Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতশ্ছাযাবিপ্রতিপত্তিমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातश्छायाविप्रतिपत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতশ্ছাযাবিপ্রতিপত্তিমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातश्छायाविप्रतिपत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
শ্যাবা লোহিতিকা নীলা পীতিকা বাঽপি মানবম্ | অভিদ্রবন্তি যং ছাযাঃ স পরাসুরসংশযম্ ||৩||
श्यावा लोहितिका नीला पीतिका वाऽपि मानवम् | अभिद्रवन्ति यं छायाः स परासुरसंशयम् ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
হ্রীরপক্রমতে যস্য প্রভাস্মৃতিধৃতিশ্রিযঃ | অকস্মাদ্যং ভজন্তে বা স গতাসুরসংশযম্ ||৪||
ह्रीरपक्रमते यस्य प्रभास्मृतिधृतिश्रियः | अकस्माद्यं भजन्ते वा स गतासुरसंशयम् ||४||
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Adhikarana 4 (5-10) · Śloka 10
যস্যাধরৌষ্ঠঃ পতিতঃ ক্ষিপ্তশ্চোর্ধ্বং তথোত্তরঃ | উভৌ বা জাম্ববাভাসৌ দুর্লভং তস্য জীবিতম্ ||৫|| আরক্তা দশনা যস্য শ্যাবা বা স্যুঃ পতন্তি বা | খঞ্জনপ্রতিমা বাঽপি তং গতাযুষমাদিশেত্ ||৬|| কৃষ্ণা স্তব্ধাঽবলিপ্তা বা জিহ্বা শূনা চ যস্য বৈ | কর্কশা বা ভবেদ্যস্য সোঽচিরাদ্বিজহাত্যসূন্ ||৭|| কুটিলা স্ফুটিতা বাঽপি শুষ্কা বা যস্য নাসিকা | অবস্ফূর্জতি মগ্না বা ন স জীবতি মানবঃ ||৮|| সঙ্ক্ষিপ্তে বিষমে স্তব্ধে রক্তে স্রস্তে চ লোচনে | স্যাতাং বা প্রস্রুতে যস্য স গতাযুর্নরো ধ্রুবম্ ||৯|| কেশাঃ সীমন্তিনো যস্য সঙ্ক্ষিপ্তে বিনতে ভ্রুবৌ | লুণ্ডন্তি চাক্ষিপক্ষ্মাণি সোঽচিরাদ্যাতি মৃত্যবে ||১০||
यस्याधरौष्ठः पतितः क्षिप्तश्चोर्ध्वं तथोत्तरः | उभौ वा जाम्बवाभासौ दुर्लभं तस्य जीवितम् ||५|| आरक्ता दशना यस्य श्यावा वा स्युः पतन्ति वा | खञ्जनप्रतिमा वाऽपि तं गतायुषमादिशेत् ||६|| कृष्णा स्तब्धाऽवलिप्ता वा जिह्वा शूना च यस्य वै | कर्कशा वा भवेद्यस्य सोऽचिराद्विजहात्यसून् ||७|| कुटिला स्फुटिता वाऽपि शुष्का वा यस्य नासिका | अवस्फूर्जति मग्ना वा न स जीवति मानवः ||८|| सङ्क्षिप्ते विषमे स्तब्धे रक्ते स्रस्ते च लोचने | स्यातां वा प्रस्रुते यस्य स गतायुर्नरो ध्रुवम् ||९|| केशाः सीमन्तिनो यस्य सङ्क्षिप्ते विनते भ्रुवौ | लुण्डन्ति चाक्षिपक्ष्माणि सोऽचिराद्याति मृत्यवे ||१०||
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Adhikarana 5 (11-16) · Śloka 16
নাহরত্যন্নমাস্যস্থং ন ধারযতি যঃ শিরঃ | একাগ্রদৃষ্টির্মূঢাত্মা সদ্যঃ প্রাণান্ জহাতি সঃ ||১১|| বলবান্ দুর্বলো বাঽপি সম্মোহং যোঽধিগচ্ছতি | উত্থাপ্যমানো বহুশস্তং পক্বং ভিষগাদিশেত্ ||১২|| উত্তানঃ সর্বদা শেতে পাদৌ বিকুরুতে চ যঃ | বিপ্রসারণশীলো বা ন স জীবতি মানবঃ ||১৩|| শীতপাদকরোচ্ছ্বাসশ্ছিন্নোচ্ছ্বাসশ্চ যো ভবেত্ | কাকোচ্ছ্বাসশ্চ যো মর্ত্যস্তং ধীরঃ পরিবর্জযেত্ ||১৪|| নিদ্রা ন ছিদ্যতে যস্য যো বা জাগর্তি সর্বদা | মুহ্যেদ্বা বক্তুকামশ্চ প্রত্যাখ্যেযঃ স জানতা ||১৫|| উত্তরৌষ্ঠং চ যো লিহ্যাদুত্কারাংশ্চ করোতি যঃ | প্রেতৈর্বা ভাষতে সার্ধং প্রেতরূপং তমাদিশেত্ ||১৬||
नाहरत्यन्नमास्यस्थं न धारयति यः शिरः | एकाग्रदृष्टिर्मूढात्मा सद्यः प्राणान् जहाति सः ||११|| बलवान् दुर्बलो वाऽपि सम्मोहं योऽधिगच्छति | उत्थाप्यमानो बहुशस्तं पक्वं भिषगादिशेत् ||१२|| उत्तानः सर्वदा शेते पादौ विकुरुते च यः | विप्रसारणशीलो वा न स जीवति मानवः ||१३|| शीतपादकरोच्छ्वासश्छिन्नोच्छ्वासश्च यो भवेत् | काकोच्छ्वासश्च यो मर्त्यस्तं धीरः परिवर्जयेत् ||१४|| निद्रा न छिद्यते यस्य यो वा जागर्ति सर्वदा | मुह्येद्वा वक्तुकामश्च प्रत्याख्येयः स जानता ||१५|| उत्तरौष्ठं च यो लिह्यादुत्कारांश्च करोति यः | प्रेतैर्वा भाषते सार्धं प्रेतरूपं तमादिशेत् ||१६||
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Adhikarana 6 (17-29) · Śloka 29
খেভ্যঃ সরোমকূপেভ্যো যস্য রক্তং প্রবর্ততে | পুরুষস্যাবিষার্তস্য সদ্যো জহ্যাত্ স জীবিতম্ ||১৭|| বাতাষ্ঠীলা তু হৃদযে যস্যোর্ধ্বমনুযাযিনী | রুজান্নবিদ্বেষকরী স পরাসুরসংশযম্ ||১৮|| অনন্যোপদ্রবকৃতঃ শোফঃ পাদসমুত্থিতঃ | পুরুষং হন্তি, নারীং তু মুখজো গুহ্যজো দ্বযম্ ||১৯|| অতিসারো জ্বরো হিক্কা ছর্দিঃ শূনাণ্ডমেঢ্রতা | শ্বাসিনঃ কাসিনো বাঽপি যস্য তং ক্ষীণমাদিশেত্ ||২০|| স্বেদো দাহশ্চ বলবান্ হিক্কা শ্বাসশ্চ মানবম্ | বলবন্তমপি প্রাণৈর্বিযুঞ্জন্তি ন সংশযঃ ||২১|| শ্যাবা জিহ্বা ভবেদ্যস্য সব্যং চাক্ষি নিমজ্জতি | মুখং চ জাযতে পূতি যস্য তং পরিবর্জযেত্ ||২২|| বক্ত্রমাপূর্যতেঽশ্রূণাং স্বিদ্যতশ্চরণাবুভৌ | চক্ষুশ্চাকুলতাং যাতি যমরাষ্ট্রং গমিষ্যতঃ ||২৩|| অতিমাত্রং লঘূনি স্যুর্গাত্রাণি গুরুকাণি বা | যস্যাকস্মাত্ স বিজ্ঞেযো গন্তা বৈবস্বতালযম্ ||২৪|| পঙ্কমত্স্যবসাতৈলঘৃতগন্ধাংশ্চ যে নরাঃ | মৃষ্টগন্ধাংশ্চ যে বান্তি গন্তারস্তে যমালযম্ ||২৫|| যূকা ললাটমাযান্তি বলিং নাশ্নন্তি বাযসাঃ | যেষাং চাপি রতির্নাস্তি যাতারস্তে যমালযম্ ||২৬|| জ্বরাতিসারশোফাঃ স্যুর্যস্যান্যোন্যাবসাদিনঃ | প্রক্ষীণবলমাংসস্য নাসৌ শক্যশ্চিকিত্সিতম্ ||২৭|| ক্ষীণস্য যস্য ক্ষুত্তৃষ্ণে হৃদ্যৈর্মিষ্টৈর্হিতৈস্তথা | ন শাম্যতোঽন্নপানৈশ্চ তস্য মৃত্যুরুপস্থিতঃ ||২৮|| প্রবাহিকা শিরঃশূলং কোষ্ঠশূলং চ দারুণম্ | পিপাসা বলহানিশ্চ তস্য মৃত্যুরুপস্থিতঃ ||২৯||
खेभ्यः सरोमकूपेभ्यो यस्य रक्तं प्रवर्तते | पुरुषस्याविषार्तस्य सद्यो जह्यात् स जीवितम् ||१७|| वाताष्ठीला तु हृदये यस्योर्ध्वमनुयायिनी | रुजान्नविद्वेषकरी स परासुरसंशयम् ||१८|| अनन्योपद्रवकृतः शोफः पादसमुत्थितः | पुरुषं हन्ति, नारीं तु मुखजो गुह्यजो द्वयम् ||१९|| अतिसारो ज्वरो हिक्का छर्दिः शूनाण्डमेढ्रता | श्वासिनः कासिनो वाऽपि यस्य तं क्षीणमादिशेत् ||२०|| स्वेदो दाहश्च बलवान् हिक्का श्वासश्च मानवम् | बलवन्तमपि प्राणैर्वियुञ्जन्ति न संशयः ||२१|| श्यावा जिह्वा भवेद्यस्य सव्यं चाक्षि निमज्जति | मुखं च जायते पूति यस्य तं परिवर्जयेत् ||२२|| वक्त्रमापूर्यतेऽश्रूणां स्विद्यतश्चरणावुभौ | चक्षुश्चाकुलतां याति यमराष्ट्रं गमिष्यतः ||२३|| अतिमात्रं लघूनि स्युर्गात्राणि गुरुकाणि वा | यस्याकस्मात् स विज्ञेयो गन्ता वैवस्वतालयम् ||२४|| पङ्कमत्स्यवसातैलघृतगन्धांश्च ये नराः | मृष्टगन्धांश्च ये वान्ति गन्तारस्ते यमालयम् ||२५|| यूका ललाटमायान्ति बलिं नाश्नन्ति वायसाः | येषां चापि रतिर्नास्ति यातारस्ते यमालयम् ||२६|| ज्वरातिसारशोफाः स्युर्यस्यान्योन्यावसादिनः | प्रक्षीणबलमांसस्य नासौ शक्यश्चिकित्सितम् ||२७|| क्षीणस्य यस्य क्षुत्तृष्णे हृद्यैर्मिष्टैर्हितैस्तथा | न शाम्यतोऽन्नपानैश्च तस्य मृत्युरुपस्थितः ||२८|| प्रवाहिका शिरःशूलं कोष्ठशूलं च दारुणम् | पिपासा बलहानिश्च तस्य मृत्युरुपस्थितः ||२९||
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Adhikarana 7 (30) · Śloka 30
বিষমেণোপচারেণ কর্মভিশ্চ পুরাকৃতৈঃ | অনিত্যত্বাচ্চ জন্তূনাং জীবিতং নিধনং ব্রজেত্ ||৩০||
विषमेणोपचारेण कर्मभिश्च पुराकृतैः | अनित्यत्वाच्च जन्तूनां जीवितं निधनं व्रजेत् ||३०||
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Adhikarana 8 (31-32) · Śloka 32
প্রেতা ভূতাঃ পিশাচাশ্চ রক্ষাংসি বিবিধানি চ | মরণাভিমুখং নিত্যমুপসর্পন্তি মানবম্ ||৩১|| তানি ভেষজবীর্যাণি প্রতিঘ্নন্তি জিঘাংসযা | তস্মান্মোঘাঃ ক্রিযাঃ সর্বা ভবন্ত্যেব গতাযুষাম্ ||৩২||
प्रेता भूताः पिशाचाश्च रक्षांसि विविधानि च | मरणाभिमुखं नित्यमुपसर्पन्ति मानवम् ||३१|| तानि भेषजवीर्याणि प्रतिघ्नन्ति जिघांसया | तस्मान्मोघाः क्रियाः सर्वा भवन्त्येव गतायुषाम् ||३२||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 31
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে ছাযাবিপ্রতিপত্তির্নামৈকত্রিংশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৩১||
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने छायाविप्रतिपत्तिर्नामैकत्रिंशत्तमोऽध्यायः ||३१||
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