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52. kāsapratiṣēdhādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ কাসপ্রতিষেধমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः कासप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

উক্তা যে হেতবো নৄণাং রোগযোঃ শ্বাসহিক্কযোঃ | কাসস্যাপি চ বিজ্ঞেযাস্ত এবোত্পত্তিহেতবঃ ||৩||

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उक्ता ये हेतवो नॄणां रोगयोः श्वासहिक्कयोः | कासस्यापि च विज्ञेयास्त एवोत्पत्तिहेतवः ||३||

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Adhikarana 3 (4-5) · Śloka 5

ধূমোপঘাতাদ্রজসস্তথৈব ব্যাযামরূক্ষান্ননিষেবণাচ্চ | বিমার্গগত্বাদপি ভোজনস্য বেগাবরোধাত্ ক্ষবথোস্তথৈব ||৪|| প্রাণো হ্যুদানানুগতঃ প্রদুষ্টঃ সম্ভিন্নকাংস্যস্বনতুল্যঘোষঃ | নিরেতি বক্ত্রাত্ সহসা সদোষঃ কাসঃ স বিদ্বদ্ভিরুদাহৃতস্তু ||৫||

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धूमोपघाताद्रजसस्तथैव व्यायामरूक्षान्ननिषेवणाच्च | विमार्गगत्वादपि भोजनस्य वेगावरोधात् क्षवथोस्तथैव ||४|| प्राणो ह्युदानानुगतः प्रदुष्टः सम्भिन्नकांस्यस्वनतुल्यघोषः | निरेति वक्त्रात् सहसा सदोषः कासः स विद्वद्भिरुदाहृतस्तु ||५||

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Adhikarana 4 (6) · Śloka 6

স বাতপিত্তপ্রভবঃ কফাচ্চ ক্ষতাত্তথাঽন্যঃ ক্ষযজোঽপরশ্চ | পঞ্চপ্রকারঃ কথিতো ভিষগ্ভির্বিবর্ধিতো যক্ষ্মবিকারকৃত্ স্যাত্ ||৬||

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स वातपित्तप्रभवः कफाच्च क्षतात्तथाऽन्यः क्षयजोऽपरश्च | पञ्चप्रकारः कथितो भिषग्भिर्विवर्धितो यक्ष्मविकारकृत् स्यात् ||६||

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Adhikarana 5 (7) · Śloka 7

ভবিষ্যতস্তস্য তু কণ্ঠকণ্ডূর্ভোজ্যোপরোধো গলতালুলেপঃ | স্বশব্দবৈষম্যমরোচকোঽগ্নিসাদশ্চ লিঙ্গানি ভবন্ত্যমূনি ||৭||

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भविष्यतस्तस्य तु कण्ठकण्डूर्भोज्योपरोधो गलतालुलेपः | स्वशब्दवैषम्यमरोचकोऽग्निसादश्च लिङ्गानि भवन्त्यमूनि ||७||

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Adhikarana 6 (8) · Śloka 8

হৃচ্ছঙ্খমূর্ধোদরপার্শ্বশূলী ক্ষামাননঃ ক্ষীণবলস্বরৌজাঃ | প্রসক্তমন্তঃকফমীরণেন কাসেত্তু শুষ্কং স্বরভেদযুক্তঃ ||৮||

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हृच्छङ्खमूर्धोदरपार्श्वशूली क्षामाननः क्षीणबलस्वरौजाः | प्रसक्तमन्तःकफमीरणेन कासेत्तु शुष्कं स्वरभेदयुक्तः ||८||

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Adhikarana 7 (9) · Śloka 9

উরোবিদাহজ্বরবক্ত্রশোষৈরভ্যর্দিতস্তিক্তমুখস্তৃষার্তঃ | পিত্তেন পীতানি বমেত্ কটূনি কাসেত্ স পাণ্ডুঃ পরিদহ্যমানঃ ||৯||

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उरोविदाहज्वरवक्त्रशोषैरभ्यर्दितस्तिक्तमुखस्तृषार्तः | पित्तेन पीतानि वमेत् कटूनि कासेत् स पाण्डुः परिदह्यमानः ||९||

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Adhikarana 8 (10) · Śloka 10

প্র(বি)লিপ্যমানেন মুখেন সীদন্ শিরোরুজার্তঃ কফপূর্ণদেহঃ | অভক্তরুগ্গৌরবসাদযুক্তঃ কাসেত না সান্দ্রকফং কফেন ||১০||

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प्र(वि)लिप्यमानेन मुखेन सीदन् शिरोरुजार्तः कफपूर्णदेहः | अभक्तरुग्गौरवसादयुक्तः कासेत ना सान्द्रकफं कफेन ||१०||

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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11

বক্ষোঽতিমাত্রং বিহতং তু যস্য ব্যাযামভারাধ্যযনাভিঘাতৈঃ | বিশ্লিষ্টবক্ষাঃ স নরঃ সরক্তং ষ্ঠীবত্যভীক্ষ্ণং ক্ষতজং তমাহুঃ ||১১||

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वक्षोऽतिमात्रं विहतं तु यस्य व्यायामभाराध्ययनाभिघातैः | विश्लिष्टवक्षाः स नरः सरक्तं ष्ठीवत्यभीक्ष्णं क्षतजं तमाहुः ||११||

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Adhikarana 10 (12) · Śloka 13

স গাত্রশূলজ্বরদাহমোহান্ প্রাণক্ষযং চোপলভেত কাসী | শুষ্যন্ বিনিষ্ঠীবতি দুর্বলস্তু প্রক্ষীণমাংসো রুধিরং সপূযম্ ||১২|| সসর্বলিঙ্গং ভৃশদুশ্চিকিত্স্যং চিকিত্সিতজ্ঞাঃ ক্ষযজং বদন্তি |১৩|

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स गात्रशूलज्वरदाहमोहान् प्राणक्षयं चोपलभेत कासी | शुष्यन् विनिष्ठीवति दुर्बलस्तु प्रक्षीणमांसो रुधिरं सपूयम् ||१२|| ससर्वलिङ्गं भृशदुश्चिकित्स्यं चिकित्सितज्ञाः क्षयजं वदन्ति |१३|

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Adhikarana 11 (13) · Śloka 13

বৃদ্ধত্বমাসাদ্য ভবেত্তু যো বৈ যাপ্যং তমাহুর্ভিষজস্তু কাসম্ ||১৩||

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वृद्धत्वमासाद्य भवेत्तु यो वै याप्यं तमाहुर्भिषजस्तु कासम् ||१३||

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Adhikarana 12 (14) · Śloka 14

শৃঙ্গীবচাকট্ফলকত্তৃণাব্দধান্যাভযাভার্গ্যমরাহ্ববিশ্বম্ | উষ্ণাম্বুনা হিঙ্গুযুতং তু পীত্বা বদ্ধাস্যমপ্যাশু জহাতি কাসম্ ||১৪||

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शृङ्गीवचाकट्फलकत्तृणाब्दधान्याभयाभार्ग्यमराह्वविश्वम् | उष्णाम्बुना हिङ्गुयुतं तु पीत्वा बद्धास्यमप्याशु जहाति कासम् ||१४||

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Adhikarana 13 (15) · Śloka 15

ফলত্রিকব্যোষবিডঙ্গশৃঙ্গীরাস্নাবচাপদ্মকদেবকাষ্ঠৈঃ | লেহঃ সমৈঃ ক্ষৌদ্রসিতাঘৃতাক্তঃ কাসং নিহন্যাদচিরাদুদীর্ণম্ ||১৫||

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फलत्रिकव्योषविडङ्गशृङ्गीरास्नावचापद्मकदेवकाष्ठैः | लेहः समैः क्षौद्रसिताघृताक्तः कासं निहन्यादचिरादुदीर्णम् ||१५||

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Adhikarana 14 (16) · Śloka 16

পথ্যাং সিতামামলকানি লাজাং সমাগধীং চাপি বিচূর্ণ্য শুণ্ঠীম্ | সর্পির্মধুভ্যাং বিলিহীত কাসী সসৈন্ধবাং বোষ্ণজলেন কৃষ্ণাম্ ||১৬||

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पथ्यां सितामामलकानि लाजां समागधीं चापि विचूर्ण्य शुण्ठीम् | सर्पिर्मधुभ्यां विलिहीत कासी ससैन्धवां वोष्णजलेन कृष्णाम् ||१६||

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Adhikarana 15 (17-18) · Śloka 18

খাদেদ্গুডং নাগরপিপ্পলীভ্যাং দ্রাক্ষাং চ সর্পির্মধুনাঽবলিহ্যাত্ | দ্রাক্ষাং সিতাং মাগধিকাং চ তুল্যাং সশৃঙ্গবেরং মধুকং তুগাং চ ||১৭|| লিহ্যাদ্ঘৃতক্ষৌদ্রযুতাং সমাংশাং সিতোপলাং বা মরিচাংশযুক্তাম্ | ধাত্রীকণাবিশ্বসিতোপলাশ্চ সঞ্চূর্ণ্য মণ্ডেন পিবেচ্চ দধ্নঃ ||১৮||

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खादेद्गुडं नागरपिप्पलीभ्यां द्राक्षां च सर्पिर्मधुनाऽवलिह्यात् | द्राक्षां सितां मागधिकां च तुल्यां सशृङ्गवेरं मधुकं तुगां च ||१७|| लिह्याद्घृतक्षौद्रयुतां समांशां सितोपलां वा मरिचांशयुक्ताम् | धात्रीकणाविश्वसितोपलाश्च सञ्चूर्ण्य मण्डेन पिबेच्च दध्नः ||१८||

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Adhikarana 16 (19-20) · Śloka 20

হরেণুকাং মাগধিকাং চ তুল্যাং দধ্না পিবেত্ কাসগদাভিভূতঃ | উভে হরিদ্রে সুরদারুশুণ্ঠীং গাযত্রিসারং চ পিবেত্ সমাংশম্ ||১৯|| বস্তস্য মূত্রেণ সুখাম্বুনা বা দন্তীং দ্রবন্তীং চ সতিল্বকাখ্যাম্ | ভৃষ্টানি সর্পীংষ্যথ বাদরাণি খাদেত্ পলাশানি সসৈন্ধবানি ||২০||

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हरेणुकां मागधिकां च तुल्यां दध्ना पिबेत् कासगदाभिभूतः | उभे हरिद्रे सुरदारुशुण्ठीं गायत्रिसारं च पिबेत् समांशम् ||१९|| बस्तस्य मूत्रेण सुखाम्बुना वा दन्तीं द्रवन्तीं च सतिल्वकाख्याम् | भृष्टानि सर्पींष्यथ बादराणि खादेत् पलाशानि ससैन्धवानि ||२०||

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Adhikarana 17 (21) · Śloka 21

কোলপ্রমাণং প্রপিবেদ্ধি হিঙ্গু সৌবীরকেণাম্লরসেন বাঽপি |২১|

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कोलप्रमाणं प्रपिबेद्धि हिङ्गु सौवीरकेणाम्लरसेन वाऽपि |२१|

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Adhikarana 18 (21) · Śloka 22

ক্ষৌদ্রেণ লিহ্যান্মরিচানি বাঽপি ভার্গীবচাহিঙ্গুকৃতা চ বর্তিঃ ||২১|| ধূমে প্রশস্তা ঘৃতসম্প্রযুক্তা বেণুত্বগেলালবণৈঃ কৃতা বা |২২|

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क्षौद्रेण लिह्यान्मरिचानि वाऽपि भार्गीवचाहिङ्गुकृता च वर्तिः ||२१|| धूमे प्रशस्ता घृतसम्प्रयुक्ता वेणुत्वगेलालवणैः कृता वा |२२|

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Adhikarana 19 (22) · Śloka 23

মুস্তেঙ্গুদীত্বঙ্মধুকাহ্বমাংসীমনঃশিলালৈশ্ছগলাম্বুপিষ্টৈঃ ||২২|| বিধায বর্তীশ্চ পযোঽনুপানং ধূমং পিবেদ্বাতবলাসকাসী |২৩|

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मुस्तेङ्गुदीत्वङ्मधुकाह्वमांसीमनःशिलालैश्छगलाम्बुपिष्टैः ||२२|| विधाय वर्तीश्च पयोऽनुपानं धूमं पिबेद्वातबलासकासी |२३|

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Adhikarana 20 (23) · Śloka 23

পিবেচ্চ সীধুং মরিচান্বিতং বা তেনাশু কাসং জযতি প্রসহ্য ||২৩||

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पिबेच्च सीधुं मरिचान्वितं वा तेनाशु कासं जयति प्रसह्य ||२३||

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Adhikarana 21 (24) · Śloka 24

দ্রাক্ষাম্বুমঞ্জিষ্ঠপুরাহ্বযাভিঃ ক্ষীরং শৃতং মাক্ষিকসম্প্রযুক্তম্ |২৪|

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द्राक्षाम्बुमञ्जिष्ठपुराह्वयाभिः क्षीरं शृतं माक्षिकसम्प्रयुक्तम् |२४|

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Adhikarana 22 (24) · Śloka 24

নিদিগ্ধিকানাগরপিপ্পলীভিঃ খাদেচ্চ মুদ্গান্মধুনা সুসিদ্ধান্ ||২৪||

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निदिग्धिकानागरपिप्पलीभिः खादेच्च मुद्गान्मधुना सुसिद्धान् ||२४||

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Adhikarana 23 (25) · Śloka 25

উত্কারিকাং সর্পিষি নাগরাঢ্যাং পক্ত্বা সমূলৈস্ত্রুটিকোলপত্রৈঃ | এভির্নিষেবেত কৃতাং চ পেযাং তন্বীং সুশীতাং মধুনা বিমিশ্রাম্ ||২৫||

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उत्कारिकां सर्पिषि नागराढ्यां पक्त्वा समूलैस्त्रुटिकोलपत्रैः | एभिर्निषेवेत कृतां च पेयां तन्वीं सुशीतां मधुना विमिश्राम् ||२५||

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Adhikarana 24 (26) · Śloka 26

যত্ প্লীহ্নি সর্পির্বিহিতং ষডঙ্গং তদ্বাতকাসং জযতি প্রসহ্য | বিদারিগন্ধাদিকৃতং ঘৃতং বা রসেন বা বাসকজেন পক্বম্ ||২৬||

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यत् प्लीह्नि सर्पिर्विहितं षडङ्गं तद्वातकासं जयति प्रसह्य | विदारिगन्धादिकृतं घृतं वा रसेन वा वासकजेन पक्वम् ||२६||

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Adhikarana 25 (27) · Śloka 28

বিরেচনং স্নৈহিকমত্র চোক্তমাস্থাপনং চাপ্যনুবাসনং চ | ধূমং পিবেত্ স্নৈহিকমপ্রমত্তঃ পিবেত্ সুখোষ্ণং ঘৃতমেব চাত্র ||২৭|| হিতা যবাগ্বশ্চ রসেষু সিদ্ধাঃ পযাংসি লেহাঃ সঘৃতাস্তথৈব |২৮|

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विरेचनं स्नैहिकमत्र चोक्तमास्थापनं चाप्यनुवासनं च | धूमं पिबेत् स्नैहिकमप्रमत्तः पिबेत् सुखोष्णं घृतमेव चात्र ||२७|| हिता यवाग्वश्च रसेषु सिद्धाः पयांसि लेहाः सघृतास्तथैव |२८|

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Adhikarana 26 (28-31) · Śloka 32

প্রচ্ছর্দনং কাযশিরোবিরেকাস্তথৈব ধূমাঃ কবলগ্রহাশ্চ ||২৮|| উষ্ণাশ্চ লেহাঃ কটুকা নিহন্যুঃ কফং বিশেষেণ বিশোষণং চ | কটুত্রিকং চাপি বদন্তি পথ্যং ঘৃতং কৃমিঘ্নস্বরসে বিপক্বম্ ||২৯|| নির্গুণ্ডিপত্রস্বরসে চ পক্বং সর্পিঃ কফোত্থং বিনিহন্তি কাসম্ | পাঠাবিডব্যোষবিডঙ্গসিন্ধুত্রিকণ্টরাস্নাহুতভুগ্বলাভিঃ ||৩০|| শৃঙ্গীবচাম্ভোধরদেবদারুদুরালভাভার্গ্যভযাশটীভিঃ | সম্যগ্বিপক্বং দ্বিগুণেন সর্পির্নিদিগ্ধিকাযাঃ স্বরসেন চৈতত্ ||৩১|| শ্বাসাগ্নিসাদস্বরভেদভিন্নান্নিহন্ত্যুদীর্ণানপি পঞ্চ কাসান্ |৩২|

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प्रच्छर्दनं कायशिरोविरेकास्तथैव धूमाः कवलग्रहाश्च ||२८|| उष्णाश्च लेहाः कटुका निहन्युः कफं विशेषेण विशोषणं च | कटुत्रिकं चापि वदन्ति पथ्यं घृतं कृमिघ्नस्वरसे विपक्वम् ||२९|| निर्गुण्डिपत्रस्वरसे च पक्वं सर्पिः कफोत्थं विनिहन्ति कासम् | पाठाविडव्योषविडङ्गसिन्धुत्रिकण्टरास्नाहुतभुग्बलाभिः ||३०|| शृङ्गीवचाम्भोधरदेवदारुदुरालभाभार्ग्यभयाशटीभिः | सम्यग्विपक्वं द्विगुणेन सर्पिर्निदिग्धिकायाः स्वरसेन चैतत् ||३१|| श्वासाग्निसादस्वरभेदभिन्नान्निहन्त्युदीर्णानपि पञ्च कासान् |३२|

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Adhikarana 27 (32-33) · Śloka 33

বিদারিগন্ধোত্পলসারিবাদীন্ নিষ্ক্বাথ্য বর্গং মধুরং চ কৃত্স্নম্ ||৩২|| ঘৃতং পচেদিক্ষুরসাম্বুদুগ্ধৈঃ কাকোলিবর্গে চ সশর্করং তত্ | প্রাতঃ পিবেত্ পিত্তকৃতে চ কাসে রতিপ্রসূতে ক্ষতজে চ কাসে ||৩৩||

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विदारिगन्धोत्पलसारिवादीन् निष्क्वाथ्य वर्गं मधुरं च कृत्स्नम् ||३२|| घृतं पचेदिक्षुरसाम्बुदुग्धैः काकोलिवर्गे च सशर्करं तत् | प्रातः पिबेत् पित्तकृते च कासे रतिप्रसूते क्षतजे च कासे ||३३||

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Adhikarana 28 (34) · Śloka 34

খর্জূরভার্গীমগধাপ্রিযালমধূলিকৈলামলকৈঃ সমাংশৈঃ | চূর্ণং সিতাক্ষৌদ্রঘৃতপ্রগাঢং ত্রীন্ হন্তি কাসানুপযুজ্যমানম্ ||৩৪||

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खर्जूरभार्गीमगधाप्रियालमधूलिकैलामलकैः समांशैः | चूर्णं सिताक्षौद्रघृतप्रगाढं त्रीन् हन्ति कासानुपयुज्यमानम् ||३४||

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Adhikarana 29 (35) · Śloka 35

রক্তাহরিদ্রাঞ্জনবহ্নিপাঠামূর্বোপকুল্যা বিলিহেত্ সমাংশাঃ | ক্ষৌদ্রেণ কাসে ক্ষতজে ক্ষযোত্থে পিবেদ্ঘৃতং চেক্ষুরসে বিপক্বম্ ||৩৫||

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रक्ताहरिद्राञ्जनवह्निपाठामूर्वोपकुल्या विलिहेत् समांशाः | क्षौद्रेण कासे क्षतजे क्षयोत्थे पिबेद्घृतं चेक्षुरसे विपक्वम् ||३५||

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Adhikarana 30 (36) · Śloka 36

চূর্ণং পিবেদামলকস্য বাঽপি ক্ষীরেণ পক্বং সঘৃতং হিতাশী |৩৬|

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चूर्णं पिबेदामलकस्य वाऽपि क्षीरेण पक्वं सघृतं हिताशी |३६|

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Adhikarana 31 (36) · Śloka 37

চূর্ণানি গোধূমযবোদ্ভবানি কাকোলিবর্গশ্চ কৃতঃ সুসূক্ষ্মঃ ||৩৬|| কাসেষু পেযস্ত্রিষু কাসবদ্ভিঃ ক্ষীরেণ সক্ষৌদ্রঘৃতেন বাঽপি |৩৭|

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चूर्णानि गोधूमयवोद्भवानि काकोलिवर्गश्च कृतः सुसूक्ष्मः ||३६|| कासेषु पेयस्त्रिषु कासवद्भिः क्षीरेण सक्षौद्रघृतेन वाऽपि |३७|

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Adhikarana 32 (37) · Śloka 37

গুডোদকং বা ক্বথিতং পিবেদ্ধি ক্ষৌদ্রেণ শীতং মরিচোপদংশম্ ||৩৭||

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गुडोदकं वा क्वथितं पिबेद्धि क्षौद्रेण शीतं मरिचोपदंशम् ||३७||

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Adhikarana 33 (38-41) · Śloka 41

প্রস্থত্রযেণামলকীরসস্য শুদ্ধস্য দত্ত্বাঽর্ধতুলাং গুডস্য | চূর্ণীকৃতৈর্গ্রন্থিকচব্যজীরব্যোষেভকৃষ্ণাহপুষাজমোদৈঃ ||৩৮|| বিডঙ্গসিন্ধুত্রিফলাযবানীপাঠাগ্নিধান্যৈশ্চ পিচুপ্রমাণৈঃ | দত্ত্বা ত্রিবৃচ্চূর্ণপলানি চাষ্টাবষ্টৌ চ তৈলস্য পচেদ্যথাবত্ ||৩৯|| তং ভক্ষযেদক্ষফলপ্রমাণং যথেষ্টচেষ্টস্ত্রিসুগন্ধিযুক্তম্ | অনেন সর্বে গ্রহণীবিকারাঃ সশ্বাসকাসস্বরভেদশোথাঃ ||৪০|| শাম্যন্তি চাযং চিরমন্তরগ্নের্হতস্য পুংস্ত্বস্য চ বৃদ্ধিহেতুঃ | স্ত্রীণাং চ বন্ধ্যামযনাশনঃ স্যাত্ কল্যাণকো নাম গুডঃ প্রতীতঃ ||৪১||

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प्रस्थत्रयेणामलकीरसस्य शुद्धस्य दत्त्वाऽर्धतुलां गुडस्य | चूर्णीकृतैर्ग्रन्थिकचव्यजीरव्योषेभकृष्णाहपुषाजमोदैः ||३८|| विडङ्गसिन्धुत्रिफलायवानीपाठाग्निधान्यैश्च पिचुप्रमाणैः | दत्त्वा त्रिवृच्चूर्णपलानि चाष्टावष्टौ च तैलस्य पचेद्यथावत् ||३९|| तं भक्षयेदक्षफलप्रमाणं यथेष्टचेष्टस्त्रिसुगन्धियुक्तम् | अनेन सर्वे ग्रहणीविकाराः सश्वासकासस्वरभेदशोथाः ||४०|| शाम्यन्ति चायं चिरमन्तरग्नेर्हतस्य पुंस्त्वस्य च वृद्धिहेतुः | स्त्रीणां च वन्ध्यामयनाशनः स्यात् कल्याणको नाम गुडः प्रतीतः ||४१||

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Adhikarana 34 (42-46) · Śloka 46

দ্বিপঞ্চমূলেভকণাত্মগুপ্তাভার্গীশটীপুষ্করমূলবিশ্বান্ | পাঠামৃতাগ্রন্থিকশঙ্খপুষ্পীরাস্নাগ্ন্যপামার্গবলাযবাসান্ ||৪২|| দ্বিপালিকান্ ন্যস্য যবাঢকং চ হরীতকীনাং চ শতং গুরূণাম্ | দ্রোণে জলস্যাঢকসংযুতে চ ক্বাথে কৃতে পূতচতুর্থভাগে ||৪৩|| পচেত্তুলাং শুদ্ধগুডস্য দত্ত্বা পৃথক্ চ তৈলাত্ কুডবং ঘৃতাচ্চ | চূর্ণং চ তাবন্মগধোদ্ভবাযা দেযং চ তস্মিন্মধু সিদ্ধশীতে ||৪৪|| রসাযনাত্ কর্ষমতো বিলিহ্যাদ্দ্বে চাভযে নিত্যমথাশু হন্যাত্ | তদ্রাজযক্ষ্মগ্রহণীপ্রদোষশোফাগ্নিমান্দ্যস্বরভেদকাসান্ ||৪৫|| পাণ্ড্বামযশ্বাসশিরোবিকারান্ হৃদ্রোগহিক্কাবিষমজ্বরাংশ্চ | মেধাবলোত্সাহমতিপ্রদং চ চকার চৈতদ্ভগবানগস্ত্যঃ ||৪৬||

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द्विपञ्चमूलेभकणात्मगुप्ताभार्गीशटीपुष्करमूलविश्वान् | पाठामृताग्रन्थिकशङ्खपुष्पीरास्नाग्न्यपामार्गबलायवासान् ||४२|| द्विपालिकान् न्यस्य यवाढकं च हरीतकीनां च शतं गुरूणाम् | द्रोणे जलस्याढकसंयुते च क्वाथे कृते पूतचतुर्थभागे ||४३|| पचेत्तुलां शुद्धगुडस्य दत्त्वा पृथक् च तैलात् कुडवं घृताच्च | चूर्णं च तावन्मगधोद्भवाया देयं च तस्मिन्मधु सिद्धशीते ||४४|| रसायनात् कर्षमतो विलिह्याद्द्वे चाभये नित्यमथाशु हन्यात् | तद्राजयक्ष्मग्रहणीप्रदोषशोफाग्निमान्द्यस्वरभेदकासान् ||४५|| पाण्ड्वामयश्वासशिरोविकारान् हृद्रोगहिक्काविषमज्वरांश्च | मेधाबलोत्साहमतिप्रदं च चकार चैतद्भगवानगस्त्यः ||४६||

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Adhikarana 35 (47-48) · Śloka 48

কুলীরশুক্তীচটকৈণলাবান্নিষ্ক্বাথ্য বর্গং মধুরং চ কৃত্স্নম্ | পচেদ্ঘৃতং তত্তু নিষেব্যমাণং হন্যাত্ ক্ষতোত্থং ক্ষযজং চ কাসম্ ||৪৭|| শতাবরীনাগবলাবিপক্বং ঘৃতং বিধেযং চ হিতায কাসিনাম্ ||৪৮||

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कुलीरशुक्तीचटकैणलावान्निष्क्वाथ्य वर्गं मधुरं च कृत्स्नम् | पचेद्घृतं तत्तु निषेव्यमाणं हन्यात् क्षतोत्थं क्षयजं च कासम् ||४७|| शतावरीनागबलाविपक्वं घृतं विधेयं च हिताय कासिनाम् ||४८||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 52

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে কাযচিকিত্সাতন্ত্রে কাসপ্রতিষেধো নাম (চতুর্দশোঽধ্যাযঃ, আদিতঃ) দ্বিপঞ্চাশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৫২||

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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे कासप्रतिषेधो नाम (चतुर्दशोऽध्यायः, आदितः) द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ||५२||

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