তানাযা আভুগ্নসক্থ্যা বস্ত্রাধারকোন্নমিতকট্যা ধন্বননগবৃত্তিকাশাল্মলীমৃত্স্নঘৃতাভ্যাং ম্রক্ষযিত্বা হস্তং যোনৌ প্রবেশ্য গর্ভমুপহরেত্ |
তত্র সক্থিভ্যামাগতমনুলোমমেবাঞ্ছেত্, একসক্থ্না প্রতিপন্নস্যেতরসক্থি প্রসার্যাপহরেত্, স্ফিগ্দেশেনাগতস্য স্ফিগ্দেশং প্রপীড্যোর্ধ্বমুত্ক্ষিপ্য সক্থিনী প্রসার্যাপহরেত্, তির্যগাগতস্য পরিঘস্যেব তিরশ্চীনস্য পশ্চাদর্ধমূর্ধ্বমুত্ক্ষিপ্য পূর্বার্ধমপত্যপথং প্রত্যার্জবমানীযাপহরেত্, পার্শ্বাপবৃত্তশিরসমংসং প্রপীড্যোর্ধ্বমুত্ক্ষিপ্য শিরোঽপত্যপথমানীযাপহরেত্, বাহুদ্বযপ্রতিপন্নস্যোর্ধ্বমুত্পীড্যাংসৌ শিরোঽনুলোমমানীযাপহরেত্, দ্বাবন্ত্যাবসাধ্যৌ মূঢগর্ভৌ, এবমশক্যে শস্ত্রমবচারযেত্ ||৯||
সচেতনং চ শস্ত্রেণ ন কথঞ্চন দারযেত্ |
দার্যমাণো হি জননীমাত্মানং চৈব ঘাতযেত্ ||১০||
অবিষহ্যে বিকারে তু শ্রেযো গর্ভস্য পাতনম্ |
ন গর্ভিণ্যা বিপর্যাসস্তস্মাত্প্রাপ্তং ন হাপযেত্ ||১১||
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औषधानि च विदध्याद्यथोक्तानि |
मृते चोत्तानाया आभुग्नसक्थ्या वस्त्राधारकोन्नमितकट्या धन्वननगवृत्तिकाशाल्मलीमृत्स्नघृताभ्यां म्रक्षयित्वा हस्तं योनौ प्रवेश्य गर्भमुपहरेत् |
तत्र सक्थिभ्यामागतमनुलोममेवाञ्छेत्, एकसक्थ्ना प्रतिपन्नस्येतरसक्थि प्रसार्यापहरेत्, स्फिग्देशेनागतस्य स्फिग्देशं प्रपीड्योर्ध्वमुत्क्षिप्य सक्थिनी प्रसार्यापहरेत्, तिर्यगागतस्य परिघस्येव तिरश्चीनस्य पश्चादर्धमूर्ध्वमुत्क्षिप्य पूर्वार्धमपत्यपथं प्रत्यार्जवमानीयापहरेत्, पार्श्वापवृत्तशिरसमंसं प्रपीड्योर्ध्वमुत्क्षिप्य शिरोऽपत्यपथमानीयापहरेत्, बाहुद्वयप्रतिपन्नस्योर्ध्वमुत्पीड्यांसौ शिरोऽनुलोममानीयापहरेत्, द्वावन्त्यावसाध्यौ मूढगर्भौ, एवमशक्ये शस्त्रमवचारयेत् ||९||
सचेतनं च शस्त्रेण न कथञ्चन दारयेत् |
दार्यमाणो हि जननीमात्मानं चैव घातयेत् ||१०||
अविषह्ये विकारे तु श्रेयो गर्भस्य पातनम् |
न गर्भिण्या विपर्यासस्तस्मात्प्राप्तं न हापयेत् ||११||
Adhikarana 5 (12-19) · Śloka 20
ততঃ স্ত্রিযমাশ্বাস্য মণ্ডলাগ্রেণাঙ্গুলীশস্ত্রেণ বা শিরো বিদার্য, শিরঃকপালান্যাহৃত্য, শঙ্কুনা গৃহীত্বোরসি কক্ষাযাং বাঽপহরেত্; অভিন্নশিরসমক্ষিকূটে গণ্ডে বা, অংসসংসক্তস্যাংসদেশে বাহূ ছিত্ত্বা, দৃতিমিবাততং বাতপূর্ণোদরং বা বিদার্য নিরস্যান্ত্রাণি শিথিলীভূতমাহরেত্, জঘনসক্তস্য বা জঘনকপালানীতি ||১২||
কিম্বহুনা- যদ্যদঙ্গং হি গর্ভস্য তস্য সজ্জতি তদ্ভিষক্ |
সম্যগ্বিনির্হরেচ্ছিত্ত্বা রক্ষেন্নারীং চ যত্নতঃ ||১৩||
গর্ভস্য গতযশ্চিত্রা জাযন্তেঽনিলকোপতঃ |
তত্রানল্পমতির্বৈদ্যো বর্তেত বিধিপূর্বকম্ ||১৪||
নোপেক্ষেত মৃতং গর্ভং মুহূর্তমপি পণ্ডিতঃ |
স হ্যাশু জননীং হন্তি নিরুচ্ছ্বাসং পশুং যথা ||১৫||
মণ্ডলাগ্রেণ কর্তব্যং ছেদ্যমন্তর্বিজানতা |
বৃদ্ধিপত্রং হি তীক্ষ্ণাগ্রং নারীং হিংস্যাত্ কদাচন ||১৬||
অথাপতন্তীমপরাং পাতযেত্ পূর্ববদ্ভিষক্ |
হস্তেনাপহরেদ্বাঽপি পার্শ্বভ্যাং পরিপীড্য বা ||১৭||
ধুনুযাচ্চ মুহুর্নারীং পীডযেদ্বাংঽসপিণ্ডিকাম্ |
তৈলাক্তযোনেরেবং তাং পাতযেন্মতিমান্ ভিষক্ ||১৮||
এবং নির্হৃতশল্যাং তু সিঞ্চেদুষ্ণেন বারিণা |
ততোঽভ্যক্তশরীরাযা যোনৌ স্নেহং নিধাপযেত্ ||১৯||
এবং মৃদ্বী ভবেদ্যোনিস্তচ্ছূলং চোপশাম্যতি |২০|
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ततः स्त्रियमाश्वास्य मण्डलाग्रेणाङ्गुलीशस्त्रेण वा शिरो विदार्य, शिरःकपालान्याहृत्य, शङ्कुना गृहीत्वोरसि कक्षायां वाऽपहरेत्; अभिन्नशिरसमक्षिकूटे गण्डे वा, अंससंसक्तस्यांसदेशे बाहू छित्त्वा, दृतिमिवाततं वातपूर्णोदरं वा विदार्य निरस्यान्त्राणि शिथिलीभूतमाहरेत्, जघनसक्तस्य वा जघनकपालानीति ||१२||
किम्बहुना- यद्यदङ्गं हि गर्भस्य तस्य सज्जति तद्भिषक् |
सम्यग्विनिर्हरेच्छित्त्वा रक्षेन्नारीं च यत्नतः ||१३||
गर्भस्य गतयश्चित्रा जायन्तेऽनिलकोपतः |
तत्रानल्पमतिर्वैद्यो वर्तेत विधिपूर्वकम् ||१४||
नोपेक्षेत मृतं गर्भं मुहूर्तमपि पण्डितः |
स ह्याशु जननीं हन्ति निरुच्छ्वासं पशुं यथा ||१५||
मण्डलाग्रेण कर्तव्यं छेद्यमन्तर्विजानता |
वृद्धिपत्रं हि तीक्ष्णाग्रं नारीं हिंस्यात् कदाचन ||१६||
अथापतन्तीमपरां पातयेत् पूर्ववद्भिषक् |
हस्तेनापहरेद्वाऽपि पार्श्वभ्यां परिपीड्य वा ||१७||
धुनुयाच्च मुहुर्नारीं पीडयेद्वांऽसपिण्डिकाम् |
तैलाक्तयोनेरेवं तां पातयेन्मतिमान् भिषक् ||१८||
एवं निर्हृतशल्यां तु सिञ्चेदुष्णेन वारिणा |
ततोऽभ्यक्तशरीराया योनौ स्नेहं निधापयेत् ||१९||
एवं मृद्वी भवेद्योनिस्तच्छूलं चोपशाम्यति |२०|
Adhikarana 6 (20-27) · Śloka 28
কৃষ্ণাতন্মূলশুণ্ঠ্যেলাহিঙ্গুভার্গীঃ সদীপ্যকাঃ ||২০||
বচামতিবিষাং রাস্নাং চব্যং সঞ্চূর্ণ্য পাযযেত্ |
স্নেহেন দোষস্যন্দার্থং বেদনোপশমায চ ||২১||
ক্বাথং চৈষাং তথা কল্কং চূর্ণং বা স্নেহবর্জিতম্ |
শাকত্বগ্ঘিঙ্গ্বতিবিষাপাঠাকটুকরোহিণীঃ ||২২||
তথা তেজোবতীং চাপি পাযযেত্ পূর্ববদ্ভিষক্ |
ত্রিরাত্রং পঞ্চসপ্তাহং ততঃ স্নেহং পুনঃ পিবেত্ ||২৩||
পাযযেতাসবং নক্তমরিষ্টং বা সুসংস্কৃতম্ |
শিরীষককুভাভ্যাং চ তোযমাচমনে হিতম্ ||২৪||
উপদ্রবাশ্চ যেঽন্যে স্যুস্তান্ যথাস্বমুপাচরেত্ |
সর্বতঃ পরিশুদ্ধা চ স্নিগ্ধপথ্যাল্পভোজনা ||২৫||
স্বেদাভ্যঙ্গপরা নিত্যং ভবেত্ ক্রোধবিবর্জিতা |
পযো বাতহরৈঃ সিদ্ধং দশাহং ভোজনে হিতম্ ||২৬||
রসং দশাহং শেষে তু যথাযোগমুপাচরেত্ |
ব্যুপদ্রবাং বিশুদ্ধাং চ জ্ঞাত্বা চ বরবর্ণিনীম্ ||২৭||
ঊর্ধ্বং চতুর্ভ্যো মাসেভ্যো বিসৃজেত্ পরিহারতঃ |২৮|
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कृष्णातन्मूलशुण्ठ्येलाहिङ्गुभार्गीः सदीप्यकाः ||२०||
वचामतिविषां रास्नां चव्यं सञ्चूर्ण्य पाययेत् |
स्नेहेन दोषस्यन्दार्थं वेदनोपशमाय च ||२१||
क्वाथं चैषां तथा कल्कं चूर्णं वा स्नेहवर्जितम् |
शाकत्वग्घिङ्ग्वतिविषापाठाकटुकरोहिणीः ||२२||
तथा तेजोवतीं चापि पाययेत् पूर्ववद्भिषक् |
त्रिरात्रं पञ्चसप्ताहं ततः स्नेहं पुनः पिबेत् ||२३||
पाययेतासवं नक्तमरिष्टं वा सुसंस्कृतम् |
शिरीषककुभाभ्यां च तोयमाचमने हितम् ||२४||
उपद्रवाश्च येऽन्ये स्युस्तान् यथास्वमुपाचरेत् |
सर्वतः परिशुद्धा च स्निग्धपथ्याल्पभोजना ||२५||
स्वेदाभ्यङ्गपरा नित्यं भवेत् क्रोधविवर्जिता |
पयो वातहरैः सिद्धं दशाहं भोजने हितम् ||२६||
रसं दशाहं शेषे तु यथायोगमुपाचरेत् |
व्युपद्रवां विशुद्धां च ज्ञात्वा च वरवर्णिनीम् ||२७||
ऊर्ध्वं चतुर्भ्यो मासेभ्यो विसृजेत् परिहारतः |२८|
Adhikarana 7 (28-39) · Śloka 39
যোনিসন্তর্পণেঽভ্যঙ্গে পানে বস্তিষু ভোজনে ||২৮||
বলাতৈলমিদং চাস্যৈ দদ্যাদনিলবারণম্ |
বলামূলকষাযস্য দশমূলীশৃতস্য চ ||২৯||
যবকোলকুলত্থানাং ক্বাথস্য পযসস্তথা |
অষ্টাবষ্টৌ শুভা ভাগাস্তৈলাদেকস্তদেকতঃ ||৩০||
পচেদাবাপ্য মধুরং গণং সৈন্ধবসংযুতম্ |
তথাঽগুরুং সর্জরসং সরলং দেবদারু চ ||৩১||
মঞ্জিষ্ঠাং চন্দনং কুষ্ঠমেলাং কালানুসারিবাম্ |
মাংসীং শৈলেযকং পত্রং তগরং সারিবাং বচাম্ ||৩২||
শতাবরীমশ্বগন্ধাং শতপুষ্পাং পুনর্নবাম্ |
তত্ সাধুসিদ্ধং সৌবর্ণে রাজতে মৃন্মযেঽপি বা ||৩৩||
প্রক্ষিপ্য কলশে সম্যক্ স্বনুগুপ্তং নিধাপযেত্ |
বলাতৈলমিদং খ্যাতং সর্ববাতবিকারনুত্ ||৩৪||
যথাবলমতো মাত্রাং সূতিকাযৈ প্রদাপযেত্ |
যা চ গর্ভার্থিনী নারী ক্ষীণশুক্রশ্চ যঃ পুমান্ ||৩৫||
বাতক্ষীণে মর্মহতে মথিতেঽভিহতে তথা |
ভগ্নে শ্রমাভিপন্নে চ সর্বথৈবোপযুজ্যতে ||৩৬||
এতদাক্ষেপকাদীন্ বৈ বাতব্যাধীনপোহতি |
হিক্কাং কাসমধীমন্থং গুল্মং শ্বাসং চ দুস্তরম্ ||৩৭||
ষণ্মাসানুপযুজ্যৈতদন্ত্রবৃদ্ধিমপোহতি |
প্রত্যগ্রধাতুঃ পুরুষো ভবেচ্চ স্থিরযৌবনঃ ||৩৮||
রাজ্ঞামেতদ্ধি কর্তব্যং রাজমাত্রাশ্চ যে নরাঃ |
সুখিনঃ সুকুমারাশ্চ ধনিনশ্চাপি যে নরাঃ ||৩৯||
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योनिसन्तर्पणेऽभ्यङ्गे पाने बस्तिषु भोजने ||२८||
बलातैलमिदं चास्यै दद्यादनिलवारणम् |
बलामूलकषायस्य दशमूलीशृतस्य च ||२९||
यवकोलकुलत्थानां क्वाथस्य पयसस्तथा |
अष्टावष्टौ शुभा भागास्तैलादेकस्तदेकतः ||३०||
पचेदावाप्य मधुरं गणं सैन्धवसंयुतम् |
तथाऽगुरुं सर्जरसं सरलं देवदारु च ||३१||
मञ्जिष्ठां चन्दनं कुष्ठमेलां कालानुसारिवाम् |
मांसीं शैलेयकं पत्रं तगरं सारिवां वचाम् ||३२||
शतावरीमश्वगन्धां शतपुष्पां पुनर्नवाम् |
तत् साधुसिद्धं सौवर्णे राजते मृन्मयेऽपि वा ||३३||
प्रक्षिप्य कलशे सम्यक् स्वनुगुप्तं निधापयेत् |
बलातैलमिदं ख्यातं सर्ववातविकारनुत् ||३४||
यथाबलमतो मात्रां सूतिकायै प्रदापयेत् |
या च गर्भार्थिनी नारी क्षीणशुक्रश्च यः पुमान् ||३५||
वातक्षीणे मर्महते मथितेऽभिहते तथा |
भग्ने श्रमाभिपन्ने च सर्वथैवोपयुज्यते ||३६||
एतदाक्षेपकादीन् वै वातव्याधीनपोहति |
हिक्कां कासमधीमन्थं गुल्मं श्वासं च दुस्तरम् ||३७||
षण्मासानुपयुज्यैतदन्त्रवृद्धिमपोहति |
प्रत्यग्रधातुः पुरुषो भवेच्च स्थिरयौवनः ||३८||
राज्ञामेतद्धि कर्तव्यं राजमात्राश्च ये नराः |
सुखिनः सुकुमाराश्च धनिनश्चापि ये नराः ||३९||
Adhikarana 8 (40-43) · Śloka 43
বলাকষাযপীতেভ্যস্তিলেভ্যো বাঽপ্যনেকশঃ |
তৈলমুত্পাদ্য তত্ক্বাথশতপাকং কৃতং শুভম্ ||৪০||
নিবাতে নিভৃতাগারে প্রযুঞ্জীত যথাবলম্ |
জীর্ণেঽস্মিন্ পযসা স্নিগ্ধমশ্নীযাত্ ষষ্টিকৌদনম্ ||৪১||
অনেন বিধিনা দ্রোণমুপযুজ্যান্নমীরিতম্ |
ভুঞ্জীত দ্বিগুণং কালং বলবর্ণান্বিতস্ততঃ ||৪২||
সর্বপাপৈর্বিনির্মুক্তঃ শতাযুঃ পুরুষো ভবেত্ |
শতং শতং তথোত্কর্ষো দ্রোণে দ্রোণে প্রকীর্তিতঃ ||৪৩||
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बलाकषायपीतेभ्यस्तिलेभ्यो वाऽप्यनेकशः |
तैलमुत्पाद्य तत्क्वाथशतपाकं कृतं शुभम् ||४०||
निवाते निभृतागारे प्रयुञ्जीत यथाबलम् |
जीर्णेऽस्मिन् पयसा स्निग्धमश्नीयात् षष्टिकौदनम् ||४१||
अनेन विधिना द्रोणमुपयुज्यान्नमीरितम् |
भुञ्जीत द्विगुणं कालं बलवर्णान्वितस्ततः ||४२||
सर्वपापैर्विनिर्मुक्तः शतायुः पुरुषो भवेत् |
शतं शतं तथोत्कर्षो द्रोणे द्रोणे प्रकीर्तितः ||४३||
Adhikarana 9 (44) · Śloka 45
বলাকল্পেনাতিবলাগুডূচ্যাদিত্যপর্ণিষু |
সৈরেযকে বীরতরৌ শতাবর্যাং ত্রিকণ্টকে ||৪৪||
তৈলানি মধুকে কুর্যাত্ প্রসারিণ্যাং চ বুদ্ধিমান্ |৪৫|
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बलाकल्पेनातिबलागुडूच्यादित्यपर्णिषु |
सैरेयके वीरतरौ शतावर्यां त्रिकण्टके ||४४||
तैलानि मधुके कुर्यात् प्रसारिण्यां च बुद्धिमान् |४५|
Adhikarana 10 (45-47) · Śloka 47
নীলোত্পলং বরীমূলং গব্যে ক্ষীরে বিপাচযেত্ ||৪৫||
শতপাকং ততস্তেন তিলতৈলং পচেদ্ভিষক্ |
বলাতৈলস্য কল্কাংস্তু সুপিষ্টাংস্তত্র দাপযেত্ ||৪৬||
সর্বেষামেব জানীযাদুপযোগং চিকিত্সকঃ |
বলাতৈলবদেতেষাং গুণাংশ্চৈব বিশেষতঃ ||৪৭||
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नीलोत्पलं वरीमूलं गव्ये क्षीरे विपाचयेत् ||४५||
शतपाकं ततस्तेन तिलतैलं पचेद्भिषक् |
बलातैलस्य कल्कांस्तु सुपिष्टांस्तत्र दापयेत् ||४६||
सर्वेषामेव जानीयादुपयोगं चिकित्सकः |
बलातैलवदेतेषां गुणांश्चैव विशेषतः ||४७||
Adhikarana puShpikA · Śloka 15
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে মূঢগর্ভচিকিত্সিতং নাম পঞ্চদশোঽধ্যাযঃ ||১৫||
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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने मूढगर्भचिकित्सितं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ||१५||