Adhikarana 1 (1-4) · Śloka 5
অথাতো মধুমেহচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
মধুমেহিত্বমাপন্নং ভিষগ্ভিঃ পরিবর্জিতম্ |
যোগেনানেন মতিমান্ প্রমেহিণমুপাচরেত্ ||৩||
মাসে শুক্রে শুচৌ চৈব শৈলাঃ সূর্যাংশুতাপিতাঃ |
জতুপ্রকাশং স্বরসং শিলাভ্যঃ প্রস্রবন্তি হি ||৪||
শিলাজত্বিতি বিখ্যাতং সর্বব্যাধিবিনাশনম্ |৫|
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अथातो मधुमेहचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
मधुमेहित्वमापन्नं भिषग्भिः परिवर्जितम् |
योगेनानेन मतिमान् प्रमेहिणमुपाचरेत् ||३||
मासे शुक्रे शुचौ चैव शैलाः सूर्यांशुतापिताः |
जतुप्रकाशं स्वरसं शिलाभ्यः प्रस्रवन्ति हि ||४||
शिलाजत्विति विख्यातं सर्वव्याधिविनाशनम् |५|
Adhikarana 2 (5) · Śloka 6
ত্রপ্বাদীনাং তু লোহানাং ষণ্ণামন্যতমান্বযম্ ||৫||
জ্ঞেযং স্বগন্ধতশ্চাপি ষড্যোনি প্রথিতং ক্ষিতৌ |৬|
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त्रप्वादीनां तु लोहानां षण्णामन्यतमान्वयम् ||५||
ज्ञेयं स्वगन्धतश्चापि षड्योनि प्रथितं क्षितौ |६|
Adhikarana 3 (6) · Śloka 7
লোহাদ্ভবতি তদ্যস্মাচ্ছিলাজতু জতুপ্রভম্ ||৬||
তস্য লোহস্য তদ্বীর্যং রসং চাপি বিভর্তি তত্ |৭|
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लोहाद्भवति तद्यस्माच्छिलाजतु जतुप्रभम् ||६||
तस्य लोहस्य तद्वीर्यं रसं चापि बिभर्ति तत् |७|
Adhikarana 4 (7) · Śloka 8
ত্রপুসীসাযসাদীনি প্রধানান্যুত্তরোত্তরম্ ||৭||
যথা তথা প্রযোগেঽপি শ্রেষ্ঠে শ্রেষ্ঠগুণাঃ স্মৃতাঃ |৮|
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त्रपुसीसायसादीनि प्रधानान्युत्तरोत्तरम् ||७||
यथा तथा प्रयोगेऽपि श्रेष्ठे श्रेष्ठगुणाः स्मृताः |८|
Adhikarana 5 (8) · Śloka 9
তত্সর্বং তিক্তকটুকং কষাযানুরসং সরম্ ||৮||
কটুপাক্যুষ্ণবীর্যং চ শোষণং ছেদনং তথা |৯|
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तत्सर्वं तिक्तकटुकं कषायानुरसं सरम् ||८||
कटुपाक्युष्णवीर्यं च शोषणं छेदनं तथा |९|
Adhikarana 6 (9) · Śloka 10
তেষু যত্ কৃষ্ণমলঘু স্নিগ্ধং নিঃশর্করং চ যত্ ||৯||
গোমূত্রগন্ধি যচ্চাপি তত্ প্রধানং প্রচক্ষতে |১০|
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तेषु यत् कृष्णमलघु स्निग्धं निःशर्करं च यत् ||९||
गोमूत्रगन्धि यच्चापि तत् प्रधानं प्रचक्षते |१०|
Adhikarana 7 (10-16) · Śloka 17
তদ্ভাবিতং সারগণৈর্হৃতদোষো দিনোদযে ||১০||
পিবেত্ সারোদকেনৈব শ্লক্ষ্ণপিষ্টং যথাবলম্ |
জাঙ্গলেন রসেনান্নং তস্মিঞ্জীর্ণে তু ভোজযেত্ ||১১||
উপযুজ্য তুলামেবং গিরিজাদমৃতোপমাত্ |
বপুর্বর্ণবলোপেতো মধুমেহবিবর্জিতঃ ||১২||
জীবেদ্বর্ষশতং পূর্ণমজরোঽমরসন্নিভঃ |
শতং শতং তুলাযাং তু সহস্রং দশতৌলিকে ||১৩||
ভল্লাতকবিধানেন পরিহারবিধিঃ স্মৃতঃ |
মেহং কুষ্ঠমপস্মারমুন্মাদং শ্লীপদং গরম্ ||১৪||
শোষং শোফার্শসী গুল্মং পাণ্ডুতাং বিষমজ্বরম্ |
অপোহত্যচিরাত্কালাচ্ছিলাজতু নিষেবিতম্ ||১৫||
ন সোঽস্তি রোগো যং চাপি নিহন্যান্ন শিলাজতু |
শর্করাং চিরসম্ভূতাং ভিনত্তি চ তথাঽশ্মরীম্ ||১৬||
ভাবনালোডনে চাস্য কর্তব্যে ভেষজৈর্হিতৈঃ |১৭|
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तद्भावितं सारगणैर्हृतदोषो दिनोदये ||१०||
पिबेत् सारोदकेनैव श्लक्ष्णपिष्टं यथाबलम् |
जाङ्गलेन रसेनान्नं तस्मिञ्जीर्णे तु भोजयेत् ||११||
उपयुज्य तुलामेवं गिरिजादमृतोपमात् |
वपुर्वर्णबलोपेतो मधुमेहविवर्जितः ||१२||
जीवेद्वर्षशतं पूर्णमजरोऽमरसन्निभः |
शतं शतं तुलायां तु सहस्रं दशतौलिके ||१३||
भल्लातकविधानेन परिहारविधिः स्मृतः |
मेहं कुष्ठमपस्मारमुन्मादं श्लीपदं गरम् ||१४||
शोषं शोफार्शसी गुल्मं पाण्डुतां विषमज्वरम् |
अपोहत्यचिरात्कालाच्छिलाजतु निषेवितम् ||१५||
न सोऽस्ति रोगो यं चापि निहन्यान्न शिलाजतु |
शर्करां चिरसम्भूतां भिनत्ति च तथाऽश्मरीम् ||१६||
भावनालोडने चास्य कर्तव्ये भेषजैर्हितैः |१७|
Adhikarana 8 (17-18) · Śloka 19
এবং চ মাক্ষিকং ধাতুং তাপীজমমৃতোপমম্ ||১৭||
মধুরং কাঞ্চনাভাসমম্লং বা রজতপ্রভম্ |
পিবন্ হন্তি জরাকুষ্ঠমেহপাণ্ড্বামযক্ষযান্ ||১৮||
তদ্ভাবিতঃ কপোতাংশ্চ কুলত্থাংশ্চ বিবর্জযেত্ |১৯|
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एवं च माक्षिकं धातुं तापीजममृतोपमम् ||१७||
मधुरं काञ्चनाभासमम्लं वा रजतप्रभम् |
पिबन् हन्ति जराकुष्ठमेहपाण्ड्वामयक्षयान् ||१८||
तद्भावितः कपोतांश्च कुलत्थांश्च विवर्जयेत् |१९|
Adhikarana 9 (19) · Śloka 20
পঞ্চকর্মগুণাতীতং শ্রদ্ধাবন্তং জিজীবিষুম্ ||১৯||
যোগেনানেন মতিমান্ সাধযেদপি কুষ্ঠিনম্ |২০|
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पञ्चकर्मगुणातीतं श्रद्धावन्तं जिजीविषुम् ||१९||
योगेनानेन मतिमान् साधयेदपि कुष्ठिनम् |२०|
Adhikarana 10 (20-34) · Śloka 34
বৃক্ষাস্তুবরকা যে স্যুঃ পশ্চিমার্ণবভূমিষু ||২০||
বীচীতরঙ্গবিক্ষেপমারুতোদ্ধূতপল্লবাঃ |
তেষাং ফলানি গৃহ্ণীযাত্ সুপক্বান্যম্বুদাগমে ||২১||
মজ্জাং তেভ্যোঽপি সংহৃত্য শোষযিত্বা বিচূর্ণ্য চ |
তিলবত্ পীডযেদ্দ্রোণ্যাং স্রাবযেদ্বা কুসুম্ভবত্ ||২২||
তত্তৈলং সংহৃতং ভূযঃ পচেদাতোযসম্ক্ষযাত্ |
অবতার্য করীষে চ পক্ষমাত্রং নিধাপযেত্ ||২৩||
স্নিগ্ধঃ স্বিন্নো হৃতমলঃ পক্ষাদূর্ধ্বং প্রযত্নবান্ |
চতুর্থভক্তান্তরিতঃ শুক্লাদৌ দিবসে শুভে ||২৪||
মন্ত্রপূতস্য তৈলস্য পিবেন্মাত্রাং যথাবলম্ |
তত্র মন্ত্রং প্রবক্ষ্যামি যেনেদমভিমন্ত্র্যতে ||২৫||
‘মজ্জসার মহাবীর্য সর্বান্ ধাতূন্ বিশোধয |
শঙ্খচক্রগদাপাণিস্ত্বামাজ্ঞাপযতেঽচ্যুতঃ’ ||২৬||
তেনাস্যোর্ধ্বমধশ্চাপি দোষা যান্ত্যসকৃত্ততঃ |
অস্নেহলবণাং সাযং যবাগূং শীতলাং পিবেত্ ||২৭||
পঞ্চাহং প্রপিবেত্তৈলমনেন বিধিনা নরঃ |
পক্ষং পরিহরেচ্চাপি মুদ্গযূষৌদনাশনঃ ||২৮||
পঞ্চভির্দিবসৈরেবং সর্বকুষ্ঠৈর্বিমুচ্যতে |
তদেব খদিরক্বাথে ত্রিগুণে সাধু সাধিতম্ ||২৯||
নিহিতং পূর্ববত্ পক্ষাত্ পিবেন্মাসমতন্দ্রিতঃ |
তেনাভ্যক্তশরীরশ্চ কুর্বীতাহারমীরিতম্ ||৩০||
ভিন্নস্বরং রক্তনেত্রং বিশীর্ণং কৃমিভক্ষিতম্ |
অনেনাশু প্রযোগেণ সাধযেত্ কুষ্ঠিনং নরম্ ||৩১||
সর্পির্মধুযুতং পীতং তদেব খদিরাম্বুনা |
পক্ষিমাংসরসাহারং করোতি দ্বিশতাযুষম্ ||৩২||
তদেব নস্যে পঞ্চাশদ্দিবসানুপযোজিতম্ |
বপুষ্মন্তং শ্রুতিধরং করোতি ত্রিশতাযুষম্ ||৩৩||
শোধযন্তি নরং পীতা মজ্জানস্তস্য মাত্রযা |
মহাবীর্যস্তুবরকঃ কুষ্ঠমেহাপহঃ পরঃ ||৩৪||
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वृक्षास्तुवरका ये स्युः पश्चिमार्णवभूमिषु ||२०||
वीचीतरङ्गविक्षेपमारुतोद्धूतपल्लवाः |
तेषां फलानि गृह्णीयात् सुपक्वान्यम्बुदागमे ||२१||
मज्जां तेभ्योऽपि संहृत्य शोषयित्वा विचूर्ण्य च |
तिलवत् पीडयेद्द्रोण्यां स्रावयेद्वा कुसुम्भवत् ||२२||
तत्तैलं संहृतं भूयः पचेदातोयसम्क्षयात् |
अवतार्य करीषे च पक्षमात्रं निधापयेत् ||२३||
स्निग्धः स्विन्नो हृतमलः पक्षादूर्ध्वं प्रयत्नवान् |
चतुर्थभक्तान्तरितः शुक्लादौ दिवसे शुभे ||२४||
मन्त्रपूतस्य तैलस्य पिबेन्मात्रां यथाबलम् |
तत्र मन्त्रं प्रवक्ष्यामि येनेदमभिमन्त्र्यते ||२५||
‘मज्जसार महावीर्य सर्वान् धातून् विशोधय |
शङ्खचक्रगदापाणिस्त्वामाज्ञापयतेऽच्युतः’ ||२६||
तेनास्योर्ध्वमधश्चापि दोषा यान्त्यसकृत्ततः |
अस्नेहलवणां सायं यवागूं शीतलां पिबेत् ||२७||
पञ्चाहं प्रपिबेत्तैलमनेन विधिना नरः |
पक्षं परिहरेच्चापि मुद्गयूषौदनाशनः ||२८||
पञ्चभिर्दिवसैरेवं सर्वकुष्ठैर्विमुच्यते |
तदेव खदिरक्वाथे त्रिगुणे साधु साधितम् ||२९||
निहितं पूर्ववत् पक्षात् पिबेन्मासमतन्द्रितः |
तेनाभ्यक्तशरीरश्च कुर्वीताहारमीरितम् ||३०||
भिन्नस्वरं रक्तनेत्रं विशीर्णं कृमिभक्षितम् |
अनेनाशु प्रयोगेण साधयेत् कुष्ठिनं नरम् ||३१||
सर्पिर्मधुयुतं पीतं तदेव खदिराम्बुना |
पक्षिमांसरसाहारं करोति द्विशतायुषम् ||३२||
तदेव नस्ये पञ्चाशद्दिवसानुपयोजितम् |
वपुष्मन्तं श्रुतिधरं करोति त्रिशतायुषम् ||३३||
शोधयन्ति नरं पीता मज्जानस्तस्य मात्रया |
महावीर्यस्तुवरकः कुष्ठमेहापहः परः ||३४||
Adhikarana 11 (35) · Śloka 35
সান্তর্ধূমস্তস্য মজ্জা তু দগ্ধঃ ক্ষিপ্তস্তৈলে সৈন্ধবং চাঞ্জনং চ |
পৈল্ল্যং হন্যাদর্মনক্তান্ধ্যকাচান্ নীলীরোগং তৈমিরং চাঞ্জনেন ||৩৫||
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सान्तर्धूमस्तस्य मज्जा तु दग्धः क्षिप्तस्तैले सैन्धवं चाञ्जनं च |
पैल्ल्यं हन्यादर्मनक्तान्ध्यकाचान् नीलीरोगं तैमिरं चाञ्जनेन ||३५||
Adhikarana puShpikA · Śloka 13
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে মধুমেহচিকিত্সিতং নাম ত্রযোদশোঽধ্যাযঃ ||১৩||
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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने मधुमेहचिकित्सितं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ||१३||