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26. pranaṣṭaśalyavijñānīyādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ প্রনষ্টশল্যবিজ্ঞানীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः प्रनष्टशल्यविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

‘শল’ ‘শ্বল’ আশুগমনে ধাতূঃ; তযোরাদ্যস্য শল্যমিতি রূপম্ ||৩||

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‘शल’ ‘श्वल’ आशुगमने धातूः; तयोराद्यस्य शल्यमिति रूपम् ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

তদ্দ্বিবিধং শারীরমাগন্তুকং চ ||৪||

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तद्द्विविधं शारीरमागन्तुकं च ||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

সর্বশরীরাবাধকরং শল্যং, তদিহোপদিশ্যত ইত্যতঃ শল্যশাস্ত্রম্ ||৫||

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सर्वशरीराबाधकरं शल्यं, तदिहोपदिश्यत इत्यतः शल्यशास्त्रम् ||५||

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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6

তত্র শারীরং দন্তরোমনখাদি ধাতবোঽন্নমলা দোষাশ্চ দুষ্টাঃ; আগন্ত্বপি শারীরশল্যব্যতিরেকেণ যাবন্তো ভাবা দুঃখমুত্পাদযন্তি ||৬||

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तत्र शारीरं दन्तरोमनखादि धातवोऽन्नमला दोषाश्च दुष्टाः; आगन्त्वपि शारीरशल्यव्यतिरेकेण यावन्तो भावा दुःखमुत्पादयन्ति ||६||

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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7

অধিকারো হি লোহবেণুবৃক্ষতৃণশৃঙ্গাস্থিমযেষু; তত্রাপি বিশেষতো লোহেষ্বেব , বিশসনার্থোপপন্নত্বাল্লোহস্য; লোহানামপি দুর্বারত্বাদণুমুখত্বাদ্দূরপ্রযোজনকরত্বাচ্চ শর এবাধিকৃতঃ | স চ দ্বিবিধঃ কর্ণী , শ্লক্ষ্ণশ্চ; প্রাযেণ বিবিধবৃক্ষপত্রপুষ্পফলতুল্যাকৃতযো ব্যাখ্যাতাঃ, ব্যালমৃগপক্ষিবক্রসদৃশাশ্চ ||৭||

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अधिकारो हि लोहवेणुवृक्षतृणशृङ्गास्थिमयेषु; तत्रापि विशेषतो लोहेष्वेव , विशसनार्थोपपन्नत्वाल्लोहस्य; लोहानामपि दुर्वारत्वादणुमुखत्वाद्दूरप्रयोजनकरत्वाच्च शर एवाधिकृतः | स च द्विविधः कर्णी , श्लक्ष्णश्च; प्रायेण विविधवृक्षपत्रपुष्पफलतुल्याकृतयो व्याख्याताः, व्यालमृगपक्षिवक्रसदृशाश्च ||७||

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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8

সর্বশল্যানাং তু মহতামণূনাং বা পঞ্চবিধো গতিবিশেষ ঊর্ধ্বমধোঽর্বাচীনস্তির্যগৃজুরিতি ||৮||

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सर्वशल्यानां तु महतामणूनां वा पञ्चविधो गतिविशेष ऊर्ध्वमधोऽर्वाचीनस्तिर्यगृजुरिति ||८||

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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9

তানি বেগক্ষযাত্ প্রতিঘাতাদ্বা ত্বগাদিষু ব্রণবস্তুষ্বতিষ্ঠন্তে, ধমনীস্রোতোঽস্থিবিবরপেশীপ্রভৃতিষু বা শরীরপ্রদেশেষু ||৯||

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तानि वेगक्षयात् प्रतिघाताद्वा त्वगादिषु व्रणवस्तुष्वतिष्ठन्ते, धमनीस्रोतोऽस्थिविवरपेशीप्रभृतिषु वा शरीरप्रदेशेषु ||९||

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Adhikarana 9 (10) · Śloka 10

তত্র শল্যলক্ষণমুচ্যমানমুপধারয | তদ্দ্বিধং সামান্যং বৈশেষিকং চ | শ্যাবং পিডকাচিতং শোফবেদনাবন্তং মুহুর্মুহুঃ শোণিতাস্রাবিণং বুদ্বুদবদুন্নতং মৃদুমাংসং চ ব্রণং জানীযাত্ সশল্যোঽযমিতি; সামান্যমেতল্লক্ষণমুক্তম্ | বৈশেষিকং তু- ত্বগ্গতে বিবর্ণঃ শোফো ভবত্যাযতঃ কঠিনশ্চ; মাংসগতে শোফাভি(তি)বৃদ্ধিঃ শল্যমার্গানুপসংরোহঃ পীডনাসহিষ্ণুতা চোষপাকৌ চ; পেশ্যন্তরস্থেঽপ্যেতদেব চোষশোফবর্জং; সিরাগতে সিরাধ্মানং সিরাশূলং সিরাশোফশ্চ; স্নাযুগতে স্নাযুজালোত্ক্ষেপণং সংরম্ভশ্চোগ্রা রুক্ চ; স্রোতোগতে স্রোতসাং স্বকর্মগুণহানিঃ; ধমনীস্থে সফেনং রক্তমীরযন্ননিলঃ সশব্দো নির্গচ্ছত্যঙ্গমর্দঃ পিপাসা হৃল্লাসশ্চ; অস্থিগতে বিবিধবেদনাপ্রাদুর্ভাবঃ শোফশ্চ; অস্থিবিবরগতেঽস্থিপূর্ণতাঽস্থিতোদঃ সংহর্ষো বলবাংশ্চ; সন্ধিগতেঽস্থিবচ্চেষ্টোপরমশ্চ; কোষ্ঠগত আটোপানাহৌ মূত্রপুরীষাহারদর্শনং চ ব্রণমুখাত্; মর্মগতে মর্মবিদ্ধবচ্চেষ্টতে | সূক্ষ্মগতিষু শল্যেষ্বেতান্যেব লক্ষণান্যস্পষ্টানি ভবন্তি ||১০||

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तत्र शल्यलक्षणमुच्यमानमुपधारय | तद्द्विधं सामान्यं वैशेषिकं च | श्यावं पिडकाचितं शोफवेदनावन्तं मुहुर्मुहुः शोणितास्राविणं बुद्बुदवदुन्नतं मृदुमांसं च व्रणं जानीयात् सशल्योऽयमिति; सामान्यमेतल्लक्षणमुक्तम् | वैशेषिकं तु- त्वग्गते विवर्णः शोफो भवत्यायतः कठिनश्च; मांसगते शोफाभि(ति)वृद्धिः शल्यमार्गानुपसंरोहः पीडनासहिष्णुता चोषपाकौ च; पेश्यन्तरस्थेऽप्येतदेव चोषशोफवर्जं; सिरागते सिराध्मानं सिराशूलं सिराशोफश्च; स्नायुगते स्नायुजालोत्क्षेपणं संरम्भश्चोग्रा रुक् च; स्रोतोगते स्रोतसां स्वकर्मगुणहानिः; धमनीस्थे सफेनं रक्तमीरयन्ननिलः सशब्दो निर्गच्छत्यङ्गमर्दः पिपासा हृल्लासश्च; अस्थिगते विविधवेदनाप्रादुर्भावः शोफश्च; अस्थिविवरगतेऽस्थिपूर्णताऽस्थितोदः संहर्षो बलवांश्च; सन्धिगतेऽस्थिवच्चेष्टोपरमश्च; कोष्ठगत आटोपानाहौ मूत्रपुरीषाहारदर्शनं च व्रणमुखात्; मर्मगते मर्मविद्धवच्चेष्टते | सूक्ष्मगतिषु शल्येष्वेतान्येव लक्षणान्यस्पष्टानि भवन्ति ||१०||

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Adhikarana 10 (11) · Śloka 11

মহান্ত্যল্পানি বা শুদ্ধদেহানামনুলোমসন্নিবিষ্টানি রোহন্তি বিশেষতঃ কণ্ঠস্রোতঃসিরাত্বক্পেশ্যস্থিবিবরেষঃ | দোষপ্রকোপব্যাযামাভিঘাতাজীর্ণেভ্যঃ প্রচলিতানি পুনর্বাধন্তে ||১১||

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महान्त्यल्पानि वा शुद्धदेहानामनुलोमसन्निविष्टानि रोहन्ति विशेषतः कण्ठस्रोतःसिरात्वक्पेश्यस्थिविवरेषः | दोषप्रकोपव्यायामाभिघाताजीर्णेभ्यः प्रचलितानि पुनर्बाधन्ते ||११||

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Adhikarana 11 (12) · Śloka 12

তত্র, ত্বক্প্রনষ্টে স্নিগ্ধস্বিন্নাযাং মৃন্মাষযবগোধূমগোমযমৃদিতাযাং ত্বচি যত্র সংরম্ভো বেদনা বা ভবতি তত্র শল্যং বিজানীযাত্, স্ত্যানঘৃতমৃচ্চন্দনকল্কৈর্বা প্রদিগ্ধাযাং শল্যোষ্মণাঽঽশু বিসরতি ঘৃতমুপশুষ্যতি চালেপো যত্র তত্র শল্যং বিজানীযাত্; মাংসপ্রনষ্টে স্নেহস্বেদাদিভিঃ ক্রিযাবিশেষৈরবিরুদ্ধৈরাতুরমুপপাদযেত্, কর্শিতস্য তু শিথিলীভূতমনববদ্ধং ক্ষুভ্যমাণং যত্র সংরম্ভং বেদনাং বা জনযতি তত্র শল্যং বিজানীযাত্; কোষ্ঠাস্থিসন্ধিপেশীবিবরেষ্ববস্থিতমেবমেব পরীক্ষেত; সিরাধমনীস্রোতঃস্নাযুপ্রনষ্টে খণ্ডচক্রসংযুক্তে যানে ব্যাধিতমারোপ্যাশু বিষমেঽধ্বনি যাযাত্ যত্র সংরম্ভো বেদনা বা ভবতি তত্র শল্যং বিজানীযাত্; অস্থিপ্রনষ্টে স্নেহস্বেদোপপন্নান্যস্থীনি বন্ধনপীডনাভ্যাং ভৃশমুপাচরেত্, যত্র সংরম্ভো বেদনা ভবতি তত্র শল্যং বিজানীযাত্; সন্ধিপ্রনষ্টে স্নেহস্বেদোপপন্নান্ সন্ধীন্ প্রসরণাকুঞ্চনবন্ধনপীডনৈঃ ভৃশমুপাচরেত্, যত্র সংরম্ভো বেদনা বা ভবতি তত্র শল্যং বিজানীযাত্, সন্ধিপ্রনষ্টে স্নেহস্বেদোপপন্নান্ সন্ধীন্ প্রসরণাকুঞ্চনবন্ধনপীডনৈর্ভৃশমুপাচরেত্; যত্র সংরম্ভো বেদনা বা ভবতি তত্র শল্যং বিজানীযাত্, মর্মপ্রনষ্টে ত্বনন্যভাবান্মর্মণামুক্তং পরীক্ষণং ভবতি ||১২||

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तत्र, त्वक्प्रनष्टे स्निग्धस्विन्नायां मृन्माषयवगोधूमगोमयमृदितायां त्वचि यत्र संरम्भो वेदना वा भवति तत्र शल्यं विजानीयात्, स्त्यानघृतमृच्चन्दनकल्कैर्वा प्रदिग्धायां शल्योष्मणाऽऽशु विसरति घृतमुपशुष्यति चालेपो यत्र तत्र शल्यं विजानीयात्; मांसप्रनष्टे स्नेहस्वेदादिभिः क्रियाविशेषैरविरुद्धैरातुरमुपपादयेत्, कर्शितस्य तु शिथिलीभूतमनवबद्धं क्षुभ्यमाणं यत्र संरम्भं वेदनां वा जनयति तत्र शल्यं विजानीयात्; कोष्ठास्थिसन्धिपेशीविवरेष्ववस्थितमेवमेव परीक्षेत; सिराधमनीस्रोतःस्नायुप्रनष्टे खण्डचक्रसंयुक्ते याने व्याधितमारोप्याशु विषमेऽध्वनि यायात् यत्र संरम्भो वेदना वा भवति तत्र शल्यं विजानीयात्; अस्थिप्रनष्टे स्नेहस्वेदोपपन्नान्यस्थीनि बन्धनपीडनाभ्यां भृशमुपाचरेत्, यत्र संरम्भो वेदना भवति तत्र शल्यं विजानीयात्; सन्धिप्रनष्टे स्नेहस्वेदोपपन्नान् सन्धीन् प्रसरणाकुञ्चनबन्धनपीडनैः भृशमुपाचरेत्, यत्र संरम्भो वेदना वा भवति तत्र शल्यं विजानीयात्, सन्धिप्रनष्टे स्नेहस्वेदोपपन्नान् सन्धीन् प्रसरणाकुञ्चनबन्धनपीडनैर्भृशमुपाचरेत्; यत्र संरम्भो वेदना वा भवति तत्र शल्यं विजानीयात्, मर्मप्रनष्टे त्वनन्यभावान्मर्मणामुक्तं परीक्षणं भवति ||१२||

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Adhikarana 12 (13) · Śloka 13

সামান্যলক্ষমপি চ হস্তিস্কন্ধাশ্বপৃষ্ঠপর্বতদ্রুমারোহণধনুর্ব্যাযামদ্রুতযাননিযুদ্ধাধ্বগমনলঙ্ঘনপ্লবনপ্রতরণ- ব্যাযামৈর্জৃম্ভোদ্গারকাসক্ষবথুষ্ঠীবনহসনপ্রাণাযামৈর্বাতমূত্রপুরীষশুক্রোত্সর্গৈর্বা যত্র সংরম্ভো বেদনা বা ভবতি তত্র শল্যং বিজানীযাত্ ||১৩||

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सामान्यलक्षमपि च हस्तिस्कन्धाश्वपृष्ठपर्वतद्रुमारोहणधनुर्व्यायामद्रुतयाननियुद्धाध्वगमनलङ्घनप्लवनप्रतरण- व्यायामैर्जृम्भोद्गारकासक्षवथुष्ठीवनहसनप्राणायामैर्वातमूत्रपुरीषशुक्रोत्सर्गैर्वा यत्र संरम्भो वेदना वा भवति तत्र शल्यं विजानीयात् ||१३||

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Adhikarana 13 (14-15) · Śloka 15

ভবন্তি চাত্র- যস্মিংস্তোদাদযো দেশে সুপ্ততা গুরুতাঽপি চ | ঘট্টতে বহুশো যত্র শূযতে রুজ্যতেঽপি চ ||১৪|| আতুরশ্চাপি যং দেশমভীক্ষ্ণং পরিরক্ষতি | সংবাহ্যমানো বহুশস্তত্র শল্যং বিনির্দিশেত্ ||১৫||

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भवन्ति चात्र- यस्मिंस्तोदादयो देशे सुप्तता गुरुताऽपि च | घट्टते बहुशो यत्र शूयते रुज्यतेऽपि च ||१४|| आतुरश्चापि यं देशमभीक्ष्णं परिरक्षति | संवाह्यमानो बहुशस्तत्र शल्यं विनिर्दिशेत् ||१५||

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Adhikarana 14 (16-17) · Śloka 17

অল্পাবাধমশূনং চ নীরুজং নিরুপদ্রবম্ | প্রসন্নং মৃদুপর্যন্তং নিরাঘট্টমনুন্নতম্ ||১৬|| এষণ্যা সর্বতো দৃষ্ট্বা যথামার্গং চিকিত্সকঃ | প্রসারাকুঞ্চনান্নূনং নিঃশল্যমিতি নির্দিশেত্ ||১৭||

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अल्पाबाधमशूनं च नीरुजं निरुपद्रवम् | प्रसन्नं मृदुपर्यन्तं निराघट्टमनुन्नतम् ||१६|| एषण्या सर्वतो दृष्ट्वा यथामार्गं चिकित्सकः | प्रसाराकुञ्चनान्नूनं निःशल्यमिति निर्दिशेत् ||१७||

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Adhikarana 15 (18) · Śloka 18

অস্থ্যাত্মকং ভজ্যতে তু শল্যমন্তশ্চ শীর্যতে | প্রাযো নির্ভুজ্যতে শার্ঙ্গমাযসং চেতি নিশ্চযঃ ||১৮||

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अस्थ्यात्मकं भज्यते तु शल्यमन्तश्च शीर्यते | प्रायो निर्भुज्यते शार्ङ्गमायसं चेति निश्चयः ||१८||

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Adhikarana 16 (19) · Śloka 19

বার্ক্ষবৈণবতার্ণানি নির্হ্রিযন্তে তু নো যদি | পচন্তি রক্তং মাংসং চ ক্ষিপ্রমেতানি দেহিনাম্ ||১৯||

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वार्क्षवैणवतार्णानि निर्ह्रियन्ते तु नो यदि | पचन्ति रक्तं मांसं च क्षिप्रमेतानि देहिनाम् ||१९||

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Adhikarana 17 (20) · Śloka 20

কানকং রাজতং তাম্রং রৈতিকং ত্রপু সীসকম্ | চিরস্থানাদ্বিলীযন্তে পিত্ততেজঃপ্রতাপনাত্ ||২০||

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कानकं राजतं ताम्रं रैतिकं त्रपु सीसकम् | चिरस्थानाद्विलीयन्ते पित्ततेजःप्रतापनात् ||२०||

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Adhikarana 18 (21) · Śloka 21

স্বভাবশীতা মৃদবো যে চান্যেঽপীদৃশা মতাঃ | দ্রবীভূতাঃ শরীরেঽস্মিন্নেকত্বং যান্তি ধাতুভিঃ ||২১||

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स्वभावशीता मृदवो ये चान्येऽपीदृशा मताः | द्रवीभूताः शरीरेऽस्मिन्नेकत्वं यान्ति धातुभिः ||२१||

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Adhikarana 19 (22) · Śloka 22

বিষাণদন্তকেশাস্থিবেণুদারুপলানি তু | শল্যানি ন বিশীর্যন্তে শরীরে মৃন্মযানি চ ||২২||

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विषाणदन्तकेशास्थिवेणुदारुपलानि तु | शल्यानि न विशीर्यन्ते शरीरे मृन्मयानि च ||२२||

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Adhikarana 20 (23) · Śloka 23

দ্বিবিধং পঞ্চগতিমত্ত্বগাদিব্রণবস্তুষু | যো বেত্তি বিষ্টিতং শল্যং স রাজ্ঞঃ কর্তুমর্হতি ||২৩||

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द्विविधं पञ्चगतिमत्त्वगादिव्रणवस्तुषु | यो वेत्ति विष्टितं शल्यं स राज्ञः कर्तुमर्हति ||२३||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 26

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে প্রনষ্টশল্যবিজ্ঞানীযো নাম ষড্বিংশতিতমোঽধ্যাযঃ ||২৬||

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इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने प्रनष्टशल्यविज्ञानीयो नाम षड्विंशतितमोऽध्यायः ||२६||

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26. pranaṣṭaśalyavijñānīyādhyāyaḥ — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi