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60. amānuṣōpasargapratiṣēdhādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতোঽমানুষোপসর্গপ্রতিষেধমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातोऽमानुषोपसर्गप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

নিশাচরেভ্যো রক্ষ্যস্তু নিত্যমেব ক্ষতাতুরঃ | ইতি যত্ প্রাগভিহিতং বিস্তরস্তস্য বক্ষ্যতে ||৩||

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निशाचरेभ्यो रक्ष्यस्तु नित्यमेव क्षतातुरः | इति यत् प्रागभिहितं विस्तरस्तस्य वक्ष्यते ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

গুহ্যানাগতবিজ্ঞানমনবস্থাঽসহিষ্ণুতা | ক্রিযা বাঽমানুষী যস্মিন্ সগ্রহঃ পরিকীর্ত্যতে ||৪||

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गुह्यानागतविज्ञानमनवस्थाऽसहिष्णुता | क्रिया वाऽमानुषी यस्मिन् सग्रहः परिकीर्त्यते ||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

অশুচিং ভিন্নমর্যাদং ক্ষতং ব যদি বাঽক্ষতম্ | হিংস্যুর্হিংসাবিহারার্থং সত্কারার্থমথাপি বা ||৫||

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अशुचिं भिन्नमर्यादं क्षतं व यदि वाऽक्षतम् | हिंस्युर्हिंसाविहारार्थं सत्कारार्थमथापि वा ||५||

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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6

অসঙ্খ্যেযা গ্রহগণা গ্রহাধিপতযস্তু যে | ব্যজ্যন্তে বিবিধাকারা ভিদ্যন্তে তে তথাঽষ্টধা ||৬||

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असङ्ख्येया ग्रहगणा ग्रहाधिपतयस्तु ये | व्यज्यन्ते विविधाकारा भिद्यन्ते ते तथाऽष्टधा ||६||

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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7

দেবাস্তথা শত্রুগণাশ্চ তেষাং গন্ধর্বযক্ষাঃ পিতরো ভুজঙ্গাঃ | রক্ষাংসি যা চাপি পিশাচজাতিরেষোঽষ্টকো দেবগণো গ্রহাখ্যঃ ||৭||

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देवास्तथा शत्रुगणाश्च तेषां गन्धर्वयक्षाः पितरो भुजङ्गाः | रक्षांसि या चापि पिशाचजातिरेषोऽष्टको देवगणो ग्रहाख्यः ||७||

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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8

সন্তুষ্টঃ শুচিরপি চেষ্টগন্ধমাল্যো নিস্তন্দ্রী হ্যবিতথসংস্কৃতপ্রভাষী | তেজস্বী স্থিরনযনো বরপ্রদাতা ব্রহ্যণ্যো ভবতি নরঃ স দেবজুষ্টঃ ||৮||

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सन्तुष्टः शुचिरपि चेष्टगन्धमाल्यो निस्तन्द्री ह्यवितथसंस्कृतप्रभाषी | तेजस्वी स्थिरनयनो वरप्रदाता ब्रह्यण्यो भवति नरः स देवजुष्टः ||८||

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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9

সংস্বেদী দ্বিজগুরুদেবদোষবক্তা জিহ্মাক্ষো বিগতভযো বিমার্গদৃষ্টিঃ | সন্তুষ্টো ভবতি ন চান্নপানজাতৈর্দুষ্টাত্মা ভবতি চ দেবশত্রুজুষ্টঃ ||৯||

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संस्वेदी द्विजगुरुदेवदोषवक्ता जिह्माक्षो विगतभयो विमार्गदृष्टिः | सन्तुष्टो भवति न चान्नपानजातैर्दुष्टात्मा भवति च देवशत्रुजुष्टः ||९||

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Adhikarana 9 (10) · Śloka 10

হৃষ্টাত্মা পুলিনবনান্তরোপসেবী স্বাচারঃ প্রিযপরিগীতগন্ধমাল্যঃ | নৃত্যন্ বৈ প্রহসতি চারু চাল্পশব্দং গন্ধর্বগ্রহপরিপীডিতো মনুষ্যঃ ||১০||

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हृष्टात्मा पुलिनवनान्तरोपसेवी स्वाचारः प्रियपरिगीतगन्धमाल्यः | नृत्यन् वै प्रहसति चारु चाल्पशब्दं गन्धर्वग्रहपरिपीडितो मनुष्यः ||१०||

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Adhikarana 10 (11) · Śloka 11

তাম্রাক্ষঃ প্রিযতনুরক্তবস্ত্রধারী গম্ভীরো দ্রুতমতিরল্পবাক্ সহিষ্ণুঃ | তেজস্বী বদতি চ কিং দদামি কস্মৈ যো যক্ষগ্রহপরিপীডিতো মনুষ্যঃ ||১১||

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ताम्राक्षः प्रियतनुरक्तवस्त्रधारी गम्भीरो द्रुतमतिरल्पवाक् सहिष्णुः | तेजस्वी वदति च किं ददामि कस्मै यो यक्षग्रहपरिपीडितो मनुष्यः ||११||

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Adhikarana 11 (12) · Śloka 12

প্রেতেভ্যো বিসৃজতি সংস্তরেষু পিণ্ডান্ শান্তাত্মা জলমপি চাপসব্যবস্ত্রঃ | মাংসেপ্সুস্তিলগুডপাযসাভিকামস্তদ্ভুক্তো ভবতি পিতৃগ্রহাভিভূতঃ ||১২||

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प्रेतेभ्यो विसृजति संस्तरेषु पिण्डान् शान्तात्मा जलमपि चापसव्यवस्त्रः | मांसेप्सुस्तिलगुडपायसाभिकामस्तद्भुक्तो भवति पितृग्रहाभिभूतः ||१२||

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Adhikarana 12 (13) · Śloka 13

ভূমৌ যঃ প্রসরতি সর্পবত্ কদাচিত্ সৃক্কিণ্যৌ বিলিখতি জিহ্বযা তথৈব | নিদ্রালুর্গডমধুদুগ্ধপাযসেপ্সুর্বিজ্ঞেযো ভবতি ভুজঙ্গমেন জুষ্টঃ ||১৩||

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भूमौ यः प्रसरति सर्पवत् कदाचित् सृक्किण्यौ विलिखति जिह्वया तथैव | निद्रालुर्गडमधुदुग्धपायसेप्सुर्विज्ञेयो भवति भुजङ्गमेन जुष्टः ||१३||

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Adhikarana 13 (14) · Śloka 14

মাংসাসৃগ্বিবিধসুরাবিকারলিপ্সুর্নির্লজ্জো ভৃশমতিনিষ্ঠুরোঽতিশূরঃ | ক্রোধালুর্বিপুলবলো নিশাবিহারী শৌচদ্বিড্ ভবতি চ রক্ষসা গৃহীতঃ ||১৪||

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मांसासृग्विविधसुराविकारलिप्सुर्निर्लज्जो भृशमतिनिष्ठुरोऽतिशूरः | क्रोधालुर्विपुलबलो निशाविहारी शौचद्विड् भवति च रक्षसा गृहीतः ||१४||

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Adhikarana 14 (15) · Śloka 15

উদ্ধস্তঃ কৃশপরুষশ্চিরপ্রলাপী দুর্গন্ধো ভৃশমশুচিস্তথাঽতিলোলঃ | বহ্বাশী বিজনহিমাম্বুরাত্রিসেবী ব্যাবিগ্নো ভ্রমতি রুদন্ পিশাচজুষ্টঃ ||১৫||

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उद्धस्तः कृशपरुषश्चिरप्रलापी दुर्गन्धो भृशमशुचिस्तथाऽतिलोलः | बह्वाशी विजनहिमाम्बुरात्रिसेवी व्याविग्नो भ्रमति रुदन् पिशाचजुष्टः ||१५||

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Adhikarana 15 (16) · Śloka 16

স্থূলাক্ষস্ত্বরিতগতিঃ স্বফেনলেহী নিদ্রালুঃ পততি চ কম্পতে চ যোঽতি | যশ্চাদ্রিদ্বিরদনগাদিবিচ্যুতঃ সন্ সংসৃষ্টো ন ভবতি বার্ধকেন জুষ্টঃ ||১৬||

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स्थूलाक्षस्त्वरितगतिः स्वफेनलेही निद्रालुः पतति च कम्पते च योऽति | यश्चाद्रिद्विरदनगादिविच्युतः सन् संसृष्टो न भवति वार्धकेन जुष्टः ||१६||

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Adhikarana 16 (17-18) · Śloka 18

দেবগ্রহাঃ পৌর্ণমাস্যামসুরাঃ সন্ধ্যযোরপি | গন্ধর্বাঃ প্রাযশোঽষ্টম্যাং যক্ষাশ্চ প্রতিপদ্যথ ||১৭|| কৃষ্ণক্ষযে চ পিতরঃ পঞ্চম্যামপি চোরগাঃ | রক্ষাংসি নিশি পৈশাচাশ্চতুর্দশ্যাং বিশন্তি চ ||১৮||

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देवग्रहाः पौर्णमास्यामसुराः सन्ध्ययोरपि | गन्धर्वाः प्रायशोऽष्टम्यां यक्षाश्च प्रतिपद्यथ ||१७|| कृष्णक्षये च पितरः पञ्चम्यामपि चोरगाः | रक्षांसि निशि पैशाचाश्चतुर्दश्यां विशन्ति च ||१८||

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Adhikarana 17 (19) · Śloka 19

দর্পণাদীন্ যথা ছাযা শীতোষ্ণং প্রাণিনো যথা | স্বমণিং ভাস্করস্যোস্রা যথা দেহং চ দেহধৃক্ | বিশন্তি চ ন দৃশ্যন্তে গ্রহাস্তদ্বচ্ছরীরিণম্ ||১৯||

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दर्पणादीन् यथा छाया शीतोष्णं प्राणिनो यथा | स्वमणिं भास्करस्योस्रा यथा देहं च देहधृक् | विशन्ति च न दृश्यन्ते ग्रहास्तद्वच्छरीरिणम् ||१९||

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Adhikarana 18 (20) · Śloka 20

তপাংসি তীব্রাণি তথৈব দানং ব্রতানি ধর্মো নিযমাশ্চ সত্যম্ | গুণাস্তথাঽষ্টাবপি তেষু নিত্যা ব্যস্তাঃ সমস্তাশ্চ যথাপ্রভাবম্ ||২০||

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तपांसि तीव्राणि तथैव दानं व्रतानि धर्मो नियमाश्च सत्यम् | गुणास्तथाऽष्टावपि तेषु नित्या व्यस्ताः समस्ताश्च यथाप्रभावम् ||२०||

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Adhikarana 19 (21) · Śloka 21

ন তে মনুষ্যৈঃ সহ সংবিশন্তি ন বা মনুষ্যান্ ক্বচিদাবিশন্তি | যে ত্বাবিশন্তীতি বদন্তি মোহাত্তে ভূতবিদ্যাবিষযাদপোহ্যাঃ ||২১||

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न ते मनुष्यैः सह संविशन्ति न वा मनुष्यान् क्वचिदाविशन्ति | ये त्वाविशन्तीति वदन्ति मोहात्ते भूतविद्याविषयादपोह्याः ||२१||

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Adhikarana 20 (22) · Śloka 22

তেষাং গ্রহাণাং পরিচারকা যে কোটীসহস্রাযুতপহ্মসঙ্খ্যাঃ | অসৃগ্বসামাংসভুজঃ সুভীমা নিশাবিহারাশ্চ তমাবিশন্তি ||২২||

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तेषां ग्रहाणां परिचारका ये कोटीसहस्रायुतपह्मसङ्ख्याः | असृग्वसामांसभुजः सुभीमा निशाविहाराश्च तमाविशन्ति ||२२||

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Adhikarana 21 (23) · Śloka 23

নিশাচরাণাং তেষাং হি যে দেবগণমাশ্রিতাঃ | তে তু তত্সত্ত্বসংসর্গাদ্বিজ্ঞেযাস্তু তদঞ্জনাঃ ||২৩||

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निशाचराणां तेषां हि ये देवगणमाश्रिताः | ते तु तत्सत्त्वसंसर्गाद्विज्ञेयास्तु तदञ्जनाः ||२३||

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Adhikarana 22 (24) · Śloka 24

দেবগ্রহা ইতি পুনঃ প্রোচ্যন্তেঽশুচযশ্চ যে | দেববচ্চ নমস্যন্তে প্রত্যর্থ্যন্তে চ দেববত্ ||২৪||

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देवग्रहा इति पुनः प्रोच्यन्तेऽशुचयश्च ये | देववच्च नमस्यन्ते प्रत्यर्थ्यन्ते च देववत् ||२४||

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Adhikarana 23 (25) · Śloka 25

স্বামিশীলক্রিযাচারাঃ ক্রম এষ সুরাদিষু | নিরৃতের্যা দুহিতরস্তাসাং স প্রসবঃ স্মৃতঃ ||২৫||

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स्वामिशीलक्रियाचाराः क्रम एष सुरादिषु | निरृतेर्या दुहितरस्तासां स प्रसवः स्मृतः ||२५||

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Adhikarana 24 (26) · Śloka 26

সত্যত্বাদপবৃত্তেষু বৃত্তিস্তেষাং গণৈঃ কৃতা |২৬|

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सत्यत्वादपवृत्तेषु वृत्तिस्तेषां गणैः कृता |२६|

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Adhikarana 25 (26) · Śloka 27

হিংসাবিহারা যে কেচিদ্দেবভাবমুপাশ্রিতাঃ ||২৬|| ভূতানীতি কৃতা সঞ্জ্ঞা তেষাং সঞ্জ্ঞাপ্রবক্তৃভিঃ |২৭|

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हिंसाविहारा ये केचिद्देवभावमुपाश्रिताः ||२६|| भूतानीति कृता सञ्ज्ञा तेषां सञ्ज्ञाप्रवक्तृभिः |२७|

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Adhikarana 26 (27) · Śloka 28

গ্রহসঞ্জ্ঞানি ভূতানি যস্মদ্বেত্ত্যনযা ভিষক্ ||২৭|| বিদ্যযা ভূতবিদ্যাত্বমত এব নিরুচ্যতে |২৮|

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ग्रहसञ्ज्ञानि भूतानि यस्मद्वेत्त्यनया भिषक् ||२७|| विद्यया भूतविद्यात्वमत एव निरुच्यते |२८|

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Adhikarana 27 (28) · Śloka 29

তেষাং শান্ত্যর্থমন্বিচ্ছন্ বৈদ্যস্তু সুসমাহিতঃ ||২৮|| জপৈঃ সনিযমৈর্হোমৈরারভেত চিকিত্সিতুম্ |২৯|

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तेषां शान्त्यर्थमन्विच्छन् वैद्यस्तु सुसमाहितः ||२८|| जपैः सनियमैर्होमैरारभेत चिकित्सितुम् |२९|

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Adhikarana 28 (29) · Śloka 30

রক্তানি গন্ধমাল্যানি বীজানি মধুসর্পিষী ||২৯|| ভক্ষ্যাশ্চ সর্বে সর্বেষাং সামান্যো বিধিরুচ্যতে |৩০|

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रक्तानि गन्धमाल्यानि बीजानि मधुसर्पिषी ||२९|| भक्ष्याश्च सर्वे सर्वेषां सामान्यो विधिरुच्यते |३०|

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Adhikarana 29 (30) · Śloka 30

বস্ত্রাণি গন্ধমাল্যানি মাংসানি রুধিরাণি চ যানি যেষাং যথেষ্টানি তানি তেভ্যঃ প্রদাপযেত্ ||৩০||

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वस्त्राणि गन्धमाल्यानि मांसानि रुधिराणि च यानि येषां यथेष्टानि तानि तेभ्यः प्रदापयेत् ||३०||

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Adhikarana 30 (31) · Śloka 32

হিংসন্তি মনুজান্ যেষু প্রাযশো দিবসেষু তু ||৩১|| দিনেষু তেষু দেযানি তদ্ভূতবিনিবৃত্তযে |৩২|

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हिंसन्ति मनुजान् येषु प्रायशो दिवसेषु तु ||३१|| दिनेषु तेषु देयानि तद्भूतविनिवृत्तये |३२|

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Adhikarana 31 (32) · Śloka 33

দেবগ্রহে দেবগৃহে হুত্বাঽগ্নিং প্রা(দা) পযেদ্বলিম্ ||৩২|| কুশস্বস্তিকপূপাজ্যচ্ছত্রপাযসসম্ভৃতম্ |৩৩|

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देवग्रहे देवगृहे हुत्वाऽग्निं प्रा(दा) पयेद्वलिम् ||३२|| कुशस्वस्तिकपूपाज्यच्छत्रपायससम्भृतम् |३३|

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Adhikarana 32 (33) · Śloka 33

অসুরায যথাকালং বিদধ্যাচ্চত্বরাদিষু ||৩৩||

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असुराय यथाकालं विदध्याच्चत्वरादिषु ||३३||

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Adhikarana 33 (34) · Śloka 34

গন্ধর্বস্য গবাং মধ্যে মদ্যমাংসাম্বুজাঙ্গলম্ |৩৪|

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गन्धर्वस्य गवां मध्ये मद्यमांसाम्बुजाङ्गलम् |३४|

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Adhikarana 34 (34) · Śloka 35

হৃদ্যে বেশ্মনি যক্ষস্য কুল্মাষাসৃক্সুরাদিভিঃ ||৩৪|| অতিমুক্তককুন্দাব্জৈঃ পুষ্পৈশ্চ বিতরেদ্বলিম্ |৩৫|

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हृद्ये वेश्मनि यक्षस्य कुल्माषासृक्सुरादिभिः ||३४|| अतिमुक्तककुन्दाब्जैः पुष्पैश्च वितरेद्वलिम् |३५|

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Adhikarana 35 (35) · Śloka 35

নদ্যাং পিতৃগ্রহাযেষ্টং কুশাস্তরণভূষিতম্ ||৩৫||

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नद्यां पितृग्रहायेष्टं कुशास्तरणभूषितम् ||३५||

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Adhikarana 36 (36) · Śloka 36

তত্রৈবোপহরেচ্চাপি নাগায বিবিধং বলিম্ |৩৬|

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तत्रैवोपहरेच्चापि नागाय विविधं बलिम् |३६|

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Adhikarana 37 (36) · Śloka 36

চতুষ্পথে রাক্ষসস্য ভীমেষু গহনেষু বা ||৩৬||

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चतुष्पथे राक्षसस्य भीमेषु गहनेषु वा ||३६||

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Adhikarana 38 (37) · Śloka 37

শূন্যাগারে পিশাচস্য তীব্রং বলিমুপাহরেত্ |৩৭|

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शून्यागारे पिशाचस्य तीव्रं बलिमुपाहरेत् |३७|

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Adhikarana 39 (37) · Śloka 38

পূর্বমাচরিতৈর্মন্ত্রৈর্ভূতবিদ্যানিদর্শিতৈঃ ||৩৭|| ন শক্যা বলিভির্জেতুং যোগৈস্তান্ সমুপাচরেত্ |৩৮|

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पूर्वमाचरितैर्मन्त्रैर्भूतविद्यानिदर्शितैः ||३७|| न शक्या बलिभिर्जेतुं योगैस्तान् समुपाचरेत् |३८|

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Adhikarana 40 (38-39) · Śloka 39

অজর্ক্ষচর্মরোমাণি শল্যকোলূকযোস্তথা ||৩৮|| হিঙ্গু মূত্রং চ বস্তস্য ধূমমস্য প্রযোজযেত্ | এতেন শাম্যতি ক্ষিপ্রং বলবানপি যো গ্রহঃ ||৩৯||

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अजर्क्षचर्मरोमाणि शल्यकोलूकयोस्तथा ||३८|| हिङ्गु मूत्रं च बस्तस्य धूममस्य प्रयोजयेत् | एतेन शाम्यति क्षिप्रं बलवानपि यो ग्रहः ||३९||

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Adhikarana 41 (40) · Śloka 41

গজাহ্বপিপ্পলীমূলব্যোষামলকসর্ষপান্ | গোধানকুলমার্জারঋষ্যপিত্তপ্রপেষিতান্ ||৪০|| নস্যাভ্যঞ্জনসেকেষু বিদধ্যাদ্যোগতত্ত্ববিত্ |৪১|

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गजाह्वपिप्पलीमूलव्योषामलकसर्षपान् | गोधानकुलमार्जारऋष्यपित्तप्रपेषितान् ||४०|| नस्याभ्यञ्जनसेकेषु विदध्याद्योगतत्त्ववित् |४१|

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Adhikarana 42 (41-42) · Śloka 42

খরাশ্বাশ্বতরোলূককরভশ্বশৃগালজম্ ||৪১|| পুরীষং গৃধ্রকাকানাং বরাহস্য চ পেষযেত্ | বস্তমূত্রেণ তত্সিদ্ধং তৈলং স্যাত্ পূর্ববদ্ধিতম্ ||৪২||

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खराश्वाश्वतरोलूककरभश्वशृगालजम् ||४१|| पुरीषं गृध्रकाकानां वराहस्य च पेषयेत् | बस्तमूत्रेण तत्सिद्धं तैलं स्यात् पूर्ववद्धितम् ||४२||

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Adhikarana 43 (43) · Śloka 44

শিরীষবীজং লশুনং শুণ্ঠীং সিদ্ধার্থকং বচাম্ | মঞ্জিষ্ঠাং রজনীং কৃষ্ণাং বস্তমূত্রেণ পেষযেত্ ||৪৩|| বর্ত্যশ্ছাযাবিশুষ্কাস্তাঃ সপিত্তা নযনাঞ্জনম্ |৪৪|

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शिरीषबीजं लशुनं शुण्ठीं सिद्धार्थकं वचाम् | मञ्जिष्ठां रजनीं कृष्णां बस्तमूत्रेण पेषयेत् ||४३|| वर्त्यश्छायाविशुष्कास्ताः सपित्ता नयनाञ्जनम् |४४|

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Adhikarana 44 (44) · Śloka 45

নক্তমালফলং ব্যোষং মূলং শ্যোনাকবিল্বযোঃ ||৪৪|| হরিদ্রে চ কৃতা বর্ত্যঃ পূর্ববন্নযনাঞজনম্ |৪৫|

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नक्तमालफलं व्योषं मूलं श्योनाकबिल्वयोः ||४४|| हरिद्रे च कृता वर्त्यः पूर्ववन्नयनाञजनम् |४५|

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Adhikarana 45 (45) · Śloka 46

সৈন্ধবং কটুকাং হিঙ্গং বযঃস্থাং চ বচামপি | বস্তমূত্রেণ সম্পিষ্টং মত্স্যপিত্তেন পূর্ববত্ ||৪৫|| যে যে গ্রহা ন সিধ্যন্তি সর্বেষাং নযনাঞ্জনম্ |৪৬|

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सैन्धवं कटुकां हिङ्गं वयःस्थां च वचामपि | बस्तमूत्रेण सम्पिष्टं मत्स्यपित्तेन पूर्ववत् ||४५|| ये ये ग्रहा न सिध्यन्ति सर्वेषां नयनाञ्जनम् |४६|

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Adhikarana 46 (46-53) · Śloka 54

পুরাণসর্পির্লশুনং হিঙ্গ সিদ্ধার্থকং বচা ||৪৬|| গোলোমী চাজলোমী চ ভূতকেশী জটা তথা | কুক্কুটা সর্পগন্ধা চ তথা কাণবিকাণিকে ||৪৭|| বজ্রপ্রোক্তা বযঃস্থা চ শৃঙ্গী মোহনবল্লিকা | অর্কমূলং ত্রিকটুকং লতা স্রোতোজমঞ্জনম্ ||৪৮|| নৈপালী হরিতালং চ রক্ষোঘ্না যে চ কীর্তিতাঃ | সিংহব্যাঘ্রর্ক্ষমার্জারদ্বীপিবাজিগবাং তথা ||৪৯|| শ্বাবিচ্ছল্যকগোধানামুষ্ট্রস্য নকুলস্য চ | বিট্ত্বগ্রোমবসামূত্ররক্তপিত্তনখাদযঃ ||৫০|| অস্মিন্ বর্গে ভিষক্ কুর্যাত্তৈলানি চ ঘৃতানি চ | পানাভ্যঞ্জননস্যেষু তানি যোজ্যানি জানতা ||৫১|| অবপীডেঽঞ্জনে চৈব বিদধ্যাদ্গুটিকীকৃতম্ | বিদধীত পরীষেকে ক্বথিতং, চূর্ণিতং তথা ||৫২|| উদ্ধূলনে, শ্লক্ষ্ণপিষ্টং প্রদেহে চাবচারযেত্ | এষ সর্ববিকারাংস্তু মানসানপরাজিতঃ ||৫৩|| হন্যাদল্পেন কালেন স্নেহাদিরপি চ ক্রমঃ |৫৪|

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पुराणसर्पिर्लशुनं हिङ्ग सिद्धार्थकं वचा ||४६|| गोलोमी चाजलोमी च भूतकेशी जटा तथा | कुक्कुटा सर्पगन्धा च तथा काणविकाणिके ||४७|| वज्रप्रोक्ता वयःस्था च शृङ्गी मोहनवल्लिका | अर्कमूलं त्रिकटुकं लता स्रोतोजमञ्जनम् ||४८|| नैपाली हरितालं च रक्षोघ्ना ये च कीर्तिताः | सिंहव्याघ्रर्क्षमार्जारद्वीपिवाजिगवां तथा ||४९|| श्वाविच्छल्यकगोधानामुष्ट्रस्य नकुलस्य च | विट्त्वग्रोमवसामूत्ररक्तपित्तनखादयः ||५०|| अस्मिन् वर्गे भिषक् कुर्यात्तैलानि च घृतानि च | पानाभ्यञ्जननस्येषु तानि योज्यानि जानता ||५१|| अवपीडेऽञ्जने चैव विदध्याद्गुटिकीकृतम् | विदधीत परीषेके क्वथितं, चूर्णितं तथा ||५२|| उद्धूलने, श्लक्ष्णपिष्टं प्रदेहे चावचारयेत् | एष सर्वविकारांस्तु मानसानपराजितः ||५३|| हन्यादल्पेन कालेन स्नेहादिरपि च क्रमः |५४|

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Adhikarana 47 (54) · Śloka 54

ন চাচৌক্ষং প্রযুঞ্জীত প্রযোগং দেবতাগ্রহে ||৫৪||

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न चाचौक्षं प्रयुञ्जीत प्रयोगं देवताग्रहे ||५४||

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Adhikarana 48 (55) · Śloka 55

ঋতে পিশাচাদন্যত্র প্রতিকূলং ন চাচরেত্ |৫৫|

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ऋते पिशाचादन्यत्र प्रतिकूलं न चाचरेत् |५५|

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Adhikarana 49 (55) · Śloka 55

বৈদ্যাতুরৌ নিহন্যুস্তে ধ্রুবং ক্রুদ্ধা মহৌজসঃ ||৫৫||

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वैद्यातुरौ निहन्युस्ते ध्रुवं क्रुद्धा महौजसः ||५५||

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Adhikarana 50 (56) · Śloka 56

হিতাহিতীযে যচ্চোক্তং নিত্যমেব সমাচরেত্ |৫৬|

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हिताहितीये यच्चोक्तं नित्यमेव समाचरेत् |५६|

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Adhikarana 51 (56) · Śloka 56

ততঃ প্রাপ্স্যতি সিদ্ধিং চ যশশ্চ বিপুলং ভিষক্ ||৫৬||

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ततः प्राप्स्यति सिद्धिं च यशश्च विपुलं भिषक् ||५६||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 60

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে ভূতবিদ্যাতন্ত্রেঽমানুষোপসর্গপ্রতিষেধো নাম (প্রথমোঽধ্যাযঃ, আদিতঃ) ষষ্টিতমোঽধ্যাযঃ ||৬০||

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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते भूतविद्यातन्त्रेऽमानुषोपसर्गप्रतिषेधो नाम (प्रथमोऽध्यायः, आदितः) षष्टितमोऽध्यायः ||६०||

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