Skip to content
AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
Open navigation
Explore AyurvedaBook appointment

13. madhumēhacikitsitam

Adhikarana 1 (1-4) · Śloka 5

অথাতো মধুমেহচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২|| মধুমেহিত্বমাপন্নং ভিষগ্ভিঃ পরিবর্জিতম্ | যোগেনানেন মতিমান্ প্রমেহিণমুপাচরেত্ ||৩|| মাসে শুক্রে শুচৌ চৈব শৈলাঃ সূর্যাংশুতাপিতাঃ | জতুপ্রকাশং স্বরসং শিলাভ্যঃ প্রস্রবন্তি হি ||৪|| শিলাজত্বিতি বিখ্যাতং সর্বব্যাধিবিনাশনম্ |৫|

View original

अथातो मधुमेहचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२|| मधुमेहित्वमापन्नं भिषग्भिः परिवर्जितम् | योगेनानेन मतिमान् प्रमेहिणमुपाचरेत् ||३|| मासे शुक्रे शुचौ चैव शैलाः सूर्यांशुतापिताः | जतुप्रकाशं स्वरसं शिलाभ्यः प्रस्रवन्ति हि ||४|| शिलाजत्विति विख्यातं सर्वव्याधिविनाशनम् |५|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 2 (5) · Śloka 6

ত্রপ্বাদীনাং তু লোহানাং ষণ্ণামন্যতমান্বযম্ ||৫|| জ্ঞেযং স্বগন্ধতশ্চাপি ষড্যোনি প্রথিতং ক্ষিতৌ |৬|

View original

त्रप्वादीनां तु लोहानां षण्णामन्यतमान्वयम् ||५|| ज्ञेयं स्वगन्धतश्चापि षड्योनि प्रथितं क्षितौ |६|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 3 (6) · Śloka 7

লোহাদ্ভবতি তদ্যস্মাচ্ছিলাজতু জতুপ্রভম্ ||৬|| তস্য লোহস্য তদ্বীর্যং রসং চাপি বিভর্তি তত্ |৭|

View original

लोहाद्भवति तद्यस्माच्छिलाजतु जतुप्रभम् ||६|| तस्य लोहस्य तद्वीर्यं रसं चापि बिभर्ति तत् |७|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 4 (7) · Śloka 8

ত্রপুসীসাযসাদীনি প্রধানান্যুত্তরোত্তরম্ ||৭|| যথা তথা প্রযোগেঽপি শ্রেষ্ঠে শ্রেষ্ঠগুণাঃ স্মৃতাঃ |৮|

View original

त्रपुसीसायसादीनि प्रधानान्युत्तरोत्तरम् ||७|| यथा तथा प्रयोगेऽपि श्रेष्ठे श्रेष्ठगुणाः स्मृताः |८|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 5 (8) · Śloka 9

তত্সর্বং তিক্তকটুকং কষাযানুরসং সরম্ ||৮|| কটুপাক্যুষ্ণবীর্যং চ শোষণং ছেদনং তথা |৯|

View original

तत्सर्वं तिक्तकटुकं कषायानुरसं सरम् ||८|| कटुपाक्युष्णवीर्यं च शोषणं छेदनं तथा |९|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 6 (9) · Śloka 10

তেষু যত্ কৃষ্ণমলঘু স্নিগ্ধং নিঃশর্করং চ যত্ ||৯|| গোমূত্রগন্ধি যচ্চাপি তত্ প্রধানং প্রচক্ষতে |১০|

View original

तेषु यत् कृष्णमलघु स्निग्धं निःशर्करं च यत् ||९|| गोमूत्रगन्धि यच्चापि तत् प्रधानं प्रचक्षते |१०|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 7 (10-16) · Śloka 17

তদ্ভাবিতং সারগণৈর্হৃতদোষো দিনোদযে ||১০|| পিবেত্ সারোদকেনৈব শ্লক্ষ্ণপিষ্টং যথাবলম্ | জাঙ্গলেন রসেনান্নং তস্মিঞ্জীর্ণে তু ভোজযেত্ ||১১|| উপযুজ্য তুলামেবং গিরিজাদমৃতোপমাত্ | বপুর্বর্ণবলোপেতো মধুমেহবিবর্জিতঃ ||১২|| জীবেদ্বর্ষশতং পূর্ণমজরোঽমরসন্নিভঃ | শতং শতং তুলাযাং তু সহস্রং দশতৌলিকে ||১৩|| ভল্লাতকবিধানেন পরিহারবিধিঃ স্মৃতঃ | মেহং কুষ্ঠমপস্মারমুন্মাদং শ্লীপদং গরম্ ||১৪|| শোষং শোফার্শসী গুল্মং পাণ্ডুতাং বিষমজ্বরম্ | অপোহত্যচিরাত্কালাচ্ছিলাজতু নিষেবিতম্ ||১৫|| ন সোঽস্তি রোগো যং চাপি নিহন্যান্ন শিলাজতু | শর্করাং চিরসম্ভূতাং ভিনত্তি চ তথাঽশ্মরীম্ ||১৬|| ভাবনালোডনে চাস্য কর্তব্যে ভেষজৈর্হিতৈঃ |১৭|

View original

तद्भावितं सारगणैर्हृतदोषो दिनोदये ||१०|| पिबेत् सारोदकेनैव श्लक्ष्णपिष्टं यथाबलम् | जाङ्गलेन रसेनान्नं तस्मिञ्जीर्णे तु भोजयेत् ||११|| उपयुज्य तुलामेवं गिरिजादमृतोपमात् | वपुर्वर्णबलोपेतो मधुमेहविवर्जितः ||१२|| जीवेद्वर्षशतं पूर्णमजरोऽमरसन्निभः | शतं शतं तुलायां तु सहस्रं दशतौलिके ||१३|| भल्लातकविधानेन परिहारविधिः स्मृतः | मेहं कुष्ठमपस्मारमुन्मादं श्लीपदं गरम् ||१४|| शोषं शोफार्शसी गुल्मं पाण्डुतां विषमज्वरम् | अपोहत्यचिरात्कालाच्छिलाजतु निषेवितम् ||१५|| न सोऽस्ति रोगो यं चापि निहन्यान्न शिलाजतु | शर्करां चिरसम्भूतां भिनत्ति च तथाऽश्मरीम् ||१६|| भावनालोडने चास्य कर्तव्ये भेषजैर्हितैः |१७|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 8 (17-18) · Śloka 19

এবং চ মাক্ষিকং ধাতুং তাপীজমমৃতোপমম্ ||১৭|| মধুরং কাঞ্চনাভাসমম্লং বা রজতপ্রভম্ | পিবন্ হন্তি জরাকুষ্ঠমেহপাণ্ড্বামযক্ষযান্ ||১৮|| তদ্ভাবিতঃ কপোতাংশ্চ কুলত্থাংশ্চ বিবর্জযেত্ |১৯|

View original

एवं च माक्षिकं धातुं तापीजममृतोपमम् ||१७|| मधुरं काञ्चनाभासमम्लं वा रजतप्रभम् | पिबन् हन्ति जराकुष्ठमेहपाण्ड्वामयक्षयान् ||१८|| तद्भावितः कपोतांश्च कुलत्थांश्च विवर्जयेत् |१९|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 9 (19) · Śloka 20

পঞ্চকর্মগুণাতীতং শ্রদ্ধাবন্তং জিজীবিষুম্ ||১৯|| যোগেনানেন মতিমান্ সাধযেদপি কুষ্ঠিনম্ |২০|

View original

पञ्चकर्मगुणातीतं श्रद्धावन्तं जिजीविषुम् ||१९|| योगेनानेन मतिमान् साधयेदपि कुष्ठिनम् |२०|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 10 (20-34) · Śloka 34

বৃক্ষাস্তুবরকা যে স্যুঃ পশ্চিমার্ণবভূমিষু ||২০|| বীচীতরঙ্গবিক্ষেপমারুতোদ্ধূতপল্লবাঃ | তেষাং ফলানি গৃহ্ণীযাত্ সুপক্বান্যম্বুদাগমে ||২১|| মজ্জাং তেভ্যোঽপি সংহৃত্য শোষযিত্বা বিচূর্ণ্য চ | তিলবত্ পীডযেদ্দ্রোণ্যাং স্রাবযেদ্বা কুসুম্ভবত্ ||২২|| তত্তৈলং সংহৃতং ভূযঃ পচেদাতোযসম্ক্ষযাত্ | অবতার্য করীষে চ পক্ষমাত্রং নিধাপযেত্ ||২৩|| স্নিগ্ধঃ স্বিন্নো হৃতমলঃ পক্ষাদূর্ধ্বং প্রযত্নবান্ | চতুর্থভক্তান্তরিতঃ শুক্লাদৌ দিবসে শুভে ||২৪|| মন্ত্রপূতস্য তৈলস্য পিবেন্মাত্রাং যথাবলম্ | তত্র মন্ত্রং প্রবক্ষ্যামি যেনেদমভিমন্ত্র্যতে ||২৫|| ‘মজ্জসার মহাবীর্য সর্বান্ ধাতূন্ বিশোধয | শঙ্খচক্রগদাপাণিস্ত্বামাজ্ঞাপযতেঽচ্যুতঃ’ ||২৬|| তেনাস্যোর্ধ্বমধশ্চাপি দোষা যান্ত্যসকৃত্ততঃ | অস্নেহলবণাং সাযং যবাগূং শীতলাং পিবেত্ ||২৭|| পঞ্চাহং প্রপিবেত্তৈলমনেন বিধিনা নরঃ | পক্ষং পরিহরেচ্চাপি মুদ্গযূষৌদনাশনঃ ||২৮|| পঞ্চভির্দিবসৈরেবং সর্বকুষ্ঠৈর্বিমুচ্যতে | তদেব খদিরক্বাথে ত্রিগুণে সাধু সাধিতম্ ||২৯|| নিহিতং পূর্ববত্ পক্ষাত্ পিবেন্মাসমতন্দ্রিতঃ | তেনাভ্যক্তশরীরশ্চ কুর্বীতাহারমীরিতম্ ||৩০|| ভিন্নস্বরং রক্তনেত্রং বিশীর্ণং কৃমিভক্ষিতম্ | অনেনাশু প্রযোগেণ সাধযেত্ কুষ্ঠিনং নরম্ ||৩১|| সর্পির্মধুযুতং পীতং তদেব খদিরাম্বুনা | পক্ষিমাংসরসাহারং করোতি দ্বিশতাযুষম্ ||৩২|| তদেব নস্যে পঞ্চাশদ্দিবসানুপযোজিতম্ | বপুষ্মন্তং শ্রুতিধরং করোতি ত্রিশতাযুষম্ ||৩৩|| শোধযন্তি নরং পীতা মজ্জানস্তস্য মাত্রযা | মহাবীর্যস্তুবরকঃ কুষ্ঠমেহাপহঃ পরঃ ||৩৪||

View original

वृक्षास्तुवरका ये स्युः पश्चिमार्णवभूमिषु ||२०|| वीचीतरङ्गविक्षेपमारुतोद्धूतपल्लवाः | तेषां फलानि गृह्णीयात् सुपक्वान्यम्बुदागमे ||२१|| मज्जां तेभ्योऽपि संहृत्य शोषयित्वा विचूर्ण्य च | तिलवत् पीडयेद्द्रोण्यां स्रावयेद्वा कुसुम्भवत् ||२२|| तत्तैलं संहृतं भूयः पचेदातोयसम्क्षयात् | अवतार्य करीषे च पक्षमात्रं निधापयेत् ||२३|| स्निग्धः स्विन्नो हृतमलः पक्षादूर्ध्वं प्रयत्नवान् | चतुर्थभक्तान्तरितः शुक्लादौ दिवसे शुभे ||२४|| मन्त्रपूतस्य तैलस्य पिबेन्मात्रां यथाबलम् | तत्र मन्त्रं प्रवक्ष्यामि येनेदमभिमन्त्र्यते ||२५|| ‘मज्जसार महावीर्य सर्वान् धातून् विशोधय | शङ्खचक्रगदापाणिस्त्वामाज्ञापयतेऽच्युतः’ ||२६|| तेनास्योर्ध्वमधश्चापि दोषा यान्त्यसकृत्ततः | अस्नेहलवणां सायं यवागूं शीतलां पिबेत् ||२७|| पञ्चाहं प्रपिबेत्तैलमनेन विधिना नरः | पक्षं परिहरेच्चापि मुद्गयूषौदनाशनः ||२८|| पञ्चभिर्दिवसैरेवं सर्वकुष्ठैर्विमुच्यते | तदेव खदिरक्वाथे त्रिगुणे साधु साधितम् ||२९|| निहितं पूर्ववत् पक्षात् पिबेन्मासमतन्द्रितः | तेनाभ्यक्तशरीरश्च कुर्वीताहारमीरितम् ||३०|| भिन्नस्वरं रक्तनेत्रं विशीर्णं कृमिभक्षितम् | अनेनाशु प्रयोगेण साधयेत् कुष्ठिनं नरम् ||३१|| सर्पिर्मधुयुतं पीतं तदेव खदिराम्बुना | पक्षिमांसरसाहारं करोति द्विशतायुषम् ||३२|| तदेव नस्ये पञ्चाशद्दिवसानुपयोजितम् | वपुष्मन्तं श्रुतिधरं करोति त्रिशतायुषम् ||३३|| शोधयन्ति नरं पीता मज्जानस्तस्य मात्रया | महावीर्यस्तुवरकः कुष्ठमेहापहः परः ||३४||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 11 (35) · Śloka 35

সান্তর্ধূমস্তস্য মজ্জা তু দগ্ধঃ ক্ষিপ্তস্তৈলে সৈন্ধবং চাঞ্জনং চ | পৈল্ল্যং হন্যাদর্মনক্তান্ধ্যকাচান্ নীলীরোগং তৈমিরং চাঞ্জনেন ||৩৫||

View original

सान्तर्धूमस्तस्य मज्जा तु दग्धः क्षिप्तस्तैले सैन्धवं चाञ्जनं च | पैल्ल्यं हन्यादर्मनक्तान्ध्यकाचान् नीलीरोगं तैमिरं चाञ्जनेन ||३५||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana puShpikA · Śloka 13

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে মধুমেহচিকিত্সিতং নাম ত্রযোদশোঽধ্যাযঃ ||১৩||

View original

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने मधुमेहचिकित्सितं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ||१३||

🔊 Audio coming soon

13. madhumēhacikitsitam — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi