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14. śōṇitavarṇanīyādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ শোণিতবর্ণনীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः शोणितवर्णनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

তত্র পাঞ্চভৌতিকস্য চতুর্বিধস্য ষড্রসস্য দ্বিবিধবীর্যস্যাষ্টবিধবীর্যস্য বাঽনেকগুণস্যোপযুক্তস্যাহারস্য সম্যক্পরিণতস্য যস্তেজোভূতঃ সারঃ পরমসূক্ষ্মঃ স `রসঃ’ ইত্যুচ্যতে, তস্য হৃদযং স্থানং, স হৃদযাচ্চতুর্বিংশতিধমনীরনুপ্রবিশ্যোর্ধ্বগাদশ দশাধোগামিন্যশ্চতস্রশ্চ তির্যগ্গাঃ কৃত্স্নং শরীরমহরহস্তর্পযতি বর্ধযতি ধারযতি যাপযতি চাদৃষ্টহেতুকেন কর্মণা | তস্য শরীরমনুসরতোঽনুমানাদ্গতিরুপলক্ষযিতব্যা ক্ষযবৃদ্ধিবৈকৃতৈঃ | তস্মিন্ সর্বশরীরাবযবদোষধাতুমলাশযানুসারিণি রসে জিজ্ঞাসা- কিমযং সৌম্যস্তৈজস? ইতি | অত্রোচ্যতে- স খলু দ্রবানুসারী স্নেহনজীবনতর্পণধারণাদিভির্বিশেষৈঃ সৌম্য ইত্যবগম্যতে ||৩||

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तत्र पाञ्चभौतिकस्य चतुर्विधस्य षड्रसस्य द्विविधवीर्यस्याष्टविधवीर्यस्य वाऽनेकगुणस्योपयुक्तस्याहारस्य सम्यक्परिणतस्य यस्तेजोभूतः सारः परमसूक्ष्मः स `रसः’ इत्युच्यते, तस्य हृदयं स्थानं, स हृदयाच्चतुर्विंशतिधमनीरनुप्रविश्योर्ध्वगादश दशाधोगामिन्यश्चतस्रश्च तिर्यग्गाः कृत्स्नं शरीरमहरहस्तर्पयति वर्धयति धारयति यापयति चादृष्टहेतुकेन कर्मणा | तस्य शरीरमनुसरतोऽनुमानाद्गतिरुपलक्षयितव्या क्षयवृद्धिवैकृतैः | तस्मिन् सर्वशरीरावयवदोषधातुमलाशयानुसारिणि रसे जिज्ञासा- किमयं सौम्यस्तैजस? इति | अत्रोच्यते- स खलु द्रवानुसारी स्नेहनजीवनतर्पणधारणादिभिर्विशेषैः सौम्य इत्यवगम्यते ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

স খল্বাপ্যো রসো যকৃত্প্লীহানৌ প্রাপ্য রাগমুপৈতি ||৪||

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स खल्वाप्यो रसो यकृत्प्लीहानौ प्राप्य रागमुपैति ||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

শ্লোকৌ চাত্র ভবতঃ- রঞ্জিতাস্তেজসা ত্বাপঃ শরীরস্থেন দেহিনাম্ | অব্যাপন্নাঃ প্রসন্নেন রক্তমিত্যভিধীযতে ||৫||

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श्लोकौ चात्र भवतः- रञ्जितास्तेजसा त्वापः शरीरस्थेन देहिनाम् | अव्यापन्नाः प्रसन्नेन रक्तमित्यभिधीयते ||५||

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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6

রসাদেব স্ত্রিযা রক্তং রজঃসঞ্জ্ঞং প্রবর্ততে | তদ্বর্ষাদ্দ্বাদশাদূর্ধ্বং যাতি পঞ্চাশতঃ ক্ষযম্ ||৬||

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रसादेव स्त्रिया रक्तं रजःसञ्ज्ञं प्रवर्तते | तद्वर्षाद्द्वादशादूर्ध्वं याति पञ्चाशतः क्षयम् ||६||

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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7

আর্তবং শোণিতং ত্বাগ্নেযম্, অগ্নীষোমীযত্বাদ্গর্ভস্য ||৭||

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आर्तवं शोणितं त्वाग्नेयम्, अग्नीषोमीयत्वाद्गर्भस्य ||७||

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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8

পাঞ্চভৌতিকং ত্বপরে জীবরক্তমাহুরাচার্যাঃ ||৮||

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पाञ्चभौतिकं त्वपरे जीवरक्तमाहुराचार्याः ||८||

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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9

বিস্রতা দ্রবতা রাগঃ স্পন্দনং লঘুতা তথা | ভূম্যাদীনাং গুণা হ্যেতে দৃশ্যন্তে চাত্র শোণিতে ||৯||

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विस्रता द्रवता रागः स्पन्दनं लघुता तथा | भूम्यादीनां गुणा ह्येते दृश्यन्ते चात्र शोणिते ||९||

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Adhikarana 9 (10) · Śloka 10

রসাদ্রক্তং ততো মাংসং মাংসান্মেদঃ প্রজাযতে | মেদসোঽস্থি ততো মজ্জা মজ্জ্ঞঃ শুক্রং তু জাযতে ||১০||

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रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते | मेदसोऽस्थि ततो मज्जा मज्ज्ञः शुक्रं तु जायते ||१०||

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Adhikarana 10 (11-12) · Śloka 12

তত্রৈতেষাং ধাতূনামন্নপানরসঃ প্রীণযিতা ||১১|| রসজং পুরুষং বিদ্যাদ্রসং রক্ষেত্ প্রযত্নতঃ | অন্নাত্পানাঞ্চ মতিমানাচারাঞ্চাপ্যতন্দ্রিতঃ ||১২||

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तत्रैतेषां धातूनामन्नपानरसः प्रीणयिता ||११|| रसजं पुरुषं विद्याद्रसं रक्षेत् प्रयत्नतः | अन्नात्पानाञ्च मतिमानाचाराञ्चाप्यतन्द्रितः ||१२||

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Adhikarana 11 (13) · Śloka 13

তত্র ‘রস’ গতৌ ধাতুঃ, অহরহর্গচ্ছতীত্যতো রসঃ ||১৩||

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तत्र ‘रस’ गतौ धातुः, अहरहर्गच्छतीत्यतो रसः ||१३||

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Adhikarana 12 (14-15) · Śloka 15

স খলু ত্রীণি ত্রীণি কলাসহস্রাণি পঞ্চদশ চ কলা একৈকস্মিন্ ধাতাববতিষ্ঠতে; এবং মাসেন রসঃ শুক্রং স্ত্রীণাং চার্তবং ভবতি ||১৪|| ভবতি চাত্র- অষ্টাদশসহস্রাণি সঙ্খ্যা হ্যস্মিন্ সমুচ্চযে | কলানাং নবতিঃ প্রোক্তা স্বতন্ত্রপরতন্ত্রযোঃ ||১৫||

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स खलु त्रीणि त्रीणि कलासहस्राणि पञ्चदश च कला एकैकस्मिन् धाताववतिष्ठते; एवं मासेन रसः शुक्रं स्त्रीणां चार्तवं भवति ||१४|| भवति चात्र- अष्टादशसहस्राणि सङ्ख्या ह्यस्मिन् समुच्चये | कलानां नवतिः प्रोक्ता स्वतन्त्रपरतन्त्रयोः ||१५||

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Adhikarana 13 (16) · Śloka 16

স শব্দার্চির্জলসন্তানবদণুনা বিশেষেণানুধাবত্যেবং শরীরং কেবলম্ ||১৬||

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स शब्दार्चिर्जलसन्तानवदणुना विशेषेणानुधावत्येवं शरीरं केवलम् ||१६||

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Adhikarana 14 (17) · Śloka 17

বাজীকরণ্যস্ত্বোষধযঃ স্ববলগুণোত্কর্ষাদ্বিরেচনবদুপযুক্তাঃ শুক্রং শীঘ্রং বিরেচযন্তি ||১৭||

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वाजीकरण्यस्त्वोषधयः स्वबलगुणोत्कर्षाद्विरेचनवदुपयुक्ताः शुक्रं शीघ्रं विरेचयन्ति ||१७||

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Adhikarana 15 (18) · Śloka 18

যথাহি পুষ্পমুকুলস্থো গন্ধো ন শক্যমিহাস্তীতি বক্তুং, নৈব নাস্তীতি; অথ চাস্তি, সতাং ভাবানামভিব্যক্তিরিতি জ্ঞাত্বা , কেবলং সৌক্ষ্ম্যান্নাভিব্যজ্যতে; স এব বিবৃতপত্রকেশরে পুষ্পে কালান্তরেণাভিব্যক্তিং গচ্ছতি; এবং বালানামপি বযঃপরিণামাচ্ছুক্রপ্রাদুর্ভাবো ভবতি, রোমরাজ্যাদযশ্চ বিশেষা নারীণাম্ ||১৮||

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यथाहि पुष्पमुकुलस्थो गन्धो न शक्यमिहास्तीति वक्तुं, नैव नास्तीति; अथ चास्ति, सतां भावानामभिव्यक्तिरिति ज्ञात्वा , केवलं सौक्ष्म्यान्नाभिव्यज्यते; स एव विवृतपत्रकेशरे पुष्पे कालान्तरेणाभिव्यक्तिं गच्छति; एवं बालानामपि वयःपरिणामाच्छुक्रप्रादुर्भावो भवति, रोमराज्यादयश्च विशेषा नारीणाम् ||१८||

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Adhikarana 16 (19) · Śloka 19

স এবান্নরসো বৃদ্ধানাং (জরা) পরিপক্বশরীরত্বাদপ্রীণনো ভবতি ||১৯||

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स एवान्नरसो वृद्धानां (जरा) परिपक्वशरीरत्वादप्रीणनो भवति ||१९||

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Adhikarana 17 (20) · Śloka 20

ত এতে শরীরধারণাদ্ধাতব ইত্যুচ্যন্তে ||২০||

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त एते शरीरधारणाद्धातव इत्युच्यन्ते ||२०||

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Adhikarana 18 (21) · Śloka 21

তেষাং ক্ষযবৃদ্ধী শোণিতনিমিত্তে, তস্মাত্তদধিকৃত্য বক্ষ্যামঃ | তত্র, ফেনিলমরুণং কৃষ্ণং পরুষং তনু শীঘ্রগমস্কন্দি চ বাতেন দুষ্টং; নীলং পীতং হরিতং শ্যাবং বিস্রমনিষ্টং পিপীলিকামক্ষিকাণামস্কন্দি চ পিত্তেন দুষ্টং; গৈরিকোদকপ্রতীকাশং স্নিগ্ধং শীতলং বহলং পিচ্ছিলং চিরস্রাবি মাংসপেশীপ্রভং চ শ্লেষ্মদুষ্টং; সর্বলক্ষণসংযুক্তং কাঞ্জিকাভং বিশেষতো দুর্গন্ধি চ সন্নিপাতদুষ্টং; দ্বিদোষলিঙ্গং সংসৃষ্টম্ ||২১||

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तेषां क्षयवृद्धी शोणितनिमित्ते, तस्मात्तदधिकृत्य वक्ष्यामः | तत्र, फेनिलमरुणं कृष्णं परुषं तनु शीघ्रगमस्कन्दि च वातेन दुष्टं; नीलं पीतं हरितं श्यावं विस्रमनिष्टं पिपीलिकामक्षिकाणामस्कन्दि च पित्तेन दुष्टं; गैरिकोदकप्रतीकाशं स्निग्धं शीतलं बहलं पिच्छिलं चिरस्रावि मांसपेशीप्रभं च श्लेष्मदुष्टं; सर्वलक्षणसंयुक्तं काञ्जिकाभं विशेषतो दुर्गन्धि च सन्निपातदुष्टं; द्विदोषलिङ्गं संसृष्टम् ||२१||

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Adhikarana 19 (22) · Śloka 22

ইন্দ্রগোপকপ্রতীকাশমসংহতমবিবর্ণং চ প্রকৃতিস্থং জানীযাত্ ||২২||

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इन्द्रगोपकप्रतीकाशमसंहतमविवर्णं च प्रकृतिस्थं जानीयात् ||२२||

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Adhikarana 20 (23) · Śloka 23

বিস্রাব্যাণ্যন্যত্র বক্ষ্যামঃ ||২৩||

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विस्राव्याण्यन्यत्र वक्ष्यामः ||२३||

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Adhikarana 21 (24) · Śloka 24

অথাবিস্রাব্যাঃ- সর্বাঙ্গশোফঃ, ক্ষীণস্য চাম্লভোজননিমিত্তঃ, পাণ্ডুরোগ্যর্শসোদরিশোষিগর্ভিণীনাং চ শ্বযথবঃ ||২৪||

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अथाविस्राव्याः- सर्वाङ्गशोफः, क्षीणस्य चाम्लभोजननिमित्तः, पाण्डुरोग्यर्शसोदरिशोषिगर्भिणीनां च श्वयथवः ||२४||

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Adhikarana 22 (25) · Śloka 25

শস্ত্রবিস্রাবণং দ্বিবিধং- প্রচ্ছানং , সিরাব্যধনং চ ||২৫||

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शस्त्रविस्रावणं द्विविधं- प्रच्छानं , सिराव्यधनं च ||२५||

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Adhikarana 23 (26) · Śloka 26

তত্র, ঋজ্বসঙ্কীর্ণং সূক্ষ্মং সমমনবগাঢমনুত্তানমাশু চ শস্ত্রং পাতযেন্মর্মসিরাস্নাযুসন্ধীনাং চানুপঘাতি ||২৬||

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तत्र, ऋज्वसङ्कीर्णं सूक्ष्मं सममनवगाढमनुत्तानमाशु च शस्त्रं पातयेन्मर्मसिरास्नायुसन्धीनां चानुपघाति ||२६||

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Adhikarana 24 (27-28) · Śloka 28

তত্র, দুর্দিনে দুর্বিদ্ধে শীতবাতযোরস্বিন্নে ভুক্তমাত্রে স্কন্দত্বাচ্ছোণিতং ন স্রবত্যল্পং বা স্রবতি ||২৭|| মদমূর্চ্ছাশ্রমার্তানাং বাতবিণ্মূত্রসঙ্গিনাম্ | নিদ্রাভিভূতভীতানাং নৃণাং নাসৃক্ প্রবর্ততে ||২৮||

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तत्र, दुर्दिने दुर्विद्धे शीतवातयोरस्विन्ने भुक्तमात्रे स्कन्दत्वाच्छोणितं न स्रवत्यल्पं वा स्रवति ||२७|| मदमूर्च्छाश्रमार्तानां वातविण्मूत्रसङ्गिनाम् | निद्राभिभूतभीतानां नृणां नासृक् प्रवर्तते ||२८||

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Adhikarana 25 (29) · Śloka 29

তদ্দুষ্টং শোণিতমনির্হ্রিযমাণং শোফদাহরাগপাকবেদনা জনযেত্ ||২৯||

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तद्दुष्टं शोणितमनिर्ह्रियमाणं शोफदाहरागपाकवेदना जनयेत् ||२९||

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Adhikarana 26 (30) · Śloka 30

অত্যুষ্ণেঽতিস্বিন্নেঽতিবিদ্ধেঽজ্ঞৈর্বিস্রাবিতমতিপ্রবর্ততে ; তদতিপ্রবৃত্তং শিরোঽভিতাপমান্ধ্যমধিমন্থতিমিরপ্রাদুর্ভাবং ধাতুক্ষযমাক্ষেপকং দাহং পক্ষাঘাতমেকাঙ্গবিকারং হিক্কাং শ্বাসকাসৌ পাণ্ডুরোগং মরণং চাপাদযতি ||৩০||

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अत्युष्णेऽतिस्विन्नेऽतिविद्धेऽज्ञैर्विस्रावितमतिप्रवर्तते ; तदतिप्रवृत्तं शिरोऽभितापमान्ध्यमधिमन्थतिमिरप्रादुर्भावं धातुक्षयमाक्षेपकं दाहं पक्षाघातमेकाङ्गविकारं हिक्कां श्वासकासौ पाण्डुरोगं मरणं चापादयति ||३०||

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Adhikarana 27 (31) · Śloka 31

তস্মান্ন শীতে নাত্যুষ্ণে নাস্বিন্নে নাতিতাপিতে | যবাগূং প্রতি পীতস্য শোণিতং মোক্ষযেদ্ভিষক্ ||৩১||

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तस्मान्न शीते नात्युष्णे नास्विन्ने नातितापिते | यवागूं प्रति पीतस्य शोणितं मोक्षयेद्भिषक् ||३१||

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Adhikarana 28 (32) · Śloka 32

সম্যগ্গত্বা যদা রক্তং স্বযমেবাবতিষ্ঠতে | শুদ্ধং তদা বিজানীযাত্ সম্যগ্বিস্রাবিতং চ তত্ ||৩২||

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सम्यग्गत्वा यदा रक्तं स्वयमेवावतिष्ठते | शुद्धं तदा विजानीयात् सम्यग्विस्रावितं च तत् ||३२||

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Adhikarana 29 (33) · Śloka 33

লাঘবং বেদনাশান্তির্ব্যাঘের্বেগপরিক্ষযঃ | সম্যগ্বিস্রাবিতে লিঙ্গং প্রসাদো মনসস্তথা ||৩৩||

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लाघवं वेदनाशान्तिर्व्याघेर्वेगपरिक्षयः | सम्यग्विस्राविते लिङ्गं प्रसादो मनसस्तथा ||३३||

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Adhikarana 30 (34) · Śloka 34

ত্বগ্দোষা গ্রন্থযঃ শোফা রোগাঃ শোণিতজাশ্চ যে | রক্তমোক্ষণশীলানাং ন ভবন্তি কদাচন ||৩৪||

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त्वग्दोषा ग्रन्थयः शोफा रोगाः शोणितजाश्च ये | रक्तमोक्षणशीलानां न भवन्ति कदाचन ||३४||

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Adhikarana 31 (35) · Śloka 35

অথ খল্বপ্রবর্তমানে রক্তে এলাশীতশিবকুষ্ঠতগরপাঠাভদ্রদারুবিডঙ্গচিত্রকত্রিকটুকাগারধূমহরিদ্রার্কাঙ্কুরনক্তমালফলৈর্যথালাভং ত্রিভিশ্চতুর্ভিঃ সমস্তৈর্বা চূর্ণীকৃতৈর্লবণতৈলপ্রগাঢৈর্ব্রণমুখমবঘর্ষযেত্, এবং সম্যক্ প্রবর্ততে ||৩৫||

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अथ खल्वप्रवर्तमाने रक्ते एलाशीतशिवकुष्ठतगरपाठाभद्रदारुविडङ्गचित्रकत्रिकटुकागारधूमहरिद्रार्काङ्कुरनक्तमालफलैर्यथालाभं त्रिभिश्चतुर्भिः समस्तैर्वा चूर्णीकृतैर्लवणतैलप्रगाढैर्व्रणमुखमवघर्षयेत्, एवं सम्यक् प्रवर्तते ||३५||

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Adhikarana 32 (36-38) · Śloka 38

অথাতিপ্রবৃত্তে রোধ্রমধুকপ্রিযঙ্গুপত্তঙ্গুপত্তঙ্গগৈরিকসর্জরসরসাঞ্জনশাল্মলীপুষ্পশঙ্খশুক্তিমাষযবগোধূমচূর্ণৈঃ শনৈঃ শনৈর্ব্রণমুখমবচূর্ণ্যাঙ্গুল্যগ্রেণাবপীডযেত্ সালসর্জার্জুনারিমেদমেষশৃঙ্গধবধন্বনত্বগ্ভি র্বা চূর্ণিতাভিঃ ক্ষৌমেণ বা ধ্মাপিতেন সমুদ্রফেনলাক্ষাচূর্ণৈর্বা, যথোক্তর্ব্রণবন্ধনদ্রব্যৈর্গাঢং বধ্নীযাত্, শীতাচ্ছাদনভোজনাগারৈঃ শীতৈঃ প্রদেহপরিষেকৈশ্চোপচরেত্, ক্ষারেণাগ্নিনা বা দহেদ্যথোক্তং, ব্যধাদনন্তরং তামেবাতিপ্রবৃত্তাং সিরাং বিধ্যেত্; কাকোল্যাদিক্বাথং বা শর্করামধুমধুরং পাযযেত্, এণহরিণোরভ্রশশমহিষবরাহাণাং বা রুধিরং; ক্ষীরযূষরসৈঃ সুস্নিগ্ধৈশ্চাশ্নীযাত্; উপদ্রবাংশ্চ যথাস্বমুপচরেত্ ||৩৬|| ভবন্তি চাত্র- ধাতুক্ষযাত্ স্রুতে রক্তে মন্দঃ সঞ্জাযতেঽনলঃ | পবনশ্চ পরং কোপং যাতি তস্মাত্ প্রযত্নতঃ ||৩৭|| তং নাতিশীতৈর্লঘুভিঃ স্নিগ্ধৈঃ শোণিতবর্ধনৈঃ | ঈষদম্লৈরনম্লৈর্বা ভোজনৈঃ সমুপাচরেত্ ||৩৮||

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अथातिप्रवृत्ते रोध्रमधुकप्रियङ्गुपत्तङ्गुपत्तङ्गगैरिकसर्जरसरसाञ्जनशाल्मलीपुष्पशङ्खशुक्तिमाषयवगोधूमचूर्णैः शनैः शनैर्व्रणमुखमवचूर्ण्याङ्गुल्यग्रेणावपीडयेत् सालसर्जार्जुनारिमेदमेषशृङ्गधवधन्वनत्वग्भि र्वा चूर्णिताभिः क्षौमेण वा ध्मापितेन समुद्रफेनलाक्षाचूर्णैर्वा, यथोक्तर्व्रणबन्धनद्रव्यैर्गाढं बध्नीयात्, शीताच्छादनभोजनागारैः शीतैः प्रदेहपरिषेकैश्चोपचरेत्, क्षारेणाग्निना वा दहेद्यथोक्तं, व्यधादनन्तरं तामेवातिप्रवृत्तां सिरां विध्येत्; काकोल्यादिक्वाथं वा शर्करामधुमधुरं पाययेत्, एणहरिणोरभ्रशशमहिषवराहाणां वा रुधिरं; क्षीरयूषरसैः सुस्निग्धैश्चाश्नीयात्; उपद्रवांश्च यथास्वमुपचरेत् ||३६|| भवन्ति चात्र- धातुक्षयात् स्रुते रक्ते मन्दः सञ्जायतेऽनलः | पवनश्च परं कोपं याति तस्मात् प्रयत्नतः ||३७|| तं नातिशीतैर्लघुभिः स्निग्धैः शोणितवर्धनैः | ईषदम्लैरनम्लैर्वा भोजनैः समुपाचरेत् ||३८||

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Adhikarana 33 (39-40) · Śloka 40

চতুর্বিধং যদেতদ্ধি রুধিরস্য নিবারণম্ | সন্ধানং স্কন্দনং চৈব পাচনং দহনং তথা ||৩৯|| ব্রণং কষাযঃ সন্ধত্তে রক্তং স্কন্দযতে হিমম্ | তথা সম্পাচযেদ্ভস্ম দাহঃ সঙ্কোচযেত্ সিরাঃ ||৪০||

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चतुर्विधं यदेतद्धि रुधिरस्य निवारणम् | सन्धानं स्कन्दनं चैव पाचनं दहनं तथा ||३९|| व्रणं कषायः सन्धत्ते रक्तं स्कन्दयते हिमम् | तथा सम्पाचयेद्भस्म दाहः सङ्कोचयेत् सिराः ||४०||

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Adhikarana 34 (41-42) · Śloka 42

অস্কন্দমানে রুধিরে সন্ধানানি প্রযোজযেত্ | সন্ধানে ভ্রশ্যমানে তু পাচনৈঃ সমুপাচরেত্ ||৪১|| কল্পৈরেতৈস্ত্রিভির্বৈদ্যঃ প্রযতেত যথাবিধি | অসিদ্ধিমত্সু চৈতেষু দাহঃ পরম ইষ্যতে ||৪২||

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अस्कन्दमाने रुधिरे सन्धानानि प्रयोजयेत् | सन्धाने भ्रश्यमाने तु पाचनैः समुपाचरेत् ||४१|| कल्पैरेतैस्त्रिभिर्वैद्यः प्रयतेत यथाविधि | असिद्धिमत्सु चैतेषु दाहः परम इष्यते ||४२||

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Adhikarana 35 (43) · Śloka 43

শেষদোষে যতো রক্তে ন ব্যাধিরতিবর্ততে | সাবশেষে ততঃ স্থেযং ন তু কুর্যাদতিক্রমম্ ||৪৩||

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शेषदोषे यतो रक्ते न व्याधिरतिवर्तते | सावशेषे ततः स्थेयं न तु कुर्यादतिक्रमम् ||४३||

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Adhikarana 36 (44) · Śloka 44

দেহস্য রুধিরং মূলং রুধিরেণৈব ধার্যতে | তস্মাদ্যত্নেন সংরক্ষ্যং রক্তং জীব ইতি স্থিতিঃ ||৪৪||

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देहस्य रुधिरं मूलं रुधिरेणैव धार्यते | तस्माद्यत्नेन संरक्ष्यं रक्तं जीव इति स्थितिः ||४४||

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Adhikarana 37 (45) · Śloka 45

স্রুতরক্তস্য সেকাদ্যৈঃ শীতৈঃ প্রকুপিতেঽনিলে | শোফং সতোদং কোষ্ণেন সর্পিষা পরিষেচত্ ||৪৫||

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स्रुतरक्तस्य सेकाद्यैः शीतैः प्रकुपितेऽनिले | शोफं सतोदं कोष्णेन सर्पिषा परिषेचत् ||४५||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 14

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে শোণিতবর্ণনীযো নাম চতুর্দশোঽধ্যায ||১৪||

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इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने शोणितवर्णनीयो नाम चतुर्दशोऽध्याय ||१४||

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