Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 3
অথাতঃ শ্বাসপ্রতিষেধং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
যৈরেব কারণৈর্হিক্কা বহুভিঃ সম্প্রবর্ততে |
তৈরেব কারণৈঃ শ্বাসো ঘোরো ভবতি দেহিনাম্ ||৩||
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अथातः श्वासप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
यैरेव कारणैर्हिक्का बहुभिः सम्प्रवर्तते |
तैरेव कारणैः श्वासो घोरो भवति देहिनाम् ||३||
Adhikarana 2 (4) · Śloka 4
বিহায প্রকৃতিং বাযুঃ প্রাণোঽথ কফসংযুতঃ |
শ্বাসযত্যূর্ধ্বগো ভূত্বা তং শ্বাসং পরিচক্ষতে ||৪||
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विहाय प्रकृतिं वायुः प्राणोऽथ कफसंयुतः |
श्वासयत्यूर्ध्वगो भूत्वा तं श्वासं परिचक्षते ||४||
Adhikarana 3 (5) · Śloka 5
ক্ষুদ্রকস্তমকশ্ছিন্নো মহানূর্ধ্বশ্চ পঞ্চধা |
ভিদ্যতে স মহাব্যাধিঃ শ্বাস একো বিশেষতঃ ||৫||
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क्षुद्रकस्तमकश्छिन्नो महानूर्ध्वश्च पञ्चधा |
भिद्यते स महाव्याधिः श्वास एको विशेषतः ||५||
Adhikarana 4 (6) · Śloka 6
প্রাগ্রূপং তস্য হৃত্পীডা ভক্তদ্বেষোঽরতিঃ পরা |
আনাহঃ পার্শ্বযোঃ শূলং বৈরস্যং বদনস্য চ ||৬||
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प्राग्रूपं तस्य हृत्पीडा भक्तद्वेषोऽरतिः परा |
आनाहः पार्श्वयोः शूलं वैरस्यं वदनस्य च ||६||
Adhikarana 5 (7) · Śloka 7
কিঞ্চিদারভমাণস্য যস্য শ্বাসঃ প্রবর্ততে |
নিষণ্ণস্যৈতি শান্তিং চ স ক্ষুদ্র ইতি সঞ্জ্ঞিতঃ ||৭||
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किञ्चिदारभमाणस्य यस्य श्वासः प्रवर्तते |
निषण्णस्यैति शान्तिं च स क्षुद्र इति सञ्ज्ञितः ||७||
Adhikarana 6 (8-10) · Śloka 10
তৃট্স্বেদবমথুপ্রাযঃ কণ্ঠঘুর্ঘুরিকান্বিতঃ |
বিশেষাদ্দুর্দিনে তাম্যেচ্ছ্বাসঃ স তমকো মতঃ ||৮||
ঘোষেণ মহতাঽঽবিষ্টঃ সকাসঃ সকফো নরঃ |
যঃ শ্বসিত্যবলোঽন্নদ্বিট্ সুপ্তস্তমকপীডিতঃ ||৯||
স শাম্যতি কফে হীনে স্বপতশ্চ বিবর্ধতে |
মূর্চ্ছাজ্বরাভিভূতস্য জ্ঞেযঃ প্রতমকস্তু সঃ ||১০||
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तृट्स्वेदवमथुप्रायः कण्ठघुर्घुरिकान्वितः |
विशेषाद्दुर्दिने ताम्येच्छ्वासः स तमको मतः ||८||
घोषेण महताऽऽविष्टः सकासः सकफो नरः |
यः श्वसित्यबलोऽन्नद्विट् सुप्तस्तमकपीडितः ||९||
स शाम्यति कफे हीने स्वपतश्च विवर्धते |
मूर्च्छाज्वराभिभूतस्य ज्ञेयः प्रतमकस्तु सः ||१०||
Adhikarana 7 (11) · Śloka 11
আধ্মাতো দহ্যমানেন বস্তিনা সরুজং নরঃ |
সর্বপ্রাণেন বিচ্ছিন্নং শ্বস্যাচ্ছিন্নং তমাদিশেত্ ||১১||
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आध्मातो दह्यमानेन बस्तिना सरुजं नरः |
सर्वप्राणेन विच्छिन्नं श्वस्याच्छिन्नं तमादिशेत् ||११||
Adhikarana 8 (12) · Śloka 12
নিঃসঞ্জ্ঞঃ পার্শ্বশূলার্তঃ শুষ্ককণ্ঠোঽতিঘোষবান্ |
সংরব্ধনেত্রস্ত্বাযম্য যঃ শ্বস্যাত্ স মহান্ স্মৃতঃ ||১২||
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निःसञ्ज्ञः पार्श्वशूलार्तः शुष्ककण्ठोऽतिघोषवान् |
संरब्धनेत्रस्त्वायम्य यः श्वस्यात् स महान् स्मृतः ||१२||
Adhikarana 9 (13) · Śloka 13
মর্মস্বাযম্যমানেষু শ্বসন্মূঢো মুহুশ্চ যঃ |
ঊর্ধ্বপ্রেক্ষী হতরবস্তমূর্ধ্বশ্বাসমাদিশেত্ ||১৩||
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मर्मस्वायम्यमानेषु श्वसन्मूढो मुहुश्च यः |
ऊर्ध्वप्रेक्षी हतरवस्तमूर्ध्वश्वासमादिशेत् ||१३||
Adhikarana 10 (14) · Śloka 14
ক্ষুদ্রঃ সাধ্যতমস্তেষাং তমকঃ কৃচ্ছ্র উচ্যতে |
ত্রযঃ শ্বাসা ন সিধ্যন্তি তমকো দুর্বলস্য চ ||১৪||
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क्षुद्रः साध्यतमस्तेषां तमकः कृच्छ्र उच्यते |
त्रयः श्वासा न सिध्यन्ति तमको दुर्बलस्य च ||१४||
Adhikarana 11 (15) · Śloka 15
স্নেহবস্তিং বিনা কেচিদূর্ধ্বং চাধশ্চ শোধনম্ |
মৃদু প্রাণবতাং শ্রেষ্ঠং শ্বাসিনামাদিশন্তি হি ||১৫||
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स्नेहबस्तिं विना केचिदूर्ध्वं चाधश्च शोधनम् |
मृदु प्राणवतां श्रेष्ठं श्वासिनामादिशन्ति हि ||१५||
Adhikarana 12 (16) · Śloka 16
শ্বাসে কাসে চ হিক্কাযাং হৃদ্রোগে চাপি পূজিতম্ |
ঘৃতং পুরাণং সংসিদ্ধমভযাবিডরামঠৈঃ ||১৬||
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श्वासे कासे च हिक्कायां हृद्रोगे चापि पूजितम् |
घृतं पुराणं संसिद्धमभयाविडरामठैः ||१६||
Adhikarana 13 (17) · Śloka 18
সৌবর্চলাভযাবিল্বৈঃ সংস্কৃতং বাঽনবং ঘৃতম্ |
পিপ্পল্যাদিপ্রতীবাপং সিদ্ধং বা প্রথমে গণে ||১৭||
সপঞ্চলবণং সর্পিঃ শ্বাসকাসৌ ব্যপোহতি |১৮|
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सौवर्चलाभयाबिल्वैः संस्कृतं वाऽनवं घृतम् |
पिप्पल्यादिप्रतीवापं सिद्धं वा प्रथमे गणे ||१७||
सपञ्चलवणं सर्पिः श्वासकासौ व्यपोहति |१८|
Adhikarana 14 (18-20) · Śloka 21
হিংস্রাবিডঙ্গপূতীকত্রিফলাব্যোষচিত্রকৈঃ ||১৮||
দ্বিক্ষীরং সাধিতং সর্পিশ্চতুর্গুণজলাপ্লুতম্ |
কোলমাত্রৈঃ পিবেত্তদ্ধি শ্বাসকাসৌ ব্যপোহতি ||১৯||
অর্শাংস্যরোচকং গুল্মং শকৃদ্ভেদং ক্ষযং তথা |
কৃত্স্নে বৃষকষাযে বা পচেত্ সর্পিশ্চতুর্গুণে ||২০||
তন্মূলকুসুমাবাপং শীতং ক্ষৌদ্রেণ যোজযেত্ |২১|
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हिंस्राविडङ्गपूतीकत्रिफलाव्योषचित्रकैः ||१८||
द्विक्षीरं साधितं सर्पिश्चतुर्गुणजलाप्लुतम् |
कोलमात्रैः पिबेत्तद्धि श्वासकासौ व्यपोहति ||१९||
अर्शांस्यरोचकं गुल्मं शकृद्भेदं क्षयं तथा |
कृत्स्ने वृषकषाये वा पचेत् सर्पिश्चतुर्गुणे ||२०||
तन्मूलकुसुमावापं शीतं क्षौद्रेण योजयेत् |२१|
Adhikarana 15 (21-22) · Śloka 23
শৃঙ্গীমধূলিকাভার্গীশুণ্ঠীতার্ক্ষ্যসিতাম্বুদৈঃ ||২১||
সহরিদ্রৈঃ সযষ্ট্যাহ্বৈঃ সমৈরাবাপ্য যোগতঃ |
ঘৃতপ্রস্থং পচেদ্ধীমান্ শীততোযে চতুর্গুণে ||২২||
শ্বাসং কাসং তথা হিক্কাং সর্পিরেতন্নিযচ্ছতি |২৩|
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शृङ्गीमधूलिकाभार्गीशुण्ठीतार्क्ष्यसिताम्बुदैः ||२१||
सहरिद्रैः सयष्ट्याह्वैः समैरावाप्य योगतः |
घृतप्रस्थं पचेद्धीमान् शीततोये चतुर्गुणे ||२२||
श्वासं कासं तथा हिक्कां सर्पिरेतन्नियच्छति |२३|
Adhikarana 16 (23-24) · Śloka 25
সুবহা কালিকা ভার্গী শুকাখ্যা নৈচুলং ফলম্ ||২৩||
কাকাদনী শৃঙ্গবেরং বর্ষাভূর্বৃহতীদ্বযম্ |
কোলমাত্রৈর্ঘৃতপ্রস্থং পচেদেভির্জলদ্বিকম্ ||২৪||
কটূষ্ণং পীতমেতদ্ধি শ্বাসামযবিনাশনম্ |২৫|
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सुवहा कालिका भार्गी शुकाख्या नैचुलं फलम् ||२३||
काकादनी शृङ्गवेरं वर्षाभूर्बृहतीद्वयम् |
कोलमात्रैर्घृतप्रस्थं पचेदेभिर्जलद्विकम् ||२४||
कटूष्णं पीतमेतद्धि श्वासामयविनाशनम् |२५|
Adhikarana 17 (25-26) · Śloka 26
সৌবর্চলযবক্ষারকটুকাব্যোষচিত্রকৈঃ ||২৫||
বচাভযাবিডঙ্গৈশ্চ সাধিতং শ্বাসশান্তযে |
গোপবল্ল্যুদকে সিদ্ধং স্যাদন্যদ্দ্বিগুণে ঘৃতম্ ||২৬||
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सौवर्चलयवक्षारकटुकाव्योषचित्रकैः ||२५||
वचाभयाविडङ्गैश्च साधितं श्वासशान्तये |
गोपवल्ल्युदके सिद्धं स्यादन्यद्द्विगुणे घृतम् ||२६||
Adhikarana 18 (27) · Śloka 27
পঞ্চৈতানি হবীংষ্যাহুর্ভিষজঃ শ্বাসকাসযোঃ |২৭|
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पञ्चैतानि हवींष्याहुर्भिषजः श्वासकासयोः |२७|
Adhikarana 19 (27-29) · Śloka 29
তালীশতামলক্যুগ্রাজীবন্তীকুষ্ঠসৈন্ধবৈঃ ||২৭||
বিল্বপুষ্করভূতীকসৌবর্চলকণাগ্নিভিঃ |
পথ্যাতেজোবতীযুক্তৈঃ সর্পির্জলচতুর্গুণম্ ||২৮||
হিঙ্গুপাদযুতং সিদ্ধং সর্বশ্বাসহরং পরম্ |
বাসাঘৃতং ষট্পলং বা ঘৃতং চাত্র হিতং ভবেত্ ||২৯||
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तालीशतामलक्युग्राजीवन्तीकुष्ठसैन्धवैः ||२७||
बिल्वपुष्करभूतीकसौवर्चलकणाग्निभिः |
पथ्यातेजोवतीयुक्तैः सर्पिर्जलचतुर्गुणम् ||२८||
हिङ्गुपादयुतं सिद्धं सर्वश्वासहरं परम् |
वासाघृतं षट्पलं वा घृतं चात्र हितं भवेत् ||२९||
Adhikarana 20 (30) · Śloka 30
তৈলং দশগুণে সিদ্ধং ভৃঙ্গরাজরসে শুভে |
সেব্যমানং যথান্যাযং শ্বাসকাসৌ ব্যপোহতি ||৩০||
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तैलं दशगुणे सिद्धं भृङ्गराजरसे शुभे |
सेव्यमानं यथान्यायं श्वासकासौ व्यपोहति ||३०||
Adhikarana 21 (31) · Śloka 32
ফলাম্লা বিষ্কিররসাঃ স্নিগ্ধাঃ প্রব্যক্তসৈন্ধবাঃ |
এণাদীনাং শিরোভির্বা কৌলত্থা বা সুসংস্কৃতাঃ ||৩১||
হন্যুঃ শ্বাসং চ কাসং চ সংস্কৃতানি পযাংসি চ |৩২|
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फलाम्ला विष्किररसाः स्निग्धाः प्रव्यक्तसैन्धवाः |
एणादीनां शिरोभिर्वा कौलत्था वा सुसंस्कृताः ||३१||
हन्युः श्वासं च कासं च संस्कृतानि पयांसि च |३२|
Adhikarana 22 (32-35) · Śloka 35
তিমিরস্য চ বীজানি কর্কটাখ্যা চ চূর্ণিতা ||৩২||
দুরালভাঽথ পিপ্পল্যঃ কটুকাখ্যা হরীতকী |
শ্বাবিন্মযূররোমাণি কোলা মাগধিকাকণাঃ ||৩৩||
ভার্গীত্বক্ শৃঙ্গবেরং চ শর্করা শল্লকাঙ্গজম্ |
নৃত্তকৌণ্ডকবীজানি চূর্ণিতানি তু কেবলম্ ||৩৪||
পঞ্চ শ্লোকার্ধিকাস্ত্বেতে লেহা যে সম্যগীরিতাঃ |
সর্পির্মধুভ্যাং তে লেহ্যাঃ কাসশ্বাসার্দিতৈর্নরৈঃ ||৩৫||
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तिमिरस्य च बीजानि कर्कटाख्या च चूर्णिता ||३२||
दुरालभाऽथ पिप्पल्यः कटुकाख्या हरीतकी |
श्वाविन्मयूररोमाणि कोला मागधिकाकणाः ||३३||
भार्गीत्वक् शृङ्गवेरं च शर्करा शल्लकाङ्गजम् |
नृत्तकौण्डकबीजानि चूर्णितानि तु केवलम् ||३४||
पञ्च श्लोकार्धिकास्त्वेते लेहा ये सम्यगीरिताः |
सर्पिर्मधुभ्यां ते लेह्याः कासश्वासार्दितैर्नरैः ||३५||
Adhikarana 23 (36) · Śloka 36
সপ্তচ্ছদস্য পুষ্পাণি পিপ্পলীশ্চাপি মস্তুনা |
পিবেত্ সঞ্চূর্ণ্য মধুনা ধানাশ্চাপ্যথ ভক্ষযেত্ ||৩৬||
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सप्तच्छदस्य पुष्पाणि पिप्पलीश्चापि मस्तुना |
पिबेत् सञ्चूर्ण्य मधुना धानाश्चाप्यथ भक्षयेत् ||३६||
Adhikarana 24 (37-38) · Śloka 38
অর্কাঙ্কুরৈর্ভাবিতানাং যবানাং সাধ্বনেকশঃ |
তর্পণং বা পিবেদেষাং সক্ষৌদ্রং শ্বাসপীডিতঃ ||৩৭||
শিরীষকদলীকুন্দপুষ্পং মাগধিকাযুতম্ |
তণ্ডুলাম্বুযুতং পীত্বা জযেচ্ছ্বাসানশেষতঃ ||৩৮||
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अर्काङ्कुरैर्भावितानां यवानां साध्वनेकशः |
तर्पणं वा पिबेदेषां सक्षौद्रं श्वासपीडितः ||३७||
शिरीषकदलीकुन्दपुष्पं मागधिकायुतम् |
तण्डुलाम्बुयुतं पीत्वा जयेच्छ्वासानशेषतः ||३८||
Adhikarana 25 (39) · Śloka 40
কোলমজ্জাং তালমূলমৃষ্যচর্মমসীমপি |
লিহ্যাত্ ক্ষৌদ্রেণ ভার্গীং বা সর্পির্মধুসমাযুতাম্ ||৩৯||
নীচৈঃকদম্ববীজং বা সক্ষৌদ্রং তণ্ডুলাম্বুনা |৪০|
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कोलमज्जां तालमूलमृष्यचर्ममसीमपि |
लिह्यात् क्षौद्रेण भार्गीं वा सर्पिर्मधुसमायुताम् ||३९||
नीचैःकदम्बबीजं वा सक्षौद्रं तण्डुलाम्बुना |४०|
Adhikarana 26 (40) · Śloka 41
দ্রাক্ষাং হরীতকীং কৃষ্ণাং কর্কটাখ্যাং দুরালভাম্ ||৪০||
সর্পির্মধুভ্যাং বিলিহন্ হন্তি শ্বাসান্ সুদারুণান্ |৪১|
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द्राक्षां हरीतकीं कृष्णां कर्कटाख्यां दुरालभाम् ||४०||
सर्पिर्मधुभ्यां विलिहन् हन्ति श्वासान् सुदारुणान् |४१|
Adhikarana 27 (41) · Śloka 42
হরিদ্রাং মরিচং দ্রাক্ষাং গুডং রাস্নাং কণাং শটীম্ ||৪১||
লিহ্যাত্তৈলেন তুল্যানি শ্বাসার্তো হিতভোজনঃ |৪২|
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हरिद्रां मरिचं द्राक्षां गुडं रास्नां कणां शटीम् ||४१||
लिह्यात्तैलेन तुल्यानि श्वासार्तो हितभोजनः |४२|
Adhikarana 28 (42) · Śloka 43
গবাং পুরীষস্বরসং মধুসর্পিঃকণাযুতম্ ||৪২||
লিহ্যাচ্ছ্বাসেষু কাসেষু বাজিনাং বা শকৃদ্রসম্ |৪৩|
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गवां पुरीषस्वरसं मधुसर्पिःकणायुतम् ||४२||
लिह्याच्छ्वासेषु कासेषु वाजिनां वा शकृद्रसम् |४३|
Adhikarana 29 (43) · Śloka 44
পাণ্ডুরোগেষু শোথেষু যে যোগাঃ সম্প্রকীর্তিতাঃ ||৪৩||
শ্বাসকাসাপহাস্তেঽপি কাসঘ্না যে চ কীর্তিতাঃ |৪৪|
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पाण्डुरोगेषु शोथेषु ये योगाः सम्प्रकीर्तिताः ||४३||
श्वासकासापहास्तेऽपि कासघ्ना ये च कीर्तिताः |४४|
Adhikarana 30 (44) · Śloka 45
ভার্গীত্বক্ ত্র্যূষণং তৈলং হরিদ্রাং কটুরোহিণীম্ ||৪৪||
পিপ্পলীং মরিচং চণ্ডাং গোশকৃদ্রসমেব চ |৪৫|
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भार्गीत्वक् त्र्यूषणं तैलं हरिद्रां कटुरोहिणीम् ||४४||
पिप्पलीं मरिचं चण्डां गोशकृद्रसमेव च |४५|
Adhikarana 31 (45) · Śloka 46
তলকোটস্য বীজেষু পচেদুত্কারিকাং শুভাম্ ||৪৫||
সেব্যমানা নিহন্ত্যেষা শ্বাসানাশু সুদুস্তরান্ |৪৬|
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तलकोटस्य बीजेषु पचेदुत्कारिकां शुभाम् ||४५||
सेव्यमाना निहन्त्येषा श्वासानाशु सुदुस्तरान् |४६|
Adhikarana 32 (46-47) · Śloka 47
পুরাণসর্পিঃ পিপ্পল্যঃ কৌলত্থা জাঙ্গলা রসাঃ ||৪৬||
সুরা সৌবীরকং হিঙ্গুঃ মাতুলুঙ্গরসো মধু |
দ্রাক্ষামলকবিল্বানি শস্তানি শ্বাসিহিক্কিনাম্ ||৪৭||
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पुराणसर्पिः पिप्पल्यः कौलत्था जाङ्गला रसाः ||४६||
सुरा सौवीरकं हिङ्गुः मातुलुङ्गरसो मधु |
द्राक्षामलकबिल्वानि शस्तानि श्वासिहिक्किनाम् ||४७||
Adhikarana 33 (48) · Śloka 49
শ্বাসহিক্কাপরিগতং স্নিগ্ধৈঃ স্বেদৈরুপাচরেত্ |
আক্তং লবণতৈলাভ্যাং তৈরস্য গ্রথিতঃ কফঃ ||৪৮||
খস্থো বিলযনং যাতি মারুতশ্চ প্রশাম্যতি |৪৯|
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श्वासहिक्कापरिगतं स्निग्धैः स्वेदैरुपाचरेत् |
आक्तं लवणतैलाभ्यां तैरस्य ग्रथितः कफः ||४८||
खस्थो विलयनं याति मारुतश्च प्रशाम्यति |४९|
Adhikarana 34 (49-50) · Śloka 51
স্বিন্নং জ্ঞাত্বা ততশ্চৈব ভোজযিত্বা রসৌদনম্ ||৪৯||
বাতশ্লেষ্মবিবন্ধে বা ভিষগ্ ধূমং প্রযোজযেত্ |
মনঃশিলাদেবদারুহরিদ্রাচ্ছদনামিষৈঃ ||৫০||
লাক্ষোরুবূকমূলৈশ্চ কৃত্বা বর্তীর্বিধানতঃ |৫১|
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स्विन्नं ज्ञात्वा ततश्चैव भोजयित्वा रसौदनम् ||४९||
वातश्लेष्मविबन्धे वा भिषग् धूमं प्रयोजयेत् |
मनःशिलादेवदारुहरिद्राच्छदनामिषैः ||५०||
लाक्षोरुबूकमूलैश्च कृत्वा वर्तीर्विधानतः |५१|
Adhikarana 35 (51) · Śloka 51
সর্পির্যবমধুচ্ছিষ্টশালনির্যাসজং তথা ||৫১||
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सर्पिर्यवमधुच्छिष्टशालनिर्यासजं तथा ||५१||
Adhikarana 36 (52) · Śloka 52
শৃঙ্গবালখুরস্নাযুত্বক্ সমস্তং গবামপি |৫২|
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शृङ्गबालखुरस्नायुत्वक् समस्तं गवामपि |५२|
Adhikarana 37 (52) · Śloka 52
তুরুষ্কশল্লকীনাং চ গুগ্গুলোঃ পদ্মকস্য চ ||৫২||
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तुरुष्कशल्लकीनां च गुग्गुलोः पद्मकस्य च ||५२||
Adhikarana 38 (53) · Śloka 53
এতে সর্বে সসর্পিষ্কা ধূমাঃ কার্যা বিজানতা |৫৩|
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एते सर्वे ससर्पिष्का धूमाः कार्या विजानता |५३|
Adhikarana 39 (53) · Śloka 53
বলীযসি কফগ্রস্তে বমনং সবিরেচনম্ ||৫৩||
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बलीयसि कफग्रस्ते वमनं सविरेचनम् ||५३||
Adhikarana 40 (54) · Śloka 54
দুর্বলে চৈব রূক্ষে চ তর্পণং হিতমুচ্যতে |
জাঙ্গলোরভ্রজৈর্মাংসৈরানূপৈর্বা সুসংস্কৃতৈঃ ||৫৪||
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दुर्बले चैव रूक्षे च तर्पणं हितमुच्यते |
जाङ्गलोरभ्रजैर्मांसैरानूपैर्वा सुसंस्कृतैः ||५४||
Adhikarana 41 (55) · Śloka 55
নিদিগ্ধিকাং চামলকপ্রমাণাং হিঙ্গ্বর্ধযুক্তাং মধুনা সুযুক্তাম্ |
লিহন্নরঃ শ্বাসনিপীডিতো হি শ্বাসং জযত্যেব বলাত্র্যহেণ ||৫৫||
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निदिग्धिकां चामलकप्रमाणां हिङ्ग्वर्धयुक्तां मधुना सुयुक्ताम् |
लिहन्नरः श्वासनिपीडितो हि श्वासं जयत्येव बलात्र्यहेण ||५५||
Adhikarana 42 (56) · Śloka 56
যথাঽগ্নিরিদ্ধঃ পবনানুবিদ্ধো বজ্রং যথা বা সুররাজমুক্তম্ |
রোগাস্তথৈতে খলু দুর্নিবারাঃ শ্বাসশ্চ কাসশ্চ বিলম্বিকা চ ||৫৬||
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यथाऽग्निरिद्धः पवनानुविद्धो वज्रं यथा वा सुरराजमुक्तम् |
रोगास्तथैते खलु दुर्निवाराः श्वासश्च कासश्च विलम्बिका च ||५६||
Adhikarana puShpikA · Śloka 51
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে কাযচিকিত্সাতন্ত্রে হিক্কাশ্বাসপ্রতিষেধো নাম (ত্রযোদশোঽধ্যাযঃ, আদিতঃ) একপঞ্চাশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৫১||
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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे हिक्काश्वासप्रतिषेधो नाम (त्रयोदशोऽध्यायः, आदितः) एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ||५१||