Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ ক্ষুদ্ররোগাণাং নিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातः क्षुद्ररोगाणां निदानं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ ক্ষুদ্ররোগাণাং নিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातः क्षुद्ररोगाणां निदानं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
সমাসেন চতুশ্চত্বারিংশত্ ক্ষুদ্ররোগা ভবন্তি | তদ্যথা,- অজগল্লিকা, যবপ্রখ্যা, অন্ধালজী, বিবৃতা, কচ্ছপিকা, বল্মীকং, ইন্দ্রবৃদ্ধা , পনসিকা, পাষাণগর্দভঃ, জালগর্দভঃ, কক্ষা , বিস্ফোটকঃ, অগ্নিরোহিণী, চিপ্পং, কুনখঃ, অনুশযী, বিদারিকা শর্করার্বুদং, পামা, বিচর্চিকা, রকসা, পাদদারিকা, কদরং, অলসেন্দ্রলুপ্তৌ , দারুণকঃ, অরুংষিকা, পলিতং, মসূরিকা, যৌবনপিডকা, পদ্মিনীকণ্টকঃ, জতুমণিঃ, মশকঃ, চর্মকীলঃ , তিলকালকঃ, ন্যচ্ছং, ব্যঙ্গঃ, পরিবর্তিকা, অবপাটিকা, নিরুদ্ধপ্রকশঃ সন্নিরুদ্ধগুদঃ, অহিপূতনং, বৃষণকচ্ছ্রঃ, গুদভ্রংশশ্চেতি ||৩||
समासेन चतुश्चत्वारिंशत् क्षुद्ररोगा भवन्ति | तद्यथा,- अजगल्लिका, यवप्रख्या, अन्धालजी, विवृता, कच्छपिका, वल्मीकं, इन्द्रवृद्धा , पनसिका, पाषाणगर्दभः, जालगर्दभः, कक्षा , विस्फोटकः, अग्निरोहिणी, चिप्पं, कुनखः, अनुशयी, विदारिका शर्करार्बुदं, पामा, विचर्चिका, रकसा, पाददारिका, कदरं, अलसेन्द्रलुप्तौ , दारुणकः, अरुंषिका, पलितं, मसूरिका, यौवनपिडका, पद्मिनीकण्टकः, जतुमणिः, मशकः, चर्मकीलः , तिलकालकः, न्यच्छं, व्यङ्गः, परिवर्तिका, अवपाटिका, निरुद्धप्रकशः सन्निरुद्धगुदः, अहिपूतनं, वृषणकच्छ्रः, गुदभ्रंशश्चेति ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
স্নিগ্ধা সবর্ণা গ্রথিতা নীরুজা মুদ্গসন্নিভা | কফবাতোত্থিতা জ্ঞেযা বালানামজগল্লিকা ||৪||
स्निग्धा सवर्णा ग्रथिता नीरुजा मुद्गसन्निभा | कफवातोत्थिता ज्ञेया बालानामजगल्लिका ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
যবাকারা সুকঠিনা গ্রথিতা মাংসসংশ্রিতা | পিডকা শ্লেষ্মবাতাভ্যাং যবপ্রখ্যেতি সোচ্যতে ||৫||
यवाकारा सुकठिना ग्रथिता मांससंश्रिता | पिडका श्लेष्मवाताभ्यां यवप्रख्येति सोच्यते ||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
ঘনামবক্ত্রাং পিডকামুন্নতাং পরিমণ্ডলাম্ | অন্ধালজীমল্পপূযাং তাং বিদ্যাত্ কফবাতজাম্ ||৬||
घनामवक्त्रां पिडकामुन्नतां परिमण्डलाम् | अन्धालजीमल्पपूयां तां विद्यात् कफवातजाम् ||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
বিবৃতাস্যাং মহাদাহাং পক্বোদুম্বরসন্নিভাম্ | বিবৃতামিতি তাং বিদ্যাত্ পিত্তোত্থাং পরিমণ্ডলাম্ ||৭||
विवृतास्यां महादाहां पक्वोदुम्बरसन्निभाम् | विवृतामिति तां विद्यात् पित्तोत्थां परिमण्डलाम् ||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
গ্রথিতাঃ পঞ্চ বা ষড্বা দারুণাঃ কচ্ছপোন্নতাঃ | কফানিলাভ্যাং পিডকা জ্ঞেযা কচ্ছপিকা বুধৈঃ ||৮||
ग्रथिताः पञ्च वा षड्वा दारुणाः कच्छपोन्नताः | कफानिलाभ्यां पिडका ज्ञेया कच्छपिका बुधैः ||८||
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Adhikarana 8 (9-10) · Śloka 10
পাণিপাদতলে সন্ধৌ গ্রীবাযামূর্ধ্বজত্রুণি | গ্রন্থির্বল্মীকবদ্যস্তু শনৈঃ সমুপচীযতে ||৯|| তোদক্লেদপরীদাহকণ্ডূমদ্ভির্মুখৈর্বৃতঃ | ব্যাধির্বল্মীক ইত্যেষ কফপিত্তানিলোদ্ভবঃ ||১০||
पाणिपादतले सन्धौ ग्रीवायामूर्ध्वजत्रुणि | ग्रन्थिर्वल्मीकवद्यस्तु शनैः समुपचीयते ||९|| तोदक्लेदपरीदाहकण्डूमद्भिर्मुखैर्वृतः | व्याधिर्वल्मीक इत्येष कफपित्तानिलोद्भवः ||१०||
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Adhikarana 9 (11) · Śloka 12
পদ্মপুষ্করবন্মধ্যে পিডকাভিঃ সমাচিতাম্ | ইন্দ্রবৃদ্ধাং তু তাং বিদ্যাদ্বাতপিত্তোত্থিতাং ভিষক্ ||১১|| মণ্ডলং বৃত্তমুত্সন্নং সরক্তং পিডকাচিতম্ | রুজাকরীং গদর্ভিকাং তাং বিদ্যাদ্বাতপিত্তজাম্ |১২|
पद्मपुष्करवन्मध्ये पिडकाभिः समाचिताम् | इन्द्रवृद्धां तु तां विद्याद्वातपित्तोत्थितां भिषक् ||११|| मण्डलं वृत्तमुत्सन्नं सरक्तं पिडकाचितम् | रुजाकरीं गदर्भिकां तां विद्याद्वातपित्तजाम् |१२|
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Adhikarana 10 (12) · Śloka 12
কর্ণৌ পরি সমন্তাদ্বা পৃষ্ঠে বা পিডকোগ্ররুক্ | শালূকবত্পনসিকাং তাং বিদ্যাচ্ছ্লেষ্মবাতজাম্ ||১২||
कर्णौ परि समन्ताद्वा पृष्ठे वा पिडकोग्ररुक् | शालूकवत्पनसिकां तां विद्याच्छ्लेष्मवातजाम् ||१२||
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Adhikarana 11 (13) · Śloka 13
হনুসন্ধৌ সমুদ্ভূতং শোফমল্পরুজং স্থিরম্ | পাষাণগর্দভং বিদ্যাদ্বলাসপবনাত্মকম্ ||১৩||
हनुसन्धौ समुद्भूतं शोफमल्परुजं स्थिरम् | पाषाणगर्दभं विद्याद्बलासपवनात्मकम् ||१३||
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Adhikarana 12 (14) · Śloka 14
বিসর্পবত্ সর্পতি যো দাহজ্বরকরস্তনুঃ | অপাকঃ শ্বযথুঃ পিত্তাত্ স জ্ঞেযো জালগর্দভঃ ||১৪||
विसर्पवत् सर्पति यो दाहज्वरकरस्तनुः | अपाकः श्वयथुः पित्तात् स ज्ञेयो जालगर्दभः ||१४||
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Adhikarana 13 (15) · Śloka 15
পিডিকামুত্তমাঙ্গস্থাং বৃত্তামুগ্ররুজাজ্বরাম্ | সর্বাত্মকাং সর্বলিঙ্গাং জানীযাদিরিবেল্লিকাম্ ||১৫||
पिडिकामुत्तमाङ्गस्थां वृत्तामुग्ररुजाज्वराम् | सर्वात्मकां सर्वलिङ्गां जानीयादिरिवेल्लिकाम् ||१५||
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Adhikarana 14 (16) · Śloka 16
বাহুপার্শ্বাংসকক্ষাসু কৃষ্ণস্ফোটাং সবেদনাম্ | পিত্তপ্রকোপসম্ভূতাং কক্ষামিতি বিনির্দিশেত্ ||১৬||
बाहुपार्श्वांसकक्षासु कृष्णस्फोटां सवेदनाम् | पित्तप्रकोपसम्भूतां कक्षामिति विनिर्दिशेत् ||१६||
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Adhikarana 15 (17) · Śloka 17
একামেবংবিধাং দৃষ্ট্বা পিটিকাং স্ফোটসন্নিভাম্ | ত্বগ্গতাং পিত্তকোপেন গন্ধনামাং প্রচক্ষতে ||১৭||
एकामेवंविधां दृष्ट्वा पिटिकां स्फोटसन्निभाम् | त्वग्गतां पित्तकोपेन गन्धनामां प्रचक्षते ||१७||
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Adhikarana 16 (18) · Śloka 18
অগ্নিদগ্ধনিভাঃ স্ফোটাঃ সজ্বরাঃ পিত্তরক্ততঃ | ক্বচিত্ সর্বত্র বা দেহে স্মৃতা বিস্ফোটকা ইতি ||১৮||
अग्निदग्धनिभाः स्फोटाः सज्वराः पित्तरक्ततः | क्वचित् सर्वत्र वा देहे स्मृता विस्फोटका इति ||१८||
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Adhikarana 17 (19-20) · Śloka 20
কক্ষাভাগেষু যে স্ফোটা জাযন্তে মাংসদারু(র)ণাঃ | অন্তর্দাহজ্বরকরা দীপ্তপাবকসন্নিভাঃ ||১৯|| সপ্তাহাদ্বা দশাহাদ্বা পক্ষাদ্বা ন্ঘন্তি মানবম্ | তামগ্নিরোহিণীং বিদ্যাদসাধ্যাং সন্নিপাততঃ ||২০||
कक्षाभागेषु ये स्फोटा जायन्ते मांसदारु(र)णाः | अन्तर्दाहज्वरकरा दीप्तपावकसन्निभाः ||१९|| सप्ताहाद्वा दशाहाद्वा पक्षाद्वा न्घन्ति मानवम् | तामग्निरोहिणीं विद्यादसाध्यां सन्निपाततः ||२०||
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Adhikarana 18 (20-22) · Śloka 23
নখমাংসমধিষ্ঠায পিত্তং বাতশ্চ বেদনাম্ | করোতি দাহপাকৌ চ তং ব্যাধিং চিপ্পমাদিশেত্ ||২১|| তদেবাক্ষতরোগাখ্যং তথোপনখমিত্যপি | অভিঘাতাত্ প্রদুষ্টো যো নখো রূক্ষোঽসিতঃ খরঃ ||২২|| ভবেত্তং কুনখং বিদ্যাত্ কুলীনমিতি সঞ্জ্ঞিতম্ |২৩|
नखमांसमधिष्ठाय पित्तं वातश्च वेदनाम् | करोति दाहपाकौ च तं व्याधिं चिप्पमादिशेत् ||२१|| तदेवाक्षतरोगाख्यं तथोपनखमित्यपि | अभिघातात् प्रदुष्टो यो नखो रूक्षोऽसितः खरः ||२२|| भवेत्तं कुनखं विद्यात् कुलीनमिति सञ्ज्ञितम् |२३|
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Adhikarana 19 (23) · Śloka 24
গম্ভীরামল্পসংরম্ভাং সবর্ণামুপরিস্থিতাম্ ||২৩|| কফাদন্তঃপ্রপাকাং তাং বিদ্যাদনুশযীং ভিষক্ |২৪|
गम्भीरामल्पसंरम्भां सवर्णामुपरिस्थिताम् ||२३|| कफादन्तःप्रपाकां तां विद्यादनुशयीं भिषक् |२४|
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Adhikarana 20 (24) · Śloka 25
বিদারীকন্দবদ্বৃত্তাং কক্ষাবঙ্ক্ষণসন্ধিষু ||২৪|| রক্তাং বিদারিকাং বিদ্যাত্ সর্বজাং সর্বলক্ষণাম্ |২৫|
विदारीकन्दवद्वृत्तां कक्षावङ्क्षणसन्धिषु ||२४|| रक्तां विदारिकां विद्यात् सर्वजां सर्वलक्षणाम् |२५|
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Adhikarana 21 (25-27) · Śloka 28
প্রাপ্য মাংসসিরাস্নাযু শ্লেষ্মা মেদস্তথাঽনিলঃ ||২৫|| গ্রন্থিং কুর্বন্তি ভিন্নোঽসৌ মধুসর্পির্বসানিভম্ | স্রবত্যাস্রাবমত্যর্থং তত্র বৃদ্ধিং গতোঽনিলঃ ||২৬|| মাংসং বিশোষ্য গ্রথিতাং শর্করাং জনযেত্ পুনঃ | দুর্গন্ধং ক্লিন্নমত্যর্থং নানাবর্ণং ততঃ সিরাঃ ||২৭|| স্রবন্তি সহসা রক্তং তদ্বিদ্যাচ্ছর্করার্বুদম্ |২৮|
प्राप्य मांससिरास्नायु श्लेष्मा मेदस्तथाऽनिलः ||२५|| ग्रन्थिं कुर्वन्ति भिन्नोऽसौ मधुसर्पिर्वसानिभम् | स्रवत्यास्रावमत्यर्थं तत्र वृद्धिं गतोऽनिलः ||२६|| मांसं विशोष्य ग्रथितां शर्करां जनयेत् पुनः | दुर्गन्धं क्लिन्नमत्यर्थं नानावर्णं ततः सिराः ||२७|| स्रवन्ति सहसा रक्तं तद्विद्याच्छर्करार्बुदम् |२८|
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Adhikarana 22 (28) · Śloka 28
পামাবিচর্চ্যৌ কুষ্ঠেষু রকসা চ প্রকীর্তিতা ||২৮||
पामाविचर्च्यौ कुष्ठेषु रकसा च प्रकीर्तिता ||२८||
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Adhikarana 23 (29) · Śloka 29
পরিক্রমণশীলস্য বাযুরত্যর্থরূক্ষযোঃ | পাদযোঃ কুরুতে দারীং সরুজাং তলসংশ্রিতঃ ||২৯||
परिक्रमणशीलस्य वायुरत्यर्थरूक्षयोः | पादयोः कुरुते दारीं सरुजां तलसंश्रितः ||२९||
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Adhikarana 24 (30-31) · Śloka 31
শর্করোন্মথিতে পাদে ক্ষতে বা কণ্টকাদিভিঃ | মেদোরক্তানুগৈশ্চৈব দোষৈর্বা জাযতে নৃণাম্ ||৩০|| সকীলকঠিনো গ্রন্থির্নিম্নমধ্যোন্নতোঽপি বা | কোলমাত্রঃ সরুক্ স্রাবী জাযতে কদরস্তু সঃ ||৩১||
शर्करोन्मथिते पादे क्षते वा कण्टकादिभिः | मेदोरक्तानुगैश्चैव दोषैर्वा जायते नृणाम् ||३०|| सकीलकठिनो ग्रन्थिर्निम्नमध्योन्नतोऽपि वा | कोलमात्रः सरुक् स्रावी जायते कदरस्तु सः ||३१||
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Adhikarana 25 (32) · Śloka 32
ক্লিন্নাঙ্গুল্যন্তরৌ পাদৌ কণ্ডূদাহরুগন্বিতৌ | দুষ্টকর্দমসংস্পর্শাদলসং তং বিনির্দিশেত্ ||৩২||
क्लिन्नाङ्गुल्यन्तरौ पादौ कण्डूदाहरुगन्वितौ | दुष्टकर्दमसंस्पर्शादलसं तं विनिर्दिशेत् ||३२||
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Adhikarana 26 (33-34) · Śloka 34
রোমকূপানুগং পিত্তং বাতেন সহ মূর্চ্ছিতম্ | প্রচ্যাবযতি রোমাণি ততঃ শ্লেষ্মা সশোণিতঃ ||৩৩|| রুণদ্ধি রোমকূপাংস্তু ততোঽন্যেষামসম্ভবঃ | তদিন্দ্রলুপ্তং খালিত্যং রুজ্যেতি চ বিভাব্যতে ||৩৪||
रोमकूपानुगं पित्तं वातेन सह मूर्च्छितम् | प्रच्यावयति रोमाणि ततः श्लेष्मा सशोणितः ||३३|| रुणद्धि रोमकूपांस्तु ततोऽन्येषामसम्भवः | तदिन्द्रलुप्तं खालित्यं रुज्येति च विभाव्यते ||३४||
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Adhikarana 27 (35) · Śloka 35
দারুণা কণ্ডুরা রূক্ষা কেশভূমিঃ প্রপাট্যতে | কফবাতপ্রকোপেণ বিদ্যাদ্দারুণকং তু তম্ ||৩৫||
दारुणा कण्डुरा रूक्षा केशभूमिः प्रपाट्यते | कफवातप्रकोपेण विद्याद्दारुणकं तु तम् ||३५||
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Adhikarana 28 (36) · Śloka 36
অরূংষি বহুবক্ত্রাণি বহুক্লেদীনি মূর্ধনি | কফাসৃক্কৃমিকোপেন নৃণাং বিদ্যাদরুংষিকাম্ ||৩৬||
अरूंषि बहुवक्त्राणि बहुक्लेदीनि मूर्धनि | कफासृक्कृमिकोपेन नृणां विद्यादरुंषिकाम् ||३६||
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Adhikarana 29 (37) · Śloka 37
ক্রোধশোকশ্রমকৃতঃ শরীরোষ্মা শিরোগতঃ | পিত্তং চ কেশান্ পচতি পলিতং তেন জাযতে ||৩৭||
क्रोधशोकश्रमकृतः शरीरोष्मा शिरोगतः | पित्तं च केशान् पचति पलितं तेन जायते ||३७||
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Adhikarana 30 (38) · Śloka 38
দাহজ্বররুজাবন্তস্তাম্রাঃ স্ফোটাঃ সপীতকাঃ | গাত্রেষু বদনে চান্তর্বিজ্ঞেযাস্তা মসূরিকাঃ ||৩৮||
दाहज्वररुजावन्तस्ताम्राः स्फोटाः सपीतकाः | गात्रेषु वदने चान्तर्विज्ञेयास्ता मसूरिकाः ||३८||
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Adhikarana 31 (39) · Śloka 39
শাল্মলীকণ্টকপ্রখ্যাঃ কফমারুতশোণিতৈঃ | জাযন্তে পিডকা যূনাং বক্ত্রে যা মুখদূষিকাঃ ||৩৯||
शाल्मलीकण्टकप्रख्याः कफमारुतशोणितैः | जायन्ते पिडका यूनां वक्त्रे या मुखदूषिकाः ||३९||
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Adhikarana 32 (40) · Śloka 40
কণ্টকৈরাচিতং বৃত্তং কণ্ডূমত্ পাণ্ডুমণ্ডলম্ | পদ্মিনীকণ্টকপ্রখ্যৈস্তদাখ্যং কফবাতজম্ ||৪০||
कण्टकैराचितं वृत्तं कण्डूमत् पाण्डुमण्डलम् | पद्मिनीकण्टकप्रख्यैस्तदाख्यं कफवातजम् ||४०||
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Adhikarana 33 (41) · Śloka 41
নীরুজং সমমুত্সন্নং মণ্ডলং কফরক্তজম্ | সহজং রক্তমীষচ্চ শ্লক্ষ্ণং জতুমণিং বিদুঃ ||৪১||
नीरुजं सममुत्सन्नं मण्डलं कफरक्तजम् | सहजं रक्तमीषच्च श्लक्ष्णं जतुमणिं विदुः ||४१||
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Adhikarana 34 (42) · Śloka 42
অবেদনং স্থিরং চৈব যস্য গাত্রেষু দৃশ্যতে | মাষবত্কৃষ্ণমুত্সন্নমনিলান্মষকং বদেত্ ||৪২||
अवेदनं स्थिरं चैव यस्य गात्रेषु दृश्यते | माषवत्कृष्णमुत्सन्नमनिलान्मषकं वदेत् ||४२||
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Adhikarana 35 (43) · Śloka 43
কৃষ্ণানি তিলমাত্রাণি নীরুজানি সমানি চ | বাতপিত্তকফোচ্ছোষাত্তান্ বিদ্যাত্তিলকালকান্ ||৪৩||
कृष्णानि तिलमात्राणि नीरुजानि समानि च | वातपित्तकफोच्छोषात्तान् विद्यात्तिलकालकान् ||४३||
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Adhikarana 36 (44) · Śloka 44
মণ্ডলং মহদল্পং বা শ্যামং বা যদি বা সিতম্ | সহজং নীরুজং গাত্রে ন্যচ্ছমিত্যভিধীযতে ||৪৪||
मण्डलं महदल्पं वा श्यामं वा यदि वा सितम् | सहजं नीरुजं गात्रे न्यच्छमित्यभिधीयते ||४४||
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Adhikarana 37 (45) · Śloka 45
সমুত্থাননিদানাভ্যাং চর্মকীলং প্রকীর্তিতম্ |৪৫|
समुत्थाननिदानाभ्यां चर्मकीलं प्रकीर्तितम् |४५|
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Adhikarana 38 (45-46) · Śloka 47
ক্রোধাযাসপ্রকুপিতো বাযুঃ পিত্তেন সংযুতঃ ||৪৫|| সহসা মুখমাগত্য মণ্ডলং বিসৃজত্যতঃ | নীরুজং তনুকং শ্যাবং মুখে ব্যঙ্গং তমাদিশেত্ ||৪৬|| কৃষ্ণমেবঙ্গুণং গাত্রে মুখে বা নীলিকাং বিদুঃ |৪৭|
क्रोधायासप्रकुपितो वायुः पित्तेन संयुतः ||४५|| सहसा मुखमागत्य मण्डलं विसृजत्यतः | नीरुजं तनुकं श्यावं मुखे व्यङ्गं तमादिशेत् ||४६|| कृष्णमेवङ्गुणं गात्रे मुखे वा नीलिकां विदुः |४७|
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Adhikarana 39 (47-49) · Śloka 50
মর্দনাত্ পীডনাচ্চাতি তথৈবাপ্যভিঘাততঃ | মেঢ্রচর্ম যদা বাযুর্ভজতে সর্বতশ্চরঃ ||৪৭|| তদা বাতোপসৃষ্টং তু চর্ম প্রতিনিবর্ততে | মণেরধস্তাত্ কোশশ্চ গ্রন্থিরূপেণ লম্বতে ||৪৮|| সবেদনঃ সদাহশ্চ পাকং চ ব্রজতি ক্বচিত্ | মারুতাগন্তুসম্ভূতাং বিদ্যাত্তাং পরিবর্তিকাম্ ||৪৯|| সকণ্ডূঃ কঠিনা চাপি সৈব শ্লেষ্মসমুত্থিতা |৫০|
मर्दनात् पीडनाच्चाति तथैवाप्यभिघाततः | मेढ्रचर्म यदा वायुर्भजते सर्वतश्चरः ||४७|| तदा वातोपसृष्टं तु चर्म प्रतिनिवर्तते | मणेरधस्तात् कोशश्च ग्रन्थिरूपेण लम्बते ||४८|| सवेदनः सदाहश्च पाकं च व्रजति क्वचित् | मारुतागन्तुसम्भूतां विद्यात्तां परिवर्तिकाम् ||४९|| सकण्डूः कठिना चापि सैव श्लेष्मसमुत्थिता |५०|
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Adhikarana 40 (50-51) · Śloka 52
অল্পীযঃখাং যদা হর্ষাদ্বালাং গচ্ছেত্ স্ত্রিযং নরঃ ||৫০|| হস্তাভিঘাতাদথবা চর্মণ্যুদ্বর্তিতে বলাত্ | মর্দনাত্পীডনাদ্বাঽপি শুক্রবেগবিঘাততঃ ||৫১|| যস্যাবপাট্যতে চর্ম তাং বিদ্যাদবপাটিকাম্ |৫২|
अल्पीयःखां यदा हर्षाद्बालां गच्छेत् स्त्रियं नरः ||५०|| हस्ताभिघातादथवा चर्मण्युद्वर्तिते बलात् | मर्दनात्पीडनाद्वाऽपि शुक्रवेगविघाततः ||५१|| यस्यावपाट्यते चर्म तां विद्यादवपाटिकाम् |५२|
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Adhikarana 41 (52-54) · Śloka 54
বাতোপসৃষ্টমেবং তু চর্ম সংশ্রযতে মণিম্ ||৫২|| মণিশ্চর্মোপনদ্ধস্তু মূত্রস্রোতো রুণদ্ধি চ | নিরুদ্ধপ্রকশে তস্মিন্মন্দধারমবেদনম্ ||৫৩|| মূত্রং প্রবর্ততে জন্তোর্মণির্ন চ বিদীর্যতে | নিরুদ্ধপ্রকশং বিদ্যাদ্দুরূঢাং চাবপাটিকাম্ ||৫৪||
वातोपसृष्टमेवं तु चर्म संश्रयते मणिम् ||५२|| मणिश्चर्मोपनद्धस्तु मूत्रस्रोतो रुणद्धि च | निरुद्धप्रकशे तस्मिन्मन्दधारमवेदनम् ||५३|| मूत्रं प्रवर्तते जन्तोर्मणिर्न च विदीर्यते | निरुद्धप्रकशं विद्याद्दुरूढां चावपाटिकाम् ||५४||
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Adhikarana 42 (55-56) · Śloka 56
বেগসন্ধারণাদ্বাযুর্বিহতো গুদমাশ্রিতঃ | নিরুণদ্ধি মহত্স্রোতঃ সূক্ষ্মদ্বারং করোতি চ ||৫৫|| মার্গস্য সৌক্ষ্ম্যাত্ কৃচ্ছ্রেণ পুরীষং তস্য গচ্ছতি | সন্নিরুদ্ধগুদং ব্যাধিমেনং বিদ্যাত্ সুদুস্তরম্ ||৫৬||
वेगसन्धारणाद्वायुर्विहतो गुदमाश्रितः | निरुणद्धि महत्स्रोतः सूक्ष्मद्वारं करोति च ||५५|| मार्गस्य सौक्ष्म्यात् कृच्छ्रेण पुरीषं तस्य गच्छति | सन्निरुद्धगुदं व्याधिमेनं विद्यात् सुदुस्तरम् ||५६||
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Adhikarana 43 (57-58) · Śloka 58
শকৃন্মূত্রসমাযুক্তেঽধৌতেঽপানে শিশোর্ভবেত্ | স্বিন্নস্যাস্নাপ্যমানস্য কণ্ডূ রক্তকফোদ্ভবা ||৫৭|| কণ্ডূযনাত্ততঃ ক্ষিপ্রং স্ফোটাঃ স্রাবশ্চ জাযতে | একীভূতং ব্রণৈর্ঘোরং তং বিদ্যাদহিপূতনম্ ||৫৮||
शकृन्मूत्रसमायुक्तेऽधौतेऽपाने शिशोर्भवेत् | स्विन्नस्यास्नाप्यमानस्य कण्डू रक्तकफोद्भवा ||५७|| कण्डूयनात्ततः क्षिप्रं स्फोटाः स्रावश्च जायते | एकीभूतं व्रणैर्घोरं तं विद्यादहिपूतनम् ||५८||
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Adhikarana 44 (59-60) · Śloka 60
স্নানোত্সাদনহীনস্য মলো বৃষণসংশ্রিতঃ | যদা প্রক্লিদ্যতে স্বেদাত্ কণ্ডূং সঞ্জনযেত্তদা ||৫৯|| তত্র কণ্ডূযনাত্ ক্ষিপ্রং স্ফোটাঃ স্রাবশ্চ জাযতে | প্রাহুর্বৃষণকচ্ছূং তাং শ্লেষ্মরক্তপ্রকোপজাম্ ||৬০||
स्नानोत्सादनहीनस्य मलो वृषणसंश्रितः | यदा प्रक्लिद्यते स्वेदात् कण्डूं सञ्जनयेत्तदा ||५९|| तत्र कण्डूयनात् क्षिप्रं स्फोटाः स्रावश्च जायते | प्राहुर्वृषणकच्छूं तां श्लेष्मरक्तप्रकोपजाम् ||६०||
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Adhikarana 45 (61) · Śloka 61
প্রবাহণাতিসারাভ্যাং নির্গচ্ছতি গুদং বহিঃ | রূক্ষদুর্বলদেহস্য তং গুদভ্রংশমাদিশেত্ ||৬১||
प्रवाहणातिसाराभ्यां निर्गच्छति गुदं बहिः | रूक्षदुर्बलदेहस्य तं गुदभ्रंशमादिशेत् ||६१||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 13
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং নিদানস্থানে ক্ষুদ্ররোগনিদানং নাম ত্রযোদশোঽধ্যাযঃ ||১৩||
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने क्षुद्ररोगनिदानं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ||१३||
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