Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 3
অথাতো বিপরীতাবিপরীতব্রণবিজ্ঞানীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
ফলাগ্নিজলবৃষ্টীনাং পুষ্পধূমাম্বুদা যথা |
খ্যাপযন্তি ভবিষ্যত্ত্বং তথা রিষ্টানি পঞ্চতাম্ ||৩||
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अथातो विपरीताविपरीतव्रणविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
फलाग्निजलवृष्टीनां पुष्पधूमाम्बुदा यथा |
ख्यापयन्ति भविष्यत्त्वं तथा रिष्टानि पञ्चताम् ||३||
Adhikarana 2 (4) · Śloka 5
তানি সৌক্ষ্ম্যাত্ প্রমাদাদ্বা তথৈবাশু ব্যতিক্রমাত্ |
গৃহ্যন্তে নোদ্গতান্যজ্ঞৈর্মুমূর্ষোর্ন ত্বসম্ভবাত্ ||৪||
ধ্রুবং তু মরণং রিষ্টে... |৫|
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तानि सौक्ष्म्यात् प्रमादाद्वा तथैवाशु व्यतिक्रमात् |
गृह्यन्ते नोद्गतान्यज्ञैर्मुमूर्षोर्न त्वसम्भवात् ||४||
ध्रुवं तु मरणं रिष्टे... |५|
Adhikarana 3 (5) · Śloka 5
... ব্রাহ্মণৈস্তত্ কিলামলৈঃ |
রসাযনতপোজপ্যতত্পরৈর্বা নিবার্যতে ||৫||
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... ब्राह्मणैस्तत् किलामलैः |
रसायनतपोजप्यतत्परैर्वा निवार्यते ||५||
Adhikarana 4 (6) · Śloka 6
নক্ষত্রপীডা বহুধা যথা কালং বিপচ্যতে |
তথৈবারিষ্টপাকং চ ব্রুবতে বহবো জনাঃ ||৬||
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नक्षत्रपीडा बहुधा यथा कालं विपच्यते |
तथैवारिष्टपाकं च ब्रुवते बहवो जनाः ||६||
Adhikarana 5 (7) · Śloka 7
অসিদ্ধিমাপ্নুযাল্লোকে প্রতিকুর্বন্ গতাযুষঃ |
অতোঽরিষ্টানি যত্নেন লক্ষযেত্ কুশলো ভিষক্ ||৭||
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असिद्धिमाप्नुयाल्लोके प्रतिकुर्वन् गतायुषः |
अतोऽरिष्टानि यत्नेन लक्षयेत् कुशलो भिषक् ||७||
Adhikarana 6 (8) · Śloka 8
গন্ধবর্ণরসাদীনাং বিশেষাণাং স্বভাবতঃ |
বৈকৃতং যত্ তদাচষ্টে ব্রণিনঃ পক্বলক্ষণম্ ||৮||
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गन्धवर्णरसादीनां विशेषाणां स्वभावतः |
वैकृतं यत् तदाचष्टे व्रणिनः पक्वलक्षणम् ||८||
Adhikarana 7 (9) · Śloka 10
কটুস্তীক্ষ্ণশ্চ বিস্রশ্চ গন্ধস্তু পবনাদিভিঃ |
লোহগন্ধিস্তু রক্তেন ব্যামিশ্রঃ সান্নিপাতিকঃ ||৯||
লাজাতসীতৈলসমাঃ কিঞ্চিদ্বিস্রাশ্চ গন্ধতঃ |
জ্ঞেযাঃ প্রকৃতিগন্ধাঃ স্যুঃ ... |১০|
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कटुस्तीक्ष्णश्च विस्रश्च गन्धस्तु पवनादिभिः |
लोहगन्धिस्तु रक्तेन व्यामिश्रः सान्निपातिकः ||९||
लाजातसीतैलसमाः किञ्चिद्विस्राश्च गन्धतः |
ज्ञेयाः प्रकृतिगन्धाः स्युः ... |१०|
Adhikarana 8 (10-12) · Śloka 12
... রতোঽন্যদ্গন্ধবৈকৃতম্ ||১০||
মদ্যাগুর্বাজ্যসুমনাপদ্মচন্দনচম্পকৈঃ |
সগন্ধা দিব্যগন্ধাশ্চ মুমূর্ষূণাং ব্রণাঃ স্মৃতাঃ ||১১||
শ্ববাজিমূষিকধ্বাঙ্ক্ষপূতিবল্লূরমত্কুণৈঃ |
সগন্ধাঃ পঙ্কগন্ধাশ্চ ভূমিগন্ধাশ্চ গর্হিতাঃ ||১২||
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... रतोऽन्यद्गन्धवैकृतम् ||१०||
मद्यागुर्वाज्यसुमनापद्मचन्दनचम्पकैः |
सगन्धा दिव्यगन्धाश्च मुमूर्षूणां व्रणाः स्मृताः ||११||
श्ववाजिमूषिकध्वाङ्क्षपूतिवल्लूरमत्कुणैः |
सगन्धाः पङ्कगन्धाश्च भूमिगन्धाश्च गर्हिताः ||१२||
Adhikarana 9 (13-15) · Śloka 15
কুঙ্কুমধ্যামকঙ্কুষ্ঠসবর্ণাঃ পিত্তকোপতঃ |
ন দহ্যন্তে ন চূষ্যন্তে ভিষক্ তান্ পরিবর্জযেত্ ||১৩||
কণ্ডূমন্তঃ স্থিরাঃ শ্বেতাঃ স্নিগ্ধাঃ কফনিমিত্ততঃ |
দূযন্তে বাঽপি দহ্যন্তে ভিষক্ তান্ পরিবর্জযেত্ ||১৪||
কৃষ্ণাস্তু যে তনুস্রাবা বাতজা মর্মতাপিনঃ |
স্বল্পামপি ন কুর্বন্তি রুজং তান্ পরিবর্জযেত্ ||১৫||
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कुङ्कुमध्यामकङ्कुष्ठसवर्णाः पित्तकोपतः |
न दह्यन्ते न चूष्यन्ते भिषक् तान् परिवर्जयेत् ||१३||
कण्डूमन्तः स्थिराः श्वेताः स्निग्धाः कफनिमित्ततः |
दूयन्ते वाऽपि दह्यन्ते भिषक् तान् परिवर्जयेत् ||१४||
कृष्णास्तु ये तनुस्रावा वातजा मर्मतापिनः |
स्वल्पामपि न कुर्वन्ति रुजं तान् परिवर्जयेत् ||१५||
Adhikarana 10 (16) · Śloka 17
ক্ষ্বেডন্তি ঘুর্ঘুরাযন্তে জ্বলন্তীব চ যে ব্রণাঃ |
ত্বঙ্মাংসস্থাশ্চ পবনং সশব্দং বিসৃজন্তি যে ||১৬||
যে চ মর্মস্বসম্ভূতা ভবন্ত্যত্যর্থবেদনাঃ |১৭|
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क्ष्वेडन्ति घुर्घुरायन्ते ज्वलन्तीव च ये व्रणाः |
त्वङ्मांसस्थाश्च पवनं सशब्दं विसृजन्ति ये ||१६||
ये च मर्मस्वसम्भूता भवन्त्यत्यर्थवेदनाः |१७|
Adhikarana 11 (17) · Śloka 18
দহ্যন্তে চান্তরত্যর্থং বহিঃ শীতাশ্চ যে ব্রণাঃ ||১৭||
দহ্যন্তে বহিরত্যর্থং ভবন্ত্যন্তশ্চ শীতলাঃ |১৮|
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दह्यन्ते चान्तरत्यर्थं बहिः शीताश्च ये व्रणाः ||१७||
दह्यन्ते बहिरत्यर्थं भवन्त्यन्तश्च शीतलाः |१८|
Adhikarana 12 (18-19) · Śloka 19
শক্তিধ্বজরথাঃ কুন্তবাজিবারণগোবৃষাঃ ||১৮||
যেষু চাপ্যবভাসেরন্ প্রাসাদাকৃতযস্তথা |
চূর্ণাবকীর্ণা ইব যে ভান্তিচানবচূর্ণিতাঃ ||১৯||
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शक्तिध्वजरथाः कुन्तवाजिवारणगोवृषाः ||१८||
येषु चाप्यवभासेरन् प्रासादाकृतयस्तथा |
चूर्णावकीर्णा इव ये भान्तिचानवचूर्णिताः ||१९||
Adhikarana 13 (20) · Śloka 20
প্রাণমাংসক্ষযশ্বাসকাসারোচকপীডিতাঃ |
প্রবৃদ্ধপূযরুধিরা ব্রণা যেষাং চ মর্মসু ||২০||
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प्राणमांसक्षयश्वासकासारोचकपीडिताः |
प्रवृद्धपूयरुधिरा व्रणा येषां च मर्मसु ||२०||
Adhikarana 14 (21) · Śloka 21
ক্রিযাভিঃ সম্যগারব্ধা ন সিদ্ধ্যন্তি চ যে ব্রণাঃ |
বর্জযেত্তানপি প্রাজ্ঞঃ সংরক্ষন্নাত্মনো যশঃ ||২১||
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क्रियाभिः सम्यगारब्धा न सिद्ध्यन्ति च ये व्रणाः |
वर्जयेत्तानपि प्राज्ञः संरक्षन्नात्मनो यशः ||२१||
Adhikarana puShpikA · Śloka 28
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে বিপরীতাবিপরীতব্রণবিজ্ঞানীযো নামাষ্টাবিংশতিতমোঽধ্যাযঃ ||২৮||
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इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने विपरीताविपरीतव्रणविज्ञानीयो नामाष्टाविंशतितमोऽध्यायः ||२८||