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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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12. pramēhapiḍakācikitsitam

Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 3

অথাতঃ প্রমেহপিডকাচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২|| শরাবিকাদ্যা নব পিডকাঃ প্রাগুক্তাঃ; তাঃ প্রাণবতোঽল্পাস্ত্বঙ্মাংসপ্রাপ্তা মৃদ্ব্যোঽল্পরুজঃ ক্ষিপ্রপাকভেদিন্যশ্চ সাধ্যাঃ ||৩||

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अथातः प्रमेहपिडकाचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२|| शराविकाद्या नव पिडकाः प्रागुक्ताः; ताः प्राणवतोऽल्पास्त्वङ्मांसप्राप्ता मृद्व्योऽल्परुजः क्षिप्रपाकभेदिन्यश्च साध्याः ||३||

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Adhikarana 2 (4) · Śloka 4

তাভিরুপদ্রুতং প্রমেহিণমুপচরেত্ | তত্র পূর্বরূপেষ্বপতর্পণং বনস্পতিকষাযং বস্তমূত্রং চোপদিশেত্; এবমকুর্বতস্তস্য মধুরাহারস্য মূত্রং স্বেদঃ শ্লেষ্মা চ মধুরীভবতি প্রমেহশ্চাভিব্যক্তো ভবতি, তত্রোভযতঃ সংশোধনমাসেবেত; এবমকুর্বতস্তস্য দোষাঃ প্রবৃদ্ধা মাংসশোণিতে প্রদূষ্য শোফং জনযন্ত্যুপদ্রবান্ বা কাংশ্চিত্, তত্রোক্তঃ প্রতীকারঃ সিরামোক্ষশ্চ; এবমকুর্বতস্তস্য শোফো বৃদ্ধোঽতিমাত্রং রুজো বিদাহমাপদ্যতে, তত্র শস্ত্রপ্রণিধানমুক্তং ব্রণক্রিযোপসেবা চ; এবমকুর্বতস্তস্য পূযোঽভ্যন্তরমবদার্যোত্সঙ্গং মহান্তমবকাশং কৃত্বা প্রবৃদ্ধো ভবত্যসাধ্যঃ; তস্মাদাদিত এব প্রমেহিণমুপক্রমেত্ ||৪||

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ताभिरुपद्रुतं प्रमेहिणमुपचरेत् | तत्र पूर्वरूपेष्वपतर्पणं वनस्पतिकषायं बस्तमूत्रं चोपदिशेत्; एवमकुर्वतस्तस्य मधुराहारस्य मूत्रं स्वेदः श्लेष्मा च मधुरीभवति प्रमेहश्चाभिव्यक्तो भवति, तत्रोभयतः संशोधनमासेवेत; एवमकुर्वतस्तस्य दोषाः प्रवृद्धा मांसशोणिते प्रदूष्य शोफं जनयन्त्युपद्रवान् वा कांश्चित्, तत्रोक्तः प्रतीकारः सिरामोक्षश्च; एवमकुर्वतस्तस्य शोफो वृद्धोऽतिमात्रं रुजो विदाहमापद्यते, तत्र शस्त्रप्रणिधानमुक्तं व्रणक्रियोपसेवा च; एवमकुर्वतस्तस्य पूयोऽभ्यन्तरमवदार्योत्सङ्गं महान्तमवकाशं कृत्वा प्रवृद्धो भवत्यसाध्यः; तस्मादादित एव प्रमेहिणमुपक्रमेत् ||४||

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Adhikarana 3 (5) · Śloka 5

ভল্লাতকবিল্বাম্বুপিপ্পলীমূলোদকীর্যাবর্ষাভূপুনর্নবাচিত্রকশটীস্নুহীবরুণকপুষ্করদন্তীপথ্যা দশপলোন্মিতা যবকোলকুলত্থাংশ্চ প্রাস্থিকান্ সলিলদ্রোণে নিষ্ক্বাথ্য চতুর্ভাগাবশিষ্টেঽবতার্য বচাত্রিবৃত্কম্পিল্লকভার্ঙ্গীনিচুলশুণ্ঠীগজপিপ্পলীবিডঙ্গরোধ্রশিরীষাণাং ভাগৈরর্ধপলিকৈর্ধৃতপ্রস্থং বিপাচযেন্মেহশ্বযথুকুষ্ঠগুল্মোদরার্শঃপ্লীহবিদ্রধিপিডকানাং নাশনং নাম্না ধান্বন্তরম্ ||৫||

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भल्लातकबिल्वाम्बुपिप्पलीमूलोदकीर्यावर्षाभूपुनर्नवाचित्रकशटीस्नुहीवरुणकपुष्करदन्तीपथ्या दशपलोन्मिता यवकोलकुलत्थांश्च प्रास्थिकान् सलिलद्रोणे निष्क्वाथ्य चतुर्भागावशिष्टेऽवतार्य वचात्रिवृत्कम्पिल्लकभार्ङ्गीनिचुलशुण्ठीगजपिप्पलीविडङ्गरोध्रशिरीषाणां भागैरर्धपलिकैर्धृतप्रस्थं विपाचयेन्मेहश्वयथुकुष्ठगुल्मोदरार्शःप्लीहविद्रधिपिडकानां नाशनं नाम्ना धान्वन्तरम् ||५||

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Adhikarana 4 (6) · Śloka 6

দুর্বিরেচ্যা হি মধুমেহিনো ভবন্তি মেদোঽভিব্যাপ্তশরীরত্বাত্, তস্মাত্তীক্ষ্ণমেতেষাং শোধনং কুর্বীত | পিডকাপীডিতাঃ সোপদ্রবাঃ সর্ব এব প্রমেহা মূত্রাদিমাধুর্যে মধুগন্ধসামান্যাত্ পারিভাষিকীং মধুমেহাখ্যাং লভন্তে ||৬||

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दुर्विरेच्या हि मधुमेहिनो भवन्ति मेदोऽभिव्याप्तशरीरत्वात्, तस्मात्तीक्ष्णमेतेषां शोधनं कुर्वीत | पिडकापीडिताः सोपद्रवाः सर्व एव प्रमेहा मूत्रादिमाधुर्ये मधुगन्धसामान्यात् पारिभाषिकीं मधुमेहाख्यां लभन्ते ||६||

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Adhikarana 5 (7) · Śloka 7

ন চৈতান্ কথঞ্চিদপি স্বেদযেত্, মেদোবহুত্বাদেতেষাং বিশীর্যতে দেহঃ স্বেদেন ||৭||

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न चैतान् कथञ्चिदपि स्वेदयेत्, मेदोबहुत्वादेतेषां विशीर्यते देहः स्वेदेन ||७||

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Adhikarana 6 (8) · Śloka 8

রসাযনীনাং চ দৌর্বল্যান্নোর্ধ্বমুত্তিষ্ঠন্তি প্রমেহিণাং দোষাঃ, ততো মধুমেহিনামধঃকাযে পিডকাঃ প্রাদুর্ভবন্তি ||৮||

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रसायनीनां च दौर्बल्यान्नोर्ध्वमुत्तिष्ठन्ति प्रमेहिणां दोषाः, ततो मधुमेहिनामधःकाये पिडकाः प्रादुर्भवन्ति ||८||

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Adhikarana 7 (9) · Śloka 9

অপক্বানাং তু পিডকানাং শোফবত্ প্রতীকারঃ, পক্বানাং ব্রণবদিতি; তৈলং তু ব্রণরোপণমেবাদৌ কুর্বীত, আরগ্বধাদিকষাযমুত্সাদনার্থে, শালসারাদিকষাযং পরিষেচনে, পিপ্পল্যাদিকষাযং পানভোজনেষু, পাঠাচিত্রকশার্ঙ্গেষ্টাক্ষুদ্রাবৃহতীসারিবাসোমবল্কসপ্তপর্ণারগ্বধকুটজমূলচূর্ণানি মধুমিশ্রাণি প্রাশ্নীযাত্ ||৯||

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अपक्वानां तु पिडकानां शोफवत् प्रतीकारः, पक्वानां व्रणवदिति; तैलं तु व्रणरोपणमेवादौ कुर्वीत, आरग्वधादिकषायमुत्सादनार्थे, शालसारादिकषायं परिषेचने, पिप्पल्यादिकषायं पानभोजनेषु, पाठाचित्रकशार्ङ्गेष्टाक्षुद्राबृहतीसारिवासोमवल्कसप्तपर्णारग्वधकुटजमूलचूर्णानि मधुमिश्राणि प्राश्नीयात् ||९||

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Adhikarana 8 (10) · Śloka 10

শালসারাদিবর্গকষাযং চতুর্ভাগাবশিষ্টমবতার্য পরিস্রাব্য পুনরুপনীয সাধযেত্, সিধ্যতি চামলকরোধ্রপ্রিযঙ্গুন্দন্তীকৃষ্ণাযস্তাম্রচূর্ণান্যাবপেত্, এতদনুপদগ্ধং লেহীভূতমবতার্যানুগুপ্তং নিদধ্যাত্, ততো যথাযোগমুপযুঞ্জীত, এষ লেহঃ সর্বমেহানাং হন্তা ||১০||

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शालसारादिवर्गकषायं चतुर्भागावशिष्टमवतार्य परिस्राव्य पुनरुपनीय साधयेत्, सिध्यति चामलकरोध्रप्रियङ्गुन्दन्तीकृष्णायस्ताम्रचूर्णान्यावपेत्, एतदनुपदग्धं लेहीभूतमवतार्यानुगुप्तं निदध्यात्, ततो यथायोगमुपयुञ्जीत, एष लेहः सर्वमेहानां हन्ता ||१०||

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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11

ত্রিফলাচিত্রকত্রিকটুকবিডঙ্গমুস্তানাং নব ভাগাস্তাবন্ত এব কৃষ্ণাযশ্চূর্ণস্য, তত্সর্বমৈকধ্যং কৃত্বা যথাযোগং মাত্রাং সর্পির্মধুভ্যাং সংসৃজ্যোপযুঞ্জীত, এতন্নবাযসম্; এতেন জাঠর্যং ন ভবতি, সন্নোঽগ্নিরাপ্যাযতে, দুর্নামশোফপাণ্ডুকুষ্ঠরোগাবিপাককাসশ্বাসপ্রমেহাশ্চ ন ভবন্তি ||১১||

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त्रिफलाचित्रकत्रिकटुकविडङ्गमुस्तानां नव भागास्तावन्त एव कृष्णायश्चूर्णस्य, तत्सर्वमैकध्यं कृत्वा यथायोगं मात्रां सर्पिर्मधुभ्यां संसृज्योपयुञ्जीत, एतन्नवायसम्; एतेन जाठर्यं न भवति, सन्नोऽग्निराप्यायते, दुर्नामशोफपाण्डुकुष्ठरोगाविपाककासश्वासप्रमेहाश्च न भवन्ति ||११||

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Adhikarana 10 (12-19) · Śloka 19

শালসারাদিনির্যূহে চতুর্থাংশাবশেষিতে | পরিস্রুতে ততঃ শীতে মধু মাক্ষিকমাবপেত্ ||১২|| ফাণিতীভাবমাপন্নং গুডং শোধিতমেব চ | শ্লক্ষ্ণপিষ্টানি চূর্ণানি পিপ্পল্যাদিগণস্য চ ||১৩|| ঐকধ্যমাবপেত্ কুম্ভে সংস্কৃতে ঘৃতভাবিতে | পিপ্পলীচূর্ণমধুভিঃ প্রলিপ্তেঽন্তঃশুচৌ দৃঢে ||১৪|| শ্লক্ষ্ণানি তীক্ষ্ণলোহস্য তত্র পত্রাণি বুদ্ধিমান্ | খদিরাঙ্গারতপ্তানি বহুশঃ সন্নিপাতযেত্ ||১৫|| সুপিধানং তু তং কৃত্বা যবপল্লে নিধাপযেত্ | মাসাংস্ত্রীংশ্চতুরোবাঽপি যাবদালোহসঙ্ক্ষযাত্ ||১৬|| ততো জাতরসং তং তু প্রাতঃ প্রাতর্যথাবলম্ | নিষেবেত যথাযোগমাহারং চাস্য কল্পযেত্ ||১৭|| কার্শ্যকৃদ্বলিনামেষ সন্নস্যাগ্নেঃ প্রসাধকঃ | শোফনুদ্গুল্মহৃত্ কুষ্ঠমেহপাণ্ড্বামযাপহঃ ||১৮|| প্লীহোদরহরঃ শীঘ্রং বিষমজ্বরনাশনঃ | অভিষ্যন্দাপহরণো লোহারিষ্টো মহাগুণঃ ||১৯||

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शालसारादिनिर्यूहे चतुर्थांशावशेषिते | परिस्रुते ततः शीते मधु माक्षिकमावपेत् ||१२|| फाणितीभावमापन्नं गुडं शोधितमेव च | श्लक्ष्णपिष्टानि चूर्णानि पिप्पल्यादिगणस्य च ||१३|| ऐकध्यमावपेत् कुम्भे संस्कृते घृतभाविते | पिप्पलीचूर्णमधुभिः प्रलिप्तेऽन्तःशुचौ दृढे ||१४|| श्लक्ष्णानि तीक्ष्णलोहस्य तत्र पत्राणि बुद्धिमान् | खदिराङ्गारतप्तानि बहुशः सन्निपातयेत् ||१५|| सुपिधानं तु तं कृत्वा यवपल्ले निधापयेत् | मासांस्त्रींश्चतुरोवाऽपि यावदालोहसङ्क्षयात् ||१६|| ततो जातरसं तं तु प्रातः प्रातर्यथाबलम् | निषेवेत यथायोगमाहारं चास्य कल्पयेत् ||१७|| कार्श्यकृद्बलिनामेष सन्नस्याग्नेः प्रसाधकः | शोफनुद्गुल्महृत् कुष्ठमेहपाण्ड्वामयापहः ||१८|| प्लीहोदरहरः शीघ्रं विषमज्वरनाशनः | अभिष्यन्दापहरणो लोहारिष्टो महागुणः ||१९||

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Adhikarana 11 (20) · Śloka 20

প্রমেহিণো যদা মূত্রমপিচ্ছিলমনাবিলম্ | বিশদং তিক্তকটুকং তদাঽঽরোগ্যং প্রচক্ষতে ||২০||

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प्रमेहिणो यदा मूत्रमपिच्छिलमनाविलम् | विशदं तिक्तकटुकं तदाऽऽरोग्यं प्रचक्षते ||२०||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 12

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে প্রমেহপিডকাচিকিত্সিতং নাম দ্বাদশোঽধ্যাযঃ ||১২||

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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने प्रमेहपिडकाचिकित्सितं नाम द्वादशोऽध्यायः ||१२||

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