Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽবারণীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातोऽवारणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽবারণীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातोऽवारणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
উপদ্রবৈস্তু যে জুষ্টা ব্যাধযো যান্ত্যবার্যতাম্ | রসাযনাদ্বিনা বত্স! তান্ শৃণ্বেকমনা মম ||৩||
उपद्रवैस्तु ये जुष्टा व्याधयो यान्त्यवार्यताम् | रसायनाद्विना वत्स! तान् शृण्वेकमना मम ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 5
বাতব্যাধিঃ প্রমেহশ্চ কুষ্ঠমর্শো ভগন্দরম্ | অশ্মরী মূঢগর্ভশ্চ তথৈবোদরমষ্টমম্ ||৪|| অষ্টাবেতে প্রকৃত্যৈব দুশ্চিকিত্স্যা মহাগদাঃ |৫|
वातव्याधिः प्रमेहश्च कुष्ठमर्शो भगन्दरम् | अश्मरी मूढगर्भश्च तथैवोदरमष्टमम् ||४|| अष्टावेते प्रकृत्यैव दुश्चिकित्स्या महागदाः |५|
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Adhikarana 4 (5-6) · Śloka 6
প্রাণমাংসক্ষযঃ শোষস্তৃষ্ণা চ্ছর্দির্জ্বরস্তথা ||৫|| অতীসারশ্চ মূর্চ্ছা চ হিক্কা শ্বাসস্তথৈব চ | এতৈরুপদ্রবৈর্জুষ্টান্ সর্বানেব বিবর্জযেত্ ||৬||
प्राणमांसक्षयः शोषस्तृष्णा च्छर्दिर्ज्वरस्तथा ||५|| अतीसारश्च मूर्च्छा च हिक्का श्वासस्तथैव च | एतैरुपद्रवैर्जुष्टान् सर्वानेव विवर्जयेत् ||६||
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Adhikarana 5 (7) · Śloka 7
শূনং সুপ্তত্বচং ভগ্নং কম্পাধ্মাননিপীডিতম্ | নরং রুজার্তমন্তশ্চ বাতব্যাধির্বিনাশযেত্ ||৭||
शूनं सुप्तत्वचं भग्नं कम्पाध्माननिपीडितम् | नरं रुजार्तमन्तश्च वातव्याधिर्विनाशयेत् ||७||
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Adhikarana 6 (8) · Śloka 8
যথোক্তোপদ্রবাবিষ্টমতিপ্রস্রুতমেব বা | পিডকাপীডিতং গাঢং প্রমেহো হন্তি মানবম্ ||৮||
यथोक्तोपद्रवाविष्टमतिप्रस्रुतमेव वा | पिडकापीडितं गाढं प्रमेहो हन्ति मानवम् ||८||
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Adhikarana 7 (9) · Śloka 9
প্রভিন্নপ্রস্রুতাঙ্গং চ রক্তনেত্রং হতস্বরম্ | পঞ্চকর্মগুণাতীতং কুষ্ঠং হন্তীহ কুষ্ঠিনম্ ||৯||
प्रभिन्नप्रस्रुताङ्गं च रक्तनेत्रं हतस्वरम् | पञ्चकर्मगुणातीतं कुष्ठं हन्तीह कुष्ठिनम् ||९||
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Adhikarana 8 (10) · Śloka 10
তৃষ্ণারোচকশূলার্তমতিপ্রস্রুতশোণিতম্ | শোফাতীসারসংযুক্তমর্শোব্যাধির্বিনাশযেত্ ||১০||
तृष्णारोचकशूलार्तमतिप्रस्रुतशोणितम् | शोफातीसारसंयुक्तमर्शोव्याधिर्विनाशयेत् ||१०||
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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11
বাতমূত্রপুরীষাণি ক্রিমযঃ শুক্রমেব চ | ভগন্দরাত্ প্রস্রবন্তি যস্য তং পরিবর্জযেত্ ||১১||
वातमूत्रपुरीषाणि क्रिमयः शुक्रमेव च | भगन्दरात् प्रस्रवन्ति यस्य तं परिवर्जयेत् ||११||
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Adhikarana 10 (12) · Śloka 12
প্রশূননাভিবৃষণং রুদ্ধমূত্রং রুগন্বিতম্ | অশ্মরী ক্ষপযত্যাশু সিকতা শর্করান্বিতা ||১২||
प्रशूननाभिवृषणं रुद्धमूत्रं रुगन्वितम् | अश्मरी क्षपयत्याशु सिकता शर्करान्विता ||१२||
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Adhikarana 11 (13) · Śloka 13
গর্ভকোষপরাসঙ্গো মক্কল্লো যোনিসংবৃতিঃ | হন্যাত্ স্ত্রিযং মূঢগর্ভে যথোক্তাশ্চাপ্যুপদ্রবাঃ ||১৩||
गर्भकोषपरासङ्गो मक्कल्लो योनिसंवृतिः | हन्यात् स्त्रियं मूढगर्भे यथोक्ताश्चाप्युपद्रवाः ||१३||
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Adhikarana 12 (14) · Śloka 14
পার্শ্বভঙ্গান্নবিদ্বেষশোফাতীসারপীডিতম্ | বিরিক্তং পূর্যমাণং চ বর্জযেদুদরার্দিতম্ ||১৪||
पार्श्वभङ्गान्नविद्वेषशोफातीसारपीडितम् | विरिक्तं पूर्यमाणं च वर्जयेदुदरार्दितम् ||१४||
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Adhikarana 13 (15-18) · Śloka 18
যস্তাম্যতি বিসঞ্জ্ঞশ্চ শেতে নিপতিতোঽপি বা | শীতার্দিতোঽন্তরুষ্ণশ্চ জ্বরেণ ম্রিযতে নরঃ ||১৫|| যো হৃষ্টরোমা রক্তাক্ষো হৃদি সঙ্ঘাতশূলবান্ | নিত্যং বক্ত্রেণ চোচ্ছ্বস্যাত্তং জ্বরো হন্তি মানবম্ ||১৬|| হিক্কাশ্বাসপিপাসার্তং মূঢং বিভ্রান্তলোচনম্ | সন্ততোচ্ছ্বাসিনং ক্ষীণং নরং ক্ষপযতি জ্বরঃ ||১৭|| আবিলাক্ষং প্রতাম্যন্তং নিদ্রাযুক্তমতীব চ | ক্ষীণশোণিতমাংসং চ নরং নাশযতি জ্বরঃ ||১৮||
यस्ताम्यति विसञ्ज्ञश्च शेते निपतितोऽपि वा | शीतार्दितोऽन्तरुष्णश्च ज्वरेण म्रियते नरः ||१५|| यो हृष्टरोमा रक्ताक्षो हृदि सङ्घातशूलवान् | नित्यं वक्त्रेण चोच्छ्वस्यात्तं ज्वरो हन्ति मानवम् ||१६|| हिक्काश्वासपिपासार्तं मूढं विभ्रान्तलोचनम् | सन्ततोच्छ्वासिनं क्षीणं नरं क्षपयति ज्वरः ||१७|| आविलाक्षं प्रताम्यन्तं निद्रायुक्तमतीव च | क्षीणशोणितमांसं च नरं नाशयति ज्वरः ||१८||
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Adhikarana 14 (19) · Śloka 19
শ্বাসশূলপিপাসার্তং ক্ষীণং জ্বরনিপীডিতম্ | বিশেষেণ নরং বৃদ্ধমতীসারো বিনাশযেত্ ||১৯||
श्वासशूलपिपासार्तं क्षीणं ज्वरनिपीडितम् | विशेषेण नरं वृद्धमतीसारो विनाशयेत् ||१९||
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Adhikarana 15 (20) · Śloka 20
শুক্লাক্ষমন্নদ্বেষ্টারমূর্ধ্বশ্বাসনিপীডিতম্ | কৃচ্ছ্রেণ বহু মেহন্তং যক্ষ্মা হন্তীহ মানবম্ ||২০||
शुक्लाक्षमन्नद्वेष्टारमूर्ध्वश्वासनिपीडितम् | कृच्छ्रेण बहु मेहन्तं यक्ष्मा हन्तीह मानवम् ||२०||
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Adhikarana 16 (21) · Śloka 21
শ্বাসশূলপিপাসান্নবিদ্বেষগ্রন্থিমূঢতাঃ | ভবন্তি দুর্বলত্বং চ গুল্মিনো মৃত্যুমেষ্যতঃ ||২১||
श्वासशूलपिपासान्नविद्वेषग्रन्थिमूढताः | भवन्ति दुर्बलत्वं च गुल्मिनो मृत्युमेष्यतः ||२१||
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Adhikarana 17 (22) · Śloka 22
আধ্মাতং বদ্ধনিষ্যন্দং ছর্দিহিক্কাতৃডন্বিতম্ | রুজাশ্বাসসমাবিষ্টং বিদ্রধির্নাশযেন্নরম্ ||২২||
आध्मातं बद्धनिष्यन्दं छर्दिहिक्कातृडन्वितम् | रुजाश्वाससमाविष्टं विद्रधिर्नाशयेन्नरम् ||२२||
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Adhikarana 18 (23) · Śloka 23
পাণ্ডুদন্তনখো যশ্চ পাণ্ডুনেত্রশ্চ মানবঃ | পাণ্ডুসঙ্ঘাতদর্শী চ পাণ্ডুরোগী বিনশ্যতি ||২৩||
पाण्डुदन्तनखो यश्च पाण्डुनेत्रश्च मानवः | पाण्डुसङ्घातदर्शी च पाण्डुरोगी विनश्यति ||२३||
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Adhikarana 19 (24) · Śloka 24
লোহিতং ছর্দযেদ্যস্তু বহুশো লোহিতেক্ষণঃ | রক্তানাং চ দিশাং দ্রষ্টা রক্তপিত্তী বিনশ্যতি ||২৪||
लोहितं छर्दयेद्यस्तु बहुशो लोहितेक्षणः | रक्तानां च दिशां द्रष्टा रक्तपित्ती विनश्यति ||२४||
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Adhikarana 20 (25) · Śloka 25
অবাঙ্মুখস্তূন্মুখো বা ক্ষীণমাংসবলো নরঃ | জাগরিষ্ণুরসন্দেহমুন্মাদেন বিনশ্যতি ||২৫||
अवाङ्मुखस्तून्मुखो वा क्षीणमांसबलो नरः | जागरिष्णुरसन्देहमुन्मादेन विनश्यति ||२५||
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Adhikarana 21 (26) · Śloka 26
বহুশোঽপস্মরন্তং তু প্রক্ষীণং চলিতভ্রুবম্ | নেত্রাভ্যাং চ বিকুর্বাণমপস্মারো বিনাশযেত্ ||২৬||
बहुशोऽपस्मरन्तं तु प्रक्षीणं चलितभ्रुवम् | नेत्राभ्यां च विकुर्वाणमपस्मारो विनाशयेत् ||२६||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 33
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানেঽবারণীযো নাম ত্রযস্ত্রিংশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৩৩||
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽवारणीयो नाम त्रयस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः ||३३||
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