Adhikarana 1 (1-4) · Śloka 5
অথাতোঽষ্টবিধশস্ত্রকর্মীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
ছেদ্যা ভগন্দরা গ্রন্থিঃ শ্লৈষ্মিকস্তিলকালকঃ |
ব্রণবর্ত্মার্বুদান্যর্শশ্চর্মকীলোঽস্থিমাংসগম্ ||৩||
শল্যং জতুমণির্মাংসসঙ্ঘাতো গলশুণ্ডিকা |
স্নাযুমাংসসিরাকোথো বল্মীকং শতপোনকঃ ||৪||
অধ্রুষশ্চোপদংশাশ্চ মাংসকন্দ্যধিমাংসকঃ |৫|
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अथातोऽष्टविधशस्त्रकर्मीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
छेद्या भगन्दरा ग्रन्थिः श्लैष्मिकस्तिलकालकः |
व्रणवर्त्मार्बुदान्यर्शश्चर्मकीलोऽस्थिमांसगम् ||३||
शल्यं जतुमणिर्मांससङ्घातो गलशुण्डिका |
स्नायुमांससिराकोथो वल्मीकं शतपोनकः ||४||
अध्रुषश्चोपदंशाश्च मांसकन्द्यधिमांसकः |५|
Adhikarana 2 (5-8) · Śloka 8
ভেদ্যা বিদ্রধযোঽন্যত্র সর্বজাদ্গ্রন্থযস্ত্রযঃ ||৫||
আদিতো যে বিসর্পাশ্চ বৃদ্ধযঃ সবিদারিকাঃ |
প্রমেহপিডকাঃ শোফঃ স্তনরোগোঽবমন্থকাঃ ||৬||
কুম্ভীকানুশযী নাড্যো বৃন্দৌ পুষ্করিকাঽলজী |
প্রাযশঃ ক্ষুদ্ররোগাশ্চ পুপ্পুটৌ তালুদন্তজৌ ||৭||
তুণ্ডিকেরী গিলাযুশ্চ পূর্বং যে চ প্রপাকিণঃ |
বস্তিস্তথাঽশ্মরীহেতোর্মেদোজা যে চ কেচন ||৮||
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भेद्या विद्रधयोऽन्यत्र सर्वजाद्ग्रन्थयस्त्रयः ||५||
आदितो ये विसर्पाश्च वृद्धयः सविदारिकाः |
प्रमेहपिडकाः शोफः स्तनरोगोऽवमन्थकाः ||६||
कुम्भीकानुशयी नाड्यो वृन्दौ पुष्करिकाऽलजी |
प्रायशः क्षुद्ररोगाश्च पुप्पुटौ तालुदन्तजौ ||७||
तुण्डिकेरी गिलायुश्च पूर्वं ये च प्रपाकिणः |
बस्तिस्तथाऽश्मरीहेतोर्मेदोजा ये च केचन ||८||
Adhikarana 3 (9) · Śloka 10
লেখ্যাশ্চতস্রো রোহিণ্যঃ কিলাসমুপজিহ্বিকা |
মেদোজো দন্তবৈদর্ভো গ্রন্থির্বর্ত্মাধিজিহ্বিকা ||৯||
অর্শাংসি মণ্ডলং মাংসকন্দী মাংসোন্নতিস্তথা |১০|
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लेख्याश्चतस्रो रोहिण्यः किलासमुपजिह्विका |
मेदोजो दन्तवैदर्भो ग्रन्थिर्वर्त्माधिजिह्विका ||९||
अर्शांसि मण्डलं मांसकन्दी मांसोन्नतिस्तथा |१०|
Adhikarana 4 (10) · Śloka 10
বেধ্যাঃ সিরা বহুবিধা মূত্রবৃদ্ধির্দকোদরম্ ||১০||
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वेध्याः सिरा बहुविधा मूत्रवृद्धिर्दकोदरम् ||१०||
Adhikarana 5 (11) · Śloka 11
এষ্যা নাড্যঃ সশল্যাশ্চ ব্রণা উন্মার্গিণশ্চ যে |১১|
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एष्या नाड्यः सशल्याश्च व्रणा उन्मार्गिणश्च ये |११|
Adhikarana 6 (11) · Śloka 12
আহার্যাঃ শর্করাস্তিস্রো দন্তকর্ণমলোঽশ্মরী ||১১||
শল্যানি মূঢগর্ভাশ্চ বর্চশ্চ নিচিতং গুদে |১২|
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आहार्याः शर्करास्तिस्रो दन्तकर्णमलोऽश्मरी ||११||
शल्यानि मूढगर्भाश्च वर्चश्च निचितं गुदे |१२|
Adhikarana 7 (12-15) · Śloka 16
স্রাব্যা বিদ্রধযঃ পঞ্চ ভবেযুঃ সর্বজাদৃতে ||১২||
কুষ্ঠানি বাযুঃ সরুজঃ শোফো যশ্চৈকদেশজঃ |
পাল্যামযাঃ শ্লীপদানি বিষজুষ্টং চ শোণিতম্ ||১৩||
অর্বুদানি বিসর্পাশ্চ গ্রন্থযশ্চাদিতশ্চ তে |
ত্রযস্ত্রযশ্চোপদংশাঃ স্তনরোগা বিদারিকা ||১৪||
সু(শু)ষিরো গলশালূকং কণ্টকাঃ কৃমিদন্তকঃ |
দন্তবেষ্টঃ সোপকুশঃ শীতাদো দন্তপুপ্পুটঃ ||১৫||
পিত্তাসৃক্কফজাশ্চৌষ্ঠ্যাঃ ক্ষুদ্ররোগাশ্চ ভূযশঃ |১৬|
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स्राव्या विद्रधयः पञ्च भवेयुः सर्वजादृते ||१२||
कुष्ठानि वायुः सरुजः शोफो यश्चैकदेशजः |
पाल्यामयाः श्लीपदानि विषजुष्टं च शोणितम् ||१३||
अर्बुदानि विसर्पाश्च ग्रन्थयश्चादितश्च ते |
त्रयस्त्रयश्चोपदंशाः स्तनरोगा विदारिका ||१४||
सु(शु)षिरो गलशालूकं कण्टकाः कृमिदन्तकः |
दन्तवेष्टः सोपकुशः शीतादो दन्तपुप्पुटः ||१५||
पित्तासृक्कफजाश्चौष्ठ्याः क्षुद्ररोगाश्च भूयशः |१६|
Adhikarana 8 (16) · Śloka 17
সীব্যা মেদঃসমুত্থাশ্চ ভিন্নাঃ সুলিখিতা গদাঃ ||১৬||
সদ্যোব্রণাশ্চ যে চৈব চলসন্ধিব্যপাশ্রিতাঃ |১৭|
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सीव्या मेदःसमुत्थाश्च भिन्नाः सुलिखिता गदाः ||१६||
सद्योव्रणाश्च ये चैव चलसन्धिव्यपाश्रिताः |१७|
Adhikarana 9 (17) · Śloka 18
ন ক্ষারাগ্নিবিষৈর্জুষ্টা ন চ মারুতবাহিনঃ ||১৭||
নান্তর্লোহিতশল্যাশ্চ... |১৮|
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न क्षाराग्निविषैर्जुष्टा न च मारुतवाहिनः ||१७||
नान्तर्लोहितशल्याश्च... |१८|
Adhikarana 10 (18) · Śloka 18
... তেষু সম্যগ্বিশোধনম্ |১৮|
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... तेषु सम्यग्विशोधनम् |१८|
Adhikarana 11 (18-19) · Śloka 19
পাংশুরোমনখাদীনি চলমস্থি ভবেচ্চ যত্ ||১৮||
অহৃতানি যতোঽমূনি পাচযেযুর্ভৃশং ব্রণম্ |
রুজশ্চ বিবিধাঃ কুর্যুস্তস্মাদেতান্ বিশোধযেত্ ||১৯||
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पांशुरोमनखादीनि चलमस्थि भवेच्च यत् ||१८||
अहृतानि यतोऽमूनि पाचयेयुर्भृशं व्रणम् |
रुजश्च विविधाः कुर्युस्तस्मादेतान् विशोधयेत् ||१९||
Adhikarana 12 (20-26) · Śloka 26
ততো ব্রণং সমুন্নম্য স্থাপযিত্বা যথাস্থিতম্ |
সীব্যেত্ সূক্ষ্মেণ সূত্রেণ বল্কেনাশ্মন্তকস্য বা ||২০||
শণজক্ষৌমসূত্রাভ্যাং স্নায্বা বালেন বা পুনঃ |
মূর্বাগুডূচীতানৈর্বা সীব্যেদ্বেল্লিতকং শনৈঃ ||২১||
সীব্যেদ্গোফণিকাং বাঽপি সীব্যেদ্বা তুন্নসেবনীম্ |
ঋজুগ্রন্থিমথো বাঽপি যথাযোগমথাপি বা ||২২||
দেশেঽল্পমাংসে সন্ধৌ চ সূচী বৃত্তাঽঙ্গুলদ্বযম্ |
আযতা ত্র্যঙ্গুলা ত্র্যস্রা মাংসলে চাঽপি পূজিতা ||২৩||
ধনুর্বক্রা হিতা মর্মফলকোশোদরোপরি |
ইত্যেতাস্ত্রিবিধাঃ সূচীস্তীক্ষ্ণাগ্রাঃ সুসমাহিতাঃ ||২৪||
কারযেন্মালতীপুষ্পবৃন্তাগ্রপরিমণ্ডলাঃ |
নাতিদূরে নিকৃষ্টে বা সূচীং কর্মণি পাতযেত্ ||২৫||
দূরাদ্রুজো ব্রণৌষ্ঠস্য সন্নিকৃষ্টেঽবলুঞ্চনম্ ||২৬||
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ततो व्रणं समुन्नम्य स्थापयित्वा यथास्थितम् |
सीव्येत् सूक्ष्मेण सूत्रेण वल्केनाश्मन्तकस्य वा ||२०||
शणजक्षौमसूत्राभ्यां स्नाय्वा बालेन वा पुनः |
मूर्वागुडूचीतानैर्वा सीव्येद्वेल्लितकं शनैः ||२१||
सीव्येद्गोफणिकां वाऽपि सीव्येद्वा तुन्नसेवनीम् |
ऋजुग्रन्थिमथो वाऽपि यथायोगमथापि वा ||२२||
देशेऽल्पमांसे सन्धौ च सूची वृत्ताऽङ्गुलद्वयम् |
आयता त्र्यङ्गुला त्र्यस्रा मांसले चाऽपि पूजिता ||२३||
धनुर्वक्रा हिता मर्मफलकोशोदरोपरि |
इत्येतास्त्रिविधाः सूचीस्तीक्ष्णाग्राः सुसमाहिताः ||२४||
कारयेन्मालतीपुष्पवृन्ताग्रपरिमण्डलाः |
नातिदूरे निकृष्टे वा सूचीं कर्मणि पातयेत् ||२५||
दूराद्रुजो व्रणौष्ठस्य सन्निकृष्टेऽवलुञ्चनम् ||२६||
Adhikarana 13 (27-28) · Śloka 28
অথ ক্ষৌমপিচুচ্ছন্নং সুস্যূতং প্রতিসারযেত্ |
প্রিযঙ্গ্বঞ্জনযষ্ট্যাহ্বরোধ্রচূর্ণৈঃ সমন্ততঃ ||২৭||
শল্লকীফলচূর্ণৈর্বা ক্ষৌমধ্যামেন বা পুনঃ |
ততো ব্রণং যথাযোগং বদ্ধ্বাঽঽচারিকমাদিশেত্ ||২৮||
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अथ क्षौमपिचुच्छन्नं सुस्यूतं प्रतिसारयेत् |
प्रियङ्ग्वञ्जनयष्ट्याह्वरोध्रचूर्णैः समन्ततः ||२७||
शल्लकीफलचूर्णैर्वा क्षौमध्यामेन वा पुनः |
ततो व्रणं यथायोगं बद्ध्वाऽऽचारिकमादिशेत् ||२८||
Adhikarana 14 (29) · Śloka 29
এতদষ্টবিধং কর্ম সমাসেন প্রকীর্তিতম্ |
চিকিত্সিতেষু কার্ত্স্ন্যেন বিস্তরস্তস্য বক্ষ্যতে ||২৯||
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एतदष्टविधं कर्म समासेन प्रकीर्तितम् |
चिकित्सितेषु कार्त्स्न्येन विस्तरस्तस्य वक्ष्यते ||२९||
Adhikarana 15 (30) · Śloka 30
হীনাতিরিক্তং তির্যক্ চ গাত্রচ্ছেদনমাত্মনঃ |
এতাশ্চতস্রোঽষ্টবিধে কর্মণি ব্যাপদঃ স্মৃতাঃ ||৩০||
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हीनातिरिक्तं तिर्यक् च गात्रच्छेदनमात्मनः |
एताश्चतस्रोऽष्टविधे कर्मणि व्यापदः स्मृताः ||३०||
Adhikarana 16 (31) · Śloka 31
অজ্ঞানলোভাহিতবাক্যযোগভযপ্রমোহৈরপরৈশ্চ ভাবৈঃ |
যদা প্রযুঞ্জীত ভিষক্ কুশস্ত্রং তদা স শেষান্ কুরুতে বিকারান্ ||৩১||
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अज्ञानलोभाहितवाक्ययोगभयप्रमोहैरपरैश्च भावैः |
यदा प्रयुञ्जीत भिषक् कुशस्त्रं तदा स शेषान् कुरुते विकारान् ||३१||
Adhikarana 17 (32) · Śloka 32
তং ক্ষারশস্ত্রাগ্নিভিরৌষধৈশ্চ ভূযোঽভিযুঞ্জানমযুক্তিযুক্তম্ |
জিজীবিষুর্দূরত এব বৈদ্যং বিবর্জযেদুগ্রবিষাহিতুল্যম্ ||৩২||
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तं क्षारशस्त्राग्निभिरौषधैश्च भूयोऽभियुञ्जानमयुक्तियुक्तम् |
जिजीविषुर्दूरत एव वैद्यं विवर्जयेदुग्रविषाहितुल्यम् ||३२||
Adhikarana 18 (33) · Śloka 33
তদেব যুক্তং ত্বতি মর্মসন্ধীন্ হিংস্যাত্ সিরাঃ স্নাযুমথাস্থি চৈব |
মূর্খপ্রযুক্তং পুরুষং ক্ষণেন প্রাণৈর্বিযুঞ্জ্যাদথবা কদাচিত্ ||৩৩||
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तदेव युक्तं त्वति मर्मसन्धीन् हिंस्यात् सिराः स्नायुमथास्थि चैव |
मूर्खप्रयुक्तं पुरुषं क्षणेन प्राणैर्वियुञ्ज्यादथवा कदाचित् ||३३||
Adhikarana 19 (34-35) · Śloka 35
ভ্রমঃ প্রলাপঃ পতনং প্রমোহো বিচেষ্টনং সংলযনোষ্ণতে চ |
স্রস্তাঙ্গতা মূর্চ্ছনমূর্ধ্ববাতস্তীব্রা রুজো বাতকৃতাশ্চ তাস্তাঃ ||৩৪||
মাংসোদকাভং রুধিরং চ গচ্ছেত্ সর্বেন্দ্রিযার্থোপরমস্তথৈব |
দশার্ধসঙ্খ্যেষ্বপি বিক্ষতেষু সামান্যতো মর্মসু লিঙ্গমুক্তম্ ||৩৫||
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भ्रमः प्रलापः पतनं प्रमोहो विचेष्टनं संलयनोष्णते च |
स्रस्ताङ्गता मूर्च्छनमूर्ध्ववातस्तीव्रा रुजो वातकृताश्च तास्ताः ||३४||
मांसोदकाभं रुधिरं च गच्छेत् सर्वेन्द्रियार्थोपरमस्तथैव |
दशार्धसङ्ख्येष्वपि विक्षतेषु सामान्यतो मर्मसु लिङ्गमुक्तम् ||३५||
Adhikarana 20 (36-39) · Śloka 39
সুরেন্দ্রগোপপ্রতিমং প্রভূতং রক্তং স্রবেদ্বৈ ক্ষততশ্চ বাযুঃ |
করোতি রোগান্ বিবিধান্ যথোক্তাংশ্ছিন্নাসু ভিন্নাস্বথবা সিরাসু ||৩৬||
কৌব্জ্যং শরীরাবযবাবসাদঃ ক্রিযাস্বশক্তিস্তুমুলা রুজশ্চ |
চিরাদ্ব্র্রণো রোহতি যস্য চাপি তং স্নাযুবিদ্ধং মনুজং ব্যবস্যেত্ ||৩৭||
শোফাতিবৃদ্ধিস্তুমুলা রুজশ্চ বলক্ষযঃ পর্বসু ভেদশোফৌ |
ক্ষতেষু সন্ধিষ্বচলাচলেষু স্যাত্ সন্ধিকর্মোপরতিশ্চ লিঙ্গম্ ||৩৮||
ঘোরা রুজো যস্য নিশাদিনেষু সর্বাস্ববস্থাসু ন শান্তিরস্তি |
তৃষ্ণাঙ্গসাদৌ শ্বযথুশ্চ রুক্ চ তমস্থিবিদ্ধং মনুজং ব্যবস্যেত্ ||৩৯||
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सुरेन्द्रगोपप्रतिमं प्रभूतं रक्तं स्रवेद्वै क्षततश्च वायुः |
करोति रोगान् विविधान् यथोक्तांश्छिन्नासु भिन्नास्वथवा सिरासु ||३६||
कौब्ज्यं शरीरावयवावसादः क्रियास्वशक्तिस्तुमुला रुजश्च |
चिराद्व्र्रणो रोहति यस्य चापि तं स्नायुविद्धं मनुजं व्यवस्येत् ||३७||
शोफातिवृद्धिस्तुमुला रुजश्च बलक्षयः पर्वसु भेदशोफौ |
क्षतेषु सन्धिष्वचलाचलेषु स्यात् सन्धिकर्मोपरतिश्च लिङ्गम् ||३८||
घोरा रुजो यस्य निशादिनेषु सर्वास्ववस्थासु न शान्तिरस्ति |
तृष्णाङ्गसादौ श्वयथुश्च रुक् च तमस्थिविद्धं मनुजं व्यवस्येत् ||३९||
Adhikarana 21 (40) · Śloka 40
যথাস্বমেতানি বিভাবযেচ্চ লিঙ্গানি মর্মস্বভিতাডিতেষু |৪০|
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यथास्वमेतानि विभावयेच्च लिङ्गानि मर्मस्वभिताडितेषु |४०|
Adhikarana 22 (40) · Śloka 40
স্পর্শং ন জানাতি বিপাণ্ডুবর্ণো যো মাংসমর্মণ্যভিতাডিতঃ স্যাত্ ||৪০||
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स्पर्शं न जानाति विपाण्डुवर्णो यो मांसमर्मण्यभिताडितः स्यात् ||४०||
Adhikarana 23 (41) · Śloka 41
আত্মানমেবাথ জঘন্যকারী শস্ত্রেণ যো হন্তি হি কর্ম কুর্বন্ |
তমাত্মবানাত্মহনং কুবৈদ্যং বিবর্জযেদাযুরভীপ্সমানঃ ||৪১||
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आत्मानमेवाथ जघन्यकारी शस्त्रेण यो हन्ति हि कर्म कुर्वन् |
तमात्मवानात्महनं कुवैद्यं विवर्जयेदायुरभीप्समानः ||४१||
Adhikarana 24 (42) · Śloka 42
তির্যক্ প্রণিহিতে শস্ত্রে দোষাঃ পূর্বমুদাহৃতাঃ |
তস্মাত্ পরিহরন্ দোষান্ কুর্যাচ্ছস্ত্রনিপাতনম্ ||৪২||
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तिर्यक् प्रणिहिते शस्त्रे दोषाः पूर्वमुदाहृताः |
तस्मात् परिहरन् दोषान् कुर्याच्छस्त्रनिपातनम् ||४२||
Adhikarana 25 (43) · Śloka 44
মাতরং পিতরং পুত্রান্ বান্ধবানপি চাতুরঃ |
অপ্যেতানভিশঙ্কেত বৈদ্যে বিশ্বাসমেতি চ ||৪৩||
বিসৃজত্যাত্মনাঽঽত্মানং ন চৈনং পরিশঙ্কতে |৪৪|
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मातरं पितरं पुत्रान् बान्धवानपि चातुरः |
अप्येतानभिशङ्केत वैद्ये विश्वासमेति च ||४३||
विसृजत्यात्मनाऽऽत्मानं न चैनं परिशङ्कते |४४|
Adhikarana 26 (44) · Śloka 44
তস্মাত্ পুত্রবদেবৈনং পালযেদাতুরং ভিষক্ ||৪৪||
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तस्मात् पुत्रवदेवैनं पालयेदातुरं भिषक् ||४४||
Adhikarana 27 (45) · Śloka 45
ধর্মার্থৌ কীর্তিমিত্যর্থং সতাং গ্রহণমুত্তমম্ |
প্রাপ্নুযাত্ স্বর্গবাসং চ হিতমারভ্য কর্মণা ||৪৫||
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धर्मार्थौ कीर्तिमित्यर्थं सतां ग्रहणमुत्तमम् |
प्राप्नुयात् स्वर्गवासं च हितमारभ्य कर्मणा ||४५||
Adhikarana 28 (46) · Śloka 46
কর্মণা কশ্চিদেকেন দ্বাভ্যাং কশ্চিত্ত্রিভিস্তথা |
বিকারঃ সাধ্যতে কশ্চিচ্চতুর্ভিরপি কর্মভিঃ ||৪৬||
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कर्मणा कश्चिदेकेन द्वाभ्यां कश्चित्त्रिभिस्तथा |
विकारः साध्यते कश्चिच्चतुर्भिरपि कर्मभिः ||४६||
Adhikarana puShpikA · Śloka 25
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানেঽষ্টবিধশস্ত্রকর্মীযো নাম পঞ্চবিংশোঽধ্যাযঃ ||২৫||
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इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽष्टविधशस्त्रकर्मीयो नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ||२५||