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30. pañcēndriyārthavipratipattyadhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ পঞ্চেন্দ্রিযার্থবিপ্রতিপত্তিমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः पञ्चेन्द्रियार्थविप्रतिपत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

শরীরশীলযোর্যস্য প্রকৃতের্বিকৃতির্ভবেত্ | তত্ত্বরিষ্টং সমাসেন, ব্যাসতস্তু নিবোধ মে ||৩||

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शरीरशीलयोर्यस्य प्रकृतेर्विकृतिर्भवेत् | तत्त्वरिष्टं समासेन, व्यासतस्तु निबोध मे ||३||

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Adhikarana 3 (4-6) · Śloka 6

শৃণোতি বিবিধাঞ্ শব্দান্ যো দিব্যানামভাবতঃ | সমুদ্রপুরমেঘানামসম্পত্তৌ চ নিঃস্বনান্ ||৪|| তান্ স্বনান্নাবগৃহ্ণাতি মন্যতে চান্যশব্দবত্ | গ্রাম্যারণ্যস্বনাংশ্চাপি বিপরীতাঞ্ শৃণোতি চ ||৫|| দ্বিষচ্ছব্দেষু রমতে সুহৃচ্ছব্দেষু কুপ্যতি | ন শৃণোতি চ যোঽকস্মাত্তং ব্রুবন্তি গতাযুষম্ ||৬||

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शृणोति विविधाञ् शब्दान् यो दिव्यानामभावतः | समुद्रपुरमेघानामसम्पत्तौ च निःस्वनान् ||४|| तान् स्वनान्नावगृह्णाति मन्यते चान्यशब्दवत् | ग्राम्यारण्यस्वनांश्चापि विपरीताञ् शृणोति च ||५|| द्विषच्छब्देषु रमते सुहृच्छब्देषु कुप्यति | न शृणोति च योऽकस्मात्तं ब्रुवन्ति गतायुषम् ||६||

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Adhikarana 4 (7-8) · Śloka 8

যস্তূষ্ণমিব গৃহ্ণাতি শীতমুষ্ণং চ শীতবত্ | সঞ্জাতশীতপিডকো যশ্চ দাহেন পীড্যতে ||৭|| উষ্ণগাত্রোঽতিমাত্রং চ যঃ শীতেন প্রবেপতে | প্রহারান্নাভিজানাতি যোঽঙ্গচ্ছেদমথাপি বা ||৮||

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यस्तूष्णमिव गृह्णाति शीतमुष्णं च शीतवत् | सञ्जातशीतपिडको यश्च दाहेन पीड्यते ||७|| उष्णगात्रोऽतिमात्रं च यः शीतेन प्रवेपते | प्रहारान्नाभिजानाति योऽङ्गच्छेदमथापि वा ||८||

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Adhikarana 5 (9) · Śloka 9

পাংশুনেবাবকীর্ণানি যশ্চ গাত্রাণি মন্যতে | বর্ণান্যতা বা রাজ্যো বা যস্য গাত্রে ভবন্তি হি ||৯||

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पांशुनेवावकीर्णानि यश्च गात्राणि मन्यते | वर्णान्यता वा राज्यो वा यस्य गात्रे भवन्ति हि ||९||

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Adhikarana 6 (10) · Śloka 10

স্নাতানুলিপ্তং যং চাপি ভজন্তে নীলমক্ষিকাঃ |১০|

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स्नातानुलिप्तं यं चापि भजन्ते नीलमक्षिकाः |१०|

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Adhikarana 7 (10) · Śloka 10

সুগন্ধির্বাঽতি যোঽকস্মাত্তং ব্রুবন্তি গতাযুষম্ ||১০||

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सुगन्धिर्वाऽति योऽकस्मात्तं ब्रुवन्ति गतायुषम् ||१०||

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Adhikarana 8 (11-12) · Śloka 12

বিপরীতেন গৃহ্ণাতি রসান্ যশ্চোপযোজিতান্ | উপযুক্তাঃ ক্রমাদ্যস্য রসা দোষাভিবৃদ্ধযে ||১১|| যস্য দোষাগ্নিসাম্যং চ কুর্যুর্মিথ্যোপযোজিতাঃ | যো বা রসান্ন সংবেত্তি গতাসুং তং প্রচক্ষতে ||১২||

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विपरीतेन गृह्णाति रसान् यश्चोपयोजितान् | उपयुक्ताः क्रमाद्यस्य रसा दोषाभिवृद्धये ||११|| यस्य दोषाग्निसाम्यं च कुर्युर्मिथ्योपयोजिताः | यो वा रसान्न संवेत्ति गतासुं तं प्रचक्षते ||१२||

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Adhikarana 9 (13) · Śloka 14

সুগন্ধং বেত্তি দুর্গন্ধং দুর্গন্ধস্য সুগন্ধিতাম্ | গৃহ্ণীতে বাঽন্যথা গন্ধং শান্তে দীপে চ নীরুজঃ ||১৩|| যো বা গন্ধং ন জানাতি গতাসুং তং বিনির্দিশেত্ |১৪|

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सुगन्धं वेत्ति दुर्गन्धं दुर्गन्धस्य सुगन्धिताम् | गृह्णीते वाऽन्यथा गन्धं शान्ते दीपे च नीरुजः ||१३|| यो वा गन्धं न जानाति गतासुं तं विनिर्दिशेत् |१४|

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Adhikarana 10 (14) · Śloka 15

দ্বন্দ্বান্যুষ্ণহিমাদীনি কালাবস্থা দিশস্তথা ||১৪|| বিপরীতেন গৃহ্ণাতি ভাবানন্যাংশ্চ যো নরঃ |১৫|

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द्वन्द्वान्युष्णहिमादीनि कालावस्था दिशस्तथा ||१४|| विपरीतेन गृह्णाति भावानन्यांश्च यो नरः |१५|

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Adhikarana 11 (15-23) · Śloka 23

দিবা জ্যোতীংষি যশ্চাপি জ্বলিতানীব পশ্যতি ||১৫|| রাত্রৌ সূর্যং জ্বলন্তং বা দিবা বা চন্দ্রবর্চসম্ | অমেঘোপপ্লবে যশ্চ শক্রচাপতডিদ্গুণান্ ||১৬|| তডিত্ত্বতোঽসিতান্ যো বা নির্মলে গগনে ঘনান্ | বিমানযানপ্রাসাদৈর্যশ্চ সঙ্কুলমম্বরম্ ||১৭|| যশ্চানিলং মূর্তিমন্তমন্তরিক্ষং চ পশ্যতি | ধূমনীহারবাসোভিরাবৃতামিব মেদিনীম্ ||১৮|| প্রদীপ্তমিব লোকং চ যো বা প্লুতমিবাম্ভসা | ভূমিমষ্টাপদাকারাং লেখাভির্যশ্চ পশ্যতি ||১৯|| ন পশ্যতি সনক্ষত্রাং যশ্চ দেবীমরুন্ধতীম্ | ধ্রুবমাকাশগঙ্গাং বা তং বদন্তি গতাযুষম্ ||২০|| জ্যোত্স্নাদর্শোষ্ণতোযেষু ছাযাং যশ্চ ন পশ্যতি | পশ্যত্যেকাঙ্গহীনাং বা বিকৃতাং বাঽন্যসত্ত্বজাম্ ||২১|| শ্বকাককঙ্কগৃধ্রাণাং প্রেতানাং যক্ষরক্ষসাম্ | পিশাচোরগনাগানাং ভূতানাং বিকৃতামপি ||২২|| যো বা মযূরকণ্ঠাভং বিধূমং বহ্নিমীক্ষতে | আতুরস্য ভবেন্মৃত্যুঃ স্বস্থো ব্যাধিমবাপ্নুযাত্ ||২৩||

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दिवा ज्योतींषि यश्चापि ज्वलितानीव पश्यति ||१५|| रात्रौ सूर्यं ज्वलन्तं वा दिवा वा चन्द्रवर्चसम् | अमेघोपप्लवे यश्च शक्रचापतडिद्गुणान् ||१६|| तडित्त्वतोऽसितान् यो वा निर्मले गगने घनान् | विमानयानप्रासादैर्यश्च सङ्कुलमम्बरम् ||१७|| यश्चानिलं मूर्तिमन्तमन्तरिक्षं च पश्यति | धूमनीहारवासोभिरावृतामिव मेदिनीम् ||१८|| प्रदीप्तमिव लोकं च यो वा प्लुतमिवाम्भसा | भूमिमष्टापदाकारां लेखाभिर्यश्च पश्यति ||१९|| न पश्यति सनक्षत्रां यश्च देवीमरुन्धतीम् | ध्रुवमाकाशगङ्गां वा तं वदन्ति गतायुषम् ||२०|| ज्योत्स्नादर्शोष्णतोयेषु छायां यश्च न पश्यति | पश्यत्येकाङ्गहीनां वा विकृतां वाऽन्यसत्त्वजाम् ||२१|| श्वकाककङ्कगृध्राणां प्रेतानां यक्षरक्षसाम् | पिशाचोरगनागानां भूतानां विकृतामपि ||२२|| यो वा मयूरकण्ठाभं विधूमं वह्निमीक्षते | आतुरस्य भवेन्मृत्युः स्वस्थो व्याधिमवाप्नुयात् ||२३||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 30

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে পঞ্চেন্দ্রিযার্থবিপ্রতিপত্তির্নাম ত্রিংশোঽধ্যাযঃ ||৩০||

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इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने पञ्चेन्द्रियार्थविप्रतिपत्तिर्नाम त्रिंशोऽध्यायः ||३०||

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30. pañcēndriyārthavipratipattyadhyāyaḥ — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi