Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽপস্মারপ্রতিষেধমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातोऽपस्मारप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽপস্মারপ্রতিষেধমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातोऽपस्मारप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
স্মৃতির্ভূতার্থবিজ্ঞানমপশ্চ পরিবর্জনে | অপস্মার ইতি প্রোক্তস্ততোঽযং ব্যাধিরন্তকৃত্ ||৩||
स्मृतिर्भूतार्थविज्ञानमपश्च परिवर्जने | अपस्मार इति प्रोक्तस्ततोऽयं व्याधिरन्तकृत् ||३||
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Adhikarana 3 (4-6) · Śloka 6
মিথ্যাতিযোগেন্দ্রিযার্থকর্মণামভিসেবনাত্ | বিরুদ্ধমলিনাহারবিহারকুপিতৈর্মলৈঃ ||৪|| বেগনিগ্রহশীলানামহিতাশুচিভোজিনাম্ | রজস্তমোভিভূতানাং গচ্ছতাং চ রজস্বলাম্ ||৫|| তথা কামভযোদ্বেগক্রোধশোকাদিভির্ভৃশম্ | চেতস্যভিহতে পুংসামপস্মারোঽভিজাযতে ||৬||
मिथ्यातियोगेन्द्रियार्थकर्मणामभिसेवनात् | विरुद्धमलिनाहारविहारकुपितैर्मलैः ||४|| वेगनिग्रहशीलानामहिताशुचिभोजिनाम् | रजस्तमोभिभूतानां गच्छतां च रजस्वलाम् ||५|| तथा कामभयोद्वेगक्रोधशोकादिभिर्भृशम् | चेतस्यभिहते पुंसामपस्मारोऽभिजायते ||६||
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Adhikarana 4 (7) · Śloka 7
হৃত্কম্পঃ শূন্যতা স্বেদো ধ্যানং মূর্চ্ছা প্রমূঢতা | নিদ্রানাশশ্চ তস্মিংস্তু ভবিষ্যতি ভবন্ত্যথ ||৭||
हृत्कम्पः शून्यता स्वेदो ध्यानं मूर्च्छा प्रमूढता | निद्रानाशश्च तस्मिंस्तु भविष्यति भवन्त्यथ ||७||
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Adhikarana 5 (8-10) · Śloka 10
সঞ্জ্ঞাবহেষু স্রোতঃসু দোষব্যাপ্তেষু মানবঃ | রজস্তমঃপরীতেষু মূঢো ভ্রান্তেন চেতসা ||৮|| বিক্ষিপন্ হস্তপাদং চ বিজিহ্মভ্রূর্বিলোচনঃ | দন্তান্ খাদন্ বমন্ ফেনং বিবৃতাক্ষঃ পতেত্ ক্ষিতৌ ||৯|| অল্পকালান্তরং চাপি পুনঃ সঞ্জ্ঞাং লভেত সঃ | সোঽপস্মার ইতি প্রোক্তঃ... |১০|
सञ्ज्ञावहेषु स्रोतःसु दोषव्याप्तेषु मानवः | रजस्तमःपरीतेषु मूढो भ्रान्तेन चेतसा ||८|| विक्षिपन् हस्तपादं च विजिह्मभ्रूर्विलोचनः | दन्तान् खादन् वमन् फेनं विवृताक्षः पतेत् क्षितौ ||९|| अल्पकालान्तरं चापि पुनः सञ्ज्ञां लभेत सः | सोऽपस्मार इति प्रोक्तः... |१०|
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Adhikarana 6 (10) · Śloka 11
... স চ দৃষ্টশ্চতুর্বিধঃ ||১০|| বাতপিত্তকফৈর্নৄণাং চতুর্থঃ সন্নিপাততঃ |১১|
... स च दृष्टश्चतुर्विधः ||१०|| वातपित्तकफैर्नॄणां चतुर्थः सन्निपाततः |११|
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Adhikarana 7 (11-12) · Śloka 12
বেপমানো দশন্ দন্তান্ শ্বসন্ ফেনং বমন্নপি ||১১|| যো ব্রূযাদ্বিকৃতং সত্ত্বং কৃষ্ণং মামনুধাবতি | ততো মে চিত্তনাশঃ স্যাত্ সোঽপস্মারোঽনিলাত্মকঃ ||১২||
वेपमानो दशन् दन्तान् श्वसन् फेनं वमन्नपि ||११|| यो ब्रूयाद्विकृतं सत्त्वं कृष्णं मामनुधावति | ततो मे चित्तनाशः स्यात् सोऽपस्मारोऽनिलात्मकः ||१२||
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Adhikarana 8 (13) · Śloka 14
তৃট্তাপস্বেদমূর্চ্ছার্তো ধুন্বন্নঙ্গানি বিহ্বলঃ | যো ব্রূযাদ্বিকৃতং সত্ত্বং পীতং মামনুধাবতি ||১৩|| ততো মে চিত্তনাশঃ স্যাত্ স পিত্তভব উচ্যতে |১৪|
तृट्तापस्वेदमूर्च्छार्तो धुन्वन्नङ्गानि विह्वलः | यो ब्रूयाद्विकृतं सत्त्वं पीतं मामनुधावति ||१३|| ततो मे चित्तनाशः स्यात् स पित्तभव उच्यते |१४|
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Adhikarana 9 (14-15) · Śloka 15
শীতহৃল্লাসনিদ্রার্তঃ পতন্ ভূমৌ বমন্ কফম্ ||১৪|| যো ব্রূযাদ্বিকৃতং সত্ত্বং শুক্লং মামনুধাবতি | ততো মে চিত্তনাশঃ স্যাত্ সোঽপস্মারঃ কফাত্মকঃ ||১৫||
शीतहृल्लासनिद्रार्तः पतन् भूमौ वमन् कफम् ||१४|| यो ब्रूयाद्विकृतं सत्त्वं शुक्लं मामनुधावति | ततो मे चित्तनाशः स्यात् सोऽपस्मारः कफात्मकः ||१५||
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Adhikarana 10 (16) · Śloka 16
হৃদি তোদস্তৃডুত্ক্লেদস্ত্রিষ্বপ্যেতেষু সঙ্খ্যযা |১৬|
हृदि तोदस्तृडुत्क्लेदस्त्रिष्वप्येतेषु सङ्ख्यया |१६|
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Adhikarana 11 (16) · Śloka 16
প্রলাপঃ কূজনং ক্লেশঃ প্রত্যেকং তু ভবেদিহ ||১৬||
प्रलापः कूजनं क्लेशः प्रत्येकं तु भवेदिह ||१६||
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Adhikarana 12 (17) · Śloka 17
সর্বলিঙ্গসমবাযঃ সর্বদোষপ্রকোপজে |১৭|
सर्वलिङ्गसमवायः सर्वदोषप्रकोपजे |१७|
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Adhikarana 13 (17) · Śloka 18
অনিমিত্তাগমাদ্ব্যাধের্গমনাদকৃতেঽপি চ ||১৭|| আগমাচ্চাপ্যপস্মারং বদন্ত্যন্যে ন দোষজম্ |১৮|
अनिमित्तागमाद्व्याधेर्गमनादकृतेऽपि च ||१७|| आगमाच्चाप्यपस्मारं वदन्त्यन्ये न दोषजम् |१८|
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Adhikarana 14 (18-21) · Śloka 21
ক্রমোপযোগাদ্দোষাণাং ক্ষণিকত্বাত্তথৈব চ ||১৮|| আগমাদ্বৈশ্বরূপ্যাচ্চ স তু নির্বর্ণ্যতে বুধৈঃ | দেবে বর্ষত্যপি যথা ভূমৌ বীজানি কানিচিত্ ||১৯|| শরদি প্রতিরোহন্তি তথা ব্যাধিসমুদ্ভবঃ | স্থাযিনঃ কেচিদল্পেন কালেনাভিপ্রবর্ধিতাঃ ||২০|| দর্শযন্তি বিকারাংস্তু বিশ্বরূপান্নিসর্গতঃ | অপস্মারো মহাব্যাধিস্তস্মাদ্দোষজ এব তু ||২১||
क्रमोपयोगाद्दोषाणां क्षणिकत्वात्तथैव च ||१८|| आगमाद्वैश्वरूप्याच्च स तु निर्वर्ण्यते बुधैः | देवे वर्षत्यपि यथा भूमौ बीजानि कानिचित् ||१९|| शरदि प्रतिरोहन्ति तथा व्याधिसमुद्भवः | स्थायिनः केचिदल्पेन कालेनाभिप्रवर्धिताः ||२०|| दर्शयन्ति विकारांस्तु विश्वरूपान्निसर्गतः | अपस्मारो महाव्याधिस्तस्माद्दोषज एव तु ||२१||
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Adhikarana 15 (22-23) · Śloka 24
তস্য কার্যো বিধিঃ সর্বো য উন্মাদেষু বক্ষ্যতে | পুরাণসর্পিষঃ পানমভ্যঙ্গশ্চৈব পূজিতঃ ||২২|| উপযোগো গ্রহোক্তানাং যোগানাং তু বিশেষতঃ | ততঃ সিধ্যন্তি তে সর্বে যোগৈরন্যৈশ্চ সাধযেত্ | শিগ্রুকট্বঙ্গকিণ্বাহিনিম্বত্বগ্রসসাধিতম্ ||২৩|| চতুর্গুণে গবাং মূত্রে তৈলমভ্যঞ্জনে হিতম্ |২৪|
तस्य कार्यो विधिः सर्वो य उन्मादेषु वक्ष्यते | पुराणसर्पिषः पानमभ्यङ्गश्चैव पूजितः ||२२|| उपयोगो ग्रहोक्तानां योगानां तु विशेषतः | ततः सिध्यन्ति ते सर्वे योगैरन्यैश्च साधयेत् | शिग्रुकट्वङ्गकिण्वाहिनिम्बत्वग्रससाधितम् ||२३|| चतुर्गुणे गवां मूत्रे तैलमभ्यञ्जने हितम् |२४|
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Adhikarana 16 (24) · Śloka 25
গোধানকুলনাগানাং পৃষতর্ক্ষগবামপি ||২৪|| পিত্তেষু সিদ্ধং তৈলং চ পানাভ্যঙ্গেষু পূজিতম্ |২৫|
गोधानकुलनागानां पृषतर्क्षगवामपि ||२४|| पित्तेषु सिद्धं तैलं च पानाभ्यङ्गेषु पूजितम् |२५|
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Adhikarana 17 (25) · Śloka 25
তীক্ষ্ণৈরুভযতোভাগৈঃ শিরশ্চাপি বিশোধযেত্ ||২৫||
तीक्ष्णैरुभयतोभागैः शिरश्चापि विशोधयेत् ||२५||
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Adhikarana 18 (26) · Śloka 26
পূজাং রুদ্রস্য কুর্বীত তদ্গণানাং চ নিত্যশঃ |২৬|
पूजां रुद्रस्य कुर्वीत तद्गणानां च नित्यशः |२६|
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Adhikarana 19 (26) · Śloka 27
বাতিকং বস্তিভিশ্চাপি পৈত্তিকং তু বিরেচনৈঃ ||২৬|| কফজং বমনৈর্ধীমানপস্মারমুপাচরেত্ |২৭|
वातिकं बस्तिभिश्चापि पैत्तिकं तु विरेचनैः ||२६|| कफजं वमनैर्धीमानपस्मारमुपाचरेत् |२७|
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Adhikarana 20 (27-28) · Śloka 28
কুলত্থযবকোলানি শণবীজং পলঙ্কষাম্ ||২৭|| জটিলাং পঞ্চমূল্যৌ দ্বে পথ্যাং চোত্ক্বাথ্য যত্নতঃ | বস্তমূত্রযুতং সর্পিঃ পচেত্তদ্বাতিকে হিতম্ ||২৮||
कुलत्थयवकोलानि शणबीजं पलङ्कषाम् ||२७|| जटिलां पञ्चमूल्यौ द्वे पथ्यां चोत्क्वाथ्य यत्नतः | बस्तमूत्रयुतं सर्पिः पचेत्तद्वातिके हितम् ||२८||
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Adhikarana 21 (29) · Śloka 29
কাকোল্যাদিপ্রতীবাপং সিদ্ধং চ প্রথমে গণে | পযোমধুসিতাযুক্তং ঘৃতং তত্ পৈত্তিকে হিতম্ ||২৯||
काकोल्यादिप्रतीवापं सिद्धं च प्रथमे गणे | पयोमधुसितायुक्तं घृतं तत् पैत्तिके हितम् ||२९||
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Adhikarana 22 (30) · Śloka 30
কৃষ্ণাবচামুস্তকাদ্যৈর্যুক্তমারগ্বধাদিকে | পক্বং চ মূত্রবর্গে তু শ্লেষ্মাপস্মারিণে হিতম্ ||৩০||
कृष्णावचामुस्तकाद्यैर्युक्तमारग्वधादिके | पक्वं च मूत्रवर्गे तु श्लेष्मापस्मारिणे हितम् ||३०||
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Adhikarana 23 (31-33) · Śloka 33
সুরদ্রুমবচাকুষ্ঠসিদ্ধার্থব্যোষহিঙ্গুভিঃ | মঞ্জিষ্ঠারজনীযুগ্মসমঙ্গাত্রিফলাম্বুদৈঃ ||৩১|| করঞ্জবীজশৈরীষগিরিকর্ণীহুতাশনৈঃ | সিদ্ধং সিদ্ধার্থকং নাম সর্পির্মূত্রচতুর্গুণম্ ||৩২|| কৃমিকুষ্ঠগরশ্বাসবলাসবিষমজ্বরান্ | সর্বভূতগ্রহোন্মাদানপস্মারাংশ্চ নাশযেত্ ||৩৩||
सुरद्रुमवचाकुष्ठसिद्धार्थव्योषहिङ्गुभिः | मञ्जिष्ठारजनीयुग्मसमङ्गात्रिफलाम्बुदैः ||३१|| करञ्जबीजशैरीषगिरिकर्णीहुताशनैः | सिद्धं सिद्धार्थकं नाम सर्पिर्मूत्रचतुर्गुणम् ||३२|| कृमिकुष्ठगरश्वासबलासविषमज्वरान् | सर्वभूतग्रहोन्मादानपस्मारांश्च नाशयेत् ||३३||
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Adhikarana 24 (34-37) · Śloka 37
দশমূলেন্দ্রবৃক্ষত্বঙ্মূর্বাভার্গীফলত্রিকৈঃ | শম্পাকশ্রেযসীসপ্তপর্ণাপামার্গফল্গুভিঃ ||৩৪|| শৃতৈঃ কল্কৈশ্চ ভূনিম্বপূতীকব্যোষচিত্রকৈঃ | ত্রিবৃত্পাঠানিশাযুগ্মসারিবাদ্বযপৌষ্করৈঃ ||৩৫|| কটুকাযাসদন্ত্যুগ্রানীলিনীক্রিমিশত্রুভিঃ | সর্পিরেভিশ্চ গোক্ষীরদধিমূত্রশকৃদ্রসৈঃ ||৩৬|| সাধিতং পঞ্চগব্যাখ্যং সর্বাপস্মারভূতনুত্ | চাতুর্থকক্ষযশ্বাসানুন্মাদাংশ্চ নিযচ্ছতি ||৩৭||
दशमूलेन्द्रवृक्षत्वङ्मूर्वाभार्गीफलत्रिकैः | शम्पाकश्रेयसीसप्तपर्णापामार्गफल्गुभिः ||३४|| शृतैः कल्कैश्च भूनिम्बपूतीकव्योषचित्रकैः | त्रिवृत्पाठानिशायुग्मसारिवाद्वयपौष्करैः ||३५|| कटुकायासदन्त्युग्रानीलिनीक्रिमिशत्रुभिः | सर्पिरेभिश्च गोक्षीरदधिमूत्रशकृद्रसैः ||३६|| साधितं पञ्चगव्याख्यं सर्वापस्मारभूतनुत् | चातुर्थकक्षयश्वासानुन्मादांश्च नियच्छति ||३७||
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Adhikarana 25 (38-40) · Śloka 41
ভার্গীশৃতে পচেত্ ক্ষীরে শালিতণ্ডুলপাযসম্ | ত্র্যহং শুদ্ধায তং ভোক্তুং বরাহাযোপকল্পযেত্ ||৩৮|| জ্ঞাত্বা চ মধুরীভূতং তং বিশস্যান্নমুদ্ধরেত্ | ত্রীন্ ভাগাংস্তস্য চূর্ণস্য কিণ্বভাগেন সংসৃজেত্ ||৩৯|| মণ্ডোদকার্থে দেযশ্চ ভার্গীক্বাথঃ সুশীতলঃ | শুদ্ধে কুম্ভে নিদধ্যাচ্চ সম্ভারং তং সুরাং ততঃ ||৪০|| জাতগন্ধাং জাতরসাং পাযযেদাতুরং ভিষক্ |৪১|
भार्गीशृते पचेत् क्षीरे शालितण्डुलपायसम् | त्र्यहं शुद्धाय तं भोक्तुं वराहायोपकल्पयेत् ||३८|| ज्ञात्वा च मधुरीभूतं तं विशस्यान्नमुद्धरेत् | त्रीन् भागांस्तस्य चूर्णस्य किण्वभागेन संसृजेत् ||३९|| मण्डोदकार्थे देयश्च भार्गीक्वाथः सुशीतलः | शुद्धे कुम्भे निदध्याच्च सम्भारं तं सुरां ततः ||४०|| जातगन्धां जातरसां पाययेदातुरं भिषक् |४१|
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Adhikarana 26 (41) · Śloka 41
সিরাং বিধ্যেদথ প্রাপ্তাং মঙ্গল্যানি চ ধারযেত্ ||৪১||
सिरां विध्येदथ प्राप्तां मङ्गल्यानि च धारयेत् ||४१||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 61
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে ভূতবিদ্যাতন্ত্রেঽপস্মারপ্রতিষেধো নাম (দ্বিতীযোঽধ্যাযঃ, আদিতঃ) একষষ্টিতমোঽধ্যাযঃ ||৬১||
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते भूतविद्यातन्त्रेऽपस्मारप्रतिषेधो नाम (द्वितीयोऽध्यायः, आदितः) एकषष्टितमोऽध्यायः ||६१||
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