Adhikarana 1 (1-4) · Śloka 4
অথাতো বাতব্যাধিচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
আমাশযগতে বাতে চ্ছর্দযিত্বা যথাক্রমম্ |
দেযঃ ষড্ধরণো যোগঃ সপ্তরাত্রং সুখাম্বুনা ||৩||
চিত্রকেন্দ্রযবে পাঠা কটুকাঽতিবিষাঽভযা |
বাতব্যাধিপ্রশমনো যোগঃ ষড্ধরণঃ স্মৃতঃ ||৪||
View original
अथातो वातव्याधिचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
आमाशयगते वाते च्छर्दयित्वा यथाक्रमम् |
देयः षड्धरणो योगः सप्तरात्रं सुखाम्बुना ||३||
चित्रकेन्द्रयवे पाठा कटुकाऽतिविषाऽभया |
वातव्याधिप्रशमनो योगः षड्धरणः स्मृतः ||४||
Adhikarana 2 (5) · Śloka 5
পক্বাশযগতে চাপি দেযং স্নেহবিরেচনম্ |
বস্তযঃ শোধনীযাশ্চ প্রাশাশ্চ লবণোত্তরাঃ ||৫||
View original
पक्वाशयगते चापि देयं स्नेहविरेचनम् |
बस्तयः शोधनीयाश्च प्राशाश्च लवणोत्तराः ||५||
Adhikarana 3 (6) · Śloka 6
কার্যো বস্তিগতে চাপি বিধির্বস্তিবিশোধনঃ |৬|
View original
कार्यो बस्तिगते चापि विधिर्बस्तिविशोधनः |६|
Adhikarana 4 (6) · Śloka 6
শ্রোত্রাদিষু প্রকুপিতে কার্যশ্চানিলহা ক্রমঃ ||৬||
View original
श्रोत्रादिषु प्रकुपिते कार्यश्चानिलहा क्रमः ||६||
Adhikarana 5 (7) · Śloka 7
স্নেহাভ্যঙ্গোপনাহাশ্চ মর্দনালেপনানি চ |
ত্বঙ্মাংসাসৃক্সিরাপ্রাপ্তে কুর্যাত্ চাসৃগ্বিমোক্ষণম্ ||৭||
View original
स्नेहाभ्यङ्गोपनाहाश्च मर्दनालेपनानि च |
त्वङ्मांसासृक्सिराप्राप्ते कुर्यात् चासृग्विमोक्षणम् ||७||
Adhikarana 6 (8) · Śloka 8
স্নেহোপনাহাগ্নিকর্মবন্ধনোন্মর্দনানি চ |
স্নাযুসন্ধ্যস্থিসম্প্রাপ্তে কুর্যাদ্বাযাবতন্দ্রিতঃ ||৮||
View original
स्नेहोपनाहाग्निकर्मबन्धनोन्मर्दनानि च |
स्नायुसन्ध्यस्थिसम्प्राप्ते कुर्याद्वायावतन्द्रितः ||८||
Adhikarana 7 (9) · Śloka 9
নিরুদ্ধেঽস্থনি বা বাযৌ পাণিমন্থেন দারিতে |
নাডীং দত্ত্বাঽস্থনি ভিষক্ চূষযেত্পবনং বলী ||৯||
View original
निरुद्धेऽस्थनि वा वायौ पाणिमन्थेन दारिते |
नाडीं दत्त्वाऽस्थनि भिषक् चूषयेत्पवनं बली ||९||
Adhikarana 8 (10) · Śloka 10
শুক্রপ্রাপ্তেঽনিলে কার্যং শুক্রদোষচিকিত্সিতম্ |১০|
View original
शुक्रप्राप्तेऽनिले कार्यं शुक्रदोषचिकित्सितम् |१०|
Adhikarana 9 (10-11) · Śloka 11
অবগাহকুটীকর্ষূপ্রস্তরাভ্যঙ্গবস্তিভিঃ ||১০||
জযেত্ সর্বাঙ্গজং বাতং সিরামোক্ষৈশ্চ বুদ্ধিমান্ |
একাঙ্গগং চ মতিমাঞ্ছৃঙ্গৈশ্চাবস্থিতং জযেত্ ||১১||
View original
अवगाहकुटीकर्षूप्रस्तराभ्यङ्गबस्तिभिः ||१०||
जयेत् सर्वाङ्गजं वातं सिरामोक्षैश्च बुद्धिमान् |
एकाङ्गगं च मतिमाञ्छृङ्गैश्चावस्थितं जयेत् ||११||
Adhikarana 10 (12) · Śloka 12
বলাসপিত্তরক্তৈস্তু সংসৃষ্টমবিরোধিভিঃ |১২|
View original
बलासपित्तरक्तैस्तु संसृष्टमविरोधिभिः |१२|
Adhikarana 11 (12) · Śloka 13
সুপ্তিবাতে ত্বসৃঙ্মোক্ষং কুর্যাত্তু বহুশো ভিষক্ ||১২||
দিহ্যাচ্চ লবণাগারধূমৈস্তৈলসমন্বিতৈঃ |১৩|
View original
सुप्तिवाते त्वसृङ्मोक्षं कुर्यात्तु बहुशो भिषक् ||१२||
दिह्याच्च लवणागारधूमैस्तैलसमन्वितैः |१३|
Adhikarana 12 (13) · Śloka 14
পঞ্চমূলীশৃতং ক্ষীরং ফলাম্লো রস এব চ ||১৩||
সুস্নিগ্ধো ধান্যযূষো বা হিতো বাতবিকারিণাম্ |১৪|
View original
पञ्चमूलीशृतं क्षीरं फलाम्लो रस एव च ||१३||
सुस्निग्धो धान्ययूषो वा हितो वातविकारिणाम् |१४|
Adhikarana 13 (14-15) · Śloka 16
কাকোল্যাদিঃ সবাতঘ্নঃ সর্বাম্লদ্রব্যসংযুতঃ ||১৪||
সানূপৌদকমাংসস্তু সর্বস্নেহসমন্বিতঃ |
সুখোষ্ণঃ স্পষ্টলবণঃ সাল্বণঃ পরিকীর্তিতঃ ||১৫||
তেনোপনাহং কুর্বীত সর্বদা বাতরোগিণাম্ |১৬|
View original
काकोल्यादिः सवातघ्नः सर्वाम्लद्रव्यसंयुतः ||१४||
सानूपौदकमांसस्तु सर्वस्नेहसमन्वितः |
सुखोष्णः स्पष्टलवणः साल्वणः परिकीर्तितः ||१५||
तेनोपनाहं कुर्वीत सर्वदा वातरोगिणाम् |१६|
Adhikarana 14 (16-17) · Śloka 18
কুঞ্চ্যমানং রুজার্তং বা গাত্রং স্তব্ধমথাপি বা ||১৬||
গাঢং পট্টৈর্নিবধ্নীযাত্ ক্ষৌমকার্পাসিকৌর্ণিকৈঃ |
বিডালনকুলোন্দ্রাণাং চর্মগোণ্যাং মৃগস্য বা ||১৭||
প্রবেশযেদ্বা স্বভ্যক্তং সাল্বণেনোপনাহিতম্ |১৮|
View original
कुञ्च्यमानं रुजार्तं वा गात्रं स्तब्धमथापि वा ||१६||
गाढं पट्टैर्निबध्नीयात् क्षौमकार्पासिकौर्णिकैः |
बिडालनकुलोन्द्राणां चर्मगोण्यां मृगस्य वा ||१७||
प्रवेशयेद्वा स्वभ्यक्तं साल्वणेनोपनाहितम् |१८|
Adhikarana 15 (18) · Śloka 19
স্কন্ধবক্ষস্ত্রিকপ্রাপ্তং বাযুং মন্যাগতং তথা ||১৮||
বমনং হন্তি নস্যং চ কুশলেন প্রযোজিতম্ |১৯|
View original
स्कन्धवक्षस्त्रिकप्राप्तं वायुं मन्यागतं तथा ||१८||
वमनं हन्ति नस्यं च कुशलेन प्रयोजितम् |१९|
Adhikarana 16 (19) · Śloka 20
শিরোগতং শিরোবস্তির্হন্তি বাঽসৃগ্বিমোক্ষণম্ ||১৯||
স্নেহং মাত্রাসহস্রং তু ধারযেত্তত্র যোগতঃ |২০|
View original
शिरोगतं शिरोबस्तिर्हन्ति वाऽसृग्विमोक्षणम् ||१९||
स्नेहं मात्रासहस्रं तु धारयेत्तत्र योगतः |२०|
Adhikarana 17 (20) · Śloka 21
সর্বাঙ্গগতমেকাঙ্গস্থিতং বাঽপি সমীরণম্ ||২০||
রুণদ্ধি কেবলো বস্তির্বাযুবেগমিবাচলঃ |২১|
View original
सर्वाङ्गगतमेकाङ्गस्थितं वाऽपि समीरणम् ||२०||
रुणद्धि केवलो बस्तिर्वायुवेगमिवाचलः |२१|
Adhikarana 18 (21-26) · Śloka 26
স্নেহস্বেদস্তথাঽভ্যঙ্গো বস্তিঃ স্নেহবিরেচনম্ ||২১||
শিরোবস্তিঃ শিরঃস্নেহো ধূমঃ স্নৈহিক এব চ |
সুখোষ্ণঃ স্নেহগণ্ডূষো নস্যং স্নৈহিকমেব চ ||২২||
রসাঃ ক্ষীরাণি মাংসানি স্নেহাঃ স্নেহান্বিতং চ যত্ |
ভোজনানি ফলাম্লানি স্নিগ্ধানি লবণানি চ ||২৩||
সুখোষ্ণাশ্চ পরীষেকাস্তথা সংবাহনানি চ |
কুঙ্কুমাগুরুপত্রাণি কুষ্ঠৈলাতগরাণি চ ||২৪||
কৌশেযৌর্ণিকরৌমাণি কার্পাসানি গুরূণি চ |
নিবাতাতপযুক্তানি তথা গর্ভগৃহাণি চ ||২৫||
মৃদ্বী শয্যাঽগ্নিসন্তাপো ব্রহ্মচর্যং তথৈব চ |
সমাসেনৈবমাদীনি যোজ্যান্যনিলরোগিষু ||২৬||
View original
स्नेहस्वेदस्तथाऽभ्यङ्गो बस्तिः स्नेहविरेचनम् ||२१||
शिरोबस्तिः शिरःस्नेहो धूमः स्नैहिक एव च |
सुखोष्णः स्नेहगण्डूषो नस्यं स्नैहिकमेव च ||२२||
रसाः क्षीराणि मांसानि स्नेहाः स्नेहान्वितं च यत् |
भोजनानि फलाम्लानि स्निग्धानि लवणानि च ||२३||
सुखोष्णाश्च परीषेकास्तथा संवाहनानि च |
कुङ्कुमागुरुपत्राणि कुष्ठैलातगराणि च ||२४||
कौशेयौर्णिकरौमाणि कार्पासानि गुरूणि च |
निवातातपयुक्तानि तथा गर्भगृहाणि च ||२५||
मृद्वी शय्याऽग्निसन्तापो ब्रह्मचर्यं तथैव च |
समासेनैवमादीनि योज्यान्यनिलरोगिषु ||२६||
Adhikarana 19 (27) · Śloka 27
ত্রিবৃদ্দন্তীসুবর্ণক্ষীরীসপ্তলাশঙ্খিনীত্রিফলাবিডঙ্গানামক্ষসমাঃ ভাগাঃ , বিল্বমাত্রঃ কল্কস্তিল্বকমূলকম্পিল্লকযোঃ, ত্রিফলারসদধিপাত্রে দ্বে দ্বে, ঘৃতপাত্রমেকং, তদৈকধ্যং সংসৃজ্য বিপচেত্; তিল্বকসর্পিরেতত্ স্নেহবিরেচনমুপদিশন্তি বাতরোগিষু |
তিল্বকবিধিরেবাশোকরম্যকযোর্দ্রষ্টব্যঃ ||২৭||
View original
त्रिवृद्दन्तीसुवर्णक्षीरीसप्तलाशङ्खिनीत्रिफलाविडङ्गानामक्षसमाः भागाः , बिल्वमात्रः कल्कस्तिल्वकमूलकम्पिल्लकयोः, त्रिफलारसदधिपात्रे द्वे द्वे, घृतपात्रमेकं, तदैकध्यं संसृज्य विपचेत्; तिल्वकसर्पिरेतत् स्नेहविरेचनमुपदिशन्ति वातरोगिषु |
तिल्वकविधिरेवाशोकरम्यकयोर्द्रष्टव्यः ||२७||
Adhikarana 20 (28) · Śloka 28
তিলপরিপীডনোপকরণকাষ্ঠান্যাহৃত্যানল্পকালং তৈলপরিপীতান্যণূনি খণ্ডশঃ কল্পযিত্বাঽবক্ষুদ্য মহতি কটাহে পানীযেনাভিপ্লাব্য ক্বাথযেত্, ততঃ স্নেহমম্বুপৃষ্ঠাদ্যদুদেতি তত্ সরকপাণ্যোরন্যতরেণাদায বাতঘ্নৌষধপ্রতীবাপং স্নেহপাককল্পেন বিপচেত্, এতদণুতৈলমুপদিশন্তি বাতরোগিষু; অণুভ্যস্তৈলদ্রব্যেভ্যো নিষ্পাদ্যত ইত্যণুতৈলম্ ||২৮||
View original
तिलपरिपीडनोपकरणकाष्ठान्याहृत्यानल्पकालं तैलपरिपीतान्यणूनि खण्डशः कल्पयित्वाऽवक्षुद्य महति कटाहे पानीयेनाभिप्लाव्य क्वाथयेत्, ततः स्नेहमम्बुपृष्ठाद्यदुदेति तत् सरकपाण्योरन्यतरेणादाय वातघ्नौषधप्रतीवापं स्नेहपाककल्पेन विपचेत्, एतदणुतैलमुपदिशन्ति वातरोगिषु; अणुभ्यस्तैलद्रव्येभ्यो निष्पाद्यत इत्यणुतैलम् ||२८||
Adhikarana 21 (29) · Śloka 29
অথ মহাপঞ্চমূলকাষ্ঠৈর্বহুভিরবদহ্যাবনিপ্রদেশমসিতমুষিতমেকরাত্রমুপশান্তেঽগ্নাবপোহ্য ভস্ম নিবৃত্তাং ভূমিং বিদারিগন্ধাদিসিদ্ধেন তৈলঘটশতেন তুল্যপযসাঽভিষিচ্যৈকরাত্রমবস্থাপ্য ততো যাবতী মৃত্তিকা স্নিগ্ধা স্যাত্তামাদাযোষ্ণোদকেন মহতি কটাহেঽভ্যাসিঞ্চেত্, তত্র যত্তৈলমুত্তিষ্ঠেত্তত্ পাণিভ্যাং পর্যাদায স্বনুগুপ্তং নিদধ্যাত্; ততস্তৈলং বাতহরৌষধক্বাথমাংসরসক্ষীরাম্লভাগসহস্রেণ সহস্রপাকং বিপচেদ্যাবতা কালেন শক্নুযাত্ পক্তুং, প্রতিবাপশ্চাত্র হৈমবতা দক্ষিণাপথগাশ্চ গন্ধা বাতঘ্নানি চ, তস্মিন্ সিধ্যতি শঙ্খানাধ্মাপযেদ্দুন্দুভীনাঘাতযেচ্ছত্রং ধারযেদ্বালব্যজনৈশ্চ বীজযেদ্ব্রাহ্মণসহস্রং ভোজযেত্, তত্ সাধু সিদ্ধমবতার্য সৌবর্ণে রাজতে মৃন্মযে বা পাত্রে স্বনুগুপ্তং নিদধ্যাত্, তদেতত্ সহস্রপাকমপ্রতিবারবীর্যং রাজার্হং তৈলম্; এবং ভাগশতবিপক্বং শতপাকম্ ||২৯||
View original
अथ महापञ्चमूलकाष्ठैर्बहुभिरवदह्यावनिप्रदेशमसितमुषितमेकरात्रमुपशान्तेऽग्नावपोह्य भस्म निवृत्तां भूमिं विदारिगन्धादिसिद्धेन तैलघटशतेन तुल्यपयसाऽभिषिच्यैकरात्रमवस्थाप्य ततो यावती मृत्तिका स्निग्धा स्यात्तामादायोष्णोदकेन महति कटाहेऽभ्यासिञ्चेत्, तत्र यत्तैलमुत्तिष्ठेत्तत् पाणिभ्यां पर्यादाय स्वनुगुप्तं निदध्यात्; ततस्तैलं वातहरौषधक्वाथमांसरसक्षीराम्लभागसहस्रेण सहस्रपाकं विपचेद्यावता कालेन शक्नुयात् पक्तुं, प्रतिवापश्चात्र हैमवता दक्षिणापथगाश्च गन्धा वातघ्नानि च, तस्मिन् सिध्यति शङ्खानाध्मापयेद्दुन्दुभीनाघातयेच्छत्रं धारयेद्बालव्यजनैश्च वीजयेद्ब्राह्मणसहस्रं भोजयेत्, तत् साधु सिद्धमवतार्य सौवर्णे राजते मृन्मये वा पात्रे स्वनुगुप्तं निदध्यात्, तदेतत् सहस्रपाकमप्रतिवारवीर्यं राजार्हं तैलम्; एवं भागशतविपक्वं शतपाकम् ||२९||
Adhikarana 22 (30) · Śloka 30
গন্ধর্বহস্তমুষ্ককনক্তমালাটরূষকপূতীকারগ্বধচিত্রকাদীনাং পত্রাণ্যার্দ্রাণি লবণেন সহোদূখলেঽবক্ষুদ্য স্নেহঘটে প্রক্ষিপ্যাবলিপ্য গোশকৃদ্ভির্দাহযেত্; এতত্পত্রলবণমুপদিশন্তি বাতরোগেষু ||৩০||
View original
गन्धर्वहस्तमुष्ककनक्तमालाटरूषकपूतीकारग्वधचित्रकादीनां पत्राण्यार्द्राणि लवणेन सहोदूखलेऽवक्षुद्य स्नेहघटे प्रक्षिप्यावलिप्य गोशकृद्भिर्दाहयेत्; एतत्पत्रलवणमुपदिशन्ति वातरोगेषु ||३०||
Adhikarana 23 (31) · Śloka 31
এবং স্নুহীকাণ্ডবার্তাকুশিগ্রুলবণানি সঙ্ক্ষুদ্য ঘটং পূরযিত্বা সর্পিস্তৈলবসামজ্জভিঃ প্রক্ষিপ্যাবলিপ্য গোশকৃদ্ভির্দাহযেত্; এতত্ স্নেহলবণমুপদিশন্তি বাতরোগেষু |
(ইতি কাণ্ডলবণম্) ||৩১||
View original
एवं स्नुहीकाण्डवार्ताकुशिग्रुलवणानि सङ्क्षुद्य घटं पूरयित्वा सर्पिस्तैलवसामज्जभिः प्रक्षिप्यावलिप्य गोशकृद्भिर्दाहयेत्; एतत् स्नेहलवणमुपदिशन्ति वातरोगेषु |
(इति काण्डलवणम्) ||३१||
Adhikarana 24 (32) · Śloka 32
গণ্ডীরপলাশকুটজবিল্বার্কস্নুহ্যপামার্গপাটলাপারিভদ্রকনাদেযীকৃষ্ণগন্ধানীপনিম্বনির্দহন্যটরূষকনক্তমালক- পূতিকবৃহতীকণ্টকারিকাভল্লাতকেঙ্গুদীবৈজযন্তীকদলীবাষ্পদ্বযেক্ষুরকেন্দ্রবারুণীশ্বেতমোক্ষকাশোকা ইত্যেবং বর্গং সমূলপত্রশাখমার্দ্রমাহৃত্য লবণেন সহ সংসৃজ্য পূর্ববদ্দগ্ধ্বা ক্ষারকল্পেন পরিস্রাব্য বিপচেত্, প্রতিবাপশ্চাত্র হিঙ্গ্বাদিভিঃ পিপ্পল্যাদিভির্বা |
ইত্যেতত্ কল্যাণকলবণং বাতরোগগুল্মপ্লীহাগ্নিষঙ্গাজীর্ণার্শোঽরোচকার্তানাং কাসাদিভিঃ কৃমিভিরুপদ্রুতানাং চোপদিশন্তি পানভোজনেষ্বপীতি ||৩২||
View original
गण्डीरपलाशकुटजबिल्वार्कस्नुह्यपामार्गपाटलापारिभद्रकनादेयीकृष्णगन्धानीपनिम्बनिर्दहन्यटरूषकनक्तमालक- पूतिकबृहतीकण्टकारिकाभल्लातकेङ्गुदीवैजयन्तीकदलीबाष्पद्वयेक्षुरकेन्द्रवारुणीश्वेतमोक्षकाशोका इत्येवं वर्गं समूलपत्रशाखमार्द्रमाहृत्य लवणेन सह संसृज्य पूर्ववद्दग्ध्वा क्षारकल्पेन परिस्राव्य विपचेत्, प्रतिवापश्चात्र हिङ्ग्वादिभिः पिप्पल्यादिभिर्वा |
इत्येतत् कल्याणकलवणं वातरोगगुल्मप्लीहाग्निषङ्गाजीर्णार्शोऽरोचकार्तानां कासादिभिः कृमिभिरुपद्रुतानां चोपदिशन्ति पानभोजनेष्वपीति ||३२||
Adhikarana 25 (33) · Śloka 33
ভবতি চাত্র- বিষ্যন্দনাদুষ্ণভাবাদ্দোষাণাং চ বিপাচনাত্ |
সংস্কারপাচনাচ্চেদং বাতরোগেষু শস্যতে ||৩৩||
View original
भवति चात्र- विष्यन्दनादुष्णभावाद्दोषाणां च विपाचनात् |
संस्कारपाचनाच्चेदं वातरोगेषु शस्यते ||३३||
Adhikarana puShpikA · Śloka 4
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে বাতব্যাধিচিকিত্সিতং নাম চতুর্থোঽধ্যাযঃ ||৪||
View original
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने वातव्याधिचिकित्सितं नाम चतुर्थोऽध्यायः ||४||