Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো বিপরীতাবিপরীতস্বপ্ননিদর্শনীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो विपरीताविपरीतस्वप्ननिदर्शनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 4
দূতদর্শনসম্ভাষা বেষাশ্চেষ্টিতমেব চ |
ঋক্ষং বেলা তিথিশ্চৈব নিমিত্তং শকুনোঽনিলঃ ||৩||
দেশো বৈদ্যস্য বাগ্দেহমনসাং চ বিচেষ্টিতম্ |
কথযন্ত্যাতুরগতং শুভং বা যদি বাঽশুভম্ ||৪||
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दूतदर्शनसम्भाषा वेषाश्चेष्टितमेव च |
ऋक्षं वेला तिथिश्चैव निमित्तं शकुनोऽनिलः ||३||
देशो वैद्यस्य वाग्देहमनसां च विचेष्टितम् |
कथयन्त्यातुरगतं शुभं वा यदि वाऽशुभम् ||४||
Adhikarana 3 (5-6) · Śloka 7
পাখ(ষ)ণ্ডাশ্রমবর্ণানাং সপক্ষাঃ কর্মসিদ্ধযে |
ত এব বিপরীতাঃ স্যুর্দূতাঃ কর্মবিপত্তযে ||৫||
নপুংসকং স্ত্রী বহবো নৈককার্যা অসূযকাঃ |
গর্দভোষ্ট্ররথপ্রাপ্তাঃ প্রাপ্তা বা স্যুঃ পরম্পরাঃ ||৬||
বৈদ্যং য উপসর্পন্তি দূতাস্তে চাপি গর্হিতাঃ |৭|
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पाख(ष)ण्डाश्रमवर्णानां सपक्षाः कर्मसिद्धये |
त एव विपरीताः स्युर्दूताः कर्मविपत्तये ||५||
नपुंसकं स्त्री बहवो नैककार्या असूयकाः |
गर्दभोष्ट्ररथप्राप्ताः प्राप्ता वा स्युः परम्पराः ||६||
वैद्यं य उपसर्पन्ति दूतास्ते चापि गर्हिताः |७|
Adhikarana 4 (7-8) · Śloka 8
পাশদণ্ডাযুধধরাঃ পাণ্ডুরেতরবাসসঃ ||৭||
আর্দ্রজীর্ণাপসব্যৈকমলিনোদ্ধ্বস্তবাসসঃ |
ন্যূনাধিকাঙ্গা উদ্বিগ্না বিকৃতা রৌদ্ররূপিণঃ ||৮||
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पाशदण्डायुधधराः पाण्डुरेतरवाससः ||७||
आर्द्रजीर्णापसव्यैकमलिनोद्ध्वस्तवाससः |
न्यूनाधिकाङ्गा उद्विग्ना विकृता रौद्ररूपिणः ||८||
Adhikarana 5 (9) · Śloka 9
রূক্ষনিষ্ঠুরবক্তারস্ত্বমঙ্গল্যাভিধাযিনঃ |৯|
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रूक्षनिष्ठुरवक्तारस्त्वमङ्गल्याभिधायिनः |९|
Adhikarana 6 (9-14) · Śloka 15
ছিন্দন্তস্তৃণকাষ্ঠানি স্পৃশন্তো নাসিকাং স্তনম্ ||৯||
বস্ত্রান্তানামিকাকেশনখরোমদশাস্পৃশঃ |
স্রোতোবরোধহৃদ্গণ্ডমূর্ধোরঃকুক্ষিপাণযঃ ||১০||
কপালোপলভস্মাস্থিতুষাঙ্গারকরাশ্চ যে |
বিলিখন্তো মহীং কিঞ্চিন্মুঞ্চন্তো লোষ্টভেদিনঃ ||১১||
তৈলকর্দমদিগ্ধাঙ্গা রক্তস্রগনুলেপনাঃ |
ফলং পক্বমসারং বা গৃহীত্বাঽন্যচ্চ তদ্বিধম্ ||১২||
নখৈর্নখান্তরং বাঽপি করেণ চরণং তথা |
উপানচ্চর্মহস্তা বা বিকৃতব্যাধিপীডিতাঃ ||১৩||
বামাচারা রুদন্তশ্চ শ্বাসিনো বিকৃতেক্ষণাঃ |
যাম্যাং দিশি প্রাঞ্জলযো বিষমৈকপদে স্থিতাঃ ||১৪||
বৈদ্যং য উপসর্পন্তি দূতাস্তে চাপি গর্হিতাঃ |১৫|
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छिन्दन्तस्तृणकाष्ठानि स्पृशन्तो नासिकां स्तनम् ||९||
वस्त्रान्तानामिकाकेशनखरोमदशास्पृशः |
स्रोतोवरोधहृद्गण्डमूर्धोरःकुक्षिपाणयः ||१०||
कपालोपलभस्मास्थितुषाङ्गारकराश्च ये |
विलिखन्तो महीं किञ्चिन्मुञ्चन्तो लोष्टभेदिनः ||११||
तैलकर्दमदिग्धाङ्गा रक्तस्रगनुलेपनाः |
फलं पक्वमसारं वा गृहीत्वाऽन्यच्च तद्विधम् ||१२||
नखैर्नखान्तरं वाऽपि करेण चरणं तथा |
उपानच्चर्महस्ता वा विकृतव्याधिपीडिताः ||१३||
वामाचारा रुदन्तश्च श्वासिनो विकृतेक्षणाः |
याम्यां दिशि प्राञ्जलयो विषमैकपदे स्थिताः ||१४||
वैद्यं य उपसर्पन्ति दूतास्ते चापि गर्हिताः |१५|
Adhikarana 7 (15-16) · Śloka 17
দক্ষিণাভিমুখং দেশে ত্বশুচৌ বা হুতাশনম্ |
জ্বলযন্তং পচন্তং বা ক্রূরকর্মণি চোদ্যতম্ ||১৫||
নগ্নং ভূমৌ শযানং বা বেগোত্সর্গেষু বাঽশুচিম্ |
প্রকীর্ণকেশমভ্যক্তং স্বিন্নং বিক্লবমেব বা ||১৬||
বৈদ্যং য উপসর্পন্তি দূতাস্তে চাপি গর্হিতাঃ |১৭|
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दक्षिणाभिमुखं देशे त्वशुचौ वा हुताशनम् |
ज्वलयन्तं पचन्तं वा क्रूरकर्मणि चोद्यतम् ||१५||
नग्नं भूमौ शयानं वा वेगोत्सर्गेषु वाऽशुचिम् |
प्रकीर्णकेशमभ्यक्तं स्विन्नं विक्लवमेव वा ||१६||
वैद्यं य उपसर्पन्ति दूतास्ते चापि गर्हिताः |१७|
Adhikarana 8 (17) · Śloka 18
বৈদ্যস্য পৈত্র্যে দৈবে বা কার্যে চোত্পাতদর্শনে ||১৭||
মধ্যাহ্নে চার্ধরাত্রে বা সন্ধ্যযোঃ ... |১৮|
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वैद्यस्य पैत्र्ये दैवे वा कार्ये चोत्पातदर्शने ||१७||
मध्याह्ने चार्धरात्रे वा सन्ध्ययोः ... |१८|
Adhikarana 9 (18) · Śloka 18
... কৃত্তিকাসু চ |
আর্দ্রাশ্লেষামঘামূলপূর্বাসু ভরণীষু চ ||১৮||
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... कृत्तिकासु च |
आर्द्राश्लेषामघामूलपूर्वासु भरणीषु च ||१८||
Adhikarana 10 (19) · Śloka 19
চতুর্থ্যাং বা নবম্যাং বা ষষ্ঠ্যাং সন্ধিদিনেষু চ |
বৈদ্যং য উপসর্পন্তি দূতাস্তে চাপি গর্হিতাঃ ||১৯||
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चतुर्थ्यां वा नवम्यां वा षष्ठ्यां सन्धिदिनेषु च |
वैद्यं य उपसर्पन्ति दूतास्ते चापि गर्हिताः ||१९||
Adhikarana 11 (20-22) · Śloka 23
স্বিন্নাভিতপ্তা মধ্যাহ্নে জ্বলনস্য সমীপতঃ |
গর্হিতাঃ পিত্তরোগেষু দূতা বৈদ্যমুপাগতাঃ ||২০||
ত এব কফরোগেষু কর্মসিদ্ধিকরাঃ স্মৃতাঃ |
এতেন শেষং ব্যাখ্যাতং বুদ্ধ্বা সংবিভজেত্তু তত্ ||২১||
রক্তপিত্তাতিসারেষু প্রমেহেষু তথৈব চ |
প্রশস্তো জলরোধেষু দূতবৈদ্যসমাগমঃ ||২২||
বিজ্ঞাযৈবং বিভাগং তু শেষং বুধ্যেত পণ্ডিতঃ |২৩|
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स्विन्नाभितप्ता मध्याह्ने ज्वलनस्य समीपतः |
गर्हिताः पित्तरोगेषु दूता वैद्यमुपागताः ||२०||
त एव कफरोगेषु कर्मसिद्धिकराः स्मृताः |
एतेन शेषं व्याख्यातं बुद्ध्वा संविभजेत्तु तत् ||२१||
रक्तपित्तातिसारेषु प्रमेहेषु तथैव च |
प्रशस्तो जलरोधेषु दूतवैद्यसमागमः ||२२||
विज्ञायैवं विभागं तु शेषं बुध्येत पण्डितः |२३|
Adhikarana 12 (23-26) · Śloka 26
শুক্লবাসাঃ শুচির্গৌরঃ শ্যামো বা প্রিযদর্শনঃ ||২৩||
স্বস্যাং জাতৌ স্বগোত্রো বা দূতঃ কার্যকরঃ স্মৃতঃ |
গোযানেনাগতস্তুষ্টঃ পাদাভ্যাং শুভচেষ্টিতঃ ||২৪||
স্মৃতিমান্ বিধিকালজ্ঞঃ স্বতন্ত্রঃ প্রতিপত্তিমান্ |
অলঙ্কৃতো মঙ্গলবান্ দূতঃ কার্যকরঃ স্মৃতঃ ||২৫||
স্বস্থং প্রাঙ্মুখমাসীনং সমে দেশে শুচৌ শুচিম্ |
উপসর্পতি যো বৈদ্যং স চ কার্যকরঃ স্মৃতঃ ||২৬||
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शुक्लवासाः शुचिर्गौरः श्यामो वा प्रियदर्शनः ||२३||
स्वस्यां जातौ स्वगोत्रो वा दूतः कार्यकरः स्मृतः |
गोयानेनागतस्तुष्टः पादाभ्यां शुभचेष्टितः ||२४||
स्मृतिमान् विधिकालज्ञः स्वतन्त्रः प्रतिपत्तिमान् |
अलङ्कृतो मङ्गलवान् दूतः कार्यकरः स्मृतः ||२५||
स्वस्थं प्राङ्मुखमासीनं समे देशे शुचौ शुचिम् |
उपसर्पति यो वैद्यं स च कार्यकरः स्मृतः ||२६||
Adhikarana 13 (27-31) · Śloka 32
মাংসোদকুম্ভাতপত্রবিপ্রবারণগোবৃষাঃ |
শুক্লবর্ণাশ্চ পূজ্যন্তে প্রস্থানে দর্শনং গতাঃ ||২৭||
স্ত্রী পুত্রিণী সবত্সা গৌর্বর্ধমানমলঙ্কৃতা |
কন্যা মত্স্যাঃ ফলং চামং স্বস্তিকং মোদকা দধি ||২৮||
হিরণ্যাক্ষতপাত্রং বা রত্নানি সুমনো নৃপঃ |
অপ্রশান্তোঽনলো বাজী হংসশ্চাপঃ শিখী তথা ||২৯||
ব্রহ্মদুন্দুভিজীমূতশঙ্খবেণুরথস্বনাঃ |
সিংহগোবৃষনাদাশ্চ হ্রে(হে)ষিতং গজবৃংহিতম্ ||৩০||
শস্তং হংসরুতং নৄণাং কৌশিকং চৈব বামতঃ |
প্রস্থানে যাযিনঃ শ্রেষ্ঠা বাচশ্চ হৃদযঙ্গমাঃ |৩২|
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मांसोदकुम्भातपत्रविप्रवारणगोवृषाः |
शुक्लवर्णाश्च पूज्यन्ते प्रस्थाने दर्शनं गताः ||२७||
स्त्री पुत्रिणी सवत्सा गौर्वर्धमानमलङ्कृता |
कन्या मत्स्याः फलं चामं स्वस्तिकं मोदका दधि ||२८||
हिरण्याक्षतपात्रं वा रत्नानि सुमनो नृपः |
अप्रशान्तोऽनलो वाजी हंसश्चापः शिखी तथा ||२९||
ब्रह्मदुन्दुभिजीमूतशङ्खवेणुरथस्वनाः |
सिंहगोवृषनादाश्च ह्रे(हे)षितं गजबृंहितम् ||३०||
शस्तं हंसरुतं नॄणां कौशिकं चैव वामतः |
प्रस्थाने यायिनः श्रेष्ठा वाचश्च हृदयङ्गमाः |३२|
Adhikarana 14 (32-40) · Śloka 40
পত্রপুষ্পফলোপেতান্ সক্ষীরান্নীরুজো দ্রুমান্ |
আশ্রিতা বা নভোবেশ্মধ্বজতোরণবেদিকাঃ ||৩২||
দিক্ষু শান্তাসু বক্তারো মধুরং পৃষ্ঠতোঽনুগাঃ |
বামা বা দক্ষিণা বাঽপি শকুনাঃ কর্মসিদ্ধযে ||৩৩||
শুষ্কেঽশনিহতেঽপত্রে বল্লীনদ্ধে সকণ্টকে |
বৃক্ষেঽথবাঽশ্মভস্মাস্থিবিট্তুষাঙ্গারপাংশুষু ||৩৪||
চৈত্যবল্মীকবিষমস্থিতা দীপ্তখরস্বরাঃ |
পুরতো দিক্ষু দীপ্তাসু বক্তারো নার্থসাধকাঃ ||৩৫||
পুন্নামানঃ খগা বামাঃ স্ত্রীসঞ্জ্ঞা দক্ষিণাঃ শুভাঃ |
দক্ষিণাদ্বামগমনং প্রশস্তং শ্বশৃগালযোঃ |
বামং নকুলচাষাণাং নোভযং শশসর্পযোঃ ||৩৬||
ভাসকৌশিকযোশ্চৈব ন প্রশস্তং কিলোভযম্ |
দর্শনং বা রুতং বাঽপি ন গোধাকৃকলাসযোঃ ||৩৭||
দূতৈরনিষ্টৈস্তুল্যানামশস্তং দর্শনং নৃণাম্ |
কুলত্থতিলকার্পাসতুষপাষাণভস্মনাম্ ||৩৮||
পাত্রং নেষ্টং তথাঽঙ্গারতৈলকর্দমপূরিতম্ |
প্রসন্নেতরমদ্যানাং পূর্ণং বা রক্তসর্ষপৈঃ ||৩৯||
শবকাষ্ঠপলাশানাং শুষ্কাণাং পথি সঙ্গমাঃ |
নেষ্যন্তে পতিতান্তস্থদীনান্ধরিপবস্তথা ||৪০||
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पत्रपुष्पफलोपेतान् सक्षीरान्नीरुजो द्रुमान् |
आश्रिता वा नभोवेश्मध्वजतोरणवेदिकाः ||३२||
दिक्षु शान्तासु वक्तारो मधुरं पृष्ठतोऽनुगाः |
वामा वा दक्षिणा वाऽपि शकुनाः कर्मसिद्धये ||३३||
शुष्केऽशनिहतेऽपत्रे वल्लीनद्धे सकण्टके |
वृक्षेऽथवाऽश्मभस्मास्थिविट्तुषाङ्गारपांशुषु ||३४||
चैत्यवल्मीकविषमस्थिता दीप्तखरस्वराः |
पुरतो दिक्षु दीप्तासु वक्तारो नार्थसाधकाः ||३५||
पुन्नामानः खगा वामाः स्त्रीसञ्ज्ञा दक्षिणाः शुभाः |
दक्षिणाद्वामगमनं प्रशस्तं श्वशृगालयोः |
वामं नकुलचाषाणां नोभयं शशसर्पयोः ||३६||
भासकौशिकयोश्चैव न प्रशस्तं किलोभयम् |
दर्शनं वा रुतं वाऽपि न गोधाकृकलासयोः ||३७||
दूतैरनिष्टैस्तुल्यानामशस्तं दर्शनं नृणाम् |
कुलत्थतिलकार्पासतुषपाषाणभस्मनाम् ||३८||
पात्रं नेष्टं तथाऽङ्गारतैलकर्दमपूरितम् |
प्रसन्नेतरमद्यानां पूर्णं वा रक्तसर्षपैः ||३९||
शवकाष्ठपलाशानां शुष्काणां पथि सङ्गमाः |
नेष्यन्ते पतितान्तस्थदीनान्धरिपवस्तथा ||४०||
Adhikarana 15 (41) · Śloka 41
মৃদুঃ শীতোঽনুকূলশ্চ সুগন্ধিশ্চানিলঃ শুভঃ |
খরোষ্ণোঽনিষ্টগন্ধশ্চ প্রতিলোমশ্চ গর্হিতঃ ||৪১||
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मृदुः शीतोऽनुकूलश्च सुगन्धिश्चानिलः शुभः |
खरोष्णोऽनिष्टगन्धश्च प्रतिलोमश्च गर्हितः ||४१||
Adhikarana 16 (42-43) · Śloka 43
গ্রন্থ্যর্বুদাদিষু সদা ছেদশব্দস্তু পূজিতঃ |
বিদ্রধ্যুদরগুল্মেষু ভেদশব্দস্তথৈব চ ||৪২||
রক্তপিত্তাতিসারেষু রুদ্ধশব্দঃ প্রশস্যতে |
এবং ব্যাধিবিশেষেণ নিমিত্তমুপধারযেত্ ||৪৩||
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ग्रन्थ्यर्बुदादिषु सदा छेदशब्दस्तु पूजितः |
विद्रध्युदरगुल्मेषु भेदशब्दस्तथैव च ||४२||
रक्तपित्तातिसारेषु रुद्धशब्दः प्रशस्यते |
एवं व्याधिविशेषेण निमित्तमुपधारयेत् ||४३||
Adhikarana 17 (44) · Śloka 44
তথৈবাক্রুষ্টহাকষ্টমাক্রন্দরুদিতস্বনাঃ |
ছর্দ্যাং বাতপুরীষাণাং শব্দো বৈ গর্দভোষ্ট্রযোঃ ||৪৪||
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तथैवाक्रुष्टहाकष्टमाक्रन्दरुदितस्वनाः |
छर्द्यां वातपुरीषाणां शब्दो वै गर्दभोष्ट्रयोः ||४४||
Adhikarana 18 (45) · Śloka 45
প্রতিষিদ্ধং তথা ভগ্নং ক্ষুতং স্খলিতমাহতম্ |
দৌর্মনস্যং চ বৈদ্যস্য যাত্রাযাং ন প্রশস্যতে ||৪৫||
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प्रतिषिद्धं तथा भग्नं क्षुतं स्खलितमाहतम् |
दौर्मनस्यं च वैद्यस्य यात्रायां न प्रशस्यते ||४५||
Adhikarana 19 (46) · Śloka 46
প্রবেশেঽপ্যেতদুদ্দেশাদবেক্ষ্যং চ তথাঽঽতুরে |
প্রতিদ্বারং গৃহে চাস্য পুনরেতন্ন গণ্যতে ||৪৬||
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प्रवेशेऽप्येतदुद्देशादवेक्ष्यं च तथाऽऽतुरे |
प्रतिद्वारं गृहे चास्य पुनरेतन्न गण्यते ||४६||
Adhikarana 20 (47-48) · Śloka 48
কেশভস্মাস্থিকাষ্ঠাশ্মতুষকার্পাসকণ্টকাঃ |
খট্বোর্ধ্বপাদা মদ্যাপো বসা তৈলং তিলাস্তৃণম্ ||৪৭||
নপুংসকব্যঙ্গভগ্ননগ্নমুণ্ডাসিতাম্বরাঃ |
প্রস্থানে বা প্রবেশে বা নেষ্যন্তে দর্শনং গতাঃ ||৪৮||
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केशभस्मास्थिकाष्ठाश्मतुषकार्पासकण्टकाः |
खट्वोर्ध्वपादा मद्यापो वसा तैलं तिलास्तृणम् ||४७||
नपुंसकव्यङ्गभग्ननग्नमुण्डासिताम्बराः |
प्रस्थाने वा प्रवेशे वा नेष्यन्ते दर्शनं गताः ||४८||
Adhikarana 21 (49-52) · Śloka 53
ভাণ্ডানাং সঙ্করস্থানাং স্থানাত্ সঞ্চারণং তথা |
নিখাতোত্পাটনং ভঙ্গঃ পতনং নির্গমস্তথা ||৪৯||
বৈদ্যাসনাবসাদো বা রোগী বা স্যাদধোমুখঃ |
বৈদ্যং সম্ভাষমাণোঽঙ্গং কুড্যমাস্তরণানি বা ||৫০||
প্রমৃজ্যাদ্বা ধুনীযাদ্বা করৌ পৃষ্ঠং শিরস্তথা |
হস্তং চাকৃষ্য বৈদ্যস্য ন্যসেচ্ছিরসি চোরসি ||৫১||
যো বৈদ্যমুন্মুখঃ পশ্যন্নুন্মার্ষ্টি স্বাঙ্গমাতুরঃ |
ন স সিধ্যতি বৈদ্যো বা গৃহে যস্য ন পূজ্যতে ||৫২||
ভবনে পূজ্যতে বাঽপি যস্য বৈদ্যঃ স সিধ্যতি |৫৩|
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भाण्डानां सङ्करस्थानां स्थानात् सञ्चारणं तथा |
निखातोत्पाटनं भङ्गः पतनं निर्गमस्तथा ||४९||
वैद्यासनावसादो वा रोगी वा स्यादधोमुखः |
वैद्यं सम्भाषमाणोऽङ्गं कुड्यमास्तरणानि वा ||५०||
प्रमृज्याद्वा धुनीयाद्वा करौ पृष्ठं शिरस्तथा |
हस्तं चाकृष्य वैद्यस्य न्यसेच्छिरसि चोरसि ||५१||
यो वैद्यमुन्मुखः पश्यन्नुन्मार्ष्टि स्वाङ्गमातुरः |
न स सिध्यति वैद्यो वा गृहे यस्य न पूज्यते ||५२||
भवने पूज्यते वाऽपि यस्य वैद्यः स सिध्यति |५३|
Adhikarana 22 (53) · Śloka 54
শুভং শুভেষু দূতাদিষ্বশুভং হ্যশুভেষু চ ||৫৩||
আতুরস্য ধ্রুবং তস্মাদ্দূতাদীন্ লক্ষযেদ্ভিষক্ |৫৪|
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शुभं शुभेषु दूतादिष्वशुभं ह्यशुभेषु च ||५३||
आतुरस्य ध्रुवं तस्माद्दूतादीन् लक्षयेद्भिषक् |५४|
Adhikarana 23 (54-66) · Śloka 66
স্বপ্নানতঃ প্রবক্ষ্যামি মরণায শুভায চ ||৫৪||
সুহৃদো যাংশ্চ পশ্যন্তি ব্যাধিতো বা স্বযং তথা |
স্নেহাভ্যক্তশরীরস্তু করভব্যালগর্দভৈঃ ||৫৫||
বরাহৈর্মহিষৈর্বাঽপি যো যাযাদ্দক্ষিণামুখঃ |
রক্তাম্বরধরা কৃষ্ণা হসন্তী মুক্তমূর্ধজা ||৫৬||
যং চাকর্ষতি বদ্ধ্বা স্ত্রী নৃত্যন্তী দক্ষিণামুখম্ |
অন্তাবসাযিভির্যো বাঽঽকৃষ্যতে দক্ষিণামুখঃ ||৫৭||
পরিষ্বজেরন্ যং বাঽপি প্রেতাঃ প্রব্রজিতা(ন)স্তথা |
মুহুরাঘ্রাযতে যস্তু শ্বাপদৈর্বিকৃতাননৈঃ ||৫৮||
পিবেন্মধু চ তৈলং চ যো বা পঙ্কেঽবসীদতি |
পঙ্কপ্রদিগ্ধগাত্রো বা প্রনৃত্যেত্ প্রহসেত্তথা ||৫৯||
নিরম্বরশ্চ যো রক্তাং ধারযেচ্ছিরসা স্রজম্ |
যস্য বংশো নলো বাঽপি তালো বোরসি জাযতে ||৬০||
যং বা মত্স্যো গ্রসেদ্যো বা জননীং প্রবিশেন্নরঃ |
পর্বতাগ্রাত্ পতেদ্যো বা শ্বভ্রে বা তমসাঽঽবৃতে ||৬১||
হ্রিযেত স্রোতসা যো বা যো বা মৌণ্ড্যমবাপ্নুযাত্ |
পরাজীযেত বধ্যেত কাকাদ্যৈর্বাঽভিভূযতে ||৬২||
পতনং তারকাদীনাং প্রণাশং দীপচক্ষুষোঃ |
যঃ পশ্যেদ্দেবতানাং বা প্রকম্পমবনেস্তথা ||৬৩||
যস্য ছর্দির্বিরেকো বা দশনাঃ প্রপতন্তি বা |
শাল্মলীং কিংশুকং যূপং বল্মীকং পারিভদ্রকম্ ||৬৪||
পুষ্পাঢ্যং কোবিদারং বা চিতাং বা যোঽধিরোহতি |
কার্পাসতৈলপিণ্যাকলোহানি লবণং তিলান্ ||৬৫||
লভেতাশ্নীত বা পক্বমন্নং যশ্চ পিবেত্ সুরাম্ |
স্বস্থঃ স লভতে ব্যাধিং ব্যাধিতো মৃত্যুমৃচ্ছতি ||৬৬||
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स्वप्नानतः प्रवक्ष्यामि मरणाय शुभाय च ||५४||
सुहृदो यांश्च पश्यन्ति व्याधितो वा स्वयं तथा |
स्नेहाभ्यक्तशरीरस्तु करभव्यालगर्दभैः ||५५||
वराहैर्महिषैर्वाऽपि यो यायाद्दक्षिणामुखः |
रक्ताम्बरधरा कृष्णा हसन्ती मुक्तमूर्धजा ||५६||
यं चाकर्षति बद्ध्वा स्त्री नृत्यन्ती दक्षिणामुखम् |
अन्तावसायिभिर्यो वाऽऽकृष्यते दक्षिणामुखः ||५७||
परिष्वजेरन् यं वाऽपि प्रेताः प्रव्रजिता(न)स्तथा |
मुहुराघ्रायते यस्तु श्वापदैर्विकृताननैः ||५८||
पिबेन्मधु च तैलं च यो वा पङ्केऽवसीदति |
पङ्कप्रदिग्धगात्रो वा प्रनृत्येत् प्रहसेत्तथा ||५९||
निरम्बरश्च यो रक्तां धारयेच्छिरसा स्रजम् |
यस्य वंशो नलो वाऽपि तालो वोरसि जायते ||६०||
यं वा मत्स्यो ग्रसेद्यो वा जननीं प्रविशेन्नरः |
पर्वताग्रात् पतेद्यो वा श्वभ्रे वा तमसाऽऽवृते ||६१||
ह्रियेत स्रोतसा यो वा यो वा मौण्ड्यमवाप्नुयात् |
पराजीयेत बध्येत काकाद्यैर्वाऽभिभूयते ||६२||
पतनं तारकादीनां प्रणाशं दीपचक्षुषोः |
यः पश्येद्देवतानां वा प्रकम्पमवनेस्तथा ||६३||
यस्य छर्दिर्विरेको वा दशनाः प्रपतन्ति वा |
शाल्मलीं किंशुकं यूपं वल्मीकं पारिभद्रकम् ||६४||
पुष्पाढ्यं कोविदारं वा चितां वा योऽधिरोहति |
कार्पासतैलपिण्याकलोहानि लवणं तिलान् ||६५||
लभेताश्नीत वा पक्वमन्नं यश्च पिबेत् सुराम् |
स्वस्थः स लभते व्याधिं व्याधितो मृत्युमृच्छति ||६६||
Adhikarana 24 (67) · Śloka 67
যথাস্বং প্রকৃতিস্বপ্নো বিস্মৃতো বিহতস্তথা |
চিন্তাকৃতো দিবা দৃষ্টো ভবন্ত্যফলদাস্তু তে ||৬৭||
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यथास्वं प्रकृतिस्वप्नो विस्मृतो विहतस्तथा |
चिन्ताकृतो दिवा दृष्टो भवन्त्यफलदास्तु ते ||६७||
Adhikarana 25 (68-70) · Śloka 71
জ্বরিতানাং শুনা সখ্যং কপিসখ্যং তু শোষিণাম্ |
উন্মাদে রাক্ষসৈঃ প্রেতৈরপস্মারে প্রবর্তনম্ ||৬৮||
মেহাতিসারিণাং তোযপানং স্নেহস্য কুষ্ঠিনাম্ |
গুল্মেষু স্থাবরোত্পত্তিঃ কোষ্ঠে, মূর্ধ্নি শিরোরুজি ||৬৯||
শষ্কুলীভক্ষণং ছর্দ্যামধ্বা শ্বাসপিপাসযোঃ |
হারিদ্রং ভোজনং বাঽপি যস্য স্যাত্ পাণ্ডুরোগিণঃ ||৭০||
রক্তপিত্তী পিবেদ্যস্তু শোণিতং স বিনশ্যতি |৭১|
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ज्वरितानां शुना सख्यं कपिसख्यं तु शोषिणाम् |
उन्मादे राक्षसैः प्रेतैरपस्मारे प्रवर्तनम् ||६८||
मेहातिसारिणां तोयपानं स्नेहस्य कुष्ठिनाम् |
गुल्मेषु स्थावरोत्पत्तिः कोष्ठे, मूर्ध्नि शिरोरुजि ||६९||
शष्कुलीभक्षणं छर्द्यामध्वा श्वासपिपासयोः |
हारिद्रं भोजनं वाऽपि यस्य स्यात् पाण्डुरोगिणः ||७०||
रक्तपित्ती पिबेद्यस्तु शोणितं स विनश्यति |७१|
Adhikarana 26 (71-74) · Śloka 74
স্বপ্নানেবংবিধান্ দৃষ্ট্বা প্রাতরুত্থায যত্নবান্ ||৭১||
দদ্যান্মাষাংস্তিলাংল্লোহং বিপ্রেভ্যঃ কাঞ্চনং তথা |
জপেচ্চাপি শুভান্ মন্ত্রান্ গাযত্রীং ত্রিপদাং তথা ||৭২||
দৃষ্ট্বা তু প্রথমে যামে স্বপ্যাদ্ ধ্যাত্বা পুনঃ শুভম্ |
জপেদ্বাঽন্যতমং বেদং ব্রহ্মচারী সমাহিতঃ ||৭৩||
ন চাচক্ষীত কস্মৈচিদ্দৃষ্ট্বা স্বপ্নমশোভনম্ |
দেবতাযতনে চৈব বসেদ্রাত্রিত্রযং তথা |
বিপ্রাংশ্চ পূজযেন্নিত্যং দুঃস্বপ্নাত্ প্রবিমুচ্যতে ||৭৪||
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स्वप्नानेवंविधान् दृष्ट्वा प्रातरुत्थाय यत्नवान् ||७१||
दद्यान्माषांस्तिलांल्लोहं विप्रेभ्यः काञ्चनं तथा |
जपेच्चापि शुभान् मन्त्रान् गायत्रीं त्रिपदां तथा ||७२||
दृष्ट्वा तु प्रथमे यामे स्वप्याद् ध्यात्वा पुनः शुभम् |
जपेद्वाऽन्यतमं वेदं ब्रह्मचारी समाहितः ||७३||
न चाचक्षीत कस्मैचिद्दृष्ट्वा स्वप्नमशोभनम् |
देवतायतने चैव वसेद्रात्रित्रयं तथा |
विप्रांश्च पूजयेन्नित्यं दुःस्वप्नात् प्रविमुच्यते ||७४||
Adhikarana 27 (75-81) · Śloka 81
অত ঊর্ধ্বং প্রবক্ষ্যামি প্রশস্তং স্বপ্নদর্শনম্ |
দেবান্ দ্বিজান্গোবৃষভান্ জীবতঃ সুহৃদো নৃপান্ ||৭৫||
সমিদ্ধমগ্নিং সাধূংশ্চ নির্মলানি জলানি চ |
পশ্যেত্ কল্যাণলাভায ব্যাধেরপগমায চ ||৭৬||
মাংসং মত্স্যান্ স্রজঃ শ্বেতা বাসাংসি চ ফলানি চ |
লভেত ধনলাভায ব্যাধেরপগমায চ ||৭৭||
মহাপ্রাসাদসফলবৃক্ষবারণপর্বতান্ |
আরোহেদ্দ্রব্যলাভায ব্যাধেরপগমায চ ||৭৮||
নদীনদসমুদ্রাংশ্চ ক্ষুভিতান্ কলুষোদকান্ |
তরেত্ কল্যাণলাভায ব্যাধেরপগমায চ ||৭৯||
উরগো বা জলৌকো বা ভ্রমরো বাঽপি যং দশেত্ |
আরোগ্যং নির্দিশেত্তস্য ধনলাভং চ বুদ্ধিমান্ ||৮০||
এবং রূপাঞ্ শুভান্ স্বপ্নান্ যঃ পশ্যেদ্ব্যাধিতো নরঃ |
স দীর্ঘাযুরিতি জ্ঞেযস্তস্মৈ কর্ম সমাচরেত্ ||৮১||
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अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि प्रशस्तं स्वप्नदर्शनम् |
देवान् द्विजान्गोवृषभान् जीवतः सुहृदो नृपान् ||७५||
समिद्धमग्निं साधूंश्च निर्मलानि जलानि च |
पश्येत् कल्याणलाभाय व्याधेरपगमाय च ||७६||
मांसं मत्स्यान् स्रजः श्वेता वासांसि च फलानि च |
लभेत धनलाभाय व्याधेरपगमाय च ||७७||
महाप्रासादसफलवृक्षवारणपर्वतान् |
आरोहेद्द्रव्यलाभाय व्याधेरपगमाय च ||७८||
नदीनदसमुद्रांश्च क्षुभितान् कलुषोदकान् |
तरेत् कल्याणलाभाय व्याधेरपगमाय च ||७९||
उरगो वा जलौको वा भ्रमरो वाऽपि यं दशेत् |
आरोग्यं निर्दिशेत्तस्य धनलाभं च बुद्धिमान् ||८०||
एवं रूपाञ् शुभान् स्वप्नान् यः पश्येद्व्याधितो नरः |
स दीर्घायुरिति ज्ञेयस्तस्मै कर्म समाचरेत् ||८१||
Adhikarana puShpikA · Śloka 29
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে বিপরীতাবিপরীতস্বপ্ননিদর্শনীযো নামৈকোনত্রিংশত্তমোঽধ্যাযঃ ||২৯||
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इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने विपरीताविपरीतस्वप्ननिदर्शनीयो नामैकोनत्रिंशत्तमोऽध्यायः ||२९||