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32. svēdāvacāraṇīyacikitsitam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ স্বেদাবচারণীযং চিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः स्वेदावचारणीयं चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

চতুর্বিধঃ স্বেদঃ; তদ্যথা- তাপস্বেদ, ঊষ্মস্বেদ, উপনাহস্বেদো, দ্রবস্বেদ ইতি; অত্র সর্বস্বেদবিকল্পাবরোধঃ ||৩||

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चतुर्विधः स्वेदः; तद्यथा- तापस्वेद, ऊष्मस्वेद, उपनाहस्वेदो, द्रवस्वेद इति; अत्र सर्वस्वेदविकल्पावरोधः ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

তত্র তাপস্বেদঃ পাণিকাংস্যকন্দুককপালবালুকাবস্ত্রৈঃ প্রযুজ্যতে, শযানস্য চাঙ্গতাপো বহুশঃ খাদিরাঙ্গারৈরিতি ||৪||

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तत्र तापस्वेदः पाणिकांस्यकन्दुककपालवालुकावस्त्रैः प्रयुज्यते, शयानस्य चाङ्गतापो बहुशः खादिराङ्गारैरिति ||४||

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Adhikarana 4 (5-7) · Śloka 7

ঊষ্মস্বেদস্তু কপালপাষাণেষ্টকালোহপিণ্ডানগ্নিবর্ণানদ্ভিরাসিঞ্চেদম্লদ্রব্যৈর্বা, তৈরার্দ্রালক্তকপরিবেষ্টিতৈরঙ্গপ্রদেশং স্বেদযেত্ | মাংসরসপযোদধিস্নেহধান্যাম্লবাতহরপত্রভঙ্গক্বাথপূর্ণাং বা কুম্ভীমনুতপ্তাং প্রাবৃত্যোষ্মাণং গৃহ্ণীযাত্ | পার্শ্বচ্ছিদ্রেণ বা কুম্ভেনাধোমুখেন তস্যা মুখমভিসন্ধায তস্মিঞ্ছিদ্রে হস্তিশুণ্ডাকারাং নাডীং প্রণিধায তং স্বেদযেত্ ||৫|| সুখোপবিষ্টং স্বভ্যক্তং গুরুপ্রাবরণাবৃতম্ | হস্তিশুণ্ডিকযা নাড্যা স্বেদযেদ্বাতরোগিণম্ | সুখা সর্বাঙ্গগা হ্যেষা ন চ ক্লিশ্নাতি মানবম্ ||৬|| ব্যামার্ধমাত্রা ত্রির্বক্রা হস্তিহস্তসমাকৃতিঃ | স্বেদনার্থে হিতা নাডী কৈলিঞ্জী হস্তিশুণ্ডিকা ||৭||

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ऊष्मस्वेदस्तु कपालपाषाणेष्टकालोहपिण्डानग्निवर्णानद्भिरासिञ्चेदम्लद्रव्यैर्वा, तैरार्द्रालक्तकपरिवेष्टितैरङ्गप्रदेशं स्वेदयेत् | मांसरसपयोदधिस्नेहधान्याम्लवातहरपत्रभङ्गक्वाथपूर्णां वा कुम्भीमनुतप्तां प्रावृत्योष्माणं गृह्णीयात् | पार्श्वच्छिद्रेण वा कुम्भेनाधोमुखेन तस्या मुखमभिसन्धाय तस्मिञ्छिद्रे हस्तिशुण्डाकारां नाडीं प्रणिधाय तं स्वेदयेत् ||५|| सुखोपविष्टं स्वभ्यक्तं गुरुप्रावरणावृतम् | हस्तिशुण्डिकया नाड्या स्वेदयेद्वातरोगिणम् | सुखा सर्वाङ्गगा ह्येषा न च क्लिश्नाति मानवम् ||६|| व्यामार्धमात्रा त्रिर्वक्रा हस्तिहस्तसमाकृतिः | स्वेदनार्थे हिता नाडी कैलिञ्जी हस्तिशुण्डिका ||७||

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Adhikarana 5 (8) · Śloka 9

পুরুষাযামমাত্রাং চ ভূমিমুত্কীর্য খাদিরৈঃ | কাষ্ঠৈর্দগ্ধ্বা তথাঽঽভ্যুক্ষ্য ক্ষীরধান্যাম্লবারিভিঃ ||৮|| পত্রভঙ্গৈরবচ্ছাদ্য শযানং স্বেদযেত্ততঃ |৯|

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पुरुषायाममात्रां च भूमिमुत्कीर्य खादिरैः | काष्ठैर्दग्ध्वा तथाऽऽभ्युक्ष्य क्षीरधान्याम्लवारिभिः ||८|| पत्रभङ्गैरवच्छाद्य शयानं स्वेदयेत्ततः |९|

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Adhikarana 6 (9) · Śloka 9

পূর্ববত্ স্বেদযেদ্দগ্ধ্বা ভস্মাপোহ্যাপি বা শিলাম্ ||৯||

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पूर्ववत् स्वेदयेद्दग्ध्वा भस्मापोह्यापि वा शिलाम् ||९||

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Adhikarana 7 (10) · Śloka 10

পূর্ববত্ কুটীং বা চতুর্দ্বারাং কৃত্বা তস্যামুপবিষ্টস্যান্তশ্চতুর্দ্বারেঽঙ্গারানুপসন্ধায তং স্বেদযেত্ ||১০||

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पूर्ववत् कुटीं वा चतुर्द्वारां कृत्वा तस्यामुपविष्टस्यान्तश्चतुर्द्वारेऽङ्गारानुपसन्धाय तं स्वेदयेत् ||१०||

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Adhikarana 8 (11) · Śloka 11

কোশধান্যানি বা সম্যগুপস্বেদ্যাস্তীর্য কিলিঞ্জেঽন্যস্মিন্ বা তত্প্রতিরূপকে শযানং প্রাবৃত্য স্বেদযেত্; এবং পাংশুগোশকৃত্তুষবুসপলালোষ্মভিঃ স্বেদযেত্ ||১১||

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कोशधान्यानि वा सम्यगुपस्वेद्यास्तीर्य किलिञ्जेऽन्यस्मिन् वा तत्प्रतिरूपके शयानं प्रावृत्य स्वेदयेत्; एवं पांशुगोशकृत्तुषबुसपलालोष्मभिः स्वेदयेत् ||११||

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Adhikarana 9 (12) · Śloka 12

উপনাহস্বেদস্তু বাতহরমূলকল্কৈরম্লপিষ্টৈর্লবণপ্রগাঢৈঃ সুস্নিগ্ধৈঃ সুখোষ্ণৈঃ প্রদিহ্য স্বেদযেত্ | এবং কাকোল্যাদিভিরেলাদিভিঃ সুরসাদিভিস্তিলাতসীসর্ষপকল্কৈঃ কৃশরাপাযসোত্কারিকাভির্বেশবারৈঃ সাল্বণৈর্বা তনুবস্ত্রাবনদ্ধৈঃ স্বেদযেত্ ||১২||

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उपनाहस्वेदस्तु वातहरमूलकल्कैरम्लपिष्टैर्लवणप्रगाढैः सुस्निग्धैः सुखोष्णैः प्रदिह्य स्वेदयेत् | एवं काकोल्यादिभिरेलादिभिः सुरसादिभिस्तिलातसीसर्षपकल्कैः कृशरापायसोत्कारिकाभिर्वेशवारैः साल्वणैर्वा तनुवस्त्रावनद्धैः स्वेदयेत् ||१२||

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Adhikarana 10 (13) · Śloka 13

দ্রবস্বেদস্তু বাতহরদ্রব্যক্বাথপূর্ণে কোষ্ণকটাহে দ্রোণ্যাং বাঽবগাহ্য স্বেদযেত্, এবং পযোমাংসরসযূষতৈলধান্যাম্লঘৃতবসামূত্রেষ্ববগাহেত; এতৈরেব সুখোষ্ণৈঃ কষাযৈশ্চ পরিষিঞ্চেদিতি ||১৩||

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द्रवस्वेदस्तु वातहरद्रव्यक्वाथपूर्णे कोष्णकटाहे द्रोण्यां वाऽवगाह्य स्वेदयेत्, एवं पयोमांसरसयूषतैलधान्याम्लघृतवसामूत्रेष्ववगाहेत; एतैरेव सुखोष्णैः कषायैश्च परिषिञ्चेदिति ||१३||

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Adhikarana 11 (14) · Śloka 14

তত্র তাপোষ্মস্বেদৌ বিশেষতঃ শ্লেষ্মঘ্নৌ, উপনাহস্বেদো বাতঘ্নঃ, অন্যতরস্মিন্ পিত্তসংসৃষ্টে দ্রবস্বেদ ইতি ||১৪||

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तत्र तापोष्मस्वेदौ विशेषतः श्लेष्मघ्नौ, उपनाहस्वेदो वातघ्नः, अन्यतरस्मिन् पित्तसंसृष्टे द्रवस्वेद इति ||१४||

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Adhikarana 12 (15) · Śloka 15

কফমেদোন্বিতে বাযৌ নিবাতাতপগুরুপ্রাবরণনিযুদ্ধাধ্বব্যাযামভারহরণামর্ষৈঃ স্বেদমুত্পাদযেদিতি ||১৫||

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कफमेदोन्विते वायौ निवातातपगुरुप्रावरणनियुद्धाध्वव्यायामभारहरणामर्षैः स्वेदमुत्पादयेदिति ||१५||

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Adhikarana 13 (16) · Śloka 16

ভবন্তি চাত্র- চতুর্বিধো যোঽভিহিতো দ্বিধা স্বেদঃ প্রযুজ্যতে | সর্বস্মিন্নেব দেহে তু দেহস্যাবযবে তথা ||১৬||

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भवन्ति चात्र- चतुर्विधो योऽभिहितो द्विधा स्वेदः प्रयुज्यते | सर्वस्मिन्नेव देहे तु देहस्यावयवे तथा ||१६||

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Adhikarana 14 (17-19) · Śloka 19

যেষাং নস্যং বিধাতব্যং বস্তিশ্চৈব হি দেহিনাম্ | শোধনীযাশ্চ যে কেচিত্ পূর্বং স্বেদ্যাস্তু তে মতাঃ ||১৭|| পশ্চাত্ স্বেদ্যা হৃতে শল্যে মূঢগর্ভাঽনুপদ্রবা | সম্যক্ প্রজাতা কালে যা পশ্চাত্ স্বেদ্যা বিজানতা ||১৮|| স্বেদ্যঃ পূর্বং চ পশ্চাচ্চ ভগন্দর্যর্শসস্তথা | অশ্মর্যা চাতুরো জন্তুঃ শেষাঞ্ছাস্ত্রে প্রচক্ষ্মহে ||১৯||

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येषां नस्यं विधातव्यं बस्तिश्चैव हि देहिनाम् | शोधनीयाश्च ये केचित् पूर्वं स्वेद्यास्तु ते मताः ||१७|| पश्चात् स्वेद्या हृते शल्ये मूढगर्भाऽनुपद्रवा | सम्यक् प्रजाता काले या पश्चात् स्वेद्या विजानता ||१८|| स्वेद्यः पूर्वं च पश्चाच्च भगन्दर्यर्शसस्तथा | अश्मर्या चातुरो जन्तुः शेषाञ्छास्त्रे प्रचक्ष्महे ||१९||

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Adhikarana 15 (20) · Śloka 20

নানভ্যক্তে নাপি চাস্নিগ্ধদেহে স্বেদো যোজ্যঃ স্বেদবিদ্ভিঃ কথঞ্চিত্ | দৃষ্টং লোকে কাষ্ঠমস্নিগ্ধমাশু গচ্ছেদ্ভঙ্গং স্বেদযোগৈর্গৃহীতম্ ||২০||

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नानभ्यक्ते नापि चास्निग्धदेहे स्वेदो योज्यः स्वेदविद्भिः कथञ्चित् | दृष्टं लोके काष्ठमस्निग्धमाशु गच्छेद्भङ्गं स्वेदयोगैर्गृहीतम् ||२०||

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Adhikarana 16 (21) · Śloka 21

স্নেহক্লিন্না ধাতুসংস্থাশ্চ দোষাঃ স্বস্থানস্থা যে চ মার্গেষু লীনাঃ | সম্যক্ স্বেদৈর্যোজিতৈস্তে দ্রবত্বং প্রাপ্তাঃ কোষ্ঠং শোধনৈর্যান্ত্যশেষম্ ||২১||

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स्नेहक्लिन्ना धातुसंस्थाश्च दोषाः स्वस्थानस्था ये च मार्गेषु लीनाः | सम्यक् स्वेदैर्योजितैस्ते द्रवत्वं प्राप्ताः कोष्ठं शोधनैर्यान्त्यशेषम् ||२१||

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Adhikarana 17 (22) · Śloka 22

অগ্নের্দীপ্তিং মার্দবং ত্বক্প্রসাদং ভক্তশ্রদ্ধাং স্রোতসাং নির্মলত্বম্ | কুর্যাত্ স্বেদো হন্তি নিদ্রাং সতন্দ্রাং সন্ধীন্ স্তব্ধাংশ্চেষ্টযেদাশু যুক্তঃ ||২২||

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अग्नेर्दीप्तिं मार्दवं त्वक्प्रसादं भक्तश्रद्धां स्रोतसां निर्मलत्वम् | कुर्यात् स्वेदो हन्ति निद्रां सतन्द्रां सन्धीन् स्तब्धांश्चेष्टयेदाशु युक्तः ||२२||

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Adhikarana 18 (23-24) · Śloka 24

স্বেদাস্রাবো ব্যাধিহানির্লঘুত্বং শীতার্থিত্বং মার্দবং চাতুরস্য | সম্যক্স্বিন্নে লক্ষণং প্রাহুরেতন্মিথ্যাস্বিন্নে ব্যত্যযেনৈতদেব ||২৩|| স্বিন্নেঽত্যর্থং সন্ধিপীডা বিদাহঃ স্ফোটোত্পত্তিঃ পিত্তরক্তপ্রকোপঃ | মূর্চ্ছা ভ্রান্তির্দাহতৃষ্ণে ক্লমশ্চ কুর্যাত্তূর্ণং তত্র শীতং বিধানম্ ||২৪||

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स्वेदास्रावो व्याधिहानिर्लघुत्वं शीतार्थित्वं मार्दवं चातुरस्य | सम्यक्स्विन्ने लक्षणं प्राहुरेतन्मिथ्यास्विन्ने व्यत्ययेनैतदेव ||२३|| स्विन्नेऽत्यर्थं सन्धिपीडा विदाहः स्फोटोत्पत्तिः पित्तरक्तप्रकोपः | मूर्च्छा भ्रान्तिर्दाहतृष्णे क्लमश्च कुर्यात्तूर्णं तत्र शीतं विधानम् ||२४||

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Adhikarana 19 (25) · Śloka 26

পাণ্ডুর্মেহী পিত্তরক্তী ক্ষযার্তঃ ক্ষামোঽজীর্ণী চোদরার্তো বিষার্তঃ | তৃড্চ্ছর্দ্যার্তো গর্ভিণী পীতমদ্যো নৈতে স্বেদ্যা যশ্চ মর্ত্যোঽতিসারী | স্বেদাদেষাং যান্তি দেহা বিনাশং নোসাধ্যত্বং যান্তি চৈষাং বিকারাঃ ||২৫|| স্বেদৈঃ সাধ্যো দুর্বলোঽজীর্ণভক্তঃ স্যাতাং চেদ্দ্বৌ স্বেদনীযৌ ততস্তৌ |২৬|

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पाण्डुर्मेही पित्तरक्ती क्षयार्तः क्षामोऽजीर्णी चोदरार्तो विषार्तः | तृड्च्छर्द्यार्तो गर्भिणी पीतमद्यो नैते स्वेद्या यश्च मर्त्योऽतिसारी | स्वेदादेषां यान्ति देहा विनाशं नोसाध्यत्वं यान्ति चैषां विकाराः ||२५|| स्वेदैः साध्यो दुर्बलोऽजीर्णभक्तः स्यातां चेद्द्वौ स्वेदनीयौ ततस्तौ |२६|

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Adhikarana 20 (26-29) · Śloka 29

এতেষাং স্বেদসাধ্যা যে ব্যাধযস্তেষু বুদ্ধিমান্ | মৃদূন্ স্বেদান্ প্রযুঞ্জীত তথা হৃন্মুষ্কদৃষ্টিষু ||২৬|| সর্বান্ স্বেদান্নিবাতে চ জীর্ণান্নস্যাবচারযেত্ | স্নেহাভ্যক্তশরীরস্য শীতৈরাচ্ছাদ্য চক্ষুষী ||২৭|| স্বিদ্যমানস্য চ মুহুর্হৃদযং শীতলৈঃ স্পৃশেত্ | সম্যক্স্বিন্নং বিমৃদিতং স্নাতমুষ্ণাম্বুভিঃ শনৈঃ ||২৮|| স্বভ্যক্তং প্রাবৃতাঙ্গং চ নিবাতশরণস্থিতম্ | ভোজযেদনভিষ্যন্দি সর্বং চাচারমাদিশেত্ ||২৯||

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एतेषां स्वेदसाध्या ये व्याधयस्तेषु बुद्धिमान् | मृदून् स्वेदान् प्रयुञ्जीत तथा हृन्मुष्कदृष्टिषु ||२६|| सर्वान् स्वेदान्निवाते च जीर्णान्नस्यावचारयेत् | स्नेहाभ्यक्तशरीरस्य शीतैराच्छाद्य चक्षुषी ||२७|| स्विद्यमानस्य च मुहुर्हृदयं शीतलैः स्पृशेत् | सम्यक्स्विन्नं विमृदितं स्नातमुष्णाम्बुभिः शनैः ||२८|| स्वभ्यक्तं प्रावृताङ्गं च निवातशरणस्थितम् | भोजयेदनभिष्यन्दि सर्वं चाचारमादिशेत् ||२९||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 32

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে স্বেদাবচারণীযং চিকিত্সিতং নাম দ্বাত্রিংশোঽধ্যাযঃ ||৩২||

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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने स्वेदावचारणीयं चिकित्सितं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ||३२||

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32. svēdāvacāraṇīyacikitsitam — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi