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33. vamanavirēcanasādhyōpadravacikitsitam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো বমনবিরেচনসাধ্যোপদ্রবচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो वमनविरेचनसाध्योपद्रवचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

দোষাঃ ক্ষীণা বৃংহযিতব্যাঃ, কুপিতাঃ প্রশমযিতব্যাঃ, বৃদ্ধা নির্হর্তব্যাঃ, সমাঃ পরিপাল্যা ইতি সিদ্ধান্তঃ ||৩||

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दोषाः क्षीणा बृंहयितव्याः, कुपिताः प्रशमयितव्याः, वृद्धा निर्हर्तव्याः, समाः परिपाल्या इति सिद्धान्तः ||३||

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Adhikarana 3 (4-5) · Śloka 5

প্রাধান্যেন বমনবিরেচনে বর্তেতে নির্হরণে দোষাণাম্ | তস্মাত্তযোর্বিধানমুচ্যমানমুপধারয ||৪|| অথাতুরং স্নিগ্ধং স্বিন্নমভিষ্যন্দিভিরাহারৈরনববদ্ধদোষমবলোক্য শ্বো বমনং পাযযিতাঽস্মীতি সম্ভোজযেত্তীক্ষ্ণাগ্নিং বলবন্তং বহুদোষং মহাব্যাধিপরীতং বমনসাত্ম্যং চ ||৫||

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प्राधान्येन वमनविरेचने वर्तेते निर्हरणे दोषाणाम् | तस्मात्तयोर्विधानमुच्यमानमुपधारय ||४|| अथातुरं स्निग्धं स्विन्नमभिष्यन्दिभिराहारैरनवबद्धदोषमवलोक्य श्वो वमनं पाययिताऽस्मीति सम्भोजयेत्तीक्ष्णाग्निं बलवन्तं बहुदोषं महाव्याधिपरीतं वमनसात्म्यं च ||५||

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Adhikarana 4 (6-7) · Śloka 7

ভবতি চাত্র- পেশলৈর্বিবিধৈরন্নৈর্দোষানুত্ক্লেশ্য দেহিনঃ | স্নিগ্ধস্বিন্নায বমনং দত্তং সম্যক্ প্রবর্ততে ||৬|| অথাপরেদ্যুঃ পূর্বাহ্ণে সাধারণে কালে বমনদ্রব্যকষাযকল্কচূর্ণস্নেহানামন্যতমস্য মাত্রাং পাযযিত্বা বামযেদ্যথাযোগং কোষ্ঠবিশেষমবেক্ষ্য; অসাত্ম্যবীভত্সদুর্গন্ধদুর্দর্শনানি চ বমনানি বিদধ্যাত্, অতো বিপরীতানি বিরেচনানি; তত্র সুকুমারং কৃশং বালং বৃদ্ধং ভীরুং বা বমনসাধ্যেষু বিকারেষু ক্ষীরদধিতক্রযবাগূনামন্যতমমাকণ্ঠং পাযযেত্, পীতৌষধং চ পাণিভিরগ্নিতপ্তৈঃ প্রতাপ্যমানং মুহূর্তমুপেক্ষেত; তস্য চ স্বেদপ্রাদুর্ভাবেণ শিথিলতামাপন্নং স্বেভ্যঃ স্থানেভ্যঃ প্রচলিতং কুক্ষিমনুসৃতং জানীযাত্, ততঃ প্রবৃত্তহৃল্লাসং জ্ঞাত্বা জানুমাত্রাসনোপবিষ্টমাপ্তৈর্ললাটে পৃষ্ঠে পার্শ্বযোঃ কণ্ঠে চ পাণিভিঃ সুপরিগৃহীতমঙ্গুলীগন্ধর্বহস্তোত্পলনালানামন্যতমেন কণ্ঠমভিস্পৃশন্তং বামযেত্তাবদ্যাবত্ সম্যগ্বান্তলিঙ্গানীতি ||৭||

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भवति चात्र- पेशलैर्विविधैरन्नैर्दोषानुत्क्लेश्य देहिनः | स्निग्धस्विन्नाय वमनं दत्तं सम्यक् प्रवर्तते ||६|| अथापरेद्युः पूर्वाह्णे साधारणे काले वमनद्रव्यकषायकल्कचूर्णस्नेहानामन्यतमस्य मात्रां पाययित्वा वामयेद्यथायोगं कोष्ठविशेषमवेक्ष्य; असात्म्यबीभत्सदुर्गन्धदुर्दर्शनानि च वमनानि विदध्यात्, अतो विपरीतानि विरेचनानि; तत्र सुकुमारं कृशं बालं वृद्धं भीरुं वा वमनसाध्येषु विकारेषु क्षीरदधितक्रयवागूनामन्यतममाकण्ठं पाययेत्, पीतौषधं च पाणिभिरग्नितप्तैः प्रताप्यमानं मुहूर्तमुपेक्षेत; तस्य च स्वेदप्रादुर्भावेण शिथिलतामापन्नं स्वेभ्यः स्थानेभ्यः प्रचलितं कुक्षिमनुसृतं जानीयात्, ततः प्रवृत्तहृल्लासं ज्ञात्वा जानुमात्रासनोपविष्टमाप्तैर्ललाटे पृष्ठे पार्श्वयोः कण्ठे च पाणिभिः सुपरिगृहीतमङ्गुलीगन्धर्वहस्तोत्पलनालानामन्यतमेन कण्ठमभिस्पृशन्तं वामयेत्तावद्यावत् सम्यग्वान्तलिङ्गानीति ||७||

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Adhikarana 5 (8) · Śloka 8

ভবতশ্চাত্র- কফপ্রসেকং হৃদযাবিশুদ্ধিং কণ্ডূং চ দুশ্ছর্দিতলিঙ্গমাহুঃ | পিত্তাতিযোগং চ বিসঞ্জ্ঞতাং চ হৃত্কণ্ঠপীডামপি চাতিবান্তে ||৮||

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भवतश्चात्र- कफप्रसेकं हृदयाविशुद्धिं कण्डूं च दुश्छर्दितलिङ्गमाहुः | पित्तातियोगं च विसञ्ज्ञतां च हृत्कण्ठपीडामपि चातिवान्ते ||८||

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Adhikarana 6 (9) · Śloka 9

পিত্তে কফস্যানু সুখং প্রবৃত্তে শুদ্ধেষু হৃত্কণ্ঠশিরঃসু চাপি | লঘৌ চ দেহে কফসংস্রবে চ স্থিতে সুবান্তং পুরুষং ব্যবস্যেত্ ||৯||

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पित्ते कफस्यानु सुखं प्रवृत्ते शुद्धेषु हृत्कण्ठशिरःसु चापि | लघौ च देहे कफसंस्रवे च स्थिते सुवान्तं पुरुषं व्यवस्येत् ||९||

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Adhikarana 7 (10) · Śloka 10

সম্যগ্বান্তং চৈনমভিসমীক্ষ্য স্নেহনবিরেচনশমনানাং ধূমানামন্যতমং সামর্থ্যতঃ পাযযিত্বাঽঽচারিকমাদিশেত্ ||১০||

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सम्यग्वान्तं चैनमभिसमीक्ष्य स्नेहनविरेचनशमनानां धूमानामन्यतमं सामर्थ्यतः पाययित्वाऽऽचारिकमादिशेत् ||१०||

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Adhikarana 8 (11) · Śloka 11

ভবন্তি চাত্র- ততোঽপরাহ্ণে শুচিশুদ্ধদেহমুষ্ণাভিরদ্ভিঃ পরিষিক্তগাত্রম্ | কুলত্থমুদ্গাঢকিজাঙ্গলানাং যূষৈ রসৈর্বাঽপ্যুপভোজযেত্তু ||১১||

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भवन्ति चात्र- ततोऽपराह्णे शुचिशुद्धदेहमुष्णाभिरद्भिः परिषिक्तगात्रम् | कुलत्थमुद्गाढकिजाङ्गलानां यूषै रसैर्वाऽप्युपभोजयेत्तु ||११||

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Adhikarana 9 (12) · Śloka 12

কাসোপলেপস্বরভেদনিদ্রাতন্দ্রাস্যদৌর্গন্ধ্যবিষোপসর্গাঃ | কফপ্রসেকগ্রহণীপ্রদোষা ন সন্তি জন্তোর্বমতঃ কদাচিত্ ||১২||

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कासोपलेपस्वरभेदनिद्रातन्द्रास्यदौर्गन्ध्यविषोपसर्गाः | कफप्रसेकग्रहणीप्रदोषा न सन्ति जन्तोर्वमतः कदाचित् ||१२||

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Adhikarana 10 (13) · Śloka 13

ছিন্নে তরৌ পুষ্পফলপ্ররোহা যথা বিনাশং সহসা ব্রজন্তি | তথা হৃতে শ্লেষ্মণি শোধনেন তজ্জা বিকারাঃ প্রশমং প্রযান্তি ||১৩||

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छिन्ने तरौ पुष्पफलप्ररोहा यथा विनाशं सहसा व्रजन्ति | तथा हृते श्लेष्मणि शोधनेन तज्जा विकाराः प्रशमं प्रयान्ति ||१३||

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Adhikarana 11 (14-15) · Śloka 15

ন বামযেত্তৈমিরিকোর্ধ্ববাতগুল্মোদরপ্লীহকৃমিশ্রমার্তান্ | স্থূলক্ষতক্ষীণকৃশাতিবৃদ্ধমূত্রাতুরান্ কেবলবাতরোগান্ ||১৪|| স্বরোপঘাতাধ্যযনপ্রসক্তদুশ্ছর্দিদুঃকোষ্ঠতৃডার্তবালান্ | ঊর্ধ্বাস্রপিত্তিক্ষুধিতাতিরূক্ষগর্ভিণ্যুদাবর্তিনিরূহিতাংশ্চ ||১৫||

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न वामयेत्तैमिरिकोर्ध्ववातगुल्मोदरप्लीहकृमिश्रमार्तान् | स्थूलक्षतक्षीणकृशातिवृद्धमूत्रातुरान् केवलवातरोगान् ||१४|| स्वरोपघाताध्ययनप्रसक्तदुश्छर्दिदुःकोष्ठतृडार्तबालान् | ऊर्ध्वास्रपित्तिक्षुधितातिरूक्षगर्भिण्युदावर्तिनिरूहितांश्च ||१५||

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Adhikarana 12 (16) · Śloka 16

অবম্যবমনাদ্রোগাঃ কৃচ্ছ্রতাং যান্তি দেহিনাম্ | অসাধ্যতাং বা গচ্ছন্তি নৈতে বাম্যাস্ততঃ স্মৃতাঃ ||১৬||

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अवम्यवमनाद्रोगाः कृच्छ्रतां यान्ति देहिनाम् | असाध्यतां वा गच्छन्ति नैते वाम्यास्ततः स्मृताः ||१६||

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Adhikarana 13 (17) · Śloka 17

এতেঽপ্যজীর্ণব্যথিতা বাম্যা যে চ বিষাতুরাঃ | অতীব চোল্বণকফাস্তে চ স্যুর্মধুকাম্বুনা ||১৭||

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एतेऽप्यजीर्णव्यथिता वाम्या ये च विषातुराः | अतीव चोल्बणकफास्ते च स्युर्मधुकाम्बुना ||१७||

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Adhikarana 14 (18) · Śloka 18

বাম্যাস্তু- বিষশোষস্তন্যদোষমন্দাগ্ন্যুন্মাদাপস্মারশ্লীপদার্বুদবিদারিকামেদোমেহগরজ্বরারুচ্যপচ্যামাতীসারহৃদ্রোগ- চিত্তবিভ্রমবিসর্পবিদ্রধ্যজীর্ণমুখপ্রসেকহৃল্লাসশ্বাসকাসপীনসপূতীনাসকণ্ঠৌষ্ঠবক্ত্রপাক- কর্ণস্রাবাধিজিহ্বোপজিহ্বিকাগলশুণ্ডিকাধঃশোণিতপিত্তিনঃ কফস্থানজেষু বিকারেষ্বন্যে চ কফব্যাধিপরীতা ইতি ||১৮||

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वाम्यास्तु- विषशोषस्तन्यदोषमन्दाग्न्युन्मादापस्मारश्लीपदार्बुदविदारिकामेदोमेहगरज्वरारुच्यपच्यामातीसारहृद्रोग- चित्तविभ्रमविसर्पविद्रध्यजीर्णमुखप्रसेकहृल्लासश्वासकासपीनसपूतीनासकण्ठौष्ठवक्त्रपाक- कर्णस्रावाधिजिह्वोपजिह्विकागलशुण्डिकाधःशोणितपित्तिनः कफस्थानजेषु विकारेष्वन्ये च कफव्याधिपरीता इति ||१८||

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Adhikarana 15 (19) · Śloka 19

বিরেচনমপি স্নিগ্ধস্বিন্নায বান্তায চ দেযম্; অবান্তস্য হি সম্যগ্বিরীক্তস্যাপি সতোঽধঃ স্রস্তঃ শ্লেষ্মা গ্রহণীং ছাদযতি, গৌরবমাপাদযতি, প্রবাহিকাং বা জনযতি ||১৯||

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विरेचनमपि स्निग्धस्विन्नाय वान्ताय च देयम्; अवान्तस्य हि सम्यग्विरीक्तस्यापि सतोऽधः स्रस्तः श्लेष्मा ग्रहणीं छादयति, गौरवमापादयति, प्रवाहिकां वा जनयति ||१९||

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Adhikarana 16 (20) · Śloka 20

অথাতুরং শ্বো বিরেচনং পাযযিতাঽস্মীতি পূর্বাহ্ণে লঘু ভোজযেত্, ফলাম্লমুষ্ণোদকং চৈনমনুপাযযেত্ | অথাপরেঽহনি বিগতশ্লেষ্মধাতুমাতুরোপক্রমণীযাদবেক্ষ্যাতুরমথাস্মৈ ঔষধমাত্রাং পাতুং প্রযচ্ছেত্ ||২০||

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अथातुरं श्वो विरेचनं पाययिताऽस्मीति पूर्वाह्णे लघु भोजयेत्, फलाम्लमुष्णोदकं चैनमनुपाययेत् | अथापरेऽहनि विगतश्लेष्मधातुमातुरोपक्रमणीयादवेक्ष्यातुरमथास्मै औषधमात्रां पातुं प्रयच्छेत् ||२०||

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Adhikarana 17 (21-22) · Śloka 22

তত্র মৃদুঃ, ক্রূরো, মধ্যম ইতি ত্রিবিধঃ কোষ্ঠো ভবতি | তত্র বহুপিত্তো মৃদুঃ, স দুগ্ধেনাপি বিরিচ্যতে; বহুবাতশ্লেষ্মা ক্রূরঃ, স দুর্বিরেচ্যঃ; সমদোষো মধ্যমঃ, স সাধারণ ইতি | তত্র মৃদৌ মাত্রা মৃদ্বী, তীক্ষ্ণা ক্রূরে, মধ্যে মধ্যা কর্তব্যেতি | পীতৌষধশ্চ তন্মনাঃ শয্যাভ্যাশে বিরেচ্যতে ||২১|| বিরেচনং পীতবাংস্তু ন বেগান্ ধারযেদ্বুধঃ | নিবাতশাযী শীতাম্বু ন স্পৃশেন্ন প্রবাহযেত্ ||২২||

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तत्र मृदुः, क्रूरो, मध्यम इति त्रिविधः कोष्ठो भवति | तत्र बहुपित्तो मृदुः, स दुग्धेनापि विरिच्यते; बहुवातश्लेष्मा क्रूरः, स दुर्विरेच्यः; समदोषो मध्यमः, स साधारण इति | तत्र मृदौ मात्रा मृद्वी, तीक्ष्णा क्रूरे, मध्ये मध्या कर्तव्येति | पीतौषधश्च तन्मनाः शय्याभ्याशे विरेच्यते ||२१|| विरेचनं पीतवांस्तु न वेगान् धारयेद्बुधः | निवातशायी शीताम्बु न स्पृशेन्न प्रवाहयेत् ||२२||

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Adhikarana 18 (23) · Śloka 23

যথা চ বমনে প্রসেকৌষধকফপিত্তানিলাঃ ক্রমেণ গচ্ছন্তি, এবং বিরেচনে মূত্রপুরীষপিত্তৌষধকফা ইতি ||২৩||

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यथा च वमने प्रसेकौषधकफपित्तानिलाः क्रमेण गच्छन्ति, एवं विरेचने मूत्रपुरीषपित्तौषधकफा इति ||२३||

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Adhikarana 19 (24) · Śloka 24

ভবন্তি চাত্র- হৃত্কুক্ষ্যশুদ্ধিঃ পরিদাহকণ্ডূবিণ্মূত্রসঙ্গাশ্চ ন সদ্বিরিক্তে | মূর্চ্ছাগুদভ্রংশকফাতিযোগাঃ শূলোদ্গমশ্চাতিবিরিক্তলিঙ্গম্ ||২৪||

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भवन्ति चात्र- हृत्कुक्ष्यशुद्धिः परिदाहकण्डूविण्मूत्रसङ्गाश्च न सद्विरिक्ते | मूर्च्छागुदभ्रंशकफातियोगाः शूलोद्गमश्चातिविरिक्तलिङ्गम् ||२४||

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Adhikarana 20 (25) · Śloka 25

গতেষু দোষেষু কফান্বিতেষু নাভ্যা লঘুত্বে মনসশ্চ তুষ্টৌ | গতেঽনিলে চাপ্যনুলোমভাবং সম্যগ্বিরিক্তং মনুজং ব্যবস্যেত্ ||২৫||

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गतेषु दोषेषु कफान्वितेषु नाभ्या लघुत्वे मनसश्च तुष्टौ | गतेऽनिले चाप्यनुलोमभावं सम्यग्विरिक्तं मनुजं व्यवस्येत् ||२५||

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Adhikarana 21 (26) · Śloka 26

মন্দাগ্নিমক্ষীণমসদ্বিরীক্তং ন পাযযেতাহনি তত্র পেযাম্ | ক্ষীণং তৃষার্তং সুবিরেচিতং চ তন্বীং সুখোষ্ণাং লঘু পাযযেচ্চ ||২৬||

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मन्दाग्निमक्षीणमसद्विरीक्तं न पाययेताहनि तत्र पेयाम् | क्षीणं तृषार्तं सुविरेचितं च तन्वीं सुखोष्णां लघु पाययेच्च ||२६||

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Adhikarana 22 (27) · Śloka 27

বুদ্ধেঃ প্রসাদং বলমিন্দ্রিযাণাং ধাতুস্থিরত্বং বলমগ্নিদীপ্তিম্ | চিরাচ্চ পাকং বযসঃ করোতি বিরেচনং সম্যগুপাস্যমানম্ ||২৭||

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बुद्धेः प्रसादं बलमिन्द्रियाणां धातुस्थिरत्वं बलमग्निदीप्तिम् | चिराच्च पाकं वयसः करोति विरेचनं सम्यगुपास्यमानम् ||२७||

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Adhikarana 23 (28) · Śloka 28

যথৌদকানামুদকেঽপনীতে চরস্থিরাণাং ভবতি প্রণাশঃ | পিত্তে হৃতে ত্বেবমুপদ্রবাণাং পিত্তাত্মকানাং ভবতি প্রণাশঃ ||২৮||

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यथौदकानामुदकेऽपनीते चरस्थिराणां भवति प्रणाशः | पित्ते हृते त्वेवमुपद्रवाणां पित्तात्मकानां भवति प्रणाशः ||२८||

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Adhikarana 24 (29-30) · Śloka 31

মন্দাগ্ন্যতিস্নেহিতবালবৃদ্ধস্থূলাঃ ক্ষতক্ষীণভযোপতপ্তাঃ | শ্রান্তস্তৃষার্তোঽপরিজীর্ণভক্তো গর্ভিণ্যধো গচ্ছতি যস্য চাসৃক্ ||২৯|| নবপ্রবিশ্যাযমদাত্যযী চ নবজ্বরী যা চ নবপ্রসৃতা | শল্যার্দিতাশ্চাপ্যবিরেচনীযাঃ স্নেহাদিভির্যে ত্বনুপস্কৃতাশ্চ ||৩০|| অত্যর্থপিত্তাভিপরীতদেহান্ বিরেচযেত্তানপি মন্দমন্দম্ |৩১|

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मन्दाग्न्यतिस्नेहितबालवृद्धस्थूलाः क्षतक्षीणभयोपतप्ताः | श्रान्तस्तृषार्तोऽपरिजीर्णभक्तो गर्भिण्यधो गच्छति यस्य चासृक् ||२९|| नवप्रविश्यायमदात्ययी च नवज्वरी या च नवप्रसृता | शल्यार्दिताश्चाप्यविरेचनीयाः स्नेहादिभिर्ये त्वनुपस्कृताश्च ||३०|| अत्यर्थपित्ताभिपरीतदेहान् विरेचयेत्तानपि मन्दमन्दम् |३१|

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Adhikarana 25 (31) · Śloka 31

বিরেচনৈর্যান্তি নরা বিনাশমজ্ঞপ্রযুক্তৈরবিরেচনীযাঃ ||৩১||

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विरेचनैर्यान्ति नरा विनाशमज्ञप्रयुक्तैरविरेचनीयाः ||३१||

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Adhikarana 26 (32) · Śloka 32

বিরেচ্যাস্তু- জ্বরগরারুচ্যর্শোঽর্বুদোদরগ্রন্থিবিদ্গাধিপাণ্ডুরোগাপস্মারহৃদ্রোগবাতরক্তভগন্দরচ্ছর্দিযোনিরোগবিসর্প- গুল্মপক্বাশযরুগ্বিবন্ধবিসূচিকালসকমূত্রাঘাতকুষ্ঠবিস্ফোটকপ্রমেহানাহপ্লীহশোফবৃদ্ধিশস্ত্রক্ষতক্ষারাগ্নিদগ্ধ- দুষ্টব্রণাক্ষিপাককাচতিমিরাভিষ্যন্দশিরঃকর্ণাক্ষিনাসাস্যগুদমেঢ্রদাহোর্ধ্বরক্তপিত্তকৃমিকোষ্ঠিনঃ পিত্তস্থানজেষ্বন্যেষু চ বিকারেষ্বন্যে চ পৈত্তিকব্যাধিপরীতা ইতি ||৩২||

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विरेच्यास्तु- ज्वरगरारुच्यर्शोऽर्बुदोदरग्रन्थिविद्गाधिपाण्डुरोगापस्मारहृद्रोगवातरक्तभगन्दरच्छर्दियोनिरोगविसर्प- गुल्मपक्वाशयरुग्विबन्धविसूचिकालसकमूत्राघातकुष्ठविस्फोटकप्रमेहानाहप्लीहशोफवृद्धिशस्त्रक्षतक्षाराग्निदग्ध- दुष्टव्रणाक्षिपाककाचतिमिराभिष्यन्दशिरःकर्णाक्षिनासास्यगुदमेढ्रदाहोर्ध्वरक्तपित्तकृमिकोष्ठिनः पित्तस्थानजेष्वन्येषु च विकारेष्वन्ये च पैत्तिकव्याधिपरीता इति ||३२||

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Adhikarana 27 (33) · Śloka 33

সরত্বসৌক্ষ্ম্যতৈক্ষ্ণ্যৌষ্ণ্যবিকাশিত্বৈর্বিরেচনম্ | বমনং তু হরেদ্দোষং প্রকৃত্যা গতমন্যথা ||৩৩||

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सरत्वसौक्ष्म्यतैक्ष्ण्यौष्ण्यविकाशित्वैर्विरेचनम् | वमनं तु हरेद्दोषं प्रकृत्या गतमन्यथा ||३३||

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Adhikarana 28 (34) · Śloka 34

যাত্যধো দোষমাদায পচ্যমানং বিরেচনম্ | গুণোত্কর্ষাদ্ব্রজত্যূর্ধ্বমপক্বং বমনং পুনঃ ||৩৪||

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यात्यधो दोषमादाय पच्यमानं विरेचनम् | गुणोत्कर्षाद्व्रजत्यूर्ध्वमपक्वं वमनं पुनः ||३४||

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Adhikarana 29 (35) · Śloka 35

মৃদুকোষ্ঠস্য দীপ্তাগ্নেরতিতীক্ষ্ণং বিরেচনম্ | ন সম্যঙ্গির্হরেদ্দোষানতিবেগপ্রধাবিতম্ ||৩৫||

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मृदुकोष्ठस्य दीप्ताग्नेरतितीक्ष्णं विरेचनम् | न सम्यङ्गिर्हरेद्दोषानतिवेगप्रधावितम् ||३५||

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Adhikarana 30 (36) · Śloka 36

পীতং যদৌষধং প্রাতর্ভুক্তপাকসমে ক্ষণে | পক্তিং গচ্ছতি দোষাংশ্চ নির্হরেত্তত্ প্রশস্যতে ||৩৬||

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पीतं यदौषधं प्रातर्भुक्तपाकसमे क्षणे | पक्तिं गच्छति दोषांश्च निर्हरेत्तत् प्रशस्यते ||३६||

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Adhikarana 31 (37) · Śloka 37

দুর্বলস্য চলান্ দোষানল্পানল্পান্ পুনঃ পুনঃ | হরেত্ প্রভূতানল্পাংস্তু শমযেত্ প্রচ্যুতানপি ||৩৭||

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दुर्बलस्य चलान् दोषानल्पानल्पान् पुनः पुनः | हरेत् प्रभूतानल्पांस्तु शमयेत् प्रच्युतानपि ||३७||

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Adhikarana 32 (38) · Śloka 38

হরেদ্দোষাংশ্চলান্ পক্বান্ বলিনো দুর্বলস্য বা | চলা হ্যুপেক্ষিতা দোষাঃ ক্লেশযেযুশ্চিরং নরম্ ||৩৮||

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हरेद्दोषांश्चलान् पक्वान् बलिनो दुर्बलस्य वा | चला ह्युपेक्षिता दोषाः क्लेशयेयुश्चिरं नरम् ||३८||

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Adhikarana 33 (39) · Śloka 39

মন্দাগ্নিং ক্রূরকোষ্ঠং চ সক্ষারলবণৈর্ঘৃতৈঃ | সন্ধুক্ষিতাগ্নিং স্নিগ্ধং চ স্বিন্নং চৈব বিরেচযেত্ ||৩৯||

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मन्दाग्निं क्रूरकोष्ठं च सक्षारलवणैर्घृतैः | सन्धुक्षिताग्निं स्निग्धं च स्विन्नं चैव विरेचयेत् ||३९||

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Adhikarana 34 (40) · Śloka 40

স্নিগ্ধস্বিন্নস্য ভৈষজ্যৈর্দোষস্তূত্ক্লেশিতো বলাত্ | নিলীযতে ন মার্গেষু স্নিগ্ধে ভাণ্ড ইবোদকম্ ||৪০||

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स्निग्धस्विन्नस्य भैषज्यैर्दोषस्तूत्क्लेशितो बलात् | निलीयते न मार्गेषु स्निग्धे भाण्ड इवोदकम् ||४०||

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Adhikarana 35 (41) · Śloka 41

ন চাতিস্নেহপীতস্তু পিবেত্ স্নেহবিরেচনম্ | দোষাঃ প্রচলিতাঃ স্থানাদ্ভূযঃ শ্লিষ্যন্তি বর্ত্মসু ||৪১||

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न चातिस्नेहपीतस्तु पिबेत् स्नेहविरेचनम् | दोषाः प्रचलिताः स्थानाद्भूयः श्लिष्यन्ति वर्त्मसु ||४१||

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Adhikarana 36 (42) · Śloka 42

বিষাভিঘাতপিডকাশোফপাণ্ডুবিসর্পিণঃ | নাতিস্নিগ্ধা বিশোধ্যাঃ স্যুস্তথা কুষ্ঠিপ্রমেহিণঃ ||৪২||

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विषाभिघातपिडकाशोफपाण्डुविसर्पिणः | नातिस्निग्धा विशोध्याः स्युस्तथा कुष्ठिप्रमेहिणः ||४२||

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Adhikarana 37 (43) · Śloka 43

বিরূক্ষ্য স্নেহসাত্ম্যং তু ভূযঃ সংস্নেহ্য শোধযেত্ | তেন দোষা হৃতাস্তস্য ভবন্তি বলবর্ধনাঃ ||৪৩||

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विरूक्ष्य स्नेहसात्म्यं तु भूयः संस्नेह्य शोधयेत् | तेन दोषा हृतास्तस्य भवन्ति बलवर्धनाः ||४३||

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Adhikarana 38 (44) · Śloka 44

প্রাগপীতং নরং শোধ্যং পাযযেতৌষধং মৃদু | ততো বিজ্ঞাতকোষ্ঠস্য কার্যং সংশোধনং পুনঃ ||৪৪||

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प्रागपीतं नरं शोध्यं पाययेतौषधं मृदु | ततो विज्ञातकोष्ठस्य कार्यं संशोधनं पुनः ||४४||

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Adhikarana 39 (45) · Śloka 45

সুখং দৃষ্টফলং হৃদ্যমল্পমাত্রং মহাগুণম্ | ব্যাপত্স্বল্পাত্যযং চাপি পিবেন্নৃপতিরৌষধম্ ||৪৫||

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सुखं दृष्टफलं हृद्यमल्पमात्रं महागुणम् | व्यापत्स्वल्पात्ययं चापि पिबेन्नृपतिरौषधम् ||४५||

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Adhikarana 40 (46) · Śloka 46

স্নেহস্বেদাবনভ্যস্য যস্তু সংশোধনং পিবেত্ | দারু শুষ্কমিবানামে দেহস্তস্য বিশীর্যতে ||৪৬||

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स्नेहस्वेदावनभ्यस्य यस्तु संशोधनं पिबेत् | दारु शुष्कमिवानामे देहस्तस्य विशीर्यते ||४६||

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Adhikarana 41 (47) · Śloka 47

স্নেহস্বেদপ্রচলিতা রসৈঃ স্নিগ্ধৈরুদীরিতাঃ | দোষাঃ কোষ্ঠগতা জন্তোঃ সুখা হর্তুং বিশোধনৈঃ ||৪৭||

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स्नेहस्वेदप्रचलिता रसैः स्निग्धैरुदीरिताः | दोषाः कोष्ठगता जन्तोः सुखा हर्तुं विशोधनैः ||४७||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 33

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে বমনবিরেচনসাধ্যোপদ্রবচিকিত্সিতং নাম ত্রযস্ত্রিংশোঽধ্যাযঃ ||৩৩||

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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने वमनविरेचनसाध्योपद्रवचिकित्सितं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ||३३||

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