Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো ধমনীব্যাকরণং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो धमनीव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো ধমনীব্যাকরণং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो धमनीव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
চতুর্বিংশতির্ধমন্যো নাভিপ্রভবা অভিহিতাঃ | তত্র কেচিদাহুঃ- সিরাধমনীস্রোতসামবিভাগঃ, সিরাবিকারা এব হি ধমন্যঃ স্রোতাংসি চেতি | তত্তু ন সম্যক্, অন্যা এব হি ধমন্যঃ স্রোতাংসি চ সিরাভ্যঃ; কস্মাত্? ব্যঞ্জনান্যত্বান্, মূলসন্নিযমাত্, কর্মবৈশেষ্যাত্, আগমাচ্চ; কেবলং তু পরস্পরসন্নিকর্ষাত্ সদৃশাগমকর্মত্বাত্ সৌক্ষ্ম্যাচ্চ বিভক্তকর্মণামপ্যবিভাগ ইব কর্মসু ভবতি ||৩||
चतुर्विंशतिर्धमन्यो नाभिप्रभवा अभिहिताः | तत्र केचिदाहुः- सिराधमनीस्रोतसामविभागः, सिराविकारा एव हि धमन्यः स्रोतांसि चेति | तत्तु न सम्यक्, अन्या एव हि धमन्यः स्रोतांसि च सिराभ्यः; कस्मात्? व्यञ्जनान्यत्वान्, मूलसन्नियमात्, कर्मवैशेष्यात्, आगमाच्च; केवलं तु परस्परसन्निकर्षात् सदृशागमकर्मत्वात् सौक्ष्म्याच्च विभक्तकर्मणामप्यविभाग इव कर्मसु भवति ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
তাসাং তু খলু নাভিপ্রভবাণাং ধমনীনামূর্ধ্বগা দশ, দশ চাধোগামিন্যঃ, চতস্রস্তির্যগ্গাঃ ||৪||
तासां तु खलु नाभिप्रभवाणां धमनीनामूर्ध्वगा दश, दश चाधोगामिन्यः, चतस्रस्तिर्यग्गाः ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 6
ঊর্ধ্বগাঃ শব্দস্পর্শরূপরসগন্ধপ্রশ্বাসোচ্ছ্বাসজৃম্ভিতক্ষুদ্ধসিতকথিতরুদিতাদীন্ বিশেষানভিবহন্ত্যঃ শরীরং ধারযন্তি | তাস্তু হৃদযমভিপ্রপন্নাস্ত্রিধা জাযন্তে, তাস্ত্রিংশত্ | তাসাং তু বাতপিত্তকফশোণিতরসান্ দ্বে দ্বে বহতস্তা দশ, শব্দরূপরসগন্ধানষ্টাভির্গৃহ্ণীতে, দ্বাভ্যাং ভাষতে, দ্বাভ্যাং ঘোষং করোতি, দ্বাভ্যাং স্বপিতি, দ্বাভ্যাং প্রতিবুধ্যতে, দ্বে চাশ্রুবাহিন্যৌ, দ্বে স্তন্যং স্ত্রিযা বহতঃ স্তনসংশ্রিতে, তে এব শুক্রং নরস্য স্তনাভ্যামভিবহতঃ, তাস্ত্বেতাস্ত্রিংশত্ সবিভাগা ব্যাখ্যাতাঃ | এতাভিরূর্ধ্বং নাভেরুদরপার্শ্বপৃষ্ঠোরঃস্কন্ধগ্রীবাবাহবো ধার্যন্তে যাপ্যন্তে চ ||৫|| ভবতি চাত্র- ঊর্ধ্বঙ্গমাস্তু কুর্বন্তি কর্মাণ্যেতানি সর্বশঃ |৬|
ऊर्ध्वगाः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धप्रश्वासोच्छ्वासजृम्भितक्षुद्धसितकथितरुदितादीन् विशेषानभिवहन्त्यः शरीरं धारयन्ति | तास्तु हृदयमभिप्रपन्नास्त्रिधा जायन्ते, तास्त्रिंशत् | तासां तु वातपित्तकफशोणितरसान् द्वे द्वे वहतस्ता दश, शब्दरूपरसगन्धानष्टाभिर्गृह्णीते, द्वाभ्यां भाषते, द्वाभ्यां घोषं करोति, द्वाभ्यां स्वपिति, द्वाभ्यां प्रतिबुध्यते, द्वे चाश्रुवाहिन्यौ, द्वे स्तन्यं स्त्रिया वहतः स्तनसंश्रिते, ते एव शुक्रं नरस्य स्तनाभ्यामभिवहतः, तास्त्वेतास्त्रिंशत् सविभागा व्याख्याताः | एताभिरूर्ध्वं नाभेरुदरपार्श्वपृष्ठोरःस्कन्धग्रीवाबाहवो धार्यन्ते याप्यन्ते च ||५|| भवति चात्र- ऊर्ध्वङ्गमास्तु कुर्वन्ति कर्माण्येतानि सर्वशः |६|
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Adhikarana 5 (6-7) · Śloka 8
অধোগমাস্তু বক্ষ্যামি কর্ম চাসাং যথাযথম্ ||৬|| অধোগমাস্তু বাতমূত্রপুরীষশুক্রার্তবাদীন্যধো বহন্তি | তাস্তু পিত্তাশযমভিপ্রপন্নাস্তত্রস্থমেবান্নপানরসং বিপক্বমৌষ্ণ্যাদ্বিবেচযন্ত্যোঽভিবহন্ত্যঃ শরীরং তর্পযন্তি, অর্পযন্তি চোর্ধ্বগানাং তির্যগ্গাণাং চ, রসস্থানং চাভিপূরযন্তি, মূত্রপুরীষস্বেদাংশ্চ বিবেচযন্তি; আমপক্বাশযান্তরে চ ত্রিধা জাযন্তে, তাস্ত্রিংশত্; তাসাং তু বাতপিত্তকফশোণিতরসান্ দ্বে দ্বে বহতস্তা দশ, দ্বে অন্নবাহিন্যাবন্ত্রাশ্রিতে, তোযবহে দ্বে, মূত্রবস্তিমভিপ্রপন্নে মূত্রবহে দ্বে, শুক্রবহে দ্বে শুক্রপ্রাদুর্ভাবায, দ্বে বিসর্গায, তে এব রক্তমভিবহতো বিসৃজতশ্চ নারীণামার্তবসঞ্জ্ঞং, দ্বে বর্চোনিরসন্যৌ স্থূলান্ত্রপ্রতিবদ্ধে, অষ্টাবন্যাস্তির্যগ্গামিনীনাং ধমনীনাং স্বেদমর্পযন্তি; তাস্ত্বেতাস্ত্রিংশত্ সবিভাগা ব্যাখ্যাতাঃ | এতাভিরধোনাভেঃ পক্বাশযকটীমূত্রপুরীষগুদবস্তিমেঢ্রসক্থীনি ধার্যন্তে যাপ্যন্তে চ ||৭|| ভবতি চাত্র- অধোগমাস্তু কুর্বন্তি কর্মাণ্যেতানি সর্বশঃ |৮|
अधोगमास्तु वक्ष्यामि कर्म चासां यथायथम् ||६|| अधोगमास्तु वातमूत्रपुरीषशुक्रार्तवादीन्यधो वहन्ति | तास्तु पित्ताशयमभिप्रपन्नास्तत्रस्थमेवान्नपानरसं विपक्वमौष्ण्याद्विवेचयन्त्योऽभिवहन्त्यः शरीरं तर्पयन्ति, अर्पयन्ति चोर्ध्वगानां तिर्यग्गाणां च, रसस्थानं चाभिपूरयन्ति, मूत्रपुरीषस्वेदांश्च विवेचयन्ति; आमपक्वाशयान्तरे च त्रिधा जायन्ते, तास्त्रिंशत्; तासां तु वातपित्तकफशोणितरसान् द्वे द्वे वहतस्ता दश, द्वे अन्नवाहिन्यावन्त्राश्रिते, तोयवहे द्वे, मूत्रबस्तिमभिप्रपन्ने मूत्रवहे द्वे, शुक्रवहे द्वे शुक्रप्रादुर्भावाय, द्वे विसर्गाय, ते एव रक्तमभिवहतो विसृजतश्च नारीणामार्तवसञ्ज्ञं, द्वे वर्चोनिरसन्यौ स्थूलान्त्रप्रतिबद्धे, अष्टावन्यास्तिर्यग्गामिनीनां धमनीनां स्वेदमर्पयन्ति; तास्त्वेतास्त्रिंशत् सविभागा व्याख्याताः | एताभिरधोनाभेः पक्वाशयकटीमूत्रपुरीषगुदबस्तिमेढ्रसक्थीनि धार्यन्ते याप्यन्ते च ||७|| भवति चात्र- अधोगमास्तु कुर्वन्ति कर्माण्येतानि सर्वशः |८|
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Adhikarana 6 (8-9) · Śloka 9
তির্যগ্গাঃ সম্প্রবক্ষ্যামি কর্ম চাসাং যথাযথম্ ||৮|| তির্যগ্গাণাং তু চতসৃণাং ধমনীনামেকৈকা শতধা সহস্রধা চোত্তরোত্তরং বিভজ্যন্তে, তাস্ত্বসঙ্খ্যেযাঃ, তাভিরিদং শরীরং গবাক্ষিতং বিবদ্ধমাততং চ, তাসাং মুখানি রোমকূপপ্রতিবদ্ধানি, যৈঃ স্বেদমভিবহন্তি রসং চাভিতর্পযন্ত্যন্তর্বহিশ্চ , তৈরেব চাভ্যঙ্গপরিষেকাবগাহালেপনবীর্যাণ্যন্তঃশরীরমভিপ্রতিপদ্যন্তে ত্বচি বিপক্বানি, তৈরেব চ স্পর্শং সুখমসুখং বা গৃহ্ণীতে, তাস্ত্বেতাশ্চতস্রো ধমন্যঃ সর্বাঙ্গগতাঃ সবিভাগা ব্যাখ্যাতাঃ ||৯||
तिर्यग्गाः सम्प्रवक्ष्यामि कर्म चासां यथायथम् ||८|| तिर्यग्गाणां तु चतसृणां धमनीनामेकैका शतधा सहस्रधा चोत्तरोत्तरं विभज्यन्ते, तास्त्वसङ्ख्येयाः, ताभिरिदं शरीरं गवाक्षितं विबद्धमाततं च, तासां मुखानि रोमकूपप्रतिबद्धानि, यैः स्वेदमभिवहन्ति रसं चाभितर्पयन्त्यन्तर्बहिश्च , तैरेव चाभ्यङ्गपरिषेकावगाहालेपनवीर्याण्यन्तःशरीरमभिप्रतिपद्यन्ते त्वचि विपक्वानि, तैरेव च स्पर्शं सुखमसुखं वा गृह्णीते, तास्त्वेताश्चतस्रो धमन्यः सर्वाङ्गगताः सविभागा व्याख्याताः ||९||
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Adhikarana 7 (10) · Śloka 10
যথা স্বভাবতঃ খানি মৃণালেষু বিসেষু চ | ধমনীনাং তথা খানি রসো যৈরুপচীযতে ||১০||
यथा स्वभावतः खानि मृणालेषु बिसेषु च | धमनीनां तथा खानि रसो यैरुपचीयते ||१०||
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Adhikarana 8 (11) · Śloka 11
পঞ্চাভিভূতাস্ত্বথ পঞ্চকৃত্বঃ পঞ্চেন্দ্রিযং পঞ্চসু ভাবযন্তি | পঞ্চেন্দ্রিযং পঞ্চসু ভাবযিত্বা পঞ্চত্বমাযান্তি বিনাশকালে ||১১||
पञ्चाभिभूतास्त्वथ पञ्चकृत्वः पञ्चेन्द्रियं पञ्चसु भावयन्ति | पञ्चेन्द्रियं पञ्चसु भावयित्वा पञ्चत्वमायान्ति विनाशकाले ||११||
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Adhikarana 9 (12) · Śloka 12
অত ঊর্ধ্বং স্রোতসাং মূলবিদ্ধলক্ষণমুপদেক্ষ্যামঃ | তানি তু প্রাণান্নোদকরসরক্তমাংসমেদোমূত্রপুরীষশুক্রার্তববহানি, যেষ্বধিকারঃ; একেষাং বহূনি; এতেষাং বিশেষা বহবঃ | তত্র প্রাণবহে দ্বে, তযোর্মূলং হৃদযং রসবাহিন্যশ্চ ধমন্যঃ, তত্র বিদ্ধস্যাক্রোশনবিনমনমোহনভ্রমণবেপনানি মরণং বা ভবতি; অন্নবহে দ্বে, তযোর্মূলমামাশযোঽন্নবাহিন্যশ্চ ধমন্যঃ, তত্র বিদ্ধস্যাধ্মানং শূলোঽন্নদ্বেষশ্ছর্দিঃ পিপাসাঽঽন্ধ্যং মরণং চ; উদকবহে দ্বে, তযোর্মূলং তালু ক্লোম চ, তত্র বিদ্ধস্য পিপাসা সদ্যোমরণং চ; রসবহে দ্বে, তযোর্মূলং হৃদযং রসবাহিন্যশ্চ ধমন্যঃ, তত্র বিদ্ধস্য শোষঃপ্রাণবহবিদ্ধবচ্চ মরণং তল্লিঙ্গানি চ; রক্তবহে দ্বে, তযোর্মূলং যকৃত্প্লীহানৌ রক্তবাহিন্যশ্চ ধমন্যঃ , তত্র বিদ্ধস্য শ্যাবাঙ্গতা জ্বরো দাহঃ পাণ্ডুতা শোণিতাগমনং রক্তনেত্রতা চ; মাংসবহে দ্বে, তযোর্মূলং স্নাযুত্বচং রক্তবহাশ্চ ধমন্যঃ, তত্র বিদ্ধস্য শ্বযথুর্মাংসশোষঃ সিরাগ্রন্থযো মরণং চ; মেদোবহে দ্বে, তযোর্মূলং কটী বৃক্কৌ চ, তত্র বিদ্ধস্য স্বেদাগমনং স্নিগ্ধাঙ্গতা তালুশোষঃ স্থূলশোফতা পিপাসা চ; মূত্রবহে দ্বে, তযোর্মূলং বস্তির্মেঢ্রং চ, তত্র বিদ্ধস্যানদ্ধবস্তিতা মূত্রনিরোধঃ স্তব্ধমেঢ্রতা চ; পুরীষবহে দ্বে, তযোর্মূলং পক্বাশযো গুদং চ, তত্র বিদ্ধস্যানাহো দুর্গন্ধতা গ্রথিতান্ত্রতা চ; শুক্রবহে দ্বে, তযোর্মূলং স্তনৌ বৃষণৌ চ, তত্র বিদ্ধস্য ক্লীবতা চিরাত্ প্রসেকো রক্তশুক্রতা চ ; আর্তবহে দ্বে, তযোর্মূলং গর্ভাশয আর্তববাহিন্যশ্চ ধমন্যঃ, তত্র বিদ্ধাযা বন্ধ্যাত্বং মৈথুনাসহিষ্ণুত্বমার্তবনাশশ্চ; সেবনীচ্ছেদাদ্রুজাপ্রাদুর্ভাবঃ; বস্তিগুদবিদ্ধলক্ষণং প্রাগুক্তমিতি | স্রোতোবিদ্ধং তু প্রত্যাখ্যাযোপচরেত্, উদ্ধৃতশল্যং তু ক্ষতবিধানেনোপচরেত্ ||১২||
अत ऊर्ध्वं स्रोतसां मूलविद्धलक्षणमुपदेक्ष्यामः | तानि तु प्राणान्नोदकरसरक्तमांसमेदोमूत्रपुरीषशुक्रार्तववहानि, येष्वधिकारः; एकेषां बहूनि; एतेषां विशेषा बहवः | तत्र प्राणवहे द्वे, तयोर्मूलं हृदयं रसवाहिन्यश्च धमन्यः, तत्र विद्धस्याक्रोशनविनमनमोहनभ्रमणवेपनानि मरणं वा भवति; अन्नवहे द्वे, तयोर्मूलमामाशयोऽन्नवाहिन्यश्च धमन्यः, तत्र विद्धस्याध्मानं शूलोऽन्नद्वेषश्छर्दिः पिपासाऽऽन्ध्यं मरणं च; उदकवहे द्वे, तयोर्मूलं तालु क्लोम च, तत्र विद्धस्य पिपासा सद्योमरणं च; रसवहे द्वे, तयोर्मूलं हृदयं रसवाहिन्यश्च धमन्यः, तत्र विद्धस्य शोषःप्राणवहविद्धवच्च मरणं तल्लिङ्गानि च; रक्तवहे द्वे, तयोर्मूलं यकृत्प्लीहानौ रक्तवाहिन्यश्च धमन्यः , तत्र विद्धस्य श्यावाङ्गता ज्वरो दाहः पाण्डुता शोणितागमनं रक्तनेत्रता च; मांसवहे द्वे, तयोर्मूलं स्नायुत्वचं रक्तवहाश्च धमन्यः, तत्र विद्धस्य श्वयथुर्मांसशोषः सिराग्रन्थयो मरणं च; मेदोवहे द्वे, तयोर्मूलं कटी वृक्कौ च, तत्र विद्धस्य स्वेदागमनं स्निग्धाङ्गता तालुशोषः स्थूलशोफता पिपासा च; मूत्रवहे द्वे, तयोर्मूलं बस्तिर्मेढ्रं च, तत्र विद्धस्यानद्धबस्तिता मूत्रनिरोधः स्तब्धमेढ्रता च; पुरीषवहे द्वे, तयोर्मूलं पक्वाशयो गुदं च, तत्र विद्धस्यानाहो दुर्गन्धता ग्रथितान्त्रता च; शुक्रवहे द्वे, तयोर्मूलं स्तनौ वृषणौ च, तत्र विद्धस्य क्लीबता चिरात् प्रसेको रक्तशुक्रता च ; आर्तवहे द्वे, तयोर्मूलं गर्भाशय आर्तववाहिन्यश्च धमन्यः, तत्र विद्धाया वन्ध्यात्वं मैथुनासहिष्णुत्वमार्तवनाशश्च; सेवनीच्छेदाद्रुजाप्रादुर्भावः; बस्तिगुदविद्धलक्षणं प्रागुक्तमिति | स्रोतोविद्धं तु प्रत्याख्यायोपचरेत्, उद्धृतशल्यं तु क्षतविधानेनोपचरेत् ||१२||
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Adhikarana 10 (13) · Śloka 13
ভবতি চাত্র- মূলাত্ খাদন্তরং দেহে প্রসৃতং ত্বভিবাহি যত্ | স্ত্রোতস্তদিতি বিজ্ঞেযং সিরাধমনিবর্জিতম্ ||১৩||
भवति चात्र- मूलात् खादन्तरं देहे प्रसृतं त्वभिवाहि यत् | स्त्रोतस्तदिति विज्ञेयं सिराधमनिवर्जितम् ||१३||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 9
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং শারীরস্থানে ধমনীব্যাকরণশারীরং নাম নবমোঽধ্যাযঃ ||৯||
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने धमनीव्याकरणशारीरं नाम नवमोऽध्यायः ||९||
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