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65. tantrayuktyadhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতস্তন্ত্রযুক্তিমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातस्तन्त्रयुक्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

দ্বাত্রিংশত্তন্ত্রযুক্তযো ভবন্তি শাস্ত্রে | তদ্যথা- অধিকরণং(১), যোগঃ(২), পদার্থঃ(৩), হেত্বর্থঃ(৪), উদ্দেশঃ(৫), নির্দেশঃ(৬), উপদেশঃ(৭), অপদেশঃ(৮), প্রদেশঃ(৯), অতিদেশঃ(১০), অপবর্জঃ(১১), বাক্যশেষঃ(১২), অর্থাপত্তিঃ(১৩), বিপর্যযঃ(১৪), প্রসঙ্গঃ(১৫), একান্তঃ(১৬), অনেকান্তঃ(১৭), পূর্বপক্ষঃ(১৮), নির্ণযঃ(১৯), অনুমতং(২০), বিধানম্(২১), অনাগতাবেক্ষণম্(২২), অতিক্রান্তাবেক্ষণং(২৩), সংশযঃ(২৪), ব্যাখ্যানং(২৫), স্বসঞ্জ্ঞা(২৬), নির্বচনং(২৭), নিদর্শনং(২৮), নিযোগঃ(২৯), বিকল্পঃ(৩০), সমুচ্চযঃ(৩১), ঊহ্যম্(৩২) ইতি ||৩||

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द्वात्रिंशत्तन्त्रयुक्तयो भवन्ति शास्त्रे | तद्यथा- अधिकरणं(१), योगः(२), पदार्थः(३), हेत्वर्थः(४), उद्देशः(५), निर्देशः(६), उपदेशः(७), अपदेशः(८), प्रदेशः(९), अतिदेशः(१०), अपवर्जः(११), वाक्यशेषः(१२), अर्थापत्तिः(१३), विपर्ययः(१४), प्रसङ्गः(१५), एकान्तः(१६), अनेकान्तः(१७), पूर्वपक्षः(१८), निर्णयः(१९), अनुमतं(२०), विधानम्(२१), अनागतावेक्षणम्(२२), अतिक्रान्तावेक्षणं(२३), संशयः(२४), व्याख्यानं(२५), स्वसञ्ज्ञा(२६), निर्वचनं(२७), निदर्शनं(२८), नियोगः(२९), विकल्पः(३०), समुच्चयः(३१), ऊह्यम्(३२) इति ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

অত্রাসাং তন্ত্রযুক্তীনাং কিং প্রযোজনম্? উচ্যতে- বাক্যযোজনমর্থযোজনং চ ||৪||

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अत्रासां तन्त्रयुक्तीनां किं प्रयोजनम्? उच्यते- वाक्ययोजनमर्थयोजनं च ||४||

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Adhikarana 4 (5-6) · Śloka 6

ভবন্তি চাত্র শ্লোকাঃ- অসদ্বাদিপ্রযুক্তানাং বাক্যানাং প্রতিষেধনম্ | স্ববাক্যসিদ্ধিরপি চ ক্রিযতে তন্ত্রযুক্তিতঃ ||৫|| ব্যক্তা নোক্তাস্তু যে হ্যার্থা লীনা যে চাপ্যনির্মলাঃ | লেশোক্তা যে চ কেচিত্স্যুস্তেষাং চাপি প্রসাধনম্ ||৬||

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भवन्ति चात्र श्लोकाः- असद्वादिप्रयुक्तानां वाक्यानां प्रतिषेधनम् | स्ववाक्यसिद्धिरपि च क्रियते तन्त्रयुक्तितः ||५|| व्यक्ता नोक्तास्तु ये ह्यार्था लीना ये चाप्यनिर्मलाः | लेशोक्ता ये च केचित्स्युस्तेषां चापि प्रसाधनम् ||६||

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Adhikarana 5 (7) · Śloka 7

যথাঽম্বুজবনস্যার্কঃ প্রদীপো বেশ্মনো যথা | প্রবোধস্য প্রকাশার্থং তথা তন্ত্রস্য যুক্তযঃ ||৭||

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यथाऽम्बुजवनस्यार्कः प्रदीपो वेश्मनो यथा | प्रबोधस्य प्रकाशार्थं तथा तन्त्रस्य युक्तयः ||७||

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Adhikarana 6 (8) · Śloka 8

তত্র যমর্থমধিকৃত্যোচ্যতে তদধিকরণং; যথা রসং দোষং বা ||৮||

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तत्र यमर्थमधिकृत्योच्यते तदधिकरणं; यथा रसं दोषं वा ||८||

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Adhikarana 7 (9) · Śloka 9

যেন বাক্যং যুজ্যতে স যোগঃ | যথা- ‘তৈলং পিবেচ্চামৃতবল্লিনিম্বহিংস্রাভযাবৃক্ষকপিপ্পলীভিঃ | সিদ্ধং বলাভ্যাং চ সদেবদারু হিতায নিত্যং গলগণ্ডরোগে’ | ইত্যত্র তৈলং সিদ্ধং পিবেদিতি প্রথমং বক্তব্যে তৃতীযপাদে সিদ্ধমিতি প্রযুক্তং, এবং দূরস্থানামপি পদানামেকীকরণং যোগঃ ||৯||

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येन वाक्यं युज्यते स योगः | यथा- ‘तैलं पिबेच्चामृतवल्लिनिम्बहिंस्राभयावृक्षकपिप्पलीभिः | सिद्धं बलाभ्यां च सदेवदारु हिताय नित्यं गलगण्डरोगे’ | इत्यत्र तैलं सिद्धं पिबेदिति प्रथमं वक्तव्ये तृतीयपादे सिद्धमिति प्रयुक्तं, एवं दूरस्थानामपि पदानामेकीकरणं योगः ||९||

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Adhikarana 8 (10) · Śloka 10

যোঽর্থোঽভিহিতঃ সূত্রে পদে বা স পদার্থঃ পদস্য পদযোঃ পদানাং বাঽর্থঃ পদার্থঃ; অপরিমিতাশ্চ পদার্থাঃ | যথা- স্নেহস্বেদাঞ্জনেষু নির্দিষ্টেষু দ্বযোস্ত্রযাণাং বাঽর্থানামুপপত্তির্দৃশ্যতে, তত্র যোঽর্থঃ পূর্বাপরযোগসিদ্ধো ভবতি স গ্রহীতব্যঃ; যথা- ‘বেদোত্পত্তিমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যাম’ ইত্যুক্তে সন্দিহ্যতে বুদ্ধিঃ- কতমস্য বেদস্যোত্পত্তিং বক্ষ্যতীতি, যতঃ ঋগ্বেদাদযস্তু বেদাঃ; ‘বিদ বিচারণে, বিদ্লৃ লাভে,’ ইত্যেতযোশ্চ ধাত্বোরনেকার্থযোঃ প্রযোগাত্, তত্র পূর্বাপরযোগমুপলভ্য প্রতিপত্তির্ভবতি- আযুর্বেদোত্পত্তিমযং বিবক্ষুরিতি; এষ পদার্থঃ ||১০||

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योऽर्थोऽभिहितः सूत्रे पदे वा स पदार्थः पदस्य पदयोः पदानां वाऽर्थः पदार्थः; अपरिमिताश्च पदार्थाः | यथा- स्नेहस्वेदाञ्जनेषु निर्दिष्टेषु द्वयोस्त्रयाणां वाऽर्थानामुपपत्तिर्दृश्यते, तत्र योऽर्थः पूर्वापरयोगसिद्धो भवति स ग्रहीतव्यः; यथा- ‘वेदोत्पत्तिमध्यायं व्याख्यास्याम’ इत्युक्ते सन्दिह्यते बुद्धिः- कतमस्य वेदस्योत्पत्तिं वक्ष्यतीति, यतः ऋग्वेदादयस्तु वेदाः; ‘विद विचारणे, विद्लृ लाभे,’ इत्येतयोश्च धात्वोरनेकार्थयोः प्रयोगात्, तत्र पूर्वापरयोगमुपलभ्य प्रतिपत्तिर्भवति- आयुर्वेदोत्पत्तिमयं विवक्षुरिति; एष पदार्थः ||१०||

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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11

যদন্যদুক্তমন্যার্থসাধকং ভবতি স হেত্বর্থঃ | যথা- মৃত্পিণ্ডোঽদ্ভিঃ প্রক্লিঘতে তথা মাষদুগ্ধপ্রভৃতিভির্ব্রণঃ প্রক্লিঘত ইতি ||১১||

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यदन्यदुक्तमन्यार्थसाधकं भवति स हेत्वर्थः | यथा- मृत्पिण्डोऽद्भिः प्रक्लिघते तथा माषदुग्धप्रभृतिभिर्व्रणः प्रक्लिघत इति ||११||

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Adhikarana 10 (12) · Śloka 12

সমাসবচনমুদ্দেশঃ | যথা- শল্যমিতি ||১২||

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समासवचनमुद्देशः | यथा- शल्यमिति ||१२||

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Adhikarana 11 (13) · Śloka 13

বিস্তরবচনং নির্দেশঃ | যথা- শারীরমাগন্তুকং চেতি ||১৩||

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विस्तरवचनं निर्देशः | यथा- शारीरमागन्तुकं चेति ||१३||

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Adhikarana 12 (14) · Śloka 14

এবমিত্যুপদেশঃ | যথা- ‘তথা ন জাগৃযাদ্রাত্রৌ দিবাস্বপ্নং চ বর্জযেত্’ ইতি ||১৪||

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एवमित्युपदेशः | यथा- ‘तथा न जागृयाद्रात्रौ दिवास्वप्नं च वर्जयेत्’ इति ||१४||

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Adhikarana 13 (15) · Śloka 15

অনেন কারণেনেত্যপদেশঃ, যথাঽপদিশ্যতে- মধুরঃ শ্লেষ্মাণমভিবর্ধযতীতি ||১৫||

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अनेन कारणेनेत्यपदेशः, यथाऽपदिश्यते- मधुरः श्लेष्माणमभिवर्धयतीति ||१५||

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Adhikarana 14 (16) · Śloka 16

প্রকৃতস্যাতিক্রান্তেন সাধনং প্রদেশঃ | যথা- দেবদত্তস্যানেন শল্যমুদ্ধৃতং তথা যজ্ঞদত্তস্যাপ্যযমুদ্ধরিষ্যতীতি ||১৬||

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प्रकृतस्यातिक्रान्तेन साधनं प्रदेशः | यथा- देवदत्तस्यानेन शल्यमुद्धृतं तथा यज्ञदत्तस्याप्ययमुद्धरिष्यतीति ||१६||

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Adhikarana 15 (17) · Śloka 17

প্রকৃতস্যানাগতস্য সাধনমতিদেশঃ | যথা- যতোঽস্য বাযুরুর্ধ্বমুত্তিষ্ঠতে তেনোদাবর্তী স্যাদিতি ||১৭||

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प्रकृतस्यानागतस्य साधनमतिदेशः | यथा- यतोऽस्य वायुरुर्ध्वमुत्तिष्ठते तेनोदावर्ती स्यादिति ||१७||

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Adhikarana 16 (18) · Śloka 18

অভিব্যাপ্যাপকর্ষণমপবর্গঃ | যথা- অস্বেদ্যা বিষোপসৃষ্টাঃ, অন্যত্র কীটবিষাদিতি ||১৮||

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अभिव्याप्यापकर्षणमपवर्गः | यथा- अस्वेद्या विषोपसृष्टाः, अन्यत्र कीटविषादिति ||१८||

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Adhikarana 17 (19) · Śloka 19

যেন পদেনানুক্তেন বাক্যং সমাপ্যেত স বাক্যশেষঃ | যথা- শিরঃ পাণিপাদপার্শ্বপৃষ্ঠোদরোরসামিত্যুক্তে পুরুষগ্রহণং বিনাঽপি গম্যতে পুরুষস্যেতি ||১৯||

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येन पदेनानुक्तेन वाक्यं समाप्येत स वाक्यशेषः | यथा- शिरः पाणिपादपार्श्वपृष्ठोदरोरसामित्युक्ते पुरुषग्रहणं विनाऽपि गम्यते पुरुषस्येति ||१९||

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Adhikarana 18 (20) · Śloka 20

যদকীর্তিতমর্থাদাপদ্যতে সাঽর্থাপত্তিঃ | যথা- ওদনং ভোক্ষ্যে ইত্যুক্তেঽর্থাদাপন্নং ভবতি- নাযং পিপাসুর্যবাগূমিতি ||২০||

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यदकीर्तितमर्थादापद्यते साऽर्थापत्तिः | यथा- ओदनं भोक्ष्ये इत्युक्तेऽर्थादापन्नं भवति- नायं पिपासुर्यवागूमिति ||२०||

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Adhikarana 19 (21) · Śloka 21

যদ্যত্রাভিহিতং তস্য প্রাতিলোম্যং বিপর্যযঃ | যথা- কৃশাল্পপ্রাণভীরবো দুশ্চিকিত্স্যা ইত্যুক্তে বিপরীতং গৃহ্যতে দৃঢাদযঃ সুচিকিত্স্যা ইতি ||২১||

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यद्यत्राभिहितं तस्य प्रातिलोम्यं विपर्ययः | यथा- कृशाल्पप्राणभीरवो दुश्चिकित्स्या इत्युक्ते विपरीतं गृह्यते दृढादयः सुचिकित्स्या इति ||२१||

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Adhikarana 20 (22) · Śloka 22

প্রকরণান্তরেণ সমাপনং প্রসঙ্গঃ, যদ্বা প্রকরণান্তরিতো যোঽর্থোঽসকৃদুক্তঃ সমাপ্যতে স প্রসঙ্গঃ | যথা- পঞ্চমহাভূতশরীরিসমবাযঃ পুরুষস্তস্মিন্ ক্রিযা সোঽধিষ্ঠানমিতি বেদোত্পত্তাবভিধায, ভূতচিন্তাযাং পুনরুক্তং- যতোঽভিহিতং পঞ্চমহাভূতশরীরিসমবাযঃ পুরূষ ইতি, স খল্বেষ কর্মপুরুষশ্চিকিত্সাধিকৃত ইতি ||২২||

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प्रकरणान्तरेण समापनं प्रसङ्गः, यद्वा प्रकरणान्तरितो योऽर्थोऽसकृदुक्तः समाप्यते स प्रसङ्गः | यथा- पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषस्तस्मिन् क्रिया सोऽधिष्ठानमिति वेदोत्पत्तावभिधाय, भूतचिन्तायां पुनरुक्तं- यतोऽभिहितं पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरूष इति, स खल्वेष कर्मपुरुषश्चिकित्साधिकृत इति ||२२||

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Adhikarana 21 (23) · Śloka 23

(সর্বত্র )যদবধারণেনোচ্যতে স একান্তঃ | যথা- ত্রিবৃদ্বিরেচযতি, মদনফলং বামযতি(এব) ||২৩||

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(सर्वत्र )यदवधारणेनोच्यते स एकान्तः | यथा- त्रिवृद्विरेचयति, मदनफलं वामयति(एव) ||२३||

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Adhikarana 22 (24) · Śloka 24

ক্বচিত্তথা ক্বচিদন্যথেতি যঃ সোঽনেকান্তঃ | যথা- কেচিদাচার্যা ব্রুবতে দ্রব্যং প্রধানং, কেচিদ্রসং, কেচিদ্বীর্যং কেচিদ্বিপাকমিতি ||২৪||

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क्वचित्तथा क्वचिदन्यथेति यः सोऽनेकान्तः | यथा- केचिदाचार्या ब्रुवते द्रव्यं प्रधानं, केचिद्रसं, केचिद्वीर्यं केचिद्विपाकमिति ||२४||

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Adhikarana 23 (25) · Śloka 25

আক্ষেপপূর্বকঃ প্রশ্নঃ পূর্বপক্ষঃ | যথা- কথং বাতনিমিত্তাশ্চত্বারঃ প্রমেহ অসাধ্যা ভবন্তীতি ||২৫||

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आक्षेपपूर्वकः प्रश्नः पूर्वपक्षः | यथा- कथं वातनिमित्ताश्चत्वारः प्रमेह असाध्या भवन्तीति ||२५||

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Adhikarana 24 (26-27) · Śloka 27

তস্যোত্তরং নির্ণযঃ | যথা- শরীরং প্রপীড্য পশ্চাদধো গত্বা বসামেদোমজ্জানুবিদ্ধং মূত্রং বিসৃজতি বাতঃ এবমসাধ্যা বাতজা ইতি ||২৬|| তথা চোক্তম্- কৃত্স্নং শরীরং নিষ্পীড্য মেদোমজ্জাবসাযুতঃ | অধঃ প্রকুপ্যতে বাযুস্তেনাসাধ্যাস্তু বাতজাঃ ||২৭||

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तस्योत्तरं निर्णयः | यथा- शरीरं प्रपीड्य पश्चादधो गत्वा वसामेदोमज्जानुविद्धं मूत्रं विसृजति वातः एवमसाध्या वातजा इति ||२६|| तथा चोक्तम्- कृत्स्नं शरीरं निष्पीड्य मेदोमज्जावसायुतः | अधः प्रकुप्यते वायुस्तेनासाध्यास्तु वातजाः ||२७||

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Adhikarana 25 (28) · Śloka 28

পরমতমপ্রতিষিদ্ধমনুমতম্ | যথা- অন্যো ব্রূযাত্- সপ্ত রসা ইতি, তচ্চাপ্রতিষেধাদনুমন্যতে কথঞ্চিদিতি ||২৮||

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परमतमप्रतिषिद्धमनुमतम् | यथा- अन्यो ब्रूयात्- सप्त रसा इति, तच्चाप्रतिषेधादनुमन्यते कथञ्चिदिति ||२८||

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Adhikarana 26 (29) · Śloka 29

প্রকরণানুপূর্ব্যাঽভিহিতং বিধানম্ | যথা- সক্থিমর্মাণ্যেকাদশ প্রকরণানুপূর্ব্যাঽভিহিতানি ||২৯||

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प्रकरणानुपूर्व्याऽभिहितं विधानम् | यथा- सक्थिमर्माण्येकादश प्रकरणानुपूर्व्याऽभिहितानि ||२९||

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Adhikarana 27 (30) · Śloka 30

এবং বক্ষ্যতীত্যনাগতাবেক্ষণম্ | যথা- শ্লোকস্থানে ব্রূযাত্- চিকিত্সিতেষু বক্ষ্যামীতি ||৩০||

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एवं वक्ष्यतीत्यनागतावेक्षणम् | यथा- श्लोकस्थाने ब्रूयात्- चिकित्सितेषु वक्ष्यामीति ||३०||

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Adhikarana 28 (31) · Śloka 31

যত্পূর্বমুক্তং তদতিক্রান্তাবেক্ষণম্ | যথা- চিকিত্সিতেষু ব্রূযাত্- শ্লোকস্থানে যদীরিতমিতি ||৩১||

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यत्पूर्वमुक्तं तदतिक्रान्तावेक्षणम् | यथा- चिकित्सितेषु ब्रूयात्- श्लोकस्थाने यदीरितमिति ||३१||

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Adhikarana 29 (32) · Śloka 32

উভযহেতুদর্শনং সংশযঃ | যথা - তলহৃদযাভিঘাতঃ প্রাণহরঃ, পাণিপাদচ্ছেদনমপ্রাণহরমিতি ||৩২||

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उभयहेतुदर्शनं संशयः | यथा - तलहृदयाभिघातः प्राणहरः, पाणिपादच्छेदनमप्राणहरमिति ||३२||

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Adhikarana 30 (33) · Śloka 33

তন্ত্রেঽতিশযোপবর্ণনং ব্যাখ্যানম্ | যথা- ইহ পঞ্চবিংশতিকঃ পুরূষো ব্যাখ্যাযতে, অন্যেষ্বাযুর্বেদতন্ত্রেষু ভূতাদিপ্রভৃত্যারভ্য চিন্তা ||৩৩||

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तन्त्रेऽतिशयोपवर्णनं व्याख्यानम् | यथा- इह पञ्चविंशतिकः पुरूषो व्याख्यायते, अन्येष्वायुर्वेदतन्त्रेषु भूतादिप्रभृत्यारभ्य चिन्ता ||३३||

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Adhikarana 31 (34) · Śloka 34

অন্যশাস্ত্রাসামান্যা স্বসঞ্জ্ঞা | যথা- মিথুনমিতি মধুসর্পিষোর্গ্রগণং; লোকপ্রসিদ্ধমুদাহরণং বা ||৩৪||

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अन्यशास्त्रासामान्या स्वसञ्ज्ञा | यथा- मिथुनमिति मधुसर्पिषोर्ग्रगणं; लोकप्रसिद्धमुदाहरणं वा ||३४||

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Adhikarana 32 (35) · Śloka 35

নিশ্চিতং বচনং নির্বচনম্ | যথা- আযুর্বিদ্যতেঽস্মিন্ননেন বা আযুর্বিন্দতীত্যাযুর্বেদঃ ||৩৫||

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निश्चितं वचनं निर्वचनम् | यथा- आयुर्विद्यतेऽस्मिन्ननेन वा आयुर्विन्दतीत्यायुर्वेदः ||३५||

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Adhikarana 33 (36) · Śloka 36

দৃষ্টান্তব্যক্তির্নিদর্শনম্ | যথা- অগ্নির্বাযুনা সহিতঃ কক্ষে বৃর্দ্ধি গচ্ছতি তথা বাতপিত্তকফদুষ্টো ব্রণ ইতি ||৩৬||

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दृष्टान्तव्यक्तिर्निदर्शनम् | यथा- अग्निर्वायुना सहितः कक्षे वृर्द्धि गच्छति तथा वातपित्तकफदुष्टो व्रण इति ||३६||

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Adhikarana 34 (37) · Śloka 37

ইদমেব কর্তব্যমিতি নিযোগঃ | যথা- পথ্যমেব ভোক্তব্যমিতি ||৩৭||

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इदमेव कर्तव्यमिति नियोगः | यथा- पथ्यमेव भोक्तव्यमिति ||३७||

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Adhikarana 35 (38) · Śloka 38

ইদং চেদং চেতি সমুচ্চযঃ | যথা- মাংসবর্গে এণহরিণাদযো লাবতিত্তিরিশারঙ্গশ্চ প্রধানানীতি ||৩৮||

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इदं चेदं चेति समुच्चयः | यथा- मांसवर्गे एणहरिणादयो लावतित्तिरिशारङ्गश्च प्रधानानीति ||३८||

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Adhikarana 36 (39) · Śloka 39

ইদং বেদং বেতি বিকল্পঃ | যথা- রসৌদনঃ সঘৃতা যবাগূর্বা (ভবত্বিতি) ||৩৯||

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इदं वेदं वेति विकल्पः | यथा- रसौदनः सघृता यवागूर्वा (भवत्विति) ||३९||

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Adhikarana 37 (40) · Śloka 40

যদনির্দিষ্টং বুদ্ধযাঽবগম্যতে তদূহ্যম্ | যথা- অভিহিতমন্নপানবিধৌ চতুর্বিধং চান্নমুপদিশ্যতে- ভক্ষ্যং ভোজ্যং লেহ্যং পেযমিতি, এবং চতুর্বিধে বক্তব্যে দ্বিবিধমভিহিতম্; ইদমত্রোহ্যম্- অন্নপানে বিশিষ্টযোর্দ্বযোর্গ্রহণে কৃতে চতুর্ণামপি গ্রহণং ভবতীতি; চতুর্বিধশ্চাহারঃ প্রবিরলঃ, প্রাযেণ দ্বিবিধ এব; অতো দ্বিত্বং প্রসিদ্ধমিতি | কিঞ্চান্যত্- অন্নেন ভক্ষ্যমবরুদ্ধং, ঘনসাধর্ম্যাত্; পেযেন লেহ্যং, দ্রবসাধর্ম্যাত্ ||৪০||

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यदनिर्दिष्टं बुद्धयाऽवगम्यते तदूह्यम् | यथा- अभिहितमन्नपानविधौ चतुर्विधं चान्नमुपदिश्यते- भक्ष्यं भोज्यं लेह्यं पेयमिति, एवं चतुर्विधे वक्तव्ये द्विविधमभिहितम्; इदमत्रोह्यम्- अन्नपाने विशिष्टयोर्द्वयोर्ग्रहणे कृते चतुर्णामपि ग्रहणं भवतीति; चतुर्विधश्चाहारः प्रविरलः, प्रायेण द्विविध एव; अतो द्वित्वं प्रसिद्धमिति | किञ्चान्यत्- अन्नेन भक्ष्यमवरुद्धं, घनसाधर्म्यात्; पेयेन लेह्यं, द्रवसाधर्म्यात् ||४०||

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Adhikarana 38 (41-43) · Śloka 43

ভবন্তি চাত্র- সামান্যদর্শনেনাসাং ব্যবস্থা সম্প্রদর্শিতা | বিশেষস্তু যথাযোগমুপধার্যো বিপশ্চিতা ||৪১|| দ্বাত্রিংশদ্যুক্তযো হ্যেতাস্তন্ত্রসারগবেষণে | মযা সম্যগ্বিনিহিতাঃ শব্দার্থন্যাযসংযুতাঃ ||৪২|| যো হ্যোতা বিধিবদ্বেত্তি দীপীভূতাস্তু বুদ্ধিমান্ | স পূজার্হো ভিষক্শ্রেষ্ঠ ইতি ধন্বন্তরের্মতম্ ||৪৩||

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भवन्ति चात्र- सामान्यदर्शनेनासां व्यवस्था सम्प्रदर्शिता | विशेषस्तु यथायोगमुपधार्यो विपश्चिता ||४१|| द्वात्रिंशद्युक्तयो ह्येतास्तन्त्रसारगवेषणे | मया सम्यग्विनिहिताः शब्दार्थन्यायसंयुताः ||४२|| यो ह्योता विधिवद्वेत्ति दीपीभूतास्तु बुद्धिमान् | स पूजार्हो भिषक्श्रेष्ठ इति धन्वन्तरेर्मतम् ||४३||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 65

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রে তন্ত্রভূষণাধ্যাযেষু তন্ত্রযুক্তির্নাম (তৃতীযোঽধ্যাযঃ, আদিতঃ) পঞ্চষষ্টিমোঽধ্যাযঃ ||৬৫||

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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रे तन्त्रभूषणाध्यायेषु तन्त्रयुक्तिर्नाम (तृतीयोऽध्यायः, आदितः) पञ्चषष्टिमोऽध्यायः ||६५||

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