Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ সিরাব্যধবিধিং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातः सिराव्यधविधिं शारीरं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ সিরাব্যধবিধিং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातः सिराव्यधविधिं शारीरं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
বালস্থবিররূক্ষক্ষতক্ষীণভীরুপরিশ্রান্তমদ্যপাধ্বস্ত্রীকর্শিতবমিতবিরিক্তাস্থাপিতানুবাসিতজাগরিতক্লীবকৃশগর্ভিণীনাং কাসশ্বাসশোষপ্রবৃদ্ধজ্বরাক্ষেপকপক্ষাঘাতোপবাসপিপাসামূর্চ্ছাপ্রপীডিতানাং চ সিরাং ন বিধ্যেত্ , যাশ্চাব্যধ্যাঃ, ব্যধ্যাশ্চাদৃষ্টাঃ, দৃষ্টাশ্চাযন্ত্রিতাঃ, যন্ত্রিতাশ্চানুত্থিতা ইতি ||৩||
बालस्थविररूक्षक्षतक्षीणभीरुपरिश्रान्तमद्यपाध्वस्त्रीकर्शितवमितविरिक्तास्थापितानुवासितजागरितक्लीबकृशगर्भिणीनां कासश्वासशोषप्रवृद्धज्वराक्षेपकपक्षाघातोपवासपिपासामूर्च्छाप्रपीडितानां च सिरां न विध्येत् , याश्चाव्यध्याः, व्यध्याश्चादृष्टाः, दृष्टाश्चायन्त्रिताः, यन्त्रिताश्चानुत्थिता इति ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
শোণিতাবসেকসাধ্যাশ্চ যে বিকারাঃ প্রাগভিহিতাস্তেষু চাপক্বেষ্বন্যেষু চানুক্তেষু যথাভ্যাসং যথান্যাযং চ সিরাং বিধ্যেত্ ||৪||
शोणितावसेकसाध्याश्च ये विकाराः प्रागभिहितास्तेषु चापक्वेष्वन्येषु चानुक्तेषु यथाभ्यासं यथान्यायं च सिरां विध्येत् ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
প্রতিষিদ্ধানামপি চ বিষোপসর্গে আত্যযিকে চ সিরাব্যধনমপ্রতিষিদ্ধম্ ||৫||
प्रतिषिद्धानामपि च विषोपसर्गे आत्ययिके च सिराव्यधनमप्रतिषिद्धम् ||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
তত্র স্নিগ্ধস্বিন্নমাতুরং যথাদোষপ্রত্যনীকং দ্রবপ্রাযমন্নং ভুক্তবন্তং যবাগূং পীতবন্তং বা যথাকালমুপস্থাপ্যাসীনং স্থিতং বা প্রাণানবাধমানো বস্ত্রপট্টচর্মান্তর্বল্কললতানামন্যতমেন যন্ত্রযিত্বা নাতিগাঢং নাতিশিথিলং শরীরপ্রদেশমাসাদ্য প্রাপ্তং শস্ত্রমাদায সিরাং বিধ্যেত্ ||৬||
तत्र स्निग्धस्विन्नमातुरं यथादोषप्रत्यनीकं द्रवप्रायमन्नं भुक्तवन्तं यवागूं पीतवन्तं वा यथाकालमुपस्थाप्यासीनं स्थितं वा प्राणानबाधमानो वस्त्रपट्टचर्मान्तर्वल्कललतानामन्यतमेन यन्त्रयित्वा नातिगाढं नातिशिथिलं शरीरप्रदेशमासाद्य प्राप्तं शस्त्रमादाय सिरां विध्येत् ||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
নৈবাতিশীতে নাত্যুষ্ণে ন প্রবাতে ন চাভ্রিতে | সিরাণাং ব্যধনং কার্যমরোগে বা কদাচন ||৭||
नैवातिशीते नात्युष्णे न प्रवाते न चाभ्रिते | सिराणां व्यधनं कार्यमरोगे वा कदाचन ||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
তত্র ব্যধ্যসিরং পুরুষং প্রত্যাদিত্যমুখমরত্নিমাত্রোচ্ছ্রিতে উপবেশ্যাসনে সক্থ্নোরাকুঞ্চিতযোর্নিবেশ্য কূর্পরে সন্ধিদ্বযস্যোপরি হস্তাবন্তর্গূঢাঙ্গুষ্ঠকৃতমুষ্টী মন্যযোঃ স্থাপযিত্বা যন্ত্রণশাটকং গ্রীবামুষ্ট্যোরুপরি পরিক্ষিপ্যান্যেন পুরুষেণ পশ্চাত্স্থিতেন বামহস্তেনোত্তানেন শাটকান্তদ্বযং গ্রাহযিত্বা ততো ব্রূযাত্- দক্ষিণহস্তেন সিরোত্থাপনার্থং নাত্যাযতশিথিলং যন্ত্রমাবেষ্টযেতি, অসৃক্স্রাবণার্থং চ যন্ত্রং পৃষ্ঠমধ্যে পীডযেতি, কর্মপুরুষং চ বাযুপূর্ণমুখং স্থাপযেত্ ; এষ উত্তমাঙ্গগতানামন্তর্মুখবর্জানাং সিরাণাং ব্যধনে যন্ত্রণবিধিঃ | পাদব্যধ্যসিরস্য পাদং সমে স্থানে সুস্থিতং স্থাপযিত্বাঽন্যং পাদমীষত্সঙ্কুচিতমুচ্চৈঃ কৃত্বা ব্যধ্যসিরং পাদং জানুসন্ধেরধঃ শাটকেনাবেষ্ট্য হস্তাভ্যাং প্রপীড্য গুল্ফং ব্যধ্যপ্রদেশস্যোপরি চতুরঙ্গুলে প্লোতাদীনামন্যতমেন বদ্ধ্বা বা পাদসিরাং বিধ্যেত্ | অথোপরিষ্ঠাদ্ধস্তৌ গূঢাঙ্গুষ্ঠকৃতমুষ্টী সম্যগাসনে স্থাপযিত্বা সুখোপবিষ্টস্য পূর্ববদ্যন্ত্রং বদ্ধ্বা হস্তসিরাং বিধ্যেত্ | গৃধ্রসীবিশ্বাচ্যোঃ সঙ্কুচিতজানুকূর্পরস্য | শ্রোণীপৃষ্ঠস্কন্ধেষূন্নামিতপৃষ্ঠস্যাবাক্শিরস্কস্যোপবিষ্টস্য | বিস্ফূর্জিতপৃষ্ঠস্য বিধ্যেত্ | উদরোরসোঃ প্রসারিতোরস্কস্যোন্নামিতশিরস্কস্য বিস্ফূর্জিতদেহস্য | বাহুভ্যামবলম্বমানদেহস্য পার্শ্বযোঃ | অনামিতমেঢ্রস্য মেঢ্রে | উন্নমিতবিদষ্টজিহ্বাগ্রস্যাধোজিহ্বাযাম্ | অতিব্যাত্তাননস্য তালুনি দন্তমূলেষু চ | এবং যন্ত্রোপাযানন্যাংশ্চ সিরোত্থাপনহেতূন্ বুদ্ধ্যাঽবেক্ষ্য শরীরবশেন ব্যাধিবশেন চ বিদধ্যাত্ ||৮||
तत्र व्यध्यसिरं पुरुषं प्रत्यादित्यमुखमरत्निमात्रोच्छ्रिते उपवेश्यासने सक्थ्नोराकुञ्चितयोर्निवेश्य कूर्परे सन्धिद्वयस्योपरि हस्तावन्तर्गूढाङ्गुष्ठकृतमुष्टी मन्ययोः स्थापयित्वा यन्त्रणशाटकं ग्रीवामुष्ट्योरुपरि परिक्षिप्यान्येन पुरुषेण पश्चात्स्थितेन वामहस्तेनोत्तानेन शाटकान्तद्वयं ग्राहयित्वा ततो ब्रूयात्- दक्षिणहस्तेन सिरोत्थापनार्थं नात्यायतशिथिलं यन्त्रमावेष्टयेति, असृक्स्रावणार्थं च यन्त्रं पृष्ठमध्ये पीडयेति, कर्मपुरुषं च वायुपूर्णमुखं स्थापयेत् ; एष उत्तमाङ्गगतानामन्तर्मुखवर्जानां सिराणां व्यधने यन्त्रणविधिः | पादव्यध्यसिरस्य पादं समे स्थाने सुस्थितं स्थापयित्वाऽन्यं पादमीषत्सङ्कुचितमुच्चैः कृत्वा व्यध्यसिरं पादं जानुसन्धेरधः शाटकेनावेष्ट्य हस्ताभ्यां प्रपीड्य गुल्फं व्यध्यप्रदेशस्योपरि चतुरङ्गुले प्लोतादीनामन्यतमेन बद्ध्वा वा पादसिरां विध्येत् | अथोपरिष्ठाद्धस्तौ गूढाङ्गुष्ठकृतमुष्टी सम्यगासने स्थापयित्वा सुखोपविष्टस्य पूर्ववद्यन्त्रं बद्ध्वा हस्तसिरां विध्येत् | गृध्रसीविश्वाच्योः सङ्कुचितजानुकूर्परस्य | श्रोणीपृष्ठस्कन्धेषून्नामितपृष्ठस्यावाक्शिरस्कस्योपविष्टस्य | विस्फूर्जितपृष्ठस्य विध्येत् | उदरोरसोः प्रसारितोरस्कस्योन्नामितशिरस्कस्य विस्फूर्जितदेहस्य | बाहुभ्यामवलम्बमानदेहस्य पार्श्वयोः | अनामितमेढ्रस्य मेढ्रे | उन्नमितविदष्टजिह्वाग्रस्याधोजिह्वायाम् | अतिव्यात्ताननस्य तालुनि दन्तमूलेषु च | एवं यन्त्रोपायानन्यांश्च सिरोत्थापनहेतून् बुद्ध्याऽवेक्ष्य शरीरवशेन व्याधिवशेन च विदध्यात् ||८||
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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9
মাংসলেষ্ববকাশেষু যবমাত্রং শস্ত্রং নিদধ্যাত্, অতোঽন্যথাঽর্ধযবমাত্রং ব্রীহিমাত্রং বা ব্রীহিমুখেন, অস্থ্নামুপরি কুঠারিকযা বিধ্যেদর্ধযবমাত্রম্ ||৯||
मांसलेष्ववकाशेषु यवमात्रं शस्त्रं निदध्यात्, अतोऽन्यथाऽर्धयवमात्रं व्रीहिमात्रं वा व्रीहिमुखेन, अस्थ्नामुपरि कुठारिकया विध्येदर्धयवमात्रम् ||९||
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Adhikarana 9 (10) · Śloka 10
ব্যভ্রে বর্ষাসু বিধ্যেত্তু গ্রীষ্মকালে তু শীতলে | হেমন্তকালে মধ্যাহ্নে শস্ত্রকালাস্ত্রযঃ স্মৃতাঃ ||১০||
व्यभ्रे वर्षासु विध्येत्तु ग्रीष्मकाले तु शीतले | हेमन्तकाले मध्याह्ने शस्त्रकालास्त्रयः स्मृताः ||१०||
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Adhikarana 10 (11) · Śloka 11
সম্যক্শস্ত্রনিপাতেন ধারযা যা স্রবেদসৃক্ | মুহূর্তং রুদ্ধা তিষ্ঠেচ্চ সুবিদ্ধাং তাং বিনির্দিশেত্ ||১১||
सम्यक्शस्त्रनिपातेन धारया या स्रवेदसृक् | मुहूर्तं रुद्धा तिष्ठेच्च सुविद्धां तां विनिर्दिशेत् ||११||
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Adhikarana 11 (12) · Śloka 12
যথা কুসুম্ভপুষ্পেভ্যঃ পূর্বং স্রবতি পীতিকা | তথা সিরাসু বিদ্ধাসু দুষ্টমগ্রে প্রবর্ততে ||১২||
यथा कुसुम्भपुष्पेभ्यः पूर्वं स्रवति पीतिका | तथा सिरासु विद्धासु दुष्टमग्रे प्रवर्तते ||१२||
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Adhikarana 12 (13) · Śloka 13
মূর্চ্ছিতস্যাতিভীতস্য শ্রান্তস্য তৃষিতস্য চ | ন বহন্তি সিরা বিদ্ধাস্তথাঽনুত্থিতযন্ত্রিতাঃ ||১৩||
मूर्च्छितस्यातिभीतस्य श्रान्तस्य तृषितस्य च | न वहन्ति सिरा विद्धास्तथाऽनुत्थितयन्त्रिताः ||१३||
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Adhikarana 13 (14) · Śloka 14
ক্ষীণস্য বহুদোষস্য মূর্চ্ছযাঽভিহতস্য চ | ভূযোঽপরাহ্ণে বিস্রাব্যা সাঽপরেদ্যুস্ত্র্যহেঽপি বা ||১৪||
क्षीणस्य बहुदोषस्य मूर्च्छयाऽभिहतस्य च | भूयोऽपराह्णे विस्राव्या साऽपरेद्युस्त्र्यहेऽपि वा ||१४||
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Adhikarana 14 (15) · Śloka 15
রক্তং সশেষদোষং তু কুর্যাদপি বিচক্ষণঃ | ন চাতিনিঃস্রুতং কুর্যাচ্ছেষং সংশমনৈর্জযেত্ ||১৫||
रक्तं सशेषदोषं तु कुर्यादपि विचक्षणः | न चातिनिःस्रुतं कुर्याच्छेषं संशमनैर्जयेत् ||१५||
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Adhikarana 15 (16) · Śloka 16
বলিনো বহুদোষস্য বযঃস্থস্য শরীরিণঃ | পরং প্রমাণমিচ্ছন্তি প্রস্থং শোণিতমোক্ষণে ||১৬||
बलिनो बहुदोषस्य वयःस्थस्य शरीरिणः | परं प्रमाणमिच्छन्ति प्रस्थं शोणितमोक्षणे ||१६||
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Adhikarana 16 (17) · Śloka 17
তত্র পাদদাহপাদহর্ষচিপ্পবিসর্পবাতশোণিতবাতকণ্টকবিচর্চিকাপাদদারীপ্রভৃতিষু ক্ষিপ্রমর্মণ উপরিষ্ঠাদ্ দ্ব্যঙ্গুলে ব্রীহিমুখেন সিরাং বিধ্যেত্, শ্লীপদে তচ্চিকিত্সিতে যথা বক্ষ্যতে, ক্রোষ্টুকশিরঃ- খঞ্জপঙ্গুলবাতবেদনাসু জঙ্ঘাযাং গুল্ফস্যোপরি চতুরঙ্গুলে, অপচ্যামিন্দ্রবস্তেরধস্তাদ্ দ্ব্যঙ্গুলে, জানুসন্ধেরুপর্যধো বা চতুরঙ্গুলে গৃধ্রস্যাং, ঊরুমূলসংশ্রিতাং গলগণ্ডে, এতেনেতরসক্থি বাহূ চ ব্যাখ্যাতৌ; বিশেষতস্তু বামবাহৌ কূর্পরসন্ধেরভ্যন্তরতো বাহুমধ্যে প্লীহ্নি কনিষ্ঠিকানামিকযোর্মধ্যে বা, এবং দক্ষিণবাহৌ যকৃদ্দাল্যে (কফোদরে চ,) এতামেব চ কাসশ্বাসযোরপ্যাদিশন্তি, গৃধ্রস্যামিব বিশ্বাচ্যাং, শ্রোণিং প্রতি সমন্তাদ্ দ্ব্যঙ্গুলে প্রবাহিকাযাং শূলিন্যাং, পরিবর্তিকোপদংশশূকদোষশুক্রব্যাপত্সু মেঢ্রমধ্যে, (বৃষণযোঃ পার্শ্বে মূত্রবৃদ্ধ্যাং, নাভেরধশ্চতুরঙ্গুলে সেবন্যা বামপার্শ্বে দকোদরে ,) বামপার্শ্বে কক্ষাস্তনযোরন্তরেঽন্তর্বিদ্রধৌ পার্শ্বশূলে চ, বাহুশোষাববাহুকযোরপ্যেকে বদন্ত্যংসযোরন্তরে, ত্রিকসন্ধিমধ্যগতাং তৃতীযকে, অধঃস্কন্ধসন্ধিগতামন্যতরপার্শ্বসংস্থিতাং চতুর্থকে, হনুসন্ধিমধ্যগতামপস্মারে, শঙ্খকেশান্তসন্ধিগতামুরোঽপাঙ্গললাটেষু চোন্মাদে, জিহ্বারোগেষ্বধোজিহ্বাযাং দন্তব্যাধিষু চ, তালুনি তালব্যেষু, কর্ণযোরুপরি সমন্তাত্ কর্ণশূলে তদ্রোগেষু চ, গন্ধাগ্রহণে নাসারোগেষু চ নাসাগ্রে, তিমিরাক্ষিপাকপ্রভৃতিষ্বক্ষ্যামযেষূপনাসিকে লালাট্যামপাঙ্গ্যাং বা, এতা এব শিরোরোগাধিমন্থপ্রভৃতিষু রোগেষ্বিতি ||১৭||
तत्र पाददाहपादहर्षचिप्पविसर्पवातशोणितवातकण्टकविचर्चिकापाददारीप्रभृतिषु क्षिप्रमर्मण उपरिष्ठाद् द्व्यङ्गुले व्रीहिमुखेन सिरां विध्येत्, श्लीपदे तच्चिकित्सिते यथा वक्ष्यते, क्रोष्टुकशिरः- खञ्जपङ्गुलवातवेदनासु जङ्घायां गुल्फस्योपरि चतुरङ्गुले, अपच्यामिन्द्रबस्तेरधस्ताद् द्व्यङ्गुले, जानुसन्धेरुपर्यधो वा चतुरङ्गुले गृध्रस्यां, ऊरुमूलसंश्रितां गलगण्डे, एतेनेतरसक्थि बाहू च व्याख्यातौ; विशेषतस्तु वामबाहौ कूर्परसन्धेरभ्यन्तरतो बाहुमध्ये प्लीह्नि कनिष्ठिकानामिकयोर्मध्ये वा, एवं दक्षिणबाहौ यकृद्दाल्ये (कफोदरे च,) एतामेव च कासश्वासयोरप्यादिशन्ति, गृध्रस्यामिव विश्वाच्यां, श्रोणिं प्रति समन्ताद् द्व्यङ्गुले प्रवाहिकायां शूलिन्यां, परिवर्तिकोपदंशशूकदोषशुक्रव्यापत्सु मेढ्रमध्ये, (वृषणयोः पार्श्वे मूत्रवृद्ध्यां, नाभेरधश्चतुरङ्गुले सेवन्या वामपार्श्वे दकोदरे ,) वामपार्श्वे कक्षास्तनयोरन्तरेऽन्तर्विद्रधौ पार्श्वशूले च, बाहुशोषावबाहुकयोरप्येके वदन्त्यंसयोरन्तरे, त्रिकसन्धिमध्यगतां तृतीयके, अधःस्कन्धसन्धिगतामन्यतरपार्श्वसंस्थितां चतुर्थके, हनुसन्धिमध्यगतामपस्मारे, शङ्खकेशान्तसन्धिगतामुरोऽपाङ्गललाटेषु चोन्मादे, जिह्वारोगेष्वधोजिह्वायां दन्तव्याधिषु च, तालुनि तालव्येषु, कर्णयोरुपरि समन्तात् कर्णशूले तद्रोगेषु च, गन्धाग्रहणे नासारोगेषु च नासाग्रे, तिमिराक्षिपाकप्रभृतिष्वक्ष्यामयेषूपनासिके लालाट्यामपाङ्ग्यां वा, एता एव शिरोरोगाधिमन्थप्रभृतिषु रोगेष्विति ||१७||
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Adhikarana 17 (18) · Śloka 18
দুষ্টব্যধা বিংশতিঃ- দুর্বিদ্ধাঽতিবিদ্বা কুঞ্চিতা পিচ্চিতা কুট্টিতাঽপ্রস্রুতাঽত্যুদীর্ণাঽন্তে বিদ্ধা পরিশুষ্কা কূণিতা বেপিতাঽনুত্থিতবিদ্ধা শস্ত্রহতা তির্যগ্বিদ্ধাবিদ্ধাঽব্যধ্যা বিদ্রুতা ধেনুকা পুনঃ পুনর্বিদ্ধা সিরাস্নায্বস্থিসন্ধিমর্মসু চেতি ||১৮||
दुष्टव्यधा विंशतिः- दुर्विद्धाऽतिविद्वा कुञ्चिता पिच्चिता कुट्टिताऽप्रस्रुताऽत्युदीर्णाऽन्ते विद्धा परिशुष्का कूणिता वेपिताऽनुत्थितविद्धा शस्त्रहता तिर्यग्विद्धाविद्धाऽव्यध्या विद्रुता धेनुका पुनः पुनर्विद्धा सिरास्नाय्वस्थिसन्धिमर्मसु चेति ||१८||
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Adhikarana 18 (19) · Śloka 19
তত্র যা সূক্ষ্মশস্ত্রবিদ্ধাঽব্যক্তমসৃক্ স্রবতি রুজাশোফবতী চ সা দুর্বিদ্ধা, প্রমাণাতিরিক্তবিদ্ধাযামন্তঃ প্রবিশতি শোণিতং শোণিতাতিপ্রবৃত্তির্বা সাঽতিবিদ্ধা, কুঞ্চিতাযামপ্যেবং, কুণ্ঠশস্ত্রপ্রমথিতা পৃথুলীভাবমাপন্না পিচ্চিতা, অনাসাদিতা পুনঃ পুনরন্তযোশ্চ বহুশঃ শস্ত্রাভিহতা কুট্টিতা, শীতভযমূর্চ্ছাভিরপ্রবৃত্তশোণিতা অপ্রস্রুতা, তীক্ষ্ণমহামুখশস্ত্রবিদ্ধাঽত্যুদীর্ণা, অল্পরক্তস্রাবিণ্যন্তেবিদ্ধা, ক্ষীণশোণিতস্যানিলপূর্ণা পরিশুষ্কা, চতুর্ভাগাসাদিতা কিঞ্চিত্প্রবৃত্তশোণিতা কূণিতা, দুঃস্থানবন্ধনাদ্বেপমানাযাঃ শোণিতসম্মোহো ভবতি সা বেপিতা, অনুত্থিতবিদ্ধাযামপ্যেবং, ছিন্নাঽতিপ্রবৃত্তশোণিতা ক্রিযাসঙ্গকরী শস্ত্রহতা, তির্যক্প্রণিহিতশস্ত্রা কিঞ্চিচ্ছেষা তির্যগ্বিদ্ধা, বহুশঃ ক্ষতা হীনশস্ত্রপ্রণিধানেনাবিদ্ধা, অশস্ত্রকৃত্যা অব্যধ্যা, অনবস্থিতবিদ্ধা বিদ্রুতা, প্রদেশস্য বহুশোঽবঘট্টনাদারোহদ্ব্যধা মুহুর্মুহুঃ শোণিতস্রাবা ধেনুকা, সূক্ষ্মশস্ত্রব্যধনাদ্বহুশো ভিন্না পুনঃ পুনর্বিদ্ধা, স্নায্বস্থিসিরাসন্ধিমর্মসু বিদ্ধা রুজাং শোফং বৈকল্যং মরণং চাপাদযতি ||১৯||
तत्र या सूक्ष्मशस्त्रविद्धाऽव्यक्तमसृक् स्रवति रुजाशोफवती च सा दुर्विद्धा, प्रमाणातिरिक्तविद्धायामन्तः प्रविशति शोणितं शोणितातिप्रवृत्तिर्वा साऽतिविद्धा, कुञ्चितायामप्येवं, कुण्ठशस्त्रप्रमथिता पृथुलीभावमापन्ना पिच्चिता, अनासादिता पुनः पुनरन्तयोश्च बहुशः शस्त्राभिहता कुट्टिता, शीतभयमूर्च्छाभिरप्रवृत्तशोणिता अप्रस्रुता, तीक्ष्णमहामुखशस्त्रविद्धाऽत्युदीर्णा, अल्परक्तस्राविण्यन्तेविद्धा, क्षीणशोणितस्यानिलपूर्णा परिशुष्का, चतुर्भागासादिता किञ्चित्प्रवृत्तशोणिता कूणिता, दुःस्थानबन्धनाद्वेपमानायाः शोणितसम्मोहो भवति सा वेपिता, अनुत्थितविद्धायामप्येवं, छिन्नाऽतिप्रवृत्तशोणिता क्रियासङ्गकरी शस्त्रहता, तिर्यक्प्रणिहितशस्त्रा किञ्चिच्छेषा तिर्यग्विद्धा, बहुशः क्षता हीनशस्त्रप्रणिधानेनाविद्धा, अशस्त्रकृत्या अव्यध्या, अनवस्थितविद्धा विद्रुता, प्रदेशस्य बहुशोऽवघट्टनादारोहद्व्यधा मुहुर्मुहुः शोणितस्रावा धेनुका, सूक्ष्मशस्त्रव्यधनाद्बहुशो भिन्ना पुनः पुनर्विद्धा, स्नाय्वस्थिसिरासन्धिमर्मसु विद्धा रुजां शोफं वैकल्यं मरणं चापादयति ||१९||
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Adhikarana 19 (20) · Śloka 20
ভবন্তি চাত্র- সিরাসু শিক্ষিতো নাস্তি চলা হ্যেতাঃ স্বভাবতঃ | মত্স্যবত্ পরিবর্তন্তে তস্মাদ্যত্নেন তাডযেত্ ||২০||
भवन्ति चात्र- सिरासु शिक्षितो नास्ति चला ह्येताः स्वभावतः | मत्स्यवत् परिवर्तन्ते तस्माद्यत्नेन ताडयेत् ||२०||
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Adhikarana 20 (21) · Śloka 21
অজানতা গৃহীতে তু শস্ত্রে কাযনিপাতিতে | ভবন্তি ব্যাপদশ্চৈতা বহবশ্চাপ্যুপদ্রবাঃ ||২১||
अजानता गृहीते तु शस्त्रे कायनिपातिते | भवन्ति व्यापदश्चैता बहवश्चाप्युपद्रवाः ||२१||
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Adhikarana 21 (22) · Śloka 22
স্নেহাদিভিঃ ক্রিযাযোগৈর্ন তথা লেপনৈরপি | যান্ত্যাশু ব্যাধযঃ শান্তিং যথা সম্যক্ সিরাব্যধাত্ ||২২||
स्नेहादिभिः क्रियायोगैर्न तथा लेपनैरपि | यान्त्याशु व्याधयः शान्तिं यथा सम्यक् सिराव्यधात् ||२२||
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Adhikarana 22 (23) · Śloka 23
সিরাব্যধশ্চিকিত্সার্ধং শল্যতন্ত্রে প্রকীর্তিতঃ | যথা প্রণিহিতঃ সম্যগ্বস্তিঃ কাযচিকিত্সিতে ||২৩||
सिराव्यधश्चिकित्सार्धं शल्यतन्त्रे प्रकीर्तितः | यथा प्रणिहितः सम्यग्बस्तिः कायचिकित्सिते ||२३||
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Adhikarana 23 (24) · Śloka 24
তত্র স্নিগ্ধস্বিন্নবান্তবিরিক্তাস্থাপিতানুবসিতসিরাবিদ্ধৈঃ পরিহর্তব্যানি- ক্রোধাযাসমৈথুনদিবাস্বপ্নবাগ্ব্যাযামযানাধ্যযনস্থানাসনচঙ্ক্রমণশীতবাতাতপবিরুদ্ধাসাত্ম্যাজীর্ণান্যাবললাভাত্ , মাসমেকে মন্যন্তে | এতেষাং বিস্তরমুপরিষ্ঠাদ্বক্ষ্যামঃ ||২৪||
तत्र स्निग्धस्विन्नवान्तविरिक्तास्थापितानुवसितसिराविद्धैः परिहर्तव्यानि- क्रोधायासमैथुनदिवास्वप्नवाग्व्यायामयानाध्ययनस्थानासनचङ्क्रमणशीतवातातपविरुद्धासात्म्याजीर्णान्याबललाभात् , मासमेके मन्यन्ते | एतेषां विस्तरमुपरिष्ठाद्वक्ष्यामः ||२४||
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Adhikarana 24 (25) · Śloka 25
সিরাবিষাণতুম্বৈস্তু জলৌকাভিঃ পদৈস্তথা | অবগাঢং যথাপূর্বং নির্হরেদ্দুষ্টশোণিতম্ ||২৫||
सिराविषाणतुम्बैस्तु जलौकाभिः पदैस्तथा | अवगाढं यथापूर्वं निर्हरेद्दुष्टशोणितम् ||२५||
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Adhikarana 25 (26) · Śloka 26
অবগাঢে জলৌকা স্যাত্ প্রচ্ছন্নং পিণ্ডিতে হিতম্ | সিরাঽঙ্গব্যাপকে রক্তে শৃঙ্গালাবূ ত্বচি স্থিতে ||২৬||
अवगाढे जलौका स्यात् प्रच्छन्नं पिण्डिते हितम् | सिराऽङ्गव्यापके रक्ते शृङ्गालाबू त्वचि स्थिते ||२६||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 8
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং শারীরস্থানে সিরাব্যধবিধিশারীরং নামাষ্টমোঽধ্যাযঃ ||৮||
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने सिराव्यधविधिशारीरं नामाष्टमोऽध्यायः ||८||
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