Skip to content
AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
Open navigation
Explore AyurvedaBook appointment

15. mūḍhagarbhacikitsitam

Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 3

অথাতো মূঢগর্ভচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২|| নাতোঽন্যত্ কষ্টতমমস্তি যথা মূঢগর্ভশল্যোদ্ধরণম্; অত্র হি যোনিযকৃত্প্লীহান্ত্রবিবরগর্ভাশযানাং মধ্যে কর্ম কর্তব্যং স্পর্শেন, উত্কর্ষণাপকর্ষণস্থানাপবর্তনোত্কর্তনভেদনচ্ছেদনপীডনর্জূকরণদারণানি চৈকহস্তেন গর্ভং গর্ভিণীং চাহিংসতা, তস্মাদধিপতিমাপৃচ্ছ্য পরং চ যত্নমাস্থাযোপক্রমেত ||৩||

View original

अथातो मूढगर्भचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२|| नातोऽन्यत् कष्टतममस्ति यथा मूढगर्भशल्योद्धरणम्; अत्र हि योनियकृत्प्लीहान्त्रविवरगर्भाशयानां मध्ये कर्म कर्तव्यं स्पर्शेन, उत्कर्षणापकर्षणस्थानापवर्तनोत्कर्तनभेदनच्छेदनपीडनर्जूकरणदारणानि चैकहस्तेन गर्भं गर्भिणीं चाहिंसता, तस्मादधिपतिमापृच्छ्य परं च यत्नमास्थायोपक्रमेत ||३||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 2 (4) · Śloka 4

তত্র সমাসেনাষ্টবিধা মূঢগর্ভগতিরুদ্দিষ্টা; স্বভাবগতা অপি ত্রযঃ সঙ্গা ভবন্তি- শিরসো বৈগুণ্যাদংসযোর্জঘনস্য বা ||৪||

View original

तत्र समासेनाष्टविधा मूढगर्भगतिरुद्दिष्टा; स्वभावगता अपि त्रयः सङ्गा भवन्ति- शिरसो वैगुण्यादंसयोर्जघनस्य वा ||४||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 3 (5-8) · Śloka 8

জীবতি তু গর্ভে সূতিকাগর্ভনির্হরণে প্রযতেত | নির্হর্তুমশক্যে চ্যাবনান্ মন্ত্রানুপশৃণুযাত্; তান্ বক্ষ্যামঃ ||৫|| ‘ইহামৃতং চ সোমশ্চ চিত্রভানুশ্চ ভামিনি | উচ্চৈঃশ্রবাশ্চ তুরগো মন্দিরে নিবসন্তু তে ||৬|| ইদমমৃতমপাং সমুদ্ধৃতং বৈ তব লঘু গর্ভমিমং প্রমুঞ্চতু স্ত্রি | তদনলপবনার্কবাসবাস্তে সহ লবণাম্বুধরৈর্দিশন্তু শান্তিম্ ||৭|| মুক্তাঃ পশোর্বিপাশাশ্চ মুক্তাঃ সূর্যেণ রশ্মযঃ | মুক্তঃ সর্বভযাদ্গর্ভ এহ্যেহি বিরমাবিতঃ ||৮||

View original

जीवति तु गर्भे सूतिकागर्भनिर्हरणे प्रयतेत | निर्हर्तुमशक्ये च्यावनान् मन्त्रानुपशृणुयात्; तान् वक्ष्यामः ||५|| ‘इहामृतं च सोमश्च चित्रभानुश्च भामिनि | उच्चैःश्रवाश्च तुरगो मन्दिरे निवसन्तु ते ||६|| इदममृतमपां समुद्धृतं वै तव लघु गर्भमिमं प्रमुञ्चतु स्त्रि | तदनलपवनार्कवासवास्ते सह लवणाम्बुधरैर्दिशन्तु शान्तिम् ||७|| मुक्ताः पशोर्विपाशाश्च मुक्ताः सूर्येण रश्मयः | मुक्तः सर्वभयाद्गर्भ एह्येहि विरमावितः ||८||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 4 (9-11) · Śloka 11

ঔষধানি চ বিদধ্যাদ্যথোক্তানি | মৃতে চোত্তানাযা আভুগ্নসক্থ্যা বস্ত্রাধারকোন্নমিতকট্যা ধন্বননগবৃত্তিকাশাল্মলীমৃত্স্নঘৃতাভ্যাং ম্রক্ষযিত্বা হস্তং যোনৌ প্রবেশ্য গর্ভমুপহরেত্ | তত্র সক্থিভ্যামাগতমনুলোমমেবাঞ্ছেত্, একসক্থ্না প্রতিপন্নস্যেতরসক্থি প্রসার্যাপহরেত্, স্ফিগ্দেশেনাগতস্য স্ফিগ্দেশং প্রপীড্যোর্ধ্বমুত্ক্ষিপ্য সক্থিনী প্রসার্যাপহরেত্, তির্যগাগতস্য পরিঘস্যেব তিরশ্চীনস্য পশ্চাদর্ধমূর্ধ্বমুত্ক্ষিপ্য পূর্বার্ধমপত্যপথং প্রত্যার্জবমানীযাপহরেত্, পার্শ্বাপবৃত্তশিরসমংসং প্রপীড্যোর্ধ্বমুত্ক্ষিপ্য শিরোঽপত্যপথমানীযাপহরেত্, বাহুদ্বযপ্রতিপন্নস্যোর্ধ্বমুত্পীড্যাংসৌ শিরোঽনুলোমমানীযাপহরেত্, দ্বাবন্ত্যাবসাধ্যৌ মূঢগর্ভৌ, এবমশক্যে শস্ত্রমবচারযেত্ ||৯|| সচেতনং চ শস্ত্রেণ ন কথঞ্চন দারযেত্ | দার্যমাণো হি জননীমাত্মানং চৈব ঘাতযেত্ ||১০|| অবিষহ্যে বিকারে তু শ্রেযো গর্ভস্য পাতনম্ | ন গর্ভিণ্যা বিপর্যাসস্তস্মাত্প্রাপ্তং ন হাপযেত্ ||১১||

View original

औषधानि च विदध्याद्यथोक्तानि | मृते चोत्तानाया आभुग्नसक्थ्या वस्त्राधारकोन्नमितकट्या धन्वननगवृत्तिकाशाल्मलीमृत्स्नघृताभ्यां म्रक्षयित्वा हस्तं योनौ प्रवेश्य गर्भमुपहरेत् | तत्र सक्थिभ्यामागतमनुलोममेवाञ्छेत्, एकसक्थ्ना प्रतिपन्नस्येतरसक्थि प्रसार्यापहरेत्, स्फिग्देशेनागतस्य स्फिग्देशं प्रपीड्योर्ध्वमुत्क्षिप्य सक्थिनी प्रसार्यापहरेत्, तिर्यगागतस्य परिघस्येव तिरश्चीनस्य पश्चादर्धमूर्ध्वमुत्क्षिप्य पूर्वार्धमपत्यपथं प्रत्यार्जवमानीयापहरेत्, पार्श्वापवृत्तशिरसमंसं प्रपीड्योर्ध्वमुत्क्षिप्य शिरोऽपत्यपथमानीयापहरेत्, बाहुद्वयप्रतिपन्नस्योर्ध्वमुत्पीड्यांसौ शिरोऽनुलोममानीयापहरेत्, द्वावन्त्यावसाध्यौ मूढगर्भौ, एवमशक्ये शस्त्रमवचारयेत् ||९|| सचेतनं च शस्त्रेण न कथञ्चन दारयेत् | दार्यमाणो हि जननीमात्मानं चैव घातयेत् ||१०|| अविषह्ये विकारे तु श्रेयो गर्भस्य पातनम् | न गर्भिण्या विपर्यासस्तस्मात्प्राप्तं न हापयेत् ||११||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 5 (12-19) · Śloka 20

ততঃ স্ত্রিযমাশ্বাস্য মণ্ডলাগ্রেণাঙ্গুলীশস্ত্রেণ বা শিরো বিদার্য, শিরঃকপালান্যাহৃত্য, শঙ্কুনা গৃহীত্বোরসি কক্ষাযাং বাঽপহরেত্; অভিন্নশিরসমক্ষিকূটে গণ্ডে বা, অংসসংসক্তস্যাংসদেশে বাহূ ছিত্ত্বা, দৃতিমিবাততং বাতপূর্ণোদরং বা বিদার্য নিরস্যান্ত্রাণি শিথিলীভূতমাহরেত্, জঘনসক্তস্য বা জঘনকপালানীতি ||১২|| কিম্বহুনা- যদ্যদঙ্গং হি গর্ভস্য তস্য সজ্জতি তদ্ভিষক্ | সম্যগ্বিনির্হরেচ্ছিত্ত্বা রক্ষেন্নারীং চ যত্নতঃ ||১৩|| গর্ভস্য গতযশ্চিত্রা জাযন্তেঽনিলকোপতঃ | তত্রানল্পমতির্বৈদ্যো বর্তেত বিধিপূর্বকম্ ||১৪|| নোপেক্ষেত মৃতং গর্ভং মুহূর্তমপি পণ্ডিতঃ | স হ্যাশু জননীং হন্তি নিরুচ্ছ্বাসং পশুং যথা ||১৫|| মণ্ডলাগ্রেণ কর্তব্যং ছেদ্যমন্তর্বিজানতা | বৃদ্ধিপত্রং হি তীক্ষ্ণাগ্রং নারীং হিংস্যাত্ কদাচন ||১৬|| অথাপতন্তীমপরাং পাতযেত্ পূর্ববদ্ভিষক্ | হস্তেনাপহরেদ্বাঽপি পার্শ্বভ্যাং পরিপীড্য বা ||১৭|| ধুনুযাচ্চ মুহুর্নারীং পীডযেদ্বাংঽসপিণ্ডিকাম্ | তৈলাক্তযোনেরেবং তাং পাতযেন্মতিমান্ ভিষক্ ||১৮|| এবং নির্হৃতশল্যাং তু সিঞ্চেদুষ্ণেন বারিণা | ততোঽভ্যক্তশরীরাযা যোনৌ স্নেহং নিধাপযেত্ ||১৯|| এবং মৃদ্বী ভবেদ্যোনিস্তচ্ছূলং চোপশাম্যতি |২০|

View original

ततः स्त्रियमाश्वास्य मण्डलाग्रेणाङ्गुलीशस्त्रेण वा शिरो विदार्य, शिरःकपालान्याहृत्य, शङ्कुना गृहीत्वोरसि कक्षायां वाऽपहरेत्; अभिन्नशिरसमक्षिकूटे गण्डे वा, अंससंसक्तस्यांसदेशे बाहू छित्त्वा, दृतिमिवाततं वातपूर्णोदरं वा विदार्य निरस्यान्त्राणि शिथिलीभूतमाहरेत्, जघनसक्तस्य वा जघनकपालानीति ||१२|| किम्बहुना- यद्यदङ्गं हि गर्भस्य तस्य सज्जति तद्भिषक् | सम्यग्विनिर्हरेच्छित्त्वा रक्षेन्नारीं च यत्नतः ||१३|| गर्भस्य गतयश्चित्रा जायन्तेऽनिलकोपतः | तत्रानल्पमतिर्वैद्यो वर्तेत विधिपूर्वकम् ||१४|| नोपेक्षेत मृतं गर्भं मुहूर्तमपि पण्डितः | स ह्याशु जननीं हन्ति निरुच्छ्वासं पशुं यथा ||१५|| मण्डलाग्रेण कर्तव्यं छेद्यमन्तर्विजानता | वृद्धिपत्रं हि तीक्ष्णाग्रं नारीं हिंस्यात् कदाचन ||१६|| अथापतन्तीमपरां पातयेत् पूर्ववद्भिषक् | हस्तेनापहरेद्वाऽपि पार्श्वभ्यां परिपीड्य वा ||१७|| धुनुयाच्च मुहुर्नारीं पीडयेद्वांऽसपिण्डिकाम् | तैलाक्तयोनेरेवं तां पातयेन्मतिमान् भिषक् ||१८|| एवं निर्हृतशल्यां तु सिञ्चेदुष्णेन वारिणा | ततोऽभ्यक्तशरीराया योनौ स्नेहं निधापयेत् ||१९|| एवं मृद्वी भवेद्योनिस्तच्छूलं चोपशाम्यति |२०|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 6 (20-27) · Śloka 28

কৃষ্ণাতন্মূলশুণ্ঠ্যেলাহিঙ্গুভার্গীঃ সদীপ্যকাঃ ||২০|| বচামতিবিষাং রাস্নাং চব্যং সঞ্চূর্ণ্য পাযযেত্ | স্নেহেন দোষস্যন্দার্থং বেদনোপশমায চ ||২১|| ক্বাথং চৈষাং তথা কল্কং চূর্ণং বা স্নেহবর্জিতম্ | শাকত্বগ্ঘিঙ্গ্বতিবিষাপাঠাকটুকরোহিণীঃ ||২২|| তথা তেজোবতীং চাপি পাযযেত্ পূর্ববদ্ভিষক্ | ত্রিরাত্রং পঞ্চসপ্তাহং ততঃ স্নেহং পুনঃ পিবেত্ ||২৩|| পাযযেতাসবং নক্তমরিষ্টং বা সুসংস্কৃতম্ | শিরীষককুভাভ্যাং চ তোযমাচমনে হিতম্ ||২৪|| উপদ্রবাশ্চ যেঽন্যে স্যুস্তান্ যথাস্বমুপাচরেত্ | সর্বতঃ পরিশুদ্ধা চ স্নিগ্ধপথ্যাল্পভোজনা ||২৫|| স্বেদাভ্যঙ্গপরা নিত্যং ভবেত্ ক্রোধবিবর্জিতা | পযো বাতহরৈঃ সিদ্ধং দশাহং ভোজনে হিতম্ ||২৬|| রসং দশাহং শেষে তু যথাযোগমুপাচরেত্ | ব্যুপদ্রবাং বিশুদ্ধাং চ জ্ঞাত্বা চ বরবর্ণিনীম্ ||২৭|| ঊর্ধ্বং চতুর্ভ্যো মাসেভ্যো বিসৃজেত্ পরিহারতঃ |২৮|

View original

कृष्णातन्मूलशुण्ठ्येलाहिङ्गुभार्गीः सदीप्यकाः ||२०|| वचामतिविषां रास्नां चव्यं सञ्चूर्ण्य पाययेत् | स्नेहेन दोषस्यन्दार्थं वेदनोपशमाय च ||२१|| क्वाथं चैषां तथा कल्कं चूर्णं वा स्नेहवर्जितम् | शाकत्वग्घिङ्ग्वतिविषापाठाकटुकरोहिणीः ||२२|| तथा तेजोवतीं चापि पाययेत् पूर्ववद्भिषक् | त्रिरात्रं पञ्चसप्ताहं ततः स्नेहं पुनः पिबेत् ||२३|| पाययेतासवं नक्तमरिष्टं वा सुसंस्कृतम् | शिरीषककुभाभ्यां च तोयमाचमने हितम् ||२४|| उपद्रवाश्च येऽन्ये स्युस्तान् यथास्वमुपाचरेत् | सर्वतः परिशुद्धा च स्निग्धपथ्याल्पभोजना ||२५|| स्वेदाभ्यङ्गपरा नित्यं भवेत् क्रोधविवर्जिता | पयो वातहरैः सिद्धं दशाहं भोजने हितम् ||२६|| रसं दशाहं शेषे तु यथायोगमुपाचरेत् | व्युपद्रवां विशुद्धां च ज्ञात्वा च वरवर्णिनीम् ||२७|| ऊर्ध्वं चतुर्भ्यो मासेभ्यो विसृजेत् परिहारतः |२८|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 7 (28-39) · Śloka 39

যোনিসন্তর্পণেঽভ্যঙ্গে পানে বস্তিষু ভোজনে ||২৮|| বলাতৈলমিদং চাস্যৈ দদ্যাদনিলবারণম্ | বলামূলকষাযস্য দশমূলীশৃতস্য চ ||২৯|| যবকোলকুলত্থানাং ক্বাথস্য পযসস্তথা | অষ্টাবষ্টৌ শুভা ভাগাস্তৈলাদেকস্তদেকতঃ ||৩০|| পচেদাবাপ্য মধুরং গণং সৈন্ধবসংযুতম্ | তথাঽগুরুং সর্জরসং সরলং দেবদারু চ ||৩১|| মঞ্জিষ্ঠাং চন্দনং কুষ্ঠমেলাং কালানুসারিবাম্ | মাংসীং শৈলেযকং পত্রং তগরং সারিবাং বচাম্ ||৩২|| শতাবরীমশ্বগন্ধাং শতপুষ্পাং পুনর্নবাম্ | তত্ সাধুসিদ্ধং সৌবর্ণে রাজতে মৃন্মযেঽপি বা ||৩৩|| প্রক্ষিপ্য কলশে সম্যক্ স্বনুগুপ্তং নিধাপযেত্ | বলাতৈলমিদং খ্যাতং সর্ববাতবিকারনুত্ ||৩৪|| যথাবলমতো মাত্রাং সূতিকাযৈ প্রদাপযেত্ | যা চ গর্ভার্থিনী নারী ক্ষীণশুক্রশ্চ যঃ পুমান্ ||৩৫|| বাতক্ষীণে মর্মহতে মথিতেঽভিহতে তথা | ভগ্নে শ্রমাভিপন্নে চ সর্বথৈবোপযুজ্যতে ||৩৬|| এতদাক্ষেপকাদীন্ বৈ বাতব্যাধীনপোহতি | হিক্কাং কাসমধীমন্থং গুল্মং শ্বাসং চ দুস্তরম্ ||৩৭|| ষণ্মাসানুপযুজ্যৈতদন্ত্রবৃদ্ধিমপোহতি | প্রত্যগ্রধাতুঃ পুরুষো ভবেচ্চ স্থিরযৌবনঃ ||৩৮|| রাজ্ঞামেতদ্ধি কর্তব্যং রাজমাত্রাশ্চ যে নরাঃ | সুখিনঃ সুকুমারাশ্চ ধনিনশ্চাপি যে নরাঃ ||৩৯||

View original

योनिसन्तर्पणेऽभ्यङ्गे पाने बस्तिषु भोजने ||२८|| बलातैलमिदं चास्यै दद्यादनिलवारणम् | बलामूलकषायस्य दशमूलीशृतस्य च ||२९|| यवकोलकुलत्थानां क्वाथस्य पयसस्तथा | अष्टावष्टौ शुभा भागास्तैलादेकस्तदेकतः ||३०|| पचेदावाप्य मधुरं गणं सैन्धवसंयुतम् | तथाऽगुरुं सर्जरसं सरलं देवदारु च ||३१|| मञ्जिष्ठां चन्दनं कुष्ठमेलां कालानुसारिवाम् | मांसीं शैलेयकं पत्रं तगरं सारिवां वचाम् ||३२|| शतावरीमश्वगन्धां शतपुष्पां पुनर्नवाम् | तत् साधुसिद्धं सौवर्णे राजते मृन्मयेऽपि वा ||३३|| प्रक्षिप्य कलशे सम्यक् स्वनुगुप्तं निधापयेत् | बलातैलमिदं ख्यातं सर्ववातविकारनुत् ||३४|| यथाबलमतो मात्रां सूतिकायै प्रदापयेत् | या च गर्भार्थिनी नारी क्षीणशुक्रश्च यः पुमान् ||३५|| वातक्षीणे मर्महते मथितेऽभिहते तथा | भग्ने श्रमाभिपन्ने च सर्वथैवोपयुज्यते ||३६|| एतदाक्षेपकादीन् वै वातव्याधीनपोहति | हिक्कां कासमधीमन्थं गुल्मं श्वासं च दुस्तरम् ||३७|| षण्मासानुपयुज्यैतदन्त्रवृद्धिमपोहति | प्रत्यग्रधातुः पुरुषो भवेच्च स्थिरयौवनः ||३८|| राज्ञामेतद्धि कर्तव्यं राजमात्राश्च ये नराः | सुखिनः सुकुमाराश्च धनिनश्चापि ये नराः ||३९||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 8 (40-43) · Śloka 43

বলাকষাযপীতেভ্যস্তিলেভ্যো বাঽপ্যনেকশঃ | তৈলমুত্পাদ্য তত্ক্বাথশতপাকং কৃতং শুভম্ ||৪০|| নিবাতে নিভৃতাগারে প্রযুঞ্জীত যথাবলম্ | জীর্ণেঽস্মিন্ পযসা স্নিগ্ধমশ্নীযাত্ ষষ্টিকৌদনম্ ||৪১|| অনেন বিধিনা দ্রোণমুপযুজ্যান্নমীরিতম্ | ভুঞ্জীত দ্বিগুণং কালং বলবর্ণান্বিতস্ততঃ ||৪২|| সর্বপাপৈর্বিনির্মুক্তঃ শতাযুঃ পুরুষো ভবেত্ | শতং শতং তথোত্কর্ষো দ্রোণে দ্রোণে প্রকীর্তিতঃ ||৪৩||

View original

बलाकषायपीतेभ्यस्तिलेभ्यो वाऽप्यनेकशः | तैलमुत्पाद्य तत्क्वाथशतपाकं कृतं शुभम् ||४०|| निवाते निभृतागारे प्रयुञ्जीत यथाबलम् | जीर्णेऽस्मिन् पयसा स्निग्धमश्नीयात् षष्टिकौदनम् ||४१|| अनेन विधिना द्रोणमुपयुज्यान्नमीरितम् | भुञ्जीत द्विगुणं कालं बलवर्णान्वितस्ततः ||४२|| सर्वपापैर्विनिर्मुक्तः शतायुः पुरुषो भवेत् | शतं शतं तथोत्कर्षो द्रोणे द्रोणे प्रकीर्तितः ||४३||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 9 (44) · Śloka 45

বলাকল্পেনাতিবলাগুডূচ্যাদিত্যপর্ণিষু | সৈরেযকে বীরতরৌ শতাবর্যাং ত্রিকণ্টকে ||৪৪|| তৈলানি মধুকে কুর্যাত্ প্রসারিণ্যাং চ বুদ্ধিমান্ |৪৫|

View original

बलाकल्पेनातिबलागुडूच्यादित्यपर्णिषु | सैरेयके वीरतरौ शतावर्यां त्रिकण्टके ||४४|| तैलानि मधुके कुर्यात् प्रसारिण्यां च बुद्धिमान् |४५|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 10 (45-47) · Śloka 47

নীলোত্পলং বরীমূলং গব্যে ক্ষীরে বিপাচযেত্ ||৪৫|| শতপাকং ততস্তেন তিলতৈলং পচেদ্ভিষক্ | বলাতৈলস্য কল্কাংস্তু সুপিষ্টাংস্তত্র দাপযেত্ ||৪৬|| সর্বেষামেব জানীযাদুপযোগং চিকিত্সকঃ | বলাতৈলবদেতেষাং গুণাংশ্চৈব বিশেষতঃ ||৪৭||

View original

नीलोत्पलं वरीमूलं गव्ये क्षीरे विपाचयेत् ||४५|| शतपाकं ततस्तेन तिलतैलं पचेद्भिषक् | बलातैलस्य कल्कांस्तु सुपिष्टांस्तत्र दापयेत् ||४६|| सर्वेषामेव जानीयादुपयोगं चिकित्सकः | बलातैलवदेतेषां गुणांश्चैव विशेषतः ||४७||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana puShpikA · Śloka 15

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে মূঢগর্ভচিকিত্সিতং নাম পঞ্চদশোঽধ্যাযঃ ||১৫||

View original

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने मूढगर्भचिकित्सितं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ||१५||

🔊 Audio coming soon

15. mūḍhagarbhacikitsitam — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi