Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ পঞ্চেন্দ্রিযার্থবিপ্রতিপত্তিমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातः पञ्चेन्द्रियार्थविप्रतिपत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
শরীরশীলযোর্যস্য প্রকৃতের্বিকৃতির্ভবেত্ |
তত্ত্বরিষ্টং সমাসেন, ব্যাসতস্তু নিবোধ মে ||৩||
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शरीरशीलयोर्यस्य प्रकृतेर्विकृतिर्भवेत् |
तत्त्वरिष्टं समासेन, व्यासतस्तु निबोध मे ||३||
Adhikarana 3 (4-6) · Śloka 6
শৃণোতি বিবিধাঞ্ শব্দান্ যো দিব্যানামভাবতঃ |
সমুদ্রপুরমেঘানামসম্পত্তৌ চ নিঃস্বনান্ ||৪||
তান্ স্বনান্নাবগৃহ্ণাতি মন্যতে চান্যশব্দবত্ |
গ্রাম্যারণ্যস্বনাংশ্চাপি বিপরীতাঞ্ শৃণোতি চ ||৫||
দ্বিষচ্ছব্দেষু রমতে সুহৃচ্ছব্দেষু কুপ্যতি |
ন শৃণোতি চ যোঽকস্মাত্তং ব্রুবন্তি গতাযুষম্ ||৬||
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शृणोति विविधाञ् शब्दान् यो दिव्यानामभावतः |
समुद्रपुरमेघानामसम्पत्तौ च निःस्वनान् ||४||
तान् स्वनान्नावगृह्णाति मन्यते चान्यशब्दवत् |
ग्राम्यारण्यस्वनांश्चापि विपरीताञ् शृणोति च ||५||
द्विषच्छब्देषु रमते सुहृच्छब्देषु कुप्यति |
न शृणोति च योऽकस्मात्तं ब्रुवन्ति गतायुषम् ||६||
Adhikarana 4 (7-8) · Śloka 8
যস্তূষ্ণমিব গৃহ্ণাতি শীতমুষ্ণং চ শীতবত্ |
সঞ্জাতশীতপিডকো যশ্চ দাহেন পীড্যতে ||৭||
উষ্ণগাত্রোঽতিমাত্রং চ যঃ শীতেন প্রবেপতে |
প্রহারান্নাভিজানাতি যোঽঙ্গচ্ছেদমথাপি বা ||৮||
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यस्तूष्णमिव गृह्णाति शीतमुष्णं च शीतवत् |
सञ्जातशीतपिडको यश्च दाहेन पीड्यते ||७||
उष्णगात्रोऽतिमात्रं च यः शीतेन प्रवेपते |
प्रहारान्नाभिजानाति योऽङ्गच्छेदमथापि वा ||८||
Adhikarana 5 (9) · Śloka 9
পাংশুনেবাবকীর্ণানি যশ্চ গাত্রাণি মন্যতে |
বর্ণান্যতা বা রাজ্যো বা যস্য গাত্রে ভবন্তি হি ||৯||
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पांशुनेवावकीर्णानि यश्च गात्राणि मन्यते |
वर्णान्यता वा राज्यो वा यस्य गात्रे भवन्ति हि ||९||
Adhikarana 6 (10) · Śloka 10
স্নাতানুলিপ্তং যং চাপি ভজন্তে নীলমক্ষিকাঃ |১০|
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स्नातानुलिप्तं यं चापि भजन्ते नीलमक्षिकाः |१०|
Adhikarana 7 (10) · Śloka 10
সুগন্ধির্বাঽতি যোঽকস্মাত্তং ব্রুবন্তি গতাযুষম্ ||১০||
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सुगन्धिर्वाऽति योऽकस्मात्तं ब्रुवन्ति गतायुषम् ||१०||
Adhikarana 8 (11-12) · Śloka 12
বিপরীতেন গৃহ্ণাতি রসান্ যশ্চোপযোজিতান্ |
উপযুক্তাঃ ক্রমাদ্যস্য রসা দোষাভিবৃদ্ধযে ||১১||
যস্য দোষাগ্নিসাম্যং চ কুর্যুর্মিথ্যোপযোজিতাঃ |
যো বা রসান্ন সংবেত্তি গতাসুং তং প্রচক্ষতে ||১২||
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विपरीतेन गृह्णाति रसान् यश्चोपयोजितान् |
उपयुक्ताः क्रमाद्यस्य रसा दोषाभिवृद्धये ||११||
यस्य दोषाग्निसाम्यं च कुर्युर्मिथ्योपयोजिताः |
यो वा रसान्न संवेत्ति गतासुं तं प्रचक्षते ||१२||
Adhikarana 9 (13) · Śloka 14
সুগন্ধং বেত্তি দুর্গন্ধং দুর্গন্ধস্য সুগন্ধিতাম্ |
গৃহ্ণীতে বাঽন্যথা গন্ধং শান্তে দীপে চ নীরুজঃ ||১৩||
যো বা গন্ধং ন জানাতি গতাসুং তং বিনির্দিশেত্ |১৪|
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सुगन्धं वेत्ति दुर्गन्धं दुर्गन्धस्य सुगन्धिताम् |
गृह्णीते वाऽन्यथा गन्धं शान्ते दीपे च नीरुजः ||१३||
यो वा गन्धं न जानाति गतासुं तं विनिर्दिशेत् |१४|
Adhikarana 10 (14) · Śloka 15
দ্বন্দ্বান্যুষ্ণহিমাদীনি কালাবস্থা দিশস্তথা ||১৪||
বিপরীতেন গৃহ্ণাতি ভাবানন্যাংশ্চ যো নরঃ |১৫|
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द्वन्द्वान्युष्णहिमादीनि कालावस्था दिशस्तथा ||१४||
विपरीतेन गृह्णाति भावानन्यांश्च यो नरः |१५|
Adhikarana 11 (15-23) · Śloka 23
দিবা জ্যোতীংষি যশ্চাপি জ্বলিতানীব পশ্যতি ||১৫||
রাত্রৌ সূর্যং জ্বলন্তং বা দিবা বা চন্দ্রবর্চসম্ |
অমেঘোপপ্লবে যশ্চ শক্রচাপতডিদ্গুণান্ ||১৬||
তডিত্ত্বতোঽসিতান্ যো বা নির্মলে গগনে ঘনান্ |
বিমানযানপ্রাসাদৈর্যশ্চ সঙ্কুলমম্বরম্ ||১৭||
যশ্চানিলং মূর্তিমন্তমন্তরিক্ষং চ পশ্যতি |
ধূমনীহারবাসোভিরাবৃতামিব মেদিনীম্ ||১৮||
প্রদীপ্তমিব লোকং চ যো বা প্লুতমিবাম্ভসা |
ভূমিমষ্টাপদাকারাং লেখাভির্যশ্চ পশ্যতি ||১৯||
ন পশ্যতি সনক্ষত্রাং যশ্চ দেবীমরুন্ধতীম্ |
ধ্রুবমাকাশগঙ্গাং বা তং বদন্তি গতাযুষম্ ||২০||
জ্যোত্স্নাদর্শোষ্ণতোযেষু ছাযাং যশ্চ ন পশ্যতি |
পশ্যত্যেকাঙ্গহীনাং বা বিকৃতাং বাঽন্যসত্ত্বজাম্ ||২১||
শ্বকাককঙ্কগৃধ্রাণাং প্রেতানাং যক্ষরক্ষসাম্ |
পিশাচোরগনাগানাং ভূতানাং বিকৃতামপি ||২২||
যো বা মযূরকণ্ঠাভং বিধূমং বহ্নিমীক্ষতে |
আতুরস্য ভবেন্মৃত্যুঃ স্বস্থো ব্যাধিমবাপ্নুযাত্ ||২৩||
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दिवा ज्योतींषि यश्चापि ज्वलितानीव पश्यति ||१५||
रात्रौ सूर्यं ज्वलन्तं वा दिवा वा चन्द्रवर्चसम् |
अमेघोपप्लवे यश्च शक्रचापतडिद्गुणान् ||१६||
तडित्त्वतोऽसितान् यो वा निर्मले गगने घनान् |
विमानयानप्रासादैर्यश्च सङ्कुलमम्बरम् ||१७||
यश्चानिलं मूर्तिमन्तमन्तरिक्षं च पश्यति |
धूमनीहारवासोभिरावृतामिव मेदिनीम् ||१८||
प्रदीप्तमिव लोकं च यो वा प्लुतमिवाम्भसा |
भूमिमष्टापदाकारां लेखाभिर्यश्च पश्यति ||१९||
न पश्यति सनक्षत्रां यश्च देवीमरुन्धतीम् |
ध्रुवमाकाशगङ्गां वा तं वदन्ति गतायुषम् ||२०||
ज्योत्स्नादर्शोष्णतोयेषु छायां यश्च न पश्यति |
पश्यत्येकाङ्गहीनां वा विकृतां वाऽन्यसत्त्वजाम् ||२१||
श्वकाककङ्कगृध्राणां प्रेतानां यक्षरक्षसाम् |
पिशाचोरगनागानां भूतानां विकृतामपि ||२२||
यो वा मयूरकण्ठाभं विधूमं वह्निमीक्षते |
आतुरस्य भवेन्मृत्युः स्वस्थो व्याधिमवाप्नुयात् ||२३||
Adhikarana puShpikA · Śloka 30
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে পঞ্চেন্দ্রিযার্থবিপ্রতিপত্তির্নাম ত্রিংশোঽধ্যাযঃ ||৩০||
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इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने पञ्चेन्द्रियार्थविप्रतिपत्तिर्नाम त्रिंशोऽध्यायः ||३०||