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7. sirāvarṇavibhaktiśārīram

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ সিরাবর্ণবিভক্তিশারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः सिरावर्णविभक्तिशारीरं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

সপ্ত সিরাশতানি ভবন্তি; যাভিরিদং শরীরমারাম ইব জলহারিণীভিঃ কেদার ইব চ কুল্যাভিরুপস্নিহ্যতেঽনুগৃহ্যতে চাকুঞ্চনপ্রসারণাদিভির্বিশেষৈঃ; দ্রুমপত্রসেবনীনামিব তাসাং প্রতানাঃ; তাসাং নাভির্মূলং, ততশ্চ প্রসরন্ত্যূর্ধ্বমধস্তির্যক্ চ ||৩||

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सप्त सिराशतानि भवन्ति; याभिरिदं शरीरमाराम इव जलहारिणीभिः केदार इव च कुल्याभिरुपस्निह्यतेऽनुगृह्यते चाकुञ्चनप्रसारणादिभिर्विशेषैः; द्रुमपत्रसेवनीनामिव तासां प्रतानाः; तासां नाभिर्मूलं, ततश्च प्रसरन्त्यूर्ध्वमधस्तिर्यक् च ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

ভবতশ্চাত্র শ্লোকৌ- যাবত্যস্তু সিরাঃ কাযে সম্ভবন্তি শরীরিণাম্ | নাভ্যাং সর্বা নিবদ্ধাস্তাঃ প্রতন্বন্তি সমন্ততঃ ||৪||

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भवतश्चात्र श्लोकौ- यावत्यस्तु सिराः काये सम्भवन्ति शरीरिणाम् | नाभ्यां सर्वा निबद्धास्ताः प्रतन्वन्ति समन्ततः ||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

নাভিস্থাঃ প্রাণিনাং প্রাণাঃ প্রাণান্নাভির্ব্যুপাশ্রিতা | সিরাভিরাবৃতা নাভিশ্চক্রনাভিরিবারকৈঃ ||৫||

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नाभिस्थाः प्राणिनां प्राणाः प्राणान्नाभिर्व्युपाश्रिता | सिराभिरावृता नाभिश्चक्रनाभिरिवारकैः ||५||

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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6

তাসাং মূলসিরাশ্চত্বারিংশত্; তাসাং বাতবাহিন্যো দশ, পিত্তবাহিন্যো দশ, কফবাহিন্যো দশ, দশ রক্তবাহিন্যঃ | তাসাং তু বাতবাহিনীনাং বাতস্থানগতানাং পঞ্চসপ্ততিশতং ভবতি, তাবত্য এব পিত্তবাহিন্যঃ পিত্তস্থানে, কফবাহিন্যশ্চ কফস্থানে, রক্তবাহিন্যশ্চ যকৃত্প্লীহ্নোঃ; এবমেতানি সপ্ত সিরাশতানি ||৬||

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तासां मूलसिराश्चत्वारिंशत्; तासां वातवाहिन्यो दश, पित्तवाहिन्यो दश, कफवाहिन्यो दश, दश रक्तवाहिन्यः | तासां तु वातवाहिनीनां वातस्थानगतानां पञ्चसप्ततिशतं भवति, तावत्य एव पित्तवाहिन्यः पित्तस्थाने, कफवाहिन्यश्च कफस्थाने, रक्तवाहिन्यश्च यकृत्प्लीह्नोः; एवमेतानि सप्त सिराशतानि ||६||

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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7

তত্র বাতবাহিন্যঃ সিরা একস্মিন্ সক্থ্নি পঞ্চবিংশতিঃ; এতেনেতরসক্থি বাহূ চ ব্যাখ্যাতৌ | বিশেষতস্তু কোষ্ঠে চতুস্ত্রিংশত্; তাসাং গুদমেঢ্রাশ্রিতাঃ শ্রোণ্যামষ্টৌ, দ্বে দ্বে পার্শ্বযোঃ, ষট্ পৃষ্ঠে, তাবত্য এবোদরে, দশ বক্ষসি | একচত্বারিংশজ্জত্রুণ ঊর্ধ্বং; তাসাং চতুর্দশ গ্রীবাযাং, কর্ণযোশ্চতস্রঃ, নব জিহ্বাযাং, ষণ্ নাসিকাযাং, অষ্টৌ নেত্রযোঃ, এবমেতত্ পঞ্চসপ্ততিশতং বাতবাহিনীনাং সিরাণাং ব্যাখ্যাতং ভবতি | এষ এব বিভাগঃ শেষাণামপি | বিশেষতস্তু পিত্তবাহিন্যো নেত্রযোর্দশ, কর্ণযোর্দ্বে; এবং রক্তবহাঃ কফবহাশ্চ | এবমেতানি সপ্ত সিরাশতানি সবিভাগানি ব্যাখ্যাতানি ||৭||

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तत्र वातवाहिन्यः सिरा एकस्मिन् सक्थ्नि पञ्चविंशतिः; एतेनेतरसक्थि बाहू च व्याख्यातौ | विशेषतस्तु कोष्ठे चतुस्त्रिंशत्; तासां गुदमेढ्राश्रिताः श्रोण्यामष्टौ, द्वे द्वे पार्श्वयोः, षट् पृष्ठे, तावत्य एवोदरे, दश वक्षसि | एकचत्वारिंशज्जत्रुण ऊर्ध्वं; तासां चतुर्दश ग्रीवायां, कर्णयोश्चतस्रः, नव जिह्वायां, षण् नासिकायां, अष्टौ नेत्रयोः, एवमेतत् पञ्चसप्ततिशतं वातवाहिनीनां सिराणां व्याख्यातं भवति | एष एव विभागः शेषाणामपि | विशेषतस्तु पित्तवाहिन्यो नेत्रयोर्दश, कर्णयोर्द्वे; एवं रक्तवहाः कफवहाश्च | एवमेतानि सप्त सिराशतानि सविभागानि व्याख्यातानि ||७||

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Adhikarana 7 (8-15) · Śloka 15

ভবন্তি চাত্র- ক্রিযাণামপ্রতীঘাতমমোহং বুদ্ধিকর্মণাম্ | করোত্যন্যান্ গুণাংশ্চাপি স্বাঃ সিরাঃ পবনশ্চরন্ ||৮|| যদা তু কুপিতো বাযুঃ স্বাঃ সিরাঃ প্রতিপদ্যতে | তদাঽস্য বিবিধা রোগা জাযন্তে বাতসম্ভবাঃ ||৯|| ভ্রাজিষ্ণুতামন্নরুচিমগ্নিদীপ্তিমরোগতাম্ | সংসর্পত্ স্বাঃ সিরাঃ পিত্তং কুর্যাচ্চান্যান্ গুণানপি ||১০|| যদা প্রকুপিতং পিত্তং সেবতে স্ববহাঃ সিরাঃ | তদাঽস্য বিবিধা রোগা জাযন্তে পিত্তসম্ভবাঃ ||১১|| স্নেহমঙ্গেষু সন্ধীনাং স্থৈর্যং বলমুদীর্ণতাম্ | করোত্যন্যান্ গুণাংশ্চাপি বলাসঃ স্বাঃ সিরাশ্চরন্ ||১২|| যদা তু কুপিতঃ শ্লেষ্মা স্বাঃ সিরাঃ প্রতিপদ্যতে | তদাঽস্য বিবিধা রোগা জাযন্তে শ্লেষ্মসম্ভবাঃ ||১৩|| ধাতূনাং পূরণং বর্ণং স্পর্শজ্ঞানমসংশযম্ | স্বাঃ সিরাঃ সঞ্চরদ্রক্তং কুর্যাচ্চান্যান্ গুণানপি ||১৪|| যদা তু কুপিতং রক্তং সেবতে স্ববহাঃ সিরাঃ | তদাঽস্য বিবিধা রোগা জাযন্তে রক্তসম্ভবাঃ ||১৫||

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भवन्ति चात्र- क्रियाणामप्रतीघातममोहं बुद्धिकर्मणाम् | करोत्यन्यान् गुणांश्चापि स्वाः सिराः पवनश्चरन् ||८|| यदा तु कुपितो वायुः स्वाः सिराः प्रतिपद्यते | तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते वातसम्भवाः ||९|| भ्राजिष्णुतामन्नरुचिमग्निदीप्तिमरोगताम् | संसर्पत् स्वाः सिराः पित्तं कुर्याच्चान्यान् गुणानपि ||१०|| यदा प्रकुपितं पित्तं सेवते स्ववहाः सिराः | तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते पित्तसम्भवाः ||११|| स्नेहमङ्गेषु सन्धीनां स्थैर्यं बलमुदीर्णताम् | करोत्यन्यान् गुणांश्चापि बलासः स्वाः सिराश्चरन् ||१२|| यदा तु कुपितः श्लेष्मा स्वाः सिराः प्रतिपद्यते | तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते श्लेष्मसम्भवाः ||१३|| धातूनां पूरणं वर्णं स्पर्शज्ञानमसंशयम् | स्वाः सिराः सञ्चरद्रक्तं कुर्याच्चान्यान् गुणानपि ||१४|| यदा तु कुपितं रक्तं सेवते स्ववहाः सिराः | तदाऽस्य विविधा रोगा जायन्ते रक्तसम्भवाः ||१५||

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Adhikarana 8 (16) · Śloka 16

ন হি বাতং সিরাঃ কাশ্চিন্ন পিত্তং কেবলং তথা | শ্লেষ্মাণং বা বহন্ত্যেতা অতঃ সর্ববহাঃ স্মৃতাঃ ||১৬||

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न हि वातं सिराः काश्चिन्न पित्तं केवलं तथा | श्लेष्माणं वा वहन्त्येता अतः सर्ववहाः स्मृताः ||१६||

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Adhikarana 9 (17) · Śloka 17

প্রদুষ্টানাং হি দোষাণাং মূর্চ্ছিতানাং প্রধাবতাম্ | ধ্রুবমুন্মার্গগমনমতঃ সর্ববহাঃ স্মৃতাঃ ||১৭||

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प्रदुष्टानां हि दोषाणां मूर्च्छितानां प्रधावताम् | ध्रुवमुन्मार्गगमनमतः सर्ववहाः स्मृताः ||१७||

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Adhikarana 10 (18) · Śloka 18

তত্রারুণা বাতবহাঃ পূর্যন্তে বাযুনা সিরাঃ | পিত্তাদুষ্ণাশ্চ নীলাশ্চ, শীতা গৌর্যঃ স্থিরাঃ কফাত্ অসৃগ্বহাস্তু রোহিণ্যঃ সিরা নাত্যুষ্ণশীতলাঃ ||১৮||

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तत्रारुणा वातवहाः पूर्यन्ते वायुना सिराः | पित्तादुष्णाश्च नीलाश्च, शीता गौर्यः स्थिराः कफात् असृग्वहास्तु रोहिण्यः सिरा नात्युष्णशीतलाः ||१८||

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Adhikarana 11 (19-21) · Śloka 21

অত ঊর্ধ্বং প্রবক্ষ্যামি ন বিধ্যেদ্যাঃ সিরা ভিষক্ | বৈকল্যং মরণং চাপি ব্যধাত্তাসাং ধ্রুবং ভবেত্ ||১৯|| সিরাশতানি চত্বারি বিদ্যাচ্ছাখাসু বুদ্ধিমান্ | ষট্ত্রিংশচ্চ শতং কোষ্ঠে চতুঃষষ্টং চ মূর্ধনি ||২০|| শাখাসু ষোডশ সিরাঃ কোষ্ঠে দ্বাত্রিংশদেব তু | পঞ্চাশজ্জত্রুণশ্চোর্ধ্বমব্যধ্যাঃ পরিকীর্তিতাঃ ||২১||

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अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि न विध्येद्याः सिरा भिषक् | वैकल्यं मरणं चापि व्यधात्तासां ध्रुवं भवेत् ||१९|| सिराशतानि चत्वारि विद्याच्छाखासु बुद्धिमान् | षट्त्रिंशच्च शतं कोष्ठे चतुःषष्टं च मूर्धनि ||२०|| शाखासु षोडश सिराः कोष्ठे द्वात्रिंशदेव तु | पञ्चाशज्जत्रुणश्चोर्ध्वमव्यध्याः परिकीर्तिताः ||२१||

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Adhikarana 12 (22) · Śloka 22

তত্র সিরাশতমেকস্মিন্ সক্থ্নি ভবতি; তাসাং জালধরা ত্বেকা, তিস্রশ্চাভ্যন্তরাঃ- তত্রোর্বীসঞ্জ্ঞে দ্বে, লোহিতাক্ষসঞ্জ্ঞা চৈকা, তাস্ত্বব্যধ্যাঃ; এতেনেতরসক্থি বাহূ চ ব্যাখ্যাতৌ; এবমশস্ত্রকৃত্যাঃ ষোডশ শাখাসু | দ্বাত্রিংশচ্ছ্রোণ্যাং, তাসামষ্টাবশস্ত্রকৃত্যাঃ- দ্বে দ্বে বিটপযোঃ , কটীকতরুণযোশ্চ; অষ্টাবষ্টাবেকৈকস্মিন্ পার্শ্বে, তাসামেকৈকামূর্ধ্বগাং পরিহরেত্, পার্শ্বসন্ধিগতে চ দ্বে; চতস্রো বিংশতিশ্চ পৃষ্ঠে পৃষ্ঠবংশমুভযতঃ, তাসামূর্ধ্বগামিন্যৌ দ্বে দ্বে পরিহরেদ্বৃহতীসিরে; তাবত্য এবোদরে, তাসাং মেঢ্রোপরি রোমরাজীমুভযতো দ্বে দ্বে পরিহরেত্; চত্বারিংশদ্বক্ষসি, তাসাং চতুর্দশাশস্ত্রকৃত্যাঃ- হৃদযে দ্বে, দ্বে দ্বে স্তনমূলে, স্তনরোহিতাপলাপস্তম্ভেষূভযতোঽষ্টৌ; এবং দ্বাত্রিংশদশস্ত্রকৃত্যাঃ পৃষ্ঠোদরোরঃসু ভবন্তি | চতুঃষষ্টং সিরাশতং জত্রুণ ঊর্ধ্বং ভবতি; তত্র ষট্পঞ্চাশচ্ছিরোধরাযাং , তাসামষ্টৌ চতস্রশ্চ মর্মসঞ্জ্ঞাঃ পরিহরেত্, দ্বে কৃকাটিকযোঃ, দ্বে বিধুরযোঃ, এবং গ্রীবাযাং ষোডশাব্যধ্যাঃ; হন্বোরুভযতোঽষ্টাবষ্টৌ, তাসাং তু সন্ধিধমন্যৌ দ্বে দ্বে পরিহরেত্; ষট্ত্রিংশজ্জিহ্বাযাং, তাসামধঃ ষোডশাশস্ত্রকৃত্যাঃ, রসবহে দ্বে, বাগ্বহে চ দ্বে; দ্বির্দ্বাদশ নাসাযাং, তাসামৌপনাসিক্যশ্চতস্রঃ পরিহরেত্, তাসামেব চ তালুন্যেকাং মৃদাবুদ্দেশে; অষ্টত্রিংশদুভযোর্নেত্রযোঃ , তাসামেকৈকামপাঙ্গযোঃ পরিহরেত্; কর্ণযোর্দশ, তাসাং শব্দবাহিনীমেকৈকাং পরিহরেত্; নাসানেত্রগতাস্তু ললাটে ষষ্টিঃ, তাসাং কেশান্তানুগতাশ্চতস্র, আবর্তযোরেকৈকা, স্থপন্যাং চৈকা পরিহর্তব্যা; শঙ্খযোর্দশ, তাসাং শঙ্খসন্ধিগতামেকৈকাং পরিহরেত্; দ্বাদশ মূর্ধ্নি, তাসামুত্ক্ষেপযোর্দ্বে পরিহরেত্, সীমন্তেষ্বেকৈকাম্, একামধিপতাবিতি; এবমশস্ত্রকৃত্যাঃ পঞ্চাশজ্জত্রুণ ঊর্ধ্বমিতি ||২২||

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तत्र सिराशतमेकस्मिन् सक्थ्नि भवति; तासां जालधरा त्वेका, तिस्रश्चाभ्यन्तराः- तत्रोर्वीसञ्ज्ञे द्वे, लोहिताक्षसञ्ज्ञा चैका, तास्त्वव्यध्याः; एतेनेतरसक्थि बाहू च व्याख्यातौ; एवमशस्त्रकृत्याः षोडश शाखासु | द्वात्रिंशच्छ्रोण्यां, तासामष्टावशस्त्रकृत्याः- द्वे द्वे विटपयोः , कटीकतरुणयोश्च; अष्टावष्टावेकैकस्मिन् पार्श्वे, तासामेकैकामूर्ध्वगां परिहरेत्, पार्श्वसन्धिगते च द्वे; चतस्रो विंशतिश्च पृष्ठे पृष्ठवंशमुभयतः, तासामूर्ध्वगामिन्यौ द्वे द्वे परिहरेद्बृहतीसिरे; तावत्य एवोदरे, तासां मेढ्रोपरि रोमराजीमुभयतो द्वे द्वे परिहरेत्; चत्वारिंशद्वक्षसि, तासां चतुर्दशाशस्त्रकृत्याः- हृदये द्वे, द्वे द्वे स्तनमूले, स्तनरोहितापलापस्तम्भेषूभयतोऽष्टौ; एवं द्वात्रिंशदशस्त्रकृत्याः पृष्ठोदरोरःसु भवन्ति | चतुःषष्टं सिराशतं जत्रुण ऊर्ध्वं भवति; तत्र षट्पञ्चाशच्छिरोधरायां , तासामष्टौ चतस्रश्च मर्मसञ्ज्ञाः परिहरेत्, द्वे कृकाटिकयोः, द्वे विधुरयोः, एवं ग्रीवायां षोडशाव्यध्याः; हन्वोरुभयतोऽष्टावष्टौ, तासां तु सन्धिधमन्यौ द्वे द्वे परिहरेत्; षट्त्रिंशज्जिह्वायां, तासामधः षोडशाशस्त्रकृत्याः, रसवहे द्वे, वाग्वहे च द्वे; द्विर्द्वादश नासायां, तासामौपनासिक्यश्चतस्रः परिहरेत्, तासामेव च तालुन्येकां मृदावुद्देशे; अष्टत्रिंशदुभयोर्नेत्रयोः , तासामेकैकामपाङ्गयोः परिहरेत्; कर्णयोर्दश, तासां शब्दवाहिनीमेकैकां परिहरेत्; नासानेत्रगतास्तु ललाटे षष्टिः, तासां केशान्तानुगताश्चतस्र, आवर्तयोरेकैका, स्थपन्यां चैका परिहर्तव्या; शङ्खयोर्दश, तासां शङ्खसन्धिगतामेकैकां परिहरेत्; द्वादश मूर्ध्नि, तासामुत्क्षेपयोर्द्वे परिहरेत्, सीमन्तेष्वेकैकाम्, एकामधिपताविति; एवमशस्त्रकृत्याः पञ्चाशज्जत्रुण ऊर्ध्वमिति ||२२||

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Adhikarana 13 (23) · Śloka 23

ভবতি চাত্র- ব্যাপ্নুবন্ত্যভিতো দেহং নাভিতঃ প্রসৃতাঃ সিরাঃ | প্রতানাঃ পদ্মিনীকন্দাদ্বিসাদীনাং যথা জলম্ ||২৩||

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भवति चात्र- व्याप्नुवन्त्यभितो देहं नाभितः प्रसृताः सिराः | प्रतानाः पद्मिनीकन्दाद्बिसादीनां यथा जलम् ||२३||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 7

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং শারীরস্থানে সিরাবর্ণবিভক্তিশারীরং নাম সপ্তমোঽধ্যাযঃ ||৭||

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इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने सिरावर्णविभक्तिशारीरं नाम सप्तमोऽध्यायः ||७||

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