Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ প্রত্যেকমর্মনির্দেশং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातः प्रत्येकमर्मनिर्देशं शारीरं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ প্রত্যেকমর্মনির্দেশং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातः प्रत्येकमर्मनिर्देशं शारीरं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
সপ্তোত্তরং মর্মশতম্ | তানি মর্মাণি পঞ্চাত্মকানি ভবন্তি; তদ্যথা- মাংসমর্মাণি, সিরামর্মাণি, স্নাযুমর্মাণি, অস্থিমর্মাণি, সন্ধিমর্মাণি চেতি | ন খলু মাংসসিরাস্নায্বস্থিসন্ধিব্যতিরেকেণান্যানি মর্মাণি ভবন্তি, যস্মান্নোপলভ্যন্তে ||৩||
सप्तोत्तरं मर्मशतम् | तानि मर्माणि पञ्चात्मकानि भवन्ति; तद्यथा- मांसमर्माणि, सिरामर्माणि, स्नायुमर्माणि, अस्थिमर्माणि, सन्धिमर्माणि चेति | न खलु मांससिरास्नाय्वस्थिसन्धिव्यतिरेकेणान्यानि मर्माणि भवन्ति, यस्मान्नोपलभ्यन्ते ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
তত্রৈকাদশ মাংসমর্মাণি, একচত্বারিংশত্ সিরামর্মাণি, সপ্তবিংশতিঃ স্নাযুমর্মাণি, অষ্টাবস্থিমর্মাণি, বিংশতিঃ সন্ধিমর্মাণি চেতি | তদেতত্ সপ্তোত্তরং মর্মশতম্ ||৪||
तत्रैकादश मांसमर्माणि, एकचत्वारिंशत् सिरामर्माणि, सप्तविंशतिः स्नायुमर्माणि, अष्टावस्थिमर्माणि, विंशतिः सन्धिमर्माणि चेति | तदेतत् सप्तोत्तरं मर्मशतम् ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
তেষামেকাদশৈকস্মিন্ সক্থ্নি ভবন্তি, এতেনেতরসক্থি বাহূ চ ব্যাখ্যাতৌ, উদরোরসোর্দ্বাদশ, চতুর্দশ পৃষ্ঠে, গ্রীবাং প্রত্যূর্ধ্বং সপ্তত্রিংশত্ ||৫||
तेषामेकादशैकस्मिन् सक्थ्नि भवन्ति, एतेनेतरसक्थि बाहू च व्याख्यातौ, उदरोरसोर्द्वादश, चतुर्दश पृष्ठे, ग्रीवां प्रत्यूर्ध्वं सप्तत्रिंशत् ||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
তত্র সক্থিমর্মাণি ক্ষিপ্রতলহৃদযকূর্চকূর্চশিরোগুল্ফেন্দ্রবস্তিজান্বাণ্যুর্বিলোহিতাক্ষাণি বিটপং চেতি, এতেনেতরত্সক্থি ব্যাখ্যাতম্ | উদরোরসোস্তু গুদবস্তিনাভিহৃদযস্তনমূলস্তনরোহিতাপলাপান্যপস্তম্ভৌ চেতি | পৃষ্ঠমর্মাণি তু কটীকতরুণকুকুন্দরনিতম্বপার্শ্বসন্ধিবৃহত্যংসফলকান্যংসৌ চেতি | বাহুমর্মাণি তু শিপ্রতলহৃদযকূর্চকূর্চশিরোমণিবন্ধেন্দ্রবস্তিকূর্পরাণ্যুর্বীলোহিতাক্ষাণি কক্ষধরং চেতি; এতেনেতরো বাহুর্ব্যাখ্যাতঃ | জত্রুণ ঊর্ধ্বং চতস্রো ধমন্যোঽষ্টৌ মাতৃকা দ্বে কৃকাটিকে দ্বে বিধুরে দ্বে ফণে দ্বাবপাঙ্গৌ দ্বাবাবর্তৌ দ্বাবুত্ক্ষেপৌ দ্বৌ শঙ্খাবেকা স্থপনী পঞ্চ সীমন্তাশ্চত্বারি শৃঙ্গাটকান্যেকোঽধিপতিরিতি ||৬||
तत्र सक्थिमर्माणि क्षिप्रतलहृदयकूर्चकूर्चशिरोगुल्फेन्द्रबस्तिजान्वाण्युर्विलोहिताक्षाणि विटपं चेति, एतेनेतरत्सक्थि व्याख्यातम् | उदरोरसोस्तु गुदबस्तिनाभिहृदयस्तनमूलस्तनरोहितापलापान्यपस्तम्भौ चेति | पृष्ठमर्माणि तु कटीकतरुणकुकुन्दरनितम्बपार्श्वसन्धिबृहत्यंसफलकान्यंसौ चेति | बाहुमर्माणि तु शिप्रतलहृदयकूर्चकूर्चशिरोमणिबन्धेन्द्रबस्तिकूर्पराण्युर्वीलोहिताक्षाणि कक्षधरं चेति; एतेनेतरो बाहुर्व्याख्यातः | जत्रुण ऊर्ध्वं चतस्रो धमन्योऽष्टौ मातृका द्वे कृकाटिके द्वे विधुरे द्वे फणे द्वावपाङ्गौ द्वावावर्तौ द्वावुत्क्षेपौ द्वौ शङ्खावेका स्थपनी पञ्च सीमन्ताश्चत्वारि शृङ्गाटकान्येकोऽधिपतिरिति ||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
তত্র তলহৃদযেন্দ্রবস্তিগুদস্তনরোহিতানি মাংসমর্মাণি, নীলধমনীমাতৃকাশৃঙ্গাটকাপাঙ্গস্থপনীফণস্তনমূলাপলাপাপস্তম্ভহৃদযনাভিপার্শ্বসন্ধিবৃহতীলোহিতাক্ষোর্ব্যঃ সিরামর্মাণি, আণী(ণি)বিটপকক্ষধরকূর্চকূর্চশিরোবস্তিক্ষিপ্রাংসবিধুরোত্ক্ষেপাঃ স্নাযুমর্মাণি, কটীকতরুণনিতম্বাংসফলকশঙ্খাস্ত্বস্থিমর্মাণি, জানুকূর্পরসীমন্তাধিপতিগুল্ফমণিবন্ধকুকুন্দরাবর্তকৃকাটিকাশ্চেতি সন্ধিমর্মাণি ||৭||
तत्र तलहृदयेन्द्रबस्तिगुदस्तनरोहितानि मांसमर्माणि, नीलधमनीमातृकाशृङ्गाटकापाङ्गस्थपनीफणस्तनमूलापलापापस्तम्भहृदयनाभिपार्श्वसन्धिबृहतीलोहिताक्षोर्व्यः सिरामर्माणि, आणी(णि)विटपकक्षधरकूर्चकूर्चशिरोबस्तिक्षिप्रांसविधुरोत्क्षेपाः स्नायुमर्माणि, कटीकतरुणनितम्बांसफलकशङ्खास्त्वस्थिमर्माणि, जानुकूर्परसीमन्ताधिपतिगुल्फमणिबन्धकुकुन्दरावर्तकृकाटिकाश्चेति सन्धिमर्माणि ||७||
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Adhikarana 7 (8-14) · Śloka 14
তান্যেতানি পঞ্চবিকল্পানি ভবন্তি; তদ্যথা- সদ্যঃপ্রাণহরাণি, কালান্তরপ্রাণহরাণি, বিশল্যঘ্নানি, বৈকল্যকরাণি, রুজাকরাণি চেতি | তত্র সদ্যঃপ্রাণহরাণ্যেকোনবিংশতিঃ, কালান্তরপ্রাণহরাণি ত্রযস্ত্রিংশত্, ত্রীণি বিশল্যঘ্নানি, চতুশ্চত্বারিংশদ্বৈকল্যকরাণি, অষ্টৌ রুজাকরাণীতি ||৮|| ভবন্তি চাত্র- শৃঙ্গাটকান্যধিপতিঃ শঙ্খৌ কণ্ঠসিরা গুদম্ | হৃদযং বস্তিনাভ্যৌ(ভী) চ ঘ্নন্তি সদ্যো হতানি তু ||৯|| বক্ষোমর্মাণি সীমন্ততলক্ষিপ্রেন্দ্রবস্তযঃ | কটীকতরুণে সন্ধী পার্শ্বজৌ বৃহতী চ যা ||১০|| নিতম্বাবিতি চৈতানি কালান্তরহরাণি তু | উত্ক্ষেপৌ স্থপনী চৈব বিশল্যঘ্নানি নির্দিশেত্ ||১১|| লোহিতাক্ষাণি জানূর্বীকূর্চবিটপকূর্পরাঃ | কুকুন্দরে কক্ষধরে বিধুরে সকৃকাটিকে ||১২|| অংসাংসফলকাপাঙ্গা নীলে মন্যে ফণৌ তথা | বৈকল্যকরণান্যাহুরাবর্তৌ দ্বৌ তথৈব চ ||১৩|| গুল্ফৌ দ্বৌ মণিবন্ধৌ দ্বৌ দ্বে দ্বে কূর্চশিরাংসি চ | রুজাকরাণি জানীযাদষ্টাবেতানি বুদ্ধিমান্ | ক্ষিপ্রাণি বিদ্ধমাত্রাণি ঘ্নন্তি কালান্তরেণ চ ||১৪||
तान्येतानि पञ्चविकल्पानि भवन्ति; तद्यथा- सद्यःप्राणहराणि, कालान्तरप्राणहराणि, विशल्यघ्नानि, वैकल्यकराणि, रुजाकराणि चेति | तत्र सद्यःप्राणहराण्येकोनविंशतिः, कालान्तरप्राणहराणि त्रयस्त्रिंशत्, त्रीणि विशल्यघ्नानि, चतुश्चत्वारिंशद्वैकल्यकराणि, अष्टौ रुजाकराणीति ||८|| भवन्ति चात्र- शृङ्गाटकान्यधिपतिः शङ्खौ कण्ठसिरा गुदम् | हृदयं बस्तिनाभ्यौ(भी) च घ्नन्ति सद्यो हतानि तु ||९|| वक्षोमर्माणि सीमन्ततलक्षिप्रेन्द्रबस्तयः | कटीकतरुणे सन्धी पार्श्वजौ बृहती च या ||१०|| नितम्बाविति चैतानि कालान्तरहराणि तु | उत्क्षेपौ स्थपनी चैव विशल्यघ्नानि निर्दिशेत् ||११|| लोहिताक्षाणि जानूर्वीकूर्चविटपकूर्पराः | कुकुन्दरे कक्षधरे विधुरे सकृकाटिके ||१२|| अंसांसफलकापाङ्गा नीले मन्ये फणौ तथा | वैकल्यकरणान्याहुरावर्तौ द्वौ तथैव च ||१३|| गुल्फौ द्वौ मणिबन्धौ द्वौ द्वे द्वे कूर्चशिरांसि च | रुजाकराणि जानीयादष्टावेतानि बुद्धिमान् | क्षिप्राणि विद्धमात्राणि घ्नन्ति कालान्तरेण च ||१४||
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Adhikarana 8 (15) · Śloka 15
মর্মাণি মাংসসিরাস্নায্বস্থিসন্ধিসন্নিপাতাঃ; তেষু স্বভাবত এব বিশেষেণ প্রাণাস্তিষ্ঠন্তি; তস্মান্মর্মস্বভিহতাস্তাংস্তান্ ভাবানাপদ্যন্তে ||১৫||
मर्माणि मांससिरास्नाय्वस्थिसन्धिसन्निपाताः; तेषु स्वभावत एव विशेषेण प्राणास्तिष्ठन्ति; तस्मान्मर्मस्वभिहतास्तांस्तान् भावानापद्यन्ते ||१५||
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Adhikarana 9 (16) · Śloka 16
তত্র সদ্যঃপ্রাণহরাণ্যাগ্নেযানি, অগ্নিগুণেষ্বাশু ক্ষীণেষু ক্ষপযন্তি; কালান্তরপ্রাণহরাণি সৌম্যাগ্নেযানি, অগ্নিগুণেষ্বাশু ক্ষীণেষু ক্রমেণ চ সোমগুণেষু কালান্তরেণ ক্ষপযন্তি; বিশল্যপ্রাণহরাণি বাযব্যানি, শল্যমুখাবরুদ্ধো যাবদন্তর্বাযুস্তিষ্ঠতি তাবজ্জীবতি, উদ্ধৃতমাত্রে তু শল্যে মর্মস্থানাশ্রিতো বাযুর্নিষ্ক্রামতি, তস্মাত্ সশল্যো জীবত্যুদ্ধৃতশল্যো ম্রিযতে (পাকাত্পতিতশল্যো বা জীবতি); বৈকল্যকরাণি সৌম্যানি, সোমো হি স্থিরত্বাচ্ছৈত্যাচ্চ প্রাণাবলম্বনং করোতি; রুজাকরাণ্যগ্নিবাযুগুণভূযিষ্ঠানি, বিশেষতশ্চ তৌ রুজাকরৌ; পাঞ্চভৌতিকীং চ রুজামাহুরেকে ||১৬||
तत्र सद्यःप्राणहराण्याग्नेयानि, अग्निगुणेष्वाशु क्षीणेषु क्षपयन्ति; कालान्तरप्राणहराणि सौम्याग्नेयानि, अग्निगुणेष्वाशु क्षीणेषु क्रमेण च सोमगुणेषु कालान्तरेण क्षपयन्ति; विशल्यप्राणहराणि वायव्यानि, शल्यमुखावरुद्धो यावदन्तर्वायुस्तिष्ठति तावज्जीवति, उद्धृतमात्रे तु शल्ये मर्मस्थानाश्रितो वायुर्निष्क्रामति, तस्मात् सशल्यो जीवत्युद्धृतशल्यो म्रियते (पाकात्पतितशल्यो वा जीवति); वैकल्यकराणि सौम्यानि, सोमो हि स्थिरत्वाच्छैत्याच्च प्राणावलम्बनं करोति; रुजाकराण्यग्निवायुगुणभूयिष्ठानि, विशेषतश्च तौ रुजाकरौ; पाञ्चभौतिकीं च रुजामाहुरेके ||१६||
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Adhikarana 10 (17) · Śloka 17
কেচিদাহুর্মাংসাদীনাং পঞ্চানামপি সমস্তানাং বিবৃদ্ধানাং সমবাযাত্ সদ্যঃপ্রাণহরাণি, একহীনানামল্পানাং বা কালান্তরপ্রাণহরাণি, দ্বিহীনানাং বিশল্যপ্রাণহরাণি , ত্রিহীনানাং বৈকল্যকরাণি, একস্মিন্নেব রুজাকরাণীতি | নৈবং, যতোঽস্থিমর্মস্বপ্যভিহতেষু শোণিতাগমনং ভবতি ||১৭||
केचिदाहुर्मांसादीनां पञ्चानामपि समस्तानां विवृद्धानां समवायात् सद्यःप्राणहराणि, एकहीनानामल्पानां वा कालान्तरप्राणहराणि, द्विहीनानां विशल्यप्राणहराणि , त्रिहीनानां वैकल्यकराणि, एकस्मिन्नेव रुजाकराणीति | नैवं, यतोऽस्थिमर्मस्वप्यभिहतेषु शोणितागमनं भवति ||१७||
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Adhikarana 11 (18) · Śloka 18
চতুর্বিধা যাস্তু সিরাঃ শরীরে প্রাযেণ তা মর্মসু সন্নিবিষ্টাঃ | স্নায্বস্থিমাংসানি তথৈব সন্ধীন্ সন্তর্প্য দেহং প্রতিযাপযন্তি ||১৮||
चतुर्विधा यास्तु सिराः शरीरे प्रायेण ता मर्मसु सन्निविष्टाः | स्नाय्वस्थिमांसानि तथैव सन्धीन् सन्तर्प्य देहं प्रतियापयन्ति ||१८||
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Adhikarana 12 (19-20) · Śloka 20
ততঃ ক্ষতে মর্মণি তাঃ প্রবৃদ্ধঃ সমন্ততো বাযুরভিস্তৃণোতি | বিবর্ধমানস্তু স মাতরিশ্বা রুজঃ সুতীব্রাঃ প্রতনোতি কাযে ||১৯|| রুজাভিভূতং তু ততঃ শরীরং প্রলীযতে নশ্যতি চাস্য সঞ্জ্ঞা | অতো হি শল্যং বিনিহর্তুমিচ্ছন্মর্মাণি যত্নেন পরীক্ষ্য কর্ষেত্ ||২০||
ततः क्षते मर्मणि ताः प्रवृद्धः समन्ततो वायुरभिस्तृणोति | विवर्धमानस्तु स मातरिश्वा रुजः सुतीव्राः प्रतनोति काये ||१९|| रुजाभिभूतं तु ततः शरीरं प्रलीयते नश्यति चास्य सञ्ज्ञा | अतो हि शल्यं विनिहर्तुमिच्छन्मर्माणि यत्नेन परीक्ष्य कर्षेत् ||२०||
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Adhikarana 13 (21) · Śloka 21
এতেন শেষং ব্যাখ্যাতম্ ||২১||
एतेन शेषं व्याख्यातम् ||२१||
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Adhikarana 14 (22) · Śloka 22
তত্র সদ্যঃপ্রাণহরমন্তে বিদ্ধং কালান্তরেণ মারযতি, কালান্তরপ্রাণহরমন্তে বিদ্ধং বৈকল্যমাপাদযতি, বিশল্যঘ্নং বৈকল্যকরং চ ভবতি, বৈকল্যকরং কালান্তরেণ ক্লেশযতি রুজাং চ করোতি, রুজাকরমতীব্রবেদনং ভবতি ||২২||
तत्र सद्यःप्राणहरमन्ते विद्धं कालान्तरेण मारयति, कालान्तरप्राणहरमन्ते विद्धं वैकल्यमापादयति, विशल्यघ्नं वैकल्यकरं च भवति, वैकल्यकरं कालान्तरेण क्लेशयति रुजां च करोति, रुजाकरमतीव्रवेदनं भवति ||२२||
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Adhikarana 15 (23) · Śloka 23
তত্র সদ্যঃপ্রাণহরাণি সপ্তরাত্রাভ্যন্তরান্মারযন্তি, কালান্তরপ্রাণহরাণি পক্ষান্মাসাদ্বা, তেষ্বপি তু ক্ষিপ্রাণি কদাচিদাশু মারযন্তি, বিশল্যপ্রাণহরাণি বৈকল্যকরাণি চ কদাচিদত্যভিহতানি মারযন্তি ||২৩||
तत्र सद्यःप्राणहराणि सप्तरात्राभ्यन्तरान्मारयन्ति, कालान्तरप्राणहराणि पक्षान्मासाद्वा, तेष्वपि तु क्षिप्राणि कदाचिदाशु मारयन्ति, विशल्यप्राणहराणि वैकल्यकराणि च कदाचिदत्यभिहतानि मारयन्ति ||२३||
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Adhikarana 16 (24) · Śloka 24
অত ঊর্ধ্বং সক্থিমর্মাণি ব্যাখ্যাস্যামঃ- তত্র পাদস্যাঙ্গুষ্ঠাঙ্গুল্যোর্মধ্যে ক্ষিপ্রং নাম মর্ম, তত্র বিদ্ধস্যাক্ষেপকেণ মরণং; মধ্যমাঙ্গুলীমনুপূর্বেণ মধ্যে পাদতলস্য তলহৃদযং নাম , তত্র রুজাভির্মরণং; ক্ষিপ্রস্যোপরিষ্টাদুভযতঃ কূর্চো নাম, তত্র পাদস্য ভ্রমণবেপনে ভবতঃ; গুল্ফসন্ধেরধ উভযতঃ কূর্চশিরঃ, তত্র রুজাশোফৌ; পাদজঙ্ঘযোঃ সন্ধানে গুল্ফঃ, তত্র রুজঃ স্তব্ধপাদতা খঞ্জতা বা; পার্ষ্ণিং প্রতি জঙ্ঘামধ্যে ইন্দ্রবস্তিঃ, তত্র শোণিতক্ষযেণ মরণং; জঙ্ঘোর্বোঃ সন্ধানে জানু, তত্র খঞ্জতা; জানুন ঊর্ধ্বমুভযতস্ত্র্যঙ্গুলমাণী , তত্র শোফাভিবৃদ্ধিঃ স্তব্ধসক্থিতা চ; ঊরুমধ্যে উর্বী, তত্র শোণিতক্ষযাত্ সক্থিশোষঃ; উর্ব্যা ঊর্ধ্বমধো বঙ্ক্ষণসন্ধেরূরুমূলে লোহিতাক্ষং, তত্র লোহিতক্ষযেণ মরণং পক্ষাঘাতো বা; বঙ্ক্ষণবৃষণযোরন্তরে বিটপং, তত্র ষাণ্ঢ্যমল্পশুক্রতা বা ভবতি; এবমেতান্যেকাদশ সক্থিমর্মাণি ব্যাখ্যাতানি | এতেনেতরসক্থি বাহূ চ ব্যাখ্যাতৌ | বিশেষতস্তু যানি সক্থ্নি গুল্ফজানুবিটপানি, তানি বাহৌ মণিবন্ধকূর্পরকক্ষধরাণি ; যথা বঙ্ক্ষণবৃষণযোরন্তরে বিটপমেবং বক্ষঃকক্ষযোর্মধ্যে কক্ষধরং, তস্মিন্ বিদ্ধে ত এবোপদ্রবাঃ; বিশেষতস্তু মণিবন্ধে কুণ্ঠতা, কূর্পরাখ্যে কুণিঃ, কক্ষধরে পক্ষাঘাতঃ | এবমেতানি চতুশ্চত্বারিংশচ্ছাখাসু মর্মাণি ব্যাখ্যাতানি ||২৪||
अत ऊर्ध्वं सक्थिमर्माणि व्याख्यास्यामः- तत्र पादस्याङ्गुष्ठाङ्गुल्योर्मध्ये क्षिप्रं नाम मर्म, तत्र विद्धस्याक्षेपकेण मरणं; मध्यमाङ्गुलीमनुपूर्वेण मध्ये पादतलस्य तलहृदयं नाम , तत्र रुजाभिर्मरणं; क्षिप्रस्योपरिष्टादुभयतः कूर्चो नाम, तत्र पादस्य भ्रमणवेपने भवतः; गुल्फसन्धेरध उभयतः कूर्चशिरः, तत्र रुजाशोफौ; पादजङ्घयोः सन्धाने गुल्फः, तत्र रुजः स्तब्धपादता खञ्जता वा; पार्ष्णिं प्रति जङ्घामध्ये इन्द्रबस्तिः, तत्र शोणितक्षयेण मरणं; जङ्घोर्वोः सन्धाने जानु, तत्र खञ्जता; जानुन ऊर्ध्वमुभयतस्त्र्यङ्गुलमाणी , तत्र शोफाभिवृद्धिः स्तब्धसक्थिता च; ऊरुमध्ये उर्वी, तत्र शोणितक्षयात् सक्थिशोषः; उर्व्या ऊर्ध्वमधो वङ्क्षणसन्धेरूरुमूले लोहिताक्षं, तत्र लोहितक्षयेण मरणं पक्षाघातो वा; वङ्क्षणवृषणयोरन्तरे विटपं, तत्र षाण्ढ्यमल्पशुक्रता वा भवति; एवमेतान्येकादश सक्थिमर्माणि व्याख्यातानि | एतेनेतरसक्थि बाहू च व्याख्यातौ | विशेषतस्तु यानि सक्थ्नि गुल्फजानुविटपानि, तानि बाहौ मणिबन्धकूर्परकक्षधराणि ; यथा वङ्क्षणवृषणयोरन्तरे विटपमेवं वक्षःकक्षयोर्मध्ये कक्षधरं, तस्मिन् विद्धे त एवोपद्रवाः; विशेषतस्तु मणिबन्धे कुण्ठता, कूर्पराख्ये कुणिः, कक्षधरे पक्षाघातः | एवमेतानि चतुश्चत्वारिंशच्छाखासु मर्माणि व्याख्यातानि ||२४||
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Adhikarana 17 (25) · Śloka 25
অত ঊর্ধ্বমুদরোরসোর্মর্মাণ্যনুব্যাখ্যাস্যামঃ - তত্র বাতবর্চোনিরসনং স্থূলান্ত্রপ্রতিবদ্ধং গুদং নাম মর্ম, তত্র সদ্যোমরণং; অল্পমাংসশোণিতোঽভ্যন্তরতঃ কট্যাং মূত্রাশযো বস্তিঃ, তত্রাপি সদ্যোমরণমশ্মরীব্রণাদৃতে, তত্রাপ্যুভযতো ভিন্নে ন জীবতি, একতো ভিন্নে মূত্রস্রাবী ব্রণো ভবতি, স তু যত্নেনোপক্রান্তো রোহতি; পক্বামাশযযোর্মধ্যে সিরাপ্রভবা নাভিঃ, তত্রাপি সদ্যো মরণং; স্তনযোর্মধ্যমধিষ্ঠাযোরস্যামাশযদ্বারং সত্ত্বরজস্তমসামধিষ্ঠানং হৃদযং, তত্রাপি সদ্য এব মরণং; স্তনযোরধস্তাদ্ দ্ব্যঙ্গুলমুভযতঃ স্তনমূলে, তত্র কফপূর্ণকোষ্ঠতযা (কাসশ্বাসাভ্যাং ) ম্রিযতে; স্তনচূচুকযোরূর্ধ্বং দ্ব্যঙ্গুলমুভযতঃ স্তনরোহিতৌ , তত্র লোহিতপূর্ণকোষ্ঠতযা কাসশ্বাসাভ্যাং চ ম্রিযতে; অংসকূটযোরধস্তাত্ পার্শ্বোপরিভাগযোরপলাপৌ নাম, তত্র রক্তেন পূযভাবং গতেন মরণং; উভযত্রোরসো নাড্যৌ বাতবহে অপস্তম্ভৌ নাম, তত্র বাতপূর্ণকোষ্ঠতযা কাসশ্বাসাভ্যাং চ মরণম্; এবমেতান্যুদরোরসোর্দ্বাদশ মর্মাণি ব্যাখ্যাতানি ||২৫||
अत ऊर्ध्वमुदरोरसोर्मर्माण्यनुव्याख्यास्यामः - तत्र वातवर्चोनिरसनं स्थूलान्त्रप्रतिबद्धं गुदं नाम मर्म, तत्र सद्योमरणं; अल्पमांसशोणितोऽभ्यन्तरतः कट्यां मूत्राशयो बस्तिः, तत्रापि सद्योमरणमश्मरीव्रणादृते, तत्राप्युभयतो भिन्ने न जीवति, एकतो भिन्ने मूत्रस्रावी व्रणो भवति, स तु यत्नेनोपक्रान्तो रोहति; पक्वामाशययोर्मध्ये सिराप्रभवा नाभिः, तत्रापि सद्यो मरणं; स्तनयोर्मध्यमधिष्ठायोरस्यामाशयद्वारं सत्त्वरजस्तमसामधिष्ठानं हृदयं, तत्रापि सद्य एव मरणं; स्तनयोरधस्ताद् द्व्यङ्गुलमुभयतः स्तनमूले, तत्र कफपूर्णकोष्ठतया (कासश्वासाभ्यां ) म्रियते; स्तनचूचुकयोरूर्ध्वं द्व्यङ्गुलमुभयतः स्तनरोहितौ , तत्र लोहितपूर्णकोष्ठतया कासश्वासाभ्यां च म्रियते; अंसकूटयोरधस्तात् पार्श्वोपरिभागयोरपलापौ नाम, तत्र रक्तेन पूयभावं गतेन मरणं; उभयत्रोरसो नाड्यौ वातवहे अपस्तम्भौ नाम, तत्र वातपूर्णकोष्ठतया कासश्वासाभ्यां च मरणम्; एवमेतान्युदरोरसोर्द्वादश मर्माणि व्याख्यातानि ||२५||
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Adhikarana 18 (26) · Śloka 26
অত ঊর্ধ্বং পৃষ্ঠমর্মাণি ব্যাখ্যাস্যামঃ - তত্র পৃষ্ঠবংশমুভযতঃ প্রতিশ্রোণিকাণ্ডমস্থিনী কটীকতরুণে, তত্র শোণিতক্ষযাত্ পাণ্ডুর্বিবর্ণো হীনরূপশ্চ ম্রিযতে; পার্শ্বযোর্জঘনবহির্ভাগে পৃষ্ঠবংশমুভযতো কুকুন্দরে, তত্র স্পর্শাজ্ঞানমধঃকাযে চেষ্টোপঘাতশ্চ; শ্রোণীকাণ্ডযোরুপর্যাশযাচ্ছাদনৌ পার্শ্বান্তরপ্রতিবদ্ধৌ নিতম্বৌ, তত্রাধঃকাযশোষো দৌর্বল্যাচ্চ মরণং; অধঃপার্শ্বান্তরপ্রতিবদ্ধৌ জঘনপার্শ্বমধ্যযোস্তির্যগূর্ধ্বং চ জঘনাত্ পার্শ্বসন্ধী, তত্র লোহিতপূর্ণকোষ্ঠতযা ম্রিযতে; স্তনমূলাদৃজূভযতঃ পৃষ্ঠবংশস্য বৃহতী, তত্র শোণিতাতিপ্রবৃত্তিনিমিত্তৈরুপদ্রবৈর্ম্রিযতে; পৃষ্ঠোপরি পৃষ্ঠবংশমুভযতস্ত্রিকসম্বদ্ধে অংসফলকে, তত্র বাহ্বোঃ স্বাপশোষৌ ; বাহুমূর্ধগ্রীবামধ্যেংঽসপীঠস্কন্ধবন্ধনাবংসৌ, তত্র স্তব্ধবাহুতা; এবমেতানি চতুর্দশ পৃষ্ঠমর্মাণি ব্যাখ্যাতানি ||২৬||
अत ऊर्ध्वं पृष्ठमर्माणि व्याख्यास्यामः - तत्र पृष्ठवंशमुभयतः प्रतिश्रोणिकाण्डमस्थिनी कटीकतरुणे, तत्र शोणितक्षयात् पाण्डुर्विवर्णो हीनरूपश्च म्रियते; पार्श्वयोर्जघनबहिर्भागे पृष्ठवंशमुभयतो कुकुन्दरे, तत्र स्पर्शाज्ञानमधःकाये चेष्टोपघातश्च; श्रोणीकाण्डयोरुपर्याशयाच्छादनौ पार्श्वान्तरप्रतिबद्धौ नितम्बौ, तत्राधःकायशोषो दौर्बल्याच्च मरणं; अधःपार्श्वान्तरप्रतिबद्धौ जघनपार्श्वमध्ययोस्तिर्यगूर्ध्वं च जघनात् पार्श्वसन्धी, तत्र लोहितपूर्णकोष्ठतया म्रियते; स्तनमूलादृजूभयतः पृष्ठवंशस्य बृहती, तत्र शोणितातिप्रवृत्तिनिमित्तैरुपद्रवैर्म्रियते; पृष्ठोपरि पृष्ठवंशमुभयतस्त्रिकसम्बद्धे अंसफलके, तत्र बाह्वोः स्वापशोषौ ; बाहुमूर्धग्रीवामध्येंऽसपीठस्कन्धबन्धनावंसौ, तत्र स्तब्धबाहुता; एवमेतानि चतुर्दश पृष्ठमर्माणि व्याख्यातानि ||२६||
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Adhikarana 19 (27) · Śloka 27
অত ঊর্ধ্বমূর্ধ্বজত্রুগতানি ব্যাখ্যাস্যামঃ- তত্র কণ্ঠনাডীমুভযতশ্চতস্রো ধমন্যো দ্বে নীলে দ্বে চ মন্যে ব্যত্যাসেন , তত্র মূকতা স্বরবৈকৃতমরসগ্রাহিতা চ; গ্রীবাযামুভযতশ্চতস্রঃ সিরা মাতৃকাঃ, তত্র সদ্যোমরণং; শিরোগ্রীবযোঃ সন্ধানে কৃকাটিকে, তত্র চলমূর্ধতা; কর্ণপৃষ্ঠতোঽধঃসংশ্রিতে বিধুরে, তত্র বাধির্যং; ঘ্রাণমার্গমুভযতঃ স্রোতোমার্গপ্রতিবদ্ধে অভ্যন্তরতঃ ফণে, তত্র গন্ধাজ্ঞানং; ভ্রূপুচ্ছান্তযোরধোঽক্ষ্ণোর্বাহ্যতোঽপাঙ্গৌ, তত্রান্ধ্যং দৃষ্টযুপঘাতো বা; ভ্রুবোরুপরি নিম্নযোরাবর্তৌ নাম, তত্রাপ্যান্ধ্যং দৃষ্টযুপঘাতো বা; ভ্রুবোরন্তযোরুপরি কর্ণললাটযোর্মধ্যে শঙ্খৌ, তত্র সদ্যোমরণং; শঙ্খযোরুপরি কেশান্ত উত্ক্ষেপৌ, তত্র সশল্যো জীবেত্ পাকাত্ পতিতশল্যো বা নোদ্ধৃতশল্যঃ; ভ্রুবোর্মধ্যে স্থপনী, তত্রোত্ক্ষেপবত্; পঞ্চ সন্ধযঃ শিরসি বিভক্তাঃ সীমন্তা নাম, তত্রোন্মাদভযচিত্তনাশৈর্মরণং; ঘ্রাণশ্রোত্রাক্ষিজিহ্বাসন্তর্পণীনাং সিরাণাং মধ্যে সিরাসন্নিপাতঃ শৃঙ্গাটকানি , তানি চত্বারি মর্মাণি, তত্রাপি সদ্যোমরণং ; মস্তকাভ্যন্তরোপরিষ্ঠাত্ সিরাসন্ধিসন্নিপাতো রোমাবর্তোঽধিপতিঃ, তত্রাপি সদ্য এব | এবমেতানি সপ্তত্রিংশদূর্ধ্বজত্রুগতানি মর্মাণি ব্যাখ্যাতানি ||২৭||
अत ऊर्ध्वमूर्ध्वजत्रुगतानि व्याख्यास्यामः- तत्र कण्ठनाडीमुभयतश्चतस्रो धमन्यो द्वे नीले द्वे च मन्ये व्यत्यासेन , तत्र मूकता स्वरवैकृतमरसग्राहिता च; ग्रीवायामुभयतश्चतस्रः सिरा मातृकाः, तत्र सद्योमरणं; शिरोग्रीवयोः सन्धाने कृकाटिके, तत्र चलमूर्धता; कर्णपृष्ठतोऽधःसंश्रिते विधुरे, तत्र बाधिर्यं; घ्राणमार्गमुभयतः स्रोतोमार्गप्रतिबद्धे अभ्यन्तरतः फणे, तत्र गन्धाज्ञानं; भ्रूपुच्छान्तयोरधोऽक्ष्णोर्बाह्यतोऽपाङ्गौ, तत्रान्ध्यं दृष्टयुपघातो वा; भ्रुवोरुपरि निम्नयोरावर्तौ नाम, तत्राप्यान्ध्यं दृष्टयुपघातो वा; भ्रुवोरन्तयोरुपरि कर्णललाटयोर्मध्ये शङ्खौ, तत्र सद्योमरणं; शङ्खयोरुपरि केशान्त उत्क्षेपौ, तत्र सशल्यो जीवेत् पाकात् पतितशल्यो वा नोद्धृतशल्यः; भ्रुवोर्मध्ये स्थपनी, तत्रोत्क्षेपवत्; पञ्च सन्धयः शिरसि विभक्ताः सीमन्ता नाम, तत्रोन्मादभयचित्तनाशैर्मरणं; घ्राणश्रोत्राक्षिजिह्वासन्तर्पणीनां सिराणां मध्ये सिरासन्निपातः शृङ्गाटकानि , तानि चत्वारि मर्माणि, तत्रापि सद्योमरणं ; मस्तकाभ्यन्तरोपरिष्ठात् सिरासन्धिसन्निपातो रोमावर्तोऽधिपतिः, तत्रापि सद्य एव | एवमेतानि सप्तत्रिंशदूर्ध्वजत्रुगतानि मर्माणि व्याख्यातानि ||२७||
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Adhikarana 20 (28-29) · Śloka 29
ভবন্তি চাত্র শ্লোকাঃ- উর্ব্যঃ শিরাংসি বিটপে চ সকক্ষপার্শ্বে একৈকমঙ্গুলমিতং স্তনপূর্বমূলম্ | বিদ্ধ্যঙ্গুলদ্বযমিতং মণিবন্ধগুল্ফং ত্রীণ্যেব জানু সপরং সহ কূর্পরাভ্যাম্ ||২৮|| হৃদ্বস্তিকূর্চগুদনাভি বদন্তি মূর্ধ্নি চত্বারি পঞ্চ চ গলে দশ যানি চ দ্বে | তানি স্বপাণিতলকুঞ্চিতসম্মিতানি শেষাণ্যবেহি পরিবিস্তরতোঽঙ্গুলার্ধম্ ||২৯||
भवन्ति चात्र श्लोकाः- उर्व्यः शिरांसि विटपे च सकक्षपार्श्वे एकैकमङ्गुलमितं स्तनपूर्वमूलम् | विद्ध्यङ्गुलद्वयमितं मणिबन्धगुल्फं त्रीण्येव जानु सपरं सह कूर्पराभ्याम् ||२८|| हृद्बस्तिकूर्चगुदनाभि वदन्ति मूर्ध्नि चत्वारि पञ्च च गले दश यानि च द्वे | तानि स्वपाणितलकुञ्चितसम्मितानि शेषाण्यवेहि परिविस्तरतोऽङ्गुलार्धम् ||२९||
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Adhikarana 21 (30) · Śloka 30
এতত্প্রমাণমভিবীক্ষ্য বদন্তি তজ্জ্ঞাঃ শস্ত্রেণ কর্মকরণং পরিহৃত্য কার্যম্ | পার্শ্বাভিঘাতিতমপীহ নিহন্তি মর্ম তস্মাদ্ধি মর্মসদনং পরিবর্জনীযম্ ||৩০||
एतत्प्रमाणमभिवीक्ष्य वदन्ति तज्ज्ञाः शस्त्रेण कर्मकरणं परिहृत्य कार्यम् | पार्श्वाभिघातितमपीह निहन्ति मर्म तस्माद्धि मर्मसदनं परिवर्जनीयम् ||३०||
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Adhikarana 22 (31-32) · Śloka 33
ছিন্নেষু পাণিচরণেষু সিরা নরাণাং সঙ্কোচমীযুরসৃগল্পমতো নিরেতি | প্রাপ্যামিতব্যসনমুগ্রমতো মনুষ্যাঃ সঞ্চ্ছিন্নশাখতরুবন্নিধনং ন যান্তি ||৩১|| ক্ষিপ্রেষু তত্র সতলেষু হতেষু রক্তং গচ্ছত্যতীব পবনশ্চ রুজং করোতি | এবং বিনাশমুপযান্তি হি তত্র বিদ্ধা বৃক্ষা ইবাযুধনিপাতনিকৃত্তমূলাঃ ||৩২|| তস্মাত্তযোরভিহতস্য তু পাণিপাদং ছেত্তব্যমাশু মণিবন্ধনগুল্ফদেশে |৩৩|
छिन्नेषु पाणिचरणेषु सिरा नराणां सङ्कोचमीयुरसृगल्पमतो निरेति | प्राप्यामितव्यसनमुग्रमतो मनुष्याः सञ्च्छिन्नशाखतरुवन्निधनं न यान्ति ||३१|| क्षिप्रेषु तत्र सतलेषु हतेषु रक्तं गच्छत्यतीव पवनश्च रुजं करोति | एवं विनाशमुपयान्ति हि तत्र विद्धा वृक्षा इवायुधनिपातनिकृत्तमूलाः ||३२|| तस्मात्तयोरभिहतस्य तु पाणिपादं छेत्तव्यमाशु मणिबन्धनगुल्फदेशे |३३|
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Adhikarana 23 (33) · Śloka 34
মর্মাণি শল্যবিষযার্ধমুদাহরন্তি যস্মাচ্চ মর্মসু হতা ন ভবন্তি সদ্যঃ ||৩৩|| জীবন্তি তত্র যদি বৈদ্যগুণেন কেচিত্তে প্রাপ্নুবন্তি বিকলত্বমসংশযং হি |৩৪|
मर्माणि शल्यविषयार्धमुदाहरन्ति यस्माच्च मर्मसु हता न भवन्ति सद्यः ||३३|| जीवन्ति तत्र यदि वैद्यगुणेन केचित्ते प्राप्नुवन्ति विकलत्वमसंशयं हि |३४|
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Adhikarana 24 (34) · Śloka 35
সম্ভিন্নজর্জরিতকোষ্ঠশিরঃকপালা জীবন্তি শস্ত্রনিহতৈশ্চ শরীরদেশৈঃ ||৩৪|| ছিন্নৈশ্চ সক্থিভুজপাদকরৈরশেষৈর্যেষাং ন মর্মসু কৃতা বিবিধাঃ প্রহারাঃ |৩৫|
सम्भिन्नजर्जरितकोष्ठशिरःकपाला जीवन्ति शस्त्रनिहतैश्च शरीरदेशैः ||३४|| छिन्नैश्च सक्थिभुजपादकरैरशेषैर्येषां न मर्मसु कृता विविधाः प्रहाराः |३५|
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Adhikarana 25 (35) · Śloka 36
সোমমারুততেজাংসি রজঃসত্ত্বতমাংসি চ | মর্মসু প্রাযশঃ পুংসাং ভূতাত্মা চাবতিষ্ঠতে ||৩৫|| মর্মস্বভিহতাস্তস্মান্ন জীবন্তি শরীরিণঃ |৩৬|
सोममारुततेजांसि रजःसत्त्वतमांसि च | मर्मसु प्रायशः पुंसां भूतात्मा चावतिष्ठते ||३५|| मर्मस्वभिहतास्तस्मान्न जीवन्ति शरीरिणः |३६|
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Adhikarana 26 (36-40) · Śloka 40
ইন্দ্রিযার্থেষ্বসম্প্রাপ্তির্মনোবুদ্ধিবিপর্যযঃ ||৩৬|| রুজশ্চ বিবিধাস্তীব্রা ভবন্ত্যাশুহরে হতে | হতে কালান্তরঘ্নে তু ধ্রুবং ধাতুক্ষযো নৃণাম্ ||৩৭|| ততো ধাতুক্ষযাজ্জন্তুর্বেদনাভিশ্চ নশ্যতি | হতে বৈকল্যজননে কেবলং বৈদ্যনৈপুণাত্ ||৩৮|| শরীরং ক্রিযযা যুক্তং বিকলত্বমবাপ্নুযাত্ | বিশল্যঘ্নে তু বিজ্ঞেযং পূর্বোক্তং যচ্চ কারণম্ ||৩৯|| রুজাকরাণি মর্মাণি ক্ষতানি বিবিধা রুজঃ | কুর্বন্ত্যন্তে চ বৈকল্যং কুবৈদ্যবশগো যদি ||৪০||
इन्द्रियार्थेष्वसम्प्राप्तिर्मनोबुद्धिविपर्ययः ||३६|| रुजश्च विविधास्तीव्रा भवन्त्याशुहरे हते | हते कालान्तरघ्ने तु ध्रुवं धातुक्षयो नृणाम् ||३७|| ततो धातुक्षयाज्जन्तुर्वेदनाभिश्च नश्यति | हते वैकल्यजनने केवलं वैद्यनैपुणात् ||३८|| शरीरं क्रियया युक्तं विकलत्वमवाप्नुयात् | विशल्यघ्ने तु विज्ञेयं पूर्वोक्तं यच्च कारणम् ||३९|| रुजाकराणि मर्माणि क्षतानि विविधा रुजः | कुर्वन्त्यन्ते च वैकल्यं कुवैद्यवशगो यदि ||४०||
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Adhikarana 27 (41) · Śloka 41
ছেদভেদাভিঘাতেভ্যো দহনাদ্দারণাদপি | উপঘাতং বিজানীযান্মর্মণাং তুল্যলক্ষণম্ ||৪১||
छेदभेदाभिघातेभ्यो दहनाद्दारणादपि | उपघातं विजानीयान्मर्मणां तुल्यलक्षणम् ||४१||
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Adhikarana 28 (42) · Śloka 42
মর্মাভিঘাতস্তু ন কশ্চিদস্তি যোঽল্পাত্যযো বাঽপি নিরত্যযো বা | প্রাযেণ মর্মস্বভিতাডিতাস্তু বৈকল্যমৃচ্ছন্ত্যথবা ম্রিযন্তে ||৪২||
मर्माभिघातस्तु न कश्चिदस्ति योऽल्पात्ययो वाऽपि निरत्ययो वा | प्रायेण मर्मस्वभिताडितास्तु वैकल्यमृच्छन्त्यथवा म्रियन्ते ||४२||
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Adhikarana 29 (43) · Śloka 43
মর্মাণ্যধিষ্ঠায হি যে বিকারা মূর্চ্ছন্তি কাযে বিবিধা নরাণাম্ | প্রাযেণ তে কৃচ্ছ্রতমা ভবন্তি নরস্য যত্নৈরপি সাধ্যমানাঃ ||৪৩||
मर्माण्यधिष्ठाय हि ये विकारा मूर्च्छन्ति काये विविधा नराणाम् | प्रायेण ते कृच्छ्रतमा भवन्ति नरस्य यत्नैरपि साध्यमानाः ||४३||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 6
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং শারীরস্থানে প্রত্যেকমর্মনির্দেশশারীরং নাম ষষ্ঠোঽধ্যাযঃ ||৬||
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने प्रत्येकमर्मनिर्देशशारीरं नाम षष्ठोऽध्यायः ||६||
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