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32. svabhāvavipratipattyadhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ স্বভাববিপ্রতিপত্তিমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः स्वभावविप्रतिपत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

স্বভাবসিদ্ধানাং শরীরৈকদেশানামন্যভাবিত্বং মরণায | তদ্যথা- শুক্লানাং কৃষ্ণত্বং, কৃষ্ণানাং শুক্লতা, রক্তানামন্যবর্ণত্বং, স্থিরাণাং মৃদুত্বং , মৃদূনাং স্থিরতা, চলানামচলত্বং, অচলানাং চলতা, পৃথূনাং সঙ্ক্ষিপ্তত্বং, সঙ্ক্ষিপ্তানাং পৃথুতা, দীর্ঘাণাং হ্রস্বত্বং, হ্রস্বানাং দীর্ঘতা, অপতনধর্মিণাং পতনধর্মিত্বং , পতনধর্মিণামপতনধর্মিত্বমকস্মাত্, শৈত্যৌষ্ণ্যস্নৈগ্ধ্যরৌক্ষ্যপ্রস্তম্ভবৈবর্ণ্যাবসাদনং চাঙ্গানাম্ ||৩||

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स्वभावसिद्धानां शरीरैकदेशानामन्यभावित्वं मरणाय | तद्यथा- शुक्लानां कृष्णत्वं, कृष्णानां शुक्लता, रक्तानामन्यवर्णत्वं, स्थिराणां मृदुत्वं , मृदूनां स्थिरता, चलानामचलत्वं, अचलानां चलता, पृथूनां सङ्क्षिप्तत्वं, सङ्क्षिप्तानां पृथुता, दीर्घाणां ह्रस्वत्वं, ह्रस्वानां दीर्घता, अपतनधर्मिणां पतनधर्मित्वं , पतनधर्मिणामपतनधर्मित्वमकस्मात्, शैत्यौष्ण्यस्नैग्ध्यरौक्ष्यप्रस्तम्भवैवर्ण्यावसादनं चाङ्गानाम् ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

স্বেভ্যঃ স্থানেভ্যঃ শরীরৈকদেশানামবস্ত্রস্তোত্ক্ষিপ্তভ্রান্তাবক্ষিপ্তপতিতবিমুক্তনির্গতান্তর্গতগুরুলঘুত্বানি, প্রবালবর্ণব্যঙ্গপ্রাদুর্ভাবো বাঽপ্যকস্মাত্, সিরাণাং চ দর্শনং ললাটে, নাসাবংশে বা পিডকোত্পত্তিঃ , ললাটে বা প্রভাতকালে স্বেদঃ, নেত্ররোগাদ্বিনা বাঽশ্রুপ্রবৃত্তিঃ, গোমযচূর্ণপ্রকাশস্য বা রজসো দর্শনমুত্তমাঙ্গে নিলযনং বা কপোতকঙ্ককাকপ্রভৃতীনাং, মূত্রপুরীষবৃদ্ধিরভুঞ্জানানাং, তত্প্রণাশো বা ভুঞ্জানানাং, স্তনমূলহৃদযোরঃসু চ শূলোত্পত্তযঃ, মধ্যে শূনত্বমন্তেষু পরিম্লাযিত্বং বিপর্যযো বা, তথাঽর্ধাঙ্গে শ্বযথুঃ শোষোঽঙ্গপক্ষযোর্বা, নষ্টহীনবিকলবিকৃতস্বরতা বা, বিবর্ণপুষ্পপ্রাদুর্ভাবো বা দন্তমুখনখশরীরেষু, যস্য বাঽপ্সু কফপুরীষরেতাংসি নিমজ্জন্তি, যস্য বা দৃষ্টিমণ্ডলে ভিন্নবিকৃতানি রূপাণ্যালোক্যন্তে, স্নেহাভ্যক্তকেশাঙ্গ ইব যো ভাতি, যশ্চ দুর্বলো ভক্তদ্বেষাতিসারাভ্যাং পীড্যতে, কাসমানশ্চ তৃষ্ণাভিভূতঃ, ক্ষীণশ্ছর্দিভক্তদ্বেষযুক্তঃ সফেনপূযরুধিরোদ্বামী হতস্বরঃ শূলাভিপন্নশ্চ মনুষ্যঃ, শূনকরচরণবদনঃক্ষীণোঽন্নদ্বেষী স্রস্তপিণ্ডিকাংসপাণিপাদো জ্বরকাসাভিভূতঃ, যস্তু পূর্বাহ্ণে ভুক্তমপরাহ্ণে ছর্দযত্যবিদগ্ধমতিসার্যতে বা স শ্বাসান্ম্রিযতে, বস্তবদ্বিলপন্ যশ্চ ভূমৌ পততি স্রস্তমুষ্কঃ, স্তব্ধমেঢ্রো ভগ্নগ্রীবঃ প্রনষ্টমেহনশ্চ মনুষ্যঃ, প্রাগ্বিশুষ্যমাণাহৃদয আর্দ্রশরীরঃ, যশ্চ লোষ্টং লোষ্টেনাভিহন্তি কাষ্ঠং কাষ্ঠেন, তৃণানি বা ছিনত্তি, অধরোষ্ঠং দশতি, উত্তরোষ্ঠং বা লেঢি, আলুঞ্চতি বা কর্ণৌ কেশাংশ্চ; দেবদ্বিজগুরুসুহৃদ্বৈদ্যাংশ্চ দ্বেষ্টি, যস্য বক্রানুবক্রগা গ্রহা গর্হিতস্থানগতাঃ পীডযন্তি, জন্মর্ক্ষং বা, যস্যোল্কাশনিভ্যামভিহন্যতে হোরা বা, গৃহদারশযনাসনযানবাহনমণিরত্নোপকরণগর্হিতলক্ষণনিমিত্তপ্রাদুর্ভাবো বেতি ||৪||

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स्वेभ्यः स्थानेभ्यः शरीरैकदेशानामवस्त्रस्तोत्क्षिप्तभ्रान्तावक्षिप्तपतितविमुक्तनिर्गतान्तर्गतगुरुलघुत्वानि, प्रवालवर्णव्यङ्गप्रादुर्भावो वाऽप्यकस्मात्, सिराणां च दर्शनं ललाटे, नासावंशे वा पिडकोत्पत्तिः , ललाटे वा प्रभातकाले स्वेदः, नेत्ररोगाद्विना वाऽश्रुप्रवृत्तिः, गोमयचूर्णप्रकाशस्य वा रजसो दर्शनमुत्तमाङ्गे निलयनं वा कपोतकङ्ककाकप्रभृतीनां, मूत्रपुरीषवृद्धिरभुञ्जानानां, तत्प्रणाशो वा भुञ्जानानां, स्तनमूलहृदयोरःसु च शूलोत्पत्तयः, मध्ये शूनत्वमन्तेषु परिम्लायित्वं विपर्ययो वा, तथाऽर्धाङ्गे श्वयथुः शोषोऽङ्गपक्षयोर्वा, नष्टहीनविकलविकृतस्वरता वा, विवर्णपुष्पप्रादुर्भावो वा दन्तमुखनखशरीरेषु, यस्य वाऽप्सु कफपुरीषरेतांसि निमज्जन्ति, यस्य वा दृष्टिमण्डले भिन्नविकृतानि रूपाण्यालोक्यन्ते, स्नेहाभ्यक्तकेशाङ्ग इव यो भाति, यश्च दुर्बलो भक्तद्वेषातिसाराभ्यां पीड्यते, कासमानश्च तृष्णाभिभूतः, क्षीणश्छर्दिभक्तद्वेषयुक्तः सफेनपूयरुधिरोद्वामी हतस्वरः शूलाभिपन्नश्च मनुष्यः, शूनकरचरणवदनःक्षीणोऽन्नद्वेषी स्रस्तपिण्डिकांसपाणिपादो ज्वरकासाभिभूतः, यस्तु पूर्वाह्णे भुक्तमपराह्णे छर्दयत्यविदग्धमतिसार्यते वा स श्वासान्म्रियते, बस्तवद्विलपन् यश्च भूमौ पतति स्रस्तमुष्कः, स्तब्धमेढ्रो भग्नग्रीवः प्रनष्टमेहनश्च मनुष्यः, प्राग्विशुष्यमाणाहृदय आर्द्रशरीरः, यश्च लोष्टं लोष्टेनाभिहन्ति काष्ठं काष्ठेन, तृणानि वा छिनत्ति, अधरोष्ठं दशति, उत्तरोष्ठं वा लेढि, आलुञ्चति वा कर्णौ केशांश्च; देवद्विजगुरुसुहृद्वैद्यांश्च द्वेष्टि, यस्य वक्रानुवक्रगा ग्रहा गर्हितस्थानगताः पीडयन्ति, जन्मर्क्षं वा, यस्योल्काशनिभ्यामभिहन्यते होरा वा, गृहदारशयनासनयानवाहनमणिरत्नोपकरणगर्हितलक्षणनिमित्तप्रादुर्भावो वेति ||४||

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Adhikarana 4 (5-6) · Śloka 6

ভবন্তি চাত্র- চিকিত্স্যমানঃ সম্যক্ চ বিকারো যোঽভিবর্ধতে | প্রক্ষীণবলমাংসস্য লক্ষণং তদ্গতাযুষঃ ||৫|| নিবর্ততে মহাব্যাধিঃ সহসা যস্য দেহিনঃ | ন চাহারফলং যস্য দৃশ্যতে স বিনশ্যতি ||৬||

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भवन्ति चात्र- चिकित्स्यमानः सम्यक् च विकारो योऽभिवर्धते | प्रक्षीणबलमांसस्य लक्षणं तद्गतायुषः ||५|| निवर्तते महाव्याधिः सहसा यस्य देहिनः | न चाहारफलं यस्य दृश्यते स विनश्यति ||६||

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Adhikarana 5 (7) · Śloka 7

এতান্যরিষ্টরূপাণি সম্যগ্ বুধ্যেত যো ভিষক্ | সাধ্যাসাধ্যপরীক্ষাযাং স রাজ্ঞঃ সম্মতো ভবেত্ ||৭||

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एतान्यरिष्टरूपाणि सम्यग् बुध्येत यो भिषक् | साध्यासाध्यपरीक्षायां स राज्ञः सम्मतो भवेत् ||७||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 32

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে স্বভাববিপ্রতিপত্তির্নাম দ্বাত্রিংশোঽধ্যাযঃ ||৩২||

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इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने स्वभावविप्रतिपत्तिर्नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ||३२||

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32. svabhāvavipratipattyadhyāyaḥ — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi