Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো দোষভেদবিকল্পমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो दोषभेदविकल्पमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো দোষভেদবিকল্পমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो दोषभेदविकल्पमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 4
অষ্টাঙ্গবেদবিদ্বাংসং দিবোদাসং মহৌজসম্ | ছিন্নশস্ত্রার্থসন্দেহং সূক্ষ্মাগাধাগমোদধিম্ ||৩|| বিশ্বামিত্রসুতঃ শ্রীমান্ সুশ্রুতঃ পরিপৃচ্ছতি |৪|
अष्टाङ्गवेदविद्वांसं दिवोदासं महौजसम् | छिन्नशस्त्रार्थसन्देहं सूक्ष्मागाधागमोदधिम् ||३|| विश्वामित्रसुतः श्रीमान् सुश्रुतः परिपृच्छति |४|
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 5
দ্বিষষ্টির্দোষভেদা যে পুরস্তাত্পরিকীর্তিতাঃ ||৪|| কতি তত্রৈকশো জ্ঞেযা দ্বিশো বাঽপ্যথবা ত্রিশঃ |৫|
द्विषष्टिर्दोषभेदा ये पुरस्तात्परिकीर्तिताः ||४|| कति तत्रैकशो ज्ञेया द्विशो वाऽप्यथवा त्रिशः |५|
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 6
তস্য তদ্বচনং শ্রুত্বা সংশযচ্ছিন্মহাতপাঃ ||৫|| প্রীতাত্মা নৃপশার্দূলঃ সুশ্রুতাযাহ তত্ত্বতঃ |৬|
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा संशयच्छिन्महातपाः ||५|| प्रीतात्मा नृपशार्दूलः सुश्रुतायाह तत्त्वतः |६|
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 7
ত্রযো দোষা ধাতবশ্চ পুরীষং মূত্রমেব চ ||৬|| দেহং সন্ধারযন্ত্যেতে হ্যব্যাপন্না রসৈর্হিতৈঃ |৭|
त्रयो दोषा धातवश्च पुरीषं मूत्रमेव च ||६|| देहं सन्धारयन्त्येते ह्यव्यापन्ना रसैर्हितैः |७|
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Adhikarana 6 (7-8) · Śloka 9
পুরুষঃ ষোডশকলঃ প্রাণাশ্চৈকাদশৈব যে ||৭|| রোগাণাং তু সহস্রং যচ্ছতং বিংশতিরেব চ | শতং চ পঞ্চ দ্রব্যাণাং ত্রিসপ্তত্যধিকোত্তরম্ ||৮|| ব্যাসতঃ কীর্তিতং তদ্ধি... |৯|
पुरुषः षोडशकलः प्राणाश्चैकादशैव ये ||७|| रोगाणां तु सहस्रं यच्छतं विंशतिरेव च | शतं च पञ्च द्रव्याणां त्रिसप्तत्यधिकोत्तरम् ||८|| व्यासतः कीर्तितं तद्धि... |९|
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Adhikarana 7 (9) · Śloka 9
... ভিন্না দোষাস্ত্রযো গুণাঃ | দ্বিষষ্টিধা ভবন্ত্যেতে ভূযিষ্ঠমিতি নিশ্চযঃ ||৯||
... भिन्ना दोषास्त्रयो गुणाः | द्विषष्टिधा भवन्त्येते भूयिष्ठमिति निश्चयः ||९||
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Adhikarana 8 (10-11) · Śloka 12
ত্রয এব পৃথক্ দোষা দ্বিশো নব সমাধিকৈঃ | ত্রযোদশাধিকৈকদ্বিসমমধ্যোল্বণৈস্ত্রিশঃ ||১০|| পঞ্চাশদেবং তু সহ ভবন্তি ক্ষযমাগতৈঃ | ক্ষীণমধ্যাধিকক্ষীণক্ষীণবৃদ্ধৈস্তথাঽপরৈঃ ||১১|| দ্বাদশৈবং সমাখ্যাতাস্ত্রযো দোষা দ্বিষষ্টিধা |১২|
त्रय एव पृथक् दोषा द्विशो नव समाधिकैः | त्रयोदशाधिकैकद्विसममध्योल्बणैस्त्रिशः ||१०|| पञ्चाशदेवं तु सह भवन्ति क्षयमागतैः | क्षीणमध्याधिकक्षीणक्षीणवृद्धैस्तथाऽपरैः ||११|| द्वादशैवं समाख्यातास्त्रयो दोषा द्विषष्टिधा |१२|
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Adhikarana 9 (12-14) · Śloka 14
মিশ্রা ধাতুমলৈর্দোষা যান্ত্যসঙ্খ্যেযতাং পুনঃ ||১২|| তস্মাত্ প্রসঙ্গং সংযম্য দোষভেদবিকল্পনৈঃ | রোগং বিদিত্বোপচরেদ্রসভেদৈর্যথৈরিতৈঃ ||১৩|| ভিষক্ কর্তাঽথ করণং রসা দোষাস্তু কারণম্ | কার্যমারোগ্যমেবৈকমনারোগ্যমতোঽন্যথা ||১৪||
मिश्रा धातुमलैर्दोषा यान्त्यसङ्ख्येयतां पुनः ||१२|| तस्मात् प्रसङ्गं संयम्य दोषभेदविकल्पनैः | रोगं विदित्वोपचरेद्रसभेदैर्यथैरितैः ||१३|| भिषक् कर्ताऽथ करणं रसा दोषास्तु कारणम् | कार्यमारोग्यमेवैकमनारोग्यमतोऽन्यथा ||१४||
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Adhikarana 10 (15-17) · Śloka 17
অধ্যাযানাং তু ষট্ষষ্ট্যা গ্রথিতার্থপদক্রমম্ | এবমেতদশেষেণ তন্ত্রমুত্তরমৃদ্ধিমত্ ||১৫|| স্পষ্টগূঢার্থবিজ্ঞানমগাঢমন্দচেতসাম্ | যথাবিধি যথাপ্রশ্নং ভবতাং পরিকীর্তিতম্ ||১৬|| সহোত্তরং ত্বেতদধীত্য সর্বং ব্রাহ্মং বিধানেন যথোদিতেন | ন হীযতেঽর্থান্মনসোঽভ্যুপেতাদেতদ্বচো ব্রাহ্মমতীব সত্যম্ ||১৭||
अध्यायानां तु षट्षष्ट्या ग्रथितार्थपदक्रमम् | एवमेतदशेषेण तन्त्रमुत्तरमृद्धिमत् ||१५|| स्पष्टगूढार्थविज्ञानमगाढमन्दचेतसाम् | यथाविधि यथाप्रश्नं भवतां परिकीर्तितम् ||१६|| सहोत्तरं त्वेतदधीत्य सर्वं ब्राह्मं विधानेन यथोदितेन | न हीयतेऽर्थान्मनसोऽभ्युपेतादेतद्वचो ब्राह्ममतीव सत्यम् ||१७||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 66
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রে দোষভেদবিকল্পো নাম ষট্ষষ্টিতমোঽধ্যাযঃ ||৬৬|| ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রং সমাপ্তম্ | সমাপ্তেযং সুশ্রুতসংহিতা |
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे दोषभेदविकल्पो नाम षट्षष्टितमोऽध्यायः ||६६|| इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रं समाप्तम् | समाप्तेयं सुश्रुतसंहिता |
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