Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো দোষধাতুমলক্ষযবৃদ্ধিবিজ্ঞানীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
View original
अथातो दोषधातुमलक्षयवृद्धिविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
দোষধাতুমলমূলং হি শরীরং, তস্মাদেতেষাং লক্ষণমুচ্যমানমুপধারয ||৩||
View original
दोषधातुमलमूलं हि शरीरं, तस्मादेतेषां लक्षणमुच्यमानमुपधारय ||३||
Adhikarana 3 (4(1)) · Śloka 4
তত্র প্রস্পন্দনোদ্বহনপূরণবিবেকধারণলক্ষণো বাযুঃ পঞ্চধা প্রবিভক্তঃ শরীরং ধারযতি (১) |৪|
View original
तत्र प्रस्पन्दनोद्वहनपूरणविवेकधारणलक्षणो वायुः पञ्चधा प्रविभक्तः शरीरं धारयति (१) |४|
Adhikarana 4 (4(2)) · Śloka 4
রাগপক্ত্যোজস্তেজোমেধোষ্মকৃত্ পিত্তং পঞ্চধা প্রবিভক্তমগ্নিকর্মণাঽনুগ্রহং করোতি; (২) |৪|
View original
रागपक्त्योजस्तेजोमेधोष्मकृत् पित्तं पञ्चधा प्रविभक्तमग्निकर्मणाऽनुग्रहं करोति; (२) |४|
Adhikarana 5 (4) · Śloka 4
সন্ধিসংশ্লেষণস্নেহনরোপণপূরণবলস্থৈর্যকৃচ্ছ্লেষ্মা পঞ্চধা প্রবিভক্ত উদককর্মণাঽনুগ্রহং করোতি ||৪||
View original
सन्धिसंश्लेषणस्नेहनरोपणपूरणबलस्थैर्यकृच्छ्लेष्मा पञ्चधा प्रविभक्त उदककर्मणाऽनुग्रहं करोति ||४||
Adhikarana 6 (5(1)) · Śloka 5
রসস্তুষ্টিং প্রীণনং রক্তপুষ্টিং চ করোতি, রক্তং বর্ণপ্রসাদং মাংসপুষ্টিং জীবযতি চ, মাংসং শরীরপুষ্টিং মেদসশ্চ, মেদঃ স্নেহস্বেদৌ দৃঢত্বং পুষ্টিমস্থ্নাং চ, অস্থীনি দেহধারণং মজ্জ্ঞঃ পুষ্টিং চ, মজ্জা স্নেহং বলং শুক্রপুষ্টিং পূরণমস্থ্নাং চ করোতি, শুক্রং ধৈর্যং চ্যবনং প্রীতিং দেহবলং হর্ষং বীজার্থং চ; (১) |৫|
View original
रसस्तुष्टिं प्रीणनं रक्तपुष्टिं च करोति, रक्तं वर्णप्रसादं मांसपुष्टिं जीवयति च, मांसं शरीरपुष्टिं मेदसश्च, मेदः स्नेहस्वेदौ दृढत्वं पुष्टिमस्थ्नां च, अस्थीनि देहधारणं मज्ज्ञः पुष्टिं च, मज्जा स्नेहं बलं शुक्रपुष्टिं पूरणमस्थ्नां च करोति, शुक्रं धैर्यं च्यवनं प्रीतिं देहबलं हर्षं बीजार्थं च; (१) |५|
Adhikarana 7 (5(2)) · Śloka 5
পুরীষমুপস্তম্ভং বায্বগ্নিধারণং চ, বস্তিপূরণবিক্লেদকৃন্মূত্রং, স্বেদঃ ক্লেদত্বক্সৌকুমার্যকৃত্; (২) |৫|
View original
पुरीषमुपस्तम्भं वाय्वग्निधारणं च, बस्तिपूरणविक्लेदकृन्मूत्रं, स्वेदः क्लेदत्वक्सौकुमार्यकृत्; (२) |५|
Adhikarana 8 (5) · Śloka 5
রক্তলক্ষণমার্তবং গর্ভকৃচ্চ, গর্ভো গর্ভলক্ষণং, স্তন্যং স্তনযোরাপীনত্বজননং জীবনং চেতি ||৫||
View original
रक्तलक्षणमार्तवं गर्भकृच्च, गर्भो गर्भलक्षणं, स्तन्यं स्तनयोरापीनत्वजननं जीवनं चेति ||५||
Adhikarana 9 (6) · Śloka 6
তত্র বিধিবত্ পরিরক্ষণং কুর্বীত ||৬||
View original
तत्र विधिवत् परिरक्षणं कुर्वीत ||६||
Adhikarana 10 (7) · Śloka 7
অত ঊর্ধ্বমেষাং ক্ষীণলক্ষণং বক্ষ্যামঃ |
তত্র, বাতক্ষযে মন্দচেষ্টতাঽল্পবাক্ত্বমপ্রহর্ষো মূঢসঞ্জ্ঞতা চ, পিত্তক্ষযে মন্দোষ্মাগ্নিতা নিষ্প্রভতা চ, শ্লেষ্মক্ষযে রূক্ষতাঽন্তর্দাহ আমাশযেতরশ্লেষ্মাশযশূন্যতা সন্ধিশৈথিল্যং (তৃষ্ণা দৌর্বল্যং প্রজাগরণং) চ ||৭||
View original
अत ऊर्ध्वमेषां क्षीणलक्षणं वक्ष्यामः |
तत्र, वातक्षये मन्दचेष्टताऽल्पवाक्त्वमप्रहर्षो मूढसञ्ज्ञता च, पित्तक्षये मन्दोष्माग्निता निष्प्रभता च, श्लेष्मक्षये रूक्षताऽन्तर्दाह आमाशयेतरश्लेष्माशयशून्यता सन्धिशैथिल्यं (तृष्णा दौर्बल्यं प्रजागरणं) च ||७||
Adhikarana 11 (8) · Śloka 8
তত্র স্বযোনিবর্ধনান্যেব প্রতীকারঃ ||৮||
View original
तत्र स्वयोनिवर्धनान्येव प्रतीकारः ||८||
Adhikarana 12 (9) · Śloka 9
রসক্ষযে হৃত্পীডাকম্পশূন্যতাস্তৃষ্ণা চ, শোণিতক্ষযে ত্বক্পারুষ্যমম্লশীতপ্রার্থনা সিরাশৈথিল্যং চ, মাংসক্ষযে স্ফিগ্গণ্ডৌষ্ঠোপস্থোরুবক্ষঃকক্ষাপিণ্ডিকোদরগ্রীবাশুষ্কতা রৌক্ষ্যতোদৌ গাত্রাণাং সদনং ধমনীশৈথিল্যং চ, মেদঃক্ষযে প্লীহাভিবৃদ্ধিঃ সন্ধিশূন্যতা রৌক্ষ্যং মেদুরমাংসপ্রার্থনা চ, অস্থিক্ষযেঽস্থিশূলং দন্তনখভঙ্গো রৌক্ষ্যং চ, মজ্জক্ষযেঽল্পশুক্রতা পর্বভেদোঽস্থিনিস্তোদোঽস্থিশূন্যতা চ, শুক্রক্ষযে মেঢ্রবৃষণবেদনাঽশক্তির্মৈথুনে চিরাদ্বা প্রসেকঃ প্রসেকে চাল্পরক্তশুক্রদর্শনম্ ||৯||
View original
रसक्षये हृत्पीडाकम्पशून्यतास्तृष्णा च, शोणितक्षये त्वक्पारुष्यमम्लशीतप्रार्थना सिराशैथिल्यं च, मांसक्षये स्फिग्गण्डौष्ठोपस्थोरुवक्षःकक्षापिण्डिकोदरग्रीवाशुष्कता रौक्ष्यतोदौ गात्राणां सदनं धमनीशैथिल्यं च, मेदःक्षये प्लीहाभिवृद्धिः सन्धिशून्यता रौक्ष्यं मेदुरमांसप्रार्थना च, अस्थिक्षयेऽस्थिशूलं दन्तनखभङ्गो रौक्ष्यं च, मज्जक्षयेऽल्पशुक्रता पर्वभेदोऽस्थिनिस्तोदोऽस्थिशून्यता च, शुक्रक्षये मेढ्रवृषणवेदनाऽशक्तिर्मैथुने चिराद्वा प्रसेकः प्रसेके चाल्परक्तशुक्रदर्शनम् ||९||
Adhikarana 13 (10) · Śloka 10
তত্রাপি স্বযোনিবর্ধনদ্রব্যোপযোগঃ (প্রতীকারঃ ) ||১০||
View original
तत्रापि स्वयोनिवर्धनद्रव्योपयोगः (प्रतीकारः ) ||१०||
Adhikarana 14 (11) · Śloka 11
পুরীষক্ষযে হৃদযপার্শ্বপীডা সশব্দস্য চ বাযোরূর্ধ্বগমনং কুক্ষৌ সঞ্চরণং চ, মূত্রক্ষযে বস্তিতোদোঽল্পমূত্রতা চ; অত্রাপি স্বযোনিবর্ধনদ্রব্যোপযোগঃ |
স্বেদক্ষযে স্তব্ধরোমকূপতা ত্বক্শোষঃ স্পর্শবৈগুণ্যং স্বেদনাশশ্চ; তত্রাভ্যঙ্গঃ স্বেদোপযোগশ্চ ||১১||
View original
पुरीषक्षये हृदयपार्श्वपीडा सशब्दस्य च वायोरूर्ध्वगमनं कुक्षौ सञ्चरणं च, मूत्रक्षये बस्तितोदोऽल्पमूत्रता च; अत्रापि स्वयोनिवर्धनद्रव्योपयोगः |
स्वेदक्षये स्तब्धरोमकूपता त्वक्शोषः स्पर्शवैगुण्यं स्वेदनाशश्च; तत्राभ्यङ्गः स्वेदोपयोगश्च ||११||
Adhikarana 15 (12) · Śloka 12
আর্তবক্ষযে যথোচিতকালাদর্শনমল্পতা বা যোনিবেদনা চ; তত্র সংশোধনমাগ্নেযানাং চ দ্রব্যাণাং বিধিবদুপযোগঃ |
স্তনক্ষযে স্তনযোর্ম্লানতা স্তন্যাসম্ভবোঽল্পতা বা; তত্র শ্লেষ্মবর্ধনদ্রব্যোপযোগঃ |
গর্ভক্ষযে গর্ভাস্পন্দনমনুন্নতকুক্ষিতা চ; তত্র প্রাপ্তবস্তিকালাযাঃ ক্ষীরবস্তিপ্রযোগো মেদ্যান্নোপযোগশ্চেতি ||১২||
View original
आर्तवक्षये यथोचितकालादर्शनमल्पता वा योनिवेदना च; तत्र संशोधनमाग्नेयानां च द्रव्याणां विधिवदुपयोगः |
स्तनक्षये स्तनयोर्म्लानता स्तन्यासम्भवोऽल्पता वा; तत्र श्लेष्मवर्धनद्रव्योपयोगः |
गर्भक्षये गर्भास्पन्दनमनुन्नतकुक्षिता च; तत्र प्राप्तबस्तिकालायाः क्षीरबस्तिप्रयोगो मेद्यान्नोपयोगश्चेति ||१२||
Adhikarana 16 (13) · Śloka 13
অত ঊর্ধ্বমতিবৃদ্ধানাং দোষধাতুমলানাং লক্ষণং বক্ষ্যামঃ |
বৃদ্ধিঃ পুনরেষাং স্বযোনিবর্ধনাত্যুপসেবনাদ্ভবতি |
তত্র, বাতবৃদ্ধৌ বাক্পারুষ্যং কার্শ্যং কার্ষ্ণ্যং গাত্রস্ফুরণমুষ্ণকামি(ম)তা নিদ্রানাশোঽল্পবলত্বং গাঢবর্চস্ত্বং চ; পিত্তবৃদ্ধৌ পীতাবভাসতা সন্তাপঃ শীতকামিত্বমল্পনিদ্রতা মূর্চ্ছা বলহানিরিন্দ্রিযদৌর্বল্যং পীতবিণ্মূত্রনেত্রত্বং চ; শ্লেষ্মবৃদ্ধৌ শৌক্ল্যং শৈত্যং স্থৈর্যং গৌরবমবসাদস্তন্দ্রা নিদ্রা সন্ধিবিশ্লেষশ্চ ||১৩||
View original
अत ऊर्ध्वमतिवृद्धानां दोषधातुमलानां लक्षणं वक्ष्यामः |
वृद्धिः पुनरेषां स्वयोनिवर्धनात्युपसेवनाद्भवति |
तत्र, वातवृद्धौ वाक्पारुष्यं कार्श्यं कार्ष्ण्यं गात्रस्फुरणमुष्णकामि(म)ता निद्रानाशोऽल्पबलत्वं गाढवर्चस्त्वं च; पित्तवृद्धौ पीतावभासता सन्तापः शीतकामित्वमल्पनिद्रता मूर्च्छा बलहानिरिन्द्रियदौर्बल्यं पीतविण्मूत्रनेत्रत्वं च; श्लेष्मवृद्धौ शौक्ल्यं शैत्यं स्थैर्यं गौरवमवसादस्तन्द्रा निद्रा सन्धिविश्लेषश्च ||१३||
Adhikarana 17 (14) · Śloka 14
রসোঽতিবৃদ্ধো হৃদযোত্ক্লেদং প্রসেকং চাপাদযতি; রক্তং রক্তাঙ্গাক্ষিতাং সিরাপূর্ণত্বং চ; মাংসং স্ফিগ্গণ্ডৌষ্ঠোপস্থোরুবাহুজঙ্ঘাসু বৃদ্ধিং গুরুগাত্রতাং চ; মেদঃস্নিগ্ধাঙ্গতামুদরপার্শ্ববৃদ্ধিং কাসশ্বাসাদীন্ দৌর্গন্ধ্যং চ; অস্থ্যধ্যস্থীন্যধিদন্তাংশ্চ; মজ্জা সর্বাঙ্গনেত্রগৌরবং চ; শুক্রং শুক্রাশ্মরীমতিপ্রাদুর্ভাবং চ ||১৪||
View original
रसोऽतिवृद्धो हृदयोत्क्लेदं प्रसेकं चापादयति; रक्तं रक्ताङ्गाक्षितां सिरापूर्णत्वं च; मांसं स्फिग्गण्डौष्ठोपस्थोरुबाहुजङ्घासु वृद्धिं गुरुगात्रतां च; मेदःस्निग्धाङ्गतामुदरपार्श्ववृद्धिं कासश्वासादीन् दौर्गन्ध्यं च; अस्थ्यध्यस्थीन्यधिदन्तांश्च; मज्जा सर्वाङ्गनेत्रगौरवं च; शुक्रं शुक्राश्मरीमतिप्रादुर्भावं च ||१४||
Adhikarana 18 (15) · Śloka 15
পুরীষমাটোপং কুক্ষৌ শূলং চ; মূত্রং মূত্রবৃদ্ধিং মুহুর্মুহুঃ প্রবৃত্তিং বস্তিতোদমাধ্মানং চ; স্বেদস্ত্বচো দৌর্গন্ধ্যং কণ্ডূং চ ||১৫||
View original
पुरीषमाटोपं कुक्षौ शूलं च; मूत्रं मूत्रवृद्धिं मुहुर्मुहुः प्रवृत्तिं बस्तितोदमाध्मानं च; स्वेदस्त्वचो दौर्गन्ध्यं कण्डूं च ||१५||
Adhikarana 19 (16) · Śloka 16
আর্তবমঙ্গমর্দমতিপ্রবৃত্তিং দৌর্গন্ধ্যং চ; স্তন্যং স্তনযোরাপীনত্বং মুহুর্মুহুঃ প্রবৃত্তিং তোদং চ; গর্ভো জঠরাভিবৃদ্ধিং স্বেদং চ ||১৬||
View original
आर्तवमङ्गमर्दमतिप्रवृत्तिं दौर्गन्ध्यं च; स्तन्यं स्तनयोरापीनत्वं मुहुर्मुहुः प्रवृत्तिं तोदं च; गर्भो जठराभिवृद्धिं स्वेदं च ||१६||
Adhikarana 20 (17) · Śloka 17
তেষাং যথাস্বং সংশোধনং ক্ষপণং চ ক্ষযাদবিরুদ্ধৈঃ ক্রিযাবিশেষৈঃ প্রকুর্বীত ||১৭||
View original
तेषां यथास्वं संशोधनं क्षपणं च क्षयादविरुद्धैः क्रियाविशेषैः प्रकुर्वीत ||१७||
Adhikarana 21 (18) · Śloka 18
পূর্বঃ পূর্বোঽতিবৃদ্ধত্বাদ্বর্ধযেদ্ধি পরং পরম্ |
তস্মাদতিপ্রবৃদ্ধানাং ধাতূনাং হ্রাসনং হিতম্ ||১৮||
View original
पूर्वः पूर्वोऽतिवृद्धत्वाद्वर्धयेद्धि परं परम् |
तस्मादतिप्रवृद्धानां धातूनां ह्रासनं हितम् ||१८||
Adhikarana 22 (19) · Śloka 19
বললক্ষণং বলক্ষযলক্ষণং চাত ঊর্ধ্বমুপদেক্ষ্যামঃ |
তত্র রসাদীনাং শুক্রান্তানাং ধাতূনাং যত্ পরং তেজস্তত্ খল্বোজস্তদেব বলমিত্যুচ্যতে, স্বশাস্ত্রসিদ্ধান্তাত্ ||১৯||
View original
बललक्षणं बलक्षयलक्षणं चात ऊर्ध्वमुपदेक्ष्यामः |
तत्र रसादीनां शुक्रान्तानां धातूनां यत् परं तेजस्तत् खल्वोजस्तदेव बलमित्युच्यते, स्वशास्त्रसिद्धान्तात् ||१९||
Adhikarana 23 (20) · Śloka 20
তত্র বলেন স্থিরোপচিতমাংসতা সর্বচেষ্টাস্বপ্রতিঘাতঃ স্বরবর্ণপ্রসাদো বাহ্যানামাভ্যন্তরাণাং চ করণানামাত্মকার্যপ্রতিপত্তির্ভবতি ||২০||
View original
तत्र बलेन स्थिरोपचितमांसता सर्वचेष्टास्वप्रतिघातः स्वरवर्णप्रसादो बाह्यानामाभ्यन्तराणां च करणानामात्मकार्यप्रतिपत्तिर्भवति ||२०||
Adhikarana 24 (21-22) · Śloka 22
ভবন্তি চাত্র- ওজঃ সোমাত্মকং স্নিগ্ধং শুক্লং শীতং স্থিরং সরম্ |
বিবিক্তং মৃদু মৃত্স্নং চ প্রাণাযতনমুত্তমম্ ||২১||
দেহঃ সাবযবস্তেন ব্যাপ্তো ভবতি দেহিনঃ |
তদভাবাচ্চ শীর্যন্তে শরীরাণি শরীরিণাম্ ||২২||
View original
भवन्ति चात्र- ओजः सोमात्मकं स्निग्धं शुक्लं शीतं स्थिरं सरम् |
विविक्तं मृदु मृत्स्नं च प्राणायतनमुत्तमम् ||२१||
देहः सावयवस्तेन व्याप्तो भवति देहिनः |
तदभावाच्च शीर्यन्ते शरीराणि शरीरिणाम् ||२२||
Adhikarana 25 (23) · Śloka 23
অভিঘাতাত্ক্ষযাত্কোপাচ্ছোকাদ্ধ্যানাচ্ছ্রমাত্ক্ষুধঃ |
ওজঃ সঙ্ক্ষীযতে হ্যেভ্যো ধাতুগ্রহণনিঃসৃতম্ |
তেজঃ সমীরিতং তস্মাদ্বিস্রংসযতি দেহিনঃ ||২৩||
View original
अभिघातात्क्षयात्कोपाच्छोकाद्ध्यानाच्छ्रमात्क्षुधः |
ओजः सङ्क्षीयते ह्येभ्यो धातुग्रहणनिःसृतम् |
तेजः समीरितं तस्माद्विस्रंसयति देहिनः ||२३||
Adhikarana 26 (24) · Śloka 24
তস্য বিস্রংসো ব্যাপত্ ক্ষয ইতি (ত্রযো দোষাঃ;) লিঙ্গানি ভবন্তি সন্ধিবিশ্লেষো গাত্রাণাং সদনং দোষচ্যবনং ক্রিযাসন্নিরোধশ্চ বিস্রংসে, স্তব্ধগুরুগাত্রতা বাতশোফো বর্ণভেদো গ্লানিস্তন্দ্রা নিদ্রা চ ব্যাপন্নে, মূর্চ্ছা মাংসক্ষযো মোহঃ প্রলাপো মরণমিতি চ ক্ষযে ||২৪||
View original
तस्य विस्रंसो व्यापत् क्षय इति (त्रयो दोषाः;) लिङ्गानि भवन्ति सन्धिविश्लेषो गात्राणां सदनं दोषच्यवनं क्रियासन्निरोधश्च विस्रंसे, स्तब्धगुरुगात्रता वातशोफो वर्णभेदो ग्लानिस्तन्द्रा निद्रा च व्यापन्ने, मूर्च्छा मांसक्षयो मोहः प्रलापो मरणमिति च क्षये ||२४||
Adhikarana 27 (25-27) · Śloka 28
ভবন্তি চাত্র- ত্রযো দোষা বলস্যোক্তা ব্যাপদ্বিস্রংসনক্ষযাঃ |
বিশ্লেষসাদৌ গাত্রাণাং দোষবিস্রংসনং শ্রমঃ ||২৫||
অপ্রাচুর্যং ক্রিযাণাং চ বলবিস্রংসলক্ষণম্ |
গুরুত্বং স্তব্ধতাঽঙ্গেষু গ্লানির্বর্ণস্য ভেদনম্ ||২৬||
তন্দ্রা নিদ্রা বাতশোফো বলব্যাপদি লক্ষণম্ |
মূর্চ্ছা মাংসক্ষযো মোহঃ প্রলাপোঽজ্ঞানমেব চ ||২৭||
পূর্বোক্তানি চ লিঙ্গানি মরণং চ বলক্ষযে |২৮|
View original
भवन्ति चात्र- त्रयो दोषा बलस्योक्ता व्यापद्विस्रंसनक्षयाः |
विश्लेषसादौ गात्राणां दोषविस्रंसनं श्रमः ||२५||
अप्राचुर्यं क्रियाणां च बलविस्रंसलक्षणम् |
गुरुत्वं स्तब्धताऽङ्गेषु ग्लानिर्वर्णस्य भेदनम् ||२६||
तन्द्रा निद्रा वातशोफो बलव्यापदि लक्षणम् |
मूर्च्छा मांसक्षयो मोहः प्रलापोऽज्ञानमेव च ||२७||
पूर्वोक्तानि च लिङ्गानि मरणं च बलक्षये |२८|
Adhikarana 28 (28) · Śloka 28
তত্র বিস্রংসে ব্যাপন্নে চ ক্রিযাবিশেষৈরবিরুদ্ধৈর্বলমাপ্যাযযেত্ ; ইতরং তু মূঢসঞ্জ্ঞং বর্জযেত্ ||২৮||
View original
तत्र विस्रंसे व्यापन्ने च क्रियाविशेषैरविरुद्धैर्बलमाप्याययेत् ; इतरं तु मूढसञ्ज्ञं वर्जयेत् ||२८||
Adhikarana 29 (29-31) · Śloka 31
দোষধাতুমলক্ষীণো বলক্ষীণোঽপি বা নরঃ |
স্বযোনিবর্ধনং যত্তদন্নপানং প্রকাঙ্ক্ষতি ||২৯||
যদ্যদাহারজাতং তু ক্ষীণঃ প্রার্থযতে নরঃ |
তস্য তস্য স লাভে তু তং তং ক্ষযমপোহতি ||৩০||
যস্য ধাতুক্ষযাদ্বাযুঃ সঞ্জ্ঞাং কর্ম চ নাশযেত্ |
প্রক্ষীণং চ বলং যস্য নাসৌ শক্যশ্চিকিত্সিতুম্ ||৩১||
View original
दोषधातुमलक्षीणो बलक्षीणोऽपि वा नरः |
स्वयोनिवर्धनं यत्तदन्नपानं प्रकाङ्क्षति ||२९||
यद्यदाहारजातं तु क्षीणः प्रार्थयते नरः |
तस्य तस्य स लाभे तु तं तं क्षयमपोहति ||३०||
यस्य धातुक्षयाद्वायुः सञ्ज्ञां कर्म च नाशयेत् |
प्रक्षीणं च बलं यस्य नासौ शक्यश्चिकित्सितुम् ||३१||
Adhikarana 30 (32) · Śloka 32
রসনিমিত্তমেব স্থৌল্যং কার্শ্যং চ |
তত্র শ্লেষ্মলাহারসেবিনোঽধ্যশনশীলস্যাব্যাযামিনো দিবাস্বপ্নরতস্য চাম এবান্নরসো মধুরতরশ্চ শরীরমনুক্রামন্নতিস্নেহান্মেদো জনযতি, তদতিস্থৌল্যমাপাদযতি ; তমতিস্থূলং ক্ষুদ্রশ্বাসপিপাসাক্ষুত্স্বপ্নস্বেদগাত্রদৌর্গন্ধ্যক্রথনগাত্রসাদগদ্গদত্বানি ক্ষিপ্রমেবাবিশন্তি, সৌকুমার্যান্মেদসঃ সর্বক্রিযাস্বসমর্থঃ, কফমেদোনিরুদ্ধমার্গত্বাচ্চাল্পব্যবাযো ভবতি, আবৃতমার্গত্বাদেব শেষা ধাতবো নাপ্যাযন্তেঽত্যর্থমতোঽল্পপ্রাণো ভবতি, প্রমেহপিডকাজ্বরভগন্দরবিদ্রধিবাতবিকারাণামন্যতমং প্রাপ্য পঞ্চত্বমুপযাতি, সর্ব এব চাস্য রোগা বলবন্তো ভবন্ত্যাবৃতমার্গত্বাত্ স্রোতসাম্; অতস্তস্যোত্পত্তিহেতুং পরিহরেত্ |
উত্পন্নে তু শিলাজতুগুগ্গুলুগোমূত্রত্রিফলালোহরজোরসাঞ্জনমধুযবমুদ্গকোরদূষকশ্যামাকোদ্দালকাদীনাং বিরূক্ষণচ্ছেদনীযানাং চ দ্রব্যাণাং বিধিবদুপযোগো ব্যাযামো লেখনবস্ত্যুপযোগশ্চেতি ||৩২||
View original
रसनिमित्तमेव स्थौल्यं कार्श्यं च |
तत्र श्लेष्मलाहारसेविनोऽध्यशनशीलस्याव्यायामिनो दिवास्वप्नरतस्य चाम एवान्नरसो मधुरतरश्च शरीरमनुक्रामन्नतिस्नेहान्मेदो जनयति, तदतिस्थौल्यमापादयति ; तमतिस्थूलं क्षुद्रश्वासपिपासाक्षुत्स्वप्नस्वेदगात्रदौर्गन्ध्यक्रथनगात्रसादगद्गदत्वानि क्षिप्रमेवाविशन्ति, सौकुमार्यान्मेदसः सर्वक्रियास्वसमर्थः, कफमेदोनिरुद्धमार्गत्वाच्चाल्पव्यवायो भवति, आवृतमार्गत्वादेव शेषा धातवो नाप्यायन्तेऽत्यर्थमतोऽल्पप्राणो भवति, प्रमेहपिडकाज्वरभगन्दरविद्रधिवातविकाराणामन्यतमं प्राप्य पञ्चत्वमुपयाति, सर्व एव चास्य रोगा बलवन्तो भवन्त्यावृतमार्गत्वात् स्रोतसाम्; अतस्तस्योत्पत्तिहेतुं परिहरेत् |
उत्पन्ने तु शिलाजतुगुग्गुलुगोमूत्रत्रिफलालोहरजोरसाञ्जनमधुयवमुद्गकोरदूषकश्यामाकोद्दालकादीनां विरूक्षणच्छेदनीयानां च द्रव्याणां विधिवदुपयोगो व्यायामो लेखनबस्त्युपयोगश्चेति ||३२||
Adhikarana 31 (33) · Śloka 33
তত্র পুনর্বাতলাহারসেবিনোঽতিব্যাযামব্যবাযাধ্যযনভযশোকধ্যানরাত্রিজাগরণপিপাসাক্ষু ত্কষাযাল্পাশনপ্রভৃতিভিরুপশোষিতো রসধাতুঃ শরীরমননুক্রামন্নল্পত্বান্ন প্রীণাতি, তস্মাদতিকার্শ্যং ভবতি; সোঽতিকৃশঃ ক্ষুত্পিপাসাশীতোষ্ণবাতবর্ষভারাদানেষ্বসহিষ্ণুর্বাতরোগপ্রাযোঽল্পপ্রাণশ্চ ক্রিযাসু ভবতি, শ্বাসকাসশোষপ্লীহোদরাগ্নিসাদগুল্মরক্তপিত্তানামন্যতমমাসাদ্য মরণমুপযাতি, সর্ব এব চাস্য রোগা বলবন্তো ভবন্ত্যল্পপ্রাণত্বাত্; অতস্তস্যোত্পত্তিহেতুং পরিহরেত্ |
উত্পন্নে তু পযস্যাশ্বগন্ধাবিদারিগন্ধাশতাবরীবলাতিবলানাগবলানাং মধুরাণামন্যাসাং চৌষধীনামুপযোগঃ, ক্ষীরদধিঘৃতমাংসশালিষষ্টিকযবগোধূমানাং চ, দিবাস্বপ্নব্রহ্মচর্যাব্যাযামবৃংহণবস্ত্যুপযোগশ্চেতি ||৩৩||
View original
तत्र पुनर्वातलाहारसेविनोऽतिव्यायामव्यवायाध्ययनभयशोकध्यानरात्रिजागरणपिपासाक्षु त्कषायाल्पाशनप्रभृतिभिरुपशोषितो रसधातुः शरीरमननुक्रामन्नल्पत्वान्न प्रीणाति, तस्मादतिकार्श्यं भवति; सोऽतिकृशः क्षुत्पिपासाशीतोष्णवातवर्षभारादानेष्वसहिष्णुर्वातरोगप्रायोऽल्पप्राणश्च क्रियासु भवति, श्वासकासशोषप्लीहोदराग्निसादगुल्मरक्तपित्तानामन्यतममासाद्य मरणमुपयाति, सर्व एव चास्य रोगा बलवन्तो भवन्त्यल्पप्राणत्वात्; अतस्तस्योत्पत्तिहेतुं परिहरेत् |
उत्पन्ने तु पयस्याश्वगन्धाविदारिगन्धाशतावरीबलातिबलानागबलानां मधुराणामन्यासां चौषधीनामुपयोगः, क्षीरदधिघृतमांसशालिषष्टिकयवगोधूमानां च, दिवास्वप्नब्रह्मचर्याव्यायामबृंहणबस्त्युपयोगश्चेति ||३३||
Adhikarana 32 (34) · Śloka 34
যঃ পুনরুভযসাধারণান্যাসেবেত তস্যান্নরসঃ শরীরমনুক্রামন্ সমান্ ধাতূনুপচিনোতি, সমধাতুত্বান্মধ্যশরীরো ভবতি সর্বক্রিযাসু সমর্থঃ ক্ষুত্পিপাসাশীতোষ্ণবাতবর্ষাতপসহো বলবাংশ্চ, স সততমনুপালযিতব্য ইতি ||৩৪||
View original
यः पुनरुभयसाधारणान्यासेवेत तस्यान्नरसः शरीरमनुक्रामन् समान् धातूनुपचिनोति, समधातुत्वान्मध्यशरीरो भवति सर्वक्रियासु समर्थः क्षुत्पिपासाशीतोष्णवातवर्षातपसहो बलवांश्च, स सततमनुपालयितव्य इति ||३४||
Adhikarana 33 (35) · Śloka 35
ভবন্তি চাত্র- অত্যন্তগর্হিতাবেতৌ সদা স্থূলকৃশৌ নরৌ |
শ্রেষ্ঠো মধ্যশরীরস্তু কৃশঃ স্থূলাত্তু পূজিতঃ ||৩৫||
View original
भवन्ति चात्र- अत्यन्तगर्हितावेतौ सदा स्थूलकृशौ नरौ |
श्रेष्ठो मध्यशरीरस्तु कृशः स्थूलात्तु पूजितः ||३५||
Adhikarana 34 (36) · Śloka 36
দোষঃ প্রকুপিতো ধাতূন্ ক্ষপযত্যাত্মতেজসা |
ইদ্ধঃ স্বতেজসা বহ্নিরুখাগতমিবোদকম্ ||৩৬||
View original
दोषः प्रकुपितो धातून् क्षपयत्यात्मतेजसा |
इद्धः स्वतेजसा वह्निरुखागतमिवोदकम् ||३६||
Adhikarana 35 (37) · Śloka 37
বৈলক্ষণ্যাচ্ছরীরাণামস্থাযিত্বাত্তথৈব চ |
দোষধাতুমলানাং তু পরিমাণং ন বিদ্যতে ||৩৭||
View original
वैलक्षण्याच्छरीराणामस्थायित्वात्तथैव च |
दोषधातुमलानां तु परिमाणं न विद्यते ||३७||
Adhikarana 36 (38) · Śloka 38
এষাং সমত্বং যচ্চাপি ভিষগ্ভিরবধার্যতে |
ন তত্ স্বাস্থ্যাদৃতে শক্যং বক্তুমন্যেন হেতুনা ||৩৮||
View original
एषां समत्वं यच्चापि भिषग्भिरवधार्यते |
न तत् स्वास्थ्यादृते शक्यं वक्तुमन्येन हेतुना ||३८||
Adhikarana 37 (39) · Śloka 39
দোষাদীনাং ত্বসমতামনুমানেন লক্ষযেত্ |
অপ্রসন্নেন্দ্রিযং বীক্ষ্য পুরুষং কুশলো ভিষক্ ||৩৯||
View original
दोषादीनां त्वसमतामनुमानेन लक्षयेत् |
अप्रसन्नेन्द्रियं वीक्ष्य पुरुषं कुशलो भिषक् ||३९||
Adhikarana 38 (40) · Śloka 40
(স্বস্থস্য রক্ষণং কুর্যাদস্বস্থস্য তু বুদ্ধিমান্) |
ক্ষপযেদ্বৃংহযেচ্চাপি দোষধাতুমলান্ ভিষক্ |
তাবদ্যাবদরোগঃ স্যাদেতত্সাম্যস্য লক্ষণম্ ||৪০||
View original
(स्वस्थस्य रक्षणं कुर्यादस्वस्थस्य तु बुद्धिमान्) |
क्षपयेद्बृंहयेच्चापि दोषधातुमलान् भिषक् |
तावद्यावदरोगः स्यादेतत्साम्यस्य लक्षणम् ||४०||
Adhikarana 39 (41) · Śloka 41
সমদোষঃ সমাগ্নিশ্চ সমধাতুমলক্রিযঃ |
প্রসন্নাত্মেন্দ্রিযমনাঃ স্বস্থ ইত্যভিধীযতে ||৪১||
View original
समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः |
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ||४१||
Adhikarana puShpikA · Śloka 15
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে দোষধাতুমলক্ষযবৃদ্ধিবিজ্ঞানীযো নাম পঞ্চদশোঽধ্যাযঃ ||১৫||
View original
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने दोषधातुमलक्षयवृद्धिविज्ञानीयो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ||१५||